Latest / Baba ji Vijay Vats / 24 Jun 25 - जड़ और चेतन में क्या फर्क है? सत्त्व, रजस, तमस –त्रिगुणों का रहस्य! माथे पर 3 लकीरों का राज!
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- 0:01भीमसेन, इंदौरा बाबा, जड़ और चेतन के व्याख्या कीजिए और सुंदर
- 0:18प्रश्न। बिलकुल वक्त पे तुमने सही प्रश्न
- 0:26किया है जड़ और चेतन की परिभाषाओं की जीत।
- 0:41ये भीमसेन इंदौर वे बचपन के प्राण मित्र भी हैं और मेरे शिष्य भी
- 0:56कॉलेज के वक्त मेरे साथ पढ़ते थे। बड़ा गजब का प्रश्न किया था जो
- 1:05तुम्हें कभी तुम्हारे दिमाग में भी नहीं आता, तुम बारेखली को भूल
- 1:14जाते हो को हो जाते हो, तुम बड़ी बड़ी रचनाएं पढ़ने में विश्वास
- 1:19करते हो? अरे, मूलभूत प्रश्नों को तुम भूल
- 1:25जाते हो, छूट जाती हो पीछे, जड़ और चेतन की बात तो तुम करते हो जो
- 1:32मृत का प्राय है वो जड़ और जो जीवंत वह चेतन।
- 1:42सीधी सी व्याख्या हुई है। सब जगह की हुई है, लेकिन जैसे हम
- 1:49जानते ही हैं इसका अर्थ अगर किसी रिश्ते ने कहा कि तो वह चूक गया।
- 2:01वहाँ से थोड़ा सा और लकीर खींच लेता तो सारे गुंडे ही हल हो
- 2:05जाते। जड़ और खेती की व्याख्या जड़ वह
- 2:20जो प्रकृति का हिस्सा है। और चेतन वह है जो प्रकृति से पार
- 2:28है। जड़ त्रि गुणों से इफेक्टेड होता
- 2:37है। यहाँ समझ लेना पात्र अब शक अभी तक
- 2:42पेड़ था। अब शाशन शुरू होगी।
- 2:51जड़ त्रिघणात्मक वृत्तियों से प्रभावित होता है और चेतन वह दो
- 2:57त्रिगुणात्मक वृत्तियों से ही क्या नहीं से भी प्रभावित ना होता
- 3:02हो? अगर ठीक से बोलूं तो जो प्रभावित
- 3:06न होता हो वह चेतन जो अकंप जो नैरलेप जो अखंड असीम वह चेतन जो
- 3:20छाया हुआ है। जरे जरे में छाया हुआ है।
- 3:27जरे जरे में जड़ भी छाया हुआ है। भूल मत जाना ये दोनों की कॉमन
- 3:33परभाषा है। लेकिन जड़ और क्षेत्र में अगर सही
- 3:38फर्क करना हो तो फर्क ये है। जड़ त्रिगनात्मक प्रकृति के
- 3:44द्वारा संचालित है और चेतन त्रिगुणात्मक गुणों के प्रकृति से
- 3:54चलाईवान नहीं होता गुस्सा आता है। काम आता है, लौह आता है, मोह आता
- 4:08है, अंकार आता है, सारे विकार आते हैं, सारे विचार आते हैं, सारे
- 4:18विषय आते हैं। सब याद किया हुआ आता है तुम्हारी
- 4:22स्मृति में क्या क्या भरा वो सब याद आते है चेतन वह जिसमें कोई
- 4:37स्मृति हो चेतन वह जो शुद्ध आनंद का पुंज है।
- 4:47और जड़ वह जो तीन गुणों की प्रकृति से चलाइमन और तीनों गुण
- 4:55जड़ता में आते है और सतभो रजहो पोथम।
- 5:02जड़ अपने आप में जड़ है, लेकिन चेतन की छूट से चेतन छू लेता है
- 5:16जड़ को तो वह जाग जाता है। चेतन कार्यशील हो जाता है।
- 5:27जड़ता के साथ जब तक चेतन जड़ता के साथ नहीं मिला, वह स्टेबल होता
- 5:37है, निर्लिप्त होता है। अकंप होता है।
- 5:42जैसे ही चेतन जड़ से मिला, उसकी अकंपता खो गई।
- 5:48वह कंपनी में आ गया। वह कंपनी लगा उसकी लो डगमगाने
- 5:55लगी। शुद्ध स्वरूप में चेतन कथन शुद्ध
- 6:05स्वरूप में चेतन लिप्त ने, लेकिन जैसे ही चेतन जड़ के साथ मिल जाता
- 6:15है। कम्पन आ जाता है, खंडित हो जाता
- 6:23है, वह अखंड नहीं रहता, वह अकंपन ही रहता है।
- 6:32हमारे वित्त विकार आने का यही कारण है।
- 6:38विचारों के वक्त विचारों के वक्त विषयों के वक्त अब ध्यान से समझना
- 6:48इस बात को चीतना जड़ता के साथ। संबंध बनाती है तो विकार आता।
- 7:03अगर चेतना जड़ता के साथ संबंध न बनाए तो विकार नहीं चेतना जड़ता
- 7:12के साथ संबंध न बनाए। तो विचार भी नहीं आया और चेतना
- 7:17जड़ता के साथ संबंध न बनाई तो कोई विषय भी नहीं आएगा।
- 7:23फिर नहीं उलझोगे तुम शास्त्रों में फिर कैसे शास्त्र में क्या
- 7:28लिखा तुम नहीं उलझोगे? अभी तो तुम शास्त्रार्थ करने की
- 7:35फिराक में हो, तुम्हारे बड़े पड़े शंकर बगल में पोती दबाए हाथ में
- 7:42झंडा उठाए शास्त्रार्थ करने को उदित हैं, किस बात की निशानी है?
- 7:51स्वयं की अखंड धारा को उन्होंने देखा नहीं।
- 7:55चखानी बिलकुल स्पष्ट करू। तुम्हारी भ्रांतियां टूटती हैं तो
- 8:02बिलकुल टूट नहीं चाहिए। मैं चाहता भी है जीस शंकर के नाम
- 8:08पर। हिंदुस्तान फखर करता है।
- 8:14ओह फखर की बात नहीं है, वो अफसोस की बात है जो शास्त्रार्थ करता
- 8:26है। अभी भी जानने के बाद भी कि उसका
- 8:29शास्त्रार्थ किया नहीं जा सकता। अभी भी शब्दों में बांधने की
- 8:34चिष्ठा करता है। अभी भी शब्दों में सत्य का आदान
- 8:44प्रदान करना चाहता है। उसे तुम अनुभवी कहोगे कलाकार।
- 8:52मात्र एक दो क्लाइन सीखनी है। शरीर से बाहर जाना वगैरह।
- 8:55फकर यह क्लाइन मेरे पास यहाँ व्यक्ति आते है, बाबा शास्त्रार्थ
- 9:10करदी तुम इतना जानते हो, गागर में सागर है।
- 9:17तो आओ शास्त्र हस्त करें, मैंने कहा नहीं भाई चरण के हाथ लगा देते
- 9:22एक बार एक चुटिया घारी भ्रम ज्यादा करके बैठ गया, मैं तो आपसे
- 9:26शास्त्र हस्त करूँ, मैं तो नहीं जाऊंगा, मैंने कहा, भाई।
- 9:35मुझे मधुर रस पीने दो, तुम क्यों अड़चन डाल रहे हो?
- 9:41गलती से कहीं आ गया होगा। वैसे घर वाले घुसने नहीं देते
- 9:45कुत्तों को और शास्त्रज्ञों को घर में नहीं घुसने देते।
- 9:53सुरों वगैरह की बात ही छोड़ दो, उनको तो परफॉमेन्ट्री ही बैन होता
- 9:59है तो कैसे घुस आया पता नहीं कहता, मैं तो साथ साथ कर लूँगा और
- 10:09मज़े की बात देखो भाई जब मैं साथ साथ करना नहीं चाहता।
- 10:13जल पान करो, भूखे हो, खाना खाओ, कुछ दुख है, पांव दबा देता हूँ,
- 10:23तुम्हारे चरण छू लेता हूँ तुम जीत गए।
- 10:28इसकी उदघोषणा कर देता हूँ, लोगों में कह देता हूँ तुम जीत गए और
- 10:33बताओ क्या चाहिए नहीं बाबा मैं शास्त्र अर्थ करना चाहता हूँ नहीं
- 10:43चलो फिर करो शास्त्र अर्थ क्या करोगे उसके बारे में क्या शास्त्र
- 10:47अर्थ करना है तुम्हे? वहीं घसी पोटी हुई तुम्हारी
- 10:52किताबें बगल में दवाई देखा तो भागवत भ्रमण तुम मैंने कहा अच्छा
- 11:02शास्त्र तो तुम ही करो नहीं, मैं तो आपके पास आया हूँ, शुरुआत
- 11:07तुमको। अच्छा यानी पहला तीर मैं चलूँगा
- 11:15कोई विद्वान धनुर्धर ही लगते हो, मुझे तो।
- 11:25तुमने सब शास्त्र पढ़ लिया, ये भागवत पढ़ लिया?
- 11:28हाँ पढ़ लिया तो ये बताओ कि कंस की माता का नाम क्या तुम भी बता
- 11:40दो अगर कोई जानता हो कमेंट बॉक्स में बता।
- 11:44या इसे पूछ के बता दे, लेकिन मुझे नाम चाहिए से ही देवकी की माता का
- 11:55नाम क्या था? देवकी की माता का नाम बताता हूँ
- 12:03कंस के की माता का नाम। एआई से पूछ लो तुम्हारे सारे
- 12:10शास्त्र कंगोल मैं तो बगले में झांकने लगा हूँ ना तो देवकी की
- 12:21माता का पता कहते ये तो भाई थे। भाई बहन का रिश्ता था देवकी और कश
- 12:29में मैंने कहा फिर पिता दो के हैं कंस कपिता उक्रोश और देवकी कविता
- 12:39देववाकर पिता दो के। क्या एक ही माता की सुनता हूँ
- 12:51अच्छा तुम बताओ ना शिट्टी पिट्टी गुम हो गए।
- 13:01मैंने कहा देखो तुम्हारे लिए ये रियायत है, तुम अपनी भागवत हो।
- 13:06पुराण को खोल लो और सारे प्राणों को खोल लो, लेकिन मुझे सत्य में
- 13:11पता होना चाहिए कि देवकी की माता का नाम क्या था और कंस की माता का
- 13:19नाम क्या था? तुम इन्हें भाई बहन कहते हो चलो
- 13:22ये तो मैं खुद बताती हूँ भाई बहन सगे तो नहीं थे।
- 13:29देवकी के पिता का नाम देवक था तो माता का नाम क्या था?
- 13:35कंस के पिता का नाम उग्र जैन था तो माता का नाम क्या था यह बताता
- 13:40हूँ सही सही जवाब चाहिए। हरिवंश पुराण फलाना पुराण दिखाना
- 13:50पुराण इनमें से जवाब नहीं चाहिए मुझे और चलो इनसे ही बता दो बता
- 13:56दो तो। लेकिन नहीं, तुम्हें पता नहीं
- 14:08तुम्हारे शास्त्र बाहर जाते हैं। अगर किसी को पता हो तो मुझे बताती
- 14:14पता होना चाहिए ये मत कहना इस पुराण में लिखा है खोज लो हरबंश,
- 14:20प्राण खोज लो, महाभारत खोज लो। भागवत खोज लो इन तीनों चीजों में
- 14:25ही आता है पेपरण इसको मैंने कहा तुम अपने शास्त्रों को खंगालो
- 14:41भागवत को खंगालो। र्वंश पुराण लेओ महाभारत को खँभा
- 14:47लें तुम्हें वक्त दिया अगर तुम नाम बता दो तुम जीत गए ऐसे ही
- 15:01तुम्हारे शंकर। जीतना चाहते हैं।
- 15:07क्या ये जीत भी गौर से सुनना समझेंगे?
- 15:13शब्दों से जीतने वाली जीत कभी जीत होती है।
- 15:18क्या शब्दों से उसका पैमाना तय किया जा सकता है?
- 15:23शब्दों से उसका विस्तार जो अखंड है, जो असीम है वो तय किया जा
- 15:29सकता है। जिसकी ओर से और कोई नहीं है।
- 15:34क्या शब्दों से उसे बांध सकूँ? फिर शब्दों में उसे बांधना क्यों
- 15:40चाहते हैं? ये तुम्हारे शास्त्र के शब्दों के
- 15:44सिवा शब्दों की लड़ाईयों के सिवा और क्या है भला?
- 15:54और वह व्यक्ति दूसरे दिन मेरे पास है कथक क्षमा करो, आप ठीक है लिखा
- 16:01तो है। लेकिन क्या कहते है, शायद शायद
- 16:17दूसरे दिन मुझे बोला बाबा मृगावती या पद्मावती?
- 16:23मैंने कहा अभी धोखा खा गए अभी भी दो है क्या?
- 16:27दो माएं होती है कुछ मृगुवती या पद्मावती एक बताओ कहता शायद
- 16:38मृगुवती मैंने कहा तुम पहले ही आ गए।
- 16:43और बात कर रहे हो उस सरोत की जो लड़खड़ाता है, तुम क्या झुंझुन न
- 16:55करोगे? शास्त्रार्थ।
- 16:59जाओ इसको चुटिया को और बढ़ा लो और पहले अपने अनुभव में उतरो।
- 17:10देववती या मृगवती या पद्मावती क्या था उसका नाम पता नहीं।
- 17:21बस तुम ऐसे ही जीत जाते हो और ऐसे ही हार जाते हो लेकिन भारतीय बड़ी
- 17:29संघ और शास्त्रों की बातें वो जानती है या उल्लू है?
- 17:38शास्त्र सारे पढ़े हैं इसमें शंकर हैं मैं बात कुछ ऐसी ही पूछूं जो
- 17:47प्रैक्टिकल है थ्रोटिकल तो सारी जानता है सारी इसके भीतर।
- 17:55शब्दावली है सर लोगों की भांति आचार्य लोगों की भांति इनके भीतर
- 18:02सारी सूचनाएं और तुम सूचनाओं को आपस में लड़ा भडा के उसको कहते हो
- 18:10शास्त्र रद्द कर लिया मैंने। मृग वती या पद्म वती?
- 18:17जी मैंने कहा देव की क्या कहता श्रुति कीर्ति या मृग वती?
- 18:24मैंने कहा फरे मृग वती तो दोनों तरफ आ गए, कंस की तरफ भी आ गए और
- 18:29देवकी की तरफ भी आ गए। ये मृगवती दोनों की तरफ आ गई।
- 18:38फिर ये भाई बहन सखे हो गए क्योंकि एक माता से जन्म डिगा और सगे ये
- 18:45थी क्योंकि देवकी देवक से आई। और कं सुग्रहसेन से आया उसकी माता
- 18:55का नाम क्या है? मैं तुम्हें फिर बताऊँगा आज नहीं
- 18:59पता अभी तुम हरवंश उपरान को पढ़ लो।
- 19:04भागवत पुराण को पढ़ लो। महाभारत को खंगाल लो और जितनी
- 19:08तुम्हारे पास है, सबको खंगाल लो, मैंने कहा ये देवकी की माता खत्म
- 19:14मृगवति श्रुतकीर्ति कहाँ से लेके आए?
- 19:19भागवत प्राण से लेके आए नहीं विष्णु प्राण से लेके आए नहीं
- 19:23हरवंश प्राण से लेके आए नहीं। फिर कहाँ से लेके आए, कहता चलती
- 19:28फिरती प्राण अब इनकी चलती फिरती प्राण भी होते हैं और ये आए हैं
- 19:41उस व्यक्ति के पास जो अनुभव किता लड़कियों में उतरा हुआ है।
- 19:49उससे सार्थक करने आए हैं शब्दों का आदान प्रदान मुर्गों की लड़ाई
- 19:58मैंने कहा तुम ही बताओ तुम जीत गए हार के क्या नाम है उसका फिर बता
- 20:06देना मुझे। कहता बाबा आप ही बता दोगे, मैंने
- 20:13कहा मैं तो कंस से पूछ करता हूँ, देवकी से पूछ कर बताऊँगा मुझे तो
- 20:21इन कीचड़खानों कबाड़खानों से कुछ मतलब ही नहीं।
- 20:27लेकिन बता दूंगा तुम्हें, मैं सीधा सीधा उससे पूछुंगा तुम्हारी
- 20:31माँ का नाम बताओ और मैंने अपनी माता से पूछ लिया माँ हमें तेरा
- 20:37नाम तो पता है गंगा देवी लेकिन हमारी नानी का नाम नहीं पता।
- 20:48तो माँ हँसी बेटा तुमने लेना भी क्या?
- 20:52वो शब्द मेरे इतने गहरे उतर गए शब्दों के कोलाहल से तुमने लेना
- 20:57ही क्या है? ये माता का ये शब्द मेरे इतने
- 21:01गहरे उतरे। के शब्द वाकई ही कोलाहल बन गया
- 21:04है। नानी का नाम सिर्फ मैंने फिर ना
- 21:12मामा से पूछा ना किसी से पूछा कि तुम्हारी माता का नाम क्या है और
- 21:20नाना जी खुद भी आते हैं। मैं नहीं पूछता था 102 साल के
- 21:25होके मरे लेकिन अकबर नंबर के झूठे थे।
- 21:40पढ़ना आता था लेकिन जिन्हें सुनाया जाता उर्दू का अखबार आता
- 21:46हूँ, धनी जौहरी की दुकान थी उसके बाद चक्की लगाली आटा की गांव में
- 21:53आके वहाँ पर बैठते सुबह सुबह एक अखबार आता सारे शहर में।
- 21:59गांव में रामामंडी के पास गांव में सुबह सुबह सारा गांव आ जाता
- 22:09है। बाबा बाबा कहते हैं ब्रह्मा आज की
- 22:15ताजा खबर बताओ क्या है, बड़े शोक से सुनते हैं।
- 22:23और फिर नाना को पता है कि ये मूर्ख हैं, पढ़े लिखे तो हैं
- 22:25नहीं, कोई नहीं कहेगा प्रमाण दो मैं पढ़ा लिखा हूँ कोई कहेगा लाओ
- 22:31खबर दो मुझे कहाँ लिखा है ऐसा तो कोई है ही नहीं तो कह देते हेर ने
- 22:37शेर को काट दिया। अब कुछ भी गप बोलते जाओ शास्त्र
- 22:43में क्या है कुछ भी गप बोलते जाओ बात तो अनुभव की है जान कृष्ण
- 22:48कहते लक्षण पहचान में आते हैं भाई शास्त्र क्यों का कोई पहचान ही
- 22:57नहीं है। इनके मुख्य मंडल में तेज होगा।
- 23:00इनकी वाणी में लबड़तेबड़ के आएगा वो रस अमृत का झरेगा सच खंड से
- 23:13लेकिन शास्त्रकों की क्या पहचान है यह तो शास्त्रों में भी नहीं
- 23:16बताई गई। शास्त्रों की पहचान तो कृष्ण ही
- 23:20नहीं बताये शास्त्रज्ञों की पहचान कृष्ण भी चूक गए, लेकिन शास्त्र
- 23:29की पहचान में। जिनके त्रिपुंडा सजा हो ये होता
- 23:42क्यों है पता है मैंने तो ब्राह्मण से पूछ लिया, मैंने कहा
- 23:47अभी ये तुम तीन लकीरें क्यों लगाते हो?
- 23:51मेरे आगे झूठ तो बोलते नहीं, कुछ यहाँ आके झूठ बोल ही नहीं सकता।
- 23:59तुम मैं उस्तल की बात कर रहा हूँ सत्य से शुरू करो और वहाँ तक
- 24:04पहुँच जाओ जहाँ झूठ बोला ही नहीं जा सकता, लेकिन शुरू करो चेष्ठा
- 24:13से। चेष्ठा पूर्वक असत्य बोलो यही
- 24:16पतंजलि कहते महावीर कहते प्रभुत कहते और फिर धीरे धीरे पहुंचते
- 24:23पहुंचते खिसकते खिसकते वहाँ पहुँच जाओगे जहाँ झूठ बोला ही नहीं जा
- 24:28सकता। तो मेरे आगे झूठ तो बोल नहीं
- 24:34सकते। बाबा देखो झूठ नहीं बोल सकते।
- 24:39बात ये है कि हमारे माथे पे सिलबटे ही है।
- 24:42जहाँ सिलबटे होती हैं वहाँ हम चंदन या पीला या सफेद या लाल लगा
- 24:48लेते हैं, ये सिलबटे न पता लगे। क्योंकि सिल्वटे भरीन तो देखने
- 24:54वाला कहेगा तुम तो चिंतित मालूम पड़ते होगे सिल्वटे चिंता का
- 24:59परिणाम इसलिए तुम बुद्धा पुरुषों का माथा बिलकुल स्पॉट, अब तो मेरी
- 25:08तरफ क्या देखते हो, देख लो। कोई दिखती है 7080 के धाके के बीच
- 25:17में चढ़ा सिलवटनी होगी का वो चिंता नहीं करते, वो जानते हैं
- 25:25चिंता चिता देवर मधे चिंता है। बबई 80।
- 25:30चिता देहती निर्जीव हाँ चिंता देहती जीवत और वहाँ पहुँच गए जहाँ
- 25:36चिंता उन्हें जलाते हैं ना चिता उन्हें जलाती है, ना चिंता उन्हें
- 25:42जलाती है कृष्ण चिता की तो बात करेगा।
- 25:53नैनम चेतन तो शस्त्र श्रावणी नदाह थी पाबकश लेकिन चिंता की बात नहीं
- 26:00की एक शब्द और चूड़ता भी नहीं जायलाती और चिंता भी नहीं जलाती,
- 26:08जैसे कृष्ण को चिंता नहीं जलाती। वह मात्र चिंतन करते हैं, चिंता
- 26:15नहीं करते हैं। चिंता और चिंतन में बड़ा गहरा
- 26:19फर्क है। चिंता चिंत देव मध्य चिंता एवगरी
- 26:26चिता देहती निरजी वह चिंता देहती जीव।
- 26:33चिंता जीत जी चला देती है ये त्रिपुंड का ये होता है ये जो
- 26:39सिलबटें पड़ी हैं चिंताओं के कारण इनको डाकले क्योंकि यह एक प्रमाण
- 26:45है। और सपोर्ट को देखो के चिंताए नजर
- 26:51आएंगी। लकीरें नजर आएंगी, लेकिन बौद्ध
- 26:57पुरुष को भी चिंता करते हैं। चिंता क्या है?
- 27:03चिंता बाकी के लिए जो अनहोनी होय। बाकी चिंता क्यों करें?
- 27:11जो हो नहीं सो होए वो जान लेता है, इस बात को मानता नहीं है, जान
- 27:17के मानता है क्यों करो चिंता जब वही होता है जो मंजूरे।
- 27:34तुम्हारे शास्त्रार्थ करने वाले लोग ऐसे हैं ऐसे ही शुरू कर रहे
- 27:38होंगे ये जो लोग पूछ लेते हैं बाबा तुम्हें कुछ शर्म शर्म नहीं
- 27:42आती? मैंने कहा इस मसले में तो बिल्कुल
- 27:46नहीं। जो खुद खंडन मंडन कर रहा है, उसका
- 27:50खंडन मंडन करने में अर्जुबिका है। उसको खुद ही पता नहीं और खंडन
- 27:58मंडन करता फिरता मंडन में सर से चकरा जाती।
- 28:03भारतीय से हार जाता, भर्ती करती है प्रैक्टिकल बात।
- 28:07स्त्री से हमेशा प्रैक्टिकल बात करती है।
- 28:12इस्र में यही फर्क है। स्त्री का एक्स क्रोमोसोम शुद्ध
- 28:20एनर्जी से भरा पड़ा है। उसमें व्हाई व्हाई प्रकार की कोई
- 28:25छटपटा अपनी। भाई में अगर कुछ खूबसूरती है तो
- 28:31कुछ बदबू भी है। दुर्गन्ध भी है आओ हम प्रश्न की
- 28:43चलेंगे। भीमसेन जड़ वह जिसके ऊपर त्रिकुण
- 28:51में प्रकृति भारी पड़ जाती है। स्त्री गुण जिसके ऊपर भारी पड़ते
- 28:58हैं। मुझे एक व्यक्ति आशु की बात सुन
- 29:01रहा है। तुमको कौन धकेलता है बुरे कर्म
- 29:06करने के लिए, तो सो कहते हैं यह त्रिगुणात्मक प्रकृति भगवान कृष्ण
- 29:16ने कहा में जो रजो गुण तमगुण है। ये तुम्हें धकेल देते हैं।
- 29:23सत्य गुण जो है वह तुम्हें दान करने पे भी विश करता है।
- 29:27तमू गुण तुम्हें छीनने पे ब्रश करता है, रजो गुण तुम्हें छीनने
- 29:32पे विश करता है, रजो गुण ढंग से छीनता है कानून बना के।
- 29:40तमगुण इतना बेहोश होता है कि वह सीधा अड्डा का मार रहता है।
- 29:45डाकू तमगुणी होता है चोर अरे जोगुणी होता है जड़ जिसके ऊपर।
- 29:59त्रुगुणमयी प्रकृति का इफेक्ट पड़ता है, प्रभाव पड़ता है वह जड़
- 30:06है और चीत अनुभव जिसके ऊपर किसी प्रकार के गुणों का इफेक्ट न
- 30:13पड़े। जो त्रिगुणा तीत है, गुणों से
- 30:17पांव है। और ये तीनों गुण तो हमारे मन में
- 30:23है, तुम्हारी बुद्धि में है, इसलिए संत कहते हैं इस बुद्धि को
- 30:27छोड़ दो, क्योंकि ये बुद्धि गुणों से भरी पड़ी है।
- 30:32श्री गौण कभी तम आएगा, कभी राजा आएगा, कभी सत्त्व आएगा।
- 30:39तुम ताम्र के भीतर किसी को चपट मार दोगे, नुकसान पर तो काट पिट
- 30:46सकते हो, आज धरती तमोगनी हो गई है, कितनी मिज़ाइलें किस तरफ सी
- 30:53चली गई, इसका आनंद उठाते हैं। और अफसोस की बात है।
- 31:00ये तुम्हारे कोई भी गिर सकती थी। हर तुम रोते पीटते हैं लेकिन हम
- 31:08कभी इस बात को आप अपनी डायरी में नोट कर लेना।
- 31:18जिन बुरी वारदातों को देख कर हम हंसते हैं एक बार अगर तुम उनकी
- 31:23जगह अपने आप को रख लो कि मैं इस विमान दुर्घटना में मैं भी बैठा
- 31:29होता विमान में बैठी होती। तो मैं भी भुज जाता आलू की तरह और
- 31:40हाल क्या होता मेरा या मेरे पर वर्क तुमने ऐसा कभी सोचा नहीं जो
- 31:46पोरस ने कहा शिकंतर को सिकंदर ने कहा राजा?
- 31:50तुम्हें क्या सजा दी जाए? तो राजा कहता औरस कहता सिकंदर, जो
- 31:58एक राजा दूसरे राज्य से अपेक्षा रख सकता है।
- 32:04सिकंदर बड़ा समय प्यास्त इस मसले में संसार की बातों में।
- 32:11परमात्मा के मसले में शून्य समझ गया जो एक राजा दूसरे राज्य से
- 32:17अपेक्षा रख सकता है। तुम सहानुभूति दिखाओगे या बर्फ़
- 32:21भरता दिखाओगे, वो तुम देख लो। और पुरुष को छोड़ दिया पैसे
- 32:31सिकंदर कहता है, तुम्हारी जवाब से मैं बड़ा खुश हूँ संतुष्ट भी तुम
- 32:38अपने आप को उसकी जगह रख के देखो अगर यही तुम्हारी साथ हो जाये तो
- 32:43क्या? तुम्हारा जीवन बदल जाएगा।
- 32:52ये डगमगाती हुई लहरें ठहर जाएँगी। एक वारिस को प्रयोग करके देखो तुम
- 33:02अपने दुश्मन के दुख से सुख लियो। लेकिन एक बार दुश्मन के दुःख में
- 33:07आकर देखना यही मेरे साथ भी जाता तो क्या होता?
- 33:12फौरन तुम ठहर के आओगे और ठहरा हुआ मन तुम्हें अंत में दिखाई देता
- 33:17है, जड़ कौन? जो तीन गुणों से संपन्न और तीन
- 33:27गुणों का जीस पर राज़ हो वे जड़ तो बता रहे हैं ओसो मैंने कहा अगर
- 33:35थोड़ी सी छलांग ले लेते हैं यहाँ से तो दोनों बातों का जवाब मिल
- 33:39जाता है जो शैतानी कर्मों में तुम्हें धकेलता है।
- 33:46उन गुणों से पार हो जाओ, तुम उनके साक्षी हो जाओ, गुण गुणों में
- 33:52बरतेंगे और तुम महज होना देखते रहोगे।
- 33:57अगर ऐसी स्थिति तुम्हारी आ जाती है तो तुम प्रज्ञाभान हो गए
- 34:01सतिप्रज्ञ हो गए। गुणों में भरते रहेंगे सफीर पे जो
- 34:07आज की वीडियो में हमने बोला ये घटनाएं घटती हैं सफीर पे केंद्र
- 34:13पर उसका कोई प्रभाव नहीं होता सफीर पे लगेंगी आग परिदीप पे
- 34:21लगेंगी आग लेकिन केंद्र के ऊपर ज़रा भी इफेक्ट नहीं पड़ेगा सेंटर
- 34:26के ऊपर ज़रा भी इफेक्ट नहीं पड़ेगा इतनी दूर तक आग आती नहीं
- 34:30इतनी दूर तक न चिंता की आग आती है न चिता की आग आती है जड़ बह।
- 34:42जिसके ऊपर त्रिगुणमयी प्रकृति राज़ करती है जिसे निचाती है
- 34:48त्रिगुणमयी प्रकृति इसलिए तुम अपराध कर देते हो सारी रात नींद
- 34:55नी आती बुध के ऊपर थूक जाती है, सारी रात करवटें बदलते है।
- 35:03सुबह उठकर 3:00 बजे अभी बुद्ध जगे नहीं हैं, वृक्ष की ओट में खड़े
- 35:08हो जाते हैं। सारी रात जगा मैंने ये क्यों
- 35:12किया? नहीं करना चाहिए था क्या हुआ वही
- 35:15आदमी है तब तंबुगुम था, अब सत्व गुणा क्या?
- 35:20तुमने कभी देखा सोते सोते तुम्हें क्यों चिंताएं ज्यादा होती हैं?
- 35:26क्योंकि तुम तमू तमू गुण से सतगुण तक की यात्रा शुरू कर देते हो।
- 35:32अब इसको ठीक से तुम सारे दिन में घूमते फिरते तमू गुण ही हो जाते
- 35:38हो। शाम तक तुम तम्म गुण हो जाते हो
- 35:42सुबह तुम सतो गुणों में उठते हो और फिर दोपहर तुम रजो गुण में
- 35:48होते हो शाम होते होते तुम तम्म गुण में हो जाते हो इसलिए तुमने
- 35:53देखा तुम्हारी याचक मगते सुबह आएँगे शाम को।
- 35:59क्योंकि सुबह तुम्हारे भीतर सत्व का ज्यादा बोर बाल है, अभी अभी
- 36:05उठे हो, ताजा ताजा उठे हो, इनकार कैसे करोगे?
- 36:09कैसे कहोगे है नहीं, तुम कहोगे बाबा ठहर जाओ, अभी लेके आता हूँ।
- 36:16दोपहर होते होते कुछ सम्भावनाएं बनती हैं।
- 36:19कुछ सम्भावनाएं नहीं भी बनते। कई बार तुम कह दो जाओ, कई बार
- 36:26कहोगे रुको, लेकिन सांझ होते होते तो बिल्कुल तमक नहीं हो जाते,
- 36:32इसलिए याचक जानते हैं सांझ को कुछ नहीं मिलेगा।
- 36:36सांझ को वो आते ही नहीं है, तुम्हारे द्वारपेक्ष समझदार याचक
- 36:42शाम को नहीं आते। बुध आते हैं, दोपहर से पहले पहले
- 36:47आ जाते हैं, शंकर आते हैं, दोपहर से पहले पहले आ जाते हैं।
- 36:54कपिल वस्तु का राज़ छोड़ के आई है।
- 36:57हाथ में भिक्षा पत्र है, भीख मांगने आई है किसके लिए उस परम
- 37:02आनंद के लिए उस परम रस का प्याला पीने के लिए इतनी बड़ी कुर्बानी
- 37:09जिसकी फिराक में, तुम हो के कैसे मिल जाए हमें?
- 37:14ये गद्दियाँ, ये सिंहासन ये रत्न जड़ित मुकुट, ये वस्त्र, ये सोने
- 37:25के तग में ये भारत रत्न को डिग्री।
- 37:34कैसे मिल जाए? हमें अभी कुछ मूर्ख उपाय करें।
- 37:39तुम्हारे उपायों करने से क्या होता है?
- 37:42मात्र वही व्यक्ति जो नेश्वर है वो तुम्हें सर्टिफिकेट दे देगा।
- 37:49नोबेल दे देगा, शांति पुरस्कार विजेता हो जाओगे।
- 37:52लेकिन क्या मरोगे नहीं? वो भी मर जाएंगे जिनके सामने
- 37:59शांति नोबेल पुरस्कार तुमने जीता? बस इतनी देर कर लिए इतनी देर कर
- 38:07लिए तुमने गंवा दी अपनी सारी जिंदगी।
- 38:11इसलिए संत कहते हैं कि हम तुम्हारी दशा देख के रोते है।
- 38:27आज क्या के इस शान पे? रोना आया आज क्या बात के सिशों पे
- 38:50रोना आया। आज क्या हुआ?
- 38:59आज की शाम में ऐसा क्या था जो रुला गया तुम्हारे मृदान के चेहरे
- 39:10देख के उनके बीच करुणा का भाव करता है।
- 39:16और जो बोला नहीं जा सकता वो उसे बोलने की चेष्टा करते हैं।
- 39:20बस यही है उनकी मजबूरी। जानते हैं बोला नहीं जा सकता।
- 39:27पक्का पक्का जानते हैं बोला नहीं जा सकता और बोल के भी पाते हैं कि
- 39:31नहीं बोला के फिर भी बोलते हैं क्यों बोलते हैं तुम्हारे चेहरे
- 39:36पर ये तीन लकीरें देखकर जिनको तुम ढक लेते हो त्रिपुंड के द्वारा ये
- 39:44माथे के भीतर जो तुम्हारे। सैलाब पढ़ते हो या टिके से ढक
- 39:51लेते हो तुम कारण कुछ और और बता देते हो।
- 40:00यही मीडिया करता है तुम्हारा यही भांड करते थे जनक के और दर्शक।
- 40:06राजाओं ने बाँध रखे होते थे। जब हम आए तो हमारी कीर्ति का बखान
- 40:11करना। इनके बुजुर्ग ऐसे होते थे, दो तल
- 40:24हैं, एक तल है सूचनाओं का। लेकिन उसमें आनंद नहीं है।
- 40:36लफ़्ज़ों का भंडार है, सूचनाओं का आवास है वो, लेकिन शांति नहीं।
- 40:48मथुर रस का प्याला वहाँ झलकता नहीं वह कब तक तुम ठहर पाओगे,
- 41:00नहीं ठहरते इसलिए रात को प्रकृति बड़ी दयालु है।
- 41:06रात को प्रकृति तुम्हें सांझ होते ही तुम्हारे भीतर मेलाटोनिन का
- 41:10उत्पादन शुरू हो जाता है। और तुम झपकी लेने लगते हो, उबासी
- 41:15लेने लगते हो सो जाते हो, सो जाते हो फिर तुम शांत हो जाते हो, सुबह
- 41:22उठते हो, सत्यगण से हटे होते हो हटे फटे।
- 41:31लेकिन ध्यान रखना तुम उसके करीब बैठ के आये हो, अगर यही बात घट
- 41:38जाए, ध्यान में उसकी करीबी तो बात बन जाए।
- 41:43हाँ आप जैसा कोई। मेरी जिंदगी में आए तो बात बन जाए
- 41:56बस वैसा जो रात को जिसके करीब बैठे थे, दिन में जागे जाके उसके
- 42:02करीब बैठ जाओ तो बात बन जाए, यही तुमसे हो नहीं पाता।
- 42:09क्योंकि जागे जागे तुम्हें बहुत सी चीजें घेरेंगी जो तुमने दबा
- 42:12ली, जो तुमने शुभ प्रयास कर ली। काम आएगा, क्रोध आएगा, मौत का भय
- 42:18आएगा, सभी प्रकार की सूचनाएं जो तुमने भीतर जर्मा ली, राधे राधे
- 42:24जमा लिया, राम राम जपा लिया। ये बाहर आएगा।
- 42:28निश्चित है उसने तुम्हारे अछेतन को हल्का करना है, फिर तुम गुरू
- 42:36के पास शौक गुरू जी, अब क्या मैं अब भी जपता रहूँ?
- 42:44मेरे तो भीतर से राम राम राधे राधे आता है।
- 42:50पता गुरु को भी नहीं, गुरु तुम्हारी चरण पकड़ लेगा।
- 42:55अरे तुम तो सिद्ध हो ये तो आज का जॉब शुरू हो गया।
- 42:59शब्दों का का खाक आजबाजा होता है, वो तो दोनों होती है, वो तो ओंकार
- 43:05की ध्वनि होती है। जो तुम्हारे उस उदगम स्थल से आती
- 43:10है जो तुम्हारा स्वभाव है और सारे विस्तार कहो के ब्रह्मण्डल में ही
- 43:16छा जाती है। तुम रात को देखना जिसे तुम
- 43:20टेंटेटस कहते हो रात को सारे ब्राह्मण को वो टेंटेटस होता है।
- 43:24तुम अगर कभी जा सको इसे योग हो सको तो तुम जाओगे ब्लैक होल में
- 43:29तो यही आवाजें पाओगे किस तरह की आवाज हमारे भीतर भी वही?
- 43:43और बाहर भी वही इसी शब्द की तरफ इशारा किया था।
- 43:48सन्तों, यथापिंडे तथा भ्रमण्य यही आवाज है पिंड के भीतर भी यही आवाज
- 43:56है। भ्रमण केन्द्र में तुम कहीं निकल
- 43:59जाओ और देखना। यही अनाजनाथ छाया हुआ।
- 44:05सब जगह उसके होने का तरीका है यह अनइंस्ट्रक्टेड सॉन्ग ऑफ
- 44:16एक्सिस्टेंस अस्तित्व के होने का ढंक बस ऐसा ही जीता है वो।
- 44:26और आनंद छलके का इस अवस्था में ये प्रमाण है नहीं।
- 44:31दुकानों के रोग को तो कर नहीं है, फिर टीनीटस ही होगा क्योंकि इस
- 44:36तरह की बिमारी भी हो सकती है। लेकिन बहूदा जिन लोगों में क्रिया
- 44:43योग के बाद शुरू होता है और टीनीटस नहीं होता।
- 44:47हौतोयाने के ना दिए होता सहसा से उत्पन्न हो सुबह तुम उठे सत्व गुण
- 45:00से भरे बैठे सारी रात तुम उसके पास बैठे जो त्रिगुणा तीर्थ है।
- 45:07त्रिकुण तीर के पास तंगगण बिल्कुल नहीं रजोगण बिल्कुल नहीं, वो ठहरा
- 45:11हुआ है और सोया भी नहीं है, ये समझ लो बात को क्या कहा हाँ बता
- 45:25दिया मैंने। जब तुम जाओगे गुरु के पास तो गुरु
- 45:28को कहोगे। ये तो अपने आप ही शुरू हो गया
- 45:31भीतर से राधे राधे क्या मैं फिर से जब्त रहूँ?
- 45:40इसको थोड़ा सा तुम विस्तार चाहते हो?
- 45:42विस्तार दे देता हूँ मैं हमने इतना खा लिया है तो मैं उल्टी आने
- 45:48लगी। तुमने इतना खा लिया है कि तुम्हें
- 45:52उल्टी आने लगी है। क्या तुम पूछोगे कि मैं और खा
- 45:55लूँ, उस वक्त तुम पूछोगे कि मैं और खा लूँ बाबा क्योंकि तुम्हारी
- 46:02प्रकृति ये तुम्हें बता रही है कि तुम्हारे भीतर जेल नहीं रहा, जो
- 46:06तुमने खाया। ये राधे राधे तुम्हारा भीतर नहीं
- 46:11झेल रहा, वो शुद्ध बुद्ध तत्त्व हैं वो तुम्हारी राधा को झेल नहीं
- 46:18पाती, ये शाब्दिक राधा है, उसे चाहिए अमृतत्व की राधा, उसे चाहिए
- 46:23चेतना की राधा। तुमने नकली राधा थोपली चाहिए
- 46:29चेतना की राधा तुमने शाब्दिक राधा थोपली क्या जब तुम्हे उल्टी आती
- 46:36तो तब तुमने किसी डॉक्टर से पूछा जा की बाबा उल्टी आ रही है डॉक्टर
- 46:40साहब खालू बकेगा रुक जाओ भाई पेरीनाम लगा लेने दो।
- 46:45डम्पेरी डॉन दे देने दो, डीएसआर ले लो या थोड़ा समय इन्जेक्शन लगा
- 46:51लूँ, थोड़ा सा ग्लूकोज़ चढ़ा दूँ, बहुत सी चीजें नष्ट हो गई हैं,
- 47:01अभी क्या चलती है खाने की? लेकिन यह गुरु कहेंगे हाँ हाँ
- 47:05हाँ। बहुत अच्छा तुम्हारे पांव सुन
- 47:07लेंगे, तुम तो सिद्ध हुए अरे ये तो खुद ही बाजा बजने लगा भीतर
- 47:16इनको खुद ही पता नहीं ये बेचारे हैं और संज्ञा क्या है तुम्हे?
- 47:26और क्या कहूं ये बेचारे हैं क्योंकि इस स्थल पर पहुंचे जहाँ
- 47:34गुंजार होता है धुन का तुमने नकली नकली बना दिया शब्दों का गुंजार
- 47:40शब्दों का गुंजार वो धुन का गुंजार नहीं।
- 47:47शब्दों का गुंजार, धन का गुंजार नहीं कल ही मुझे एक प्रश्न है
- 47:55मेरा भाई क्यों पहुँच गया जबते जबते मैंने कहा अपना मोबाइल नंबर
- 48:01दो। उसने डिलीट ही कर दी उसे पता
- 48:08तुम्हें क्या पिटना पड़ेगा। मीरा पहुंची शब्दों के द्वारा
- 48:20कहाँ पहुंची? बिरहा के द्वारा धोन के द्वारा
- 48:29पहुंची धोन ओर शब्द में बड़ा फर्क है।
- 48:35धोन संगीत लबत् होती है, शब्द लबत् नहीं होते।
- 48:41शब्द रूखे सुख हैं, दोनों अमृत से अति पटी है।
- 48:49इतना फर्क है और उस अमृत की ही तलाश में तुम रूखे, सूखे शब्दों
- 48:56में उलझ जाते हो, रूखे सूखे उठ जाते हो।
- 49:02रूखा, सूखा शब्द अपनाओगे, रूखा सूखा ही फल मिलेगा।
- 49:08धुन के भीतर मैं कहता हूँ कीर्तन करो, याद करो बिरहा की आने दो याद
- 49:16तड़प आने दो मछली की तरह। मछली जानबूझ के तड़पती है।
- 49:20क्या मछली को जब पानी से बाहर कर लिया जाता है?
- 49:27क्या मछली जानबूझकर एक्टिंग करती है?
- 49:29तुम्हारी तरह सर्कस करती है, नकली दिखावा है नहीं उसकी तड़पन असली
- 49:35है, यही मीरा की तड़पन है। और इस तड़पन में वो कहती है की
- 49:45अगर मुझे पता हो तो मैं ऐसा। नगरी ढिंढोरा हीडती फिर नकरियों
- 50:30को। मेरा हाथ के द्वारा उस तड़पन को
- 50:41देखो। हमने मत्स्य को मत्स्य अवतार कहा
- 50:44मत्स्य को क्यों कहा। बस यह एक सिम्बोलिक ही
- 50:51प्रिजेंटेशन अप्रीविएशन था सार था यहाँ से शुरू करो जब तक तुम मीन
- 50:58के बिना पानी के बिना मछली की तरह तड़पोगे नहीं तब तक।
- 51:08शुरुआत नहीं होगी। वे फर्स्ट स्टेप टु व्हाटस
- 51:13एनलाइटन वेन्ट पहला कदम और तुम पहली अवतार पे उसकी उसकी ही नहीं।
- 51:23बातें समझ सके तो मछली को पूजने लगे।
- 51:26रोज़ मुझे प्रश्न आते हैं क्या मछली को खा लेना चाहिए?
- 51:30वो तो परमात्मा का अवतार है, जो तुम खाते हो, परमात्मा का अवतार
- 51:34नहीं है, वो शैतान का अवतार है क्या ये गेहूं या चावल या जो भी
- 51:39कुछ खाते हो वही तो है जिसे तुम खाते हो?
- 51:46लेकिन मछली का प्रारूप मत्स्य अवतार कहना किसी कारण से था।
- 51:51उन्होंने सिम्बोलिक रिप्रजेंटेशन दे दिए क्योंकि तुम चित्रों की
- 51:56भाषा को सहजे सहजे समझे जाते हो तो शुरुआत यहाँ से होगी।
- 52:03उसके अभाव में तुम्हारा जेहरा तड़पेगा।
- 52:09तुम दर बदर बेज़ार हो के घूमो फिर उसकी तलाश में तुम गरीबों से
- 52:17श्रांग हो। गो कुल ढूँढा मैंने मथुरा ढूंढ गो
- 52:43कुली ठोंगा मैंने। मथुरा ढूं खोई नगरिया न छोर रे।
- 53:05सुध विसरा गयो मोरी वोकारा इक बांसुरी वाला।
- 53:27सुध विसरा गयो, मोरू कर गयो मन्नू की चोरी।
- 53:45ओं काला काला इक बांसुरी व जाप के द्वारा कहा पहुँची कड़प लगी और
- 54:05धुन जगी। शब्दों का यहाँ कहाँ शब्दों का
- 54:12क्या काम इस अंगना में शब्दों का कोई काम मेरे अंगना में तुम्हारा
- 54:20क्या काम ये मस्तों की महफिल है। यहाँ बकवासी शब्दों का कोई भी तो
- 54:32काम नहीं है। धुन चरेंगी धुन सजेंगी संगीत
- 54:37लहरेगा साज सजेंगे लेकिन शब्द नहीं होंगे।
- 54:46देखना वाहन जाके सिर्फ दोनों ही तुम्हें सुनाई पड़ेगी सपने सारी
- 54:57रात तुम उसके पास बैठे बैठे अब समझा गई तुम।
- 55:03पहले से ही उलटी आ रही है। इतना जप लिया राधे राधे इतना जप
- 55:06लिया आराम ना फिर तुम पूछोगे ये गुरु खुद ही मोर का है ये
- 55:14तुम्हारे चरणों के हाथ से कहा कि अरे बाबा तुम तो पहुँच गए
- 55:19तुम्हारे भीतर तो वो जगह। अजपा जप जपा।
- 55:24अब तुम्हें जाप नहीं करना चाहिए। खुद से चलने लगा है वो कुछ नहीं
- 55:31हुआ मात्र बकवास तुमने नकल पैदा कर ली, जैसे गुलाब के फूलों के
- 55:38तुमने प्लास्टिक के फौज बना दिए, बस ऐसे ही तुम बराबरी करते हो।
- 55:42प्रकृति की और परमात्मा की मिलता तो कुछ भी नहीं कृष्ण कहते हैं,
- 55:47लक्षणों से जानो सुगंध है जेब्लास्टिक के फूल कब तक चलेंगे?
- 55:56मुरझाएंगे नहीं शाश्वत। असली फूल मुरझा जाए लेकिन खुशबू
- 56:04थे के जाए नकली फूल तुम्हारे पृष्ठी के मुरझाएंगे नहीं, स्टेबल
- 56:12बहुत म्यादी ज्यादा है चाइनीज माल की तरह खुशबू।
- 56:24बिना खुशबू के शब्द तुम्हें कुछ नहीं दे पाएंगे और खुशबू वाली धुन
- 56:32में शब्द नहीं होगा। शब्दों से मिलता जुलता राग होगा
- 56:38उनका। जा ठकर दे ढेरे भड़या मस्जिद कोनो
- 56:45जोड़ा डरया जा ठकर दे ढेरे भड़या जीतते वह दे नाद 1000 इश्क दे
- 56:55नवे। हजारों प्रकार के नाक चल रहे हैं।
- 57:05बोले शाह ने कहूं कॉल वहाँ जाप चल रहा है, कुछ नहीं शाह ने कहा,
- 57:13जिते वज्दे नाद हैं, जाप धोनी चल रही हैं।
- 57:19बड़ी प्यारी, प्यारी, मधुर, मधुर और तुम्हारा जीरा घूमता है, वहाँ
- 57:24तुम डोलते हो, जैसे तानसेन ने गाना शुरू कर दिया हो, जैसे
- 57:32हरिदास ने गाना शुरू कर दिया। जैसे चौरसिया अपने लभों से वंसरी
- 57:46के धुन पे गाते हैं वो शब्दावली है नहीं।
- 57:55दोनों रसेली होती है, शब्द नीरस होते हैं।
- 57:59अगर शब्द अचारों की तरह बोले जाए तो नीरस होंगे।
- 58:04अगर शब्द नानक की तरह बोले जाए तो बड़े रस से भरे बोले होंगे और
- 58:12शब्द गाए जाए मीरा की तरह। तो बात ही कुछ और है।
- 58:20ये मुरदों कादे प्रसादों। ये मुर्दो का थे।
- 58:38इनमें शब्द तो हैं, लेकिन रस से अटपटे हैं।
- 58:46तुम्हारे गुरु रस से बिना तुम्हें कोरे शब्द पकड़ा देते हैं।
- 58:49येस? उनके पास खुद ही रस क्या करें?
- 58:54बेचारा रासे ही होता तो वो जकाई न मारते, मैं तुम्हें पक्का करता
- 59:00जिससे रस मिल गया। वह एकांत के कोने में बैठ जाएगा,
- 59:04वह पिएगा उसे उसे प्रचारित करने की कोई जल्दबाजी थोड़ी।
- 59:10उसको तो कहा जाएगा हुक्म देगा, परमात्मा के बोलो भी कुछ पीते ही
- 59:16रहोगे कुछ लोगों को बाँट दो सारी दुनिया बेहाल है, आग में जल रही
- 59:23है, थोड़ा बांट दो। इस जल को छिड़क दो ताकि ये आग बूझ
- 59:29जाए जड़ जिसके ऊपर जो तीन गुणों से बनी और जिसके ऊपर तीन गुणों का
- 59:47इफेक्ट होता है, प्रभाव होता है वो जड़।
- 59:52और जो ना तो तीन गुणों से बनी तीन गुणों से पार है, त्रिगुणा तीत है
- 59:57और ना ही तीन गुणों का उसके ऊपर इफेक्ट होता है या प्रभाव होता
- 1:00:01है। वो क्या बोलती है तुम्हें तो
- 1:00:04तुमने पूछा, पुत्र टीम से? जड़ और चेतन में फर्क कहें
- 1:00:14बिल्कुल एक्रेट एप्रोप्रिएट टाइम पर मैंने प्रश्न पूछा जैसे अब मैं
- 1:00:21आखिरी लम्हों में बोल रहा हूँ और तुम जाते जाते मुझसे वसीयत पूछो,
- 1:00:27ऐसा है ये शब्द। अब तक किसी ने नहीं पूछा जड़ और
- 1:00:31चेतन में फर्क किसी ने नहीं पूछा, आज तक कित्ते कित्ते प्रश्न पूछे
- 1:00:37कित्ते इत्ते शास्त्रार्थ के प्रश्न पूछे इतने इतने फिलॉसोफिकल
- 1:00:41प्रश्न पूछे, गहराई से लदे पड़े। लेकिन कृष्ण ने सिंपल सा यह
- 1:00:47प्रश्न नहीं पूछा कि आखिर फर्क क्या है?
- 1:00:49जाड़ा श्वेत तुम पहले व्यक्ति हो बुद्ध और मैं ऐसे प्रश्नों को ही
- 1:00:56कदर दे पाऊँ जिसने मूल उढ़ा आड़ा, अल्फाबेट एबीसी, कखा, ग।
- 1:01:04अब्बा सा सीखा नहीं, नहीं फिर पीएचडी की किताबों में भी कैसे
- 1:01:10पढ़ेगा और अट्टाफिकेशन होगी मेरी सासु माँ है, अनपढ़ है बिलकुल
- 1:01:21बिलकुल अनपढ़। और तुलसीदास कृतः श्रीराम चृत
- 1:01:27मानस का सुंदर कांड आराम से पढ़ देती है, होफ हो लफ्ज़ बालव्ज़।
- 1:01:33उससे सुन ज़रा भी गलती नहीं लगी थी और ऐसे आवेग से पड़े।
- 1:01:46अल्फाबेट जानते हैं अल्फाबेट सीखा नहीं, 12 खड़ी जाती है सुंदर का
- 1:01:59सुन लो। और तुम कहते हो बहुत बड़ा सारी
- 1:02:09दुनिया में महान संत की उपाधि यह भी तो देखो, महान संत की उपाधि
- 1:02:17देने वाले कौन हैं, समझदार हैं या मूड हैं?
- 1:02:20मूड लोग तो किसी को भी भारत के रत्न पकड़ा सकते हैं।
- 1:02:24ये तो एक छलावा है, ये तो एक अहंकार की दृष्टि और पुष्टि है।
- 1:02:34सत्यमय पुरस्कार मुशण्य दिया करता सत्यमय पुरस्कार परमात्मा दिया
- 1:02:39करता है इसलिए संत संत भला करता है और कुएं में गैर तत है भूल
- 1:02:45जाता है यही तुम्हें समझाया गया, नेकी कर कुएं में डाल।
- 1:02:53दरिया में डाल पता ही न चले कब की थी निक्की ज़रा भी लकीर न छपे मन
- 1:03:01के चित्त के ऊपर तुम भूल ही जाओ तो सुबह सुबह तुम उठोगे।
- 1:03:10तो त्रिगुणा तीत के संबंध से उठकर ताजा ताजा बाहर आओगे तो गुणा तीत
- 1:03:16तो नहीं होंगे, लेकिन सतगुण से भरपूर होगा।
- 1:03:20दुपहरी आते आते रेस लगेंगी दौड़ की तुम रहजोगुणी हो जाओगे और शाम
- 1:03:26आते आते तुम बूझ जाओगे। गिर पड़ोगे बसंत पर गम्मोगनी हो
- 1:03:34जाओगे यह त्रिगुण त्रिगुणमयी प्रकृति।
- 1:03:44इससे यही झड़प है। यही यात्रा की शुरूआत पत्थर से
- 1:03:52परमात्मा तक की यात्रा तीनों गुणों से पार होने की यात्रा है।
- 1:03:58त्रिकुणा तीत होने की यात्रा है। ये गुण तुमसे अच्छा भी कराएं।
- 1:04:05दान पुण्य भी कराएंगे, भला भी कराएंगे, बीमार को दवाई भी दोगे।
- 1:04:14ईसाईयत ने यही अपनाया शुरुआत कहीं से तो करो, कूड़ा आढ़ा से करो,
- 1:04:22एबीसी से करो कागा से करो सुरत करो।
- 1:04:29शुरुआत तो यही सर लेकिन फिर आगे चलते चलते चलते सुपरकन्शियस नेस
- 1:04:36में जाना मानस का जमा मिलेगा, लेकिन एक बार समझी लेना।
- 1:04:45मैंने 3 दिन प्रवचन किये जो सही सही मेरे फलोव से मुझे पहचाना।
- 1:04:55उन्होंने कोई प्रतिकार नहीं जो मुझे समझे जो अभी समझ नहीं सके
- 1:05:03अभी। उन्होंने प्रतिकार किया फिर हम
- 1:05:06क्या करें? पापा बड़ा खतरनाक था महाराज का
- 1:05:11खौफ ज्यादा था, हिल गए, भीतर से अंतर से गया, बस मुझे भेद करना
- 1:05:22कोई। अब और क्या पहनना चाहिए?
- 1:05:25यही तो पेमेंट जब तुम्हारे मस्तक पे अंगूठा लाके गुरु ने कह दिया
- 1:05:35यू विल बी लिबरेटेड एंड यू अरे लिबरेटेड फ्रम नाउ शुरुआत हो गई
- 1:05:41तुम्हारे लिबरेशन की। पर इसका मतलब किसको यकीन हुआ?
- 1:05:47उसने कमेंट नहीं किया। उसने प्रतिकार नहीं किया जीसको
- 1:05:52यकीन नहीं हुआ अभी कम यकीन था, उसने प्रतिकार किया और जीस जीसको
- 1:05:58बिल्कुल ही यकीन नहीं था नास्तिक था।
- 1:06:00उसने भरपूर प्रतिकार किया। उसके लंबे लंबे कमेंट साए यही
- 1:06:10पहचान में आ जाती है। गुरु को कुछ करना नहीं पड़ता।
- 1:06:14गुरु एक शब्द बोलेंगे और देखेगा तुमने क्या प्रतिक्रिया दी?
- 1:06:19और उससे समय जाएगा। इसे लोग मुझे कहते हैं बाबा आप
- 1:06:22आते ही अंगूठा लगा देते हो ब्रो, मैंने कहा भाई जाख मारने का फायदा
- 1:06:27भी क्या है? किसी और बुर्के के पास चले जाओ।
- 1:06:29तुम्हें किसी और चीज़ की जरूरत है, तुम्हें सूचना ही चाहिए।
- 1:06:34तुम्हें द्रव्य चाहिए, तुम अभावग्रस्त हो, तुम पीड़ाग्रस्त
- 1:06:37हो तुम रोगग्रस्त हो, तुम डॉक्टर के पास सो तुम किसी धनी की शरण
- 1:06:44में जाओ, तुम किसी अचार्य के पास जाओ, मेरी कोई आवश्यकता नहीं है,
- 1:06:51मेरी आवश्यकता जिससे होती है। मैं जानता हूँ, अच्छी तरह से उसे
- 1:06:56मैं अपना ही लेता हूँ और वक्त वक्त पे मैं पहचान भी करता हूँ
- 1:07:03कितना ऊंचा उठा, कितना गहरा गया, कितना कॉन्शसनेस कितना कॉन्शसनेस
- 1:07:12ऊपर उठा। कितने जड़ तक पहुंचा?
- 1:07:16और ये भी ध्यान रखना जितनी जड़ तक पहुंचोगे तुम गहरे उतने ही ऊपर
- 1:07:20उठोगे कॉन्शसनेस लेवल पे मिठत नीमी नान का गुण चंगियाईया तक
- 1:07:30जीतने नीमें हो जाओगे। जो वृक्ष फलों से लध जाता है उसकी
- 1:07:35टहनियां झुक जाया करती है। उसका फल टूट के धरती पे नहीं
- 1:07:42गिरता। वह फल समेत इतना झुक जाता है कि
- 1:07:46धरती को चूम लेता है। इतना भारी हो जाता है वृक्ष।
- 1:07:52कि उसके भार से ही वह पूरा का पूरा वृक्ष धरती को झूम लेता है।
- 1:07:58यही तो निशानी है। हम लक्षणों को जानते हैं, लक्षणों
- 1:08:02को देखते हैं झड़कों जो त्रिगुणमयी प्रकृति सेवाना और
- 1:08:13त्रिगुणमयी प्रकृति का उस पर प्रभाव भी होता है तुम पर भी होता
- 1:08:19है लेकिन तुम्हारे भीतर सदा ही एक ऐसा तत्व है जो त्रिगुण तीर्थ है।
- 1:08:26वो कभी गुणों के साथ जब। समाहित हो जाता है, कनेक्शन जोड़
- 1:08:31देता है तो वह विकृत हो जाता है। अब इन शब्दों को आखिरी शब्दों को
- 1:08:36ध्यान से सुन लेना। वह निर्लिप्त तत्व जब जड़ के साथ
- 1:08:45लिप्त हो जाता है। तो वह दूषित हो जाता है फिर आते
- 1:08:53हैं तुम्हारे विकास फिर आते हैं तुम्हारे विचार फिर आते हैं
- 1:08:59तुम्हारे विषय ये परिणाम किस चीज़ का?
- 1:09:07तुम्हारी चेतना का जड़ से संलग्न होना तुम जाड़ होने ही हो, तुम
- 1:09:16शुद्ध चेतन्य हो, तुम चेतना, लेकिन यह पदार्थ जो तुम्हें मिला
- 1:09:23इंस्ट्रूमेंट। यह कुछ तुमसे अलग है, वह तीसरी
- 1:09:31बातों से छोड़ो नहीं समझ पाओगे, यह खिचड़ी हो जाएगी अन्य कुटनी
- 1:09:36बनाना चाहता हूँ सीधा सीधा सुनो बात को।
- 1:09:45जो त्रिगुण से युक्त वह प्रकृति जो त्रिगुण तीर्थ वह पुरुष देखिए,
- 1:09:53कितना प्यारा शब्द है पुरुष तुम विवाह क्रमोस्स्म के नहीं में आ
- 1:09:59जाते तो अपने भीतर बैठे उस पुरुष के साथ शलकन हो रहे।
- 1:10:05इसलिए प्रकृति को माँ कहा गया और उस तत्व को जो आपके भीतर बैठा
- 1:10:11उसको पुरुष कहा गया और प्रकृति और पुरुष का मेला शब्द और श्रुति का
- 1:10:17मेला तो वो एक ढंग था। दिगंबर जैन का वो तुम्हारे लिए
- 1:10:28थोड़ी था तुम कम गए, वाहे करो मौसम उपलब्ध हो जरूरी तो नहीं,
- 1:10:37लेकिन तुम्हारे भी एक पुरुष बैठा है।
- 1:10:43सदा ही विद्वानों ने कहा संत जन ने कहा प्रकृति और पुरुष का संयोग
- 1:10:48जब हो जाता है तो प्रकृति भी निहाल हो जाती है, प्रकृति खल
- 1:10:53जाती है, पुरुष के संयोग से और पुरुष दूषित हो जाता है।
- 1:11:03कुछ देर के लिए जब चेतना प्रकृति के सान्निध्य में आती है, चेतना
- 1:11:12पुरुष प्रकृति के साथ संबंध में आ जाता है तो वह थोड़ी देर के लिए
- 1:11:18दूषित हो जाता है। उस वक्त तुम्हीं शोज को जागने को
- 1:11:28अवेयरनेस को बचाए रखना। यह ढांचा प्रकृति से बना है, पंच
- 1:11:38महाभूतों से बना है और पंच महाभूत।
- 1:11:41सब प्रकृति है जड़ इसलिए जब चेतना निकल गई, तुम निकल गए थे तो इसको
- 1:11:50बुलाओ, इसको सुनाओ 21 तोपों की सलाह में तो नहीं सुने।
- 1:11:54काय कान है? लेकिन वह सुनने वाला गया।
- 1:12:02किसको सलामी दे रहे हो? वह तो चला गया और सारी उम्र तुमने
- 1:12:06उपद्रव किया कोशाकें बदली देश बदले, सैरस पार्टी किए, इसी दिन
- 1:12:13के लिए किए और यही दिन तुम्हारे काम नहीं आए।
- 1:12:19जब तुम्हें सलामी मिलेंगे तब कांत तो होंगे लेकिन वो कांत पदार्थ के
- 1:12:30होंगे तुम्हारे लिए तुम्हारे भी अपने कांत हैं बेनप्पा गचले सुने
- 1:12:38बिना काना। तुम्हारी भी कान है, लेकिन यह कान
- 1:12:46नहीं यह पदार्थ के कान है, यह तुम्हारी नहीं है, तुम जब बाहर
- 1:12:53चले जाओगे और तुम्हें तोपों की सलाम नहीं मिलेंगे।
- 1:12:58तो ये कान नहीं सुन पाए। इसलिए तुम सोते हुए व्यक्तियों को
- 1:13:02ठहरमा देय समझाते हो। गीता को कोई फायदा नहीं, ना भी
- 1:13:08समझाओ, कोई फायदा नहीं है। अभी जब तक शरीर छोड़ा नहीं है
- 1:13:12आत्मा ने जब तक तुम इन्हें समझाना है तो ये समझाओ।
- 1:13:18ये देखो जागो थोड़ा शरीर से तुम्हारा संबंध विच्छेद हो रहा
- 1:13:24है। मेजर ऑपरेशन इस गोइंग टु हैपन
- 1:13:29बड़ा विराट ऑपरेशन हो रहा है। कांट छांट हो रही है, तुम जागो और
- 1:13:35जाग के देखो। नहीं नहीं, दर्द नहीं होता, जब
- 1:13:41प्रकृति कांड सृट करती है, कोई दर्द नहीं होता, यह तुम्हारे
- 1:13:45मूर्खों के बुनाई है, किसी ने जाग के देखा जो जाग के देखता है वो
- 1:13:52पाता है परमरस की घड़ी है वो। मरने की घड़ी परमरस की घड़ी होती
- 1:14:00इसका आनंद चक इसलिए कबीर ने कहता जा मरने से जग डरे।
- 1:14:11मेरे मन्नू आनंद मरने ही से पाई ये कौन पर?
- 1:14:31माँ न जीस मरने से तुम डरते हो जग मेरे माँ ना हाँ ना क्यों कबीर
- 1:14:39जाग के देखते हैं इस घड़ी को देखें तो क्या होता है नेचर इस
- 1:14:47गोइंग टु मेजर ऑपरेट? तुमने जाग के देखना है क्या दर्द
- 1:14:54होता है, नहीं होता, खुशी होती है तुम्हारे बंधन टूट रहे हैं इधर
- 1:15:00उधर शरीर बदला जा रहा है। नए वस्त्र मिलेंगे।
- 1:15:05अगर कर्म बाकी हैं तो। अनंत नहीं मिलेंगे फिर बूंद समानि
- 1:15:12संबंध में फिर तुम स्मंत्र में समा जाओगे वह जो चेतना की बूंद जो
- 1:15:16पत्थर से शुरू हुई तुम्हारे संग रही थी, सभी योनियों में तुम्हारा
- 1:15:22संघ ने छोड़ा। वहीं बस अब निवृत्त हुई।
- 1:15:26इसे ही निर्वाण कहते हैं। वह बूंद नवृत्त हुई निर्वाण ये
- 1:15:35होता है। वह बूंद अकेली रह गई।
- 1:15:37इसे ही केवल्य कहते हैं महावीर। वह बूंद स्वस्थित हुई।
- 1:15:46इसे ही स्थिति प्रज्ञा कहते हैं। कृष्ण वह बूंद सुरती और शब्द का
- 1:15:53मिलान हुआ। इसे ही कहते हैं बूंद सामान्य
- 1:15:57समता में। इसे ही मुक्ति कहलो इसे ही संबोधि
- 1:16:09कहलो, इसे ही समाधि कहलो कुछ भी कहलो शब्द हैं, तुम्हारे शब्द ने
- 1:16:17कहें, कृत एक। बूंद अपने मोल बुद्ध गम जहाँ से
- 1:16:25निकली उसमें समा जाएगी। एक अक्कार झटकी फिर वहाँ से जो
- 1:16:33आवाज से निकलेगी सिबोहम सिबोहम। हमारिया तू सच्चिदानंद शिव, हम
- 1:17:16शिव, हम।