Latest / Baba ji Vijay Vats / 31 Dec 25 - तीर्थ स्थानों पर शांति मिलने, काबा के काले पत्थर का रहस्य ! दान, त्याग - मैं पने का भाव !
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- 0:22बाबूजी सादरपूर्ण, राकेश कुमार, दीनदयाल, हजरत उल अंसारी, मोहम्मद
- 0:36बिन कासिम। और बहुत से लोगों के प्रश्न हैं
- 0:41सांझ तीर्थ यात्राओं पे जाके, जटकाबा
- 1:00के पत्थर के पास से आके। गंगासागर, प्रावराज, ऋषिकेश,
- 1:11हरिद्वार या ये रिक्षलम में जाके है गरजा, घरों में जाके इतनी
- 1:23शांति कब मिलती है? बड़ा प्यारा साल है, शुक्र है
- 1:38तुमने पूछ लिया बहुत से प्रश्न चूक जाएंगे और उसका कारण मैं नहीं
- 1:50होऊंगा। कम हो गया, मैंने बहुत पहले
- 1:55तुम्हें कहा था। आई ऍम जस्ट ए साइलेंट लेक।
- 2:01मैं एक मौन झील की तरह निस तरंगों में इसमें कंकड़िया डालो और।
- 2:21उस कंकड़िया से जो लहर उठेगी। वो तुम्हारे का जुबाब।
- 2:25होगा मौन झील इसमें कुछ भी तो नहीं करती।
- 2:34इसमें करती है तुम्हारी कंकड़ियां तो आज तुमने यह कंकड़ियां डाल दे।
- 2:46इसका उत्तर मैं नहीं दूंगा। इसका उत्तर अक्शैन का रिएक्शन जो
- 2:52आएगा। तीर्थ छात्राओं पे तीर्थ स्थलों
- 3:08पे काबा के पत्थर के भाषण इतनी शांति का मृत्यु है, प्रश्न बड़ा
- 3:20प्यारा है। और उत्तर इससे भी ज्यादा प्यारा
- 3:23है। दोतरफी घटनाएं घटती हैं जब आप
- 3:36किसी तीर्थ यात्रा में, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा श्रद्धास्थल
- 3:42पर। यह काबा में यह यरुशलम में किसी
- 3:54भी श्रद्धा स्थल पर तुम जाते हो, वहाँ दो प्रकार की घटनाएं घटती
- 4:02हैं। पहली घटना तुम्हारा अंतश की तरफ
- 4:15मुड़ जाना और दूसरी घटना बाहर की फैली हुई तिरंगों को पी जाना।
- 4:29यह वास्तव में एक ही घटना है, ऋषियों की अनूठी खोज थी, है किसी
- 4:40भी स्थान को। इतनी आसानी तरंगों से युक्त कर
- 4:48दिया जाए कि जब तुम उस स्थान पर पहुंचोगे तो ऑटोमैटिकली।
- 5:00तुम अंतस की तरफ मुड़ने लगोगे, क्योंकि आसानी तरंगें तुम्हें
- 5:06अंतस की तरफ मोड़ती हैं। लासानी तरंगें तुम्हें पदार्थ की
- 5:11तरफ खींचती हैं। यह रिश्तों की अनूठी खोज थी।
- 5:28इसीलिए तुलसी ने कहा श्रद्धा किसी श्रद्धा स्थल पे जाओ।
- 5:39उसित में बड़ी सहायता मिलेंगे गुरु।
- 5:47श्रद्धा का मूर्तवत रूप है। श्रद्धा ही श्रद्धा वहीं पड़ी है
- 5:52उसके पिता, क्योंकि वह उस श्रद्धा के उन्माद में चौबीसों घंटे खोया
- 6:01रहता है और जब प्रथम बार उसका दर्शन करते हो।
- 6:09ऐसा भी कोई व्यक्ति हो सकता है? तुम्हारी आँखों पर सहसा तुम्हें
- 6:15ही यकीन नहीं होता मैं ये क्या देख रहा हूँ?
- 6:22ये बिलकुल अनोखा वातावरण जो बाहर न था।
- 6:26एकाएक सहसा यहाँ कैसे प्रकट हुआ? यह श्रद्धा का ही कमाल है।
- 6:43काबा का पत्थर हजरत अश्वत कहलाता है।
- 6:53हजरे हर्षवक्त यह इसके भीतर रखा हुआ है काबा का कानापथ?
- 7:15ये काले रंग की महिमा बड़ी अजीब है, इस महिमा को जो भी अपने अंत
- 7:23में गया, उसने काले रंग के महिमा को देखा श्वेत रंग में इतनी
- 7:32गहराई। काले रंग में बहुत गहरे होते हैं,
- 7:39इसलिए हमने आदि का कावा का पत्थर तो बहुत ज्यादा पुराण में
- 7:51शिवलिंग। बहुत ज्यादा पुराना है ऋषियों ने
- 7:59हमारे या तुम्हारे ने, साइंटिस्ट कभी किसी के नहीं होते, साइंटिस्ट
- 8:06साझे होते हैं। ऋषियों ने काले रंग का महत्त्व
- 8:12खोज लिया था। हजरत मोहम्मद ने भी काले रंग का
- 8:24महत्त्व खोजा और जो उसे तलहटी पे पहुंचा उसे देर अबेर पता लग जाता
- 8:33है। काले रंग का महत्त्व।
- 8:39गोरे रंग में कोई इतनी नहीं होती उखड़ा उखड़ा सा होता है लेकिन
- 8:48श्यामल वर्ण बड़ा प्यारा होता है। इसलिए हमने अपने अवतारों को शामिल
- 8:57अपहरण दिया है। वो कृष्ण हो लवराम है उनका वर्ण।
- 9:03श्यामल वर्ण था। आज जो मूर्ति बनाई गई राम मंदिर
- 9:10में। मैंने जब प्रथम बार उसको देखा तो
- 9:14मैं खूब हँसा। मूर्खों का यही तो कमाल है राम
- 9:27ऐसे तो न थे कृष्ण ऐसे तो न थे भला ये रंग किसी को कचता है।
- 9:39श्यामल वरन वो जो चुभ की तरह लोहे को खैर, बाहर के संसार में ऐसा ही
- 9:51कुछ हुआ करता है। तुम ठीक ठीक से श्यामल वर्ण को
- 9:55कभी पहचान नहीं पाओगे। काबा का पत्थर भी काला पत्थर है
- 10:09इस काले रंग के मेहमान मैं यहीं समाप्त करता हूँ क्योंकि अगर
- 10:15मैंने शुरू कर दिया फिर आपका प्रश्न।
- 10:18हजर अश्वत में बस जी हैरान के भीतर यह स्थित है।
- 10:35आइए। इसको वैज्ञानिक रूप से समित आज
- 10:44मनुष्य की बुद्धि वैज्ञानिक जाता हो गई है, लेकिन कुछ हमारे पुराने
- 10:55वैज्ञानिक जिसे हम मरीज ही कहते थे।
- 11:00आज साइंटिस्ट्स कहते हैं वो कुछ इंद्र बिंदु छोड़ गए।
- 11:09थे। अब्रीविएशन।
- 11:17अगर हम ठीक ठीक से उन अब्रीविएशन को सिंबल करी प्रेजेंटेशन को खोल
- 11:24सकें, तो कुंजी मिल गई हमें हजरे। अस्वथ अदरे अस्वथ मसिथ हैरान के
- 11:41भीतर से थे। यह काले रंग का पत्थर है।
- 11:48यह इतना प्यारा क्यों है बाबा जी? यह तीर्थ स्थानों पर जाकर अचानक
- 12:01क्या घटता है? जो श्रद्धा के उनमाद में हमें
- 12:08धकेल देता है। तो आइए इसकी सेंचुरी प्रोसेसर्स
- 12:13को जाने। पति से हृदय क्या है?
- 12:20जो छुपाया गया आपसे आपसे नहीं छुपायेगा आपने खुद ही इसे पहचाना
- 12:28नहीं। कोई भी व्यक्ति पहचान सकता है,
- 12:31कोई भी व्यक्ति उगाड़ सकता है इसको।
- 12:38और अगर ये पर्दा उठ गया तो भेद खुल जाता है।
- 12:46जब पाल या भेद कल अंतर था बुआ खुल के अपने अंदर था।
- 12:53सुखवासी हाँ, उस मंद्रदा जिसे चढ़ती है ना लें दी है इस परदे को
- 13:05उठाने की जरूरत है। संतों ने बहुत बहुत अलफाज़ परुप
- 13:09करके इस परदे को उगाड़ने की शिष्टा की।
- 13:17पर्दे में रहने। दो पर्दा नहीं उठाओ पर्दा जो उठ
- 13:25गया तो एक खुल जायेगा और जैसे ही पर्दा उठता है वही।
- 13:33वैसे ही तुम्हारी दुष्यमान्यताएं ध्वस्त हो जाती हैं चकनाचूर हो
- 13:38जाती। हैं, तभी तक तुम मुर्ख रह सकते हो
- 13:47जब तक वह। पर्दा बना हुआ है।
- 13:51पर्दे में रहने दो पर्दा ना उठाओ पर्दा जो उठ गया तो भेद खुल जाएगा
- 14:10इस्लाम ने इसीलिए स्त्रियों को काले नकाब में।
- 14:24स्त्री शक्ति स्वरूपा और पुरुष चेतन स्वरूपा अर्ध नारी शुल्क यही
- 14:36रूप है। शेतन और शक्ति का मिलन संयोग जब
- 14:43हो जाता है तो शेव बनता है, अर्ध नारीश्वर उसका रूप है, स्त्री
- 14:53शक्तिरूपा है और पुरुष। चेतन रूप है दोनों का मिल जाना
- 15:05परिपूर्ण सेब का हो जाना है। सेबई जाने शाश्वत सनातन अल्टिमेट
- 15:12हिमाडर ही नेवर डाइस। आइए हम साइंटिफिक विश्लेषण में
- 15:25थोड़ा गहरा खेल। अगर किसी एक स्थान पर श्रद्धा से
- 15:45युक्त आत्मा जीवंत आत्मा इकट्ठी होती चली जाए तो वहाँ की जमीन,
- 15:56नदियां। पहाड़, वृक्ष और लोकेशन वॉटेवर इट
- 16:06इस जो वहाँ पर प्रेसेंट है वो चाहे धरती है चाहे पानी है।
- 16:19अब वो हवा सब पी जाता है, उसको वहाँ की दीवारें वहाँ का
- 16:31स्ट्रक्चर ढांचा अबज़र्व कर लेता है उन रंगों को।
- 16:36जो तुम्हे दिखती भी नहीं और करोड़ों करोड़ों लोग लाखों, लाखों
- 16:47बार इकट्ठे हुए तुमने देखा? इबादत करते हुए मक्का के भीतर
- 17:01कितने लोग होते हैं और सब श्रद्धा से भरे होते हैं।
- 17:04ज़रा भी अब ये शब्द अच्छी तरह से उनमें सेंषण नहीं होता।
- 17:16शशयहीन व्यक्तित्व शशयहीन व्यक्तित्व यानी श्रद्धायुक्त
- 17:25व्यक्ति का समूह। जीस स्थान पर इकट्ठा होगा।
- 17:37उस स्थान पर जो भी कुछ है वो पेड़ हैं, पर्वत हैं, पानी है, धरती है
- 17:46आसमान सब पी जायेगा उन रंगों को। और श्रद्धा की तरंगें हर पल बाहर
- 17:54बहुत मात्रा में निकलती हैं। तुम तो कुछ दिन बिता के कुछ
- 18:04गड़ियां बिता के अपने घर चले जाओगे।
- 18:09लेकिन तुम्हें नहीं मालूम उस तीर्थ पे पेड़े औधे पत्ते, तने
- 18:28पानी ये किनारे। ये पुल सब पी जाएंगे और चाहे काबा
- 18:42का पत्थर हो, चाहे गंगा साबर हो, चाहे अमरनाथ हो, केदारनाथ हो।
- 18:54चाहे तुम्हारी मूर्ति ही क्यों न हो, मंदिर में रखे।
- 19:00जब श्रद्धा का अपार झुंड जीवंत व्यक्तियों का मुर्दा में तो
- 19:05श्रद्धा होती है, मुर्दा में शंशा भी नहीं होता समझ लेना।
- 19:12जीवंत व्यक्तियों का श्रद्धा युक्त अपार समूह एक स्थान पे
- 19:17इकट्ठा हो जाएगा तो उनके भीतर से रोम रोम से निकली हुई श्रद्धा की
- 19:21किरणें वह स्थान की जाएगा और उस स्थान पर जो भी चीज़ है।
- 19:33वो मिट्टी है, वो पेड़ पौधे हैं, वो पर्वत हैं, श्रद्धा से मुक्त
- 19:42हो जाएंगे, आसानी तरंगों से मुक्त हो जाएंगे।
- 19:51लेकिन सब। कुछ करके भी तात स्वर्ग अपवर्ग
- 20:02सुख दर्य तुला एका अंग थोड़ा जाग जाओ, बड़ी महत्वपूर्ण बात हो रही
- 20:13है। ता तो स्वर्ग अपवर्ग सुख धर्र्य
- 20:17तुला इक अंग तू रणा ता ही शक ल मेरी जो सुख लघ सत शंख श्रद्धा के
- 20:29उन पलों में तुम अंत में चले जाते हो।
- 20:34जिसे हम सत्य। कहते हैं।
- 20:39सत्य चित्रा आनंद श्रद्धा के उन पलों में तुम एक बार उस सत्य में
- 20:48डुबकी लगाते हो और उसको छू लेते हो।
- 20:55क्षण भर के लिए ही सही और जब तुम उस शक्ति को छू के आते हो तो
- 21:08तुम्हारी छटा ही निराली होती है। यह बाहर का ऋषियों का बनाया हुआ।
- 21:21वैज्ञानिक का बनाया हुआ 37 का बनाया हुआ एक आयोजन था।
- 21:31सामूहिक रूप से किसी विशेष आकाशीय घटना के समय।
- 21:42इकट्ठे हो जाओ तो वह पल ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाएंगे।
- 21:54आकाशीय स्थिति ग्रह नक्षत्रों की और तुम्हारा झुंडों के अंदर
- 21:59श्रद्धा से युक्त हो। जीवन तत्व ये दोनों जब यज्ञ सा
- 22:06होंगे इकट्ठे होंगे तो स्वर्ग वहाँ शर्मा जाता है इससे।
- 22:26एक और व्यक्तित्व है, वह अकेला है और अकेलापन में वह सत्य में सदाफी
- 22:36डूबा रहता है वह सत्य, जिसकी एक झलक तुमने तीर्थों।
- 22:41पे। एक पल के लिए कवि पाई थी।
- 22:47लेकिन वो झलक बाहरी कार्यों से एक पल के लिए तुम्हारे भीतर आई।
- 22:51थी समेत जाना बहुत महत्वपूर्ण सवाल है, इसे बार बार सुनिएगा।
- 23:02श्रद्धा के उन लम्हों में जब तुम भीतर जाकर उस सत्य को छू लिए थे
- 23:09तो तुम्हे बड़ा आनंद और रसाया। था।
- 23:15तुम ध्यान करना। जब तुम काबा के पत्थर के बादशाह
- 23:20हो। तुम्हें कामभासन नहीं उठेगा, यही
- 23:26महत्त्व है जब तुम तीर्थ यात्रा पे जाओगे।
- 23:35श्रद्धा के इस स्थल पर कामभासन गायब होती है।
- 23:41क्रोध नहीं होता, ये कायब होते है, विकार गायब होते है, शुद्ध
- 23:48ऊर्जा बचती है। अपने शुद्धातम स्वरूप में बहुत से
- 23:57लोगों ने मुझे सवाल पूछे बाबा? तीर्थ स्थलों पे जाके काम वासना
- 24:04क्यों नहीं छूती? श्रद्धा का यही तो चमत्कार है।
- 24:13श्रद्धा के। वक्त।
- 24:16तुमने जो चाहा वो तुम्हें मिल जाता है।
- 24:27तुमने चाहा था आनंद और कामबासन में क्षणिक मिलता है सतपुरुष जो
- 24:37श्रद्धा के लिए उस स्थान पर जाकर बैठ गया, पालथी मार्कर स्थिति
- 24:42प्रज्ञा हो गया। उसको सदा के लिए मिल गया वो जीवन
- 24:48रस जिसकी खोज में वह था जो तुम्हें काबा के पत्थर के पास
- 25:01यरुशलम में। जहाँ भी तुम्हारी श्रद्धा है
- 25:08व्यक्ति था, मैं जहाँ भी तुम्हारी श्रद्धा है, वह तुम्हें एक पल के
- 25:17लिए मिला था कभी जो रस उस रस में सदा ही।
- 25:23चौबीसों घंटे डूबा रहता है, सत्तपुरुष उसे ही संत कहते हैं।
- 25:33यह एक वैज्ञानिक आयुजन था जो हमने बाहर से किया था।
- 25:43श्रद्धा से ले आना इस श्रद्धा से पी लेना।
- 25:57इस श्रेणी के घटना को वह तुम्हें अपने अंत में जाने में सहायक
- 26:07सिद्ध होगी। और वह रस जब भी किसी को मिला,
- 26:13अपने अंत से मिला, क्योंकि वह अन्त से में मौजूद है।
- 26:19बाहर पदार्थों का रस उसका मुकाबला नहीं कर पाएगा।
- 26:24बाहर पदार्थों का रस पीकर तुम रूखे, सूखे, पतझड़ के पत्ते के
- 26:29समान हो। जो वश टूटने के करीब है,
- 26:44लेकिन भीतर जाकर जब तुम उस शक्ति के तत्व को छू लोगे और छूते छूते
- 26:53तुम इतने रहस्य विभोर हो जाओगे। कि तुम्हें बाहर का पदार्थ रस ही
- 27:01नजर आएगा। यही कुछ हुआ।
- 27:04वध के साथ मृत्यु का क्षणिक स्मरण निरंतर स्मरण बन गया।
- 27:16मृत्यु का क्षणिक स्मरण सतत स्मरण बन गया और अकस्मात ही वह उस गहरे
- 27:27तन को छू गया जिसे हम सत्य कहते हैं।
- 27:31सत्य चित आनंद सत्यदानंद। आगाज कहा से हुआ।
- 27:44मृत्यु से मृत्यु का सतत स्मरण बुध को क्योंकि प्रथम बार मृत्यु
- 27:52को देखा था उसने उसके पिता ने आयोजन ही ऐसा किया था कि गौतम को
- 27:59कभी पता ही न चले। की मृत्यु हुई होती है।
- 28:05भारत था किशोर हुआ, जवान हुआ, शादी हुई, बच्चा हुआ फिर पिता ने
- 28:19सोचा अब कब तक छुपाएंगे इसको। मैं बूढ़ा हूँ चला बाज फ़ित हो
- 28:29गए। अब बताने का वक्त आ गया है।
- 28:36एक मित्र के घर भव्य आयोजन था। वह अक्सर घर पर आया करता था।
- 28:45उसने गौतम से कहा, हमारे घर भव्य आयोजन है, मैं रोज़ तुम्हारे पास
- 28:50रहता हूँ। इतने प्यार से कहा था, क्या तुम
- 28:53एक बार? नहीं आ सकते।
- 29:02उसका नाम था मित्र वरंदा। बाद में उसका शिष्य शुरू हुआ तो
- 29:13गौतम बोले पिता श्री से पूछ लो। वह राजा के पास गया, नमन किया।
- 29:32मैं आपसे आज्ञा चाहता हूँ गौतम को मेरे घर पे भव्य आयोजन है, एक
- 29:38त्यौहार है उसको हमने मनाना है गौतम की कमी मुझे खलगी मैं तब
- 29:46वृंदा ने कहा। क्या?
- 29:52आप। इन्हें मेरे घर जाने का इजाज़त दे
- 29:56सकते हो और जैसे शुद्धोधन सोचने ही रहा था कि कब तक छुपाऊँगा।
- 30:101 दिन राज़ तिलक की घोषणा भी करूँगा।
- 30:14इसे इन महरों की चार दीवारों से बाहर तो जाना ही पड़ेगा क्योंकि
- 30:19राजा को अक्सर जाना ही होता है। जनता से वार्तालाप करने के लिए
- 30:27जनता का सुख दुःख। जानने के लिए जनता की हौसला अफजाई
- 30:33के लिए राजा को बार बार जनता के बीच में जाना चाहिए तो वह राजा
- 30:43कभी गिरेगा नहीं जो राजा बार बार जनता से संवाद करता है।
- 30:53उनके हालो हालात से परिचित रहता वह राजा कभी नहीं करता राजा को।
- 31:09जनता के सुख दुःख में भागीदार हमेशा ही रहना चाहिए, वही राजा
- 31:15जनता का प्रिय होता है। शुद्धोधन ने कहा हाँ पुत्र मित्र
- 31:23वृंदा बिना शक मैं बहिप्त हूँ। मित्र वृंदा चला गई गौतम को जाति
- 31:38हो गई कह के कि पिता श्री ने इजाजत दे।
- 31:45दी है। तुम उस दिन याद करके मेरे पास आना
- 31:49अन्य का हम यह त्यौहार मनाएंगे। तुम बिन
- 32:12सब ठीक? तुम भी न जीवना कैसे बीता वो जो
- 32:26मेरे दिल से हाय पूछो मेरे। दिल से तुम बिन जीवन कैसे भी थे
- 32:43खूबसूर मेरे दिल से तुम्हें उसकी याद करा रहा हूँ तुम कैसे उसके
- 32:52बिना जीवन को गुजार रहे हो? जब व्यक्ति बुद्ध हो जाता है तो
- 33:02सोचता। है।
- 33:05यह अपने जीवन को कैसे ढो रहा है गुजार रहा है या ढो रहा है वास्तव
- 33:11में तुम अपने जीवन को ढो रहे हो जीवन एक भार है तुम्हारे लिए।
- 33:19तुम भी जीवन कैसा? जीवन पूछो मेरे दिल से।
- 33:27जो पहुँच गया उससे पूछो उसको तुम्हारी।
- 33:35स्थिति पे तरसता? है।
- 33:37तुम मुझे कुछ। तो लेते हो?
- 33:40तुम इतना क्यों बोले बाबा 5.5 वर्ष हो गए तुम्हें निरंतर बोलते।
- 33:47को हम लेक्चरर हैं, हम प्रोफेसर हैं।
- 33:5730 मिनट का भाषण देने की बगा लेते हैं।
- 34:03फिर तुम कब होते हो यही बात हमें प्रेरित करते हैं।
- 34:15मैं पूछता हूँ तुम दुखी क्यों हो? तुमने कभी अपने आप से पूछा?
- 34:25कभी पूछा तो आज पूछो जब संत पुरुष के चरणों में जाओगे तब पूछेंगे
- 34:35मैं ऐसा क्यों नहीं? मैं ऐसा क्यों नहीं?
- 34:45तुम कभी अपने आप से पूछ के देखना संत से पूछोगे तो संत कहेगा तुम
- 34:52ज़िन्दगी जी नहीं रहे? तुम दिनों को धक्के दे रहे हो,
- 35:01तुम ज़िन्दगी को जीने का सिलिका सीखे और जब तक व्यक्ति उस तल पर
- 35:09नहीं पहुंचता, उसे ज़िन्दगी को जीने का सिलिका ही नहीं आता।
- 35:18तो ऋषियों ने इसे खोज लिया था। क्या किया जाए?
- 35:26दिन भर रात चिंतित ऋषि आखिर में खोज ही लिए यह दो फलक की तलवार
- 35:37थी। यह तीर था।
- 35:41यह वो तलवार थी जिनके दोनों सिरे तेजधार से युक्त हैं।
- 35:46एक सिरानी शंशा को गिरा तो सबसे पहले।
- 36:02श्रद्धा स्थल पर चले जाओ अगर तुम्हें गुरु नहीं मिला परिपूर्ण
- 36:13तो आज तुझे हैरानी की बात है, क्योंकि गुरपूर्ण परिपूर्ण है ही
- 36:18नहीं। सब निहित स्वार्थों से युक्त गुरु
- 36:23बैठे हैं गुरु जनो मेरी बातों को ध्यान से सुन रहा हूँ तुम सब
- 36:29पाखंडी हो तुम लोभी हो तुम लालची हो निह तो स्वार्थ है तुम्हारा,
- 36:37चाहे वो जीने की ही कामना क्यों न हो?
- 36:39यह भी एक। लोभ है तुम्भ कांपों को इस बात को
- 36:47सुनता है। जीने की तमन्ना भी तुम्हारा लोभ?
- 36:52है। इसलिए महावीर ने कहा, जी वैष्णव
- 36:57जब तक छूट न जाए। तब तक तुम्हारा लोभ नहीं गया, यह
- 37:04अंतिम शब्द था उनका तुम कहते हो हमने लोभ त्याग दिया हमारे बाप ने
- 37:1540,000 करोड़ कमाया या हमने कमाया हमने गरीबों में बाँट दिया, लेकिन
- 37:20याद रखना। तुम अभी नहर लोभी नहीं हुए यह
- 37:26भ्रमण पाल लेना जो हमने इकट्ठा किया जीवन में अपना बाज्य न होवे,
- 37:33इकट्ठी मोया शंकर नाचार ठग्गी ठोरी मारकर।
- 37:40इसका उसका छीनकर जो हमने इकट्ठा किया वह हमने सब बाट मिला।
- 37:46लेकिन इतने से कुछ नहीं होगा और क्या करें सब तो बांट दिया बाबा।
- 37:58मैं तुम्हें आज एक अंतिम सबक देता हूँ।
- 38:04अगर उस श्रद्धा के समुद्र के पास पहुंचना है, उस समय गोते लगानी
- 38:13तीर्थनामा जीते से पावे मल मल के नहाना।
- 38:17उस तीर्थ के सरोवर में। कि।
- 38:26जब तक तुम्हारी जीने की तमन्ना नहीं खत्म होती है, ध्यान रखना इस
- 38:32शरीर को मारना नहीं है, यह तुम नहीं हो आत्महत्या तुम कभी कर
- 38:38नहीं सकते बड़ी ही मुश्किल बात है लोग कहते हैं।
- 38:42नैपोलियन कहता था नथिंग इज़ इम्पॉसिबल इन माई डिक्शनरी तो झूठ
- 38:49बोलता था, तुम अपने आपको नहीं मार सकते, यह इम्पॉसिबल है।
- 39:02यू कैनट हिट योरसेल्फ, फिर सुनिए सब तुम सब कर सकते हो, बट यू कांट
- 39:12हिट योरसेल्फ तुम अपने आपको आघात नहीं पहुंचा सकते यहाँ जाकर तुम।
- 39:20हार जाओगे क्योंकि तुम बहुत तत्व हो।
- 39:26जिसे कोई शस्त्र काटता नहीं, वायु सुकाती नहीं पानी गलातन अगन की
- 39:38ज्वाला। जैसे जलाती न हो तुम बहुत तत्व हो
- 39:43तुम अपने आप को हिट नहीं कर सकते और तुम कहते हो मैं बड़ा दुख हँसी
- 39:53आती है मुझे हरकतें इंसान पर। तुम कहती हो, भगवान ने
- 39:58सर्कमस्टैंसेस ही ऐसा बना दिया गलतियाँ तो खुद करे और दोस्त है
- 40:02भगवान महावीर कहते हैं कि तुम सब छोड़ दो, जब तुम्हारे बाप दादन हो
- 40:16तो मैं। जो पीढ़ी धर्म पीढ़ी तुम कमाते ही
- 40:20चले गए और तुमने भी खूब कमाया, लोगों की जेबें काटो, तुमने अपना
- 40:28पूरा जीवन आलम सुविधाओं से समपन्न कर लिया।
- 40:36और तुम सारा छोड़ दो। सारा छोड़ के जन मुनि हो जाओ
- 40:46महावीर कहते हैं तुम फिर भी मुन्नी ना हो पाओगे?
- 40:55फिर अब क्या रह गया? महावीर बिल्कुल अंकित शब्द कहते
- 41:01हैं, इसलिए मैं तुम्हें कहता हूँ, कृष्ण के बिल्कुल पैरेलल खड़े
- 41:04हैं। जीस ग्राउंड पे कृष्ण।
- 41:10खड़े हैं एक तरफ। बिल्कुल दूसरे विरोधी छोर पर खड़े
- 41:16हैं। इतना सम्मान है मेरे मन में
- 41:18महावीर के पत्र बुध तक तो हर एक व्यक्ति को पहुंचना ही होता है,
- 41:28जो पर्व अस्तित होने की तमन्ना लिए चलता है।
- 41:32उसे बुध तत्व आना ही होगा लेकिन उसके आगे और भी बढ़ाव है।
- 41:39राहतें और भी हैं। वसल की राहत के सिवा अभी तुम दुखी
- 41:44हो सकते हो और भी गम है जमाने में मोहब्बत के सिवा।
- 41:56तुमने जो कमाया, तुम्हारे बाप दादा ने जो कमाया, वीडियो ने जो
- 42:00कमाया तुम सारा जैन मुनि हो जाओ, लेकिन महावीर कहते हैं तुम मुनि
- 42:08नहीं हो पाई, तुम मन के वार नहीं हुए, तुम मन में ही उलझे रहे।
- 42:14तुम त्यागी हो जाओगे, बल्कि ज्यादा अहंकारी हो जाओगे, मैंने
- 42:18सब कुछ छोड़ दिया है। ये आई ए एस के डिग्री वाले लोग
- 42:23बोल सकते हो अपने सिधों पे भकबरी अच्छी शब्दकोश बहुत गना है।
- 42:35तज़र्बात बहुत हैं इनमे सब साहब कहे आंतरिक रहस्य के ज़रा भी
- 42:43नहीं। काश इन्होंने उस आंतरिक रहस्य की
- 42:46एक बूंद पीढ़ी होती कभी इन्हीं क्षणों में।
- 42:55आजकल तो ये सब लोग ही परमात्मा की व्याख्या करने लगे हैं।
- 43:01विकास द्विविकृति अजमेर की कथा कहते हैं अब मैं इससे बुद्धू कहूं
- 43:07या न कहूं, आध्यात्मिक कतल के लिए तो ये बुद्धू ही रहेंगे।
- 43:13संसारिक तल के दीजिये। सर वहाँ तो मैं भी इन्हें श्रेय
- 43:18देता हूँ तो महावीर कहते हैं कि तुम सब छोड़ दो, लेकिन फिर भी तुम
- 43:31मुनि नहीं होए, तो मुनि कैसे? होगे।
- 43:34वह ऊन मुनि अवस्था आएगी। कैसे?
- 43:39मन के पार कैसे होगे तुम? तो फिर वो कहते हैं कि ये भी छोड़
- 43:45दो कि मैंने सब कुछ छोड़ दिया क्योंकि ये तुम्हारे अहंकार को
- 43:51बढ़ाता है। मैंने सब कुछ छोड़ दिया जो कमाई
- 43:55था। उसका मतलब यह है कि तुम्हारा कुछ।
- 43:58था। और अभी भी तुम्हारा है चिपकाहट
- 44:03बनी हुई है, ये पट्टिकाएं देख लो। आचार्य प्रशांत के टेबल के ऊपर
- 44:09रखी हुई भूतपूर्व प्रशासनिक अधिकारी।
- 44:16यह क्या याद कराता है? जो कभी सरपंच रहा वो भी घर के आगे
- 44:21लिख देता है। भूतपूर्व सरपंच भूत हो गया, लेकिन
- 44:27सरपंच अभी सर के ऊपर चढ़ी हुई है। प्रशासनिक अधिकारी।
- 44:35अरे थी भाई जिन रास्तों को तुम लांघ गए और मंजिल तक पहुँच गए,
- 44:43जिन्हें छोड़ आए वो कभी रास्ते याद किया करते हैं।
- 44:47पथिक नहीं अगर तुम याद करते हो तो इसका मतलब तुमने मंजिलें को
- 44:52छुवाना। इसका मतलब तुम वहीं खड़े हो, अभी
- 44:58रास्ते पे चले हैं अभी अभी अगर तुम्हें याद आता है कि मेरे पास
- 45:06इतना कुछ था, मेरे तीन पीढ़ियों का सारा कमाया हुआ और मैंने भी
- 45:11खूब कमाए। और मैंने इतना दान किया तो
- 45:19तुम्हारे भीतर एक अभ्रांति अभी भी बनी हुई है कि कुछ मेरा था, जो
- 45:24मैंने बेगाना कर। दिया।
- 45:27महावीर कहते हैं, अभी तुम चुभ गए। अभी और चल राहतें और भी हैं।
- 45:36वसल की राहत के सवा इससे आगे भी एक मकान है।
- 45:42जब तुम्हें ये पता चल जाए कि तुम्हारा कुछ था ही नहीं ये नहीं
- 45:47तुम ही नहीं हो। यह शिक्षण तुम्हें यह पता चलता है
- 45:55कि तुम ही नहीं हो व्यक्षण पर प्रसन्नता का क्षण होता है लाचारी
- 46:05है तुम्हारी कि तुमने अभी वह क्षण छुआ।
- 46:10तुम्हारे सारे न्यूरॉन भरे पड़े हैं।
- 46:14उन न्यूरॉन में यह बात भी जमा हो जाएगी कि मैंने ये ये छोड़ा तुम
- 46:19एकएक चीज़ को रिश्त बनाकर दे सकते हो कि मैंने ये ये छोड़ा दो
- 46:25मित्रों की। प्रेमी प्रेमिका का झगड़ा होता है
- 46:28ना तो लिस्ट बना के भेज देते है एक दूसरे के पास मैंने तुम्हारे
- 46:33लिए ये कुछ किया था प्रेमी भी लिख के भेज देता है और प्रेमिका भी
- 46:40लिख के भेज देती है की इन क्षणों के अंदर तुम फंसे हुए तरह मैंने
- 46:44तुम्हारे लिए ये किया था। यह उपकार था, यह उपकार था।
- 46:51यह उपकार था या व्यापार था व्यापार?
- 46:56था क्योंकि इसके बदले में तुम आज उससे चाहते हो की अब तुम भी उपकार
- 47:00करो, तुम भी व्यापार करो। जब मैंने तुम्हारे बुरे दिनों में
- 47:06तुम्हारा शंख नहीं छोड़ा तो अब तुम क्यों भागते हो?
- 47:12तुम क्यों भगोड़े हो गए? तुम भी मेरा साथ हो, कंधे से कंधा
- 47:17मिला के चलो तो अभी याद है तुमने कुछ छोड़ा था तो फिर छोड़ा कहाँ
- 47:22रह गया? जब तनक तुमने जो कमाया जो कुएं
- 47:29में घरा दिया नेकी करो दरिया में डाल पता ही न चले।
- 47:37इसलिए सन्तों ने कहा तुम दायें हाथ से दान करना बाएं को पता न
- 47:42चला। फिर वो दान दान तुम्हें याद कराइ
- 47:49लो 100 बार याद कराइ फिर भी तुम कहो नहीं मुझे याद नहीं तुम्हारे
- 47:57मनुष्य पटल पे वह चित्र खुदे ही। उन लम्हों में दिया गया दान साकार
- 48:08होता है। बह सार्थक होता है जो दान तुमने
- 48:13दिया और तुम्हारे मनस पटल पर खोदा न रह गया, अन्यथा वह व्यापार था
- 48:19तुमने उसके बदले में कुछ चाहा होगा।
- 48:30महावीर कहते हैं, सब छोड़ने के बाद ही रोज़ खबरें आती हैं।
- 48:42फला व्यक्ति ने 40,000 करोड़ छोड़ दिए और तुम उसके पांव सुनते हो कि
- 48:48हम तो ये नहीं कर सकते प्रभु इसलिए दान का इतना महत्त्व था।
- 48:54ये बनाया तो ऋषियों ने था फायदा उठाना शुरू कर दिया।
- 49:03पाखंडियों ने बनाया था ऋषियों ने सबसे।
- 49:14आसान धन छोड़ना है, धन हाथ की मैल है, यहाँ से शुरू करो तो संस्कार
- 49:25पड़ जाएगा छोड़ने का और संत भलीभाँति जनता है।
- 49:30और अगर संत नहीं जानता तो फिर कोई भी नहीं जानता।
- 49:35संत जानता है कि आज अगर शुरू करोगे छोड़ने से कल को तुम्हें
- 49:41अपना आपका छोड़ना पड़ेगा, संस्कार बढ़ते ही जाएंगे।
- 49:49छोड़ने के छोड़ते चले जाओ, छोड़ते चले जाओ, छोड़ते चले जाओ और अंत
- 49:55में संत जानता है जी यह संस्कार इतना बड़ा हो जाए कि तुम्हें खुद
- 50:01ही को ही छोड़ना। पड़ेगा।
- 50:07कहीं तुम गलती में तो नहीं हो। ज़रा सोचना बैठ के लेकिन सोचने से
- 50:14हैलो होगा न तुम कहोगे नहीं मैं कोई गलती नहीं एक मारवाड़ी स्त्री
- 50:25मर के ऊपर पहुँच गयी थी। आठ बार एकएक पीसा दान किया था एक
- 50:35पीसा, तब बहुत। होता था।
- 50:42और सोचा था कि जब मैं जाउंगी तो ढोल नगाड़ों से मेरा स्वागत होगा।
- 50:49फूल बरसे। स्वर्ग के लोग मेरे चरण पूजायेंगे
- 50:56धोयेंगे और वो पियेंगे लेकिन ऐसा कुछ भी तो नहीं हुआ वो थोड़ा सा
- 51:05लाइन में बाहर होने की चेष्टा की सुन ने कहा ठहर लाइन के बीच मत
- 51:10रही हो। भीतर तो कहता था, हमने आठ बार एक
- 51:15एक पीसादा किया। खैर निपटते निपटे, उसकी भी बारी आ
- 51:21गई। उसने कहा बताओ तुम स्वर्ग जाना
- 51:28चाहती हो या नरक? अब उसमें तो मान बहुत गहरा था।
- 51:34मारवाड़ी थी और मारवाड़ियों में तो बहुत गहरा होता।
- 51:37है। मन तो बार बार कह रहा था आठ बार
- 51:42दान किया एक एक पीसा पर पीसा बहुत होता था, उस वक्त बा मुश्किल एक
- 51:49पीसा बनता था। हमारी दादी के पास दो चव्वनियां
- 51:53थीं। चार आने तो उन्होंने अपनी साड़ी
- 51:59के साथ दो गांठें अलग अलग बांध रखे थे।
- 52:02यह सत्य घटना बताता हूँ। तब वह पैसे के कीमत थे इतना बड़ा
- 52:11घर। हमने 1100 में लिया था।
- 52:12पिता जी मैं बात सुना रहा हूँ अपनी दादी की दो चवन्नियां थीं और
- 52:20साड़ी के दो पहलू। में बांध रखे थे तो पिता जी ने
- 52:24पूछा माँ? यह दो चुन्नियां तो इकट्ठे क्यों
- 52:31नहीं बांध लेते? ये दो गांठें मारने की क्या जरूरत
- 52:35है या कुछ इसमें विशेष कारण है? कोई टोटका है?
- 52:40कहते नहीं नहीं कोई टोटका नहीं फिर तुम इकट्ठे क्यों नहीं बांध
- 52:44लेते? वो दादी बोली बेटा कैसे जाएंगे?
- 52:50शून्य कैसे तो आठ बार पीसा दान किया था।
- 52:57अब। उसकी चनाई धर्मराज ने पूछा,
- 53:06स्वर्ग जाओगी नर्क? अब उसके सपने तो सारे ढोल दूर से
- 53:17उसका वो सोचना ढोल नगाड़े बजेंगे, फुल बरसेंगे, अमृत कलश निकाले
- 53:25जाएंगे। इतना ज़ोर शोर से रिसेप्शन होगा।
- 53:34तुम सोच ही नहीं सकते। उसने आठ बार की वीसा दान करके
- 53:40बड़ा कमाल का काम किया था, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।
- 53:48सपनों में खोई खोई जब धर्मराज ने कहा भाई पीछे लाइन बहुत लंबी है
- 53:54बसंती देवी। अच्छा कोई बात नहीं, ठीक?
- 54:04लेकिन मुझे सोच लेने दो। धर्मराज तो देख के तो यह तो सोच
- 54:11रही। है।
- 54:14धर्मराज ने कहा तुम ऐसे करो, अपने यमदूत से कहा, अपने गल्ले में से
- 54:20आठवीं से निकाल के लाओ। झट से आठ पीसे आ गए।
- 54:25अब बीती देर इतना वक़्त कहाँ है, देखो कितनी लम्बी लाइन है सारे
- 54:31संसार में पल पल चार चार बंदे मर जाते हैं और सब यहाँ आके खड़े हो
- 54:35जाते हैं तो धरमराज ने आठ पीसे लिए।
- 54:47और कहा हाथ करो। आगे तो आठ पीस के हाथ में रख दिया
- 54:54और यमदूत से कहा बस इसका पुण्य यही था, इसको नरक में ले जाओ।
- 55:04तुम्हें इतना ही गुमान रहता है और तुम्हें छोड़ो प्रेमी प्रेमकाओं
- 55:11को यही गुमान मार जाता है प्रेमी प्रेमकाएँ आपस में व्यापार की।
- 55:21बात तो नहीं करती लेकिन उनका क्षेत्र व्यापार से भरा होता है।
- 55:24मैं इस वक्त तुम्हारे काम आया था। मैं इस वक्त तुम्हारे काम आई थी।
- 55:29सारी चेहरी तो जब चाहे निकाल लेना इनके भीतर जमा पड़ी और जब तक कोई
- 55:35व्यक्ति उस स्तर पर नहीं पहुँच सकता तो यह बुद्धि।
- 55:39का हिसाब किताब खत्म होता है। बुद्धि का हिसाब किताब उस वक्त
- 55:45समाप्त होता है जब तुम बुद्ध हो जाते हो, फिर वह नहीं सोचेगा।
- 55:50मैंने क्या कुछ छोड़ा और उतना कुछ छोड़ा जितना तुम पाना चाहते हो?
- 55:56उससे भी 1000 गुणा ज्यादा छोड़ दिया बुद्ध ने।
- 56:00और कब का छोड़ दिया तो बुद्धि के पार होने के बाद ही समझाती है कि
- 56:07तुमने छोड़ा क्या खाक था और महावीर के पास जब तुम उस स्तर पर
- 56:14पहुंचते हो तो तुम्हें पता चलता है तुम हो ही नहीं।
- 56:18कृष्ण के तल पर पहुँचता है। जब व्यक्ति तो वह पाता है।
- 56:22तुम हो तो नहीं लेकिन तुम्हारी एक सांगरचना ऐसी भी है जो अनंत है,
- 56:28जो विराट है, इसलिए मैं दो छोर कहता हूँ महावीर के और कृष्ण।
- 56:35महावीर भी जान जाते हैं कि मैं हूँ ही नहीं, लेकिन तत क्षण पता
- 56:44चलता है। जब मैं नहीं हूँ तो पता चलता है,
- 56:48मैं बूंद की तरह नहीं हूँ, मिट गया, लेकिन मैं अनंत की तरह हो
- 56:54गया। जब बूंद समुद्र में समर जाती है
- 56:59तो बूंद बूंद की तरह मर जाती है और समुद्र की तरह हो जाती है।
- 57:05इसलिए मैं विरोधी छोर पर कहता हूँ।
- 57:08ऑन द सेम ग्राउंड लेवल दोनों ही एक तट पर खड़े हैं।
- 57:14महावीर भी उसी ग्राउंड पे है, बिल्कुल समतल जमीन पर, लेकिन
- 57:19उन्होंने ये पा लिया है व्याख्या में पता उन्हें भी है क्या?
- 57:24मैं कौन इस बात से कुछ हो? ही नहीं है कि उन्हें पता नहीं
- 57:35चला कि मैं कौन हूँ? सब पता चल गया लेकिन व्याख्या
- 57:39करने का ढंग ये है क्योंकि दो ढंग है तो महावीर एक व्याख्या करते
- 57:44हैं कि मैं नहीं वो कहते हैं सब ईश्वरणाएं छोड़ दें धन की।
- 57:52परिवार की व्यापार की सब ईशनाएँ छोड़ दी और तुम मुनि हो गए हो, यह
- 57:59मत सोच ले। मुनि कब हो गए?
- 58:02जब तुम जीव ईशना छोड़ोगे जीने की इच्छा भी छोड़ दो तो क्या मर जाए?
- 58:08तुम मर सकते हो? अब फंस गए ना तुम जब मरने चलोगे
- 58:19तो कृष्ण अड़े आ जाएंगे। वो कहेंगे तुम मर तो सकते, तुम तो
- 58:23अजर हो, तुम तो अमर हो नैनम चिदं त्रिशस्त्रण नैनम दहती पावका न
- 58:28चनौक्रेधन तापू न सो सती मारूता। तुम्हें कौन चला सकता है तुम?
- 58:37महावीर कहते हैं कि तुम हो ही नहीं, जो है ही नहीं, वो अपना
- 58:44वजूद को ही क्यों ना दे? वह क्यों माने?
- 58:52कि मैंने त्याग किया, त्याग करने वाला ही विदा हो जाए।
- 59:00जब तुम ऐसा परिभाषित करने लगोगे तो तुम समझोगे, तुम महावीर के
- 59:05तर्क पर आ गए। तो महावीर कहते हैं, जीवेशण सबको
- 59:10छोड़ना होगा, यह भी एक इच्छा है। जीने की एक इच्छा भी इच्छा है तो
- 59:19वो कहते हैं कि बुद्ध की इच्छा भी इच्छा है, बांटने की इच्छा भी
- 59:24इच्छा है। हम बांटना चाहते हैं तो ये भी एक
- 59:33इच्छा है मनो तुम्हारे दुख दर्द को देख कर रहमो कर्म आता है लेकिन
- 59:42अच्छी तरह से जानते हैं। कि यह जीवेशणा हमने खोदने बांधी
- 59:47है। यह गांठ हमने खोदने लगाई है चला
- 59:52था त्रिवेणी संगम में छलांग लगाने के लिए जीवेशणा खत्म थी।
- 1:00:02आवाज आई कि तुम्हारा काम अभी पूर्ण नहीं।
- 1:00:04हुआ। अभी ये सब चल रहा है।
- 1:00:08बाहर भीतर का सब सही है तुम्हारा ऑपरेटर्स उपकरण बिल्कुल से ही काम
- 1:00:15कर रहा है तो फिर अभी थोड़ा काम। और कर रहा है।
- 1:00:23कर सकते हो? इन रोती हुई रोहनों की तरफ झांका
- 1:00:33उन हृदयों को देखा जो आग में जल रहे थे उन प्यासों को देखा?
- 1:00:39जिनके कंठ सूखे हुए थे, उन गर्मी से मारी बेचारी हाइड्रेटड करना
- 1:00:51था, उनको डिहाइड्रेटड के शिकार हो गए थे, वो कुछ ही याद आया।
- 1:01:02फिर ये कैसे हो सकेगा? यह ऐसे हो सकेगा कि किसी नकली
- 1:01:10ईशिणा के साथ अपने आप को और मैं अच्छी तरह से जानता हूँ।
- 1:01:17कि राजनीति एक नकली ईशन है। मेरे भीतर से नहीं आई, बिल्कुल
- 1:01:23नहीं आ भी नहीं सकती। जीस व्यक्ति ने सारी उम्र बोला कि
- 1:01:28राजनीति कीचड़ हो और आज भी मैं जानता हूँ कि कीचड़ा है लेकिन
- 1:01:34नकली ईशणा से बांध लिया। कुछ देर के लिए और जब।
- 1:01:40टूटते टूटते, टूटते टूटते। यह ईशना भी टूट जाएगी।
- 1:01:44ज्यादा दिन की नहीं है, ज्यादा देर की कहाँ है जो नकली है?
- 1:01:50मैंने खुद ही बनाई है बुद्ध व्रष्ठों का निराला अंदाज देकर।
- 1:01:59बुत परस्थों का निराला अंदाज देखा है, खुद तराशा है और नाम भगवान
- 1:02:05रखा है। मैंने खुद ही बनाई है ये गांठ
- 1:02:11लेकिन ध्यान रखना ये गांठ नहीं। ये मेरी क्रिएशन है कुछ देर और
- 1:02:20ठहर जाऊं, जाऊं खिसक तो जला था। जीवेशना बिल्कुल नहीं है लेकिन
- 1:02:26जीवेशना नकली बना ली गई है। ये घणित जीवेशना है, ये नेचुरल
- 1:02:32नहीं है। यह मेरी खुद की सेल्फ मेड है और
- 1:02:38यह बनाई है सिर्फ किसी कारण से कि किसी ना किसी तरह से इन
- 1:02:43कुकर्मियों से तुम्हें छुटकारा दिलाती।
- 1:02:46है। इन दुष्टों से तुम्हें छुटकारा
- 1:02:51दिलाती है। इन मूर्खों से तो मैं छुटकारा तलब
- 1:03:03महावीर कहते सब छोड़ना पड़ेगा और जिसने छोड़ दिया अन्त में, उसे भी
- 1:03:09छोड़ना पड़ेगा कि मैंने छोड़ दिया, थोड़ी गहरी बात है।
- 1:03:16बार बार सुनने पर समझ पाओगे मैंने क्या कहा है मुझे अभी तो लोग कह
- 1:03:24देते हैं आपने जाने के लिए टिकट बुक कराया है दखाओ तो देखिये
- 1:03:32संतों को कहाँ तक ज्वालाओं का चयन करना पड़ता है।
- 1:03:37हम बोलते हैं इनसे कुछ नहीं लेते, इनसे कुछ नहीं मांगा हमने तुमने
- 1:03:44जो दिया अपनी इच्छा से दिया। हमने कोई अमाउंट तय नहीं किया था,
- 1:03:52लेकिन तुमने जो किया अपनी इच्छा से किया।
- 1:03:58खुद तराशा है और नाम भगवान रखा है श्रद्धा के केंद्रों पर जाकर
- 1:04:13क्योंकि वो दीवारें। अनगणित लोग आए श्रद्धा से युक्त
- 1:04:18आए और देखिए काबा का पत्थर हो या तुम्हारी तीर्थ स्थल हो तुम वहाँ
- 1:04:28काम वास ललित के लिए नहीं जा सकते।
- 1:04:31यह बड़े मज़े की बात। है।
- 1:04:33वहाँ कुछ आबो हवा ही ऐसी है। वहाँ जाकर वहाँ की हवाओं की
- 1:04:40तिरंगों को पीकर तुम कम रहित हो जाते।
- 1:04:42हो? एक पल दो पल के लिए तुम्हें यह
- 1:04:53मूर्तापूर्ण महसूस ही हो सकता है कि हम तो काम वासना से रहित हो
- 1:04:59गए, लेकिन नहीं। यह वक्त का और सर्कमस्टैंसेस का
- 1:05:05प्रभाव था जब तुम इतनी श्रद्धा से भरे हुए यहाँ आए थे क्रोध खत्म,
- 1:05:11कामखर्क लोग खत्म बहुत खत्म, अहंकार खत्म सब खत्म हो जाता है
- 1:05:18यहाँ। इतना प्यारा क्यों है काबा का
- 1:05:26पत्थर? यह सब बाहरी तंत्र का परिणाम है
- 1:05:33काबा के पत्थर ने आसपास के दीवारों ने इतनी श्रद्धा की करने
- 1:05:38भी नहीं कि उसका रोम रोम। जीवंत व्यक्ति की तरह परिपूर्ण हो
- 1:05:47गया लेकिन ध्यान रखना बिखेरता नहीं है।
- 1:05:49अभी संत। बिखेरता है।
- 1:05:57दीवारों के रोम नहीं होते, संत के शरीर के रोम होते हैं।
- 1:06:03उसके शरीर का हर रोम बिखेरता है। बस यही फर्क है संत में और तीर्थ।
- 1:06:10में। संत के भीतर तीर्थ होता है जीवंत
- 1:06:15जागृत, लेकिन तुम मृत तीर्थों के पास जाते हो।
- 1:06:20वे भी काम। के हैं वहाँ से शुरू कर लेना।
- 1:06:24वहाँ से एक चिंगारी ले आना आग की जैसे पुराने जमाने में।
- 1:06:32आग। दूसरे घरों से मांगी जाती।
- 1:06:35थी। वो जमाने तुम्हें देखनी होगी,
- 1:06:39हमने देखा। आग नहीं है पड़ोसी के घर से आग ले
- 1:06:44आओ वो राख के भीतर ढक के रखते थे आग को आज तो माचिस में बंद कर तब
- 1:06:53आग भांग के लेके आते थे फिर उस आग से उत्पन्न कर लेते थे जौलों को।
- 1:07:02तो तीर्थों से काबा के पत्थर से आग मान के लिया और फिर घर पे आके
- 1:07:13ज्वालाओं को प्रकट कर लेना पर जलवात कर लेना सारे माहौल।
- 1:07:18उस आनंद के प्रवाह में डूब जाना है।
- 1:07:24तीर्थों का ये महत्त्व था काबा के पत्थर के पास जाके इतनी शांति
- 1:07:28इसलिए मिलती है क्योंकि वह अर्पों खर्पों खर्पों खर्प व्यक्तियों के
- 1:07:36आस्था को पी गया है। श्रद्धा को पी गया है इसलिए वहाँ
- 1:07:44जाकर आपको बड़ी शांति मिलेंगे। थोड़ा सा एरिया होता है उसका
- 1:07:51दीवारों का भी एरिया होता है। लेकिन जीवंत तीर्थों का सत
- 1:08:01पुरुषों का एरिया तो बड़ा दूर। तक होता है।
- 1:08:07सच में पूछो तो हज़ारों मील। तक।
- 1:08:11यह सारा ब्राह्मण एक बार तो नाचेगा।
- 1:08:16जब कोई अपने अन्त को छूएगा तो जब तुम निकलते हो काबा के पत्थर के।
- 1:08:26पास। हजारों करोड़ों की तादाद में जब
- 1:08:30तुम अल्लाह का याद करते हो ना? उसकी प्रेसेंट्स को याद करते हो,
- 1:08:37उसकी होड़ को याद करते हो तो वह बिखरता है।
- 1:08:42तुम्हारे ऊपर और तुम उन। कारणों से ओत प्रोत तुम कहते हो
- 1:08:48आह बड़ी शांति। बस तुम्हें साइंटिफिक व्याख्या
- 1:08:55में आज समझा पाया अगर तुम समझ पाओगे तो तुम धन्यवाद समझाने की
- 1:09:01चेष्टा मैंने की है परिपूर्ण उपाय तो काबा के पत्थर के पास जाओ जहाँ
- 1:09:07तुम्हें श्रद्धा है अगर हिंदू जायेगा काबा के पत्थर के पास?
- 1:09:11तो उसके ऊपर ये कुछ नहीं होगा जो जैसा मुसलमान के साथ होता है
- 1:09:16मुसलमान जाएगा। तीर्थों में वो कहेगा पानी के
- 1:09:19सिवा कुछ भी नहीं, कुछ नहीं। गंगा के पानी पानी है, बस नहा लो
- 1:09:29और चले जाओ, हुआ तो कुछ भी नहीं। होगा भी नहीं हिंदू को काबा के
- 1:09:36पत्थर के पास कुछ नहीं होगा मुसलमान को गंगा सागर, ऋषिकेश में
- 1:09:43कुछ नहीं होगा गंगा में पानी की। जरूरतों की तरह वह पूर्ति करेगा।
- 1:09:56क्या चुक गया? श्रद्धा चुक गयी एक पक्ष चुक गया
- 1:10:05जो मैंने समझाया था मार्ग और श्रद्धा।
- 1:10:10तुम्हारी बात चलता है, मार्ग नहीं है, इसलिए जो तीर्थों पे जाते हैं
- 1:10:21वो पल दो पल के लिए अपने अंतर को छू लेते हैं।
- 1:10:24निश्चित ही श्रद्धा के लिए नहीं जो काब में जाते हैं।
- 1:10:31पत्थर के साथ जब वह अपने अंत समय छूते हैं तो पल दो पल के लिए उस
- 1:10:40प्रेम में डूब जाती है। आँखें अशुरो से तुम्हें निहाल कर
- 1:10:44देती है, तुम्हारा रोवां रोवां धन्य हो उठता है।
- 1:10:52लेकिन जैसे ही तुम घर पर तोगे ओये डाक के तीन पात शनि क्रांति गठित
- 1:11:04होती है तीर्थों पे कहा बाकी पत्थर के पास।
- 1:11:11और स्थाई क्रांति गठित होती है। संत में संत के पास में, संत में
- 1:11:20संत के पास तो वह प्रचुर मात्रा में मिलेगा, जो तीर्थों पर तुमने
- 1:11:25नहीं कमाया। जो तीर्थों में तुम्हें आनंद नहीं
- 1:11:28मिला वो संत के पास बैठने से मिल जाएगा।
- 1:11:32इसलिए मैं दीक्षा देते वक्त 510 मिनट लगा देता हूँ।
- 1:11:38इस सारी प्रोसेसिंग में ताकि वो यहाँ की आसानी तरंगों को उतनी देर
- 1:11:43तक पी सकें। बैठ आऊंगा आराम से आँखें बंद कर
- 1:11:49लो अपने आपको ढीली छोड़ो, मृत वत हो जाओ यह सारी प्रोसेसिंग
- 1:11:58करूँगा, आँखें बंद करेंगे, अपने भीतर जाएंगे अपने भीतर जाएंगे ऊपर
- 1:12:02से मैं थोड़ी सी एनर्जी भी फेंकूंगा।
- 1:12:05आसानी तरंगों को भी उनके ऊपर फेंकूंगा जो आँख खोल के बैठ
- 1:12:17जाएंगे समझ लेना कि वो पीने नहीं आए, वो निहार में आए कि यह कहीं
- 1:12:25कोई लुटेरा तुम्हें इसलिए एक बार रोहित बैठकर।
- 1:12:31मैंने कहा तुम यहाँ से चले जाओ, यहाँ मत बैठा करो क्योंकि अगर
- 1:12:40तुम्हारे मन में एक बार श्रद्धा आ गई, एक बार श्रद्धा आ गई तो सारी
- 1:12:47श्रद्धाओं को दी जाएगी। क्यों तुम अभी कच्चे हो पक जाने
- 1:12:55के बाद? तो फिर तुम चाहे कितनी ही देर
- 1:12:59बैठे रहें कच्चे खड़े हो, मैं कुछ नहीं करता।
- 1:13:07मैं स्टिल बैठा हूँ वैसे और तुम मुझे निहारते रहोगे?
- 1:13:11मैं स्टिल बैठा रहूँगा और भीतरखानी सब प्रोसेसर जारी
- 1:13:15रहेंगी, करने वाला करता रहेगा और तुम मुझे देखोगे बाबा वैसे ही
- 1:13:20बैठे पॉसिबल है कि तुम्हारी सर्दा टूट जाए।
- 1:13:27बरसों वर्षों से कमाई हुई श्रद्धा एक पल में टूट जाया करती है इसलिए
- 1:13:33जिनकी श्रद्धा एक बार टूट गयी। मैंने उन्हें कर भद्र प्रार्थना
- 1:13:37करती, क्या भाग जाओ? रहमान धागा प्रेम का मत तोड़ो
- 1:13:42झटका है। टूटे पाछे नहीं मिले, मिले गांठ
- 1:13:48पर जाए श्रद्धा को बिल्कुल मत टूटे तो कोई भी ऐसा प्रश्न अगर मन
- 1:13:54में आता तो उसको गुजर जाने दो। अतिथि की तरह आया और चला गया।
- 1:14:07आकाश के ऊपर बादलों की तरह आया और चला गया तुम उसे व्यख्यायित करना
- 1:14:13मत, तुम उसका उत्तर मांगना मत क्योंकि तुम्हारी सब प्रश्न
- 1:14:21तुम्हारे। दुख से आते है।
- 1:14:24और यह प्रश्न गुरु के सामने मत रखना अगर तुम शिष्य का शिष्यत्व
- 1:14:32का आनंद लेना चाहते हो तो प्रश्न आएँगे और जाएंगे।
- 1:14:39इन्हें बादलों की तरह देखना समस्याएं आएँगी और जाएंगे।
- 1:14:44इन्हें बादलों की तरह देखना तुम बादल हो नहीं, लेकिन बादलों से
- 1:14:50तुम ऐडेंटिफिकेशन कर सकते हो। तुम बादल तो नहीं हो लेकिन इतनी
- 1:14:57मूर्खता जरूर हो सकती है। तुम्हारे भीतर के तुम बादल को ही
- 1:15:02अपना होना मान लो। यही मूर्खता इस पृथ्वी के
- 1:15:11प्रत्येक प्राणी में जिससे संत काटने के लिए आता है और जैसे जैसे
- 1:15:23इतनी। मूढ़ता बढ़ जाती है।
- 1:15:26चारों तरफ गना अँधेरा है। वो अंधकार किस चीज़ का है इस
- 1:15:30मूढ़ता का कि मैं कौन हूँ? जदजदा ही धर्म सगला निर्वाती भारत
- 1:15:37धर्म जब जब जैसे जैसे तुम स्वभाव को बोलते चले जाते।
- 1:15:41हो? जदा जदा ही धर्म से गलानेर भक्ति
- 1:15:45भारत जैसे जैसे तुम अपने स्वभाव को भूल जाते हो, तो मैं वास्तव
- 1:15:50में कौन हूँ? अभ्बुत थानम अधर्मश्य मैं बादल
- 1:15:58हूँ, तुमने तादाद में बना लिया इस।
- 1:16:02आइडेंटिफिकेशन को तोड़ने के लिए अधर्मश्य रित्रानाय साधूनाम वह जो
- 1:16:13व्यक्ति खुद को याद करना चाहता है वह जो इस आइडेंटिफिकेशन से तंग आ
- 1:16:20गया है। जिसके लिए जीवन के सारे।
- 1:16:26भोग दुख हो गए हैं। बुद्ध ने कहा ना दुख है, तुम
- 1:16:31कहोगे क्या दुख है सब कुछ तो है तजात्मा नाम शजाह में हम।
- 1:16:39जो खुद की आत्मा में तलीन होना चाहते हैं उनको बचाने के लिए सृजन
- 1:16:44करने के लिए पृतृणा ये साधू नाम बिना शायद है दुसके का जो इस भ्रम
- 1:16:51में पड़ गए कि मैं कौन हूँ उनका भ्रम हटाने के लिए?
- 1:16:56रित्रा नाय साधु नाम साधु कोण जो खुद जानना चाहता है कि मैं हूँ
- 1:17:00कौन? लेकिन इन पाखंडों के जालसमूह में
- 1:17:04आके राधे राधे जाबते रहो तुम्हें खुद का पता चल जाएगा पांच नाम
- 1:17:10जबते रहो तुम्हें खुद का पता चल जाएगा।
- 1:17:13इन मूर्खों ने पाखंडियों ने जो तुम्हें रास्ता गलत दिखा रहे हैं,
- 1:17:17इनका विनाश करने के लिए पृतनाय साधु नाम बिना शाई के दुष्यकृताम
- 1:17:24कृष्ण कहते हैं कि दुष्यकृत कृत्य करने वाले लोग हैं, यह है।
- 1:17:32भोली भाली जनता को भड़काते मार्गदर्शन इनका गलत है क्योंकि
- 1:17:39जाना नहीं खुद और जिसने खुद जाना नहीं उसका मार्गदर्शन गलत ही होगा
- 1:17:48धर्म संस्थापनार्थाय। तुम कौन हो यह दिखाने के लिए यह
- 1:17:54संस्थापन करने हेतु संभवामी युग युग युग युग युग में मैं किसी ना
- 1:18:02किसी रूप में प्रकट होता ही रहता हूँ।
- 1:18:04यह परमात्मा के गुण में कृष्ण के मौके द्वारा बोली गई वाणी।
- 1:18:12उस अखंड उस असीम वाणी उसकी है। जदा जदा ही धर्म से गलानिड भक्ति
- 1:18:22भारत अब्दुथानम अधर्म से ददात्मनम सर्जामेहम पृत्रा नाय साधु नाम
- 1:18:28विनाशय से दुष्कृताम। धर्म संस्थापना अर्थाय धर्म की
- 1:18:35संस्थापना के लिए धर्म क्या है? स्वभाव तुम्हारा स्वभाव बताने के
- 1:18:40लिए तुम्हारा स्वभाव क्या है? नैनम षदन्त शस्त्रण नैनम बाहुती
- 1:18:45भाव का नैनम उगले, जनता को नैन शती मारूता।
- 1:18:50यह तुम्हारा शुभम यह बताने के लिए मैं अलग अलग रूपों में अलग अलग
- 1:18:57विषयों में अलग अलग वक्त वक्त पर आता ही रहता।
- 1:19:02हूँ पित्रा नायक साधू जो स्वयं को जानना चाहते हैं उन्हें बताने के
- 1:19:16लिए और देखिए किसी भी नाम जब से तुम स्वयं को नहीं जान पाओगे कोई
- 1:19:26भी नाम जब तुम्हें दूसरे को जानने में मदद देता है।
- 1:19:31राधे राधे करने से तुम खुद को कैसे जान पाओगे?
- 1:19:37पांच नाम को जपने से तुम खुद को कैसे जान पाओगे?
- 1:19:451000 नाम जपने से तुम खुद को कैसे जान पाओगे?
- 1:19:49रामचरित मानस पढ़ने से तुम खुद को कैसे जान पाओगे?
- 1:19:55शास्त्र पढ़ने से वेदों को प्राणों को उपनिष्ठों को पढ़ने से
- 1:19:59तुम खुद को कैसे जान पाओगे? खुद को जान पाओगे अपने भीतर, अपने
- 1:20:07भीतर, अपने अंतः समय उतरने को जहाँ तुम्हारी खुद खुद ही।
- 1:20:13विराजमान है जिसे भगवान कृष्ण ने कहा स्थिति प्रज्ञा हो जा ये
- 1:20:20पार्थ। संभव वाणी युग शुक्र युग युग में
- 1:20:30प्रकट होता हूँ मैं तुम्हें क्या बतलाने के लिए स्वभाव बतलाने के
- 1:20:36लिए तुम हो कौन तुम बादल नहीं हो। बादल आसमान में आते हैं, जाते
- 1:20:45हैं, विचार आते हैं, जाते हैं, भावनाओं आती हैं, जाती हैं,
- 1:20:50घटनाएं आती हैं, जाती हैं। ये तुम नहीं हो, फिर तुम कौन हो
- 1:20:57तुम इन घटनाओं को देखने वाले हो? तुम जैसे स्वप्न को देखते हो, सोए
- 1:21:04पड़े होते हो, मैं जागता हुआ वो तत्व हूँ तुम वो ही तत्व हो जो
- 1:21:11जागकर उस मन से चित्र मन स पटल पर चलते हुए स्वप्न को निहार रहे
- 1:21:17होते हो, वो तुम हो। गलती से तुमने मान लिया है ये
- 1:21:35बादल जो आये जो सर्कमस्टैंसेस जो आये वो तुम हो गलती से तुमने मान
- 1:21:43लिया कि ये दर्द तुम हो। गलती से तुमने मान लिया यह शरीर
- 1:21:50तुम हो विचार तुम हो विचार तो पल पर बदलते हैं, फिर तुम्हारे कितने
- 1:21:55स्वरूप हैं, तुम्हारा तो एक ही स्वरूप है।
- 1:22:10मन बदलता ही रहता है मन, चंचल मन जो मन के मते ना चा लिए पलक पलक
- 1:22:23मन हो मन लो ही मन लालची कभी लोभ आता है, कभी लालच आता है।
- 1:22:33कभी काम बसना आती है, कभी रोज़ आता है, कभी लोभ आता है, कभी
- 1:22:41अहंकार आता है, लेकिन ये तुम नहीं हो।
- 1:22:45ये तुम्हारे मनस पटल पर बादलों की तरह आए हुए चित्र हैं।
- 1:22:51ये चित्र तुम नहीं हो क्योंकि तुम इन्हें देख रहे हो, जैसी भ्रांति
- 1:22:59हो गई है। तुम्हारी तुमने आइडेंटिफिकेशन कर
- 1:23:03लिया है तुमने तदात में कर लिया है इस तदात में को तोड़ने के लिए।
- 1:23:09बिना आशा एक या दुष्कर्म तुम ये बादल नहीं हो और तुम्हें जो समझा
- 1:23:19रहे हैं के राधे राधे करते रहो, पांच नाम जपते रहो।
- 1:23:22वो मोरू हैं। क्योंकि उन्होंने खुद को जाना
- 1:23:33नहीं कि ये बादल तुम नहीं हो इसलिए वो तुम्हें ऐसे ऐसे लफ्जी
- 1:23:39से चोर बाजारी करते हैं जो व्यापारी हैं।
- 1:23:44ये निर्लो भी नहीं हैं। ये खुद लोग से चिपके हुए लोग हैं।
- 1:23:50मैं तुम्हें इन सब वासनाओं से मुक्त करने आया हूँ और बताने आया
- 1:23:55हूँ कि यह बादल आज हैं, कल चले जाएंगे।
- 1:24:05इसलिए इन बादलों से उलझो मत ये तुम नहीं हो मनुस पटल पर आई हुई
- 1:24:12चीजें हैं आए हैं, चले जाएंगे। आज की रात मेरे।
- 1:24:28दिल की सलामी ले लें, दिल की सलामी ले लें।
- 1:24:42आ आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले दिल की सलामी ले ले कल तेरी
- 1:24:59बसम से। दीवाना चला जाएगा कल तेरी बदम से
- 1:25:11दीवाना चला जाएगा, क्षमा रह जाएगी।
- 1:25:21फरवाना चला जाएगा, क्षमा रह जाएगी फरवाना चला जाएगा आज की रात।
- 1:25:40मेरे दिल की सलामी ले ले, दिल की सलामी ले ले धन्यवाद।