Latest / Baba ji Vijay Vats / 5 Jul 25 - LSD: साधना का शॉर्टकट या भ्रम? संत और निंदक में कोई फर्क नहीं! कबीर का दोहा निंदक नियरे राखिए।
Transcript
- 0:03गोविंद भट्टाचार्य कबीर जी का एक प्रसिद्ध दोहा।
- 0:18निंदक नियर राखिये आंगनकुटी सवाय बिन जल के साबुन में न सगला मैल
- 0:33धुए चाय। तुम्हें कभी कभी हैरानी होगी शायद
- 0:48कि बिल्कुल अनपढ़ लोग जिन्होंने पाठशालाओं का मुख नहीं देखा।
- 1:03कबीर जैसे नानक जैसे नानक एक दो बार गए थे।
- 1:12वो भी उस अप्रिसेम आनंद तक पहुंचने में कामयाब हो रहा है और
- 1:22तुम इतनी डिग्री ले लेते हो। दुनिया भर की सूचनाएं तुम्हारे
- 1:29पास एकत्रित है लेकिन दुखी हो कभी तुम्हारे मन में नहीं आता अगर इन
- 1:39सूचनाओं में आनंद और खुशी होती। तो कबीर के पास तो सूचना ही थी।
- 1:51नानक के पास ज्यादा सूचना नहीं थी और परम आनंद को छूवाया इन्होंने।
- 2:02कहीं ऐसा तुम्हें ज्यादा सूचनाएं तुम्हारे आनंद में जाने के लिए
- 2:12वादा होती हैं। ऐसा ही है।
- 2:20अनपढ़ कबीर के दो के पीछे चल के लोगों ने डॉक्टरेट का ये जो
- 2:30प्रश्न आए थे, ये पीएचडी में है। शब्द उठाया कबीर का।
- 2:43और कभी जानने की चेष्ठा नहीं की होगी।
- 2:46अभी भी डिग्रीज़ इकट्ठी करने पर तुले हुए है, यह बात समझ में नहीं
- 2:53आई। जो थीम है कहिये ये डिग्रीज़ ही
- 2:58तुम्हारे गले की फांस तो नहीं बन जाएगी?
- 3:07ऐसा ही है। ऐसा क्यों है?
- 3:19क्योंकि उस परम अस्तित्व का जो तुम हो, जो कभी बदला नहीं कभी
- 3:24नहीं बदला अनचेंजेबल विल नेवर चेंज।
- 3:34उसका सूचनाओं से कोई समझ नहीं है। सूचनाएं जीस स्तर पर एकत्रित होती
- 3:40हैं। वो हमारे से है, हमारी है मैंने
- 3:46कल एलएसडी का रिकॉर्ड किया था। 1938 में रिचर्ड हॉफमैन ने
- 4:02अल्बर्ट हॉफमैन ने, जो कि एक शुष्य वैज्ञानिक था एक रसायन की
- 4:13खोज में उस रसायन का नाम था एल एस।
- 4:20लाइथेरचेक डाइएथिल एमाइड एल एस पी लेथेरचेक डाइएथिल एमाइड इन करना।
- 4:38थोड़ी देर उसने रिसर्च की, लेकिन उसके पास हाफ में मर गया, लेकिन
- 4:45खोज जारी अमेरिका के डॉक्टर रिचर्ड अल्पर उन्होंने खोज को आगे
- 4:56बढ़ाया। एलएसडी का पूरा आविष्कार हो गया।
- 5:06यह एक ऐसा साल्ट था आज भी है जो हमारे ब्रेन के।
- 5:16सैराटोनिन रिसेप्टर्स को छेड़छाड़ करता है और उनको कॉन्शसनेस की
- 5:27बुलंदियों पे पहुंचा देता है। एक एक शब्द को सुनते जाना।
- 5:34और कॉन्शसनेस की बलिंदियाँ ही परमात्मा का दर्शन है।
- 5:40सीटौरी दूर दराज बैठे हुए हैं, उस कलश को निहार लेना है सीटौरी।
- 5:56और उस करिश् के साथ जाके चिपक जाना है उसमें एक आकार भोजन वह
- 6:02समाधी तो रिचर्ड एल पर्ट ने एलएसटी की खोज की और एलएसटी खाया
- 6:11उन्होंने। हैलस्टिका के जो चीज़ उन्होंने
- 6:18देखी संसार का रंग बदल दिया। अजीबोगरीब, इतना सुंदर और
- 6:29अट्रैक्टिव। कलर पूर्णबव हो गया बड़ा हैरान
- 6:34हुआ आनंद के उन्माद की लहरें गहरे अंतराल में से उकसतीं उसके
- 6:44ब्रम्परंतर को छू लेतीं। वहाँ जाकर वक्त की गति बदल गई थी।
- 7:05इसका शानदार ट्रांसफर मिशन देखकर रिचर्ड अल्बर्ट हैरान हुआ।
- 7:16तो उसने खोज की कि भारत में ऋषिगण इसी शिखर को देखने के लिए भांग,
- 7:26गांजा वगैरह का इस्तेमाल करते हैं।
- 7:35लेकिन उसने यद्यपि दूर से देखा तो वो कलश लेकिन उसके करीब नहीं
- 7:41पहुंचा था। उसमें एकाकार नहीं हुआ था तो उसने
- 7:51घोषणा की भाई। 1931 में इनका जन्म हुआ है और की
- 8:001965 में इन्होंने घोषणा की कि जो पूर्व में 1213 वर्षों में होता
- 8:10है। तो हम 2 मिनट में करके देख
- 8:15लगेंगे। जीस आनंद में 1213 वर्ष लग जाते
- 8:21हैं। बुध को महावीर को बड़े बड़े
- 8:26विषयों को हम उसे 2 मिनट में कर देंगे।
- 8:32उसे समझाया कि ये सब न्यूरॉन्स के सैटोनिन अक्सेप्टन्स का कमाल है।
- 8:46वैज्ञानिक तो वैज्ञानिक ही होता है लेकिन काश ये चीज़ स्थायी हो।
- 8:56अब तो वह रोज़ सेवन करने लगा है का का सेवन करते करते वह इसका
- 9:04अडिक्ट है, अडिक्ट हो गया। अगर न खाता है इसे तो उसे दुनिया
- 9:12रंगी नजर ना दे। इसलिए तुम्हें भी दुनिया अच्छी
- 9:17नहीं लगती है। तुमने दुनिया का वास्तव के स्वरूप
- 9:20देखा है, संत गुर्जर दुनिया बड़ी प्यारी लगती है, कारण क्यों देखता
- 9:27है उसे इस ब्राह्मण के कण कण में वह विराट?
- 9:33जो अद्वितीय सौंदर्य की प्रतिमा है क्योंकि वह उस स्थल पर पहुँच
- 9:40गया जहाँ थोड़ी देर के लिए है रिचर्ड अल्बर्ट पहुँच जाया करते
- 9:45थे। वे तो खिस्ते चले गए, रोज़ खिस्ते
- 9:52चले गए, लेकिन तल ये था की तल वहाँ से परमानेंट नहीं हो सका।
- 10:02उस तल पर पहुंचने के लिए उसे लाइसेंस डाइएथिल।
- 10:10एमाइट इसकी जरूरत पड़ती है। एल एस डी से रोज़ एक सीमत
- 10:18मंत्रालय नहीं पड़ती। मैं तो जैसे ही पागल हो गया था और
- 10:28कोई भी व्यक्ति पागल हो जाता है। अभी बुद्ध को ये चीज़ मिली नहीं
- 10:35होती, सिंघासणों को छोड़ देते हैं महावीर कोई चीज़ मिली नहीं होती,
- 10:42सिर्फ झलक मिली होती है, सिंघासणों को त्याग देते हैं और
- 10:47तुम कहोगे इतना बड़ा त्याग। नहीं, कोई त्याग नहीं क्योंकि
- 10:53तुमने ये देखा नहीं कि उन्होंने पाया क्या तुम देखते हो?
- 10:59उसने हाथों में कंकणपथर गिरा दिया।
- 11:04तुम ये नहीं देखते कि उन्हें हाथों ने अमूल्य हीरे जोहारात।
- 11:10उठा लिए यही तुम्हारी मूर्खता है और इसी को कबीर कहते हैं।
- 11:23लेकिन 1 दिन जब रिचर्ड अल्फर्ट जीसको चक की रोज़ खाऊंगा।
- 11:34लेकिन क्यों ना मिला जाए उन दृश्यों से जो हिंदुस्तान में
- 11:41परमानेंट इस चीज़ की उत्पत्ति करते हैं?
- 11:44कैसे होता है ये मेरा अनुभव तो परमानेंट नहीं हुआ।
- 11:51मुझे तो रोज़ इसका सेवन करना पड़ता है।
- 11:54ध्यान रखना समाधि के बाद किसी व्यक्ति हो फिर से ध्यान में जाने
- 11:59की आवश्यकता नहीं पड़ती। यद् भी वो पीता है क्योंकि करण
- 12:05में धरना सब छूट गया। कुछ ना बचा करने के लिए कुछ ना
- 12:11बचा पाने के लिए कुछ ना बचा खाने के लिए तो वह रोज़ उस स्थल पर
- 12:19जाना चाहता है। यह दशा है योगी की जो एक बार मिल
- 12:28गया उस परम तक। लेकिन रिचा डैश बरते।
- 12:34सोचा कि इसकी कोई ऐसी भी व्यवस्था होती होगी जो स्थाई होगी।
- 12:40जो रोज़ बदलती है तो हिंदुस्तान में आ गया बाबा नीम करौली के पास।
- 12:54नीम करौली हनुमान जीके भगत जैसे कह दो के हनुमान जीके भक्ति करते
- 13:02करते उसमें समर्पित हो गए थे। हनुमान जी को दी हो गए थे तो
- 13:12रिचर्ड एल पर दा के नीम करौली के चरण में गिर।
- 13:19बिना बोले नीम करोली उसकी बात को समझ गए, क्योंकि वह भीतर की पुकार
- 13:33को सुनता है। वह तुम्हारी बाहर जितना जर्रे
- 13:37जर्रे में विद्यमान है। तुम्हारे अंदर भी जरे जर्रे में
- 13:40विद्यमान है। कहीं जाता उससे करीब कोई है नहीं।
- 13:45उपनिश्चित कहते हैं दूर से दूर है और पास से पास है तुम्हारे हृदय
- 13:52का बिल्कुल पास है, तुम्हारे अस्थि से कोई बिल्कुल पास है, ऐसी
- 13:57कोई जगह नहीं है या वो है। बीन नावें नाहीं, कोठा बीन नावें
- 14:06नाहीं कोठा नाम कहते हैं परमात्मा के वजूद को वह बनानक तुमने नाम को
- 14:13जप में डाल दिया, इसलिए दुखी हो और दर दर पूछते हो?
- 14:21ग्रंथियों से पूजते हम दुखी क्यों हैं?
- 14:23बाबा बस दुखी इसलिए हो तुम कि तुम अपने से दूर कहीं निकल आए हो।
- 14:34उस परम सुंदर एकांत को त्याग कर तुम्हें भीड़ को चुना, कोलाहल को
- 14:39चुना। और ये कोलाहल दुखदायी है संसार का
- 14:44तुम उस मौन में कभी उतरते नहीं और इसलिए तुम दुखी हो तो नीमकरौली ने
- 14:56बिना उसे सब बता दिया। रिचर्ड अल्बर्ट ने कहा, मैं समाधि
- 15:08के लिए आपके पास आया हूँ, मैंने कडका रिसर्च किया है, खाया भी है
- 15:20बिलकुल उसी कल पे पहुँच जाता हूँ मैं जैसा ऋषियों ने।
- 15:24वर्णन किया है कि आप मुझ पर क्या कुछ कृपा करेंगे, तुने क्या है?
- 15:35क्या है वो चीज़ तुने? एल एस डी को दिखा दिया?
- 15:48बंदा रिचर्ड एल पर्थ मोमुक्षु था प्यास लगी थी।
- 15:57प्यास लग ही जाएगी जो व्यक्ति सतौरी की झलक देख लेगा और एलएससी
- 16:02से उसे सतौरी की झलक में। इसलिए मेरे को कहता हूँ कि मेरे
- 16:07जीते की स्टोरी को उपलब्ध हो जाना तुम जल्दबाजी करने में तुम उसको
- 16:14खोदोगे ये उलट बांसी है, तुम जितना जल्दी मेरे कहने से पाने की
- 16:21चेष्टा करोगे उतनी देर हो जाएगी। तुमने भीतर से अपने हृदय को शीतल
- 16:27रखना है कि जब मिलेगा, मिल जाएगा, नहीं मिलेगा तो नहीं मिलेगा और
- 16:32तुम पाओगे, तुम्हारा हृदय शांत होने लगा।
- 16:36अगर तुमने शर्त लगा दी जल्दबाजी की कि अभी मिल जाए, अभी मिल जाए।
- 16:40बाबा का पता नहीं कब चल जाए। तुमने देखा कभी तुमने गाड़ी
- 16:50पकड़ने हो, वक्त 2 मिनट रह जाओ और यहाँ जाना उस घर की चाबी तुम कहीं
- 16:58रख कर भूल गए। और तुम खंगाल रहे हो।
- 17:02सारा घर खंगाल दिया तुमने गाड़ी आने को है।
- 17:09जल्दबाजी में तुम्हे पता नहीं चला, गाड़ी निकल गई, तुम्हारा मन
- 17:14शांत हुआ, अब तो गाड़ी चली गई, देखा तो सामने में छुपे पड़ी है।
- 17:21जल्दबाजी से तुम सामने पड़ी चीज़ को खो देते हो सामने पड़ी नहीं जो
- 17:26खुद की खुदी को खो देता है जल्दबाजी में खुद की खुदी को खो
- 17:33देता है, जल्दबाजी में और जल्दबाजी कभी मत करना।
- 17:39अगर मैं कहता हूँ मेरे रहते रहते उसकी एक बार झलक पार आपको जुड़ाना
- 17:46नहीं है उसका काम मैं ठहरने की बात करता हूँ।
- 17:55आप पिता ठहर जाओ, आप पिता ठहर जाओ के उसे ठहरने में ही आपको ठहराव
- 18:01में ही मिलेंगे। सटोरी की झलक मैं तुम्हें कोई
- 18:04व्यापार करना नहीं हो सकता, मैं तुम्हें कोई संस्था बनाना नहीं हो
- 18:12सकता। कोई फॉलोवर से इकट्ठा करना नहीं
- 18:17मैं तुम्हें कोई 10 कॉमेंडमेंट्स नहीं देता, मैं तुम्हारे ऊपर कोई
- 18:23बंधन नहीं लागता, मैं सिर्फ तुम्हें उपाय बताता हूँ, घर जाके
- 18:28करो यहाँ ठहरने भी नहीं देता। अपने घर जो मुकाम पे जो ठहराव है
- 18:37हर चीज़ की फैसिलिटीज है वहाँ वहाँ ज्यादा आराम से तुम अपनी
- 18:43साधना को कर पाओगे इसलिए मैं रोज़ कहता हूँ।
- 18:50कि किसी तरह किसी तरह एक बार सदोरी को पालो ताकि तुम्हें
- 18:58विश्वास हो जाएगा। वो है यह विश्वास ही तुम्हें ले
- 19:01के जाएगा उस पर परमपिता परमात्मा की तरफ।
- 19:09तुम कोशिश भी करते रहो, लेकिन कोशिश करने में ही तुम ज्यादा
- 19:14दौड़ने लगते हो, यही बाधा बन जाता है।
- 19:19ज्यादा दौड़ तुमसे व्यापार कराती है।
- 19:21मैं ज्यादा दौड़ने वालों को व्यापारी करता हूँ।
- 19:25फिर ये भी बना लो फिर वो भी बना लो फिर ज्यादा एकड़ का आश्रम बना
- 19:31लो, फिर रहने की व्यवस्था भी कर लो।
- 19:34फिर ये भी कर लो वो भी कर लो, फिर लोगों को इकट्ठा भी कर लो, फिर
- 19:41डांस करके भी दिखाओ। तांडव नृत्य भी करके दिखाओ।
- 19:46ये सब नहीं चलता वहाँ बड़े साफ सुथरे लोग पहुँच जाते हैं कभी जो
- 19:58ज़रा भी सर्कस नहीं करते। वो पहुंचते हैं वहाँ कबीर जैसे
- 20:08लोग एलएसडी से देखो एलएसडी तो आज बैन है।
- 20:22भांग से देख सकते हो तुम, लेकिन अफसोस की बात है।
- 20:30इस अध्यात्मिक मुल्क ने जीस आध्यात्मिकता की उचाई को छुआ।
- 20:35उसने सतौरी को देखने की जो पद्धतियां थी, जो रसायन की चीजें
- 20:42थी, उनको प्रतिबंधित क्यों कर दिया?
- 20:46जो मुझे समझ नहीं आया? बस इतना ही समझाया।
- 20:50कि राज़ करने वाले मूर्ख थे अज्ञानी थे उन्हें कोई इन्ट्रेस्ट
- 20:56न था आध्यात्मिकता में उन्हें सिर्फ इन्ट्रेस्ट था राजनीति में
- 21:01इसलिए अध्यात्म की चीजों को उन्होंने अधिमान्य दिया।
- 21:07वो चुक गए, खुद तो चुक गए, कोई बात नहीं लेकिन हिंदुस्तान को चुक
- 21:14दिया। यह मुश्किल है, उन्हें ऐसा नहीं
- 21:18करना चाहिए था। शरीर का कोई नुकसान नहीं होता।
- 21:23बैंक का क्या नुकसान होता है? थोड़ी देर के लिए तुम्हारे सेरा
- 21:29ट्यूनिंग के अक्सेप्टर्स प्रभावित होते हैं।
- 21:33सेरा ट्यूनिंग के हैप्पी हार्मोन्स हैं, लोपामिंग सेरा
- 21:36ट्यूनिंग जो तुम्हारी न्यूरॉन में होते हैं उनके साथ छेड़ छेड़ करते
- 21:43हैं। इसके मित्र के जो केमिकल है
- 21:50एलएसडी के भीतर जो केमिकल मैंने आपको बताया लाइसेक्सिक
- 21:54डाइएथिलैमाइट ऐसे ही कुछ सर्ट्स होते हैं केमिकल होते हैं भगवान
- 22:01की हिस्टरी में क्या नहीं? सब है 1 दिन खोज लिया जाए, लेकिन
- 22:08हमारे संतो ने जो खोज की वो चरम थी, परम थी उस खोज से ज्यादा शायद
- 22:16तुम नहीं खोज पाओगे। जो एल एसटी में मिलता है, बिल्कुल
- 22:23वो ही भांग में मिलता है और शंकर भवन भांग गांजा रगड़ के पीते हैं।
- 22:34उन्होंने कभी कन्डेम नहीं किया। इसको मत पियो।
- 22:39लेकिन तुम्हें ठीक नहीं लगता। तुम ज्यादा बड़े वैज्ञानिक हो तो
- 22:44रोक सकते हो लेकिन एक बात ध्यान रखना फिर ये गरीब जनता ना इन्हें
- 22:49भूख से निजात मिलेंगे ना इन्हें दुख से निजात मिलेंगे।
- 22:54एक तरफ की निजात तो इन्हें दे दो बिचारों को।
- 22:59या तो भूख से नहीं जागते दो। इन्हें खाने को भोजन दो रहने को
- 23:08मकान दो, पहनने को कपड़ा दो, हाथों को रोजगार दो।
- 23:16अर्थव्यवस्था को पथरी के ऊपर ले के आओ अगर नहीं कर सकते तो कम से
- 23:22कम ये करो की इनके आत्मिक उत्थान हो।
- 23:26ये उस स्तर पर पहुँच जाए कि गरीबी के भीतर भी गुज़ारा कर लो।
- 23:31दुखी सुखी खाई के ठंडा पानी पी। देख भरा झोपड़ी मत ललचा वे जी
- 23:37दोनों में से कोई काम तो कर रहा तुम बीच में तड़पा के ना मारो
- 23:45जनता कह रही है ना खुदा ही मिला ना बसा ले सनम हमारी आध्यात्मिक।
- 23:54प्रगाढ़ता जो हमने छुई हमारे रिशियों ने ना हमें आज वो मिल रही
- 23:58है और ना हमें उस वंश का जो गुप्त वंश ने छुआ संसार का पीक।
- 24:14जब सेना की यात्री ने आके देखा, फरहान के हर घर में ऐसे सोने के
- 24:23सिक्के पड़े जैसे गेहूं के हम अम्बार लगाते थे।
- 24:31हमारे पंजाब में आके। मंदिरों में देखना कभी गेहूं के
- 24:35वक्त अम्बार लगे होते हैं। बड़े बड़े ऐसे ही अशर्फियों के
- 24:44सिक्खों के अम्बार लगे होते थे इसलिए इसको सोने की चिड़िया कहा।
- 24:52फुफ हाँ देख के घबरा गया इतना सोना उसने अपनी किताबों में वर्णन
- 24:58किया। भारत सोने की चिड़िया है, लेकिन
- 25:03आज उल्टा है। सोने की चिड़िया भी थी।
- 25:08आध्यात्मिक संरचना भी इतनी ऊंचे लेवल की थी।
- 25:13आज कुछ भी नहीं आज पल्ले क्या है? आज पल्ले हैं चकमा देने वाली गुरु
- 25:22जी नहीं तुम सद्गुरु। कह देती हो।
- 25:26जी नहीं, तुम आज सारे कह देते हो, गुरु कह सकते हो।
- 25:31ये धोखा देने वाले हैं। इनकी खुद की बात में शांत नहीं
- 25:35हुई। अभी मेरे पास थोड़ी दिन पहले डेरा
- 25:41सच्चा सौदा के एक वक्तब है। मुझे कैसे बाबा को पिछले जनो का
- 25:49दंड मिला है? मैंने कहा गलत है, पिछले जन्म का
- 25:56दंड मिला था राम कृष्णम परमहंस को कैन्सरायटिस हो गया था, उन्होंने
- 26:03इस श्रम में कोई काम ऐसा नहीं किया जो इनके गले का कैन्सरायटिस
- 26:09होता है। खाना पीना माहौल हो जाए एक बूंद
- 26:12पानी की पी न सके, वो तो पिछले जन्म का जिसका कारण पता न हो
- 26:23तुम्हें तो कारण पता है कि तुम्हारे पापा को जेल क्यों है?
- 26:29रेप के इसमें और बड़ी छानबीन के बाद इतने बड़े अस्तित्व का मालिक
- 26:36इतने करोड़ो शिष्यों का गुर ऐसे कैसे पकड़ा जा सकता है?
- 26:43बिना बात के तुम्हारे बाबा आसार हैं।
- 26:50आगे जज पागल थोड़ी है, किसी सरकार के कहने से काम थोड़ी करेंगे,
- 26:55न्याय पद्धति को थोड़ी बदल देंगे और फिर जज तो बदलते रहते हैं,
- 27:01सरकारों भी बदलती रहती हैं। उन सरकारों ने आगे क्या किया?
- 27:06उन्होंने देखा होगा कि यह आदमी वाक्य ही गुनाहगार है, एक होती
- 27:17कुदरत की मार, कुदरत की मार जैसे कृष्णमूर्ति जिदु कृष्णमूर्ति को।
- 27:32रामकृष्णा परमहंस को गले का हो गया पैंक्रिएटिक कैंसर इतिस हो
- 27:37गया जिद्दू कृष्णमूर्ति जो पिछले जनम की कुछ ना कुछ हो गई जिसने
- 27:45हमारे सामने ही किया। और प्रत्यक्ष कारण मौजूद हैं और
- 27:50उनके ऊपर एलीगेशन लगाने वाले मौजूद हैं।
- 27:53तो फिर तुम कैसे कह सकते हो पिछले जाम में कुछ किया होगा बाबा ने इस
- 27:57जनम इस जनम में तो बड़े शुद्ध वुद्ध भ्रम जारी हैं, दिल के
- 28:04बहलाने को गाली फिर ख्याल अच्छा है।
- 28:11नहीं नहीं भ्रांतियो न हमे मारा और अगर मैं तोड़ता हूँ इन
- 28:17भ्रांतियो को तो भक्त लोग नाराज हो जाते हैं मैं कहता हूँ मुझे
- 28:24तुम्हारी नाराजगी से कोई फर्क नहीं पड़ता।
- 28:27बशर्ती की मैं सत्य बोल रहा हूँ। तुम्हारी नाराजगी की कीमत कुछ भी
- 28:33तो नहीं है। सत्य नहीं टूटना चाहिए सत्य मय
- 28:40भजय के। तुम्हारी नाराजगी मोह लेने को मैं
- 28:46तैयार हूँ, लेकिन सत्य की नाराजगी मोह लेने को मैं तैयार हूँ।
- 29:07निंदक निरहे राखी है आंगन कोटी शबा है कबीर के शब्द।
- 29:16तुम्हारे तथाकथित गुरुओं से बिल्कुल विपरीत पड़ते हैं।
- 29:22तुम निंदा नहीं सुनना चाहते अपने गुरु की और कबीर बिल्कुल उल्टा
- 29:28बोलते हैं और उसके बोलने का कारण है तुमने पूछा।
- 29:38कि इसका कारण क्या है? इनके गहरे अर्थों में, रहस्यत्मक
- 29:47गुड़ अर्थों में हमें लिखनी है। चलो हम चलते हैं।
- 29:56स्वभाव ते मन अपनी निंदा सुनना नहीं चाहता और तुम जिसके साथ ही
- 30:03चिपटे हो, वो चाहे तुम्हारा भाई भतीजा है, रिश्तेदार है, परिवार
- 30:10है, माँ बाप है या गुरु है? जिसके साथ ही तुम चिपटे हो, वो
- 30:14चाहे तुम्हारी मान्यताएँ ही तो ना हो, शब्द को वाइड्ली ले लेना,
- 30:22ब्रॉड स्पेक्ट्रम में जिसके साथ तुम चिपटे हो, वो चाहे तुम्हारी
- 30:30मान्यताएँ हैं। चाहे रिश्तेदारी हो चाहे उसके साथ
- 30:37तुम्हारा कोई भी संबंध है, तुम जिसके साथ क्लिंग होते हो, उसके
- 30:48साथ बंध जाते हो, वह तुम्हारे बंधन का अकारण बन जाता।
- 30:58कबीर कहते हैं, निंदक नियरे राखी है, और तुम निंदा के योग्य हो
- 31:06जाते हो, जिसने निंदित कार्य किया।
- 31:15उसके बारे में अगर मैं निंदा ना करूँ तो मैं शक्ति के साथ इंसाफ
- 31:23ना करता हूँ। ये बात ठीक है, गलत निंदा से
- 31:32व्यक्ति पे भार। लेकिन सही निंदा से व्यक्ति पर
- 31:36भार नहीं पड़ता। इसे सुनते ना मैं किसी फिर किसी
- 31:39और एग्ज़ैम्पल से इस बात को आपको बताऊँगा कि सही व्यक्ति की निंदा
- 31:46करने से कैसे भार पड़ता है। ये अलग सा विषय है।
- 31:50बाद में तय करेंगे इसे। आज सही से निंदा की बात करें।
- 32:00निंदा के निहारे राखी है आँगन अकोठी सवार तुम सबको देख सकते हो।
- 32:12सब की त्रुटियों को देख सकते हो क्योंकि आँखें हैं तुम सामने वाले
- 32:20लोगों को देख सकते हो। किसी व्यक्ति ने चित्र बना दिया,
- 32:25तुम उसको अच्छी तरह से देख फर्क दोगे उसमें गलतियाँ निकाल सकते
- 32:31हो। तुम दूसरों को देख सकते हो
- 32:39क्योंकि आँखें सदा बाहर ही देखते हैं और उनमें गलतियाँ भी निकाल
- 32:47सकते हो। उसी को निंदक कहते हैं कभी।
- 32:53कबीर कहती है अगर तुम्हारी को निंदा करे और तुम्हारा दुश्मन है
- 33:00अध्यात्म के मत से अगर देखा जाए तो कबीर 100% सही।
- 33:10जो भी बात जो भी अनुभव तुम्हें बाहर से तोड़े, भीतर की तरफ़
- 33:17उन्मुख कर दे, वह तुम्हारा मित्र है।
- 33:24भगवान कृष्ण का मन ही तुम्हारा मित्र और मन ही तुम्हारा शत्रु।
- 33:29जब मन बेहरगामी होता है तो तुम्हारा शत्रु होता है, मन जब
- 33:37अन्तर्मुखी होता है तो तुम्हारा मित्र होता है।
- 33:42जो मन तुम्हें अंत में ले जाए, खींच के वह तुम्हारा मित्र हो, जो
- 33:47मन तुम्हें बाहर की। दृश्यों में उलझाएं बाहर के सुंदर
- 33:58संगीत से जोड़ दे, शब्दों से जोड़ दे, बाहर के मौसमों से जोड़ दे।
- 34:07क्लाइमेट से जुड़ते, सिचुएशन से जुड़ते परिस्थितियों से जोड़तें
- 34:12वमंत तुम्हारा शत्रु का काम क्या है?
- 34:20तुम्हारी आलोचना करना जो तुम्हारे में नुक्स है, उनको निकाल देना है
- 34:27और कबीर कहते हैं ये काम तुम खुद नहीं कर सको।
- 34:35कबीर कहते हैं, ये काम खुद न कर सकोगे तुम क्योंकि तुम अपने भीतर
- 34:39झांकते हो, यह काम कोई दूसरा कर सकता है और वो कर सकता है निंदा
- 34:53का। अंगन कुटी छवाय।
- 34:56उसको तो घर में ही कोई जगह दे देना, उसके लिए पांडा लगा लेना,
- 35:02सोने रहने, खाने की व्यवस्था कर देना, नहाने धोने की व्यवस्था कर
- 35:07देना, उसको तो कहें कि आप यहीं बैठे रहो, बड़ा सुंदर उपाय बताया।
- 35:16तुम तो थोड़ा सा तुम्हें कोई तुम्हारी तरफ देख कर मुँह भी मटका
- 35:22ले उच्च काले और तुम्हें सारी रात नींद नहीं आती।
- 35:36कबीर कहते हैं, अगर कोई आपकी निंदा करता है क्योंकि वही
- 35:44तुम्हारा मित्र है, तुम्हारा मन क्योंकि बहरगामी है, इसलिए
- 35:53तुम्हारे अंतर के दोषों को मन नहीं देख सकता।
- 35:59कौन देख सकता है? निंदक निंदक भी बेहरगामी है।
- 36:06वो भी बाहर देखता है लेकिन वो तुम्हारी गलत कामों को देखता है।
- 36:13तुम उसके गलत कामों को देखते हो। इसलिए तुम्हारे लिए नींद का बहुत
- 36:21शुभ है। उसके लिए तुम शुभ हो क्योंकि तुम
- 36:26उसकी निंदा करते हो। सामने खड़ा हुआ व्यक्ति अच्छी तरह
- 36:30से नज़र आता है। उसके दोष भी ठीक से समझाते हैं।
- 36:37तुम बिना मिरर के अपनी तस्वीर नहीं देख सकते, कभी ख्याल किया
- 36:43तुम्हे अपना तस्वीर देखने के लिए दूसरे का साथ लेना पड़ता है।
- 36:48वो चाहे मौन झील हो, चाहे तालाब, सरोवर हो।
- 36:53क्या है दर्पण आँखें अपने आप को नहीं देख सकती।
- 37:02आँखें दर्पण से देख सकती हैं। अपने आपको यही मज़ा है और
- 37:09अध्यात्म का ये अंतिम उपाय है। कि जब तक तुम अपने खुद के मैल न
- 37:16देखोगे, अपने खुद के गलतियाँ न देखोगे, अपने खुद के पास न देखोगे
- 37:22तब तक बदलाव नहीं होगा। ट्रांसफॉर्मेशन विल नॉट बी हैपन।
- 37:35खुद के दोषों को देखना जरूरी है ताकि खुद के दोषों को ठीक कर सको
- 37:42और खुद के दो से दूर होंगे। तभी तुम अंत में जा सको तो तुम
- 37:49खुद नहीं कर सकते। कबीर कहते वो काम कर सकता है।
- 37:52निंदा। तो मुश्किल अगर तुम्हें कोई निंदक
- 37:57मिल जाए, घूमते फिरते हैं घर घर हर घर में निंदकी तुम्हें आज
- 38:07आँखें हैं, लेकिन अंधे हैं कान हैं, लेकिन बैर हैं।
- 38:17सब हैं उनके पास, लेकिन दिमाग से दे देखने के बावजूद भी अंधा हो
- 38:28जाना न देखा कर दिया। इसे इतना अंधा कहते हैं तो कबीर
- 38:37कहते हैं अपने। पापों को तुम देखने कौन देखेगा,
- 38:47निंदक देखेगा। जैसे तुम निंदक के दुष्कर्मों को
- 38:52देखते हो, ऐसे ही निंदक तुम्हारे दुष्कर्मों को देखता है।
- 38:58तो फिर क्या करो? अगर तुम अंतर्मुखी होना चाहते हो
- 39:02तो कबीर कहते है सर लो पाय न साबुन की जरूरत पड़ेगी न पानी की
- 39:10जरूरत पड़ेगी बे न जान के साबण बिना सगल मैल धुल जाय।
- 39:18न साबुन की जरूरत पड़ेगी न पानी की जरूरत पड़ेगी तुम्हारे सारे
- 39:26मैल जो शीशे को दर्पण का कुरूप बना रहे हैं जीस शुद्ध।
- 39:35दर्पण के भीतर तुम्हें अपनी तस्वीर नजर नहीं आती कि तुम हो
- 39:39कौन? उवार जू वो तुम्हें नजर आएगी वह
- 39:44शर्त के तुम्हारा दर्पण साफ हो से दर्पण महिला है इसमें धूल जमीं
- 39:50है, जन्मो। जन्मो की धूल जमीं है।
- 39:53संस्कारों की धूल जमी है और उसको धोएगा कौन उसको धोएगा?
- 39:58नींद तक तुम खुद नहीं तो उसको क्योंकि तुम्हें वो नजर नहीं आती
- 40:03अपनी आँखों तक नजर नहीं आती धूल कैसे नजर आएगी नींद तक?
- 40:13तुम्हारी धूल को बजा देता है तुम्हारे आईने पे ये धूल लगी,
- 40:18डब्बा लगा एक काल से एक सूत्र मिल गया।
- 40:23यह एक सूत्र है, खुद तक पहुंचने का एक सूत्र है खुद को देखने का
- 40:29एक सूत्र है। सेल्फ रियलाइजेशन का एक सूत्र
- 40:35दूसरा बताएगा तुम्हे? और दूसरा बताएगा उसको गर्दन से मत
- 40:43पकड़ लेना, उसका कॉलर पकड़ के खेच ला खेच मत लेना, मारपीट मत करने
- 40:50लग। कबीर कहता है कि उसको तो अपने घर
- 40:55में ही कुटिया बना के दे देना, खाने पीने, सोने का प्रबंध कर
- 41:00देना और उसकी बातों को गौर से सुनना।
- 41:09उसको दुत्कारना मत, उसकी शान की खिलाफत में कोई शब्दावली प्रयोग
- 41:18ना करना, लड़ाई झगड़ा मत करना, उसकी तो पूजा करना, सुबह उठ के
- 41:26इसके पांव छूना। प्रातः है समर नहीं है बना लेना
- 41:32सुबह उठ के उसके ही दर्शन करना, क्योंकि उसके ही कारण तुम सेल्फ
- 41:37रियलाइजेशन कर सको क्या तुम वास्तव में हो कौन?
- 41:44जन्मो जन्मो की धूल, जो संस्कारों की तुम्हारी दर्पण पे पड़ी है तो
- 41:48इतना काला हो गया है। दर्पण मटमैला हो गया है कि वो
- 41:53कीचड़ के भीतर दर्पण भी है, तुम्हें दिखता नहीं, आज वो दर्पण
- 42:01नजर आएगा। के जन्मों जन्मो की संस्कारित धूल
- 42:06हटेगी और तुम खुद ना हटा सकोगे। कबीर कहता है, ठहरों मैं तुम्हें
- 42:12बताता हूँ डाँग कबीर कहते हैं निंदा को लिया ना घर में जैसे हम
- 42:19संत को घर में ले आते हैं। प्रणाम करते हैं, खाना खिलाते
- 42:27हैं, हमारे घर में रुकता है, हमें चार बातें प्रवचन की सुनाता है।
- 42:34हम बड़े प्यार से सुनते हैं। नहाने, खाने, पीने रहने, सोने का
- 42:38इंतजाम हम कर देते हैं। ऐसे ही निंदक को भी करना जैसे संत
- 42:45को किया निंदक और संत में ज़रा भी तो फर्क नहीं।
- 42:50संत तुम्हें सीधा सीधा समझाने आया है कि तुम कौन हू अरे यू, लेकिन
- 42:57उससे बात बनेगी नहीं। क्योंकि संत कितना ही समझाए चला
- 43:02जाए तुम्हारी खोपड़ी में आती कहाँ है?
- 43:04बात अगर आ भी जाए तो वो सिर्फ एक सूचना बनके तुम्हारे न्यूरोल में
- 43:09फीड हुई रह जाती है उससे तुम कोई फायदा नहीं उठा सकते।
- 43:14कितनो ने सुना गीता मैं कृष्णा को कहता हूँ।
- 43:21कितनो ने सुना नैनं छिद्दं ती शस्त्र प्राणी नैनं।
- 43:25दाती पाप का नय चैनम सेगन्त्र को न शशति भरता है, उसे शस्त्र नहीं
- 43:33काट सकता, उसे अग्नि नहीं चला सकती, उसे पानी नहीं गला सकता।
- 43:37उसे वायु नहीं सुखा सकती वह तुम हो अजर हो अमर हो तुम जलते नहीं
- 43:45तुम मरते नहीं तुम कटते नहीं अकट्य हो असुस्य हो कितनी बार
- 43:54सुना तुमने? जन्म से लगे थे, बूढ़े हो गए,
- 43:58क्या कोई रूपांतरण हुआ नहीं हुआ? संतों के वंचनों से रूपांतरण नहीं
- 44:03होता तो अद्भुत फॉर्मूला बताते हैं कबीर कबीर कहते हैं ऐसे सुनी
- 44:13सुनाई बातों से। उन्होंने देखा होगा, बिल्कुल देखा
- 44:16होगा जो तुम्हें बताने के लिए तुम्हारे घर पे आते हैं, तुम्हें
- 44:22बताते हैं तुम कौन हो, लेकिन तुम्हारी धूल कहाँ कहाँ हटती है
- 44:28तुम्हारे शीशे पर से तुम्हारी धूल नहीं हटती।
- 44:33धूल यथावत बनी रहती है और सच पूछो तो कई बार धूल ज्यादा गहरी हो
- 44:39जाती है क्योंकि सूचनाएं तो पहले से ही बहुत ही सूचनाएं और भी गुरु
- 44:45लोग आकर दे गए। ये और किचण जहाँ ये और भार चढ़ा।
- 44:51शीशा और ज्यादा मटमैला हो गया तो कबीर बड़ा गहरा उपाय तुम्हें
- 44:59बताते हैं और वह उपाय तुम कर न सकोगे।
- 45:06संतो के वचन सुनना तो आनंद नीय भी है।
- 45:11मगन कर देता है तुम्हें उसका रस का प्याला पीके तुम मदहोसी के आलम
- 45:15में झूमने लग जाते हो, फिजाएं रंगीन हो जाती हैं, हवाओं में
- 45:22सुगंध तैर जाती है। लेकिन निंदा की बातें सुनकर।
- 45:30तुम्हारे हृदय में कहीं सोल चुभता है।
- 45:36कबीर कहते हैं इस सोल का चुभना ही तुम्हारी ट्रांसफॉर्मेशन का कारण
- 45:43बन सकता है। सीधे सीधे प्रमोशन अगर मैं करूँगा
- 45:47तो मैं बड़ा बोलेंगे। कबीर कहते हैं, मैंने इतने से
- 45:52इतने हजारों हजारों दोहे बोल दिए तुम कहाँ रुखांतरित हो तुम पूजा
- 46:01किए पत्थर की मूर्तियों को, मैंने बोला पाथर पूजा हर मिले तो मैं
- 46:07पूजू पहाड़? अगर पत्थर की मूर्तियों को पूजने
- 46:12से परमात्मा मिल जाता है तो मैं पूरे पहाड़ को ही पूज लेता हूँ
- 46:22लेकिन तुम बदले नहीं। तुम्हारी धूल हिट ही नहीं।
- 46:26मुख्य बात ये है कि तुम अपना। चेहरा नहीं देख सकते हू एमआइ मैं
- 46:31कैसा हूँ मैं कौन जो दर्पण के ऊपर जमीं धूल के कारण है और धूल की
- 46:37परतें इतनी हो गई हैं? जन्मो।
- 46:40जन्मो से तुम ये मानती आए कि मैं शरीर हूँ, मैं मन हूँ, मैं विचार
- 46:45हूँ, मैं भावना। यही चीजें यही मान्यताएँ तुम्हारे
- 47:02शीशे के ऊपर धूल का काम करती हैं। आवरण का काम ये धूल तुम्हारे आइने
- 47:11पे जम जाता है। फिर आईना कहाँ बता पाता है
- 47:19तुम्हें तुम्हारे नए नए नक्शे कैसे नहीं बता पाता?
- 47:27आईना खुद ही असमर्थ हो जाते हैं क्योंकि आईने पे तुमने दूर?
- 47:34लीप दी। बढ़िया दोस्त बात है शायद फिर
- 47:40पूछा तुमने को भी संत के प्रवचन से हम क्यों नहीं बदल सकते?
- 47:51संतों के प्रवचनों को हम लुत्फ उठाते हैं सीडी।
- 47:56लुत्फ उठाते हैं। दो कुट पीला दे शाकिया दो कुट
- 48:07पीला दे शाकिया, बाकी मेरे करो, होड़ दे।
- 48:18दो कुट पीला जैसा किया बाकी मेरे कि रोड दे दो, कुट पीला जैसा।
- 48:32तुम्हें आनंद आता है संतों के भरोसे सुन।
- 48:37तुम कहते और पहिला दो और पहिला दो और ज़रा सी दे दे साकी, और ज़रा
- 48:49सी ओह। और ज़रा सी दे दे सा की और ज़रा
- 48:57सी और कैसे रहूँ चुपके मैंने पी ही क्या है ओश भी तक है बाकी।
- 49:14और ज़रा सी दे दे साखी और ज़रा सी और कैसे रहूं चुप के, मैंने पी ही
- 49:24क्या है? होश भी तक है बाकी जब तक होश बाकी
- 49:33है तभी और पी सकता हूँ और ज़रा सी दे दे साखी और ज़रा सी और।
- 49:50पता है तुमको राज़ क्या है? मेरे इस सरूर का पता है तुमको
- 50:00राज़ क्या है मेरे इस सरूर का के इस सरूर में।
- 50:08ज़रा सा रंग है गुरूर का जो मैंने पी तो क्यों नशा जो मैंने पी तो
- 50:20क्यों नशा उतर गया हजूर का? जो मैंने पी तो क्यों नशा उतर गया
- 50:30हजूर का और ज़रा सीधे देसाखी और ज़रा सी और कैसे रहूं चुपके मैंने
- 50:42पी ही क्या है? ओष भी तक हैवा की और ज़रा सी दे
- 50:51दे सा और ज़रा सी मेरे पास एक लेडीज आती है लड़की थी करीब 30
- 51:01वर्ष से कम। मेरे पति शराब और पीते हैं बहुत
- 51:07इंतजाम कर लिए चूना टूट के कर लिए दवा, दूध, दारू पी डाल के देख लिए
- 51:13छोड़ते हैं कोई उपाय बताइए बाबा मैंने कहा सीधा सो पाया क्या?
- 51:22जब शाम को तुम्हारा घर वाला पीने लगे तो टेबल पर पैक दो रख लेना,
- 51:32हसते कैसे हो ना पूछे दो पैक कैसे कहता है हम भी बराबर?
- 51:42जो आप पी रहे हो हमारे मालिक हो साहिबजादे तो हम क्यों ना पिए?
- 51:49जरूर ही इसमें कोई अजीब सा रंग होगा जो तुम रोज़ पीते हो तो आज
- 51:54हम भी पिएंगे। 4 दिन के बाद शराब पिए तो जो
- 52:05मैंने पी तो क्यों नशा उतर गया? हजूर का?
- 52:14और ज़रा सी दे दे शाखी और ज़रा सी और कैसे रहूं चुप के मैंने पी ही
- 52:24क्या? उसने एक पैक डाला और कहती और चलो
- 52:32समझ आया। इसमें तो मज़ा ही।
- 52:38तुम संतो के परवेशन सुनते हो तो घरवाला कहता है क्या रखा है,
- 52:44उसमें क्यों जाती है? वहाँ सब बकवास है।
- 52:53भगवान होवे गुन्नी इन्हें बिरसा के कहते है क्योंकि इन्होंने कभी
- 53:02उसका शरुर देखा तो जब उन्होंने शरुर देख लिया तो बस डांटना खत्म।
- 53:13आज बहुत से जोड़े मेरे पास आते हैं जो कभी पहले एक आता था दोनों
- 53:18में, लेकिन आज दोनों आते हैं क्योंकि जिसने भी उसकी सहन शक्ति
- 53:27बढ़ गई, दूसरे शराब की बात करता हूँ तुम्हारी।
- 53:31तुम्हारी सहन शक्ति घटाती है तुम्हारी इस ठेके की शराब लेकिन
- 53:38उस ठेके की शराब तुम्हारी सहनशीलता को बढ़ाती है।
- 53:44इम्युनिटी को बढ़ाती है। घर में शांति होने लगी, उसको चार
- 53:48बातें कह दिया तो कोई फर्क ही नहीं पड़ता।
- 53:51तो परिवर्तन होना शुरू हो गया तो आदमी ने भी सोचा बात क्या है?
- 53:57आगे तो बेलन उठा लेती थी और कभी कभी चकला भी फेंक दिया, चिमटा भी
- 54:05उठा के मार लेती थी, पता नहीं कहाँ लगी?
- 54:09लेकिन अब तो ज़रा भी प्रतिक्रिया नहीं करती।
- 54:11बदलाव तो है इस बदलाव से वो हतप्रभ हुआ।
- 54:18बड़े गुरुओं के पास गया था तुने टोटके तभी राख झाड़फूंक को बड़ा
- 54:24कुछ किया था लेकिन ठीक नहीं आया था काम।
- 54:34लेकिन जब आदमी देखता है स्त्री की सहन शक्ति बदल गई, घर संतोषजनक
- 54:42हालत में आ गया। घर में शांति और शांति ही तो
- 54:45चाहिए प्रत्येक अगर घर में शांति हो।
- 54:51तो वहाँ आप भी जाना चाहोगे भगवान कृष्ण ने कहा है जहाँ शांति है,
- 55:00वहाँ समृद्धि है जहाँ लड़ाई है, वहाँ विनाश है।
- 55:11जहाँ शांति है, वहाँ स्मृति है, जहाँ शांति होनी शुरू हो जाएगी,
- 55:18आपने चार गालियां निकाल ली, घरवाले ने चुप चाप प्रकाशित करो।
- 55:22एक घरवाले ने चार गालियां निकाल ली, उलट पुलट बोल दिया, तुम आराम
- 55:27से बैठे रहे। सोक्रेट की तरह सुक्रात सुक्रात
- 55:33की घर वाली वस्ट लेडी ऑफ दी वर्ल्ड किताब मिलाव धरती की सबसे
- 55:41बुरी से बुरी स्त्री बहती ध्यान में बैठा होता है।
- 55:461 दिन तो पानी। ठंडा पानी सर्दी की रात ध्यान में
- 55:53बैठा और गिलास भर के लेके आई उसके ऊपर फेंक दिया।
- 56:01लेकिन सुकरा तो सुकरा उन्होंने तौलिया लिया।
- 56:07अपना सिर पूछ लिया, बोले चार शब्द आपको भी सुन लेने चाहिए।
- 56:15सुक्रात के शब्द हैं मामूली तो होंगे नहीं सुक्रात कहते हैं पहले
- 56:21तो सिर्फ गरजा ही करती थी, आज बरस भी गई।
- 56:29पहले तो सिर्फ गरजा ही करती थी, आज बरस भी गई।
- 56:35देखिए सहनशक्ति, इस व्यक्ति की इतनी ही सहनशक्ति की आवश्यकता
- 56:40होती है। गृहस्थी के दायित्वों को निभाने
- 56:43के लिए ये दो। दो पहियों का मामला है।
- 56:47एक पहिया भी गड़बड़ा गया या धीरे या तेज चलने लगा तो गृहस्थी की
- 56:52गाड़ी रुक जाएगी, दो पहियों पे चलनी चाहिए, समानांतर चलने चाहिए
- 56:58और समवेग से चलनी चाहिए। तो गृहस्थी की गाड़ी बखूबी लग
- 57:06जाती है। अंत तक थोड़े से दिन में ही वह
- 57:15व्यक्ति पीना छोड़ गया। यहाँ आ गया यहाँ के नाम दान ले
- 57:23गया नाम दानी मैं नाम दानी समझती हूँ।
- 57:27दीक्षांत व समित नामदान ले गया। वो भी मदहोश रहने लगा।
- 57:34सुबह सुनता है पांच 5 मिनट पहले वो सुनता है, नहा दगों के उठ के
- 57:41तैयार हो जाता है दफ्तर तो 9:00 बजे जाना।
- 57:45तब तक आनंद मानेंगे तुम एक बार सुनो उसके बाद मैं भी सुनु क्या
- 57:53होता है? मज़ा लेकिन संत बोलेंगे बेसत्ते
- 57:57के तुम बदलने को तैयार हो जो बदलने को तैयार नहीं।
- 58:05उनके लिए कबीर का ये धोखा बड़ा काम कामगार है।
- 58:12अजीब कारीगरी करते हैं। अजीब तरह की बात कही कबीर ने।
- 58:19कबीर कहते हैं धूल जमी इतनी धूल जमी।
- 58:24कितनी धूल को तुम उखाड़ोगे लेकिन चरे।
- 58:29वैती चरे, वैती चरे। वैती चलते रहो, धूल को उखाड़ते
- 58:33रहो, उखाड़ते रहो, उखाड़ते रहो। 1 दिन शीशा दर्पण बन जाएगा।
- 58:43तुम्हारा आईना तुम्हारा मुख तुम्हें दिखला देगा हूँ आर यू
- 58:53निंदकनियरे राखिये आँगन अकोटी सवाज घर में ही बता दो उसको सेवा
- 58:59करो जैसे संत की सेवा करते हैं ये बड़ा संत है, बड़े बाग से मिला है
- 59:04तुम्हें। और इसकी बातों को सुनो।
- 59:09इसकी निंदा को सुनो। जो तुम्हारे दोषीय बताता है उनको
- 59:14सुनो और सुन के उनको ठीक करो। बिन साबुन वारी बिना साबुन भी
- 59:23नहीं और पानी बना। बिन साबुन वारी बिना सगल मैल धुल
- 59:28जाए सारी मैल धुल जाती, जो कीचड़ तुम्हारे आईने पे जमा है, सब चढ़
- 59:38जाएगा, अब तुम अपनी तस्वीर देख लोगे, यही तो जानना था, हू एम आए?
- 59:43अपनी ही तस्वीर है तो तुम्हें पता नहीं था कि मैं हूँ कौन?
- 59:50और जब सारी धूल दवा से झड़ जाएगी और शीशा बिल्कुल पवित्र हो जायेगा
- 59:54साप तुम्हें तुम्हारा चेहरा दिखेगा स्पष्ट तुम्हारी नकन आँखों
- 59:58से तुम देख पाओगे कि तुम और कौन? ये शब्द मुझे याद आता है दिल के
- 1:00:08आईने में थी तस्वीरें यार दिल के आईने में थी तस्वीरें यार।
- 1:00:20जब ज़रा गर्दन झुकाई देख ले जब भी संकट के बादल हो जब भी मन ऊहा पाउ
- 1:00:30से गिर जाए चिंता करने लग जाए, चिंतन ना करें।
- 1:00:39तुम्हारा मन बादलों काले बादलों के प्रकोप से अंधकारमयी डरावना
- 1:00:47वातावरण पैदा कर दे, गरजे भी और बरसे भी तो तुम उस आईने में झांक
- 1:00:56लेना। और तुम्हारे दिल के आइने में ही
- 1:01:00तुम उसे पाओगे दिल के आइने में थी तस्वीरें यार लेकिन ये माटी की
- 1:01:08जमी हुई धूल, ये पचड़े ये तुम्हें अपनी तस्वीर को देखने नहीं देते
- 1:01:14थे। आज शीशा साफ हुआ।
- 1:01:19मन का आईना साफ हुआ, सब धूल धमांस जड़ गई आई तुम अपनी तस्वीर को
- 1:01:28बखुशी देख सकते हो जब ज़रा गर्दन छुटाई देख ली और तुम अपनी आईनों
- 1:01:34को देखो अपनी तस्वीर तुम्हें नजर आएगी।
- 1:01:38फिर तुम कोई गलत काम ना कर सकोगे। तुम ही हो जिसके बारे में गलत सोच
- 1:01:46रहे हो। तुम ही जीसको गालियाँ निकाल रहे
- 1:01:50हो, तुम ही तुम्हारा कोई शत्रु, तुम्हारा कोई मित्र नहीं।
- 1:01:57शत्रु और मित्रता से पार जो तुम हो बिलकुल नृलिप्त वो तुम हो
- 1:02:09जिनका फैलाव दिगंतर तक है और विराट है असीम है, जिसका कोई और
- 1:02:14स्वर्ग है। तुम्हारे ही वेतर है बाहर मत लाशो
- 1:02:27बाहर मत खो भटको मत बाहर भटकोगे तो वेतर नहीं जा सकोगे वेतर नहीं
- 1:02:33जा सकोगे तो खुद को नहीं देख सकोगे।
- 1:02:36एक ही जरिया है अपने आप को देखना भीतर चले जाना।
- 1:03:00ढोने जाए सर्बव्यापी सदा अलेहपा सर्बव्यापी सदा।
- 1:03:18हलीफा तोहे संघ सभा कायरे बनु धन जाए।
- 1:03:39कहीं मचाओ, सर्वव्यापी सब जगह है, सदा अलेपा निर्लिप्त है तोहे
- 1:03:50संघर्ष समाय तुम में ही समाया हुआ है, काहे रे बन ढूंढन जाय।
- 1:03:57वन में, मठ में। शरिब व्यापी सदा फले प शरिब
- 1:04:11व्यापी सदा फले प। अले पा अले पा अले पा शरबया भी
- 1:04:33सदा अले पा। सर्बव्यापी सदा अलीफा तोह संघ
- 1:04:47समा। काहेरे बन खोजन जाए काहेरे।
- 1:05:16धन्यवाद।