Latest / Baba ji Vijay Vats / 28 Dec 24 - कैसे पता चले कि कर्म खुद से हुआ या अज्ञात ने करवाया? समर्पण कैसे करें? गीता का ज्ञान!
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- 0:02कल के प्रसंग से आगे कर्मने वाध का रास्ता है।
- 0:15तुम्हारे पास सिर्फ एक ही अधिकार है।
- 0:21कर्म करने का तुम ये मत सोचना कि तुम पुण्य करो या तुम पाप करो
- 0:33नहीं, तुम्हें ये पता नहीं चलेगा। कि तुमने जो कुछ किया वह पुण्य था
- 0:41या पात्र था क्योंकि तुम्हें उसके विधान की कोई खबर नहीं है।
- 0:52उसके संविधान की कोई खबर नहीं है। तुम नहीं जानते कि तुमने जो किया
- 1:02वह पाप था या पुण्य था, तुम अपनी बुद्धि से तोल मोल करोगे, लेकिन
- 1:09बुद्धि कहाँ पहुँच पाती है? उसके नियमों तक तो कृष्ण कुछ अलग
- 1:19ही पहलू तुम्हें बदलते हैं। कृष्ण कहते हैं, एक ही अधिकार
- 1:25तुम्हारे पास है और वो इसे नाम देते हैं सह काम कर्म।
- 1:36जो तुम करते हो निष्काम कर्म जो वह करवाता है बहुत से प्रश्नाएँ
- 1:47हैं बाबा ये कैसे पता चले? यह क्रम हमने अपनी मर्जी से किया
- 1:58या उसने करवाया सुंदर प्रश्न जीस काम को करने के उपरांत तुम्हें
- 2:10पश्चात अब हो जाए? वह तुमने किया है जीस कर्म को
- 2:18करने के उपरांत तुम्हें खुशी मिले और तुम्हें गम हो ध्यान से समझना
- 2:30इन शब्दों को। जीस कर्म को करने के बाद तुम्हें
- 2:36खुशी मिले या तुम्हें दुख हो, प्रायश्चित हो या तुम नाचने लग
- 2:44जाओ कर्म करके वह कर्म तुमने किया है।
- 2:52और जो कर्म करने के बाद तुम्हें ना तो खुशी हो और ना ही दुख, न
- 3:04हर्ष, न शोक, वह उसने करवाया है। या सीधी सी पहचान है।
- 3:17पूछा है कि समर्पण कैसे हो? क्योंकि आप ने समर्पण की व्याख्या
- 3:24ही बदल दी? नहीं, मैंने नहीं बदली।
- 3:27समर्पण की व्याख्या यही थी। तुम्हारे मार्गदर्शकों ने बदल दी
- 3:33है। समर्पण को उन्होंने एक कठपुतलियों
- 3:39का सर्कस बना दिया। समर्पण कैसे हो?
- 3:48इसे ऐसा समझो कि आपने गोताखोर जरूर देखे होंगे।
- 3:54गहरे समुद्र में पहले वो गोता लगाते है तो तल के ऊपर नजर आते
- 4:03है। फिर वो गहरे गहरे उतरते हैं, गहरे
- 4:09गहरे उतरते हैं। धीरे धीरे फिर वो सुमद्र की उन
- 4:16गहराइयों को छू लेते हैं, जो कि बहुत गहरे तल पे हैं, लेकिन एकदम
- 4:24से। वो गहरे तलों पर नहीं पहुँचते, बस
- 4:30ऐसा ही समर्पण है शुरू करो। छोटी छोटी चीजों को उस पर छोड़ने
- 4:37के इसे अभ्यास करना होगा। छोटी छोटी बातों को उस पर छोड़ना
- 4:44शुरू करो, किसने तुम्हें बेइज्जत किया?
- 4:51छोड़ दो, यह उसके ऊपर छोड़ना होगा।
- 4:57हम इसके न्यायकारी नहीं बनेंगे। इसने गाली निकाल दी।
- 5:03इसने धमकी दे दी। हम इसके न्यायकारी नहीं बनेंगे?
- 5:07छोड़ दो उसको छोटी छोटी बातों को उस विराट उस अज्ञात जो तुमने कभी
- 5:20देखा नहीं। जिसकी खुशबू कभी कभी आती है तो भी
- 5:26तुम पहचान नहीं पाते आती तो है क्योंकि तुम्हारे सबके भीतर वह
- 5:35विराट अज्ञात ही तो बैठा है। और भीतर नहीं बाहर दोनों जगह भीतर
- 5:48भी और बाहर भी वही तो है छोटी छोटी बातों से है ये जो मैं तुमने
- 5:56बनाया है। अनंत जन्मों के संस्कार के कारण
- 6:04तब तो तुम अज्ञानी थे और तब तो तुम ज्ञानी हो भी नहीं सकते थे।
- 6:11वृक्ष कैसे जान सकता है कि मैं शरीर नहीं?
- 6:17मछली कैसे जान सकती है कि मैं शरीर नहीं कछुआ दो, पाएं चार पाएं
- 6:27शेर कैसे जान सकता है कि मैं शरीर नहीं हूँ, क्योंकि उसके भीतर
- 6:32विवेक की क्षमता नहीं होती? तो मैं शरीर हूँ, ये तुमने
- 6:42नादिकाल से मान रखा है क्योंकि तुम सत्य को जानते नहीं थे और यह
- 6:51संस्कार तहे बनाता गया। मैं शरीर हूँ, मैं शरीर हूँ, चाहे
- 6:57पेड़ हो, चाहे पत्थर हो, चाहे अमीबा हो, यूनीसेल्युलर
- 7:04मल्टीसेल्युलर फिर चलने वाले रेंगने वाले उड़ने वाले पशु
- 7:12पक्षी। ये सभी ये समझते है कि हम शरीर है
- 7:22और तुम्हारा समझना और इधर तुम्हारे संस्कार का बनना उसी
- 7:28वक्त हो जाता है। संस्कारों की तय है जमती चली गई
- 7:35और कितने जन्म बीते? फिर तुम मानव शरीर में आए तो भी
- 7:40तुम अभी अज्ञानी थे और जब तक तुम ये जानना लोगे कि मैं शरीर नहीं
- 7:47हूँ तब तक। यह संस्कार जमते रहे थे।
- 7:55पहाड़ बन चुका है हिमालय जैसा लेकिन और जुड़ता चले जाएगा अज्ञान
- 8:02की कहीं संस्कार रोज़ भारी होता जाता है।
- 8:14जैसे जैसे तुमने संस्कार जोड़े मैं शरीर हूँ वैसे वैसे उनको
- 8:21तोड़ना होगा, तोड़ना होगा साक्षी बन कर।
- 8:31वह प्रक्रिया अपने आप से होती रही अज्ञान के कारण और साक्षी का
- 8:39ज्ञान तुम्हारे मैं शरीर हूँ के बनाए हुए।
- 8:49संस्कारों को नष्ट कर देगा। धीरे धीरे तुमने हिमालय और स्मेरु
- 8:59जैसे पर्वत खड़े कर दिया है। संस्कारों के अज्ञान के कारण अब
- 9:07धीरे धीरे इन्हें मिटाना होगा। 1 दिन में ये काम हो जाए ये
- 9:13मुश्किल है। इसलिए पहले तो सौंपो उसके हाथों
- 9:19में कोई पास से गुजर गया तो मैं कंधा मार गया।
- 9:25हालांकि गलती से मारा। उसने क्षमा भी मांगी, सॉरी मैं
- 9:33कहीं और था, भटक गया था आपको चोट तो नहीं आई छोटी छोटी बातों को तो
- 9:44नज़रअन्दाज़। करते जाना यहाँ से करना शुरुआत
- 9:53फिर थोड़ी सी बड़ी बातों को फिर और थोड़ी सी बड़ी बातों को जैसे
- 9:59मैंने कहा गोताखोर धीरे धीरे भीतर जाता है, धीरे धीरे धीरे समुद्र
- 10:04की। अतल गहराइयों को छू लेता है वैसे
- 10:10ही तुम 1 दिन छोड़ते जाओगे, छोड़ते जाओगे उस अज्ञात पे जिसका
- 10:20दर्शन नहीं तुमने किया। और बड़े हौसले का काम है।
- 10:28मैंने कल भी कहा था महावीर और बुद्ध तो अपना राज़ काज अपना सारा
- 10:41जमीन जायदाद खजाना। अपनी शहनशाही छोड़ देते हैं, उस
- 10:49विराट के ऊपर तू जाने तेरा काम जाने और छोड़ देते हैं।
- 11:01अपने आप को असुरक्षित छोड़ देते हैं।
- 11:08तुममें और बुद्ध और महावीर में क्या फर्क है?
- 11:12तुम असुरक्षा से घबराते हो और सुरक्षा के उपाय करते हो।
- 11:20कोई गोली न मार दे तो आस पास 6677 लेयर्स बना देते।
- 11:29हम सुरक्षा की बड़ी बड़ी बंदूकें आटोमेटिक लिए हुए हुए तुम्हारी
- 11:39सुरक्षा करते हैं। कैसे मिटेगा भाव कि मैं शरीर नहीं
- 11:47जग के जब जलते हैं अष्टावक्र जब चलते हैं कृष्ण जब चलते हैं
- 11:54सुरक्षा की कोई तह नहीं होती उनके आस पास।
- 12:02महावीर और बुध जब चलते हैं, सुरक्षा की कोई तय नहीं होती।
- 12:08कोई आके थूक जाता है, रास्ते में कोई गाली निकाल देता है, बुध को
- 12:16छोड़ देते हैं, छोड़ने का अभ्यास हो चुका है।
- 12:19यहाँ से तुम शुरू करना इस बात को आप समझ के चलना कि जैसे आप ऑफिस
- 12:29में जाते हो, दिनभर काम करते हो, सांझ को खाली हाथ वापस घर लौट
- 12:38जाते हो। ऑफिस की तरह ही तुम्हारा संसार
- 12:43है, ये यहाँ काम करने के लिए आए जैसे ऑफिस में तुमने काम किया और
- 12:51सांझ घर वापस आ गए। ऐसे ही तुम इस संसार में ऑफिस में
- 12:58काम करने के लिए आए हो। जब तुम घर जाओगे अपने जीस घर का
- 13:05तुम्हें पता ही नहीं है वो कौन सा है, कहाँ है उस घर में तुम्हें
- 13:12वापस जाना ही होगा। और वहाँ जाए बिना तुम्हारी गति
- 13:19नहीं होगी तुम्हारा कल्याण नहीं होगा ये पण्डे गया के भीतर बैठे
- 13:25है तुम्हारी गति नहीं करा सकेंगे गति तुम कर सकते हो आप?
- 13:32दूसरे के लिए गति कभी होती ही नहीं।
- 13:36जब दूसरे का खाया अन्न तुम्हें तृप्त नहीं करता, दूसरे का पिया
- 13:41पानी तुम्हें तृप्त नहीं करता तो दूसरे के द्वारा की गई गति
- 13:49तुम्हारी गति कैसे होगी? ये व्यापार की बातें हैं।
- 13:57पंडितों ने तुम्हे अपने जाल में उलझा लिया है और तुम बोले से गए
- 14:01हो, लेकिन ध्यान रखना चाहे पंडापुरोहित हो।
- 14:12चाहे राजनीतिक बड़ी से बड़ी अथॉरिटी हो, जब तक यह भ्रम रहेगा
- 14:20कि मैं शरीर हूँ, तब तक वह कपता रहेगा भीतर।
- 14:28इस समय किसी तरह की कोई अतिशोक्ति नहीं कर रहा हूँ जब तक तुम अपने
- 14:35आप को शरीर जाने हो, अपने आप को शरीर से अलग नहीं जाने दिया है।
- 14:44तब तक तुम हर वक्त चौबीसों घंटे कांपते ही रहोगे।
- 14:49दूसरों को तुम शो करो या न करो और ये इतने इतने बॉडीगार्ड्स की कतार
- 14:58सूचना देती है कि तुम बड़े डरपों को हो।
- 15:05जो डरते नहीं वो अकेले ही चला करते है और भौगोलिया भी खाया करते
- 15:13है। वो मर भी जाया करते है और तुम
- 15:18मरने से डर जाओ। क्योंकि तुमने जो मरता है वह मैं
- 15:25हूँ ये मान रखा है अन्यथा तुम जो हो वो कभी नहीं मरता।
- 15:38ऐसी बात कृष्ण कहते हैं। जो वास्तव में तुम हो, वह कभी
- 15:43नहीं मरता। एक राजा चाहे सात दीवारों का महल
- 15:49भी क्यों न बना ले परकोटे डाल के और उसके भीतर अपने आपको सुरक्षित
- 15:55करके बैठ जाए। लेकिन मृत्यु से कहाँ पर छुपाता
- 16:00है वो मृत्यु से दबोच लेगी। अभी कुछ दिन पहले ही मैं खबर पढ़
- 16:10रहा था कि एक कपड़ा बनाया गया है कानपुर के आइआइटी में।
- 16:20जो की ओझल कर देता है, छुपा देता है।
- 16:25इसके पीछे क्या ये नहीं पता चलेगा तो मैंने कहा मृत्यु तो इसे भी
- 16:34पकड़ लेंगे। डर मत बेटा तू ये मत सोचना कि
- 16:41अपने ऊपर डाल लेगा, मृत्यु को नहीं देखेगा, मृत्यु तुम्हें ढूंढ
- 16:45ही लेगी। तुम कहीं चले जाओ और ग्रहों पे
- 16:49बैठे हुए लोगों को भी ढूंढ लेती है।
- 16:53तुम पृथ्वी पर बैठे हो, यहाँ पर ढूंढकर लगे, वह तुम्हें स्पेयर
- 16:58नहीं करेगी, इसका अभ्यास करना होगा।
- 17:10समर्पण का अभ्यास करना होगा। समर्पण का अर्थ है अपने आपको छोड़
- 17:17देना, जैसे मैंने समझाया गोताखोर ऐसे ही जो व्यक्ति डूबता है वह
- 17:26एकदम से गहरे तलों पे नहीं जाता है जो डूबता है धीरे धीरे डूबता
- 17:32है धीरे धीरे। बस ऐसे ही अभ्यास करना होता है
- 17:37समर्पण। का?
- 17:40तुम उसके हाथों में एकदम से अपनी बागडौड़ न छोड़ पाओगे, ये थोड़ा
- 17:46मुश्किल पड़ेगा। कुछ लोगों के लिए ये संभव है
- 17:50लेकिन सभी के लिए ना वो कुछ लोग। बुद्ध जैसे होते है प्रतिक क्षण
- 17:58छोड़ देते है, लेकिन प्रत्येक को सब कुछ उसके चरणों में छोड़ देना
- 18:10मुश्किल है असम्भव। अब सोपदिया इस जीवन का सब बार
- 18:32तुम्हारे। हाथों में अब सुन खुदिया इस जीवन
- 18:46का सब। तुम्हारे हाथों में है जीत
- 18:58तुम्हारे हाथों में, और हार तुम। रहे हाथों में है जीत तुम्हारे
- 19:16हाथों में और हार तुम्हारे हाथों में।
- 19:27सोंकते चले जाओ, सोंकते चले जाओ, चलते चलो सोंकते सोंकते चलते चलो
- 19:38एक एक पग, एक एक क्षण, एक एक पग? समर्पण करते चले जाओ, धीरे धीरे
- 19:48तुम्हें अभ्यास आ जाएगा और 1 दिन तुम पूरे का पूरा अपने आप को छोड़
- 19:54सकते हो यही ध्यान है ध्यान की कला है, अपने आप को समग्र रूपयणी
- 20:00छोड़ देना दूसरी बात तुम्हें समझा दूँ।
- 20:05जैसे ही तुमने अपने आपको परिपूर्ण रूप से छोड़ दिया, कैसे ही तुम
- 20:12पाओगे के साक्षी हो गए इधर तुम्हारा अपने आपको पूर्ण रूप से
- 20:19छोड़ना। और उधर तुम्हारा परिपूर्ण रूप से
- 20:23साक्षी होना जिसे कृष्ण कहते हैं सतीप्रज्ञ हो जा अर्जुन
- 20:32सतीप्रज्ञता यही होती है जब तक तुम।
- 20:39अपने आप को न छोड़ोगे यह है छोड़ने की कला बढ़िया धूप है तुम
- 20:45पकड़ लेते हो। उसने मुझे ये शब्द कहे तो क्यों
- 20:51कहे? उसने मेरे कंधा मारा।
- 20:58जानबूझकर कंधा मारा, उसने मुझे गाली निकाली।
- 21:07तुम छोड़ नहीं पाते लेट इट गो ये शब्द अगर तुम सीख जाओ बहुत ही इसे
- 21:17अच्छी तरह जानते हैं। इसलिए कोई गाली निकाल देता है,
- 21:22राह चलते कोई थूक देता है, कोई गलत शक्ल बनाता है, मुँह चिढ़ा के
- 21:36चला जाता है, लेकिन बुद्ध के ऊपर कोई असर नहीं है।
- 21:45बुद्ध चले ही जाते है। बुद्ध का अभ्यास बड़ा गहरा है।
- 21:52बुद्ध ऐसे छोड़ते छोड़ते दृष्टता में पहुँच जाते हैं, साक्षित्व
- 21:58में पहुँच जाते हैं। और तुम ढूंढ़ते रह जाते हो,
- 22:02साक्षीत में खोपड़ी में बैठे बैठे, तुम्हें साक्षीत वनों में
- 22:06रहेगा छोड़ना होगा, छोड़ते जाओगे, छोड़ते जाओगे जैसे जैसे गहरे
- 22:18छोड़ते जाओगे। भीतर भीतर भीतर उतरते चले जाओगे,
- 22:22रोज़ मुझे प्रसन्न आ जाते हैं। बाबा अपने भीतर कैसे उतरे?
- 22:28बस यही तरीका है, छोड़ दो, छोड़ते चले जाओ, छोड़ते चले जाओ।
- 22:39ये रोज़ के अभ्यास में करना होगा। तुम रोज़ कह देते हो बाबा?
- 22:45घर में बड़ा क्लेश है, उसका कारण ढूंढो।
- 22:52क्या क्लेश है? कोई व्यक्ति ज्यादा सम्मान चाहता
- 22:58होगा। ठीक है, जाने दो, कोई व्यक्ति
- 23:08ज्यादा अपेक्षा करता होगा ठीक है, करने दो, तुम्हारा झगड़ा तब होता
- 23:16है। जब तुम उसके करने में बाधा बनते
- 23:22हो, उसे क्रोध आता है क्योंकि वह समझ रहा था मुझे ये करने में सुख
- 23:29मिलेगा और तुम उसमें रुकावट डाल देते हो।
- 23:35रुकावट के कारण वह। क्रोधित हो जाता है।
- 23:39सुख मिले या न मिले ये बात अलग है, लेकिन तुम्हारा रुकावट डालना
- 23:46उसके क्रोध का कारण बन जाता है और क्रोध क्लेश को फैलाता है।
- 23:54तो मैं रोज़ कहता हूँ, छोड़ते चले जाओ।
- 23:57अपने आप को छोड़ते चले जाओ। धीरे धीरे तुम चाहतों को भी
- 24:02छोड़ते, चले जाओगे ध्यान से समझना इस बात को और चाहतों को छोड़ते
- 24:09छोड़ते तुम वासनाओं को भी छोड़ सकोगे।
- 24:12वासनाई बहुत गहरी है। विचारों को आराम से छोड़ सकते हो।
- 24:19विचार तो तुम्हारे परवर्त हो जाते हैं।
- 24:24आज तुम किसी पार्टी में हो, घंटों बाद तुम किसी और का झंडा डंडा उठा
- 24:30लेते हो। विचारों को बदलना बड़ा आसान है।
- 24:35जट से ही बदल जाते हैं विचार तो और पार्टियों में ये खोपड़ी बड़ी
- 24:43परिवर्तनशील है। खोपड़ी को थोड़ा सा समझाने वाला
- 24:48होना चाहिए तुरंत बदल जाएगी, लेकिन थोड़ा गहरे उतरोगे।
- 24:54तो भावना ही आयेंगे। भावना इतनी आसानी से बदली नहीं
- 24:58जाती। भावना बहुत गहरे तल से आती है और
- 25:04जब तुम गहरे उतरते ही चले जाओगे, देखिये मेरे शब्दों के साथ साथ
- 25:08चलते जना खोपड़ी से। तुम छोड़ते चले जाना, छोड़ते चले
- 25:16जाना और तुम पाओगे तुम भीतर उतरते चले गए तुम्हारा छोड़ने का अभ्यास
- 25:25और इधर तुम्हारा भीतर खिसकने का ये पैरलल चलेंगे जैसे जैसे तुमने
- 25:32छोड़ा। वैसे वैसे तुम भीतर उतरी स्टवकर
- 25:40अपने आपको एक बार की छोड़ देते हैं, एक बार की छोड़ देते हैं,
- 25:48इसलिए जनक पूछते हैं। हे ब्रह्मदेव, क्या कोई रास्ता है
- 25:57कि मैं इस जन्म में मुक्त हो जाऊं?
- 26:02अष्टावकर हंसते कहते हैं, राजन। इस जन्म में तो बहुत दूर है, मैं
- 26:13तुम्हें अभी पहुंचा सकता हूँ। घोड़े पर एक पायदान से दूसरे
- 26:21पायदान पर पैर रखने में जितना समय लगता है।
- 26:26मैं तुम्हें इतने ही काल में पहुंचा सकता हूँ, बशर्ते बशर्ते
- 26:33के तुम पूर्ण रूप से मेरे समर्पित हो जाओ।
- 26:37इसीलिए गुरु जब दीक्षा देता है, पुराने गुरुओं की बात कर रहा हूँ।
- 26:46आज गुरु बदल गए। आज गुरु कहते हैं मैं जो कहूंगा
- 26:51तुम करोगे करूँगा तो तुम्हारा तन मन दन मेरा ठीक है तुम्हारा तन भी
- 27:01मेरा दन भी मेरा और दन भी मेरा मन भी मेरा।
- 27:07और फिर फिर गुफाओं का काम शुरू हो जाता है, वो भी सड़ते हैं।
- 27:15नर्क में बैठे बाहर आने के लिए पैरोल की जरूरत पड़ती है ये
- 27:22तुम्हारे इन्हीं शब्दों में। इन दुष्टों को इजाजत दी तन भी
- 27:30तेरा तो कह देते हैं तुमने वायदा नहीं किया था तन भी मेरा और दन भी
- 27:38लो, माल दो और मन भी मेरा। मैं जैसे कहता हूँ वही मानो बस
- 27:45वही ठीक है राधे राधे कहूं तो वही मानो राम राम कहूं तो वही मानो
- 27:50पांच नम कहूं तो वो मानो तुम्हारा मन मेरा हो गया है।
- 27:55दुरूपयोग करना बड़ा आसान है मानो मन बड़ा फ्लेक्सिबल है।
- 28:01मैंने कहा बुद्धि तो क्षण में ही बदल जाती है, कभी किसी का डंडा
- 28:06झंडा उठा लेती है, कभी किसी का झंडा उठा लेती है, उसको बदलने में
- 28:12देर नहीं लगती लेकिन भावनाओं को थोड़ी देर लगती है, भावनाएँ गहरी
- 28:17हैं। और गहरे तलों पे जैसे तुम उतरते
- 28:21जाओगे वैसे पाओगे एक गहरा तल ऐसा भी आएगा जहाँ कुछ बदलता नहीं वहाँ
- 28:30रोज़ झंडा डंडा नहीं बदलता वहाँ जाकर तो सब कुछ अपरवर्तनशील हो
- 28:36जाता है। कुछ नहीं हिलता, कुछ नहीं
- 28:40परिवर्तित होता वह तल जहाँ परिवर्तन नहीं होता, तुम कँपते
- 28:55नहीं? जहाँ कोई डर नहीं नर पो निर वैर
- 29:01जहाँ कोई बैर नहीं किसी से अकाल मुहूर्त जहाँ मौत तुम्हें तंग
- 29:07नहीं करता, जहाँ तो मृत्यु का सामान आते ही तुम थर थर कांपना
- 29:14शुरू कर देते हो। अजोनी सेपम प्रत्येक योनियों में
- 29:25वो बराबर है। किसी एक विशेष यूनिमनी सेपम अपने
- 29:34ही प्रकाश से प्रकाशित है गुरु प्रसाद लेकिन मिलता है।
- 29:41उसकी नजरें एनाल से हैं, उसके रहमो कर्म से तुम्हारी मेहनत से
- 29:52नहीं मिलता। तुम्हें मेहनत क्यों करनी पड़ती
- 29:58है? पहली बात तो तुम्हें मेहनत करनी
- 30:00नहीं पड़ती। अपने आप को छोड़ देने में कोई
- 30:03मेहनत होती है। रोज़ तुम रात को सोते हुए अपने आप
- 30:07को छोड़ते नहीं हो छोड़ते हो तभी तुम गहन निद्रा में जा पाते हो
- 30:15अगर ना छोड़ पाओ तो तुम गहन निद्रा में ना जा पाओगे।
- 30:20तो छोड़ने का अभ्यास तुम नींद से सीखो रात्रि में जब तुम नींद में
- 30:28उतरे थे, तुमने अपने आप को कैसे छोड़ा था और छोड़ते ही तुम
- 30:35ततक्षम? थोड़े से खुमार में डूबने शुरू हो
- 30:42गए थे और खुमार आते आते तुम्हें पता ही नहीं चला तुम कब निद्रा
- 30:48में मग्न हो गए फिर कौन आया, कौन चला गया, कौन तुम्हारे पास से
- 30:56गुजर गया। कोई तो मैं मारने आया था, उसका मन
- 31:02बदल गया या कोई तो मैं लूटने आया था, उसका मन बदल गया या वो लूट के
- 31:08ले गया, तुम्हें कुछ पता नहीं लगेगा।
- 31:17ये खुमार अपने आप को छोड़ने की पद्धति से आता है।
- 31:27समर्पण एक बारगी नहीं हो सकेगा। तुम जनक और अष्टावक्र पे मत जाओ
- 31:34वो कुछ वृक्षंत रह के। व्यक्ति हैं, अपवाद हैं, वो
- 31:40एक्सेप्शनल केसेस हैं। वो उन अपवादों को छोड़ दो, उनके
- 31:46उदाहरण मत दिया करो तुम अष्टावक्र के तप पर, जीस दिन आगे उस दिन
- 31:53मुझे पूछने की जरूरत नहीं पड़ेगी। तुम छलांग लगा ही दोगे, तुम जम्प
- 31:59कर ही जाओ, तुम डरते हो, जम्प करते हो, कम्पते हो इसीलिए तो
- 32:07गुरु की आवश्यकता होती है तो अभ्यास करो।
- 32:15मैं बारबार समझा रहा हूँ इस छोटे से सूत्र को कल से लगा हूँ समझाने
- 32:26में, क्योंकि ये बड़ा महत्वपूर्ण है।
- 32:30मैंने पहले दिन कहा। यह गीता की जान है।
- 32:36अगर तुम इसको ठीक से समझ गए तो गीता को सुनना बंद कर देना बस फिर
- 32:44तुम्हे आवश्यकता नहीं है। तुमने प्लान करके किया, तुमने
- 32:53अपनी इच्छा से किया, तुमने सारे बंदोबस्त करके किया तो वैसा काम
- 33:00कर में तुमने कोई प्लान नहीं किया?
- 33:08कोई बंदोबस्त नहीं किया, कोई सामग्री नहीं जुटाई और वह तुमसे
- 33:13हो गया, तब तुमने नहीं किया उसकी छाप भी नहीं बनेगी तुम्हारे पिता
- 33:23वह उसने करवाया। जब तुम समर्पण कर देते हो तो वह
- 33:33करवाता है और जब वह करवाता है तो वह ही भौंकता है, तुम नहीं भौंकता
- 33:40है जब तुम करते हो। तो तुम ही भौंकते हो, वह नहीं
- 33:48भौंकता। इन दोनों फार्कों को आप आराम से
- 33:52समझ लेना बड़ा आसान मामला है, जो तुमने इतना उलझा रखा है जिसके
- 34:00करने से तुम्हें पश्चात आप हो तुम समझना वो मैंने किया है।
- 34:07जीसको करने से तुम्हें पश्चात न हो तुम समझो वो उसने करवाया है।
- 34:14इसे ही सह काम, कर्म और अनिष्ट काम कर्म कहते हैं।
- 34:17भगवान कृष्ण जैसे ही तुम समर्पण करोगे।
- 34:24गहरे गहरे गहरे तलों पे उतरते जाओगे तो मैंने पहले भी तुम्हें
- 34:30कहा कि जंगसर पांच आता है वहाँ आदेश आने शुरू होता है।
- 34:38यही मार्ग है उसके आदेशों को सुनने का।
- 34:45छोड़ना शुरू करो उस अज्ञात पर छोड़ना शुरू करो तुमने अपने जीवन
- 34:52की नैया की पतवार पूरी की पूरी पकड़ रखी है यहीं से तुम धोखा खा
- 35:00जाते हो। नैया को थोड़ा थोड़ा छोड़ना शुरू
- 35:06कर दो पतवार को उसे संभालना शुरू कर दो, वह चलाये।
- 35:18इसे कहते हैं समर्पण। जैसे ही तुम अपने आप को छोड़ोगे
- 35:25निग्लेक्ट करोगे इसे भी जाने दो लेट इट गो इसने गाली निकाल दी
- 35:32जाने दो इसने चब्ध लगा दी जाने दो।
- 35:40इसने ये नुकसान कर दिया। जाने दो लेट इट गो तुम भूलते ही
- 35:48चले जाओ यहाँ से शुरुआत करनी होगी समर्पण कि।
- 36:03ियों का जश्न मनाता चला गया। हर फिक्र के धुंए पे उड़ाता चला
- 36:17गया। बर्बादियों का शो मना न फिजूल था,
- 36:30मना न फिजूल था। बर्बादियों का जश्न मनाता चला
- 36:40गया। मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया
- 36:51हर फिक्र को धुएं में। उड़ाता चला गया।
- 37:01लेट इट गो अगर तुम तुम्हारे प्राण ये कहना सीख जाए तो समर्पण होने
- 37:10की शुरुआत हो गयी। ज़िन्दगी का साथ निभाना तुमने
- 37:16शुरू कर दिया ज़िन्दगी ने जो तुम्हे दिखाया जो भी सरकमस्टेंसेस
- 37:24आए हमारे ऊपर तुम ज़िन्दगी से जबरते हो साथ नहीं निभाते।
- 37:32तुम कहते हो ये सर्कमस्टैंसेस क्यों आई?
- 37:37लेकिन वह है विराट है जिसने सर्कमस्टैंसेस पैदा किए वह है
- 37:43विराट है और तुम एक जर्रा भी नहीं हो।
- 37:52और उसने किया है विराट ने तुम कैसे लड़ोगे?
- 37:55उसके साथ तुम्हारी सत्ता करीब करीब नेग्लिज जीवन है, सच पूछो तो
- 38:03बाद में तुम्हे पता चलेगा तुम्हारी सत्ता है ही मैंने।
- 38:12कुछ दिन पहले भी कहा था, अगर ईश्वर जगत के कण कण में व्याप्त
- 38:18है तो तुम्हारी जगह कहाँ है? ईशा वास्य मेदम सर्वमजति किंच जगत
- 38:25आम जगत। अगर वह कण कण में व्याप्त है तो
- 38:29तुम्हारी जगह कहाँ है? तुम कहाँ बैठे हो?
- 38:33सभी जगह तो वह है, बाबा नानक ने भी कहा है जेता पीता तेता ना बिन
- 38:44ना मैं, ना ही कोठों। उस पसारे के अलावा उसके अलावा और
- 38:55कुछ है ही नहीं तो तुम कहाँ रह गए?
- 38:59मेरा विचार करके देखना ये तो तुम्हारी मोटिवेटिक स्पीकर।
- 39:09तो ये बदलने की चेस्टन में रात भर दिन संलग्न रहते हैं।
- 39:17मेरे पास एक व्यक्ति आ रहा है। मुझे कहते बाबा मैंने जज बनना है,
- 39:24मैंने कहा क्या करोगे जज बन के? बड़ी मौज होती है।
- 39:30जज के हुक्म चलाएंगे, फैसले देंगे।
- 39:38मैंने कहा, हुक्म देना तो मूर्खों का काम है इसलिए सारे मूर्ख
- 39:44राजनीति में चले जाते है। क्योंकि उन्हें हुक्म देने की आदत
- 39:50हो जाती है, संस्कार पड़ जाता है, हुक्म देना नहीं, हुक्म मानना
- 39:58सीखो अगर तुम सुख चाहते हो अगर आनंद का।
- 40:08वो सरोवर चाहते हो, वो समुद्र चाहते हो तो हुकुम मानना सीखो,
- 40:16हुकुम करना ना सीखो, हुकुम करने वाले दुःखी रोज़ दुखी होते चले
- 40:22जाएंगे क्योंकि हुकुम करने की आदत पड़ जाएगी।
- 40:28और इस राह में कोई न कोई उनके हुकुम को तोड़ देगा।
- 40:34इंकार कर देगा मानस वह उन्हें दुख होगा।
- 40:42हुकुम करने वाले लोग मूर्ख होते हैं।
- 40:45और सारी राजनीति में चले जाते हैं।
- 40:47मैंने कहा क्योंकि उनको गद्दी मिलती है और गद्दी के बड़े लालची
- 40:53हैं। वो लोग ये गद्दी के लालची हैं
- 40:58इसलिए और फिर गद्दी से ये दुष्कर्म करते हैं।
- 41:04पाप करते हैं, हुक्म करते करते गलतियाँ हो ही जाती हैं, तभी तो
- 41:09कहा है राजो नर्क तपो राजा, तब से राज़ मिलता है राज़ से नर्क मिलता
- 41:19है क्या कारण है? राज़ करने में गलतियाँ हो जाती
- 41:24हैं, किसी की भावनाओं आहत होती हैं, किसी का रोजगार छिन जाता है,
- 41:32किसी की जिंदगानिया भी चली जाती हैं, कोई भूख से मर जाता है, कोई
- 41:37दवाई के बिना मर जाता है, कोई सर्दी के कारण मर जाता है।
- 41:43और सारी व्यवस्था का जिम्मा तुमने लिया था।
- 41:47व्यवस्था तुम कर नहीं पाते, लेकिन राज़ करने की इच्छा इतनी प्रबल है
- 41:55कि तुम उच्चतम स्तर पर पहुंचना चाहते हो।
- 41:59काबिलियत हो, चाहे ना हो। और यहीं से पाप बहना शुरू हो जाता
- 42:04है। इसलिए मैं बार बार तुम्हें कहता
- 42:09हूँ अगर दुखी व्यक्तियों की कतार देखनी हो अगर दुखी व्यक्तियों का
- 42:15समूह देखना हो भरा नर्क देखना हो। कुम्भी पाक नर्क देखना हो तो ऊपर
- 42:22तो कहीं है नहीं पार्लियामेंट हाउस में चले जाना वह कुम्भी पाक
- 42:28नर्क है उससे बड़ा कुम्भी पाक नरक और है ही नहीं।
- 42:38वहाँ सत्य का कोई बोल बाला नहीं, शब्दों से शब्दों को बढ़ाया जाता
- 42:44है जैसे मुर्गों को मुर्गे से लड़ाया जाता है।
- 42:48सुकुम्बी पाक नर्क देवताओं ने बनाया पंडित जीओ ने, लेकिन मुझे
- 42:56तो कहीं नज़र नहीं आया। मैं तो सारे कहीं घूमा फिरा मुझे
- 43:02कहीं कोई नर्क नजर नहीं आया तुम कुंभ भी बात की बात करते हो लेकिन
- 43:08हाँ कुम्भी पाक नर्क है, दिल्ली में है, पार्लियामेंट हाउस में
- 43:12है, देख लो जाके। ये रोक रोज़ बैठ कैसे जाते हैं?
- 43:20इतनी सड़ाध मारती है वहाँ अहंकार की हर व्यक्ति अहंकार की षड़ंत से
- 43:26भरा पड़ा है कोई संत संत हृदय इन व्यक्तियों के बीच मैं बैठ नहीं
- 43:35सकता। वह नाक बूँह सुकुर लेगा और भाग
- 43:39आएगा। बाँस हुकुम करना तुम्हारी खोपड़ी
- 43:50चाहती है और बाबा कहते हैं हुकुम करना मत सीखो।
- 44:00तो क्या सीखो? हुक्म मान सीखो शक्ति को मान लेने
- 44:08में कोई हर्ज नहीं शक्ति को मान ही लेना चाहिए बाबा कहते हैं
- 44:15हुक्म अंदर सबको। उसके हुक्म में तुम चलते हो ना कि
- 44:21तुम उस पे हुक्म चलाओ, हुक्म अंदर सबको बाहर हुक्म न कोय कोई भी
- 44:29व्यक्ति कितनी कोशिश कर ले यह चाँद तारे इस सूरज के भीतर
- 44:35तुम्हारी। हजारों लाखों पृथ्वीया समा सकती
- 44:40हैं। इतना विशाल है ये अकेला सूरज
- 44:45तुम्हारी पृथ्वीया लाखों की तादाद में इसमें समा सकती है इतना बड़ा
- 44:52सूरज है तुम्हारी औकात क्या है? और इस धरती पर तुम्हारी क्या औकात
- 44:58है? धरती की ही कोई औकात नहीं है।
- 45:02सूरज के आगे तभी तो परिक्रमा करती है।
- 45:08यह परिक्रमा करना, आरती उतारना है।
- 45:12तुम देखो जब आरती उतारते हो तो थाली को परिक्रमा करते हो न भगवान
- 45:16के आस पास, बस वैसी ही धरती और वैसी ही चंद्रमा धरती की परिक्रमा
- 45:22करता है। वह उसकी उपासना करता है, शलाघा
- 45:26करता है। वह उसका शोर शक चार पूजन करता है।
- 45:31परिक्रमा करना उसकी पूजा करना है। हुक्म अंदर सबको बाहर हुक्म न कोई
- 45:49नानक हुक्म जे बुझे। बड़ी प्यारी बात है, देखिये सिर्फ
- 45:54सुनना मत इसको गुण अर्जन, हृदय के भीतर प्रवेश कर लेना, इसको नानक
- 46:04हुक्म जे बुझे अगर तुम अपने भीतर उतरते उतरते उतरते।
- 46:09मैंने कहा एकता लाएगा जहाँ। उसका हुक्म जारी होता है, उसका
- 46:15फरमान जारी होता है। एक तल ऐसा आएगा क्या हुआ?
- 46:19अगर आपने अभी तक वो तल देखा नहीं तो कोई बात नहीं तुमने तो अपने आप
- 46:25तक को नहीं देखा, तुमने तो अपने साक्षी तक को नहीं देखा?
- 46:31तो तुम उस जंक्चर प्वाइंट पे पहुँच के परमात्मा के जहाँ से
- 46:36हुक्म रिलीज होते हैं, वहाँ जाकर व्यक्ति उससे पहले नास्तिक होता
- 46:41है, उससे पहले व्यक्ति समझता है कि मैं हुक्म करता हूँ मेरे करने
- 46:47से सब कुछ होता है। उससे पहले जो व्यक्ति करता है वह
- 46:51शैकाम कर्म करता है। व्याख्या बड़ी गंभीर होती जा रही
- 46:56है और व्याख्या बड़ी गहरी होती चली जा रही है।
- 47:01जंक्चर प्वाइंट के पहले अगर कोई व्यक्ति लाख कोशिश करे, वह
- 47:06निष्काम कर्म नहीं कर सकता। उससे जो कर्म होंगे सह काम कर्म
- 47:12ही होंगे और जैसे ही जंक्चर प्वाइंट के ऊपर तम चले गए, उससे
- 47:19थोड़ा सा नीचे आओगे तो परमात्मा के आदेश तुम्हें मिलने शुरू हो
- 47:24जाएंगे। तुम्हें स्पष्ट दिखना शुरू हो
- 47:26जायेगा कि उसके हुक्म में ही चलता है सब और वहीं जाकर ये शब्द
- 47:34उचारित होते हैं। बाबा के द्वारा क्या हुक्म है
- 47:38अंदर सब को? बाहर हुक्म न कोई यह बाबा अपने
- 47:44दिमाग से नहीं लिखते हैं। यह बाबा उस पॉइंट पे पहुँच कर
- 47:48देखकर लिखते हैं और बाबा कहते हैं नानक हुक्म जे बुजह।
- 48:00जो उस तल पर पहुँचकर जिसने जान लिया कि उसके हुक्म से सब जल रहा
- 48:05है, उससे पहले तो तुम लाख सोचो, उससे पहले तो दिल के बहलाने को
- 48:14गालिब ख्याल अच्छा है, तुम सोच सकते हो कि उसके हुक्म से सब चलता
- 48:19है। कहीं ना कहीं भीतर अविश्वास के
- 48:24करने झुलते ही रहेंगे कि नहीं जाने बाबा गलत बोलते हैं, तुम
- 48:31बाबा तक पे संदेह करने में कोई कसर नहीं छोड़ते।
- 48:37तुम परमात्मा तक में संदेह। करते रहो।
- 48:41तुम्हारा संदेह। इतना विराज?
- 48:42हो गया है कि वह टूटे से टूटता नहीं, तो टूटेगा कैसे दर्शन से
- 48:48टूटेगा? वहाँ जाकर जंक्चर प्लांट।
- 48:53से थोड़ा नीचे जाओगे तो उसके हुक्म तुम्हें दिखने शुरू हो
- 48:57जाएंगे। सुनाई पढ़ने शुरू हो जाएंगे और
- 49:00तुम देखोगे जो वो हुकम करता है वो ही हो रहा है बाहर वहीं।
- 49:06जाकर कहते हैं। लाउ से कि ईश्वर जो करता है ठीक
- 49:10करता है और भले के लिए करता है। ऐसे ही नहीं बोलते इन लोगों को
- 49:18पागल कुत्ते ने नहीं काटा। ये वहाँ जाकर बोलते हैं।
- 49:24और सभी एक भाषा बोलते हैं तो कभी। कभी कबीर ने कहा।
- 49:30सब है सयाने एक मत जो भी उस पॉइंट पे पहुँच गया।
- 49:34उन सब ने एक ही चीज़ देखी। और एक ही चीज़ देखी तो।
- 49:41उनको कबीर कहते हैं वो सयाने हो गए।
- 49:45सब सयाने एक मत मूर्ख, अपनों अपने मूर्ख अपनों अपनी।
- 49:51पार्लियामेंट में। देखो सब मूर्ख बैठ।
- 49:58इनको कुछ मिलता नहीं है। नान को हुक्म मैं जे बुझे बुझा
- 50:06कैसे जाएगा, उस हुक्म को बुझा कैसे जाएगा उस जंक्चर पॉइंट पे
- 50:11जाकर जब तुम देखोगे। परमात्मा का आदेश जैसा आया वैसा
- 50:17बाहर भी हो रहा है। तुम देख कर पहली दफ़े चकित हो
- 50:21होंगे। जो आदेश भीतर से आया बाहर वहीं हो
- 50:30गया। फिर तुम समझोगे, यह चलाने वाला
- 50:35कोई और है, यह तो जो आवाज देता है भीतर वो ही चलाता भी है, तब
- 50:46तुम्हें समझा आएगी पहली दफा मान मत लेना इस बात को, लेकिन मान भी
- 50:51लो तो ये सच है। इसके अलावा कुछ मत मान लेना, इसके
- 51:00अलावा कुछ मानोगे तो नरक में जाओगे।
- 51:05मार्क्स कहते हैं, भगवान है नहीं। मानलो।
- 51:10ना तो मार्कर्स। ने देखा ना?
- 51:12मार्कर्स ने खोजा, ना तुमने देखा, ना तुमने खोजा, तुम बिना देखे,
- 51:20बिना खोजे मंदिर चले जाते हो और मार्कर्स बिना देखे, बिना खोजे
- 51:25परमात्मा के अस्तित्व को नकार देते हैं।
- 51:28दोनों बुद्धू हैं। दोनों मोड़ हैं।
- 51:32असल दोनों ने नहीं देखा। असल दोनों ने नहीं जाना तो?
- 51:38बाबा कहते हैं कि सही। आपको पता कहाँ चलेगा?
- 51:43उस जंक्चर प्वाइंट से थोड़ा सा नीचे जब जाओगे।
- 51:46परमात्मा के आदेश आएँगे और तुम देखोगे।
- 51:50कि यह आदेश। आ रहे हैं, उधर बाहर अभिव्यक्त भी
- 51:54हो रहे हैं वैसा ही। हो रहा है जैसा।
- 51:58ये कह रहा है तब पहली दफ़े तुम आस्तिक हो पाओगे।
- 52:06उससे पहले तुम नाश्ते हो आस्तिकता का लैब लगा लो, मंदिर से ले जाओ,
- 52:12चंदन लगा लो, पीला चंदन लगा लो, दाढ़ी के भी लगा लो, सारे के लगा
- 52:17लो, कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन आस्तिक नहीं होगे।
- 52:23राधे राधे करते करते। कभी कोई न आस्तिक हुआ है राम।
- 52:28राम करते करते न? कभी कोई आस्तिक हुआ है, न कभी कोई
- 52:32आस्तिक होगा इसको। आप पत्थर पर।
- 52:37लकीर उकेर के लिखे न और ये शब्द कभी कट नहीं सकते हैं।
- 52:42वही करता है और वही करता है। तुम शब्दों से कहोगे, लेकिन बाबा
- 52:48नानक शब्दों से नहीं कहते। बाबा नानक जान के कहते हैं, उस
- 52:53स्थल पर जब जाते हैं, देखते हैं, जो होता है वह करता है, वह बोलता
- 52:58है, उधर अभिव्यक्त होता है करनी में।
- 53:02पहली दफे व्यक्ति। आस्तिक होता है, सच में उससे पहले
- 53:08कल्पना का सच है, कल्पना का ही तुम आस्तिक हो, कल्पना में ही तुम
- 53:14आस्तिक हो। और कल्पना का आस्तिक और।
- 53:18कल्पना का नास्तिक बिल्कुल जस्ट ए ड्रीम सुपन में।
- 53:24तुम आस्तिक हो जाओ। या नास्तिक हो जाओ कोई फर्क पड़ता
- 53:27है कोई फर्क नहीं पड़ता स्वपन तो स्वपन है, कल्पना तो कल्पना है जब
- 53:34टूट गई। तो तुम्हारा सुना सुनाया, देखा
- 53:38दिखाया सब टूट जाएगा, मैं कहता। हूँ पहली दफ़ा।
- 53:43बाबा कहते हैं हुक्म अंदर सबको बाहर हुक्म ना कोय।
- 53:51नानक हुक्म जे बुझे। जो भूज लेता है उस।
- 53:56हुक्म को और कहाँ भूजा जाता है उस जंक्चर प्वाइंट से नीचे जहाँ तुम
- 54:02सुनोगे देखोगे तो मैं कहे न कोई फिर जिसने।
- 54:09सुन लिया वो कहता। है।
- 54:10मैं करता हूँ ये भाव मिट जाएगा। क्योंकि वह देखेगा भीतर से।
- 54:17आदेश आ रहे हैं बाहर मूर्त। रूप ले रहे हैं।
- 54:21तो मैं कहाँ से हूँ मेरा किया कुछ होता नहीं है तब पहली दफ़े वह
- 54:29निष्काम कर्म कर सकता है। उस जंक्चर पाइंट से पहले जो भी
- 54:35तुम करोगे वह शैकाम कर्म होगा। और जब उस जंक्चर पाइंट के ऊपर
- 54:41जाकर तुम देखोगे और देखने के बाद और ध्यान रखना देखने से ही भ्रम
- 54:46मिलता है कल्पना से कभी भ्रम मिलता है।
- 54:51ताजमहल है, मान लोगे तुम है निश्चित है तुम्हें कोई काट नहीं
- 54:59सकता, लेकिन तुम पक्का पक्का तब कह पाओगे जब तुम उसके सौंदर्य को
- 55:06सामने खड़े हो कर निहार लोगे। कहाँ है?
- 55:11फिर तुम्हारी। मान्यताओं को कोई चोट नहीं पहुंचा
- 55:15सकेगा। अब रोज़ लोग मुझे कहते हैं, तुम
- 55:17भावनाओं को चोट पहुंचाते हो, पाप कर रहे हो नहीं।
- 55:21मैं सत्य बोल रहा हूँ। तुम्हारी दृष्टि में पाप कर रहा
- 55:25होगा, लेकिन मैं सत्य बोल रहा हूँ।
- 55:29मैंने जैसा देखा वैसे बोल दिया तुम इसे पाप समझ लो, तुम इसे
- 55:33पुण्य समझ लो, ठाकुर तुम सरनाई। आ ठाकुर, तुम सरनाई।
- 56:12उतर गए हो मेरे मन का संसा। उतर गए हों।
- 56:29मेरे। मन का।
- 56:34संसा। उतर गए हों मेरे मन का संसार जब
- 56:51तेरा दर सन हो। ठाकुर?
- 57:02तुम सरनाई आई ओह ठाकुर, तुम सरनाई आई?
- 57:18उतर गयो मेरे मन का। सन से जब तेरा दर्शन पायो जब वहाँ
- 57:26जाकर देखा। सुना तुम्हारे आदेशों को।
- 57:31तुम्हारे फरमानों को और बाहर। देखा, वही हो रहा।
- 57:35है मैं कहा। तब व्यक्ति सज्जा आस्तिक बनता है,
- 57:41उससे पहले नास्तिक होता है, तब वो जो करेगा निष्काम कर्म करेगा।
- 57:50तब बाबा कहते हैं कि तब। उसके बाद।
- 57:55कोई। नहीं कह सकता कि मैं।
- 57:56करता हूँ ना ना कहूँ कि मैं ये बुझे तो मैं कहे न कोई मैं करता
- 58:03हूँ मम्मी कोई नहीं कहेगा और अगर कोई कहता है मैं करता हूँ तो उसने
- 58:10उस स्तर को देखा नहीं, दो ही बात है।
- 58:15जिसने देख लिया वो मैं नहीं कहेगा और जिसने जो कहता है मैं करता हूँ
- 58:20उसने वो तो देखा है। सीधा सीधा गणित है कहीं।
- 58:25कोई उलझन नहीं है। से काम करम निष्काम।
- 58:36करम। उस प्वाइंट पर अपने भीतर।
- 58:40उतरते जाना कैसे उतरोगे बताया मैंने छोड़ते चले जाओ उसके ऊपर
- 58:47छोड़ते। चले जाओ।
- 58:51किसी ने गाली निकाल दी मेरे जब्त। लगाए जाते हैं लोग कोई बात नहीं,
- 58:57मैंने आपको बताया मेरे बेटे को मार दिया, कोई बात नहीं।
- 59:03क्योंकि मेरे हाथ छोटे हैं। और अगर तो तुने कुछ अगला पिछला
- 59:09कर्म का बदला लेना है तो ठीक और अगर कुछ ऐसा होना ही था, तुने
- 59:16करवाना ही था तो करवा दिया मैं अपने।
- 59:20हाथ में न्यायिक। अव्यवस्था नहीं लेता।
- 59:25न्यायिक व्यवस्था तेरे हाथों। में और मैंने तुम्हें देखा है बस
- 59:30यही मज़े। की बात है।
- 59:33छोड़। तो तुम भी सकते हो उसके।
- 59:35ऊपर लेकिन अभी अज्ञानता में छोड़ोगे लेकिन छोड़ दे न यह शुभ
- 59:40मार्ग है। छोड़ते चले जाओ।
- 59:43छोड़ते। चले जाओ।
- 59:46उसके हाथों में कोई कुछ भी कह गया कह गया।
- 59:53और जेब की लम्बी नंगी। तलवार।
- 59:58गुरु तेग बहादुर का शीश काट लेती। और वो सामने मूर्ति वत बैठे।
- 1:00:04रहते हैं। उनकी कुर्बानियाँ आने वाली
- 1:00:15पीढ़ियाँ पे लगी हैं। उनकी कुर्बानियाँ को हमने भुला
- 1:00:21दिया है। बस एक।
- 1:00:23सम्मान के रूप। में हिन्द की चादर कह के बस कर
- 1:00:26गए। हमने सीखा क्या उनसे कुर्बानी
- 1:00:31देनी हमने सीखी है। हम तो चार अक्षर भी नहीं बोल
- 1:00:34सकते। जो आदमी जुल्म करता है उसके
- 1:00:36विपरीत। लेकिन वो तो जाके बैठ गए काट?
- 1:00:40ले सर। धर्म तो नहीं बदलेगा, सिर ले।
- 1:00:45ले। ये होता है साहस और।
- 1:00:53साहस आता है दर्शन के बाद जिसमें साहस नहीं समझना, उसने दर्शन नहीं
- 1:01:00करना उस तल्प का। दर्शन नहीं किया।
- 1:01:06तो सह काम कर। निष्काम कर कर्मने वाध का रस्ते
- 1:01:11एक अधिकार ही तुम्हारे पास है, दूसरा कोई नहीं अगले ही शब्द की
- 1:01:15व्याख्या फिर करूँगा वक्त हुआ जा रहा है।
- 1:01:23अधिकार तुम्हारे पास कर्म। करने का है।
- 1:01:27कर्म क्या पाप या पुण्य नहीं पाप या पुण्य का तुम्हे कुछ पता नहीं
- 1:01:32वो तुम अपनी खोपड़ी से करते हो कई बार तुम।
- 1:01:36दान भी कर। सकते हो और वो पाप हो सकता है।
- 1:01:39क्योंकि दान। देकर अगर तुम्हारा।
- 1:01:41अहंकार ज्यादा बढ़ गया तो ज्यादा। अहंकार का बढ़ना।
- 1:01:46तुम्हें दुखी करेगा ज्यादा तो वह। पुण्य तुम्हारे दुःख का।
- 1:01:51कारण बना ना इससे? अच्छा तो नहीं करते।
- 1:01:56अगर तुम्हारे भीतर पश्चात की अग्नि जलती रही हाय।
- 1:02:01मैंने हाय मैंने। पुण्य किया था, लेकिन मुझे उसका
- 1:02:05माकजा नहीं मिल रहा तो फिर तुमने पुण्य नहीं किया, फिर तुमने
- 1:02:09व्यापार किया। फिर तुमने सौदा गिरी किया।
- 1:02:15दान तो वो संत कहते हैं, लेकिन हम समझते कहाँ है?
- 1:02:24नेकी कर दरया में डाल पता नहीं कहाँ चली जाए, दायां हाथ दान
- 1:02:30करें। भय को पता न चला, लेकिन तुम्हें
- 1:02:33तो बुरा बुरा पता चलता है। तो तुम।
- 1:02:37इस बात का अंदाज़ा। नहीं लगा सकोगे कि पुण्य क्या है,
- 1:02:40पाप क्या है? तुम बाहर बाहर से उसकी
- 1:02:44एक्सप्लेनेशन करते जाओगे, लेकिन तुम्हें पक्का नहीं पता है कई बार
- 1:02:50जिससे तुम पाप समते हो। वह भी पुण्य हो जाता है, इसलिए
- 1:02:56कृष्ण कहते हैं तू पाप पुण्य के चक्कर में मत पड़।
- 1:03:02तू चक्कर में मत पड़। के तुझे पाप पुण्य का भी पता नहीं
- 1:03:06विधान मैंने बनाया पाप पुण्य का फैसला।
- 1:03:10तुम कर रहा है। छोड़ दे तुम मुझपे छोड़ दे क्या
- 1:03:16पुण्य है क्या पाप है उसकी व्यवस्था मैंने निर्धारित कर रखी
- 1:03:21है। और बिलकुल उसी के हिसाब।
- 1:03:25से तुम्हे फल मिलेगा। कर मनेवाद का रस एक ही अधिकार है
- 1:03:34तुम्हारे पास क्या पाप पुण्य? का नहीं।
- 1:03:38पाप पुण्य तो छोड़ दो सह काम निष्काम और मैंने कहा जब तक तुम
- 1:03:48उसे जंक्चर प्वाइंट पे अपने भीतर नहीं पहुंचोगे।
- 1:03:52तब तक तुम सह काम कर्म ही करते रहोगे।
- 1:03:55निष्काम कर्म करना तुम्हारे वश में अभी नहीं आया अभी तुमने नहीं
- 1:04:01देखा कि ये सारा विश्व चल रहा है, उसकी मर्ज़ी से चल रहा है पर तुम
- 1:04:06तो बेचारे। खिलौने हो?
- 1:04:07छोटे से तुम्हारी औकात क्या है? नेगलिजबल भी कहना तो ठीक न होगा
- 1:04:13तुम्हारे लिए नगण्य कहना भी तो शुभ नहीं है, ठीक नहीं है, तुम
- 1:04:19नगण्य भी नहीं हो तो कृष्ण कहते हैं पाप को छोड़ सह काम निष्काम
- 1:04:27पे आ। निष्काम पे कैसे जाएं?
- 1:04:31ये पूछो तुम अपने भीतर उतरो कैसे उतरो छोड़ दो समर्पण करना सीखना
- 1:04:39होगा अभ्यास के दौरान तुम हर बात को अफ़सोस मत बनाओ, खुशी मत बनाओ।
- 1:04:50बर्बादियों का शो मनाना फिजूल था, मनाना फिजूल था।
- 1:05:08बर्बादियों का जश्न मनाता चला गया बर्बादियों का जश्न मनाता चला
- 1:05:17गया। हर फिक्र को धुएँ।
- 1:05:22में उड़ाता चला गया। मैं जिंदगी।
- 1:05:28का साथ निभाता चला गया। जिंदगी का साथ निभाता चला गया।
- 1:05:35थोड़ा गहरे उतरे शब्द में है, वक्त है पांच 4 मिनट का जैसे
- 1:05:41जिंदगी चलाना चाहती है। उसका साथ निभाओ ज़िन्दगी को अपने
- 1:05:50हिसाब से चलाने की कोशिश मत करो तुम ज़िन्दगी जैसे तुम्हें चलाती
- 1:05:56है वैसे ही चलो ये है ज़िन्दगी का साथ निभा दो।
- 1:06:00ज़िन्दगी का साथ। निभाता चला गया।
- 1:06:05इसे बाबा एक शब्द में कहते हैं, तेरा पाणा मीठा लग गए जो तुद पावे
- 1:06:13सोई पलिकर ये ज़िन्दगी का साथ निभाना होता है बुरा कर दिया कर
- 1:06:19दिया आखिर में पाओगे मेरा कुछ था भी नहीं।
- 1:06:24जो गुम हुआ। वो भी मेरा।
- 1:06:25नहीं था जो मेरा वो भी मेरा नहीं था।
- 1:06:30अब तुम सब कुछ कमाते हो। तुम समते हो साथ लेकर जाएंगे कभी
- 1:06:35कोई साथ लेकर गया शरीर तक को यहाँ छोड़ना पड़ता है भाई।
- 1:06:41कहाँ साथ लेकर जाते हो? तो वह बच्चा मेरे पास आया मुझे।
- 1:06:48कहने लगा मैं जज बनना चाहता हूँ, मैंने कहा क्या करे खर्च बन के
- 1:06:52मूर्ख छोड़? जज जीतने।
- 1:06:56दुखी होते हैं उतना कोई दुखी होता ही नहीं।
- 1:07:00है तो तबका। हाँ।
- 1:07:05मैं अंतःस की बात को जानता। हूँ क्योंकि हम।
- 1:07:12हम उस कॉन्शसनेस। के लेबर पे उतर चूके हैं जिसे आप
- 1:07:18कोलेक्टिव अनकॉन्शस कहते हो। हम देखते हैं जा जी कितने सुखी
- 1:07:23हैं हमको रात को नींद नहीं आती जीसको रात को नींद तक भी न आए एक
- 1:07:31भिखारी को भी नींद मज़े से आ जाती है।
- 1:07:36और जज को रात को नींद न आए। नींद जैसी नैसर्गिक चीज़ न आए।
- 1:07:42तो ये अशुभ है क्या अशुभ है? कहता मैं तो बनूँगा मैं तो
- 1:07:49कॉम्पटीशन। में बैठूंगा तो बैठ।
- 1:07:51जाओ मैं कह सोना परमात्मा व्यवस्था करता है।
- 1:08:00पुण्य और पाप की सुख और दुख से ठीक है यह तो मैं समझता हूँ कहता
- 1:08:04हूँ तो अब तू। देखना जज बन के।
- 1:08:06सुख पायेगा के दुख पायेगा तो जज बनना पाप है या पुण्य अगर दुख
- 1:08:13मिले जज मिल के बन के तो पाप किया अगर सुख मिले जज बन के तो बोलने
- 1:08:19की। वह तो बन गया।
- 1:08:24एक 2 साल ठीक रहा। फिर से मेरे पास आ गया, बाबा
- 1:08:27तुमने ठीक कहा था। तुमने ठीक कहा था।
- 1:08:34यह तो दुःख ही दुख है, यह तो परमात्मा ने मेरे ऊपर बोझ ला
- 1:08:38दिया। सारे दिन सारी रात मेरे दिमाग पे
- 1:08:43बोझ बना रहता है और असुरक्षा? के भाव में।
- 1:08:47ये उसके खिलाफ़ फैसला दिया है। कहीं वो दनादन न कर जाए।
- 1:08:52मैंने कहा यही होता है बेटा इसलिए मैंने कहा सर क्या करना है?
- 1:08:59क्यों पागल हुआ जा रहा है? मेरे से पूछा ही है तो मेरे अनुभव
- 1:09:03को मान भी ले वैसा भाई मेरे। अनुभव को मान लो।
- 1:09:11या ना मान लो तुम्हारी इच्छा लेकिन मैं बोलेंगे वो ही।
- 1:09:16जो मैंने सत्य में पाया तुम्हे सुख देने के लिए तुम्हे आनंद देने
- 1:09:20के लिए छोड़ते चले जाओ उसके ऊपर धीरे धीरे तुम अपने गहरे में
- 1:09:26उतरने शुरू हो जाओगे जैसे व्यक्ति डूबता हुआ गहरे में उतरता है,
- 1:09:30अपने आप करना कुछ नहीं है डूबने। के लिए कुछ करना होता है क्या?
- 1:09:36डूब तो अपने आप ही जाता है, व्यक्ति तो छोड़ना ही होता है बस
- 1:09:41किसी तिनके को ना पकड़े कोई हाय हुल्ला ना मचाए कोई आस पास के
- 1:09:46खड़े लोगों से ना कहे बचा लो मैं गयो ऐसा कुछ ना हो बस डूबना तो
- 1:09:52होता ही है। और 1 दिन ऐसा आएगा कि तुम।
- 1:09:57डूबते, डूबते, डूबते, डूबते उस स्तर पर पहुँच जाओगे जहाँ उसके
- 1:10:02आदेश आते हैं और जहाँ उसके आदेश आते हैं।
- 1:10:06जब तुम वहाँ पहुँच गए तो मज़ा ही मज़ा है।
- 1:10:12चारों तरफ आनंद की बरसात। हो रही है आनंद का एक बूंद भी आज
- 1:10:18तक न पिया था, आज तो मूंझ लग गई आय तो आनंद के झरने में थे, पहली
- 1:10:24दफ़े तुम सुख क्या है यह जान पाओगे?
- 1:10:30पहली दफ़े तुम परम। सुख क्या है अखंड धारा सुख की
- 1:10:35होती क्या है यह जान पाओगे कैसे जान पाओगे तेरी कहाँ मैंने बता
- 1:10:39दिया आपको छोड़ते चले। जाओ।
- 1:10:43जैसे डूबता है व्यक्ति बस छलांग ही तो रखनी होती है फिर डूब तो
- 1:10:48अपने आप ही जाता है। डूबते चले जाओ डूबते।
- 1:10:53चले जाओ और कोई आस पास अगर तुम्हें सहारा भी दिखे मत पकड़
- 1:11:01वंचित रह जाओगे भीतर भीतर उतरोगे भीतर भीतर उतरोगे।
- 1:11:07कुछ नहीं करना है डूब तो खुद ही जाता है आदमी तो उस स्तर पे पहुँच
- 1:11:12जाओगे। जहाज में वो वेद मंत्रों की ध्वनि
- 1:11:17सुनाई पड़ती है। वह परम ज्ञान की ध्वनि।
- 1:11:22सुनाई पड़ती है। जहाँ खुद कृष्ण बोलते हैं
- 1:11:31सर्वधर्माणन। प्रत्यक्षमामेकम शरणम ब्रजो अहम
- 1:11:39तम सर्वप पे भ्यो। मोक्ष श्याम माँ सुचह।
- 1:11:51वहाँ उसकी आवाज़ सुनने। को मिलेंगे, वहाँ उसके फरमान
- 1:11:56सुनने को मिलेंगे। यहीं से आता है।
- 1:12:02बांगे इलाही यह जो अन्नदनद का गूंज हो रहा है उसका उद्गम सतल
- 1:12:11वहीं है जहाँ से आते हैं आदेश। तो मैं कहता हूँ बड़ा।
- 1:12:17जिसके अन्नदनद शुरू हो गया। पर महात्मा।
- 1:12:21ने उसकी मोज लगा दी। इसके संघ संग उतरे जाओ।
- 1:12:26संघ संग उतरते जाओ शंख। संग उतरे हुए कैसे छोड़ दो, अपने
- 1:12:32आप को छोड़ दो, फिर बाहर की चीजों का ख्याल मत करो।
- 1:12:37वो गाली निकाल के निकाल के क्या ले गया?
- 1:12:40गाली निकालने वाला भी मर जाएगा। जीसको गाली निकाली वह भी मर
- 1:12:45जाएगा। ये कोई दर्शन थोड़ी देने होते
- 1:12:48हैं। साढ़े 12:00 बजे लोगों को जगाना
- 1:12:50थोड़ी होता है। लोग पंचभौतिक शरीर का दर्शन कर
- 1:12:53लो। अरे पागल हुए हो, लोगों को मूर्ख
- 1:12:57बनाओगे, पागल बनाओगे इनकी नींदें खराब कर रहे हो।
- 1:13:00अमरीका में आज सोने के लिए लोग दवा लेकर सोते हैं और तुम लोगों
- 1:13:05को जगा रहे हो। ये पाप है या पुण्य?
- 1:13:08इसलिए मैं कहता हूँ पाप और पुण्य का ख्याल मत करना।
- 1:13:12क्योंकि तुम्हें पता नहीं है क्या।
- 1:13:14पाप है और क्या पुण्य है तुम सह काम और निस्काम।
- 1:13:18तुम उस तन पर उतर जाना जहाँ आदेश आता है और आदेश वह आता भी है आदेश
- 1:13:26और उसे परिपूर्ण भी वह खुद ही करता है, तो यहाँ आकर उसने कहा है
- 1:13:34आप के खेल खेल खिलाड़ी। आप पे खेल हारा हो वह खुद ही
- 1:13:44खेलता है खुद ही खेल है, खुद ही खिलाड़ी है खुद ही जीतता है खुद
- 1:13:50ही हारता है। श्री कृष्ण।
- 1:13:58गोविंद हरे मुरारी श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी।
- 1:14:17हे नाथ नारायण वसुदेव श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण?
- 1:14:34वासुदेव, श्री कृष्ण, गोविंद हरे मुरारी, ए नाथ नारायण, वासुदेव,
- 1:14:51पितुमात स्वामी। सखा हमारे।
- 1:15:08हेनाथ नारायण वासुदेव, श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी।
- 1:15:29हे नाथ नारायण वसुदेव श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण?
- 1:15:53धन्यवाद।