Latest / Baba ji Vijay Vats / 19 May 26 - ध्यान करना छोड़ो… तभी असली ध्यान घटेगा | तीसरी आंख, विपश्यना और एकाग्रता के खतरे
Transcript
- 0:21बाबा जी जन्मस्पर्श कृपया बताएं कि एकाग्रता के संशकार से कैसे
- 0:36छुटकारा पाया जाए? मेरा ध्यान बार बार दोनों आँखों
- 0:44के बीच और नाक की धरती पर लग जाता है ये कॉन्सेंट्रेशन का प्रभाव।
- 0:57पूरे दिन रहता है। कभी कभी प्रॉब्लम इतनी बढ़ जाती
- 1:02है कि नींद में जाना भी मुश्किल हो जाता है।
- 1:10ना ध्यान हो पाता ना ठीक से और नींद भी।
- 1:16गायब हो जाती है। मैंने सब कुछ तय किया
- 1:22कॉन्सेंट्रेशन को हटाने का लेकिन प्रॉब्लम सॉल्व नहीं हो रही?
- 1:31मुझे पता है बाबा जी आपने बताया। कि कॉन्सेंट्रेशन नहीं करना चाहिए
- 1:40वो ध्यान नहीं होता, लेकिन मेरी ये प्रॉब्लम कर्म करते हुए साक्षी
- 1:49भाव को साधने की वजह से हुई। गलती से मुझसे कॉन्सेंट्रेशन का
- 1:58अभ्यास हो गया, कृपया मार्गदर्शन की जप्रभु जनस वर्ष गुरुदेव जी
- 2:08सुमित कुमार दिल्ली से। आधुनिक मनोविज्ञान के हिसाब से
- 2:26देखें सेगमेंट फ्राइड के हिसाब से तो मन के पांच ही तल होते हैं।
- 2:38प्राचीन दृश्यों के हिसाब से देखें तो मन के चार कल होते हैं।
- 2:51मैं ये क्यों कह रहा हूँ? इसीलिए के मुझे आपको समझाना है
- 2:59कन्वर्सेशन के लिए। कृष्ण को भी आपकी भाषा बोलनी
- 3:05पड़ती है। यद्यपि कृष्ण ने ये भाषा खुद
- 3:10द्वजपे नहीं किया लेकिन कृष्ण जब अर्जुन को समझाते हैं।
- 3:18तो वह ऋषियों के द्वारा बनाई गई लैंगुएज का इस्तेमाल करते हैं।
- 3:30लेकिन उनका मतलब होता है आपको समझाने का।
- 3:34अब ये भाषा मैंने तो ईजाद नहीं की है।
- 3:39ये भाषा आपने आपके पुर खोये। किसी ने ईजाद किया तो मुझे इसी
- 3:47भाषा का इस्तेमाल करना क्योंकि मुझे आपको समझाना सिगमेंट फ्राइड
- 3:59करना मैं इसलिए देखता हूँ। कि आज मनोविज्ञान का मसीहा वह
- 4:10कहता है। चेतन चेतन मन और उसके बाद अचेतन
- 4:17को उसने दो भाग में विभक्त कर दिया।
- 4:23अभिचेतन सबकॉन्शियस माइंड और अचेतन अनकॉन्शियस माइंड उसके बाद
- 4:33कोलेक्टिव अनकॉन्शियस माइंड। ध्यान रखना ये चार मन आपके स्वयं
- 4:43के होते हैं। इनमें कोई दाखिल अंदाजी नहीं कर
- 4:47सकता। एक पांचवा मन होता है वह किसी का
- 4:54नीच ही नहीं होता, वह सबका सामूहिक होता है।
- 4:58वह सामूहिक चेतनमन कोलेक्टिव कॉन्शसनेस माइंड वह परम चेतन जो
- 5:15आपका अंतिम लक्ष्य है। वहाँ जाकर आपको तृप्ति मिलेंगे तो
- 5:28तुम्हारा प्रश्न मैं वैसे पहले बोल चुका हूँ और मैंने वक्त वह
- 5:35वक्त कहा भी है कि विपश्यना ध्यान में खतरे।
- 5:49खतरे मरने के नहीं, मरने से बड़े खतरे भी होते हैं जैसे पागल हो
- 5:59जाना मरने से बड़ा खतरा है। जैसे रात को नींद ना हो।
- 6:07मेरे पास बहुत से ऐसे पेशेंस रहते हैं।
- 6:10बाबा नींद नहीं आती और अगर ठीक से जांच पड़ताल करें तो इस भौतिक
- 6:26संसार में आज के संसार में। नींद से बड़ा परमात्मा का
- 6:32पुरस्कार और कोई भी नहीं तुम बिछू नहीं ले सकते हो तुम स्वादिष्ट
- 6:443600 प्रकार के भोजन खरीद सकते हो भूख।
- 6:51नींद परमात्मा का आशीर्वाद है। नींद गई तो सब गया और बड़ी से
- 7:02बड़ा खतरा बुध के। यही है नींद मेरे पास से केस पहले
- 7:15किया है। उनमें से दो व्यक्ति का भी उनका
- 7:22इलाज ठीक से नहीं हो सका। तुम घबराहट।
- 7:32बस मैं तुम्हें रोकना चाहता हूँ विपश्य न करने के लिए थोड़ी समझा
- 7:40होने की जरूरत है। आजकल विपश्यना किश्वर लगते हैं।
- 7:47तो वश ही ऐसी पीढ़ी उसको आप जितनी हो सके फैला दिया करो क्योंकि ऋषि
- 7:55भी कहता है तमसो मा ज्योतिर्गा मैं अंधकार से प्रकाश की ओर ले।
- 8:07जो विद्या हमें अंधकार में धकेलती है, उसको रिमूव अगर तुम करते हो
- 8:14तो तुम पुण्य के पात्र हो। इसलिए मैं कहता हूँ ऐसे वीडियो को
- 8:24अपने मित्रों में, दोस्तों में चाहे वो माने या ना माने।
- 8:31ये उनकी इच्छा है, तुम अपना दायित्व निभा दिया करो, मैंने
- 8:39देखा आज बहुत से शिविर लगते हैं। बी प्रश्न।
- 8:47बहुत से शोर रखते हैं। निद्रा योग निद्रा ये आपको गुलाम
- 8:53बनाने का एक ढंग है। योग निद्रा में आपको हिप्नोटाइज़
- 8:59किया जाता है और हिप्नोटाइज़ में तुम आदेश मानने के अभ्यस्त हो
- 9:06जाते हैं। फिर तुम्हारी ज़िन्दगी स्वय की
- 9:12ज़िन्दगी नहीं रहती पर के आदेशों के ऊपर वह ज़िन्दगी तुम जीते हो।
- 9:18सारी उम्र तानाशाहों का यही मतलब था।
- 9:25आपकी जिंदगी को अपने कंट्रोल में ले लेना तानाशाह कहता है।
- 9:30बैठ जाओ, तुम बैठ जाते हो, उठ जाओ, उठ जाते हो तानाशाह जो कहता
- 9:37है आप करते हो इसलिए मैं ऐसे लोगों को मंदबुद्धि कहता।
- 9:44जो तानाशाहों की बातों को मानी बगैर स्वय की परीक्षा किया।
- 9:52ये एक न 1 दिन पागलों में को है। विपश्यना के शिविर में नहीं लगते
- 10:03दिखे। और मज़े की बात है।
- 10:05हम पागल होने के लिए निर्देश होने के लिए उन्हें धन भी देते हैं कि
- 10:15ये लोग शिविर में हमारा भी नाम लिख लो, हमें भी पागलो।
- 10:25हम ठेकों पे जा के शराब खरीदते हैं, पैसे और पता है।
- 10:31शराब से हमारा बहुमूल्य गुर्दा खराब होता है, जेवर खराब होता है,
- 10:37पैंक्रियास खराब होता है, भीतर के तत्व खराब होते हैं।
- 10:40लेकिन अपेक्षा दी की बिमारी घर लेके आती है, खरीदना ही है तो
- 10:55ध्यान खरीदो और ध्यान सिखाने वाला व्यक्ति आपसे कीमत नहीं।
- 11:05नहीं वसूलेगा। नहीं इच्छा रखेगा, क्योंकि ध्यान
- 11:11का मतलब ही है सभी प्रकार की वासनाओं का खोजन जिसकी वासना खो
- 11:19गई, वहीं आपको ध्यान से खाने में। योग्य हो सके।
- 11:34अब तुम्हारी क्या समस्या है? पुत्र के तुमने कॉन्सेंट्रेशन
- 11:39किया बहुत से धारण तीसरे नेत्र को जगाने के लिए।
- 11:45कॉन्सेंट्रेशन का प्रयोग करते हैं।
- 11:47खासतौर से बिकने वाले यहाँ कुछ ऐसा नहीं है जो आप ध्यान करोगे और
- 12:02आपका तीसरा नेत्र जग जाएगा। नो इट्स ए रॉन्ग वे।
- 12:11तीसरा नेत्र स्वयं में विज्ञता है, कुंडली के जागरण से वह
- 12:17अपरीसीम शक्ति जब कुंडली से उठकर सुसुमना के मध्य में से गुजर के।
- 12:26सब चक्करों को पार करती हूँ। वे तीसरे नेत्र के चक्र पर
- 12:30पहुँचती हैं तो तीसरा नेत्र जागृत हो जाता है।
- 12:36यह सही परंपरा बिना किसी एफर्ट के इसलिए मैं तुम्हें से दे देता
- 12:44हूँ। की समाधि एफर्टलेसनेस की समाधि
- 12:50सहज समाधि भली रे साधो, सहज समाधि भली तुम प्रयास मत करना, तुम तो
- 13:01प्रयास करते हो यह बिल्कुल उल्टा। वे है जैसे गाड़ी को तुम बैठ कर
- 13:11बैठ फिर जहाँ पहुंचे हो वहाँ से तुम बेक होना शुरू हो जाओगे और
- 13:19आखिर में तुम अपने घर तक ही पहुंचाओगे जहाँ जाना था वहाँ नहीं
- 13:24पहुंचोगे। अगर तुमने कॉन्सेंट्रेशन की बहुत
- 13:37से लोग मूलाधार, मणिपुर, स्वाधिष्ठान, अनाहत, विशुद्ध।
- 13:51और ऐसे ही आज्ञाचकर पर ध्यान करते हैं।
- 13:55बहुत से लोग तो सहस्रार पर भी ध्यान करते हैं।
- 14:01ये उनकी स्वय निर्मित प्रयोग हैं। किसने बताये?
- 14:10और अगर किसी ने बताया तो वह बताने वाला मूड होगा, वह खुद गया नहीं
- 14:19होगा, मार्ग उससे पूछो जिसने मार्ग तय करके मंजिल पाली वह आपको
- 14:28सटीक मार्ग बता सकेगा। अन्यथा दूसरा व्यक्ति नहीं तुमने
- 14:38कहा सद गया कार्य करते हुए साक्षी रहने का अभ्यास।
- 14:50कृत करते मेरा ध्यान तीसरे नेत्र पर ही चला जाता है।
- 14:58यह नाक की हड्डी पे चला जाता है। इस ध्यान करने में यू विल लूज़
- 15:13यूर एनर्जी इसको आप एक मूर्त मंत्र बना लो।
- 15:23जीस विधि से तुम शक्ति को खोते हो।
- 15:31वह आपको ध्यान में नहीं ले के जाता जीस शक्ति से तुम जीस विद्या
- 15:47से तुम शक्ति को संग्रहित करते हो जोड़तें हो वह आपको ध्यान में ले
- 15:53जायेगा। इसलिए ऋषियों ने सुबह भ्रम
- 15:59मुहूर्त में सारी रात तुम सोए तुमने शक्ति को इकट्ठा किया तो
- 16:06ऋषि कहते हैं सुबह भ्रम मुहूर्त का लाभ उठा लेना कहा तो ठीक था।
- 16:15लेकिन इन पंडितों ने बीच में आके गोल गोल कर दिया।
- 16:18वो कहते हैं कि 3:00 बज कर 40। ये ज्यादा समझदार व्यक्तियों ने
- 16:27काम खराब किया है। तुम जब जब तुम्हारी नींद पूरी हो
- 16:41जाए और ध्यान रखना सोते से तुम्हारी आँख खुलेगी।
- 16:48जब घड़ा भर जाता है तो छलकने लगता है या उसकी निशान?
- 16:59जब तुम्हारी नींद पूरी हो गयी तो तुम्हारी आंखें पट से हो जाएगी।
- 17:08यह प्रकृति का दिया हुआ ऑटोमैटिक व्यवस्था है।
- 17:16तुम्हें अलार्म लगा के जगना पड़े या किसी को कह के जगना पड़े तो
- 17:21तुम्हारी नींद पूरी नहीं हुई? किसी आवश्यक कारण से जाना हो वो
- 17:28बात अलग है अन्यथा रोज़मर्रा की जिंदगी में तुम अपनी नींद खराब
- 17:34नहीं कर। नींद गई तो समझो सब कुछ गया।
- 17:45आज बहुत से लोग हैं ऐसे जो अपने अंत में नहीं गए, जो कहते हैं 2
- 17:50घंटे में मैं आपकी नींद पूरी कर दूंगा।
- 17:53और बहुत से लोग तो ऐसे जो कहते हैं, सो ही मत।
- 18:03ऋषि भी कहते हैं। वैज्ञानिक भी कहते हैं अगर कोई
- 18:06व्यक्ति 9-13 दिन तक लगातार जागता रहे, वह पागल हो जाएगा।
- 18:16दिमाग के तंत्रों को रस्त जाता है और वह नींद के अलावा कोई और विधि
- 18:23नहीं दे सकती। तुम्हें सो मत अगर तुम सदा ही
- 18:39ध्यान में रहते हो तो सो मत। फिर चलेगा क्योंकि सोने में तुम
- 18:47जीस केंद्र पे पहुँच जाते हो, ध्यान में भी तुम उसी केंद्र में
- 18:52पहुँच सकते हो, हर क्षण तुम अपने आप को तरोताजा।
- 19:03लेकिन मैं बहुधा अपने अंतस के पास रहता हूँ, लेकिन जब मैं बोलता
- 19:17हूँ। मैं अपनी शक्ति को गवाता हूँ,
- 19:22मुझे नीती की आवश्यकता है, आखिर मैं बोलूं ना तो मुझे नीती की कोई
- 19:36आवश्यकता है और यही कहा है कृष्ण। जब तुम्हारा सारा संसार सो जाता,
- 19:49उस घड़ी मेरा योगी जाता है। उसे नींद की कोई जरूरत नहीं
- 19:56क्योंकि ध्यान 1000 गुणा नींद से ज्यादा प्रभावी है।
- 20:05वह मस्ती का अर्थ तुम्हें इतना ज्यादा तरोसाया भर जाता है की
- 20:16नींद उतनी तरोसा जानी चाहिए। इसलिए संत के आस पास हमने।
- 20:22एक चक्र बना दिया स्वेक रंग का। उसका मतलब कुल मतलब इतना ही था कि
- 20:29वह इतना एनलजेटिक हो गया कि उसका न्यूरॉन्स तो भर गया और उसका
- 20:36न्यूरॉन्स बिखेरने लगा उस ताजगी को।
- 20:40संत के करीबाकर अगर तुम ताज़गी के झोंके महसूस करते हो तो इसमें कोई
- 20:50इल्यूश़न नहीं है। येस सत्य?
- 21:01क्योंकि इसका सारा गागर भर गया है और गागर भरने के बाद ऊपर से
- 21:09लगातार गगन मंडल से जल रहा है। वह बिखरेगा, उसके करीब जो भी आएगा
- 21:19वह उसको पी लेगा। इसलिए संत के करीब रहने वाला
- 21:26व्यक्ति थोड़ा सा करके ही पहुँच जाएगा क्योंकि उसने इतना अमृत पी
- 21:36लिया है। कि उसे ज्यादा प्रयास करने की
- 21:43आवश्यकता नहीं। वह पहुंचा कि पहुंचा
- 21:54कॉन्सेंट्रेशन सद गई या तुमने साथ ही देखिये।
- 22:03जिसे मैं संस्कार कहता हूँ पहली बार आप सिगरेट पीते हो, सिगरेट का
- 22:11धुआं भीतर लेके जाता हूँ, फिर उसे बाहर निकलता हूँ यह बाहर भीतर
- 22:20बाहर भीतर यह क्या? इनहेलिंग ये तो जभावी का फिक्र है
- 22:26सांस के, लेकिन निकोटीन का भीतर जाना, निकोटीन का बाहर आना यह तो
- 22:34प्राकृतिक व्यवस्था नहीं है, लेकिन तुम पहली दफ़ है।
- 22:42सिगरेट पीते हो तो अभ्यस्त हो जाता है और धीरे धीरे भगवान कृष्ण
- 22:51ने कहा है कि अभ्यास जो करोगे उसके तुम आदि हो जाओगे।
- 23:00रसरी आवत जातते सिल पर पड़ते निशा करत करत।
- 23:06अभ्यास के जड़ मती होत। सजा के ऊपर से बार बार रस्सी
- 23:12गुजरे तो वह निशान डाल जाएगी और वह निशान इतना गहरा हो जाएगा।
- 23:20हो सकता है 1 दिन वह पत्थर फट ही जाए।
- 23:23दो टुकड़ों में ध्यान एकाद्रता नहीं है ध्यान का अंतिम परिणाम।
- 23:43इतना विराट होना होता है जिसका कोई और शौक नहीं है जिसका कोई
- 23:50मेज़रमेंट नहीं है। कोई आदी नहीं, मध्य नहीं।
- 23:53अंत में तुमने विराट होना है और कॉन्सन्ट्रेशन में तुम शुद्र हो
- 24:00जाते हो। बस एक बिंदु के ऊपर ध्यान लगा
- 24:05अवसर और 1 दिन तुम बिंदु ही होकर रह जाते हो।
- 24:14विराट होने की इच्छा तुम्हारी दफ़न हो जाती है यही तुम्हारे संग
- 24:21हुआ है पुत्र। मेरे पास ऐसे बहुत से उनमें से दो
- 24:26व्यक्ति पागल हो गए। इसलिए मैं कभी कभी कह देता हूँ।
- 24:34बुद्ध ने जल्दबाजी करके अच्छा नहीं किया।
- 24:43नीम हकीम खतरा अच्छा? आधा अधूरा ज्ञान जानलेवा है, उसे
- 24:57बांटना नहीं चाहिए, लेकिन बुद्ध मजबूर है।
- 25:03बुध घर से निकले ही इसलिए हैं इस संसार में उन्होंने पाया कि दुख
- 25:08है और जब उन्होंने पा लिया कि मैं शरीर नहीं और शरीर के दुख ही दुख
- 25:17होते हैं तो जल्दी से भाग पड़े बांटने के लिए।
- 25:21सरनथ में उन्होंने पहला प्रवचन दे दिया जबकि अभी वो स्वयं पर पक्वार
- 25:28नहीं हुए थे। विपश्यना की तकनीक बुद्ध की तकनीक
- 25:40है। और मैं इसको सिरे से नकारता हूँ
- 25:49क्योंकि ज्यादा संभावना है कि यह तुम्हारी विपश्यना की सांस आई
- 25:57सांस गई। या कुंतीसन तीसरे नृत्य पर या
- 26:02आनापान सती ज्यादा संभावना है कि तुम चीजों के अभ्यस्त हो जाते हो।
- 26:11इसे हमारी भाषा में ऋषियों की भाषा में संस्कार कहते हैं।
- 26:19और अगर तुम्हें एक बार संस्कार पड़ा तो तुम जाने अनजाने उधर ही
- 26:24उधर जाओगे, तुम्हारी शक्ति फिर बड़े प्रयास करके वो तोड़नी पड़ती
- 26:31है और अगर तुम्हारा अभ्यास इतना गहरा हो गया तो उसको तोड़ना बड़ा
- 26:37मुश्किल है। मैंने पहले भी बहुत बार समझाया है
- 26:45आपको मेरे प्राणी प्रवचन आपने सुना ही नहीं है, मेरे हिसाब से
- 26:49सुने हैं तो गुने हैं। बहुत से व्यक्ति मुझे सुनकर कमेंट
- 26:59करते हैं। बाबा ऐसा नहीं है।
- 27:04तो मेरे पास ये बात कहने के अतिरिक्त और कुछ होता ही नहीं कि
- 27:09फिर तुम भाई मेरे पास क्यों आये, तुम तो मेरे से पहले पहुँच गए हो।
- 27:18तो तुम दर दर के ठोकरे क्यों खा रहे हो?
- 27:25तुमने मेरे से पहले आनंद पा लिया, पाल लिया तो फिर मेरे पास भटकने
- 27:32की आवश्यकता क्या है जिसने पा लिया।
- 27:36उसका एक ही लक्षण है कि वह भटकना समाप्त कर देता है।
- 27:44भटकना उसे भटकाती नहीं, वह ठहर जाता है।
- 27:48मैंने कितनी बार बोला, रोज़ बोला फिर तुम्हारा।
- 27:55किसी प्रकार का कमेंट फिर तुम कहते हो बाबा आपने हमें ब्लॉक कर
- 28:03दिया, देखिए जो पहुँच ही जाते हैं, उन्हें तो ब्लॉक ही करना
- 28:08बनता है ना यह बताइए मैं और क्या कर सकता हूँ?
- 28:16तुम्हारी इन मूडताओं को मैं कब तक पढूंगा समय व्यर्थ करने के
- 28:21अतिरिक्त और इनमें रखा क्या है तो फिर ज्यादा अच्छा होता है कि मैं
- 28:31तुम्हें ब्लॉक करता हूँ। अन्यथा गुरु तो शिष्यों की तलाश
- 28:36में पड़ते हैं, पर मैं तुम आए हुए को ब्लॉक कर देता हूँ तो इसमें
- 28:43कोई राज़ होगा ना? ऐसे ही तो कोई कुछ तो मजबूरी आ
- 28:50रही होगी। यूं ही कोई बेवफा नहीं होता।
- 28:58आइए मैं तुम्हें इसकी सारी साइंटिफिक प्रोसेसर समझा देता
- 29:03हूँ, जो तुम्हारे आज के साइकोलॉजिस्ट है।
- 29:14उन्होंने पूरा रास्ता कंगालानी सीगबंड फ्राइड को तुम आइकोन और
- 29:24सीगबंड फ्राइड अचेतन को पूरा कंगालानी।
- 29:31उन्होंने चेतन को जाना, चेतन को दो भागों में विभक्त उन्होंने ही
- 29:36किया ऊपर ऊपर का हिस्सा उन्होंने सब कॉन्सेप्ट माइंड यानी अब चेतन
- 29:42मन लेकिन गहरा मन वो खंगा नहीं हो सकता।
- 29:50गहरे मन को उन्होंने कह दिया अचेतन मन यह खंगाला नहीं जा सकता,
- 29:59बिल्कुल ठीक है। यह भाषा आचारों की भाषा है।
- 30:07यह भाषा चारवाको की भाषा है। मार्कस की भाषा है, पहुँचे नहीं।
- 30:14परमात्मा देखा नहीं निसय कहता परमात्मा मर गया, मार्कस कहता
- 30:21परमात्मा होता ही नहीं। मैं इसे परमात्मा को क्यों मानु
- 30:27जो मुझे खाने को रोटी नहीं देता तो भला खाने को रोटी मार्क इसका
- 30:32पिता देता है क्या? किसने सारा संसार तुम्हारे लिए
- 30:39बना दिया तुम्हारी सुख सुविधा के लिए?
- 30:48उसको ऐसे नकार देना तुम्हारी ही मंदबुद्धि का द्योतक है, लेकिन
- 31:00तुम वही चीज़ मानते हो जो जहाँ तक तुम्हारा अनुभव है।
- 31:09चारवाक ने इसको देखा नहीं कि मेरा किया हुआ मेरे पर ही वापस पलटेगा
- 31:16तो उसने कहा कि कोई लेने देने का यह नियम है ही नहीं।
- 31:29संत कहता है अब रिएक्शन देर इस एनक्वल एंड अपोज़िट रिएक्शन
- 31:36प्रत्येक क्रिया की विपरीत और समान प्रतिक्रिया होती है।
- 31:46लेकिन चार, वह कहेगा नहीं ऐसा नहीं है कर्मों के सूक्ष्म
- 31:53सिद्धांत वह नहीं जानता तो वह इनकार करता है ईमानदार है, मैं इन
- 32:01लोगों को ईमानदार कहता हूँ। और ईमानदारी के साथ साथ मैं इन
- 32:06लोगों को मूड भी कहता हूँ। अज्ञानी भी कहता हूँ और अगर कोई
- 32:12अज्ञान बिना अपने अंत में जाए, उपनिषद का व्याख्या करने लगे तो
- 32:21उसने आनंद तो पाया ना। गागर में सागर को भर लाने का दावा
- 32:30भर करेगा कि मैंने गागर में सागर भर लिया है और यह कितना सही है आप
- 32:38अंदाजा लगा सकते हो? तुलसी कहते हैं भला कर भला करेगा
- 32:50तो भला ही मिलेगा। चार मा कहता नौ।
- 33:00यदा जीवित सुखी जीवित छोटी सी जन्तगानी है सुख पूर्वक जी अगर
- 33:11तुम्हारा माँ बाप कमाता है और तुम भाई बह हो तो दूसरे का हक खा जाओ।
- 33:20स्वयं किसी को आइकॉन बुला के भालू, ऊंचे कर लो, पठानी सूट्स
- 33:29भालू, जीस से पैसे लो। उसको पुलिस स्टेशन में घसीट लो,
- 33:40उसको अपने ससुर और लंगड़ों का डर दिखाओ।
- 33:44मसल दिखाओ और उसको न्यालो में घसीट लो।
- 33:48यह चार बाग का सिद्धांत है। जदा जीवित, सुखी, जीवित और ध्यान
- 33:57रखना ये लोग सुख की परिभाषा भी नहीं जानते।
- 34:01सुख तो बहुत दूर की बात है, ये सिर्फ आराम को सुख समझे बैठे है,
- 34:10आराम सुख नहीं होता। शरीर का आरंभ कहीं सुख होता है?
- 34:17ये सुख से भी नीचे की स्टेज पर है और हमने सुख से ऊपर की स्टेज पर
- 34:23जाना है, वो है आनंद। ऐसे लोग तुमने देखे होंगे।
- 34:33जो सड़क बनाते, पत्थर कूटते और भरी दुपहरी जून जुलाई के महीने
- 34:39में उन पत्थरों के ऊपर नुकीले पत्थरों के ऊपर नींद आ जाती है सो
- 34:42जाते हैं उनके लिए यही डंडप के पिल्लों से बढ़िया है।
- 34:49बात नीदगी है। बात बिछड़ो की है ही नहीं।
- 34:53बिछड़ो तो आपको सुबह त्याग नहीं पड़ते,
- 35:06जिसने जो अनुभव किया उतना ही माना।
- 35:10इस बात को आप अंडरलाइन कर लेना सर्कल में दे लो इसको और तुमने
- 35:17क्या करना है? तुम कहो, ठीक है उससे बहस होना
- 35:27इसलिए मैंने आपको कितनी बार कहा? मेरे पास लोग बहुत ही बगल में डाल
- 35:32के आ जाते हैं। भाभी आओ, शास्त्रार्थ करें, मैं
- 35:37समझ जाता हूँ। एक और पगलिया का बच्चा आ गया तो
- 35:48मैं उसके पांव हाथ डका देता हूँ प्रभु आज से कौन जीत पाया आप जीते
- 35:57जिताए हो? आप आसन ले लो, बैठ जाओ, जलपान
- 36:02करा, चाय वगैरह पीला देता हूँ, भोजन खिला देता हूँ, उसके पांव
- 36:09हाथ लगा देता हूँ, ठीक बने तो थोड़ी दक्षिणा को दे देता हूँ,
- 36:15उसका अंकार फूले नहीं जुमाता। वो नरद की तरह कहते हैं, मैंने
- 36:21बाबा को जीत लिया, बिल्कुल जीत लिया और मैं चाहता हूँ कि वह जीत
- 36:29के जाए। वह व्यक्ति कभी नहीं पहुँच सकेगा।
- 36:41जिसकी क्षुद्र बुद्धि इतना भी नहीं जान सकती, ये रेत का कण
- 36:47बनेगा कैसे? वह पागल नहीं तो और क्या है?
- 36:55कई बार अतिबुद्धिमान समझने वाले स्वयं को पागल ही तो हुआ करते हैं
- 37:04अनिथा बना के दिखा दे तुम अगर इतने ही समझदार हो तो रेत का
- 37:13थोड़ा कण बना के दिखा दो मुझे। पानी की बूँद बना के दिखा दो एच
- 37:17टू ओह बना के दिखा दो छोड़ो तुम हाइड्रोजन ही बना के दिखा दो, तुम
- 37:22ऑक्सीजन ही बना के दिखा दो मोलेक्यूल छोड़ो, तुम एटम ही बना
- 37:26के दिखा दो छोड़ो इसको इलेक्ट्रॉन प्रोटन न्यूट्रॉन में से कुछ भी
- 37:30बना के दिखा दो नहीं बनेगा। लेकिन चर चर जुबान चलाने में
- 37:39माहिर है, इसलिए मैं शंकराचार्य को इतना बड़ा विद्वान नहीं मानता,
- 37:46बल्कि अव्वल सेरी का मूड मानता हूँ और शंकराचार्य के शिष्यों को
- 37:51तो मूड कम मानता हूँ। क्योंकि जो उससे भी गाय बीते हैं,
- 37:55जो उसका अनुकरण करते हैं और हम तो उनको कहेंगे।
- 38:02चारों कुटों में वह ज्ञान का प्रचार प्रसार कर गया।
- 38:08नहीं नहीं। वह अज्ञान का प्रचार कर गया।
- 38:12खुद ही ज्ञान को नहीं जान पाया था।
- 38:16उसने शास्त्रार्थ करना सिखाया। बुद्धि को तीक्षण बुद्धि की धार
- 38:22को तीखा करना सिखाया। स्वयं के उस रस भरे आनंद की तरफ
- 38:29जाना तो उसने सिखाया भी वह कुछ सिद्धियों से युक्त था और
- 38:37सिद्धियां तो कोई भी ले सकता है। मैंने करीब करीब बचपन में ही बहुत
- 38:44सी स्थितियों को लोगों को दिखाना शुरू कर दिया था।
- 38:48कोई शराब मांगता ले, शराब ले ले, कोई कंबल मांगता, कंबल ले ले, कोई
- 38:57दाल का फैक्ट मांगता, कोई भुजिया का फैक्ट मांगता और ये लोग आज
- 39:01बुद्धिमान हैं। परमात्मा की एक एक ही पहचान है,
- 39:16एक ही लक्षण है, तुम्हारा अंत से शीतल हो जाएगा और जब वह बोलेंगे
- 39:29ऐसी वाणी बोलिए मन का आभा खोए। तुम्हारा भी भीतर का अज्ञान मटेगा
- 39:40कोण को शीतल करे? आप हूँ शीतल होए वह स्वयं शीतल
- 39:47होगा और उस शीतलता से शीतलता की धारा निकलेगी शब्दों के रूप में।
- 39:52और आपको भी शीतल कर जाएगा। यह लक्षण उस रस का जब तुम
- 40:11कॉन्सेंट्रेशन करते हो तो यह बुद्ध की पद्धति है और बुद्ध
- 40:18स्वयं चुक गए। बुद्ध ने यह जाना था कि गर्म गर्म
- 40:27नदम नदम गद्धों में सुख नहीं। इसलिए उन्होंने कहा जीवन दुख है।
- 40:42उन्होंने डनलप के में राजपूत से अकेले वारिस थे।
- 40:50सुख नहीं। यानी अभी वो सुख की तलाश में थे।
- 40:59बुध ने सुविधाएं पाई थी, सूख नहीं पाया था।
- 41:05अब तक तुम्हें जानकर बड़ा आश्चर्य होगा।
- 41:12बुद्ध राज़ महल में जन्मे पहले 10 दासियां थीं।
- 41:17उसकी एक हुकम से 1000 चीजें पैदा होती थीं।
- 41:24एक आवाज और सैकड़ों दास। दासियां इकट्ठी हो जाती जी हजूर
- 41:30जी मलक। ऐसी अवस्था में वह भला था, लेकिन
- 41:40सब कुछ होने के बाद उसने पाया जीवन में सुख नहीं तो क्या है?
- 41:53आराम है। शरीर का आराम है, सुख नहीं, इसलिए
- 42:02प्रथम वाक्य बुद्ध का जीवन में दुख है।
- 42:08बिल्कुल सटीक व्याख्या बुद्ध ज़रा भी बेईमान नहीं है, ना ही।
- 42:15बुध कहते हैं वस्तुओं में सुविधा है, सुख है यानी बुद्ध अब तक
- 42:28राजपरवार में जन्म लेने के उपरांत भी।
- 42:32सुख को नहीं जान पाए तुम्हे कहानियों सुनाई गई, लेकिन तुम
- 42:39कहानियों के गहरे अर्थ नहीं समझ सके।
- 42:46तुम भी यही समझते होगे कि हमने सुख पा रही है, गलती में हो।
- 42:50जब बुध नहीं पा सके तो तुम सुख कैसे पाली हो?
- 43:01आठ अरब के करीब का यह विश्व बाजार बाजारी हो।
- 43:10कुछ विरल ही व्यक्ति लव से जैसा सुख ही होता है।
- 43:18और जिसने अभी सुख ही नहीं पाया वह आनंद पाने वाले व्यक्ति के ऊपर
- 43:26कमेंट करें। क्या यह सटीक टिप्पणी है?
- 43:36नहीं, बुध यही बात कह के घर से निकले जीवन दुख है जब बिमारी
- 43:48आएगी। ट्यूबरकलसिस होगा जब क्षय रोग
- 43:58होगा जब डायफाइन्ड होगा। खांसी आएगी, बुरा हाल हो जाएगा,
- 44:11कमर झुक जाएगी, वृद्धावस्था आएगी, ठीक से चल नहीं सकोगे और 1 दिन मर
- 44:17जाओगे तो बूते ने देखा अगर यही होता है व्यक्ति का हसर।
- 44:27तो फिर मुझे नहीं चाहिए ऐसा जीवन वह किसी दूसरे जीवन की तलाश में
- 44:33और पहला कदम ठीक था उसका तो उसने ये नहीं देखा कि मैंने क्या छोड़ा
- 44:41जैसे आज के जैन मनी देखते हैं, एक जैन मनी मेरे पास आया करता हूँ।
- 44:47वो अपनी पूंछ से साथ लेके आता था। इनके आंख में जो पूंछ होती है,
- 44:53डंडा लगा होता है, वह पूंछ से पहले तो जगह साफ करते हैं, बैठ
- 44:59जाते हैं। मैं पूछता, प्रभु पहले तो जलपान
- 45:06का? अब बताओ चाय चलेगी, लस्सी चलेगी
- 45:17या दूध चलेगा या भोज नहीं चलेगा? या जलजीरा जलेगा।
- 45:30उसने जलजीरा पिया नहीं तो वो कहता हाँ जलजीरा तो मैं उसे जलजीरा दे
- 45:37देता बड़ा स्वादिष्ट है एक ग्लास और दे दो।
- 45:43और मैं उसकी अंतर भावना समझ लेता हूँ।
- 45:47अंतः के घट घट की जान भले भरे के पीर पछान इसने कभी जलजिरा पिया
- 45:54नहीं और उसे बड़ा सुहाग लगा। मैं एक जग भर क्यों कर देता हूँ
- 46:01और अपने काम में व्यस्त हो जाता? लोग रोज़ ये गिलास लो और टेबल के
- 46:08ऊपर रह देता, जितनी प्यासे हैं आप पी लो गर्मी में आए हो, वे सारे
- 46:17जेग खाली कर देता समझ आती है। जो अभी जीवा का स्वाधीन चक्र खत्म
- 46:27कर सका वह गुप्तेन्द्रियों का स्वाद कहाँ से खत्म करेगा?
- 46:36मैं थोड़ी सी बात से समझ सकता हूँ।
- 46:41तो मैं समझता हूँ प्रभु भोजन करता हूँ नहीं भोजन तो मैं नहीं करूँगा
- 46:52भोजन के लिए तो मैं निकला हूँ पर मैं अपनी सफेद सी पोटली दिखाता
- 47:01हूँ उसमें पांच छः। वो होठ होते है ना?
- 47:07होठ क्या कहते हो आप उसको रोटी रखने वाली वो होते उनमें अलग अलग
- 47:14तरह की सब्जियां होती। फिर समझाया कि ये लोग क्यों नहीं
- 47:20छोड़ते येंद्र को? इसको चार चार सब्जियां मिलें और
- 47:30फिर पांव के हाथ में जाएं। वह किसी कीमत पे नहीं छोड़ पाएगा।
- 47:36यद्यपि लालसा नहीं भरी है और बात तो लालसा होगी।
- 47:42बुध की लालसा मिट गई, भोजन खाने से लालसा मिट गई, इत खाया, इत
- 47:49खाया कि भोग तुम्हें वैराग्य तक पहुंचा दे तो बुध ने अभी सुख नहीं
- 48:00पाया। सुविधा पाली।
- 48:04इन सुविधाओं को भोगने के उपरांत जर्रा भर भी वह सुख नहीं पा सके।
- 48:12मौत की आहट को देखकर उसके प्राण कंप गए चेतक क्या व्यक्ति?
- 48:21बीमार भी होता है। हाँ राजकुमार बीमार भी होता है।
- 48:29जान दुविधा में थी। सुधोधन ने कह दिया था ऐसे कुछ मत
- 48:34बताना, लेकिन क्या करे? इतने प्यार से पूछता और बुद्ध अगर
- 48:44पूछे जी कैसे हो सकता है कि आप ना बताओ?
- 48:53ऐसा भी एक फॉर्मूला है पॉलिसी या डंडा फेरने के एलम?
- 48:58ये तो मैं इतने प्यार से पूछो के वह बताते हाँ मैंने किया, मैंने
- 49:03हीरेन वोंडा को मारा है और रोए गिड़गिड़ाए अंगली माल की तरह
- 49:11अंगली माल अपने सारे। गुनाह कन्फेस कर लेता है लेकिन
- 49:16बुद्ध जैसा होना चाहिए उसके सामने फिर उसे पॉलिसी डंडे की आवश्यकता
- 49:23नहीं। तुम्हें तो सिखाया ही है क्या?
- 49:27बुलडोजर चला दो बा मुश्किल साल 2 साल में बेचारे ने।
- 49:33सारी उम्र की कमाई लगा के किसी तरह घर खड़ा किया और तुम बुलडोजर
- 49:38गिरा देते हो और उसमें अपनी शाबाशी समझते हो।
- 49:41बहादुरी समझते हो नहीं तुम कायर हो तुम्हें बहादुर किसने कहा
- 49:49बुलडोजर तुमने थोड़ा गिराया। मकान तुमने थोड़ा करा है, बुलडोजर
- 49:55ने करा है तो बहादुर तो बुलडोजर को।
- 50:07बुध ने अपने पूरे जीवन में सुविधाएं तो सभी पानी।
- 50:16कमर झुका, आदमी देखा प्रथम बार राजकुमार प्रथम बार आए थे, बाहर
- 50:23किसी ने आज तक दर्शन नहीं किया था।
- 50:25बुध बड़े प्यारे थे, बुध का ऐसा मासूम चेहरा था।
- 50:34के बुध को देखकर सहसा ही व्यक्ति द्रव हो जाता था।
- 50:41बच्चों के समान मासूम चेहरा मोहरा उसका वाक्य शेरी, बड़ी प्यारी।
- 50:59क्या कमर झुक जाया करती है बुढ़ापे में?
- 51:03हाँ राजकुमार, यह क्यों खांस रहा है?
- 51:07इतना इसके राजी जक्ष्म रोक के इसका कोई इलाज नहीं।
- 51:19नहीं राजकुमार फिर आगे अर्थी देखता है, वृद्धा औरत देखता है,
- 51:28कांप रही है, हाथ में लाठी है। फिर अर्थ ही देखता है और रुक जाता
- 51:39है चेतक अर्थ ही को गुज़रने देते हैं हम क्योंकि वह अंतिम यात्रा
- 51:49है इस वक्त इसको रोकना। बीमार को और अर्थी को रोकना
- 51:58प्राप्त होता है। बीमार न जाने शायद 1 मिनट पहले
- 52:04पहुँच जाता तो बच जाता। तुम्हें पता है जिसे हार्ट अटैक
- 52:10का? उसके पास मात्र 4-6 मिनट होते
- 52:15हैं। अगर वो बच गया उस वक्त तक तो ठीक
- 52:21नहीं। ब्रेन को ऑक्सीजन मिलनी खत्म हो
- 52:23जाएगी और 12 मिनट के बीच बीच में उसके ब्रेन के सारे तंतु खत्म हो
- 52:28जाएंगे। हम ब्रेन डेड हो जायेगा और एक बात
- 52:33तो मैं समझा जीस। व्यक्ति का ब्रेन डेड हो गया।
- 52:41उसको भगवान भी आकर जिंदा नहीं कर सकता क्योंकि सिस्टम खत्म हो गया।
- 52:49और तुम आशुतोष को? 12 वर्षों ब्रेन डॉट कप का यह खुद
- 52:58भी चाहे तो बड़ी कोशिश तो बहुत बार की थी।
- 53:05तो चिंता नहीं हो सकेगा। तुम्हारा कोई भी प्रयास से चिंता
- 53:08नहीं कर सकेगा, लेकिन पागलों की जमात होती है, पागलों की परिभाषा
- 53:16नहीं होती, जमात हुआ करती है। मैं जब ये चीजें बोलता हूँ।
- 53:23तो आपको सत्य को समझाने की चेष्टा करता हूँ, किसी की निंदा नहीं
- 53:28करता हूँ, आप जग जाओ आप इस पागलपण का शिकार ना हो इसीलिए बोला करता
- 53:36हूँ और गुरु का महत्त्व भी यही होता है कि आपको सभी भ्रांतियों
- 53:42से मुक्त कर। और आखिर में सबसे बड़ी भ्रांति तो
- 53:46फिर भी बच जाती है। हम कितनी ही भ्रांतियों को तोड़
- 53:51ले, लेकिन आखिर में आपकी मूलभूत भ्रांति तो यथावत रह जाती है, वह
- 54:00मूलभूत भ्रांति है। मूलभूत भ्रांति है।
- 54:04इस खंडहर को अपना होना समझ लेना, इन उठते हुए विचारों को इन हरदा
- 54:11से उठती हुई भावनाओं के तूफ़ान को स्वयं का होना समझ लेना, यह सबसे
- 54:17बड़ी से बड़ी भ्रांति है। अगर तुम इससे मुक्त हो गए?
- 54:21इसको छोड़ दिया तो तरीके है या इससे पार हो गए।
- 54:26दोनों में से कोई भी आजमा लो जो तुम्हें सुगम लगता है या तुम इनको
- 54:32तोड़ 211 करके उनमें समय लगेगा या इनसे बोझ के धीरे से पार हो जाओ।
- 54:41दबी पांव निकल जाओ प्यार में ऐसा ही होता है लेकिन प्रेम होता
- 54:48कैसे? कैसे खाये किसी लैला मजनू को किसी
- 54:56ही राँझा किसी शीरी फरियाद को। किसी सौनी महिवाल को प्रेम में
- 55:05ऐसा चुपके से निकल जाता है। मनुष्य के पार कुछ नहीं तोड़ता
- 55:11भ्रांतियों को भाई इसलिए जिससे प्रेम हो गया उसके ऊपर परमात्मा
- 55:18की। रहमो कर्म हो गई वह उसका ऐसा
- 55:27पात्र हो गया जिसके ऊपर उसने कृपा बरसाई।
- 55:30कृपा निदान ने तो सीरी फराज़ हो या लैला मजनू हो या ही राजा हो।
- 55:38रोमियो जूलिएट हो यह ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने कुछ नहीं किया और
- 55:45परमात्मा के पास पहुँच गए, उस परम आनंद के समुद्र के पास पहुँच गए।
- 55:51क्या उसमें विलीन ही हो गए? यह सुगम रसता है, लेकिन तुम्हारे
- 56:01लिए नहीं होगा, क्योंकि अहंकार तो प्रेम को भगाता है।
- 56:12मेरे पास यह है एक बहुत साल पहले की बात है।
- 56:18मैं बोलता था तुम्हें तो अपने प्रवाह है, मैं बोलता।
- 56:23और अगर ठीक से व्यख्या करूँ तो मैं नहीं बोलती, वह बोलता और जब
- 56:29तुम कमेंट करते हो तो तुम मुझे नहीं तुम परमात्मा को गालों से
- 56:36ठहराते, क्योंकि मैं तो यंत्र हूँ।
- 56:40इस यंत्र से वह जो बोलेंगे वह ये यंत्र बोल देगा, इसकी कोई औकात
- 56:48नहीं। वह उसकी एक भी शब्दिया भाव को रोक
- 56:52सके। कोई स्त्री मुझे सुना करती थी,
- 56:57नाम वाम तो मैं कभी याद नहीं रखता।
- 56:59मैं तो यहाँ आए हुए लोगों को पहचान भी नहीं सकता।
- 57:02कौन मेरे से दीक्षा ले गया, क्योंकि मैं तो अपनी मस्ती के
- 57:07उमंग में खोया सहसरार में लीन होता हूँ।
- 57:10मेरी तो आँखें खुलती थी सहसरार में प्रतिष्ठित।
- 57:20मुझे पता ही नहीं लगता कौन आया कौन मुझे मेरी शिक्षा शिक्षाएं
- 57:28पूछ लेते हैं, मैं आया था, मैं आई थी आपको पता लगा?
- 57:35पहचानने वाला उस वक्त नहीं था। गायक वह था जिसने तुम्हें बनाया,
- 57:46मैं पहचानने वाला हूँ, मैं नहीं था उस वक्त इसलिए बहुत सी प्रवचन
- 57:53करके मैं कह देता हूँ। मेरे एडिटर से मैं क्या बोला मुझे
- 57:58पता नहीं देख लेना। अगर कोई आपको ऐसा आंट शंट लगे,
- 58:03मेरा कोई पता नहीं मैं गाली ही निकाल पता लगता है।
- 58:10फिर वह गाली में नहीं निकाल। फिर वह गाली भी परमात्मा का।
- 58:15आशीष तो फिर एडिटर्स सुन लेते हैं और ऐसा शब्द जो थोड़ा सा आपको गलत
- 58:26लगता है क्योंकि आपके ही तल पर वह।
- 58:32उसको वह काट देता है और आपको आपके पास शुद्ध शुद्ध आप जिसे ठीक समझे
- 58:41वह भाषा पहुँचती है। परमात्मा की सीधी सीधी भाषा नहीं
- 58:45पहुँचती। परमात्मा की भाषा सीधी सीधी
- 58:48पहुंचे। तो फिर नान कहता है कित्ते चोर
- 58:52हरामखोर कित्ते मूर्ख मल पख खा कित्ते मूर्ख खाई खा।
- 59:12ऐसी भाषा नानक कहती तुम सूअर मल पख खा मल कौन खाता है, सूअर खाता
- 59:27है? तुम उनकी भाषा नहीं समझ सकते।
- 59:29यह परमात्मा की दुर्गा से सीधी आई हुई भाषा इसमें कोई तरमीन नहीं
- 59:34हुई और बाबा बोलते हैं जिसे ए लिखे तो सरना तुम ये मत समझना कि
- 59:43नानक ने लिख दिए उसने अपने। इस सारी संगरचना से लिखवा लिया,
- 59:56क्योंकि यह सब उसका ही है, न न का कुछ भी नहीं, न यहाँ कृष्ण का कुछ
- 1:00:08कृष्ण के भीतर से सीधे सीधे परमार्थ।
- 1:00:17नान के हितर से सीधे सीधे परमात्मा बोलता है जी वो फरमाएं
- 1:00:29ते ते पापा जैसा वह प्रमाण करता है, वैसे ही वैसे ही यंत्र बोलता
- 1:00:35है जैसे कोई ऑपरेटर बैठा हो। कंप्यूटर की स्क्रीन पे कीबोर्ड
- 1:00:42पर हाथ जैसा जैसा वो हाथ घुमाएगा वैसा वैसा फीड होगा।
- 1:00:49उसमें कंप्यूटर कुछ नहीं कर सकता। ऐसा ही भगत सही भगत कुछ नहीं कर
- 1:00:57सकता नहीं कुछ करता है। वह जानता है महाबली है जिसका मैं
- 1:01:03जरिया नहीं बना सकता। उसने करोड़ों धरतियों से भी बड़े
- 1:01:08एस्ट्रॉयड आवारा घूमते हुए बना दिए तो उसके आगे नृत्य मस्तक होना
- 1:01:17ही श्रेष्ठता है। इसलिए कृष्ण ने कहा तुम समर्पित
- 1:01:23हो जा सर्वधर्माण पर तंज छोड़ दे अपनी खोपड़ी धर्म खोपड़ी।
- 1:01:34उसे मात्र बहम हो जाता है। अगर मैं राजा बन गया, राजसी पोशाक
- 1:01:38डाल दिया तो मैं सुखी हो जाऊंगा। वह भ्रांति में मैं राम जी का रोल
- 1:01:50करता। राम जी की पोशाक डालता लोग आगे
- 1:01:53पांव आस लगाते मैं जानता ये मुझे राम जी समझते हैं, मैं राम जी हूँ
- 1:01:58नहीं। मैं तो गंगा और कन्हैया का बेटा
- 1:02:11जी राम जी समझते हैं, तुम क्या समझते हो इससे कुछ फर्क नहीं
- 1:02:16पड़ता। परमात्मा जो बोलता है वह अपनी चाल
- 1:02:20से बोलता है तो बुध को। इन सभी भोगों में सुख नहीं मिला।
- 1:02:30बुद्ध सुख को तरस गए ये शायद बात तुम्हें किसी ने बताई नहीं
- 1:02:36कहानियों सुन लेते हो तुम कहानियों के भीतर का मर्म
- 1:02:41तुम्हें। नहीं समझाया जाता।
- 1:02:47बुध को सारी उम्र सुख नहीं मिला। अगर सुख भी मिल जाता वह घर नहीं
- 1:02:52छोड़ता इसलिए प्रथम भाग किस कथा, संसार, दुख है, दुख का कारण है।
- 1:03:03और कारण को मिटाने का उपाय है और उस उपाय को उसने बताया कैसे?
- 1:03:09पर वह विपश्यना था और तुम विपश्यना में उग गए विपश्यना यह
- 1:03:16कॉन्सेंट्रेशन। तो ये मैं क्यों कहता हूँ कि वो
- 1:03:23दर्द हो रहे है? कृष्ण पूरे कबीर पूरे नानक पूरे
- 1:03:32उनकी विधि पूरी पूरी है। जो व्यक्ति लगातार तीसरे नेत्र पर
- 1:03:42ध्यान रखेगा या इस साधना को सा देगा, निश्चित रूप से पहली बात तो
- 1:03:50वह बुद्धिहीन हो जाएगा, उसका दिमाग भारी रहने लगेगा, चक्कर भी
- 1:03:56आएँगे। किसी वक्त वोमिटिंग जैसा दिल भी
- 1:03:59हो जब तुम एक ऐसे पुर्जे से ऐसा काम ले रहे हो जिसके लिए वह बना
- 1:04:08नहीं तो उसके प्रभाव तो गलत ही होंगे।
- 1:04:19तुमने ध्यान लगाया साक्षी की परिभाषा तुम गलत समझ बैठे हो और
- 1:04:24मैंने बहुत बार बताया कि तुम साक्षी बना लेते हो जब के तुम
- 1:04:30साक्षी हो, यहीं फर्क पड़ जाता है जैसे तुम।
- 1:04:37राजगद्दीयों पर बैठ के अपने आप को राजा बना लेते हो और फिर राजगद्दी
- 1:04:42छोड़ने का मन नहीं करता और संत जान लेता है कि मैं शहनशाही आलम
- 1:04:51ये दोनों में बड़ा फर्क है। आप तो वोट मांग मांग के या हेरा
- 1:04:55फेरी से आपके। चुनाव आयोग वाले आपको राजा बना
- 1:05:00देते हैं पता, उन मूर्खों को भी नहीं के आपके राज़ में आपको सुख
- 1:05:05भी नहीं मिलेगा। बुध ने कहाँ पाया, कहाँ पाया जनक
- 1:05:11ने कहाँ पाया 24 तीर्थंकरों ने। अगर राज़ में सुख होता तो बुध घर
- 1:05:18छोड़ के ना भागते और 24 के 24 तीर्थंकर घर छोड़ के ना भागते
- 1:05:24राज़ में सुख है नहीं, जनक भी ना भागते अष्टावकर के चरण ना पकड़ते
- 1:05:30सुख तो जहाँ। तो आपके ही हृदय के अंत स्तर के
- 1:05:38भीतर है, वहीं से मिलेगा। मैं सदा ही कहा करता हूँ चीजें
- 1:05:44वहीं मेला करती हैं जहाँ हुआ करती हैं उसके अतिरिक्त तुम्हें कहीं।
- 1:05:53और तुम्हें वही जाना होगा। परमात्मा को पाने के लिए बाहर मत
- 1:05:58भटको बुध को सुख नहीं मिला, तुम्हें बड़ा आश्चर्य होगा।
- 1:06:06तुम कहोगे सुख ही तो मिला नहीं मिला।
- 1:06:11इसलिए बुध का प्रथम वक्तव्य के जीवन दुख और जीस वक्त उन्होंने
- 1:06:18अपना आपा पाया। नो दाय शायद हू आर यू तो उनको
- 1:06:22प्रथम बार सुख की झलक मिली। सुख ही हो गए वो और वो भाग्य।
- 1:06:28यही तो अड़चन थी। राजसी भोग भोगने से सुख नहीं
- 1:06:34मिले। सुंदर बिछुनों पर दास उदासियाँ
- 1:06:38पांव दबाती। एक बार आवाज देने से सैकड़ों लोग
- 1:06:44इकट्ठे हो जाते शुद्धोधन ने। उसके आराम में कोई कसर नहीं, कोई
- 1:06:53छोड़ी थी, लेकिन सुधोधन खुद ही मूर्ख है।
- 1:06:58सुधों को पता नहीं है के आराम देने वाली चीजें सुख नहीं दिया
- 1:07:03करते। अब जो नौकईले पत्थरों पर सो गया
- 1:07:11उसको कौन सा बिछो न मिला? लेकिन नींद आ गई।
- 1:07:16वह सुखदायक है, नींद सुखदायक है। भूत ने प्रथम बार सुख पाया उस
- 1:07:37सुबह के वेले में जब भोर का तारा डूब रहा था, रात को खीर खाई,
- 1:07:46सुजाता राम की स्त्री को भरकर बड़ा कटोरा दे गई।
- 1:07:50और 49 दिन से भूखे थे और ईमानदारी से भूखे थे।
- 1:07:55अन्ना हजारे की तरह नहीं थे। ये चुपके से जा के घबराए और बाहर
- 1:08:02आकर धन बदल दिया के आज 31 दिन हो गया ऐसा नहीं।
- 1:08:10ऐसे व्यक्ति तो पाखंडे हुआ करते थे।
- 1:08:12यह शैतान के चेहरे की तरफ़ देखो। चेहरा बहुत कुछ बता देता है।
- 1:08:19यह है शैतान तारीखें बदले वाले गाँधी नहीं थे गाँधी सही हो
- 1:08:33खड़ताल रखते थे। महात्मा गाँधी और भगत सिंह ने सही
- 1:08:40भूख हड़ताल रखी, सही भूख हड़ताल रखी, जतिन दानी और भोंखे भोंखे मर
- 1:08:46गया वो परिणाम भी तो आने चाहिए, लक्षण भी तो आने चाहिए अन्ना 1000
- 1:08:53ही का मौज। चुप करके भीतर से गबल लेता हूँ
- 1:09:00बाहर आके तारीख को बदल देता हूँ दूर बैठा हाकम समझता ये तो इतने
- 1:09:09दिन हो गए इसने का है कुछ मैं ऐसे सोचता हूँ।
- 1:09:13बे हरामी मरा क्यों इतने दिन खाके भी इसकी आवाज में इतने दिन न खाके
- 1:09:22भी इसकी आवाज में तर्राहट है। फिर दो ही व्यक्ति हो सकते हैं या
- 1:09:29तो अपने अंत से ऊर्जा लेके आता होगा।
- 1:09:31वह अंत से ये जानता नहीं। आपको जानकर बड़ी हैरानी हो क्या
- 1:09:40अन्ना हजारे नासिक वह परमात्मा का नहीं?
- 1:09:51अपने भीतर कैसे चला जाएगा? बिना इस कुपडिया के भ्रम को थोड़े
- 1:09:57के परमात्मा होता नहीं। अगर दिक्कत आती है हजारों को या
- 1:10:03मार्क्स को या नीतसे को या चारवा को दिक्कत आती है जो उन्होंने
- 1:10:08बनाया हुआ संस्कार है। के यहाँ कोई नियम नहीं है लेने
- 1:10:13देने का बस में भूत से देह से पुनर आगमनम को तह तर्कों से
- 1:10:22तुम्हारी बुद्धि प्रभावित हो जाती है जचेगा।
- 1:10:28तुम कहोगे तर्क बिलकुल ठीक है और तर्क बिलकुल ठीक है तो ये सच बोल
- 1:10:32रहा है। गलत है तुम्हारी बात तुम्हारा
- 1:10:35तराजू तौलने वाला गलत है। ऋण देने वाला भी खाक हो गया।
- 1:10:43ऋण लेने वाला भी खाक हो गया। तो फिर लेने देने का कुछ है ही
- 1:10:47नहीं। यहाँ इसीलिए ही तो मुसलमानों को
- 1:10:55ईमान साधना पड़ता है। उन्हें पता है अगले जन्म में लेना
- 1:10:58देना कुछ है नहीं, वो कहें कि मुसलसल ईमान हूँ मैं मुसलमान हूँ।
- 1:11:06लेकिन अगला जन्म होता नहीं फिर दोगे का सभी चीजों का फल यहीं तो
- 1:11:12नहीं मिलता। बहुत से फल ऐसे होते हैं जो वक्त
- 1:11:15ले लेते हैं प्रोसेसिंग में फिर उसका क्या होगा?
- 1:11:20तो पिट जाता है यहाँ इनका सर। जो तौर तरीका है वो ईसाईयत हो, वो
- 1:11:28इस्लामियत हो तो बुद्ध को सुख नहीं मिला था, आपको जानकर पड़ा है
- 1:11:42और तुम भी समझते हो कि मैं सुख पा लूँगा तुम गलती में प्रदीप कुमार
- 1:11:49तुम गलती में हो। क्या बताये?
- 1:11:56प्रदीप कुमार नहीं, सुमित कुमार हैं।
- 1:11:58दिल्ली से कोई बात नहीं। विपश्यना साधना करने वाले भी सुखी
- 1:12:09नहीं होता। कॉन्सेंट्रेशन।
- 1:12:13इस नॉट ए हैपीनेस नाटिपलाइजर बस तुम गौर से देखते हो।
- 1:12:24किसी चीज़ को उसमें शक्ति व्यय होती है और जिसमें शक्ति व्यय
- 1:12:29होती है वह ध्यान नहीं ध्यान है अपने आप को खुला छोड़ देना।
- 1:12:36अब ये समित कमर फंस गया। क्या करे रात की नींद खत्म तुमने
- 1:12:41देखा जब तुम कई बार बहुत ज्यादा परिश्रम कर लेते हो, उससे ज्यादा
- 1:12:48परिश्रम करने के कारण भी तुम्हें रात को नहीं।
- 1:12:53ओवर हार्ड वर्किंग वो भी तुम्हें नींद नहीं लेने देती तो परोसे
- 1:13:01लंबा हो जाएगा। अगर तुम पूरा ही इसको ठीक सुनना
- 1:13:05चाहते हो तो मैं अगला कदम लूँ। चलो ठीक है।
- 1:13:15तो चेतन मन जब चुक जाता है अब समझना बात को यह जो सुमरण की जाप
- 1:13:25की पॉलिसी थी, यह हमारे चेतन मन की सारी शक्ति को गवानी की।
- 1:13:33एक विधि थी राम राम करते रहो, कुछ भी करते रहो, चाहे खुद का ही नाम
- 1:13:39बोलते रहो, शक्ति चुक जाएगी, बोलने से शक्ति चुकती और मैंने 5
- 1:13:46साल बताए। चेतन की शक्ति चूक गई फिर तुम
- 1:13:51पहुंचे सब कॉन्शस, सब कॉन्शस की शक्ति भी चूक जाती।
- 1:13:59अगर तुम नहीं ठहरे तो कई बहुत बहुत अंध भगत होते हैं।
- 1:14:08वो कहते नहीं हम तो पांच ना हम जपेंगे और जपेंगे जपु फिर उनका
- 1:14:14सबकॉन्शस चेतन का जो सकती है वो जाता है फिर आ जाता है अनकॉन्शस
- 1:14:24लेकिन वो छोड़ते नहीं। वो भी चुक जाता है तो चेतन गया अभ
- 1:14:36चेतन गया अचेतन गया। अब सुनिए डांस है क्या होता है
- 1:14:44जार्ज गुर से यही करवाया करता था। जब नया नया शीश उसके पास पहुंचा
- 1:14:54तो उसे शराब पिलाता। खूब खूब पी ले क्यों?
- 1:15:00क्योंकि यह चेतन बेहोश हो गया। चेतन क्या फिर वह और पिलाता?
- 1:15:07फिर क्या हुआ? फिर उसका सब कॉन्शस गया, फिर
- 1:15:15अनकॉन्शस गया और फिर अनकॉन्शस के बाद देखिए यह शराब चाहे ठीक ही की
- 1:15:25है। अंग्रेजी है के संतरा मार्क का
- 1:15:34चाहे जाप की शराब चाहे पांच नाम की शराब, यह शराब तुम्हें बेहोश
- 1:15:44करती है। चेतन को तुमने भुला दिया सब
- 1:15:55कॉन्शस में आए, उसको बना दिया, अनकॉन्शस में आए उसको बुला दिया,
- 1:16:00लेकिन तुम पांच जनम जापते ही रहे, राधी राधी करते ही रहे, ये कहते
- 1:16:04हैं 8,00,00,000 जाप कर लो। इसका यही फेलस भी है भीतर के।
- 1:16:10तू तो अपने भीतर गाय नहीं इसलिए जानते हैं फिर आएगा कोलेक्टिव
- 1:16:18अनकॉन्शियस सामूहिक अचेतन वहाँ तो इतनी जबरदस्त भीड़ है।
- 1:16:28विचारों की भावनाओं की इतना जबरदस्त भीड़ है कि तुम वहाँ जाकर
- 1:16:35भाग जाओगे। बस डर इसी बात का है।
- 1:16:44जाप इसलिए मैं जाप से रोकता हूँ कि कहीं तुम ज्यादा मंदबुद्धि न
- 1:16:51हो जाओ। ज्यादा अंधभक्त न बन जाओ कहीं
- 1:16:55माला की फड़के घुमा दो, तुम्हारा चेतन चुक जाए अभिचेतन चुक जाए
- 1:17:00अचेतन चुक जाए और तुम कोलएक्टिव चेतन अभिचेतन में पहुंचो तुम
- 1:17:06कोलएक्टिव अभिचेतन में पहुंचे वहाँ तो समूह भरा पड़े।
- 1:17:11वहाँ तो इतवार भरे पड़े हैं कि तुम उसको बर्दाश्त नहीं कर पाओगे
- 1:17:17जैसे यकसा तुम्हारे ऊपर सुमेरु पुरुष गिर जाये इसलिए परमात्मा
- 1:17:27नहीं नहीं बनाती धीरे धीरे। कौन व्यक्ति वहाँ जाकर पागल नहीं
- 1:17:32होगा? जो व्यक्ति ध्यान में जाएगा बिना
- 1:17:36कुछ गंवाए तुम गंवा के जाते हो और जाप में गंवाना होता है और
- 1:17:43कॉन्सेंट्रेशन में भी गंवाना होता है।
- 1:17:45आज चीजों को साफ कर लो, अगर कोई प्रश्न हो तो मुझे बता दो।
- 1:17:51जॉब में भी यू लूज़ युअर एनर्जी और त्राटक में भी कॉन्सेंट्रेशन
- 1:18:03ऑफ माइंड में भी यू लूज़ युअर एनर्जी क्योंकि तुम शक्ति को एक
- 1:18:08स्थान पे लगा रहे हो। तुम धूप की आती हुई तरंगों को
- 1:18:19कॉन्वेक्स लेंज में से गुजार दो और आग लगा देती हैं, लेकिन धूप की
- 1:18:23तरंगें तो आईं वो तरंगें तो वे नष्ट वहीं के नहीं तो जाप के अंदर
- 1:18:32तुम शक्ति को। कॉन्सेंट्रेशन जान के धीरे बोल
- 1:18:43रहा हूँ ताकि तुम्हारे भीतर रखे कॉन्सेंट्रेशन में भी तुम शक्ति
- 1:18:47को घुमाते हो, एक जगह पे लगा देते हो जाप में भी तुम पुनवृक्ति करके
- 1:18:54अपनी शक्ति को घुमा देते हो और एक वक्त ऐसा आता है कि तुम?
- 1:19:00करीब करीब बेहोशी की हालत में होते हो और फिर तुम सहसा चेतन
- 1:19:07चुका अब चेतन चुका अचेतन चुका और तुम कलेक्टिव अनकॉन्शियस में
- 1:19:14पहुँच गई सामूहिक अचेतन वहाँ तो भरा पड़ा है।
- 1:19:19वहाँ तो एक दम से परहार होगा तुम्हारे ऊपर ऐसा जैसे मधुमक्खी
- 1:19:25ने तुम्हारे ऊपर हमला कर दिया वो चारों तरफ से और काटेंगे तुम इस
- 1:19:36बात को खतरा मत समझना, लेकिन खतरे से आग रहा करना मेरा फर्श उस दंश
- 1:19:44से। तो मर भी सकते हो, पागल भी हो
- 1:19:49सकते हो, ईंट बाटे भी मरने शुरू कर देते हो।
- 1:19:57बहुत से लोग मैंने पागल होते देखे हैं, मरते भी देखे हैं, मैं इतनी
- 1:20:03गर्मा से इसलिए नहीं बोल रहा हूँ। तुम्हारे जीवनों को सुखी करने के
- 1:20:07लिए तुम अध्यात्म चुना और अगर अध्यात्म ही तुम्हें नर्क में
- 1:20:12धकेल दे तो फिर कैसा अध्यात्म? अध्यात्म तो तुम्हें वो सुनहरी
- 1:20:21मार्ग बताता है जहाँ सुगंध आती है।
- 1:20:27जहाँ तुम्हारा दुख जुड़ा दिया जाता है।
- 1:20:43कलेक्टिव कान्शस्नस उन तुम्हारे कृत्यों का भंडार है जो तुमने ही
- 1:20:51किसी वक्त किए थे और वो तुम्हारे ही मन में सुप्रश करके नीचे नीचे
- 1:21:00नीचे। सबकॉन्शियस अनकॉन्शियस फिर
- 1:21:04कलेक्टिव अनकॉन्शियस में स्टोर में डाल दिए हैं।
- 1:21:09तुम्हारी ही किए हुए कर्म प्रकृति बड़ी समझदार है, अगर तुम्हे याद
- 1:21:15कराएगी तो तुम पागल हो जाओगे। तो प्रकृति धीरे धीरे नीचे नीचे
- 1:21:21नीचे नीचे सुप्रेस करती करती आखिर में तुम्हारे कोलेक्टिव
- 1:21:25अनकॉन्शियस में ठोंक देती है उसको और वहाँ बड़ी भीड़ है और तुम्हारी
- 1:21:30जन्मो जन्हो की भीड़ है। ज़रा सोचो के इसी जन्म की बातें
- 1:21:38यज्ञ सातों में याद आ जाएं तो तुम माथा पकड़ के बैठ जाओगे और तुम
- 1:21:44पार कर जाओ, कहीं शोक है, कहीं धैर्य है, कहीं गम है, कहीं जुदाई
- 1:21:52है, कहीं विदाई है, कहीं मिलन? कहीं नुकसान है, कहीं नफा है,
- 1:21:58कहीं अपनों से बिछोड़ा है, कहीं अपनों से मिलन है, कहीं किसी से
- 1:22:04तीव्र दुश्मनी है वह सब तुम जो भूल गए हो चेतन भूल गया है।
- 1:22:10वह प्रकृति ने तुम्हारे धीरे धीरे धीरे धीरे कोलेक्टिव अनकॉन्सेस
- 1:22:14जमा कर लिया और इसी जन्म का नहीं सभी जन्मों का इकट्ठा है और इसे
- 1:22:21तुम्हें ही कहना होगा। यह है इसकी वैज्ञानिक प्रोसेसर
- 1:22:29यद्यपि सेगमेंट फ्राई तो अचेतन पूरा नहीं कंघार सकते, लेकिन संत
- 1:22:36पूरा अचेतन और अचेतन के बाद सामूहिक अब अचेतन।
- 1:22:43और फिर सामुजी के चेतन में पुरुष जाता है, यही है सारी वैज्ञानिक
- 1:22:52इसकी व्याख्या ज़रा याद रखो सोचो। इसी जन्म की सारी स्मृतियां जो
- 1:23:04धकेल दी गईं तुम्हारे अंतः और मरते वक्त ये तुम्हें तुम्हारे
- 1:23:09सामने आए इसलिए मरते वक्त तुम इतने पज़ल महसूस करते हो अपने आप
- 1:23:15को क्योंकि वो सारी स्मृतियां यज्ञ सं।
- 1:23:19कुछ ही मिनटों में तुम्हारे सामने सारी भीड़ की तरह घूम रहे हैं
- 1:23:26इसलिए तो आदमी बैड मार्क नहीं लगता है।
- 1:23:31हम मु्द्दे पे आ गए। तुम रेपुटेशन के माध्यम से चले
- 1:23:37हो, कोई जाप करने? तुमने चेतन की सारी शक्ति खोदी,
- 1:23:45लेकिन तुम बड़े भक्त हो, तुम कहती हो नहीं तू शक्ति है, और भी है
- 1:23:51दूसरी तल की शक्ति है सब कॉन्शस की, वह चालू होनी शुरू हो जाएगी।
- 1:23:57यही गुरु जी अब सिखाया करता था। तो तुम उसको प्रयोग करना शुरू कर
- 1:24:05दो, वह शराब के जरिए इसको करता। तुम जब्प की शराब के से यह करते
- 1:24:13हो तो फिर उसके बाद तुम जाओगे गहरे सबकॉन्शियस से अनकॉन्शियस।
- 1:24:28अनकॉन्शियस में जाकर भी तुम्हारी शक्ति अगर चूक जाती है तो तुम
- 1:24:36पहुंचोगे कोलेक्टिव अनकॉन्शियस में शक्ति फिर भी नहीं चूकती।
- 1:24:43शक्ति कभी नहीं चूकती। क्योंकि अगर तो तुम छलांग ले गए
- 1:24:55फिर तो पार लेकिन खतरा भी होता है।
- 1:25:04चेतन छोड़ा सारी शक्ति चूक गई। सब कॉन्शस की सारी शक्ति चुकी
- 1:25:13अनकॉन्शस की सारी शक्ति चुकी ध्यान से समझना मैं धीरे बोल रहा
- 1:25:17हूँ जान फिर कोलेक्टिव अनकॉन्शस में वह बहुत वृहद शक्ति।
- 1:25:27वहाँ तो तुम पगला जाओगे, पागल हो जाओगे, तुम पागलों सी हरकतें करने
- 1:25:31लगोगे। ऐसे ही लोग होते हैं जिनको
- 1:25:34बेड़ियों में बांधा जाता है और साइकोलॉजिस्ट, साइकेट्रिस्ट उनको
- 1:25:39समझ नहीं पता। यह मसला अध्यात्मिक है।
- 1:25:43किसी भी जरिये से तुम। किसी तरह उस कलेक्टिव अनकॉन्शियस
- 1:25:48में पहुँच गए हो, वो जरिया कोई भी हो वो जाप भी हो सकता है।
- 1:25:53वो खंडपाठ भी हो सकता है। वो कुछ भी रेपुटेशन हो सकती है,
- 1:25:59लेकिन तुम किसी भी तरह कलेक्टिव अनकॉन्शियस में पहुँच गए हो।
- 1:26:05और फिर तुम तुम्हें संभालने वाला कोई है नहीं और ध्यान रखना डॉक्टर
- 1:26:11तो सिर्फ महज किताबें पड़ी है, उसने उसके पास अनुभव नहीं है, तो
- 1:26:19तुम वहाँ बचाएगा कौन तुम्हें वहाँ बचाएगा तुम्हें?
- 1:26:24जो अपने अंत में कोलेक्टिव कॉन्शसनेस में पहुँच गया है यानी
- 1:26:31सचव, वहाँ पहचान होती है कच्छ बकाई ओथ पाई नानक गया जा के जाई।
- 1:26:40वहाँ पहचान होती है कि तुम्हें निकालता कौन है?
- 1:26:45तुम्हारे साइकेट्रिस्ट में क्या करेंगे?
- 1:26:47एपनोटिक दे देंगे सो जाओ, लेकिन सही गुरु क्या करेगा?
- 1:26:55सही गुरु तुम्हारी उस चीज़ को धीरे धीरे धीरे धीरे कसरत करेगा
- 1:27:01वक्त लग जाएगा। क्योंकि तुम ऐसे वादे में पहुँच
- 1:27:08गए जहाँ भीड़ बहुत है और तुम्हें उनसे निपटने का अंदाज पता नहीं और
- 1:27:16इन गुरुओं को भी अंदाज पता नहीं। यह तो ठगी के हिसाब से आए थे।
- 1:27:22यह तो अपनी कोठियां बनाने आए थे। जिनका एक ज़रा साथ नहीं ले के
- 1:27:26जाएंगे, बड़े बड़े समूह बना जाएंगे, बड़े बड़े ढर्रे बना
- 1:27:30जाएंगे और तुर जाएंगे। यहाँ से हजुरों को सौंप जाएंगे
- 1:27:33हजूर, फिर बाबा बन जाएंगे वो, फिर आगे हजूर आ जाएंगे, ऐसे तुम दौलत
- 1:27:38तो इकट्ठी कर लोगे? लेकिन बुध की तरह आखिर में कहोगे
- 1:27:47सुख नहीं मिला। बुध ने सुख ही नहीं पाया और जब
- 1:27:55सुख मिला तो वो भाग लिया। काश वह रुक जाता।
- 1:28:02काश मैंने बहुत बार कहा और लोगों ने बहुत बुद्धों के मेरे पास तीखे
- 1:28:10कमेंट्स भी आए। मैंने उनको कोई जवाब नहीं दिया।
- 1:28:15मैंने कहा जो तुम अपने हिसाब से समझ सकते हो समझो अगर सही समझ
- 1:28:21सकते हो। तो फिर तुम आ जाओ मेरे पास अगर
- 1:28:24तुम अपनी बुद्धि से ही समझना चाहते हो तो तुमने समझ ही लिया।
- 1:28:28फिर मुझे सुनने की कोई जरूरत नहीं।
- 1:28:36मेरी बातों पर कमेंट मत करना, क्योंकि मेरी बातें प्रगाढ़ अनुभव
- 1:28:41से आई। इनको तुम शार्दिक रूप से उनके ऊपर
- 1:28:47तुम कमेंट तो कर सकते हो, लेकिन तुम्हारा कमेंट सही नहीं होगा या
- 1:28:51गुरु अच्छी तरह से जानता है तो जब तुम उस भीड़ के भीतर चले गए जहाँ।
- 1:29:02ऐसा समझो मक्खियों के झुंड तो आपने देखा होगा मक्खियों का
- 1:29:06समुद्र तो आपने नहीं देखा होगा वहाँ तो मक्खियों का समुद्र है जो
- 1:29:11चीचड़ की तरह चिपक जाएंगे तुम्हें और फिर तो मरने के अतिरिक्त पागल
- 1:29:16होने के अतिरिक्त तुम्हारे पास कोई चारा ही नहीं।
- 1:29:21वहाँ जरूरत पड़ती है जीवंत को तुम्हारे शास्त्रों में ये बातें
- 1:29:26मिलेंगी। तुम खंगाल के देख लो तुम्हारे
- 1:29:33शास्त्र शब्दों से सूचनाओं से भरे पड़े।
- 1:29:37उनमें अनुभव नहीं है। अनुभव किसी को हुआ होगा तो उसने
- 1:29:41लिखा होगा, लेकिन यह ऐसा अनुभव के लिखा नहीं जाता।
- 1:29:46और कितने लोग यहाँ तक पहुंचे? कितने लोग कृष्ण हो पाए?
- 1:29:51बहुत कम लोग गिनती गिनती चुनती। उस तल पर पहुँचकर जो कोलेक्टिव
- 1:30:01अनकॉन्शियस मैएंड है तुम्हारा वहाँ अगर तुम जाप करके पहुंचे हो
- 1:30:07याने चेतन का सारा एनर्जी तुमने खत्म कर दिया अब चेतन का फिर।
- 1:30:14अचेतन का सारा एनर्जी तुमने खत्म कर दिया लेकिन तुम अपनी जिद पर
- 1:30:19अड़े कि हम तो दोहराएँ दोहरा जैसे अंधभक्त कहते हैं हम तो ये करें
- 1:30:26करो तो परिणाम भी होने को तैयार। मैं निचा दोर सितारों की तमन्ना
- 1:30:49की थी मैं निचा दोर। सितारों की तमन्ना की थी मुझको
- 1:31:05रातों की सयाही के सिवा कुछ ना मिला।
- 1:31:17मैंने क्या दो र सितारों की तमन्ना की थी।
- 1:31:27तुम्हारी तमन्ना तो थी लेकिन रास्ता गलत था।
- 1:31:33रस्वत में वहाँ पहुंचा गया जहाँ गुरु कहता है देखो।
- 1:31:37इसके बाद गुरु अपनी मौजूदगी में विवेकानंद के सिर को प्राप्त रखता
- 1:31:43है और विवेकानंद कलेक्टिव अनकॉन्शियस के करीब ही होता है और
- 1:31:48इतनी भीड़ भड़का देखकर वो कहता है।
- 1:31:53स्वामी जी मेरे माँ बाप भी हैं। पता था रामकिशन को कहीं ऐसा ना हो
- 1:32:06कि थोड़ी सी डुबकी लगा ले फिर पागल हो जाए।
- 1:32:10समझदार हैं क्योंकि गए हुए हैं तो तुरंत ये हाथ उठा लेते ठीक फिर
- 1:32:17बाहर आ जाओ लेकिन जहाँ तक पहुँच गए चेतन चेतन अवस्था में तुम
- 1:32:24अचेतन तक पहुंचते हो, तुम मूर्छित, मूर्छित महते हो।
- 1:32:28वहाँ तक भी आनंद कोई कम नहीं है। अगर चेतन तक पहुंचो तो जगते, जगते
- 1:32:34पहुंचो तो लेकिन तुम तो मूर्छित, मूर्छित सारी शक्ति गँवा के
- 1:32:39पहुँचते हो तो फिर तुम्हारा पागल होना निश्चित है तुमने ऐसी बीहड़?
- 1:32:48मक्खियों के समुद्र में हाथ डाल लिया है जहाँ बचने का कोई उपाय
- 1:32:53नहीं जहाँ तुम पागल हो गई अब सुमित कुमार अब तुम क्या करो, मैं
- 1:33:01तुम्हें उपाय बताता हूँ और जो व्यक्ति ऐसा कर रहे हैं किसी भी।
- 1:33:08संप्रदायिक हूँ मैं किसी एक व्यक्ति विशेष नहीं नहीं बोलता,
- 1:33:13ना ही जो मेरे से दीक्षित है उनके लिए बोलता हूँ।
- 1:33:16मैं समग्र संसार की एक धरोहर समग्र अस्तित्व की धरोहर हूँ।
- 1:33:23मैं मैं सबके लिए बोलता हूँ। वह मेरे से दीक्षित हैं, जरूरत
- 1:33:28नहीं। मैं इतने लोगों को दीक्षित कर भी
- 1:33:31नहीं पाऊंगा। मुझे पता है इसलिए वो भी को
- 1:33:37सुनें। मैं उनके हित अर्थ ही बोल रहा
- 1:33:40हूँ, छोड़ दें आज अभी छोड़ दें फिर क्या करें?
- 1:33:46फिर जहाँ बाबा नानक का पल्टू का कबीर का जो तकनीक है, वो काम
- 1:33:54आएगा, कुछ न कर कुछ न कर जो होता है होने दे तेरा ध्यान जाए।
- 1:34:06जाने दे, अपने आप पड़ जाए तू साधने की चेष्टा न कर तू जान
- 1:34:13बूझकर उसमें शक्ति इन्वेस्ट करता है जब तुमने कुछ महीनों के लिए
- 1:34:18वक्त लग जाएगा। जितना इन्वेस्ट किया है उतना
- 1:34:21निकासी में भी वक्त लगेगा। मन जाएगा, बाहर बार बार उधर जाएगा
- 1:34:28क्योंकि संस्कार तो मन जाए जाए, रोकना भी मत लड़ना मत जाए जाए।
- 1:34:37कुछ वक्त ऐसा आएगा महीने दो महीने जितना तुमने इन्वेस्ट किया वह बाप
- 1:34:431 दिन। वहाँ से ध्यान हट जाएगा तुम्हारा
- 1:34:49तुम अपनी विधि बदल लो, यह कोई विधि भी नहीं है।
- 1:34:54यह तो बुद्ध को भी सुख मात्र ही दे पाई।
- 1:34:58सुख के आगे रस तो दे ही नहीं पाई। कहाँ है बुद्ध की जिंदगी?
- 1:35:02मरस? बुद्ध की तस्वीर देखो, पत्थर की
- 1:35:07शिला मालूम पड़े और तस्वीर देखो कृष्ण की आनंद से भरपूर सुगंध से
- 1:35:18भरपूर मुररलिया बजाते हुए। आनंद की बरसात करते हुए मिलेंगे
- 1:35:26तुम्हें झरणों की तरह नाचते, गाते रास रचत लेकिन बुधरास नहीं रचा
- 1:35:35पाएंगे। बुद्ध तो मूर्ति बस बैठे रहे।
- 1:35:40को की। बुद्ध की तकनीक यहीं तक लेके आती
- 1:35:43है। तुम मूर्तिवत हो जाओ बस इससे आगे
- 1:35:46जाती है तुमने बुद्ध से कृष्ण होना है बुध से कृष्ण होने के
- 1:35:57लिए। इस कन्सेन कृष्ण की विधि को छोड़
- 1:36:01दो, फिर दूसरी विधि कौन सी अख्तियार करें?
- 1:36:10फंसो न वह फरियाद ना करें। न वह फरियाद न करे याद दिल की
- 1:36:31सुनो दुनिया वालो। या मुझको भी चुप रहने, मैं गम को
- 1:36:48खुशी कैसे कह दूँ? जो कहते हैं उनको।
- 1:36:59कहने दो या दिल की सुनो दो ने आवर या मुझको अभी चुप रहने दो।
- 1:37:17मैं गम को खुश कैसे कह दूँ जो कहते हैं को कहने दो।
- 1:37:31या दिल। की सुनो धोनी।
- 1:37:39एक फूल चमन में ऐसा खेला माली की नजर में प्यार नहीं।
- 1:37:58हंसते हुए क्या क्या देख लिया अब बहती हैं आंसू बहने दो।
- 1:38:13ज्यादा। किसनों दुनिया वालों एक खुशी का
- 1:38:28देखा नहीं। देखा जो कभी तो भूल गए माना हम
- 1:38:42तुम्हें कुछ दे न सके जो तुमने दिया हो।
- 1:38:52सहने दो माना हम तुम्हें कुछ दे ना सके, जो तुमने दिया वो सहने
- 1:39:09दो। या दिल की सुनो धुनिया आवनो क्या
- 1:39:20दर्द किसी का लेगा कोई इतना तो किसी।
- 1:39:31में दर्द नहीं, क्या दर्द किसी का लेगा कोई इतना तो किसी में दर्द
- 1:39:49नहीं। बहते हुए आंसू और वहीं अब ऐसी
- 1:40:00तसल्ली रहने दो। या दिल।
- 1:40:06की सुनो। दुनिया या मुझको भी चुप रहने दो
- 1:40:19मैं शाम को खुशी कैसे कह दूँ? जो कहते हैं उनको कहने दो दिल की
- 1:40:35सुनो अब तुम्हारे लिए यही रस्ता है।
- 1:40:44सुमित। कि तुम कुछ क्यों करो जो होता है
- 1:40:51होने दो ध्यान जाएगा प्राण संस्कारों के कारण लेकिन तुम
- 1:40:58उन्हें वापस से मत बुलाओ क्योंकि यह भी तुमने अपनी शक्ति फिर
- 1:41:03व्यस्त करती हो। लड़ो मत होता है होने दो ध्यान
- 1:41:12जाता है जाने दो, लेकिन जल्दी ही तुम समझोगे कि वह ध्यान तुम्हारी
- 1:41:19शक्ति के बिना वापस लौट आएगा। ऐसे टूटेगा तुम्हारा संस्कार?
- 1:41:27फिर तुम रास्ता को चुनना वह जो सही रास्ता है यह कॉन्सेंट्रेशन
- 1:41:33का रास्ता है जा पांच न पाठ यह कॉन्सेंट्रेशन का रास्ता है।
- 1:41:41तीसरी आंख पे लगा लो मूलधार पे लगा लो पे लगा लो सब शक्ति को
- 1:41:46व्यय करने के ढंग हैं लेकिन तुमने वहाँ जाना है जहाँ शक्ति बचानी है
- 1:41:55इसलिए मैंने ब्रह्मचर्य का और ऋषियों ने ब्रह्मचर्य का पालन
- 1:41:59अनिवार्य बताया। ताकि शक्ति हर तरफ से इकट्ठी कर
- 1:42:04पौष्टिक भोजन से इकट्ठा करो, ऊंचे उचित स्वास्थ्य लेकर इकट्ठा करो,
- 1:42:10यह तुम्हारी शक्ति को बहुत वृहद गुणा बढ़ा देगा।
- 1:42:18फिर तुम योग नेत्रा में जाओ, तुम किसी के इंतजार मत करो ये
- 1:42:22प्रोटिस्म का कि वह आदेश देगा तो तुम अपने अंग प्रतंग को ढीला
- 1:42:28छोड़ोगे नहीं, तुम सिर्फ अपने आप को इतना क्रिया योग करो के तुम
- 1:42:35सीधे ही। योग निद्रा में चले जाओ।
- 1:42:38ये अभूत पूर्व प्रणाली है जो बाबा ने मुझे 1900 छियत्तर में दी और
- 1:42:46मैंने सारी उम्र आजमाया। इसको और सही पूछो तो एकमात्र कारण
- 1:42:51ही है मेरी एनलाइटनमेंट का। तुम भी करो ऐसे जो नास्तिक है वो
- 1:42:59भी एक बार करके देखो खर्चा क्या है स्वास्थ्य तो तुम वैसा भी लेते
- 1:43:04हो थोड़ा लंबा श्वास ले लिया तो कोई हर्ज़ नहीं।
- 1:43:07नाक से श्वास ले लो, मुख से छोड़ दो, पूछा है मैं क्या करूँ?
- 1:43:13अब तुम यही करो। होने दो, जो होता है आंसू बहते
- 1:43:18हैं तो बहनो, लेकिन तुम गम को खुशी नहीं कह सकते, यह तो तुम्हें
- 1:43:26मार देगा। यह तो तुमने चेतन की सारी शक्ति
- 1:43:30खत्म कर दी। अब चेतन की अचेतन की शक्ति खत्म
- 1:43:34कर दी। और तुम उस बीहड़ जंगल में पहुँच
- 1:43:38गए हो जहाँ से पीछा छुड़ाना बड़ा मुश्किल है, लेकिन गोरु अगर हो तो
- 1:43:43वह तुम्हें बता देगा, बता देगा रास्ता जल्दी से बाहर आ जाओ और
- 1:43:51बाहर आने का ढंग जी है जीव तो रुका यही।
- 1:43:55एकमात्र जरूरत है यही जरूरत है वो यही आपके गुरुओं के पास है।
- 1:44:04गुरु तो इसके भीतर की एंटायर क्रोनोलॉजी को जानते ही नहीं।
- 1:44:10तुम्हें बताएंगे कैसे? तो सुमित कुमार मैंने तुम्हें इस
- 1:44:16हिसाब से सेंटिफ़िकरी माइंड का सारा स्ट्रिक्टर ढांचा डाईसेट
- 1:44:22करके बता दिया कि ऐसा है और ऐसे तुम बाहर आओ और ऐसे तुम गए हो
- 1:44:31इसलिए मैं रोकता हूँ। क्योंकि मैं साइंटिफिकरी जानता
- 1:44:35हूँ कि यह 1 दिन पागल हो जाएंगे और बहुत से लोग आज हिंदुस्तान में
- 1:44:39पागल हैं। जो तुम्हें पता है न, वह हमने
- 1:44:44पागलों को गदियों पर बिठा दिया, ये पागल है।
- 1:44:52बस तुम्हें पता नहीं, पागलों ने पागलों को वोट दे दिया और देते
- 1:44:55रहे बस तुम्हें पता नहीं सिर्फ लेकिन जागृत व्यक्ति का जो
- 1:45:02दायित्व होता है उसे मैं भागता नहीं, मैं भागा नहीं, यद्यपि अपना
- 1:45:09संपूर्ण ग्रंथ करके स्पर्चुअल टीका फिर भी अभी भी में आपको आपकी
- 1:45:15तकलीफ क्या है? ऊँचाई कोई भी हो, शारीरिक हो,
- 1:45:18मानसिक हो, अभाव की हो, आपका पेट न भरा हो तो राजनीति के ऊपर भी
- 1:45:25बोलना शुरू कर दिया। यह मात्र मेरी करुणा का एक।
- 1:45:31ढंग है ना गद्दियाँ चाहेंगी? क्योंकि जो गद्दी मुझे मिली उससे
- 1:45:36बड़ी गद्दी होती है ना पाऊंगा। क्या उसका अपूर्व विस्तार उसका
- 1:45:43कोई और छोर नहीं? वहाँ तक में आसीन हो गया और उससे
- 1:45:48ज्यादा फिर पानी को है भी क्या? इतना वृहद आनंद और इतना इतना
- 1:45:57विराट पाकर मेरी सब वासनायी समाप्त मेरी सभी विषय समाप्त।
- 1:46:10मेरे सब विचार तो समाप्त पहले ही हो, सब भावनाओं समाप्त सभी कुछ
- 1:46:18खत्म, यहाँ तक कि जीवेशण भी समाप्त और अगर मैं अभी थोड़ा गहरा
- 1:46:28मसला। अगर मैं राजनीति के ऊपर भी बोलना
- 1:46:34बंद कर दिया तो मैं तो चला था। संगम पर त्रिवेणी संगम पर टिकट
- 1:46:40बुक थी और मैंने मुहूर्त चुन लिया था कि किस वक्त मैंने किस घाट के
- 1:46:47ऊपर जाकर। अपने आप को सुपुर्द पानी कर देना
- 1:46:53है, लेकिन फिर पीछे से आवाज आई मत जाओ हम।
- 1:47:08अनाथ हो जाएंगे ये लोग, 15 धन्यवाद।