Latest / Baba ji Vijay Vats / 26 Jan 26 - चोटी और ब्रह्मरंध्र का विज्ञान | खेचरी मुद्रा और अमृत पान | डेल्टा वेव्स -आध्यात्मिक ऊर्जा
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- 0:15बाबा जी प्रणम छोटे छोटे प्रश्न दो तीन हम पहले विचार हैं सत्य और
- 0:33सत्य में क्या फर्क है? सत्य बोला जाता है, सत्य हुआ जाता
- 0:46है। बड़ा शॉट सच बाग है।
- 0:54लेकिन इसमें गहरे राज़ छुपे हुए हैं।
- 0:57सत्य बोला जाता है, सत्य हुआ जाता है एक्जिस्टेंस इज़ सत्य एंड
- 1:10स्पीच इज़ सत्य। हम जो बोलते हैं वह सत्य और जो हम
- 1:22हो जाते हैं। आखिर में संत शब्द सत से बना है,
- 1:28सत सत के ऊपर एक बिंदी लगा दी है। संत हो गया दूसरा प्रश्न ले ले
- 1:51मेरे मुख से मीठी सी लार मीठा पन। काफी मात्रा में इकट्ठा हो जाता
- 2:05है ध्यान के भक्त ये क्या है इसकी सरल से पहचान मैं तुम्हें बताता
- 2:18हूँ मुँह में पानी जैसा या लार जैसा इकट्ठा हो जाना।
- 2:28अगर आपको आनंदित करता है तो वह अमृत है।
- 2:33ऊपर से जरा हुआ अमृत अगर आनंद नहीं होता आपको तो वह लार है
- 2:42सैलाईवा। अगर आनंद नहीं होता, सिर्फ मीठा
- 2:51पानी या लार इकट्ठा होता है तो वह सलाई बा है अगर उस मीठे पानी या
- 2:59लार के साथ आनंद घना हो जाता है। तो वह अमृत है, ऊपर से झरता हुआ
- 3:10फिर ये झरता कहाँ से ये महत्वपूर्ण है।
- 3:22हमारे ब्राह्मण लोक जय शंकर आचार्य चोटी रखते हैं।
- 3:29चुटिया अपने चाणक्य की कहानी सुनी होगी
- 3:45धनानंद के साथ। उसका कोई गहरा विवाद बढ़ गया।
- 3:58वो घनी चोट ही रखा पड़ता था। ब्राह्मण था उसे काला ब्राह्मण
- 4:03करता था। शकलूर सूरत से बद सूरत।
- 4:20और अक्ल से तेज छुरी धार जैसा तलवार भी धार जैसा तो चोटी रखता
- 4:30डंपी बहुत बड़ी चोटी थी उसका। इसलिए शंकराचार्य लोग अपना सारा
- 4:39सिरम मुड़ा देते एक चोटी रख लेते, बस चोटी ही उनकी पहचान है।
- 4:50आइए हम थोड़ा गहरे में आते हैं। यह प्रश्न बड़ा सुनता है।
- 5:00अब किसी शंकराचार्य से पूछोगे ये चोटी क्या शंकराचार्य कहेंगे
- 5:07हमारा सन्मान यह दंड? यह छतर और यह चोटी हमारा सम्मान
- 5:20है, हमारा लक्षण है हमारे शंकराचार्य होने का ब्राह्मण है।
- 5:33देखें सिम्बोलिक रीप्रिजेंटेशन बचे रह गए।
- 5:45जो हमने प्रतीक प्रतीकात्मक चिन्ह छोड़े थे वो बच गए लेकिन अगर इनसे
- 5:56पूछा जाए यह वास्तव में रखा क्यों जाता है?
- 6:04तो इनके पास जॉब आप कोई नहीं है ये शंकरे सर उसे कहते हैं जीसको
- 6:15शास्त्र कंठस्थ। जीसको शास्त्र संस्कृत के शास्त्र
- 6:28कंठस्थों व शंकराचार्य हम्म वो तो रेक्टाफिकेशन है छः 7 साल के
- 6:41बच्चे। गीता को खूब हूँ संस्कृत में, आज
- 6:48से भी सुन्दर भाषा में बोल देंगे तो इसका मतलब वह कृष्ण नहीं
- 6:55होंगे। हम प्रसंग को ज्यादा लंबा न करें।
- 7:07शार्ट में सोचें ये चोटी जहाँ से निकलती है चुटिया उस स्थान को।
- 7:24ब्रह्मराम अगर इस चुटिया को उखाड़ लिया जाए बस यही वो स्थान है जहाँ
- 7:35से झड़ता है अमृत यहाँ से लेकर कपाल के बीचों बीच।
- 7:43यह सारा क्षेत्र बड़ा कीमती यहाँ परमात्मा का ऐसा ऐसा यंत्र पड़ा
- 7:56है या आप सोच भी नहीं सकते। सारा ब्राह्मण यहीं से चलता है और
- 8:05यहीं उसे सारा ब्राह्मण का अस्तित्व का फरमान माना जाता है।
- 8:11उतरता है। यही क्षेत्र है यहाँ पर हम चुटिया
- 8:19रखते हैं, शंकराचार्य लम्बी, लम्बी चुटिया रखते हैं, उसको गांठ
- 8:27दे देते हैं तो चणक ने कहा मैं अपनी चुटिया को आज खोलता हूँ।
- 8:37तब तक यह चुटिया खुली रहेंगी। जब तक घनानंद के साम्राज्य का अंत
- 8:43नहीं कर दूंगा और यह राज्य का अधिकारी।
- 8:53कोई योग्य पुरुष हो जाएगा वहाँ से चलती है राजनीति
- 9:14अगर यह चुटिया खोल दी जाए गांठ न रहे इसमें।
- 9:25तो वह अमृत का जर्ण शुरू हो जाता है।
- 9:37धरती में नीचे व्यर्थ होना शुरू हो जाता है।
- 9:48अगर इस चुटिया को खोल दिया जाए, उनकी गांठों को खोल दिया जाए तो?
- 9:57यद्यपि ये बार इंसुलेटेड हैं, कंडक्टर नहीं हैं, तथापि रेंज तो
- 10:06रहती हैं इसको। रेंज खुले में बरसना शुरू हो
- 10:10जाएंगे और धरती में समा जाएंगे। और यू विल लूज़ युअर डेल्टा वेव्स
- 10:19यहीं से निकलते है डेल्टा वेव्स वेव और विद्युत में बड़ा फर्क।
- 10:27केरण में और विद्युत में बड़ा फर्क है।
- 10:33जिन्हें डेल्टा पेप्स में कहता हूँ, वह कोई इलेक्ट्रिकल
- 10:42कम्पोजिशन से बनी हुई चीज़ नहीं है।
- 10:47वह लहर है वेब है और वेब में और विद्युत में जमीन आसमान का फर्क
- 10:54है। दोनों चीजों को यकसा मत समझ लेना
- 11:02आइए थोड़ा शोर गहरे से। पुराने जमाने में हमारी ऋषि
- 11:12अमानियों को आज के साइंटिस्ट कहा जाता था और आज के साइंटिस्ट हमारी
- 11:22ऋषि अमानियों के। पांव के नाखून के बराबर भी नहीं।
- 11:30उन्होंने कुछ भी खोज लिया हो, लेकिन वह पदार्थ मैटर के रूप में
- 11:46खोज लिया आनंद के रूप में मैंने खोज।
- 11:52यहाँ थोड़ा सा आराम से बोलूं आप समझाओगे मटेरियलिस्टिक खोज नहीं
- 12:01की उन्होंने सब्वर्चुअल खोज की उन्होंने।
- 12:10इन बालों में से हर वक्त डेल्टा बीफ्स चोटियां की बाल है।
- 12:22डेल्टा बीफ्स प्रसारित होती रहती है।
- 12:31इसलिए इसको गांठ दे दिया। अगर गांठ दे दी गई तो यह वेब्स
- 12:39आगे नहीं जा पाएगा। गांठ देने का ये कारण था।
- 12:48पुराने जमाने में अगर कोई स्त्री विधवा हो जाती तो उसके बाल खोल
- 12:54दिए जाते हैं। आज की विधवाएं क्षमा करना आज की
- 13:07विधवाएं। बाल खोरे करते हैं, इनका कोई पति
- 13:11है ही नहीं और देखो देखने में अच्छे नहीं लगेंगे।
- 13:25इस चुटिया को क्यों बांधते थे? जिसे हम गुप्त कहते हैं।
- 13:29छोटी प्राणी स्त्रियाँ छोटी करती थी।
- 13:36यह बालों का गूथ जानो उन रहस्यमयी रंगों को अर्थ होने से रोकता है।
- 13:48जमीन में घुस जाने से रोक देते हैं।
- 13:54यह बालों का उलझा देना आपस में इसलिए बनानी स्त्रियाँ चोटी करती
- 14:00थी। छोटी से छोटी बच्ची भी चोटी करती
- 14:03थी। आपने देखा भगवान कृष्ण कितने छोटे
- 14:06हैं? लेकिन उसके भी चोट ही कर देती थी।
- 14:11मैया उसके बालों को गूंथकर ऊपर गांठ लगा देते थे।
- 14:20भगवान राम के साथ भी ये जो सन्यासी लोग थे संत।
- 14:30यह बालों को इकट्ठा करके जुड़ा को बांध लेते थे और स्त्रियां जुड़ा
- 14:37को बांध लेती थी। उसका सिर्फ कारण यही था।
- 14:41डेल्टा वेव्स धरती में न जाने पाए।
- 14:46डेल्टा वेव्स यहीं घूमती रहे। लेकिन आज वैद्य ज्ञानिकता तुम तो
- 14:55कहते हो चर्म सीमा मैं कहता हूँ खो गया है मटेरियलिस्टिक आपने
- 15:03बढ़ा दिया। भगवान कृष्ण के वक्त पंखे नहीं
- 15:07चलते थे, रुकमणी को पंखा झेलना पड़ता था, विद्युत की खोज नहीं
- 15:14हुई थी और कोई ज़रूरी बात नहीं है।
- 15:17विद्युत की खोज ना हो तो वह तरक्की नहीं कर सकता।
- 15:23में। और भी राहतें हैं।
- 15:27वसल की राहत के सिवा और भी गम हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा।
- 15:46और मोर पंखे एक ऐसी चीज़ है जो असामानी रंगों को अपने भीतर सहज
- 16:00ही खींच लेता है। इसलिए मोर जब नाश्ता है तो अपने
- 16:08पंखों को ऊपर कर देता है ब्राह्मण की तरफ उसे बड़ा आनंद आता है,
- 16:14क्यों? क्योंकि यह पंखों की टिकिया।
- 16:22यह ब्रह्मांड से डेल्टा वेव्स को खींचती है और मोर नाचता है।
- 16:30आपने सोचा शायद मोर नाचता है, सावन के कारण नहीं मोर नाचता है
- 16:38एंड डेल्टा वेव्स। जो उसने पंखों पर फैलाये और ये जो
- 16:44पंखों की वितरतीकिया होती है, नीले, हरे रंग की आसमानी रंग की,
- 16:51यह डेल्टा भी उसको खीच लेती है। ब्राह्मण रस।
- 17:00और यह तुम्हारी एक चुटिया के पास ग्रंथी है।
- 17:09ब्रह्म्रन्द्र जो सहज शरारत तक जाती है, उसमें प्रवाहित हो जाता
- 17:17है। यही महत्त्व था जोड़े का।
- 17:21यही महत्त्व था औरतों की चुटिया का चोटी बांधना और जब कोई स्त्री
- 17:28विधवा हो जाती उसको बाल खुलवा दिए जाते।
- 17:34सफेद वस्त्र पहनना न दिए जाते कार में।
- 17:40अब तुम्हारी ज़िन्दगी से सारा रंग खत्म हो गया, तुम्हारी ज़िन्दगी
- 17:46बेरंग हो गई, बाल खोलते थे अब आनंद के दन तुम्हारे समाप्त हुए
- 18:00हैं। अब डेल्टा वेव्स जो पैदा होती हैं
- 18:06उनको जड़ लेने दो, धरती को पी लेने दो, अब तुम्हारी ज़िन्दगी
- 18:10मेरस न बचा हो। यह कृषि पोलिक्री प्रेजेंटेशन था।
- 18:16प्रतीकात्मक क्षण लेकिन हमने। बिना वैज्ञानिक कारण जाने तुम
- 18:26देखना ये खुले खुले हुए बालों वाले स्त्रियाँ लड़कियां बच्चियां
- 18:35आज की बाल खोल के चलती हैं। यह मात्र दिखावा है और यह दिखावा
- 18:48बड़ा महंगा है। यह दिखावे का शौक बहुत महंगा है
- 18:54अपने अंगों को प्रकट कर दे अपने रोनों को।
- 19:07खुला छोड़ देना प्रकृति की तरफ खुला छोड़ देना यह क्यों नकाब और
- 19:21क्यों घूँघट? और क्यों पूरा शरीर डांप लिया
- 19:25जाता था? कारण क्या था?
- 19:36जब घर से बाहर निकले हैं तो वातावरण में काम करें।
- 19:44जी हम। लाशानी तरंगें कहते हैं, लाशानी
- 19:53तरंगों में काम वासना भरी पड़ी क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति उलट
- 20:01पुलट चाउ में चुग्गा। काम बृद्धक चीजें खाता है और उसके
- 20:08रोम में से काम बात से निकलती है। नग्न शरीर का प्रदर्शन तुम्हारी
- 20:18रोम को खोल देगा। और विशेष त्याग मंगलवार को हमारे
- 20:30रोम को ज्यादा खुले होते है। इसलिए मंगलवार हनुमान जी का दिन
- 20:40मना गया और हनुमान जी। लंगोट धारी यानी ब्रह्मचारी थे।
- 20:55अपने शरीर को खुला छोड़ना यह व्याख्या लंगोट की व्याख्या मैं
- 21:06सार्वजनिक नहीं करूँगा। किसी मेरे विशेष शिष्य के पूछने
- 21:13पर ही मैं यह बात उसको बता पाऊंगा।
- 21:17सार्वजनिक करना लोक हित में नहीं, शरीर के सारे अंगों को नक से सीखा
- 21:28तक। बिल्कुल ढक लेना यह कोई शर्म है
- 21:42कि बात में इसके पीछे एक साइंटिफिक।
- 21:54जितनी आप वातावरण के प्रति अपने रोम को को छोड़ोगे उस वातावरण में
- 22:06काम वासन की तरगें भरी पड़ी। इन्हें लासानी तरंगें कहते है।
- 22:10हम इसलिए हमारे पास तो जहाँ आता। उसको घंटा दो घंटा बाहर बैठाया
- 22:16जाता है। किसी बहाने से पानी पी लो, चाय पी
- 22:20लो, खाना खा लो, सीधा सीधा बैठती है अगर कोई यहाँ जल्दी करो बाबा,
- 22:30मुझे दिशा दे दो। उसमें इंकार कर देता हूँ कि वापस
- 22:36चले जाओ, अक्सेप्टेंस पावर नहीं है अभी तुम्हारा चित ठहरा नहीं और
- 22:49भागता हुआ चित। एक्सेप्ट नहीं कर पाता।
- 22:52तरंगों में ठहरना आवश्यक है तो पहले इस दरबार में बैठोगे आराम से
- 23:02यहाँ की बरसती हुई आसानी और डेल्टा वेव में ठहरोगे आनंद का
- 23:08पान करोगे भूल जाओगे सब कुछ। कि मेरे कोई घर भी है, बार भी है,
- 23:14बेटे भी है, बच्चे भी है सब भूल जाओगे, मैं यहाँ क्या पूछने आया
- 23:19था? बाबा श्री को भूल जाओगे आप
- 23:24क्योंकि यहाँ के तरंग। डेल्टा वेव तक जब व्यक्ति पहुंचता
- 23:31है तो सब भूल जाता है। उसका बुद्धि से कनेक्शन टूट जाता
- 23:37है। यह जो पर्दे की प्रथा थी, नकाब
- 23:45था। सारे शरीर को झांक लेना था।
- 23:53नक्से शिखा तक एक अंगुली भी आपकी खुले वातावरण में आपका रोम कोप।
- 24:04लासानी तंगों में ना चला जाए कहीं उससे बचने की तरकीब थी, लेकिन
- 24:17इस्लाम ने इसे अपनाया और हिंदू धर्म ने सनातन्य भी इसे अपनाया
- 24:25धीरे धीरे। अश्लीलता बढ़ती गई।
- 24:28तुम तो कहते हो, लेकिन मैं कहता हूँ वैज्ञानिकता बढ़ती गई,
- 24:34आध्यात्मिकता खो गए। अपने शरीर से वस्त्र घटाने शुरू
- 24:40करते है, बस आज दो महज। जैसे भगवान महावीर के दिगम पर
- 24:46होते हैं, वैसे ही रहते हैं, उतना भी अगर न हो तो कोई बड़ी बात नहीं
- 24:52है। यह अश्लीलता नहीं है, मैं इसे
- 24:59गुंडापन नहीं कहता। आदिवासी आज भी नकन करते हैं।
- 25:21वातावरण के प्रति रोम कूपों को खोल देना आसानी रंगों को मौका मिल
- 25:28जाता है, आपके रोम कूपों में आपके शरीर के भीतर प्रवेश करने का।
- 25:39और वह आपकी तासीर बदल देती है। फिर आप कामभासना से ग्रसित हो
- 25:46जाते हो, क्योंकि एक बार लाशानी तरंगें भीतर घुसीं कामभासना
- 25:52उठेगी। बाहर के दृश्य तुम्हारे पोर्न
- 25:58वगैरह उनको भड़काएंगे और तुम अपनी शक्ति को खो दोगे ब्रह्मचर्य को
- 26:06खोदोगे और वह शक्ति खोदोगे जिसके जरिए जो जहाज का काम करती है।
- 26:15तुम्हें वहाँ तक ले जाने में रॉकेट का काम करती है।
- 26:19ब्रह्मचर्य को मैं रॉकेट कहती सैली वैसी इस दी रॉकेट टु
- 26:25स्पर्चुलेशन जैसे आप रॉकेट। मन का भटका खत्म होगा।
- 26:42मन का भटका खत्म हुआ तो मन ठहरा, मन ठहरा तो अपने भीतर उतरना शुरू
- 26:48हो गया। बहुत से डायमेंशन से ब्रह्मचर का
- 26:53प्रभाव पड़ता है आपके सारे पूरे शरीर तन पादन।
- 27:02तो अगर इस छुट्टियों को खोल दिया जाए तो डेल्टा वेव से नीचे बिखरने
- 27:11शुरू हो जाएंगे। बस यह एक प्रतिज्ञा थी।
- 27:20डेल्टा वेव्स यानी आध्यात्मिक तरंग जो आपको सरब और रखती थी आनंद
- 27:30से और जैसे ही कोई सरब और आनंद से रहता है वह गणित है कैलकुलेशन
- 27:39नहीं कर सकता। अगर तुम गणित ये कैलकुलेशन करना
- 27:44चाहते हो तो अध्यात्म से दूसरे छोर पे चले जाना, फिर बार खोल
- 27:50देना, तो तुम सांसारिक चीजों को अच्छे से समझ सकोगे।
- 27:58अगर तुम परमात्मा की तरफ गतिशील होना चाहते हो तो अपने बालों को
- 28:04बांध लो। इसलिए सिखों ने बालों का इतना
- 28:09महत्त्व रखा और चाही सारी सिर को में डालो।
- 28:19चूटी को बजाए रखो, लंबी रखो और इसके अंदर गांठ मत रहो, क्योंकि
- 28:25यहीं से निकलती हैं डाटा वेव्स। यहीं से निकलती हैं वो वेव्स जो
- 28:32आपको आनंदित करती हैं। जैसे ही छुट्टियां खुलीं तो आपकी
- 28:39आध्यात्मिकता नीचे बरसनी शुरू हो गई और अब सेनसाज हो गए तो चानिक
- 28:45करें। ये काम समझदार नहीं था अचानक
- 28:50लेकिन उसे एक विधि का पता था। अगर मैंने संसार की बातों की तरफ
- 28:57ध्यान करना है तो मुझे इस चुटिया की गांठ खोलनी पड़ेगी।
- 29:04रितिकात्मक चिन्ह की तरह उसे समझा दिया था उसके गुरु ने तो उसने
- 29:11चोटी को खोल दिया। ये ले चोटी खोल दे।
- 29:14अब मेरी खोपड़ी दिन भर रात तेरे विशाल साम्राज्य को पतन करने में
- 29:21लग जाएगी। अब मैं सारी प्लान बनाऊंगा तेरे
- 29:27विशाल साम्राज्य के अंत के लिए आज से मैं शुद्ध।
- 29:35शानदारी को हुआ। मैंने अपना अध्यात्म त्याग दिया,
- 29:39ब्राह्मण था, अध्यात्मिक व्यक्ति था और चोटी खोल दी।
- 29:49ये ले आज से अध्यात्म के सारे प्रयास समाप्त।
- 29:54और संसार के सारे प्रयास स्वरूप और उसने सारे प्रयास किए और 1 दिन
- 30:00कामयाब भी हुआ। गद्दी बदल दी गई।
- 30:02गनानंद भाग गया या मारा गया जीस स्त्री का पति।
- 30:14चला जाता, उस स्त्री के वार खोल दिए जाते है, मुड़ा दिए जाते है
- 30:24या खोल दिए जाते है। खोलने का मतलब ये है जब घृत खुल
- 30:32गए। तो वो डेल्टा वेव्स जहाँ अटकनी थी
- 30:37जाके वो सारा रास्ता खुल गया और डेल्टा वेव्स भी करनी शुरू हो
- 30:45गयी। धरती ने कही इसलिए छुट्टियों को
- 30:50खोल देना। या बालों को खोल देना, यह आपको
- 30:59अधार्मिक बनाएगा। संक्षेप में अगर मैं कहु राजस्व
- 31:03रूप में अगर बालों को खोल दोगे? तुम ज्यादा कम हो जाओगे, इसलिए
- 31:17अंग्रेज कौन ज्यादा कम होती बाबकट बाबकट हमने भी आज कहा।
- 31:29पहले की जवानी हम बाल रखते थे, छोटे कटा लेते थे, लेकिन चुटिया
- 31:34की जगह हम नहीं काटने देते थे। वहाँ हम गांठ बाध लेते थे।
- 31:40आपको याद हो गए शायद वह जमाने जो मेरी हम उम्र के।
- 31:46चुटिया के स्थान पे हम बालों को काटने नहीं देते थे और ना ही कुछ
- 31:50भी नहीं काटता था वहाँ पर अच्छे से घाट लगा देता था बाकी वालों को
- 31:55काट देता था मुख में से जोरस आता है मिठा यहीं से टपकता है आगाज़
- 32:10यहीं से। यह सेंटर है और वह इतना आनंददायी
- 32:18है कि उसका बखान किया नहीं जाता बेहरसवान।
- 32:30मीरों को मीरा को बाबली बना देता है, मीरा शुद्ध बहुत भूल जाती है।
- 32:36राजस्थान की उस परंपरा में जहाँ एक एक फिट का गूँघट होता है और वह
- 32:43तो कोई पुत्री नहीं थी, वहाँ की स्त्री थी, बहुत थी।
- 32:51घूंघट पता नहीं कहाँ है, पांव में जूते नहीं हैं और बाबरी हुई बागी
- 33:03चली जाती। जाती ही है, अपने गुरुदेव के पास
- 33:07गुरुदेव उसके है, चमार जाती है, चमड़े का व्यापार करते है,
- 33:14युवतियां बनाती है और लोग तान मैंने मारते है।
- 33:33यह घूँघट उतर गया, इसने शर्मू हया सब त्याग दिया।
- 33:42जैसे ही आप वातावरण बाहरी वातावरण से अपने रोण कूपों को संपर्क में
- 33:49आ जाने दोगे। उतना ही आप ज्यादा कम हो जाओगे।
- 33:55सीधी सी परिभाषा रस रूप में आप समझ रहे हो इसलिए शरीर को ढक कर
- 34:02रखना चाहिए। और यही इस्लाम ने सखाया था, यही
- 34:12सनातन ने सखाया था। लेकिन हमने आध्यात्मिक
- 34:24साइंटिफिकनेस खोदी। साइंस बचाली साइंस।
- 34:31बस सुन्दर लोगों किसी तरह दिखावा और दिखावे से हीन हो जाना अपने आप
- 34:47को छुपाना पर्दे में रखना। इसलिए संत एक कुटिया के भीतर
- 34:56अकेला बैठ जाता है। तंद्राउन में वह ज्यादा संसार के
- 35:01संपर्क में नहीं आता। संसार के संपर्क में अगर आओगे तुम
- 35:15तो तुम्हारे रोम को संसार के प्रति।
- 35:19लासानी तरंगों के प्रति घुल जाएंगे और काम बासना हमारे शरीर
- 35:26का रोम रोम यह भी श्वास लेता है श्वास छोड़ता है एक प्रकार से
- 35:31खुला हुआ श्वास यंत्र है शब्द। यही से रस रसता है अगर वह आनंदित
- 35:58करता है। बहुत से लोगों के प्रश्न इस तरह
- 36:03के आए हैं। अब मैं लक्षण समझाता हूँ आपको।
- 36:08अभी मैंने विज्ञान बताया, लक्षण समझा देते हैं, ये पूछ रहे हैं
- 36:19फिर क्या करना चाहिए? इसरो को इसरो को बाल बांध कर रखने
- 36:23चाहिए। सिख लड़कियां आज भी बालों को बांध
- 36:30कर जुड़ा करती हैं। हमारे पंजाब में यहाँ देखो ऊंचे
- 36:35ऊंचे जुड़ा है, चाहे पता हो, कीमिया का या न पता हो लेकिन एक
- 36:44प्रतीक बचा तो रह गया। न आपको उसका फल पता हो न पता हो।
- 36:50जहर पीने से मर जाता है। अमृत पीने से जी जाता है आपको ये
- 36:55पता हो या न पता हो लेकिन अमृत तो आपने पे लिया ना?
- 37:00अमृत तो अपना काम करेगा ना आपको पता हो ना पता हो ये जुड़ा क्यों
- 37:07बांधा जाता है? ये गोत क्यों की जाती है?
- 37:10क्यों गांठ बांध की जाती है? चोटी में यह कोई ज्यादा महत्त्व
- 37:14नहीं रखता। यह तो एक एक्सप्लनेशन है, लेकिन
- 37:21मर्म क्या है? रहस्य क्या है?
- 37:23सीक्रेट क्या है? सीक्रेट ये है कि इसको बांध लो।
- 37:28बस अगर इतना भी बच जाये इस लिए ऋषियों ने प्रतीकात्मक चिन्ह बचाए
- 37:35रखे। इनका अर्थ न भिजानोगे तो कोई बात
- 37:43नहीं। इसका फल तो तुम्हें मिल ही
- 37:45जायेगा। हमारे पंजाब में आज भी सिख
- 37:52बच्चियां जुड़ा बांधती है सिख छोटे बच्चे सिखों के लड़के जुड़ा
- 37:58बांधते हैं, जो बड़े बुजुर्ग है वो पगड़ी बांधते हैं, देख लो।
- 38:09वो पगड़ी भी एक इन्सुलेटर है। वह ऊपर की रेंज को को भ्रम भ्रम
- 38:19में जाने नहीं देते और भ्रम से आते ही वो आसानी रंग या डेल्टा भी
- 38:25उसको बाहर बिखरने नहीं देते। इसलिए हर पंजाबी के सिर के ऊपर
- 38:32आपको कोई कपड़ा मिलेगा। राजस्थानी के सिर पर भी आपको
- 38:38पगड़ी मिलेंगे या कोई गमछा मिलेगा?
- 38:44यह परंपरा थी सिर्फ सिंबल बचे ही रह गए।
- 38:47इतना ही काफी और तुम सिंबल को ही बचाए रखो, इतना काफी इसके अर्थ
- 38:54समझना ज़रूरी नहीं है। जैसे हम बस इतना ही जानते हैं।
- 38:59बटन को ऑन कर दो, पंखा चल जायेगा हम इतना जानते हैं।
- 39:07कि बटन को ऑफ कर दो बलबूज जाएगा, एसी बंद हो जाएगा इतना ही काफी
- 39:14है, क्या घटता है क्यों बंद होता है?
- 39:22क्यों शुरू होता है? इसे क्यों हेक्टेयर चालू होता है?
- 39:26क्यों पंखा चालू होता है, यह रहस्य जानने की आवश्यकता इतनी
- 39:30नहीं है। प्रोसेसिंग जानने की आवश्यकता
- 39:35नहीं है सिर्फ आपको। सिम्बोलिक प्रतीक बचे रहे हैं।
- 39:49बालों को बांध कर रखो अगर बाल समय असमय चले गए हैं बहुत से वक्त का
- 39:56तगजा बाल गिरने शुरू हो जाते हैं, खास तौर से पुरुषों के।
- 40:03स्त्रियों के बाल सफेद हो जाते हैं, गिरते नहीं हैं, आम जूस कम
- 40:06हो जाते हैं, लेकिन इन बालों को गांठ देकर यहाँ पर सुहागन या
- 40:18विधवा या कुंवारी। वगैरह का कोई मतलब नहीं है।
- 40:23ये एक साइंटिफिक हो गई है। अध्यात्म बात सब ऐसा होगा, कोई
- 40:30बात नहीं, छोटी को बात तुम विवाहित हो, तुम कवारे हो।
- 40:41लेकिन छोटी बात ये बहुत महत्वपूर्ण है।
- 40:44सिर का सारा एरिया बहुत महत्वपूर्ण है।
- 40:48इसलिए हमारे सन्तों ने जिक्र किया तो सिर का किया जय तो।
- 40:56प्रेम मिलन के चा। जेतों प्रेम मिलन की चा शीश
- 41:14तलीधर। घर मेरे आ शीश तलीधर घर मेरे आ जय
- 41:33तुम फेम मिलन की चा। सी शतली धरकर भर जाऊं, उसने क्यों
- 41:42नहीं कहा के हाथों को काट लो, बांहों को काट लो, पैरों को काट
- 41:47लो, कहा नहीं, सिर का ही महत्त्व है क्योंकि वह ड्राइवर सर में
- 41:54बैठे हैं। सारा कुछ सिर में है, अहंकार
- 42:03तुम्हारा सिर में है शीश को बस एक सिंपल था ये।
- 42:23ईगो को काट दो, ईगो को बस में बहुत कर दो तो यह यहाँ से बरसता
- 42:35है रस जब यहाँ से। वास की भूत होकर डेल्टा वेव्स और
- 42:46आसान तरंगे बाहर नहीं जाते तो यह रस जो आप ध्यान में जाते हो, जो
- 42:55आप अपने आप में उतरने की चेष्टा करते हो, प्रक्रियाएं करते हो।
- 43:02उससे जो आनंद मिलता है, वह आपके भीतर उतर जाता है।
- 43:08गले में इसलिए खेचरी मुद्रा लगाई जाती थी क्योंकि जीवा का अग्रभाग
- 43:17सबसे ज्यादा। रिसेप्टर होता है स्वाद के लिए,
- 43:22इसलिए हम जब चखते हैं तो जीवा के आगे भाग में लगाते हैं।
- 43:31वह बता देता है कि स्वाद का है। सबसे ज्यादा सेंसिटिव है ये जीवा
- 43:38का अगला पोषण यह नुकीला पोषण। तो खेचरी मुद्रा को।
- 43:49इसको उलटा कर हम बिलकुल जो काम होता है, काम वहाँ पर लगा देते
- 43:56हैं, वहाँ तक आता है और बरसता है और गले में उतर जाता है।
- 44:01अगर तुम नभिक केचरी मुद्रा लगाओगे।
- 44:04बहुत से लोग तो वैसे ही खेचरी मुद्रा लगाए रहते हैं।
- 44:07अभी अमृत बरसना शुरू नहीं हुआ। यह पागलपन है, सर्कस है, सर्कस
- 44:14है, यह बंदरों जैसी सर्कस है, इमिटेशन है यह वृत की शिष्ठ है,
- 44:25अमृत तो अभी उत्तरा नहीं। तुमने खिचड़ी मुद्रा लगा ली जीवा
- 44:30के अगर भाग को तुमने कहाँ तक पहुंचा दिया?
- 44:33कोई फायदा नहीं। फायदा तब होगा जब तुमने देखा जब।
- 44:46हार्ट के दौरे में जीवा के नीचे गोली रखनी होती है क्योंकि यहाँ
- 44:50का पोर्शन सबसे ज्यादा अब्सोर्ब करता है, जल्दी अब्सोर्ब करता है,
- 44:55कार्बेट जैसी चीज़ जीवा के पास रखी जाती नीचे वहाँ सबसे ज्यादा
- 45:01अब्सोर्ब में पावर है, सीधी खून में मिल जाएगा।
- 45:09अगर आप पेट के जरिये उसको ले के जाओगे तो बहुत सी प्रोसेसेस में
- 45:14मेटाबोलिज्म वगेरह होगा। अब्सॉर्पशन वगेरह होगा फिर जाके
- 45:19खून में मिलेंगे बहुत देर बाद लेकिन यहाँ से स्थिति में जाके।
- 45:28वैज्ञानिक कारणों से समझा रहा हूँ।
- 45:29ध्यान से समझा जो ज्यादा गहरे नहीं जा पाए उनके लिए छोटे
- 45:42बच्चियों के लिए। छोटे बच्चों के लिए किशोरावस्था
- 45:48में अपने बालों को गूंथकर रखो, चोटी करो किशोरावस्था में बालों
- 46:00को कटाओ मत अगर कटाओ तो चोटी इस ढंग से रखो कि वहाँ गांठ बन जाए।
- 46:06सहरसरा के पास यहाँ यहाँ यहाँ चोटी ब्राह्मणों को देखना, अब
- 46:12शंकरा एचारों की चोटी देख रहा हूँ सर्च मारो चैट जीपी टी पे कि चोटी
- 46:22का स्थान बताओ वह बता देगा। मैंने बहुत बार कहा है अगर आपको
- 46:32कोई शिक्षक ना मिले तो मोबाइल आजकल सब का है चैट जीपी टी पे
- 46:39ग्रॉक पे जमनायी पे। सर्च करो, इसको वह आपको स्थान बता
- 46:47देगा। यह स्थान है उस स्थान के बालों को
- 46:51मत कटाव। तुम किसी भी जाति को फर्क नहीं
- 46:55पड़ता। रस कैसे नहीं चाहिए?
- 47:00वह क्षुद्र, वह वैश्य, वह ब्राह्मण, वह क्षत्रिय?
- 47:04इससे कोई फरक नहीं पड़ता। इंसान तो है ना तो बालों को मत
- 47:11कटाओ। कम से कम इस स्थान में ये बागड़ी
- 47:17तुम्हें रोके हैं। ये मूर्ख शंकराचार्य तुम्हें रोके
- 47:24हैं। ये मूर्ख सना ये तुमने क्यों
- 47:28चुटिया बांध रही? तुमने कहो तुम कहो इसके पीछे
- 47:31वैज्ञानिक करना हमारे मार्गदर्शक ने हमें बताया है।
- 47:38बंगाल लेना है तो उसके साथ रहो। तुम चोटी को बांधो, थोड़े से बाल
- 47:46को बढ़ा लो और यहाँ पर थोड़े से बाल लंबे रखा लो, ज्यादा लम्बी मत
- 47:50रखो, चोटी को बांध लो, बिल्कुल सिरे पे बांध लो।
- 47:55इससे भरपूर फायदा मिलेगा आपको डेल्टा रेंज का।
- 47:59और आसानी तरंगों को न वो बाहर जाएंगे न वो बिखरेंगे, न बाहर से
- 48:06कोई लासानी तरंगे आपके भीतर प्रवेश कर सकेंगे।
- 48:12किसी भी धर्म, जाति, सम्प्रदाय का सवाल नहीं है यह।
- 48:18मानव मात्र होना चाहिए। मानव मात्र की संग रचना ऐसी है
- 48:25चोटी के पास बाल बड़े रखो थोड़े से बाकी अपने हिसाब से फैशन के
- 48:30हिसाब से कटवा लो कोई बात नहीं मुंडवा लो तो कोई बात नहीं लेकिन
- 48:35यहाँ पर चोटी लंबी रखो। और गांठ बांध लो, किसी को पता भी
- 48:41नहीं चलेगा बल्कि ये रवाज चल पड़ेगा से ही पूछो तुम यह रवाज चल
- 48:47पड़ेगा। आपके चेहरे पर लाभान्य बरसना शुरू
- 48:51हो जाएगा। इतनी सी बात से आपका चेहरा आकर्षक
- 48:55हो जाएगा। छोटी को कोई भी स्त्री पुरुष
- 49:16कितनी भी उम्र का ले जाए, बालों को ब्रम्हरन्द्र की जगह पर बड़ा
- 49:23करो थोड़ा सा और उसको चोटी को गाठ मार दो।
- 49:27फिर आप बाकी के सारे सिर के बाल अपने ढंग से कटवा सकते हो।
- 49:32फैशन दिखाना है तो वहाँ पर दिखा दो, दिखाना ही है तो तो यह रस
- 49:42बरसता है इस स्थान से। यह आता है आपके मुख में जो काम
- 49:50होता है जब आप मुख खोल देना डॉक्टर कहेगा मुख खोल के दिखाओ।
- 49:54आप कहोगे आ तो वो कहाँ दिखेगा साहब दिखेगा वहाँ पर जो एक तीखी
- 50:01सी चोंच होती है वहाँ तक आता है रस।
- 50:06और वहाँ से नीचे टपकता है बस खेचरी मुद्रा में अपनी जीवपा को
- 50:13उड़टकर यह सेन्सिटिव पोरशन सुपर सेन्सिटिव पोरशन उस का के साथ
- 50:18ललका देना होता है ताकि सीधा खून में मिल जाए आनंद की धार।
- 50:24यह था पर्पस वैज्ञानिक। आज तुम कुछ भी समझ लो आज के तो
- 50:30ऐसा ही है। कंपनी तो ये क्या है?
- 50:36अगर तो सैलाइवा है एसिडिटी है आपके पेट में तो आपको आनंद नहीं
- 50:43देगा ये। अगर यह अमृत है ऊपर से आया हुआ
- 50:49सज्जखंड से बरसता हुआ तो फिर आप इसको पी लेना इसकी एक बूंद भी
- 50:58उगवाना नहीं है आप? एक जगह लिखा था डू नॉट स्पिट।
- 51:08मैंने कहा ये अध्यात्मिक भी है और संसार की भी है क्योंकि थूकने में
- 51:14कुछ बैक्टीरिया होते हैं। वो फैल जाते हैं।
- 51:16वो बिमारी हो। और थूकने में ऐसा भी हो सकता है
- 51:21कि कोई संतत्व तक पहुँच जाए और ऊपर से अमृत बरसे और वह थूक दे,
- 51:29वह तो बहुत कीमती है, वह तो अमूल्य है।
- 51:32उसकी तो कोई कीमत ही नहीं है। हमारे संतों ने बहुत से पॉइंट्स
- 51:37खोजे थे। कपड़े सेंसेटिव हैं उनमें से एक
- 51:43यह ब्राह्म लगाता हूँ। एक तीसरी आंख का यहाँ पर हम टीका
- 51:49लगाते हैं टीके का सिंधु? बाहर की लासानी तरंगों को भीतर
- 51:58नहीं प्रवेश करने देता और भीतर की आसानी तरंगों को डेल्टा वेव्स को
- 52:03बाहर नहीं निकलने देता टीका लगाने का या बिंदिया लगाने का?
- 52:09यही कारण था विधवा होने पर। स्त्रियां बिनती नहीं लगातीं।
- 52:18यह सिर्फ एक आध्यात्मिक प्रोसेसर को रोकने का कारण था, लेकिन ये
- 52:28गलत है। अगर स्त्री शादी ना करे अगर
- 52:36स्त्री विधवा हो जाए तो उसमें उसका क्या कसूर है?
- 52:41कोई कसूर नहीं तो उसको बिलकुल भी लगानी चाहिए क्योंकि यह।
- 52:53बिंदी का लगाना आध्यात्मिक व्यवस्था है।
- 52:58बिलकुल बिंदी लगाओ सिंदूर थोड़ा सा हम इसके ऊपर बात करना।
- 53:10सिंदूर के भीतर पारा होता है। और 12 एक ऐसा तत्व है जो कि आपकी
- 53:20डेल्टा रेंज को बाहर नहीं जाने देता।
- 53:28सिर के बीचों बीच आजकल तो फैशन के हिसाब से लगाते हैं।
- 53:35लेकिन पुरातन स्त्रियां इसको सिर के बीचों पे देखोगे तो यह भ्रम
- 53:41भ्रम पर जाकर रोकेगा। यह सिर के बीचों बीच अगर आप खीर
- 53:49लगाओगे तो यह भ्रम भ्रम तक जाकर रुकेगा।
- 53:55तो वहाँ तक सिंदूर लगाती थी और जैसे जैसे विज्ञान हो गया, वैसे
- 54:06वैसे बस एक थोड़ा सा दिखाने के लिए भेंडी निकाली या यहाँ पे
- 54:10सिंदूर भर लिया बस। लेकिन यहाँ तक नहीं ले के गए असल
- 54:19मकसद था हमारा तीसरे नेत्र से शुरू करके और ब्रह्मरंद्र के उस
- 54:27केंद्र तक ले जाना। सिंदूर को आज तो सिंदूर भी नकली
- 54:33आता है, ऐसे नहीं आता। आर्टिफिशियल है, केमिकल से बना है
- 54:37हल्दी, कुमकुम और लाक सक्सेसर इनके संयोग से सिंदूर बनता था
- 54:50पराथन जमाने में। हमारी जड़ी को ऋषि मणि बनाते थे।
- 54:56पारा जहरीला होता है। पारे को बिना शोधन के नहीं लगाना
- 55:01चाहिए। यह जहरीला होता है।
- 55:06ये चार चीजें हैं। केसर में सुगंध होती है हल्दी लाख
- 55:14और को ये चारों चीजों को मिलाकर थोड़ा सा हल्दी को अगर आप ज्यादा
- 55:25पिसोगे तो वह लाल रंग की हो जाएगी।
- 55:29वह लाली में हो जाता था। उससे सिंदूर बनता था।
- 55:33यह प्राकृतिक सिंदूर है। यह था रेंज को बाहर न निकल देने
- 55:38का उपाय। बस इसका यही मतलब था जब कोई पुरुष
- 55:46स्त्री के मांग में। भरंबरंतर तक सिंदूर भरते उसका
- 55:53मतलब मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा। प्राचीन व्यवस्था में यह एक
- 56:00सिम्बल था। यह बिंदिया से लेके तीसरे नेत्र
- 56:07से लेके। सिंदूर की एक सीधी लाइन
- 56:17भ्रमभरांतर तक जाती थी। इसका मतलब था कि मैं तुम्हारी
- 56:24रक्षा करूँ। ये सारे द्रव्य जो मैंने आपको चार
- 56:31बताए हैं, यह उसमें प्रयोग किए जाते थे।
- 56:35आज तो केमिकल से आज तो नुकसान करते हैं और अगर आप इसमें पारा का
- 56:44इस्तेमाल करोगे। तो पारा भी शरीर के लिए केमिकल
- 56:48नुकसानदायक है। अगर आप उसको शोधन न करो तो तो ये
- 56:57जो लहर गिरती है यह इस स्थान से टपकती है।
- 57:04यह एक जैसे समझलों के आनंद की फैक्टरी है।
- 57:10आनंद की फैक्टरी उत्पादन होता है। इसमें सारा भ्रम भ्रम से लेके सह
- 57:20श्रात तक यह सारा क्षेत्र एक मैन्युफैक्चरिंग हब है।
- 57:30आनंद की करिये शंका इसलिए जब पुराने व्यक्ति के हम पांव छूते
- 57:37थे, गुरु के या बड़े बुजुर्गों के वो हमारे सिर पर जाहूत रखता था।
- 57:46अंगूठियों से यहाँ टेस्ट करता था सर को यहाँ पे रखता था हाथ को यह
- 57:53सारी रेंज उसके पूरे शरीर में समा जाती थी।
- 58:00यह आशीर्वाद देने का एक ढंग था। आजकल तो कोई लफाजी रह गई है।
- 58:09अध्यात्म में भी अब राजनीति में तो सदा से ही लफाजी रह गए तो ऐसे
- 58:20इसका प्रयोग करो। ये जो लार टपकती है यह अमृत है
- 58:29अगर आपको आनंद देती है तो फिर आप इसको खेचड़ी मुद्रा लगा के भी
- 58:35सीधा भी पी सकते हो। बस उसमें फर्क भी नहीं पड़ेगा।
- 58:40पेट में चली जाएगी तो भी खून में मिल जाए।
- 58:44अगर सीधा खिचड़ी मुद्रा लगा लो तो सीधा जीवा के अग्रवाल से लेकर
- 58:49सीधी खून में मिल जाएगी। यह त्वरित खून में मिलाने का
- 58:54संसाधन साधन है और कुछ भी नहीं है।
- 58:59जी है रेह से इसका। थोड़ा प्रवचन हम प्रसन्न के थे।
- 59:07सत्य और सत्य सत्य बोला जाता है, सत्य हुआ जाता है।
- 59:12सत्य वह बिंदु है जहाँ पर पहुँचकर हम आनंदित हो जाते हैं और सत्य वो
- 59:18शब्द है जो सत्य क्या है? यह बोला जाता है सत्य बोलने की
- 59:30भाषा में एक सत्य होने की भाषा में एक तो आज बहुत से प्रश्न हमने
- 59:38कवर किए बहुत से रह गए अगले प्रदर्शन में।
- 59:44इनके प्रश्नों को उठाऊंगा। दर्शन दो घनशाम।
- 1:00:01नाथ मोई अखिया प्यार श्रीरे मन मंदिर मन मंदिर में।
- 1:00:21यो तुझे जला दे खट खट वा सी रे दर्शन दो।
- 1:00:38घनश्याम नाथू मोरी अँखियाँ प्यार से रे।
- 1:00:52मन्दर मन्दर मूरत तोरी मन्दर मूरत तोरी फिर भी न दें।
- 1:01:12खिसूरत तोर मन्दर मन्दर मूरत तोर फिर भी न देखी।
- 1:01:31सूरत तोर युग बीते युग बीते कब आए मिलन की?
- 1:01:49युग बीते कब आए मिलन की पुराणमा से रे दर्शन दो।
- 1:02:08घनश्याम ना तू मौरी अँखियाँ प्यासी रे मन मंदिर में ज्योत जला
- 1:02:25दे। घट घट वा सी हीरे घनश्याम।
- 1:02:48धन्यवाद।