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बरगद के पत्ते पर बालक | The child on the banyan leaf
पूरा सत्संग, श्लोक और अर्थ के साथ: https://occultguide.com/satsang/bargad-ke-patte-par-balak
तैरते-तैरते थक जाना कमज़ोरी नहीं। मार्कण्डेय भी थके थे। और भगवान का पहला वाक्य था — "मैं जानता हूँ, तुम थक गए हो।" वो आपकी थकान जानते हैं।
जो डूबता दिखता है, वो नष्ट नहीं हुआ। आपका पुराना घर, आपके बिछड़े लोग, आपकी टूटी उम्मीदें… सब उसी बालक के भीतर सुरक्षित हैं। "ततस्ते दर्शितं जगत्।"
अंत में मार्कण्डेय ने क्या किया? "तमेव शरणं गतः।" उसी की शरण। आप भी, जब सारे हाथ-पैर थक जाएँ, तो बस इतना कहिए — "मैं तुम्हारी शरण में हूँ।"
वीडियो: https://youtu.be/BQb9CwcQtCI
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