Latest / Baba ji Vijay Vats / 16 May 25 - सीधा सा सूत्र - पलट जाओ! कहीं जाना नहीं, कुछ करना नहीं, जिस तरफ पीठ है उस तरफ मुख करलो!
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- 0:01पलटू सोबे मगन में साहब चौकीदार, पलटू सोबे मगन में साहेब,
- 0:14चौकीदार, साहेब, चौकीदार। मगन होय सोवन लागे दोनों पांव
- 0:24पसार देख कर दुश्मन भागे जा के सिर पर राम शाह को बार न जा के।
- 0:38जा के सिर पर राम ताह को बार न वाकय।
- 0:44गाफिल में मैं रही अपनी आपिता कह पलटू दास के शब्द।
- 0:58परतु के जीवन की कहानी बड़ी अद्भुत है।
- 1:08परतु एक बनिया थे, मैं हूँ परतु बनिया।
- 1:16खुद का परिचय देते हैं। बट रेव अवध के बीच अवध मिराथ पर
- 1:29टू मारे मारे फिर सभी मारे मारे फिर।
- 1:39इस संसार में कौन है जो सुखी सुखी कर रहा है सभी मारे मरे फिर
- 1:50पलटूबी असिथ तुम सभी कुछ खोज रहे हो ढूंढ रहे हो घर पर?
- 2:04क्या है वो पता नहीं कैसे मिलेगा पता नहीं ना, लक्ष्य का पता है ना
- 2:16राह का पता है लेकिन फिर भी कुछ ढूंढ रहे हैं।
- 2:21फिर भी कोई मार्ग अपना लिया मिलता तो एक बनिया पहले जाता है गुरु के
- 2:39पास गुलाल साहब के पास। गुलाल साहब के पास बदल नहीं पाता,
- 2:49वो मिलता नहीं, जिसकी प्यास से गुलाब साहब से आया भीखा साहब के
- 2:58पास भीखा, वात अगम की कहन सुनन की न।
- 3:04जो जाने सो कहे नहीं कहे सो जाने न बेखा साहब के पास, लेकिन बेखा
- 3:16साहब के पास कोई बात नहीं, वो न मिला जिसकी भूख थी।
- 3:23जिसकी प्यास थी भटक तक इधर उधर बहुत भटक और अंत में पहुंचे गुरु
- 3:39गोविन्द सिंह के पास। गुरु गोविंद ने देखा कि अरे ये तो
- 3:50मोमूक्ष है, ये तो प्यासा है, सचमुच चीज़ से व्यस्त अनोखी
- 3:59कहानी। गुरु बह जान जाते है आप लाख सिल
- 4:09लो बाबा शक्ति बात कर दो बाबा व्यासा हूँ मोमुखियों हूँ कृपा कर
- 4:23दो, पहले तुम्हें अपने पर कृपा करनी होगी।
- 4:29गुरु तो सदैव तैयार बैठा है, लेकिन गुरु तैयार बैठा है, परन्तु
- 4:34इतना भी मूर्ख नहीं है कि तुम्हारे गटर से भरे लौटे के वीर
- 4:43रखना। फिर उसका फायदा ना आपको ना गुरु,
- 4:51इतने भी खुदा ही नहीं करता गुरु कि कोई भी सभी कह देते थोड़ी झलक
- 5:00दिखा दो एक बार। झलक देखेंगे तो पहुँच ही जाएंगे।
- 5:09फिर तो बड़ा आसान मसला है। मैं भी कहती हूँ झलक देखना ही बस
- 5:15पहुंचना। फिर तो मैं कुछ नहीं करना, फिर
- 5:21विश्वास वगैरह। फिर श्रद्धा वगैरह फिर कोई कर्म
- 5:29धर्म की बात नहीं करना, कोई कर्म नहीं, कोई धर्म नहीं, बस ये झलक
- 5:37देखो। इसीलिए ऐसे झलक के ऊपर मेरा इतना
- 5:43ज़ोर है वही तो बता पाऊंगा ना जिसके जरिए मुझे पंख लगे।
- 6:00मैं उड़ा खुले आसमान वो ही बता सकूंगा।
- 6:06इसे अन्यथा मैं कुछ बता ना सकूँ। पहुंचे गुरु गोविंद के पास गुरु
- 6:13गोविंद ने देखा कहना कहाँ पड़ता है कै शक्तिपात करता हूँ।
- 6:20गुरु गोविंद ने देखा मो। मोक्ष है।
- 6:22अरे शक्ति बात करती है और पलटू पलट गए।
- 6:38पलटू का नाम पलटू दास नहीं था। परंतु तो उन्होंने अपना ही नाम
- 6:47खुद रख लिया। गुरु के द्वारा दिया गाना अरे
- 6:52बनिए तू दो कष्ट किया भाई गुरु गोबिंद बोले अरे बनिए।
- 7:01तू तो पर लटक गया तो उसने चरणों में सर रखा।
- 7:08हाँ हाँ, गुरुदेव पर लटक गया मैं बनिया पर लटक गया, अब इसके भीतर
- 7:16एक बड़े रहस्य की घटनाएं। कौन पलटता है?
- 7:24बनिया पलट गया बड़ी प्यारी कहावत है बनिया था बनिया कौन?
- 7:35जो हर चीज़ का हिसाब रखे? और जो किसी भी चीज़ का हिसाब ना
- 7:45बेपरवाहियाँ तेरी यहाँ तरफ डा। डा।
- 7:48बेपरवाह बनिया हर चीज़ का हिसाब रखे।
- 7:57और ब्राह्मण किसी चीज़ का हिसाब नहीं रखते।
- 8:04ये डेफिनिशन है बनिया और ब्राह्मण की तुम्हारी डेफिनिशन से, इसको
- 8:09कोई मत लो तुम्हारा बनिया। तो जांघों से पैदा होता है जबकि
- 8:21जांघें किसी बच्चे को जन्म नहीं देती।
- 8:24जंग तो जहाँ से होता है वहीं से होता है और तुम पागलों की पूरी
- 8:30पूरी जमात। ये कथावाचक सारे दिन झूठ जो देखा
- 8:42नहीं। जो जाना नहीं, उसके बारे में
- 8:44प्रसारित करते तो पलटू उदास पलटते।
- 8:52और गुरु गोबिंद ने कहा अरे बनिया तू तो पलट गया कौन पलटा बुद्धि
- 9:02पलटी बुद्धि ही पलटती कैसे पलटती? बुद्धि का काम है हिसाब किताब
- 9:16गणना करना, संख्याओं को जोड़, घटाव करना, डेविटेशन करना,
- 9:23मल्टीप्लिकेशन करना या बुद्धि का करो बुद्धि जब वो पर्यट जाए और
- 9:30बुद्धि पर्यट के रथक में आए हृदय हिसाब में।
- 9:34हृदय कोई कैलकुलेशन नहीं करता, हृदय तो प्रेम से भरा नहीं, उसके
- 9:49पास कोई पैमाना नहीं। तुम्हारी गणना का हृदय गणना नहीं
- 9:57करता। हेल्थ तो पीता है, बिना पैमाने के
- 10:03पीता है जिसका कोई नापतोल नहीं होता।
- 10:07सूरत कलारी भाई मतवारी मदवा पी गई बैन तोलह कोई तोल मोल नहीं।
- 10:17कोई पैमाना नहीं, कोई मेजरमेंट और परेड तो पी गए तो गुरु का दिया
- 10:29हुआ ये शब्द अरे बनिया तू परेड के देखिये सब भी बनिया।
- 10:37ये भूल मत जान जो हिसाब करते हैं वो बनी बाहर से तुम अपने आप को
- 10:44कुछ भी दिखा मैं रोज़ देता हूँ जो कायर है वो कहते हम डरते नहीं,
- 10:50किसी से ये मत समझ लेना कि मैं डर गया बस इसका अर्थ ही।
- 10:57तो वो डर गया बात को मत देखो अचरण को देखो जो डरता है वो अपने साथ
- 11:10सात दीवारों की अभेद सुरक्षा। कवच साथ लेके चलता है साफ तरह के
- 11:17मरने से डर इससे ज्यादा प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता क्या जो
- 11:24व्यक्ति खुलेआम अकेला चल नहीं सकता वह डरपोक नहीं तो बहादुर है,
- 11:31उससे बड़ा डरपोक और जीतने। बर्तों के किले में बंद है, उतना
- 11:37ही बड़ा अंडर भोग पर मौत तो आएगी और सात किलो को भी भेद देगी।
- 11:451 दिन तो पलटू पर हट गई। गुरु गोविंद ने कहा बनिया तो पलट
- 12:00गया, सारी दुनिया हिसाब किताब में व्यस्त है।
- 12:07राजनीति हिसाब, किताब का सड़ा हुआ तंत्र।
- 12:14इसलिए मैं कहता हूँ जो सड़ जाता है वो राजनीति में जाता है।
- 12:21हमारे एक शब्द हैं पिता जिसने जन्म दिया पालमपुस दादा दादा पिता
- 12:31का पिता। उसने आपको पिता आपके पिता को
- 12:34पाला। पुस दादा के पास पढ़ता वो उसका भी
- 12:40पिता तो हम जब बड़ा आदमी मर जाता है तो उसकी होली खेलते हैं, खुशी
- 12:46मनाते हैं ढोलक। गुलाल खेलता है और एक होता है सड़
- 12:58दा दा पढ़ दाता का मतलब जो पढ़ के मर गया चार पाइप पे पढ़ के मर गया
- 13:04वो पढ़ ला दो और दादा जो ठीक ठाक मर गए।
- 13:08वो दादा दादागिरी नहीं कहती, जो दादागिरी करता है, वो दादा हाथ
- 13:17में चिट्टियां रहती है। हर वक्त खुंडी वो दादागिरी करता
- 13:23है और बाप अपना कर्तव्य निर्वाहण करता है।
- 13:27बाप के भीतर वो जो बातें सरल से भरा हुआ है और दादा के भीतर
- 13:34दादागिरी और पड़ दादा के भीतर जो दादागिरी भी नहीं कर सकता, पड़
- 13:39गया चार और जो सड दादा जो पड़ भी गया और सड भी गया।
- 13:46तो रात की खोपड़ी सड़े हुए तंत्र को साथ लेकर सदा चलती है।
- 13:52तुम सड़ जाओगे, मरोगे नहीं, सड़ सड़ के मरोगे।
- 14:05हमारे सनातनी अद्भुत शब्द खोजें, उसके अर्थ आपको मालूम न हों,
- 14:13लेकिन शब्द बिलकुल ठीक पलटू पलट गया।
- 14:26तुम्हारी बुद्धि हर वक्त सोचती है।
- 14:30अगर मैं ऐसा करूँगा तो मुझे इस चीज़ का लाभ हो जाएगा।
- 14:35अभी मुझे रोज़ प्रश्न हो जाते हैं।
- 14:38बाबा अगर ये क्रिया योग करेंगे तो हमें फायदा क्या होगा?
- 14:44मैंने कहा मेरे चैन को अनसबस्क्राइब कर दो, जैसे पैदा
- 14:47होगा। यहाँ फायदे के लिए अनहिबमत वो
- 14:57बहुत जनरल है। वहाँ चले जाओ, यहाँ फायदा वगैरह
- 15:05होने को नहीं है कुछ लुफ्त न हो। बहकनबो साँझ ढरे महफिल सजान को
- 15:23साँझ ढरे पैमाने सलकाने हूँ तो इस महफिल में आ जानो।
- 15:30वर यहाँ से रूक्षत रवि हो जाओ फायदा वगैरह कुछ नहीं होता भाई उन
- 15:38लोगों के पास जाओ जो आपको फायदा गिना रहे हैं यहाँ फायदा वायदा
- 15:45कुछ नहीं होने को है, यहाँ तो लूट जाओ।
- 15:51जो हो वो लूट जाओगे, तेरी महफिल में किस्मत आजमा कर हम भी देखें
- 16:06घड़ी भर को तेरे नजदीक आकर हम भी देखेंगे।
- 16:13तेरी महफिल में किस्मत आजमाकर हम भी देखेंगे घड़ी भर को तेरे नजदीक
- 16:21आकर हम भी देखेंगे बाहरें आज पैगामे मोहब्बत लेके आईं।
- 16:33बड़ी मुद्दत से उम्मीदों की गलियां मुस्कुराईं गमे दिल से
- 16:42ज़रा दामन बचाकर हम भी देखेंगे। अगर दिल गम से खाली हो तो जीने का
- 16:57मज़ा क्या है? अगर दिल गम से खाली हो तो जीने का
- 17:04मज़ा क्या है ना हो, खुने जगर तो अश्क पीने का मज़ा क्या?
- 17:14मोहब्बत में ज़रा आंसू बहाकर हम भी देखेंगे।
- 17:20यश बड़े कीमती होते ये उसकी मोहब्बत में गिरा कर।
- 17:32ने पी ले भाग्यशाली हो अगर तुमने पी लिया मोहब्बत हमने माना जिंदगी
- 17:42बर्बाद करती मोहब्बत करने वालों का है बस इतना ही अफसाना।
- 17:52मोहब्बत करने वालों का है बस इतना ही अफसाना यही फायदा है मोहब्बत
- 18:01का तड़पना तड़पना चुपके चुपके आह वरना।
- 18:10घुट के मर जाना चड़पना चुपके चुपके आह वरना घुट के मर जाना
- 18:20किसी दिन ये तमाशा मुस्करा कर हम भी देखे रो के मत देखना ये।
- 18:31किसी दिन मुस्कुराकर ये तमाशा हम भी देखेंगे तेरी महफिल में किस्मत
- 18:37आजमाकर हम भी देखेंगे मोहब्बत हमने माना जिंदगी बर्बाद, धरती है
- 18:45बिलकुल दलाशक। तुम्हारे काउंट फाउंट सब खत्म
- 18:51मनेजमेंट सब खत्म मोहब्बत हमने माना जिंदगी बर्बाद करती है।
- 18:59ये क्या कम है की मर जाने पर दुनिया याद करती है इसे फायदा समझ
- 19:06लो। यही फैसला है।
- 19:10बस आज पल्टू को दुनिया याद करती है किसी के इश्क में दुनिया
- 19:18लुटाकर हम भी देखें तेरी महफिल में।
- 19:26किस्मत आजमाकर हम भी देखेंगे तो बाबा हम ध्यान करेंगे, हमें फायदा
- 19:38क्या होगा? कुछ फायदा नहीं होगा किसी के इश्क
- 19:45में। जिंदगी लुटाकर हम भी देखेंगे यह
- 19:53जिंदगी लुटाने की साहस हो तो आ जाना यह पेकड़ों की महफिल।
- 20:06यहाँ लूटने लुटाने की बात करो यहाँ नफे नुकसान की बात मत करो ये
- 20:21यहाँ वो पैमाने नहीं डलते यहाँ बुद्धि के वो पैमाने डलते नहीं।
- 20:29यहाँ दिल के जाम पिलाए जाते हैं। ये वो नगमा है जो हर साहस पे गाया
- 20:40नहीं जाता। सो फायदा नुकसान की बात को मत
- 20:45पूछो। फायदा वगैरह तो कुछ होने को नहीं।
- 20:50पहले तो नुकसान की बात और नुकसान ये किसी के इश्क में दुनिया
- 20:57लुटाकर हम भी देखते थे। ये कम फायदा है।
- 21:06ये फायदा कम है। सबसे अभूतपूर्व फायदा बाबा को ₹30
- 21:13दिए थे, कोई अच्छा सा सौदा करके आने इसमें ला भी लाबो और बाबा ने
- 21:23भूखे संतों को 7 दिन से भूखे साधुओं को।
- 21:27पेट भर खाना बना दिया और घर आए। इससे ज्यादा फायदे वाला सौदा कौन
- 21:33सा हो सकता है भला भूखे को खाना करा दिया।
- 21:37इससे फायदा मेरे हृदय को तो बड़ा सुकून है, पर हृदय को सुकून मिल
- 21:44जाए। ये फायदा नहीं है।
- 21:47क्या इसी को तो आप ढूंढ रहे हैं? इसी के चाहत में दरबदर भटक रहे
- 21:55हो। सबसे बड़ा फायदा अगर लेना हो तो
- 22:04हृदय की तृप्ति। सबसे बड़ा फायदा है जब अबे,
- 22:08संतोष, धन सब धन दूध सामान पर तू मैं जीते मुया मैं जीते जी मर गया
- 22:20मर जी बड़ा पर तू मैं जीते मुया। नाम भरोसा पाए देखिए वही बात पहले
- 22:32उसका भरोसा होना जरूरी है। भरोसा करना नहीं, भरोसा हो जाए।
- 22:39परंतु मैं जियते बुआ। नामो भरोसा मैं जीते जी मर गया
- 22:50उसके नाम का भरोसा जैसे ही हुआ मैं जीते जी मर गया मर भी जाओ यही
- 22:59लाभ है कि तुम विदा हो जाओ कृपा करो।
- 23:05तुम ही गड़बड़ हो तुम्हारा गुणा जीस स्तर पर आज तुम विद्यमान हो
- 23:13वही गड़बड़ पैदा करता है। वही दुख का एकमात्र कारण तुम बड़ा
- 23:21शोरगुल करते। तुम बड़ी ऊहो पोहो मचाते हो, बड़ी
- 23:27घमासान की लड़ाई लड़ते हो तुम तुम्हारे अस्तित्व का सवाल जो हो
- 23:32जाता समर्पण के नाम पर तुम समर्पण नहीं करते तुम मात्र झुक जाते हो
- 23:41शरीर से। वेतर कहाँ है जो परेटू में जीते
- 23:52मोवा राम भरोसा पाए, कर्म, धर्म सब छाड़ के सब कर्म छोड़ दिए,
- 24:03पुण्य पाप सब कर्म छोड़ दिए। कर्म छोड़ा और धर्म छोड़ा, देखिये
- 24:10बड़े मज़े की बात है पलटू बात बड़ी उलटी कर कर्म, धर्म सब
- 24:16छांटते धर्म भी छांट दिया, पुण्य पाप भी छोड़ दिया, कोई कर्म भी
- 24:26नहीं। कोई अच्छा भी नहीं, कोई बुरा भी
- 24:28नहीं, कोई शुभ भी नहीं, कोई अशोभ भी नहीं।
- 24:32कोई धरम भी नहीं, कोई सिम्प्रदायिक कोई झंडा डंडा नहीं
- 24:36उठाना है, हमने कोई नारे बाजा नहीं करना है।
- 24:39हमने कोई बहसबाजी नहीं करनी है। हमें क्यों?
- 24:47क्योंकि हमने उसका भरोसा पा लिया। भरोसा हो गया है उसमें पलटू मैं
- 24:58जिय तो मरा, मैं जीते जी मर गया, नाम भरोसा पाए।
- 25:05जैसे ही उसके नाम का भरोसा हुआ जैसे ही उसके अस्तित्व को मैंने
- 25:10देखा नगन आँखों से भरोसा हो ही जाता है करम धर्म सब छांट के बड़े
- 25:20शरण में आए। बड़े शरण में आए कर्म धर्म सब
- 25:29छाड़ के मेरे पास एक केस आया किसी धर्म से गुरु और शिष्य के भीतर
- 25:43बंटी नहीं। अब शिष्य ये कहती कि मुझे इशारे
- 25:49पे मत नचाओ और गुरु के मित्र अकड़ ही इस चीज़ की है कि कोई मेरे
- 25:54इशारों पे न छ। फिर झगड़ा होना स्वभाविक है तो
- 26:02बात मेरे तक आये। तो मुझसे साधिका बोली छोटी शिक्षा
- 26:14कि मैंने 12 वर्ष पहले समर्पण किया और इतने वर्ष हो गए मुझे
- 26:19कष्ट हो से मैंने कहा बस सिया की गलती कर ले।
- 26:25समर्पण पहली बात तो किया नहीं जाता होता है और फिर जब समर्पण हो
- 26:30जाये तो ये जो तुम कहते हो कि 12 वर्ष हो गए, मुझे झगड़ा करते नरक
- 26:37भोंकते जैसे ही समर्पण हुआ स्वर्ग उतर जाता है।
- 26:42नरक विदा हो जाता है तो बतिया समर्पण हूँ अन किया ये बिलकुल ठीक
- 26:52है हूँ अन बड़े शरण में आज बस गिर पड़ते हो शरण में।
- 27:05जैसे ही नाम का भरोसा हो जाता है वैसे ही तुम सरनम इंद्र पड़ते हो।
- 27:14गुरु के फिर तकरार नहीं। कौन करेगा तकरार?
- 27:23जो तकरार करने वाला था वह तो गया विदा हो गया परंतु मैं जीते मूव
- 27:31नाम भरोसा पाए। करम धरम सब छाड़ कोई धर्म कोई
- 27:38व्रत नहीं, कोई उपवास नहीं। कोई बाट नहीं, कोई पूजा नहीं, कोई
- 27:49वंतगी नहीं, कुछ कोई ब्रह्ममूर्त में जागना नहीं, कोई माला फिरने
- 27:59नहीं। कोई कर्म नहीं करना।
- 28:04तुम तो कहते धार्मिक कर्म तो मैं करना ही धार्मिक कर्म ही तो नहीं
- 28:10करना पड़ा। कर्म तो कर्म है और धार्मिक हो
- 28:15चाहे संसारिक हो। बस फर्क इतना पड़ता है कि संसारिक
- 28:23कर्म जो तुम करते हो तो उसमें तुम्हें अहंकार नहीं है, तुम्हारा
- 28:28फर्ज है, दायित्व है, कर्तव्य है, हमारे बच्चों को पालना है, बारनो
- 28:34पोषण करना है। संसारिक कर्म को करते वक्त
- 28:37तुम्हारे भीतर अहंकार मजबूत नहीं होता और बड़े मज़े की बात है।
- 28:42धार्मिक कार्य करते हुए धार्मिक कर्म करते हो, तुम्हारा अहंकार
- 28:48अकड़ जाता है। तुम्हें पता है मैंने आज 11 माह
- 28:53फिर। पता नहीं नमोकार मंत्र की मैंने
- 29:0011 मालाप आज मैं 21 बार पांच से नाम ली, आज मैं उकार का जप 2 घंटे
- 29:10की। गल फाड़ा या जब किया गला फाड़ा
- 29:19क्योंकि जीस ने तुम्हें बताया कि ओंकार की ध्वनि निकालो।
- 29:23वे खुद ही मूव है। उसे पता ही नहीं कि एक ओंकार की
- 29:29ध्वनि तुम्हारे प्राण वस्त है। एक शब्द मेरे प्राण वस्त है, वो
- 29:35शब्द है ओंकार, उसके पास जाना है, सुनना है उसके पास पहुंचना है।
- 29:43झपना नहीं ये अहंकार को बढ़ाने का षड़यंत्र।
- 29:51इसलिए तो तुम पहुँच ही नहीं पाते। दुखी, दुखी से मरे, मरे से गले,
- 29:56गले से सड़े सड़े से संसार में लटके लटके चेहर हैं क्या हो गया
- 30:09है तुम्हें? धार्मिक व्यक्ति तो बड़ा प्रसन्न
- 30:12होना चाहिए। धार्मिक व्यक्ति तो आनंदित होना
- 30:17चाहिए। धार्मिक व्यक्ति तो खुमारी से
- 30:20अग्रसित होना चाहिए और तुम तो दिनपत गड़ते जा रहे हो सड़ते जा
- 30:30रहे हो? जैसे जैसे उम्र बढ़ती है वैसे
- 30:36वैसे तुम्हारे हाथ में लट्ठी आ जाती है चलने के लिए भी और लोगों
- 30:42को पीटने के पीटते भी हो। गुरु से ज्यादा और कौन पीटता?
- 30:51छोटी छोटी बात पे लठिया जला देता परंतु मैं जीवता ना भरोसा पाए
- 31:09कर्म, धर्म सब चांडके बड़े शरण में आए।
- 31:16सब करम छोड़ दिया सब धर्म छोड़ दिया ने कर्म धर्म सब छांट के
- 31:31पड़ा शरण में आए। सरण में गर पड़ोगे सरण में गड़ना
- 31:37पड़ेगा नहीं जैसे ही भरोसा हुआ जैसे ही उन अज्ञात हाथों का दर्शन
- 31:50हुआ जो सारी सृजना को जला रहा है आभास मत्र।
- 31:57दूर से वैसे ही तुम्हारा अहंकार करेगा, फिर तुम तो चाहे स्ट्रेट
- 32:05खड़े रहना, कोई बात नहीं। लेकिन एक चीज़ जो आज तक देरी नहीं
- 32:11थी वो कर जाएगी समर्पण। पर वो है तुम्हारा इल्यूसन
- 32:18तुम्हारा भर्म तुम्हारी अकड़ तुम्हारी बकड़ तुम्हारा अहंकार
- 32:23तुम्हारी एक ये गलती है शरीर ना गिरे गिरे कोई फर्क नहीं अहंकार
- 32:32का घन लाजमी है। यही है जब गिरेगा तो तुम आनंद की
- 32:38खुमारी में डूबोगे पलटू बनिया है। जब तक हिसाब किताब की दुनिया में
- 32:48खोए हो तुम तुम मुझे सुनते हो तो फिर हिसाब किताबें ही लगाते रहते।
- 32:59गिनते रहते अरे 20 मिनट हो गए बाबा वीडियो छोटी सी कंपनी ने
- 33:07दिया करो अरे भाई कौन कहता है पूरे साल जितनी बात ही है सुन लो।
- 33:14बाकी फिर सुन लेना नहीं भी सुनना हो तो चलेगा किसने फांस लगाई कि
- 33:23पूरी ही सुनो मत सुनो तो भी चलेगा।
- 33:28अरे भाई जितनी जितना तुम्हारा मन। मानता है उतनी सुन रोज़ मुझे
- 33:39कमेंट विपरीत कमेंट विपरीत कोई कहता है बाबा 4 घंटे की वीडियो
- 33:49बनाओ तो मजाक। कोई कहता बाबा थोड़ा संक्षेप में
- 33:56सार शब्द में समझा दिया। मैंने कहा भैया सार शब्द मेरे पास
- 34:02तो है नहीं, ये तो जिसके पास कृपा हुई है, भगवान की उसके पास ही
- 34:07होगा। मेरे पास तो ये सार असार शब्द
- 34:11किशन ये उनसे पूछो जिन्हें सार शब्द परमात्मा ने सबसे पहले दिया,
- 34:23मुझे तो सार शब्द का कोई मालूम नहीं।
- 34:27मैं तो सार असार में वेद ही नहीं करता, मैंने दो खोपड़ी ही उसके
- 34:34पास शरणों में रख दी, पर अब सार और असार को समझेगा कौन सार और
- 34:40असार भी तुम्हारी बुद्धि ही पकड़ती तो इस बुद्धि को ये ठिकाने
- 34:45लगा दो। इस बुद्धि को ही उसके चरणों में
- 34:52रख दूँ सर्वधर्माण वृत्तिजमामीकम शरण वृक्ष मेरे शरण में आजा ही
- 35:02अर्जुन सभी धर्मों का अप्रत्याग कर के।
- 35:07ये सार शब्द की बात मत पूछो जिसने सार की बात पूछी, इसका मतलब असार
- 35:18भी कुछ है, लेकिन वो भूल जाता है जब व्यक्ति अपने अंतरिम अंत।
- 35:26तंत्रिम तलों पे पहुंचता है तो सार तो खोता ही है, असार तो खोता
- 35:33ही है, सार भी हो जाता है। कैसा सार एक ही है, न सार है, न
- 35:42असार है, और कहो के सार भी है और असार भी।
- 35:46कुछ भी हो क्यों पकड़े बैठू सारस हम तुम शब्द में कुछ भी नहीं ना
- 35:56सार ना असार बस जिसे तुम तराश रहे हो।
- 36:04जो हुंकार का नाद तुम गले से निकाल रहे हो ये कोई जगह है ये
- 36:10सनातन की तरह जैसे तुम कहते हो कुलक्षेत्री बुझाओ सीज़न में कलम
- 36:15बजाओ से कभी किसी बच्चे का जन्म हुआ ब्राह्मण मुख सीज़न में?
- 36:25हद हो गई। इतनी नॉनसेंटिफिक बात हम इतने
- 36:28हजारों सालों से मान रहे हैं और बनिया जांघों से बना जांघे हुए
- 36:45बच्चे उत्पन्न करते हैं और शूद्र पांव से जन्म।
- 36:50कभी पांव से बच्चा जन्म देखा है, कभी किसी ने, कभी किसी ने जीवन
- 36:55में ऐसा देखा है कि किसी के पांव बच्चा पैदा कर रहे हैं।
- 37:00बच्चा तो जहाँ से पैदा होता है, वहीं से पैदा होता है।
- 37:13हमारे हरियाणा में कहावत है इस बहू और शस्त्र में झगड़ा हो गया।
- 37:21बहुत बड़ी सी वॉचाल थी वॉचाल ज्यादा बोला करती थी किसी भी बात
- 37:30तो गुस्सा खा गए। बोली ससुर जी, बात सुन तो हमारे
- 37:35सिर के ऊपर मूत होगी हमारे सिर के ऊपर पेशाब तो ससुर कहने लगा बेटी
- 37:44मूतेगी तो जहाँ मूतेगी अपनी जुबान जरूर खराब कर ली तुने।
- 37:55हरयाणवी लोगों का आपको पता है, वो तो भगवान के प्रार्थना भी करते
- 38:02हैं तो ऐसा लगता है जैसे गाली निकालते हैं।
- 38:07रे भगवान रे तेरी माया गा कोनी रे पट्या रे बेरा रे पर राजा ने
- 38:19कंगाल बना दे निरधन नै? अरे, भगवानू रे तेरी माया को हैं,
- 38:33आती है न झलक थोड़ी थोड़ी झलक आती है।
- 38:36एक गाली ने गाली गाते कभी बच्चा दिखा पांव से फिर कितने ऊर्जा में
- 38:44जी रहे हैं हम? ये मन्नू ये महाराज नहीं कमालखत
- 38:50सब शरारत उसके ये जितना पाखंड खिलारा और फिर उसके भक्त तो हुए
- 38:57हम बिलकुल ही कमालखत भक्त तो तह तह के आप।
- 39:05और सनातन धर्म का प्रचार कर रहे हैं और ऐसे धर्म को तुम धर्म कहते
- 39:23हो। सारे विश्व में फैलाएंगे ऐसा
- 39:26धर्म। तो विश्व में फैलाओगे कि विश्व को
- 39:32मारोगे? ऐसे जहरीले मार्गदर्शन, ऐसे
- 39:41जहरीले तथ्य तुम सारी दुनिया में बिखेरोगे सारी दुनिया को विकृत
- 39:49करोगे? ये सनातन है और मुझे कहते हैं आप
- 39:52सनातन के विरोध में क्यों बोलते हो?
- 39:56जिनके विरोध में मैं बोलता हूँ, उनके विरोध में भी बोले योग्य
- 40:00कहाँ है? वो उनके विरोध में बोलकर भी गंदगी
- 40:05में हाथ मारकर अपने ही हाथ गंदे करता हूँ।
- 40:11तुम्हें पसंद जिसे तुम आज सनातन कहते हो वो आदि सनातन नहीं वो तो
- 40:19तुमने कब कब बिदा का? आज तो प्रखंड से युक्त धारण मातृ
- 40:25ब्रह्म कल्पनाएं। या कुछ बचा इसे तुम सनातन करके
- 40:35तुम में कोई ऑथेंटिसिटी है नहीं तो पलटू, पलटू उनका नाम नहीं था।
- 40:51और पर तू एक बड़ी सुंदर बात कहते हैं, पल्टू उनका नाम बड़ा प्यार
- 40:59है, पल्टू नाम इस बात को उंगेद करता है कि तुम्हें कहीं जाना
- 41:06नहीं। नो नीड टु गो एनीव्हेर कहीं भी
- 41:14जाने की जरूरत नहीं, कहीं जाना नहीं है, कुछ घटना नहीं पलट जाना
- 41:22है यानी जीस तरफ थी पीठ उस तरफ कर लेना है मुँह।
- 41:30और जीस तरफ था मुख उस तरफ कर लेनी है पेट बस पलटी मार दे।
- 41:36जैसे ही राजनीतिज्ञ लोगों पलटी मार जाते हैं, गंगा स्नान कर देते
- 41:41हैं, पलटी मार जाते हैं। हमारे यहाँ पर एक राजनीतिज्ञ है।
- 41:50उनके पास कई रंगों की पगियां थीं। पगड़ियां तो गांव लेसी थी।
- 42:00फिर लोग बड़े होशियार होते हैं। कौन सा जहाज जो डूब रहा है?
- 42:05इनके पास बड़े सुंदर पैमाने होते हैं?
- 42:10तो पता लगा कि अकाली पार्टी का बड़ा ज़ोर है।
- 42:14अब आने वाले वक्त में तो अकाली पार्टी है।
- 42:16आज रात को सोए, घर गए सफेद पगड़ी हमने देखी हमारे पड़ोस क्रीम भी
- 42:24रहते थे सफेद पगड़ी। वो सुबह जब घर से नहा धो के उतरे
- 42:32तो नीली पगड़ी बांध रख तुमने पूछा क्या हुआ भाई मैं तो कर ली हो?
- 42:44गो। अब कान किसी से काली होने में
- 42:51कितना का फर्क लगता है पगली ही तो बदलनी है।
- 42:54रंग ही तो बदलना है, रंगों का ही तो झगड़ा है।
- 43:02तुम्हारी सारी राजनीति रंगों के ऊपर चले तो तुम ज़रा भी आंख बोल
- 43:10के नहीं देखते कि हम कर क्या रहे हैं?
- 43:19कहाँ जा रहा है तू है जाने वाले कहाँ जा रहा है तू है?
- 43:37जाने वाले अँधेरा है, मन्नू का दिया तो जनाले का जारा है तू है?
- 43:57जाने वाले अधेरा है, मन का दिया तो जना ले कहाँ जा रहा है?
- 44:16कुछ पतन अँधेरी रातें हैं, काली माँ से ग्रस्त आज तो चाँद भी नहीं
- 44:24निकला है अमावस्या की घनी रात दिखता नहीं है, लेकिन हम चले जा।
- 44:37पता नहीं कहा जा रहा है कोई साथी भी नहीं, कोई मंजिल भी नहीं, कोई
- 44:45रास्ता भी पता नहीं हमें क्या चाहिए हम मैं खुद ये नहीं मालूम
- 44:53है ना? तो कबीर ने कहा एक अजूबा हमने
- 44:57देखा जल में रह के मीन है, प्यार से ये अजूबा है, अभी कल ही मुझे
- 45:06प्रश्न आया के समुद्र में गोता लगाता हूँ, मैं सूखा निकलता हूँ
- 45:11बस यही बात कबीर ने कही। एक अजूबा हमने देखा, जल में रह गए
- 45:19मीन ए प्यासी तो पलटू पलट गए। पलटू कहते हैं कोई कुछ नहीं कर
- 45:31कर्म, धर्म सब चो। कर्म, धर्म सब छोड़ के पड़े शरण
- 45:40में आठ जैसे ही उसके नाम का भरोसा हो गया उसकी एक झलक देख ली तो ये
- 45:51कर्म ये धर्म। ये कॉमेंडमेंट्स ऐसा करो, ऐसा न
- 45:57करो, ऐसा करो, ऐसा न करो, सब भूल जाओ।
- 46:06ये ऐसा पैमाना है जो आपके होश को छीन लेता है।
- 46:12जो आपको मतघोषित ये ऐसा पैमाना है ऐसा ज़म है जो आपका होश खींच
- 46:22लेगी। पढ़ाई शरण में आठ शरण में पड़
- 46:28जाते हो, घर जाते हो। उसे ही समर्पण कर माँ बेकम शरणं
- 46:39ब्रज मुझे एक ही शरण में आज सर्वतरमानु प्रतिज लेकिन तुम 1000
- 46:49बार रिपीट करते हो। रेपेटिशन के कारण तुम पागल हो
- 46:53जाते, तुम्हें पता ही नहीं कि इस रेपेटिशन ने तुम्हें कितना
- 47:00नुकसान? आज तुम जो हो मात्र एक रेपेटिशन
- 47:09के कारण। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि जीस बात
- 47:18को तुम हृदय के अंतर्म से स्वीकार कर लेते हो, वह मूर्त रूप ले लेता
- 47:24है। मैंने कहानी सुनाई थी।
- 47:34सुखना झील के ऊपर कपल के जाने की वापस आए तो किरली छिपकली उबली
- 47:41पड़ी थी। चाय पी के गए थे, कुछ नहीं हुआ 3
- 47:44घंटे तक। लेकिन जैसे ही मन ने स्वीकार किया
- 47:48कि हाय जी छिपकली पे गए। अब तो मरना निश्चित है।
- 47:51दोनों मर गए तुम्हारा मन जीसको पूरे समर्पण भाव से समग्र भाव से
- 47:58स्वीकार कर लेता है। वह मूर्त रूप धारण कर लेता है,
- 48:03लेकिन तुम्हें बार बार समझा रहा हूँ कि यह नियम मन के लिए है मन
- 48:09के लिए है। इसको आत्मा का नियम मत मान लेना
- 48:14लेकिन बहुत से मूर्व इस नियम को आत्मा को पालने का नियम मान लेते
- 48:23है। शिव हम शिवम्।
- 48:28जिसे शस्त्र काटे, नागनी जलाये, इसलिए हम गला हुए।
- 48:33हमने इस नियम को आत्मा के ऊपर अप्लाई कर लिया।
- 48:37नियम था साइकोलॉजिकल मानसिक मनुष्य और शरीफ ये दोनों एक ही
- 48:48धागे के दो छौब। मान शरीर का सुख समरूप और शरीर मन
- 48:55का स्थूर दो धागे के दो छोर लगते हैं दो दो हैंड एक।
- 49:08और जीस चीज़ को आप हृदय से स्वीकार कर लेते हो वो अंतर्धम से
- 49:14बस उससे तो मुक्त नहीं हो पाते जल्दी जल्दी ये बड़ी खतरनाक।
- 49:25इसलिए मैं कहता हूँ किसी को भी सुनियो किसी को भी सुन वो गीता
- 49:31हो, कुरान हो, प्राण हो, बाइबल हो, ग्रन्थ हो, किसी को भी सुनो
- 49:37लेकिन ध्यान से इतना मत सुन लेना। के हृदय के भीतर शब्द ही रह जाए।
- 49:48फिर तुम्हारा हृदय तो परिवर्तित हो जाएगा, फिर तुम्हारी बुद्धि तो
- 49:53प्रवर्तित हो जाएगी, लेकिन इस बात का भी ध्यान रखो कि आप उस तट पर
- 50:00नहीं पहुँच पाओगे जहाँ पहुंचना चाहते हो।
- 50:04हृदय परिवर्तित हो जाएगा, सोच बदल जाएगी, मान्यताएँ बदल जाएंगी,
- 50:10विश्वास बदल जाएंगी, श्रद्धाएं बदल जाएंगी, लेकिन उस स्तर पर आप
- 50:14नहीं पहुँच पाओगे। जीस स्तर पर जाकर आपको सुकून
- 50:18मिलता है। यह साइकोलॉजिकल व्यवस्थाएँ हैं।
- 50:24यह साइकोलॉजिकल नियमें और मन के ऊपर और शरीर के ऊपर प्रभावी हैं,
- 50:31लेकिन आत्मा के ऊपर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
- 50:34आत्मा के ऊपर तो तुम्हारी मान्यताओं का प्रभाव कैसे बढ़ेगा,
- 50:38जिसके ऊपर शस्त्र का प्रभाव नहीं पड़ता?
- 50:42नैनम चदंती शस्त्रण जिसके ऊपर आग का प्रभाव नहीं पड़ता नैनम धरती
- 50:49पांव का न चैनम केले दंते पानी से घराने।
- 50:58पानी की पहुँच नहीं हुआ। कितनी ही बार बार आ जाए नसुसतिमा
- 51:03रुतहा हवा उससे सुखा ही नहीं सकती।
- 51:09वो ऐसा तत्व है यह तुम्हारी सभी मान्यताएँ धारणाएं जब बहुत गहरी।
- 51:18चली जाती हैं। इसीलिए तो आप इतने इलूशन में फंसे
- 51:21हो, फिर तुम कहते हो वह वह मैं दुखी हूँ क्रिया योगी बहुत करता
- 51:26हूँ, ध्यान भी बहुत करता हूँ अपने आपको जोड़ देता हूँ बिल्कुल छोड़
- 51:31देता हूँ लेकिन क्या करूँ? अनंत अनंत जन्मों की ये संस्कार
- 51:44जो तुमने मानो क्या मानो मैं शरीर हूँ अहे ब्रह्मस्मण यदि मान सकते
- 51:56हो। लेकिन अभी तो तुमने माना कि मैं
- 51:59शरीर हूँ क्योंकि शरीर को तुम जानते हो ब्रह्म को तो तुम जानते
- 52:03हो, मैं मन हूँ क्योंकि मन को तो तुम जानते हो सारे दिन परेशान
- 52:09करता है तुम्हें मन मन से ज्यादा तुम किस को जानते हो ज़रा सी चोट
- 52:16लग जाए। और तुम रुख्त हो जाती है।
- 52:2020 साल पहले तुमने मुझे यह बात कही थी।
- 52:22एक छोटी सी बात के लिए महाभारत हो जाता है।
- 52:27द्रौपदी ने कह दिया दुर्घटना के अंधों के अंधे ही पैदा होते हैं
- 52:33और बात लड़ गई अहंकारिक व्यक्ति के बात लड़ जाती।
- 52:39समझे नहीं अंकारी व्यक्ति का अगर अस्तित्व देखना हो अंकारी व्यक्ति
- 52:46की अगर पहचान करनी हो लक्षण देखना हो तो मेरी इस बात को आप नोट कर
- 52:51लेना। अंकारी व्यक्ति का लक्षण होगा कि
- 52:55वह आपके शब्दों से प्रभावित होगा। अरे तुमने कोई ऐसी बात कह दी?
- 53:05वह आपके शब्दों से टूटेगा क्योंकि वही शब्द है वह अभी दिमाग में
- 53:12उलझा हुआ है, वह अभी गणना कर रहा है।
- 53:17फिर गाना चाहे पैसे की करो, इतने के मालिक हो गए, चाहे वोटों की
- 53:22करो, चाहे जमीन जायदाद की करो चाहे दोस्तों की करो।
- 53:31गण न चाहे किसी भी चीज़ कुक्की करो, तुम बनिए ही हो और पल्टू
- 53:37कहता है मैं बनिया अरे वो अभदित्य बीच?
- 53:56अब बनी इसे पलटना है, हृदयस्त होना है और हृदय से आगे चलना है
- 54:03आत्मस्तु होना है। अब ये दो पड़ाव हैं बुद्धि से
- 54:14हृदय की ओर। हृदय से अस्तित्व की ओर पहले तो
- 54:21इस गणना को बंद कर इस कैलकुलेशन को ड्राफ्ट कर बहुत बार मैं कहता
- 54:33हूँ अलग अलग ढंगो से इस गुती को छोड़।
- 54:37क्योंकि ये गणना करती है मैंने पांच माला जपवी मैंने 10 माला जब
- 54:43कि तुम माला ही छोड़ दो, तुम जपना ही छोड़ दो काहे जपते हो किसको
- 54:54जपते हो उसका उधार चुकाने के लिए? उसने जो दांत दी है उसकी कीमत है
- 55:06यह स्वास्थ्य, यह ऑक्सीजन जो तुम ले रहे हो इसकी वना कीमत क्या है?
- 55:11मतलब है, लेकिन तुमने इसकी कीमत तय कर ली है।
- 55:18इसकी कीमत है कोई। तुम गणनाएँ करते हो, इसलिए तुम
- 55:30पहुँच नहीं पाते और जो दुखी है वह तुम्हारी गणना करने वाली बुद्धि
- 55:37ही है। इसलिए इस गली सनी बुद्धि को छोड़
- 55:42दो। जो दुखित होता है, वह तुम नहीं
- 55:50इसको आग नहीं छू पाती, जीसको शस्त्र नहीं काट पाता, उसको आग की
- 55:58चिंता कैसे जलाई? आग नहीं जलाती, तुम्हारी चिंता
- 56:03कैसे जलाएगी बोलो नहीं जलेगी वो तुम्हारी चिंता से तुम्हारी
- 56:09बुद्धि जलेगी, तुम्हारा खून जलेगा, तुम्हारा मन जलेगा,
- 56:16तुम्हारे शरीर जलेगा। आग सभी को जला देगी, तुम्हें नहीं
- 56:21जला पाएगा, तुम तक तो पहुँच ही नहीं पाएगा।
- 56:25तुमसे बहुत दूर तक उसका शफीर खत्म हो जाता है और जहाँ से परमात्मा
- 56:33का शफीर शुरू होता है, उसकी परिधि जहाँ से शुरू होती है।
- 56:37वहाँ तक आग की चिंताओं की लपट वहाँ तक तो पहुँच भी नहीं पाती
- 56:44बहुत दूर छिटक जाती है, इसलिए कोई चिंता तुम तक नहीं पहुँच सकती कोई
- 56:52आग तुम तक नहीं पहुँच पाती। कोई चेता तुम तक नहीं पहुँच पाती,
- 56:57कोई चिंता तुम तक नहीं पहुँच पाती और तुम फिक्र करते रहते तो पलटू
- 57:08कहते हैं कि इस आग में मत जल चिंता करना छोड़ दे।
- 57:15चिंता का ही मैंने देखा मुझ तक आग का शेक नहीं पहुंचता।
- 57:27आग की ऊष्णता, आग की गर्माहट मुझे छू तक भी नहीं पाती।
- 57:35पर तू कहते मैं पर मैं हूँ पर तू बाणिया अवध के बीच।
- 57:55पलट जाओ सीधा सा सूत्र कहीं जाना नहीं, कुछ करना नहीं जीस तरफ मुख
- 58:05है उस तरफ पीठ कर लो, जीस तरफ पीठ है उस तरफ मुख कर लो सीधा सा
- 58:13सूत्र। रबदा की कोना उतरो, पठ न एम्
- 58:18दर्जा, जिधर पीठ है उधर मुखड़ा कर लो जिधर मुखड़ा है, उधर पीठ कर
- 58:26लो, बस इतनी सी तो बात तुम दुखी ही इस लिए हो।
- 58:33कि तुमने उस स्पर्म सुख की तरफ आंख उठाकर देखा तुमने उस आनंद की
- 58:47तरफ झांक के? तुमने वो उस जाम की एक बूंद भी
- 58:53कवि छखी ने यही तुम्हारा दुर्भाग्य है इसलिए होश में आओ
- 59:05ज्यादा बीती थोड़ी रही अब जाग जाओ बहुत भी छुप।
- 59:13इससे पहले भी बहुत जन्म भी चुक है बहुत जन्म बिछड़े मेरे माथे ए
- 59:21जन्म तुम्हारे लेख अब जितनी भी बची खुची है जब भी जाग जाओ भला है
- 59:31वो ही लगा दो। और लगाना भी क्या है?
- 59:37बदलाहट होते कोई वक्त नहीं लगता ये समझ लेना बात सदना।
- 59:47कसाई को कितना वक्त लगा अनिका गणिका को कितना वक्त?
- 59:52बस इतना ही वक्त लगता है। जीस तरफ पीठ थी, मुख कर लिया और
- 59:58जीस तरफ मुख था पीठ कर ली। अब आप देख लेना कि इसमें कितना
- 1:00:02भक्त है इसलिए शांत कहते हैं कि पल छिन्न मैं तो भी।
- 1:00:11साधु से साधु हो सकते हो, तुम भी दुख से सुख तक पहुँच सकता हो।
- 1:00:23दुख दो सोपन देख रहे हो बस आँख ही तो खोल ली दुख दो सोपन समाप्त हो
- 1:00:30जाएगा आँखें खोल जाग जाओ। धन्यवाद।