Latest / Baba ji Vijay Vats / 25 Jun 25 - Juncture Point पर क्या होता है? क्यों होती हैं आश्रम में आकर मन्नतें पूरी?
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- 0:02अंचल उपाध्याय बा वजुप्रण जब भी आप किसी को बुलाते हो।
- 0:19तो मैं अवश्य बिन भलाई आ जाती हूँ लेकिन आपके व्यवस्थापक मुझे एंटर
- 0:30नहीं करने देते। आश्रम में उसका कारण ये है।
- 0:40कि मैं यहाँ आकर जो भी मन्नत मानती हूँ वो हो जाती है।
- 0:48भला उनको हर जाके और भी तो आते हैं, उनको नहीं रोकना चाहिए।
- 0:58कृपया आप उन्हें समझा सकते हैं अचल अंचल उपाध्याय नहीं, मैं
- 1:20उन्हें समझा नहीं सकता। इस तरह के और बहुत से प्रश्न हैं।
- 1:35मैं उन्हें तो नहीं समझा सकता कि वो व्यवस्था पक् रहे हैं, मैनेजर
- 1:40हैं और जानते हैं और टु कंट्रोल। खुद सेवा करू निष्ठा पुरो के सेवा
- 1:53का दायित्व निभा रहे हैं और मैं किसी के काम में प्रावधान नहीं
- 2:00डालता, बिलकुल स्वतंत्रता से अपने कम होकर।
- 2:08मैं उनको कोई आदेश नहीं दे सकती। एक ही आदेश दे सकता हूँ कि मेरे
- 2:14पास कब गला हो उन्हें दीक्षित होने के लिए।
- 2:23बाकी सभी व्यवस्था उनके हाथ में है।
- 2:27हाँ, लेकिन तो मैं समझा सकता हूँ हाँ पहले इस बात की गहरे रहस्य
- 2:37में उतर जाएं। क्यों होती है आपकी यहाँ आकर सब
- 2:42मन्नतें पूरी क्योंकि यहाँ मेरे पास आके तुम
- 2:55मुझसे तल पे पहुँच जाते हो जिससे मैं जंक्चर पंत करता हूँ जाने
- 3:02अनजाने। कुछ क्षणों के लिए कुछ परोगे यहाँ
- 3:11की तरंगियाँ ऐसी दिन भर रात 13 बरसों से यहाँ बैठ के जब तुम आओगे
- 3:21तुम्हें पता ही नहीं चलेगा। हवा की गुणवत्ता बदली जाती है।
- 3:33बाहर के सर्कमस्टैंसेस का ढंग बदल जाता है और तुम्हें ज़रा भी नहीं
- 3:41पता चलता। कब तुम उस से जंक्चर पे पहुँच गए
- 3:50अक्सर आदमी आके वहाँ मन हो जाता है इसलिए तुम बाद में जाके कहो
- 3:59गया अरे बाबा माला तो भूल गया। अब तुम्हारा हमने साथ दीक्षा के
- 4:08साथ ही मयया करा देते हैं। गायत्री मंत्र भूल गया यहाँ आकर
- 4:19तुम जैसे ही इस माहौल में आओगे। मुद्दतों से ही यहाँ की निकलती
- 4:29हुई परम आसानी तरंगें तुम्हें अपनी गिरफ्त ले लेंगे, और तुम
- 4:38सहसा ही प्रयास उस सतल पे पहुँच जाओगे।
- 4:46वहाँ जाकर मैं तुम्हें कहूँ तुम जो सोचोगे मन्नत मानोगे और फूल
- 4:54किसका आंत्रिक हश है तुम इसका लाभ उठाना चाहती हो?
- 5:04लेकिन तुम भूल गई कि विश्व की आबादी आठ अरब से ज्यादा है।
- 5:12सभी आना चाहते हैं कौन चोकना चाहता है?
- 5:26और फिर तुमने लिखा कि मैं आने से पहले आपके चैनल को कुछ भेंट शुरू
- 5:34भी देती हूँ, वो तो बस मत दिया करो उसके क्या सोच है?
- 5:41उसकी क्या आवश्यकता है? यहाँ कोई हनुमान की हनुमान घड़ी
- 5:49थोड़ी यहाँ कोई देवी माता का पर्वत श्रृंखला थोड़ी है।
- 5:59कि मैं चुन्नी चिढ़ा दूंगी, मैं साड़ी चिढ़ा दूंगी, मेरी ये कामना
- 6:02पूरी कर दो। हम रिश्वत नहीं लेते हैं, वर्ण जो
- 6:10रिश्वत देता है उसका काम रोक लेते हैं।
- 6:15यह जैसा है। जहाँ सभी उलटे दिमाग के बंदे हैं,
- 6:24अनशन याद रखना, मैंने तुम्हें समझा दिया यहाँ होता क्या है और
- 6:31वहाँ जाने का फॉर्मूला भी तुम्हें समझा दिया।
- 6:35लेकिन मैं तुम्हारी मुसीबत को भी समझता हूँ, वहाँ जाने के लिए
- 6:41अहंकार तोड़ना पड़ेगा। वो तुम दौड़ना नहीं चाहते, ये है
- 6:47सच्चाई कौन छूपा है मुझसे? मैं चाहता हूँ तुम सदा के लिए
- 7:00अपनी भीतर जाओ और मांग लो जो मांगने से बड़ी दुविधा उत्पन्न हो
- 7:09जाती है। तुम्हारे लिए बड़ा आसन रास्ता है,
- 7:15लेकिन इस रास्ते में। बड़े से काटे हुए हैं।
- 7:23एक तो दूसरों को मौका नहीं मिलता, सबसे बड़ा तुम रोज़ जहाँ आओगी तो
- 7:32ऐसे भक्तों की संख्या बढ़ जाएगी एक तो तुम।
- 7:38मेरी गिरफ्त में आ जाओगे, हिप्नोटाइज़ हो जाओगे मेरे से सर
- 7:44मेरे बिना तुम चारे नहीं सकोगे, सांस में ले इसको मेरे अन्यायी
- 7:52बनो, मेरे बोला मत बनो। मेरे फलाव पणो, मेरे सिलेब ना पणो
- 8:09लेकिन जब तुम ऐसी मान्यताओं को पूरी होने के लिए यहाँ पर आना
- 8:14चाहोगी तो तुम बुलाओ। फिर तुम स्वास्थ्य भी न सकोगे फिर
- 8:20तुम पग पग पे पूछो बाबा मैं वहाँ चली जाऊं मैं क्या कोर्स कर लूँ?
- 8:34हर कदम फूंक के तो मोटा हो गई। और मेरी एजाज़ से उठाओगे, ये तो
- 8:45बहुत बड़ा रोग हो गया तुम्हारे लिए नहीं मेरे लिए क्योंकि मैं
- 8:51पकड़ रहा हूँ दिन भर प्याली भर भर के पीने वाला मास्क।
- 8:59कौन परवाह करतब कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक आ सबको चाहिए
- 9:13एक उम्र असर होने तक। उसके लिए वक्त भी लगेगा।
- 9:22एक उम्र लगेंगी इस आह को फलीभूत होने में आह को चाही के एक उम्र
- 9:33असर होने तक कौन जीता है? तेरी जुल्फ के सर को भी।
- 9:41तुम वहाँ जाना नहीं चाहती। मैं अच्छी तरह से जानती हूँ, बहुत
- 9:45से भक्त हम उससे छिपा लेते हैं। ये काम धंधा हो गया था जी इसीलिए
- 9:54अर्चना आ गई। बीमार हो गया था पड़ोसी।
- 10:00बीमार हो गया था, बच्चा बीमार हो गया।
- 10:05था तो फिरो हॉस्पिटल केंद्र अपने आप में उतर जाती है।
- 10:08वहाँ क्या दिक्कत है? लेकिन तुम्हारे बहाने बाजी को मैं
- 10:15अच्छी तरह से जानता हूँ। तुम यहाँ क्यों आती हो?
- 10:23बड़ा सरल काम है यहाँ न इसीलिए तो तुम मंदिरों में जाती हो और वहाँ
- 10:30किसके आमान पूरे होते हैं सब भटकते ही तो रह जाते हैं
- 10:34तुम्हारे। बनावटी तीर्थ, बनावटी ही बिल्कुल
- 10:44ऐसे ही जैसे गुलाब के पौधे के पास तो मैंने पृष्टि का फूल लगा दिया
- 10:48हो। एवरग्रीन भी होगा वो।
- 10:52तुम्हारा असली फूल पहले मुर्झा जाएगा, स्वतंत्र देगा नकली फूल जो
- 10:58तुमने प्लास्टिक की फैक्टरीज़ में बनाया वो खिला रहेगा लेकिन उसमें
- 11:04जीवन ना होगा वह चयन सा ही होगा। धरती के गर्व को पार किया हुआ ये
- 11:19गुलाब खुशबू बखेरेगा लेकिन तुम्हारी फैक्टरी में बना हुआ ये
- 11:27गुलाब का बोत और फूल खुशबू नहीं बिकेगा।
- 11:31एक तरह बिखेरेगा जो तुमने छटक दिया वह धरती के भीतर से आती
- 11:39होगी। सुगंध जी बाहर से तुम्हारे
- 11:43परफ्यूम की होगी सुगंध। लेकिन दोनों में जमीन आसमान का
- 11:48फर्क है। ऐसे ही तो तुम्हें गुमराह करते
- 11:54हैं। तुम्हारे राजनीति में बहुत देखो,
- 12:00हम खुश हैं और तुम उनके लतीफों में उध जाती हो।
- 12:11जब उनके लतीफों से मुक्ति पाती हो तो पाती हो पेट भूखा है जन्मो,
- 12:18जन्मो से भूखा है, एक पल। जैसे इक युग बीता, इक पलज से इक
- 12:42युग बीता। युग वि ते मोहनि न आज पूछो न कैसे
- 13:00मैंने रेन बेटा। बहकावे में लेने के मात्र हैं ये
- 13:18राजनीति का क्योंकि जो झूठ बोल लेता है।
- 13:25बड़ा करामाती होता है, अल्फाज़ का धनी होता है।
- 13:32उस समय बौद्धिक अक्षमता नहीं होती लेकिन शरारत की क्षमता होती है वो
- 13:40तुम्हें घमा फहरा सकता है। कैसा भी मुकाम आ जाए, कैसा भी
- 13:49बाहर का परिवर्तन हो जाए। सर्कमस्टैंसेस में वह थोड़े दिन
- 13:57ठहर के। वह दक्ष है इस काम में, लेकिन
- 14:07अफसोस वह खुद भी रीत रह जाता है और तुम तो रीत रहते ही हो, मैं
- 14:16तुम्हें गुलाम नहीं बनाना चाहता राजनीतिज्ञों की तरह।
- 14:22राजनीति से कोसो तो कभी कभी चार अल्फाज़ बोल देता हूँ कि कहीं तुम
- 14:33गलत मार्ग तो नहीं चल रहे हो ये जांच लो परख लो अपने आप।
- 14:41अगर गलत चल रहे हों तो सही दिशा फिर चुन लो गलतियाँ होती हैं।
- 14:51तुमने कुछ अपराध नहीं किया, गलती अपराध नहीं हुआ करती।
- 14:56गलती तुम्हारा स्वभाव है, इसको बदला जा सकता है।
- 15:08ज़रा सोचे बैठे तुम अकेली ही नहीं।
- 15:16मुझे रोज़ ऐसे मैसेज आते बाबा वह कहें पर मैं तुम्हें गुलाम नहीं
- 15:27बनाना चाहती, मैं नहीं कहता यहीं डेरे लगा के बैठ जाऊं।
- 15:35इसलिए मैंने ज्यादा व्यवस्था की भी नहीं।
- 15:38एकाध व्यक्ति को थका मारता बोला, भटका है रैन बसेरा किया और चला
- 15:48गया अपने घर। लेकिन यहाँ मैं किसी को परमानेंट
- 15:58ठिकाना नहीं बनाने देगा क्योंकि मैं तुम्हें गुलाम नहीं बनाना
- 16:05चाहता, नहीं, अब तो इश्यूदा है मेरे मैं नहीं चाहता, तुम मेरी
- 16:18गिरफ्त में आ जाओ। मैं ये भी जानता हूँ आज तुम्हें
- 16:22हूँ जीसको तुम में समेकित हो। ये पंच भौतिक तत्व का पुतला है और
- 16:29कल ये खंड जाएगा, स्केच हो जाएगा, भ्रष्ट हो जाएगा फिर तुम क्या
- 16:34करो? फिर तुम्हारे प्रश्न होंगे, फिर
- 16:42तुम्हारी मान्यताएँ सुनूंगा। मैं लेकिन जवाब नहीं दे पाऊंगा।
- 16:48आज जवाब दे सकता हूँ। इतना सा ही फर्क है आजमी और तन और
- 16:53यही फर्क बहुत बड़ा फर्क है। तुमने पूछा बेटे मुझे आने नहीं
- 17:15देते, उनका कोई किशोर नहीं, वो जानते हैं पीछे एक लंबी कतार और
- 17:23वो तुम्हारी ही तरह प्यासी है। और मैं सच कहूँ तो तुम तो प्यासी
- 17:34जिसने यहाँ आकर संसार के चीजों की मन्नत मांगनी, भला उसे प्यासा
- 17:40कहेंगे हम कि वासनाग्रस्त कहेंगे तुम वासनाग्रस्त हो।
- 17:48तुम प्यासी नहीं, तुम्हें वो नहीं चाहिए जो तुम्हें सदा के लिए
- 17:53तृप्ति दे दे। तुम्हें वो चाहिए जो तुम्हें
- 17:57थोड़ी देर के लिए तृप्ति दे दे, पुत्री।
- 18:09जैसा मैनेजमेंट कहती हैं, मैं तो जानता भी नहीं, मैं तो सच हूँ,
- 18:12तुम मेरे पास आते हो। मैंने शायद ही किसी का नाम कभी
- 18:17पूछा, शायद ही। मैं तुम्हें पहचानने से भी बहुताज
- 18:29हो जाता हूँ, इतना भीतर बैठा हुआ हूँ, मस्ती का रसपान करता हुआ
- 18:40रसपान न करूँगा तो बांटूंगा क्यों?
- 18:46फिर तो वो कोरे शब्द होंगे आचार्य जैसे फिर तो वो कोरे शब्द होंगे
- 18:53सर जैसे उनमें शहदसा मिठास न होगा।
- 19:08उनमें अपने अस्तित्व की खुशबू और शहद सा आनंद लेना होगा।
- 19:16तुम झूमोगे नहीं, तुम रहोगे नहीं। अब तो तुम्हें झरझर आंसू आते हैं,
- 19:27जब तुम मुझे सुनती हो तुम लेकिन कभी सोचा तुमने तुम आचार्यों के
- 19:35प्रवचन सुनते हो, कभी झरझर आंसू आए शर के प्रवचन सुनते हो कभी
- 19:43झरझर आंसू आए बस यहीं पर करें। निर्णायक तुम सुन हो तुम स्वयं के
- 19:56निर्णायक हो अगर तुम्हें मेरी बातें सुन के।
- 20:03आनंद नहीं आया, लुत्फ नहीं आया, अपने भीतर नहीं उतरे, जर्जर आसुना
- 20:07कह भी रहा की थी, सोते तो समझ लेना कोरी लफाजी से और कोरी लफाजी
- 20:19से कभी अस्तित्व के फूल नहीं खेलता।
- 20:30कभी देख घंटे भर का प्रोविशन समझ गया तुम्हारी खोपड़ी की नसें
- 20:40खुलेंगी। तुम्हारी खोपड़ी की गांठें
- 20:43खुलेंगे लेकिन कहाँ खुलेंगे जिसकी खोज में तुम चले वो रस्तो नहीं हम
- 20:54मेरा की तरह आँखों से जर्जर आंसू तो नहीं बहे?
- 21:00और तुम्हारी आत्मा के भीतर बिरहा की आग तो नहीं लगी वो राधा की तरह
- 21:05है फगवे पायलिया बांस के घुंघरू बांस के तुम नाचे तो है ना जैसे
- 21:15आए थे। रुखे सूखे वैसे रुखे सूखे चल दिए
- 21:19क्या परिवर्तन? उस स्थल पर जाकर परिवर्तन घटित
- 21:26होता है। इन दो शब्दों को टिक मारकर लेना
- 21:33उस स्थल को कसौटी पे कसना हो तो देख लेना कि तुम्हारे भीतर।
- 21:39परिवर्तन हुआ के नहीं हुआ बस यही कसम है जीसको सुनकर संगीत ना बजाओ
- 21:50ये तेरे को आँखों से आश्क न बहे। भीतर से पूरा अस्तित्व तुम्हारा
- 22:01रोया नहीं उसे याद कर। मेरी जात पे ना तुम आंसू बहाना न
- 22:23जी को दुखाना हमें भूल जाना मेरी जात।
- 22:33में। तुम ना आंसू बहाना न जी को जलाना
- 22:49हमें भूल जाना। मेरी याद में तुम।
- 23:01जब तुम्हे याद आएगी भाषणों से याद नहीं आएगी।
- 23:09पर वचन से याद आएगी परावचनों से याद आएगी जो दूसरे कहीं दूर से आए
- 23:15हुए वचन प्रयावचन परावचन परा की खबर देते हैं।
- 23:20तुम्हें वो वचन इस लोक की खबर तो तुम्हारे पास पहले ही बहुत है।
- 23:28परा की खबर तुम्हारे पास है जो परा से आया हुआ वचन कहे और कौन कह
- 23:39पाएगा वही जो परा के भीतर से जो प्रकृति से पार चला गया परा के
- 23:46पास पहुँच गया? वहाँ से बोलेंगे जो वही तो प्रवचन
- 23:50होगा। खोपड़ी से आए हुए प्रवचन थोड़ी
- 23:54हुआ करते हैं। वो तो भाषण हुआ करते हैं और फिर
- 23:59तुम आखिर में जांच परीक्षण कर लेना कोई नेत्र जरे नहीं कोई वरा
- 24:05की अग्नि लगी नहीं। कोई क्रांति घटित नहीं हुई।
- 24:12ट्रांसफॉर्मेशन नहीं हुई, कोई भीतर से बदला ना हुआ सिर्फ शब्द
- 24:17सुनी और शब्दों को नेरोज में कैद कर लिया।
- 24:21तुम भर गए आगे कम ही नेरोज भरे नहीं है।
- 24:26बड़ी भीड़भाड़ है, दम घुटता है, अचेतन पूरा प्रत्या है और मैं
- 24:38तुम्हें सीखाता हूँ जहाँ मैं ता हो मैं जानता हूँ बड़ा आसान
- 24:46रास्ता है तुम्हें। तुम्हारा मन बार बार चलेगा, बाबा
- 24:53के दरबार चले यह मुसीबत आ गई बाबा के दरबार में जाके मन्नत मान लेते
- 25:00हैं, लेकिन कब तक आओगे, कब तक मांगो?
- 25:06क्यों नहीं अपने आप को बाबा का दरबार बना लेते?
- 25:09तुम्हारे भीतर भी तो हो ही मैं प्रत्येक अपरणी को बाबा का दरबार
- 25:19बनने के लिए प्रेरित करता हूँ तो मत भटको।
- 25:25नकली तीर्थों पे या मैन, मेड है तीरथ नवाजे के सब बाल हुक्म रजाई
- 25:37चल नानान कलिख्या ना? तुम अब।
- 25:43उसके हुक्म में क्यों नहीं आ जाते?
- 25:45क्यों तब्दील करना चाहते हो? बार बार जहाँ आकर तो तुम तब्दील
- 25:51करना चाहते हो तुम्हारी मन्नतों से सब पता चलता है चुन्नी चढा तो
- 25:56नहीं मालूम? बकरे की बलि दे बकरे, मासूम बकरे
- 26:02ने क्या बिगाड़ा? जैसी जान तुम में पैसे जानू सुने
- 26:18और तुम जश्न मनाते हो, बकरीद मनाते हो, बकरीद की खैर नहीं
- 26:24बेचारे। मेमने की खैर नहीं।
- 26:32यह सिखाया तुम्हारे धर्मंदों ने कूड़ा, कबाड़ा, गटर, दुर्गंध, बघी
- 26:45सड़ाध जहाँ पशुओं के मृत शरीर कराए जाते हैं।
- 26:50उसमें धकेल दिया था और फिर कहते हैं ये देखो आह कितनी सुंदर खुशबू
- 26:58आ रही है किताब विकास किया हमने औरतों में व्यस्त हो जाते हो।
- 27:11तुम थोड़ी देर में कहने लगते हो कि हम यही है विकास एक लड़की किसी
- 27:23चमारों के घर में ब्याही गई चमड़े का व्यापारी था।
- 27:33वहाँ गई तो नाक पूस कोड लिया, साड़ी का पल्लू नाक पे गिर गया।
- 27:45ससुर ने पूछा सास ने पूछा पुत्री ये क्या कर रही है?
- 27:54माँ दुर्गंध बहुत आती है, हम कोई और कहीं मकान नहीं ले सकते।
- 28:07माँ समझदार थी, वो भी कभी इस घर में आई थी, घर पुराण था, का था
- 28:15पुश्तैनी था। कोई बात नहीं धीरे धीरे ठीक हो
- 28:19जाएगा कुछ दिन बीत गए।
- 28:35बहू बोली माँ पिताजी देखिये मेरे चलन कितने अच्छे है।
- 28:43कैसे पुत्र जब मैं आई तो बड़ी दुर्गंध थी?
- 28:51मैंने कहा कि तुमसे शिकायत हम घर बदल लेते हैं तो माताश्री ने कहा
- 29:00कोई बात नहीं। धीरे धीरे ठीक हो जाएगा।
- 29:04अब देखो मैं हूँ मेरे आने के कारण माहौल बदल गया मेरे जाने से खिलती
- 29:16हैं हुसैन की कली। मेरे जाने से उजाड़ होता है मैं
- 29:23आई तो यहाँ हुस्न की कलियाँ खेलें सुगंध बिखरी अब देखो ज़रा भी बदबू
- 29:32नहीं आती सास भी ऐसा सस्र। भी हँसा ऐसे ही तुम अंधभक्त हो?
- 29:51गोबर के भीतर लबड़ लबड़ के जब तुमने गोबर को प्रसाद समझना शुरू
- 29:58कर दिया तो वह प्रसाद 1 दिन हो ही जाएगा।
- 30:05फिर 1 दिन गोबर पार्टी होगी और तुम उसी को परमात्मा की निनायत
- 30:12समझ के खा जाओगे। एक पशु के शरीर ने इसे त्याग
- 30:18दिया। और तुम महान पशु हो जो तुमने इसे
- 30:22खा लिया। एक पशु ने अपने शरीर से बाहर
- 30:27निकाला। दीज़ आर ऑरेन मटेरियल्स वीजा तीय
- 30:37द्रव्य हैं ये शरीर के काम। के नहीं हैं।
- 30:43इसलिए पशु के शरीर ने इसे बाहर फेंक दिया और तुम इसे खा जाते हो,
- 30:56वही मैं तुम्हें समझाना चाहता हूँ।
- 31:00संसार की सभी कमाएं, पूरी भी हो जाएंगी तो क्या होगा?
- 31:06जिनकी कामनाएं पूरी हो गई, उनसे जाके पूछो क्या वास्तव में पूरी
- 31:10हो गई? तुम चाहते थे संसार के एक नंबर के
- 31:17अमीर हो ना और जो संसार के एक नंबर के अमीर होकर बहुत से लोग
- 31:22हुए। उनसे जाके पूछना तुम्हें क्या
- 31:27मिला? अगर वो ईमानदार होंगे तो वो
- 31:31कहेंगे कुछ नहीं वाला, लेकिन भाई वाणी का बुल बाला है, वो तो
- 31:41तुम्हें सोने की प्रशांके पहन के अंगूठा दिखाएंगे देखो।
- 31:45तुम्हारे ही जेबों से ढाका मारा हुआ है और तुम ईर्ष्या खा जाओगे
- 31:55तुम फिर वैसा ही होने की चेष्टा करोगे चल गया उनका मंत्र।
- 32:02उसमें अपने जैसा ही नक कटिया बनाना चाहते थे।
- 32:05नाक कट गया, हमको सोचा था चरम पे पहुँच जाएंगे, बड़ी गद्दी पे
- 32:11पहुँच जाएंगे, तृप्ति मिल जाएगी, गद्दी पे पहुँच गए, धनपति हो गए,
- 32:19तृप्ति ना मिले। नहीं जाने क्यों मन बार बार फिर
- 32:27से जाता है कुछ और चाहता है क्या चाहता है पता नहीं।
- 32:39क्या चाहता है? कबीर बताते हैं, इसे संत बताते
- 32:43हैं उससे तुम तब तक डोलते ही रहोगे।
- 32:52बाहर जब तक तुम्हें को अमूल्य हीरा नहीं मिल गया।
- 33:00मानसरोवर के मिलते ही ताल तलैया बेकार हो जाती।
- 33:11है। अंसपयो मानसरोवर।
- 33:23ताल तलैया क्यों बोल? मन मस्त।
- 33:32हुआ फिर क्यों बोल? मन मस्त हुआ।
- 33:50ये मेज़रमेंट है, मापदंड है बस तुम्हारा बोलने को जी ऐसे तो तुम
- 34:00जबर जबर बोले जाते हो। सारे दिन तुम बोलते ही रहते हो
- 34:10तुम नहीं बोलते लबों को सी लेते हो तो तुम्हारा मन बोल।
- 34:16लेकिन चुप कहन होते हो, चुप है चुप न हो भाई जे लाए रहा ली बतार
- 34:25पोखियाँ पुख न उतरी जेबनापुरिया पार से से सेणपण लखो वे तेइक न
- 34:30चले ना। तुम्हारी भोग नहीं उतरेगा तुम
- 34:40सारे परियों के पदार्थ भी क्यों न भोग लो तुम्हारी कोई चालाकी नहीं
- 34:48चलेगी। शतरंज की राजनीतिक चालें बिछाते
- 34:51रहो। जब जाओगे तो हाथ खाली और फिर
- 34:56जागने का कोई फायदा नहीं है, क्योंकि मौत ने तुम्हें बेहोशी के
- 35:01आलम में सुला दिया सदा के लिए, फिर निद्रा में तुम सो गए, फिर
- 35:07तुम्हें कोई नहीं जगा आएगा। जिसे सारी उम्र बचाया तुमने अपनी
- 35:21तकनीकों से बचाएं, शतरंज के मोहरे से फेंक फेंक के बचाएं।
- 35:28खो ग मसीहा। सामने तेरे फिर भी न तू बच पा
- 35:42आएगा तेरा अपना। तुझको आग लगाएगा आसमान पे है।
- 36:09आसमान पे उड़ने वाले माटी में मिल जाए कस्मे वादे प्यार।
- 36:30सब गाते। हैं बातों का क्या?
- 36:37कोई किसी का नहीं, झूठे नाते हैं। ना तो का क्या कसमें, वादे प्यार?
- 37:01यह सच्चाई है जीवन की। यही ट्रांसफॉर्मेशन पतंजलि ने जो
- 37:16बातें कहीं और प्रथम चरण पे भी वो ही होती हैं और अंतिम चरण पे भी
- 37:21वो ही होती हैं चौकों में सत्य से शुरू करो।
- 37:33और उस सत्य तक पहुँच जाओ जो तुम्हारा हो, ना अहिंसा से शुरू
- 37:40करो और उस तत्व तक पहुँच जाओ जहाँ हिंसा हो ही नहीं सकती, कृष्ण
- 37:47हिंसा नहीं कर सकते। तुम कहोगे चल इस से लाख लोग मरवा
- 37:51दिया लेकिन ज़रा भी नहीं मरवाया तुम्हारी दृष्टि से मरे लेकिन
- 37:59कहाँ मरे सिर्फ उनके शरीरों के तत्व बिखरे से कई ट्रक हुए, कुछ
- 38:07भी तो नहीं मरता जानू? मैट्र कैन नीदर बी ग्रेट नॉर कैन
- 38:12बी डिस्ट्रॉयड पदार्थ तो कभी मरता ही नहीं, बस पदार्थों का समूह
- 38:19मरता है खंड खंड हो जाता है। तुम इसको ही मरना कहते हो।
- 38:33आस्ते से शुरू करो, चोरी मत करो, वहाँ पहुँच जाओगे जहाँ चोरी
- 38:39किस्से करनी जब कोई दूसरा रहा ही नहीं, आस्ते से शुरू करो, चोरी ना
- 38:49करो। यहाँ से शुरू करो चरित्र से शुरू
- 38:54करो अस्तित्व तक पहुँचो यही पतंग जली ने कहा महावीर ने कहा, बुद्ध
- 39:00ने कहा ब्रह्मचर्य से शुरू करो। अपनी जैविक ऊर्जा का कण कण बजा लो
- 39:13और फिर उस ब्रह्मचर्य में चले जाओ जहाँ ऊर्जा खत्म होती ही नहीं,
- 39:18अपार भंडार है ऊर्जा का, चेतना का परम सरोवर परम समुद्र।
- 39:27तो ब्रह्मचर्य से शुरू करो, एक बार यहाँ की यात्रा उस 70 पर चले
- 39:35जाओगे, तुम जहाँ ब्रह्मचर्य खंडित होता ही नहीं, कितना ही निकालो और
- 39:43नस्यपूर्ण वादाएं और मेवाव शिक्षा थे।
- 39:48उसमें से पूरे का पूरा ही तुम बाहर निकाल लो विथड्रा कर लो, फिर
- 39:53भी पूर्ण ही बच जाएगा, मैं तुम्हें एक अक्षर के बहुत से मतलब
- 39:59समझाता हूँ और एक अक्षर के बहुत से मतलब निकलते भी हैं क्योंकि
- 40:05अक्सर। सम्पूर्ण नहीं होता है अक्षरों
- 40:10को, इसलिए हम अशुद्ध कहते हैं अक्षरों को, इसलिए हम शुद्ध कहते
- 40:17हैं। ये सीमित हैं।
- 40:20विराट तक ले जाने की क्षमता इनमें नहीं है।
- 40:25विराज होना है तो इनको त्याग न होगा।
- 40:28संघ संघ नहीं ले जा सकोगे तुम इसलिए ज़ैन फकीर कहते हैं, अगर
- 40:34परमात्मात का न हो, अगर हम तक भी आना हो तो इस खोपड़िया को बाहर रख
- 40:38के आना जहाँ जूते उतारते हो वहाँ इसको खोपड़ी को रख देना।
- 40:44बुद्धि साथ लेके मत आ जाना, यह मत पूछना कैसे?
- 40:48यह मत पूछना क्यों? और इस सिद्धांत का मूड ने बड़ा
- 40:53फायदा भी उठाया है। दो धारू तलवार है, क्या करें?
- 40:59बताना भी पड़ता है, छिपाना भी पड़ता है।
- 41:05ब्रह्मचर्य से शुरू करो, अपनी जैविक शक्ति का एक कण भी बर्तन
- 41:09होने दो और उस ब्रह्मचर्य तक पहुँच जाओगे जो कभी खंडित होता ही
- 41:15नहीं। वह विराट समुद्र है जिसका कोई और
- 41:19छोर नहीं। उस ब्रह्मचर्य में पहुँच जाओगे
- 41:24जिसका एक कण भी तुम ना मार सकते हो ना जेला सकते हो ना ईदर कैन बी
- 41:36क्रिएटेड नॉर कैन बी जस्ट? अब प्रि ग्रह पांच वर्ष जोड़ना
- 41:48बंद करो। सारी प्रकृति प्रग्रहण करती।
- 41:59देखिए कुमार की बात, यहाँ तक कि पशु जिनको तुम न्यूनतम जोड़ियां
- 42:06कहते हो, उनके आगे तुम दूध रख दो, रोटी रख दो उनके खाने की सामग्री
- 42:13रख दो वो उतना ही खाएंगे जितना उनका पेट सह।
- 42:20जब तृप्त हो जाएंगे तो छोड़ देंगे।
- 42:22बाकी शाम के लिए साथ में बांध के पेड़ से नहीं लेके जाएंगे।
- 42:29मनुष्य ही ऐसा मूड प्राणी है जो शाम के लिए पेड़ से बांध के ले
- 42:33जाता है। ये तुम्हारे ट्रंकों के भीतर जमा
- 42:37करना पेट के साथ बांधना ही तो है और क्या खबर देता है?
- 42:45तुम कहते हो न जाने कोई ऐसी घड़ी आ जाए तो जरूरत पड़ जाए, फिर क्या
- 42:52करेंगे तुमने पहले ही न जाने कहकर?
- 42:56अपना संकर भैस में होना चाहिए कि नहीं कभी नहीं आएगी मुसीबत और सच
- 43:04पूछो तो तुम्हारे पर मुसीबत कभी आती है।
- 43:07तुम ऐसे तत्व हो जो न छिदते हो, न कटते हो, न गलते हो, न जलते हो।
- 43:13तुम पे मुसीबत काहे आएगी? मुसीबत आती है सिफियर में बिल्कुल
- 43:20बादलों की तरह आती है और छंट जाती है थोड़ी देर में हवाएं उन्हें
- 43:24उड़ा के ले जाती हैं तुम पे तो कभी मुसीबत आई ही नहीं हाँ तुम पे
- 43:30मुसीबत अब आती है। जब तुम आग लगी हुई सफीर पे उसके
- 43:34साथ तुम एक आभार हो जाते हो और तुम फिर तुम भी चलते हो क्योंकि
- 43:40तुम केंद्र से उठे और सफीर में आग के भीतर कूद गए कूद गए तो जलोगे
- 43:46भाई? तुम मोज़ से बैठे थे, सोए हुए थे,
- 43:54चैन से ओढ़े हुए कफन सोए हुए थे, चैन से ओढ़े हुए कफन यहाँ भी
- 44:03सतानी आ गए। किसने पता बता दिया?
- 44:10तुम केंद्र में बैठे मज़े से राती जागण राती कोकण इस दरगाह दे
- 44:16कुत्ते बोले शाह जिनारब बजाय अच्छा दर तान के सुत्ते।
- 44:26आराम से लेटे केंद्र में सबीर पे आग लग गई।
- 44:34यही तो भ्रांति है। तुम्हें इसी भ्रांति को तोड़ने के
- 44:39लिए लाखों लाखों। कृषि आए तुम्हें समझा के गए कुछ
- 44:48क्षण के लिए तुम्हारी भ्रांतियां टूटी लेकिन फिर तुम भूल गए फिर
- 44:56फिर आग लगती है सफ़र पे। और तुम सफीर के भीतर पहुँच जाते
- 45:02हो अभी मुझे लोग कहते हैं बाबा आग में जल रहा हूँ, क्या करूँ?
- 45:09मैंने कहा आग से बाहर छलांग लगा जाओ और क्या करोगे?
- 45:14अगर सच में तुम आग में जलो तो उस शिक्षण क्या करते हो बताओ?
- 45:22बस बात ये है कि तुम जानबूझकर इन्द्रियों से चिपटे रहना चाहते
- 45:29हो तुम शुद्र स्वादों को भर्म स्वाद समझते हो?
- 45:35यही तुम्हारे लिए अहितकर हो जाते हैं और यही तुम्हारे लिए बंधनकारक
- 45:40हो जाते हैं। फिर तुम्हें बांध लेते हैं फिर
- 45:43तुम चिल्लाते हो हाय में बंध गया बाबा मैं बंध गया मुझे मुक्त करो
- 45:52किसने बांधा तुम्हें? तुम खुद ही तो बंद है आग लगी थी
- 45:59सफीर पे परदी तुम कूद गए परदी पे तो परदी का का कसूर आग का का कसूर
- 46:07परदी पे तो आग ही आग है। अभाव ही अभाव है, दुःखी दुख हैं,
- 46:11दर्द ही दर्द हैं, कष्ट ही कष्ट हैं, क्लेश ही क्लेश हैं, चिंताएं
- 46:16चिंताएं चिंतनाएँ ये चिंतनाएँ मैंने क्यों ले ली?
- 46:23ये राम राम, राधे राधे भी क्लेश हैं इनको चिंता के साथ ही रखो ना।
- 46:32ये भी चिता की भाँति जलाती हैं चिंतन करो या चिंता करो, इन
- 46:40शब्दों को समझियेगा सर्क में ले लो हाँ ले लो।
- 46:47चिंता और चिंतन तुम तक होगे। हम तो भगवान का श्रण कर रहे हैं
- 46:51भाई भगवान का स्वर्ण क्यों करते? तुम्हें पता है भगवान कैसा है,
- 46:55कौन है तुम्हारी कभी मुलाकात हुई किसी राहत पे है किसी मोड़ पे है?
- 47:06कभी मिले, गले मिले उसे पहचानते हो अगर वो तुम्हारे सामने आ
- 47:11जाएगा, पहचान पाओगे और तुम्हें पता है कि तुम सिर्फ याद उसी को
- 47:18कर सकते हो जीसको कभी देखा है? जीसको देखा ही नहीं उसको याद कैसे
- 47:26करोगे, काल्पनिक का तस्वीर बना सकते हो वो बेवकुफियां तुम कर रहे
- 47:32हो माता को शेर के ऊपर बैठा दिया और एक माता को गधे के ऊपर बैठा
- 47:37दिया यही तो पागलपन जारी है आज लड्डू गोपाल जी बना रहे है दिखा
- 47:43रहे हो देखो। हवाई जहाज के अंदर ये नहीं मरा,
- 47:46ये मरेगा भी नहीं भाई ये मैटर है मैटर कैन नीदर भी करे टेड नॉट कैन
- 47:51बी डिस्ट्रॉइड ऐसे तो जो बच गया जहाज का मलबा वो भी तो फिर?
- 48:03तुम्हारे लड्डू गोपाल ही है जो बच गया वो लड्डू गोपाल है तुम्हारी
- 48:13मूड तवन को तोड़ेगा कौन तुम इतनी गहरी निद्रा तंद्रा में हो के जो
- 48:19जगाता है उसको तुम दुश्मन समझ नहीं लगते तुम एकठ समूह बना लेते
- 48:26हो। लट्ठ लेके चल पुटते हो इसको बदले
- 48:29खुद क्यों न बदलो भाई खुद बदलो और देखो बदल के कितना आनंद आता है
- 48:37रसधार बहेगी अमृत के तुम खुद को बदलो दूसरों को तुम बदल कैसे
- 48:44पाओगे? दूसरा नहीं बदलेगा।
- 48:47जिसने मानसरोवर पा लिया, वो ताल तलैया में क्यों भौंकेगा?
- 48:55इसलिए संत को बदलने का को ये डंगर है।
- 48:58तुम संत को मार सकते हो, वो भी उसके शरीर को उसको नहीं मार सकते।
- 49:07वो तो तुम्हारे शरीर के भीतर का तत्व भी कोई नहीं मार सकता।
- 49:11सिर्फ संत ही नहीं, बस तुम्हारी कल्पनाएं ही महज और इन कल्पनाओं
- 49:17को तुम यथार्थ में बदल देते क्योंकि ये व्यस्त हो जाते हो।
- 49:21इसे ही म्यंत भक्ति करते। बस तुम अभ्यस्त हो गए।
- 49:27अब यह लड़की कभी नहीं कहेगी। यहाँ बदबू आती है क्योंकि इसके
- 49:31नाक को उस बदबू की आदत पड़ गई। कभी सोच ना लेना यह अंतवक्त
- 49:39बदलेंगे मैं सदैव करता। बाबा जयंत भक्त कब बदलेंगे ये कभी
- 49:44नहीं बदलेंगे। इनके नाक मर गए।
- 49:47इन्हें दुर्गन्ती के भीतर भी सुगन्ती आती है।
- 49:50आहा हाँ क्या उपवन की लाइफ बाहर ही बाहर है?
- 49:56जूही का मोतिया का गुलाब का। पागलों को नहीं पता चलता कि हम
- 50:03पागल है। मैंने सुना है पंडित जवाहरलाल
- 50:09नेहरू प्राइम मिनिस्टर ऑफ इंडिया फर्स्ट प्राइम मिनिस्टर ऑफ इंडिया
- 50:13आग्रा के पागलखाने में चले गए। देखें तो पागलखाना कैसा होता है।
- 50:20हालांकि ये लोग राजनैतिक लोग पागलों से कुछ कम नहीं होते।
- 50:24असहमत कर जवाहरलाल बड़ा पागल और छोटे पागलों को देखने चला बस
- 50:35राजनीतिज्ञ नहीं। अंत भक्तों ने इनके ऊपर ठप्पा लगा
- 50:40दिया। वे बड़े विद्वान हैं अन्यथा
- 50:43राजनीति का कोई भी समझदार नहीं होता।
- 50:46राजनीति महामूर्ख और महा पागल होते हैं, अन्यथा क्यों झंझट में
- 50:53आएगा? अपने शरीर का बोझा ढोले इतना कम
- 50:57है, फिर सारे देश का बोझा ढोएगा वह गधा ही तो होगा बड़ा गधा है
- 51:05छोटा गधा थोड़ा बोझा उठा दो बड़ा गधा देश का बोझा उठा दो और बड़े
- 51:13गधे हो जाओगे। तो देश क्या संसार का बोझा
- 51:16उठाओगे, तुम्हारी तमन्ना हो तो यही है के सारे संसार का मालिक
- 51:21मैं बन जाऊ क्या करोगे? बोझा दो पहले ही बोझा बहुत है, तो
- 51:28देखा वहाँ गए सबसे पहले के कागज़ मिला।
- 51:35और पागल कभी गंभीर भी हो जाते हैं, कभी हँसते भी हैं, अकारण
- 51:41हँसते हैं और अकारण ही गंभीर हो जाते हैं।
- 51:48उसे पूछने लगा। सात जो आप कौन हैं?
- 51:56नए नए आए थे ना सर पर टोपी जी गाँधी टोपी आप कौन हैं खत्म मैं
- 52:04तुम जानते हो, बस इसी ने तुम्हें निगल लिया।
- 52:12जमीं। खा गई आसमान कैसे कैसे?
- 52:25जने ने मारे। जो?
- 52:30हाँ, कैसे कर? इस श्रेय के लेने बड़े बहादुरों
- 52:39की जान दे दी। जमीं खा गई आसमान कैसे, कैसे जमा
- 52:44ने ने मारे जमा कैसे कैसे? ये छपंजा इंच का 100 छपंजा इंच
- 52:53शूर वीरों को भी खा गई ये श्रेय लेने की परंपरा देखो बच्चों तुम
- 53:02इसमें फंस मत हो जाना ये सबसे बड़ा रोग है जिसका कोई है लाज।
- 53:13रोग होने के बाद पता चलता है ये रोग मुझे लग गया तब तक बहुत देर
- 53:19हो गई होती है। कहता मैं जवाहर लाल, तुम मुझे
- 53:24जानते नहीं। वे सभा प्रसिद्ध हूँ।
- 53:31शांति का प्रौद्योगक शांति की पंचशील का नारा मुझे दिया तुम
- 53:38मेरा नाम नहीं जानते, क्षमा करना। बहुत देर से स्वर्ग में हूँ
- 53:47पागलखाना उसे स्वर्ग लगता है नर्क का मुझे पता ही है यही दोता है
- 53:55पागलखाने वालों को बाहर नर्क लगता है, बाहर वालों को पागलखाना नर्क
- 54:00लगता है। बहुत देर से स्वर्ग में बैठा हूँ,
- 54:04आनंद में कल्पवृक्ष के नीचे खा लेता हूँ, खेल लेता हूँ, बोल लेता
- 54:12हूँ, असल लेता हूँ, रो लेता हूँ, लेकिन मैंने कभी किसी ज्वारलाल का
- 54:19नाम नहीं सुना। नाम सुना है लेकिन देखा पहली बार
- 54:25तुम कहते हो जवाहरलाल तो उसने उसकी पीठ के उपरार से जवाहरलाल
- 54:36देखते रहे, पागलखाने में आया हूँ सब देखना पड़ेगा भाई।
- 54:41पागल खाने में आया हूँ सब देखना पड़ेगा थोड़ा सा गमगीन हुआ आँखों
- 54:50में आंसू आए चेहरा थोड़ा सा उदास हो गया।
- 54:57जैसे प्रेसी के जुदाई में प्रेमी उदास हो जाता है।
- 55:06किस डे का घबराव हॉस्पिटल बहुत अच्छा है, ठीक हो जाओगे।
- 55:20बड़े से बड़े जवाहरलाल ठीक हो गए यहाँ पर आकर मैं जब नया नया आया
- 55:27था, मैं भी तो अपने आपको जवाहरलाल कहता था।
- 55:39और शायद तुमसे बड़ा जवाहरलाल कहता था, तुम तो छोटे जवाहरलाल, मैं
- 55:44बड़ा जवाहरलाल था, लेकिन ठीक हो जाओगे।
- 55:46अस्पताल बहुत बढ़िया है। यहाँ के डॉक्टर बड़े सद व्यवहार
- 55:51करते हैं। मारपीट नहीं होती, कोई बात नहीं।
- 55:57आए हो हमारे मेहमान हूँ चलो विराजो तुम मुझे ये मत समझे ना कि
- 56:06तुम समझदार हो पागलखाने जा रहे हो तुम बड़े पागल खाने से निकल के
- 56:12छोटे पागलखाने में जा रहे हो। यह कौन बताएगा, सिर्फ संत बताएगा
- 56:19जिसने इतनी मदरा खेली है। मन मस्त हुआ फिर क्यों बोला?
- 56:32मन मस्त हुआ तो क्यों बोलूं हीरो पायो गांठ गठियायो?
- 56:52बार बार वा को क्यों खो ल मन मस्त हुआ हाँ, फिर क्यों बो हो?
- 57:07ल। मन फर्स्ट।
- 57:09मस्त हुआ फिर क्यों बोल? बोलने की जरूरत कहाँ रह जाती है?
- 57:17वह चुप हो के ही समझाया जा सकता है।
- 57:21बोलने से समझाया नहीं जा सकता। हम जानते हैं अच्छी तरह से फिर भी
- 57:26क्या करें? क्या करें, बोलना पड़ता है जो
- 57:36गगड़िया इतनी भर गई छलकने लगी अमृत वह बिखर जाया करता है, वह
- 57:45झलक जाया करता है। क्योंकि अमृत की बूंदें लगातार सच
- 57:51खंड से भर रही हैं, उसका आकर पिता समा पाएगा उतना समय गया है लेकिन
- 57:59अब उसमें एक बूंद भी और समाने की गुंजाइशें नहीं हैं।
- 58:05अब जो गिरेगा सत्यखंड से और प्रतिबल झेल रहा है सोते जगते
- 58:11उसका क्या होगा वह बिखर जाएगा आसपास और इसलिए संत के आसपास जो
- 58:19वातावरण होता है वो बड़ा लोभावना होता है।
- 58:23तुम उसकी गिरफ्त में आ जाते हो। तुम बिना किसी प्रयास के उस स्थल
- 58:29पर पहुँच जाते हो जिसे मैंने संधि क्षेत्र कहा।
- 58:34जंग के चर पॉइंट कर और वहाँ जाकर तुम्हारी सभी इच्छाएं पूरी बजाती।
- 58:40तुम जो भी मन्नत मांग लोगे। मन्नत पूरी हो जाती मेरे पास कुछ
- 58:49दिन पहले तो व्यक्ति आ गई बाबा ये साड़ी और ₹11,000 मैंने कहा ये की
- 58:57सिटी है बाबा मन्नत मांगे थे। तो मैं तो साड़ी बांधता हूँ और
- 59:05कैसी कैसी मानता है तुम मांग लेते हो दुर्गा माता के लिए तुमने
- 59:12मांगी होगी बाबा के लिए भी साड़ी मैं कोई साड़ी थोड़ी बांधता हूँ।
- 59:20बाबा साड़ी ही मैंने मन्नत में मांगी तो तो साड़ी ही गूँगना आज
- 59:25तो बड़ी हो गई है शेरा वालियों की मेहरा वालियों की तो फिर साड़ी ही
- 59:33सूख ली। चलो अब पूरी हो गई।
- 59:38मैंने कहा भाई देखो ये लफंगेबाजी यहाँ नहीं चलेंगे, तुम बाहर ही
- 59:44रहा करो, सही करते हैं हमारे मैनेजर तुम्हे यहाँ तुम्हे जहाँ
- 59:50घुसने नहीं देते हो, अरे मूर्ख साड़ी मैंने कभी बांधी है।
- 59:57मैंने तो रोल में भी सीता कर कभी नहीं किया, सदा ही राम का रोल
- 1:00:03किया मैंने मनभावन रोल है मेरा मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम सबके
- 1:00:10हृदय में बसने वाले प्रभु राम। तुम आते हो मन्नत मांगते हो, मैं
- 1:00:20जानता हूँ कभी कभी तुम्हारी चैनल पर पैसे आ जाते हैं नाम नहीं आता
- 1:00:26मैं समझ आता हूँ उसी मूर्ख का होगा और कौन भेज सकता है?
- 1:00:36बहुत से यहाँ पर मन्नत मांग के जाते हैं।
- 1:00:40पूरी तो हो ही जाती हैं फिर भेजो। बाबा का ये उधारी है, उधारी चुकता
- 1:00:49करो। नहीं हमारी कोई उधारी नहीं हम
- 1:00:54यूनिवर्सल प्रॉपर्टी। ये समझे ना?
- 1:00:58कृष्ण की कोई उदाहरण नहीं होती। तुम पर यूनिवर्सल ट्रुथ और
- 1:01:09यूनिवर्सल प्रफ सारे संसार की मलकियत है और सारा संसार हमारी
- 1:01:18मलकियत। बस यही राज्यस्थान खुल गया।
- 1:01:23उस दिन तुम्हें ताज तालियों में भटकने की जरूरत नहीं पड़े फिर
- 1:01:27मानसरोवर मिल गया। अब हम थीम के आखिरी शब्द पे आ
- 1:01:38जाएं। वीडियो मेरी दृष्टि में बहुत लंबी
- 1:01:41हो गई है। ज़रा देख लो।
- 1:01:43अरे भाई 1 घंटे की हो गयी है इससे ज्यादा तुम सुन भी तो नहीं पाओगे
- 1:01:57हाँ तुम तो वेले हो, तुम तो चाहे 5 घंटे हो, तुम्हारा क्या है?
- 1:02:01ये मनीष कहता है चाहे 5 घंटे की बोल।
- 1:02:07तुम्हें कोई काम धाम तो है नहीं, तुमने तो बत्तीशी ही पढ़नी होती
- 1:02:11है अच्छा कहे तू बुरा कहे तुमने बत्तीशी ही पढ़नी होती है, दाल
- 1:02:20दिखा नहीं होती है, दिखा देती हूँ।
- 1:02:24लेकिन लोगों को तो भाई शौक नहीं है, परिवार का काम है, कोई बीमार
- 1:02:28है, किसी शादी है, किसी के कुछ पार्टी रखी है, जाना पड़ता है, सब
- 1:02:35कारोबार धंधा भी करना पड़ता है। अब थीम पे आ जाए, मैं नहीं कहता
- 1:02:47तुम यहाँ हो यहाँ से सीख के चले जाओ एक बार दो बार आ गए देख लिया
- 1:02:56और फिर मैंने तुम्हे समझाया। तुम खुद के जिंक्चर पॉइंट पे
- 1:03:00पुत्र क्यों की? तुम भी वो ही है तत्व मर्सी श्वेत
- 1:03:06के तू वही तत्व तू है श्वेत के तू जीसको ढूंढ रहा है।
- 1:03:18तेरा साहेब है तू जवानी। बाहर रहना क्यों खोले?
- 1:03:31मन मस्त हुआ तो क्यों बोले? तेरा सा है वह है तुझे माँ बाहर
- 1:03:43नैना क्यों खो रहा है? मन मस्त हुआ फिर क्यों बोला?
- 1:03:50जरूरत नहीं वो वह जाके चुप हो जाते।
- 1:03:56और जो सुख छत जुबारे नंबर को खार लाक जिगाई मार लो संसार में लेकिन
- 1:04:03जो आनंद तुम्हें चुप्पी में आएगा वह बकवास में नहीं आएगा बकवास
- 1:04:08चाहे राम राम की हो, चाहे अल्लाह अकबर की हो चाहे।
- 1:04:17राधे राधे की हो और चाहे सतनाम श्री वाहिदु की हो, ये मात्र
- 1:04:25बकवास है। अक्षरों में होशद्र होता है विराट
- 1:04:31क्योंकि अक्सर खुद ही। शुद्र है तुम करते रहो वो बकवास
- 1:04:37लेकिन वहाँ जाकर चुप हो जाना पड़ेगा ये बात ध्यान रखो मैं
- 1:04:46तुम्हें सीखाता हूँ तुमको दी उस सतल पर क्यों न हो जाओ यहाँ पर
- 1:04:52आते हो बिल्कुल वही इफेक्ट मिलता है जो गांजा।
- 1:04:57जो एलएसडी, जो नाइट्रस ऑक्साइड गैस तुम सूंघ लेते हो उससे हँसना
- 1:05:09और भीतर के डोपा में नो सेरटोनिन। और इन हार्मोन के प्रभाव से हसना
- 1:05:16जमीन असमान कब करता है? नाइट्रस ऑक्साइड ने हसाया तो क्या
- 1:05:22हसाया तुम खुद के भीतर उस आनंद की संघ रचना करो उस तत्व पे उस तल पे
- 1:05:31चले जाओ। जहाँ पर तुम्हारे भीतर ये डोपमेन,
- 1:05:37ये सैराटोनिन ये हैप्पी हार्मोन खुद से पैदा होते हैं इसलिए संत
- 1:05:45इतना प्रसन्न होता है एक प्रश्न आया बच्चे का मयंक भार का।
- 1:05:53उसका पुत्र भी है ये थोड़े से हैप्पी हार्मोन हम पैदा करते हैं,
- 1:06:03लेकिन क्या करें? फिर खर्च हो जाते हैं नहीं, नहीं
- 1:06:06तो हम उस स्तर पर चले जाओ जहाँ। समुद्र है इनहैपी और जो चुकता
- 1:06:13नहीं और संत इसलिए प्रश्न होता है संत इसलिए बेफिक्र होता है,
- 1:06:21निश्चिंत होता है वे कर्ज होवे, वे फर्ज होवे, वे मर्ज होवे तो वे
- 1:06:27गर्ज हो। सच्ची आशिकी दा मज़ा वही चक्खे
- 1:06:35बेकर्ज होवे बेमर्ज होवे बेकर्ज होवे बे फर्ज होवे और वहाँ जाकर
- 1:06:43तुमने होना नहीं है बेकर्ज बे मर्ज फिर तो तुम उधर जाओगे।
- 1:06:49तुमने उस तल पे पहुंचाना है वह ना तो कोई तुम्हें मर्ज सताती है
- 1:06:55मर्ज होगी, शरीर को होगी, कैंसराइटिस होगा, शरीर को होगा
- 1:07:02लकवा मार गया, शरीर को मार गया। गुर्दे फेल हो गए, शरीर के हो गए
- 1:07:09तुम्हारे तो नहीं हुए तुम वसु तन पर निकल जाओ जहाँ हम हैप्पी
- 1:07:14हार्मोन का भंडार जो समुद्र है, जो खुशहाली का आलम कभी खत्म नहीं
- 1:07:22होता है फिर कितना ही काम हो जाएगा।
- 1:07:28तम उससे तल पर को पुत्र और तुम्हें कहूंगा कि अगर मैं
- 1:07:35तुम्हें यहाँ मेरी मनेजमेंट तुम्हें आने हिंदी तो ठीक करती
- 1:07:40है। क्योंकि तुम यहाँ के एडिक्टेड हो
- 1:07:42जाओगे, लत बढ़ जाएगी जैसे तुम्हें नशों की लत बढ़ जाती है।
- 1:07:49इस नश में तो बड़े बड़े मारती है नाइट्रस ऑक्साइड बेरियम संत जन
- 1:07:57मारती है। जमी।
- 1:08:00खा गई आसमान कैसे, कैसे जमान निमार जमान?
- 1:08:19कैसे कह। इस यूनाइटेड ऑक्साइड में और सर
- 1:08:28डाइजेबान ने वेरियम ने कितने घर बर्बाद कर दिया तुम्हारे संतों तक
- 1:08:32को बर्बाद कर दिया, इसकी जिम मशीनें फैल कर दी।
- 1:08:41ये मशीनरी पराधीन हो गई भीतर से स्वाधीन रहने वाला व्यक्ति
- 1:08:47मस्तिष्क के स्तर पर पराधीन हो गया तुम समझना सकोगे।
- 1:08:56अभी जब जाओगे तो समझ पाओगे क्योंकि मैं सब जगह हूँ तुम मुझे
- 1:09:04ही परो बस किसी हैप्पी हार्मोन की जरूरत नहीं पर मैं मिलूंगा तुम्हे
- 1:09:10यहाँ नहीं जहाँ तो सिर्फ मेरी ही परछाई हो।
- 1:09:15उसका पता नहीं कब मिट जाए, कब से कटर हो जाए, खंड खंड हो जाए।
- 1:09:23लेकिन। जहाँ जाइएगा, हमें आएगा।
- 1:09:38अजी रो उठ कर अब कहाँ जाएगा जहाँ जाएगा हमें।
- 1:10:00कर अब। जहाँ चाहे चले जाओ हमें ही भयर
- 1:10:08गंदे नाले में मैं ही हूँ गंगा सागर में मैं ही हूँ।
- 1:10:13हथियारों में भी मैं ही हूँ, डाकुओं में भी मैं ही हूँ।
- 1:10:19दानदाताओं में भी मैं ही हूँ और जो जीवन दान देते हैं, उनमें भी
- 1:10:26मैं ही हूँ सब जगह मैं ही हूँ, यह सारा बसारा मैं ही हूँ।
- 1:10:33मेरा ही है ऐसा नहीं ये मैं हूँ। जेता कित्ता तेता ना?
- 1:10:40बीन ना मैं ना ही कोठा कोई ठान ऐसी नहीं जाने मैं ही नाम हूँ
- 1:10:49मुझे समझ मत कर। मेरा शमरण आनी दे उस महबूबा की
- 1:10:56तरह, जो एक समाती ही तुम खाली क्षणों में बैठे होते हो और उसकी
- 1:11:01याद उतर जाती है, तुम याद करोगे तो उससे चूक जाओगे अगर कोई पागल
- 1:11:11हो गया है। तो तुम उसके पीछे पागल मत हो, तुम
- 1:11:16सत्य को समझो, इनके कोई निहित स्वार्थ होंगे, मैं तुम उस तन पर
- 1:11:26चले जाओ पुत्र जहाँ इन हैप्पी हार्मोन की कोई कमी नहीं।
- 1:11:31एक खोपड़ी से हैप्पी हार्मोन तुम बनाओगे सैरोटोनियन बनाओगे
- 1:11:34मैलाटोनियन बनाओगे डोपा में ही बनाओगे तुम चुप जाओगे पुत्र संत
- 1:11:43के भीतर इतना क्यों आनंद होता है हर?
- 1:11:48जब वो डुबकी लगाता है उस सागर में गंगा सागर के तीर्थ में तो बाहर
- 1:11:54इतना फैलाव होता है उस गन्ती का की दूर तलक फैल जाती है।
- 1:12:00उसकी महक तुम खींचे चले आते और सभा भी गए हैं।
- 1:12:08तुम वहाँ जो मन्नत मांगोगे वो पूरी हो जाएगी लेकिन का बता तुम
- 1:12:15ये लत लग जाएगी। ये शरीर तो मरण धर्म है, अगर होगा
- 1:12:22तो फिर भी। भूत के भीतर वो उतार लिया जाएगा
- 1:12:28विशेष प्रोसेसर के द्वारा एक बूंद जो शुरू से चली मेरे संग वो उतार
- 1:12:36ली जाएगी, लेकिन मैं जवाब नहीं दे पाऊंगा जैसे आज जवाब दे पाऊंगा,
- 1:12:42बस सुन लूँगा तुम्हारी बात। जवाब नहीं दिया बिन पग चले सुने
- 1:12:52बिन का नाम मैं सुनूंगा तुम्हारी बात तुम्हारा दुख दर्द मैं सुनता
- 1:12:57हूँ गट गट के अंतस की जानत भले होरे की वीर।
- 1:13:03थोड़ा सा दुखड़ा रो लेना आके फिर थोड़ा सा दुखड़ा रो लेना ज़िन्दगी
- 1:13:17ने। कर दिया।
- 1:13:21जब भी हुदा ज़िन्दगी ने कर दिया जब भी हुदा सा गए घबरा के हम।
- 1:13:41मंजिल के पास सर झुकाया, सर झुकाकर रो दिए आपके।
- 1:13:59पहलू में आकर रो दिए दास्ताने अवम सुनाकर रो दिए।
- 1:14:17आपके पहलू में आकर रो दिए। जिंदगी ने कर दिया जब भी।
- 1:14:32उदास करेगी, बहुत वक्त पे करेंगे बहुत बार तुम उदासी के।
- 1:14:37फलों में धकेल दिए जाओगे ज़िन्दगी ने कर।
- 1:14:42दिया जब भी उदास। आ गए घबरा के हम मंजिले मेरे पास
- 1:14:47आ जाने। सर झुकाया, सर झुका के।
- 1:14:53रोत दिया। आपके पहलू में आके रोते मेरे पहलू
- 1:14:58में आके रोते। दास्ताने गम।
- 1:15:04सुनाना दास्ताने गम सुना कर। रोते?
- 1:15:11है। आपके।
- 1:15:14पहलू में आँखें होती है। अगर मुश्किल हो जाए भीतर जाना तो
- 1:15:20फिर ये अंतिम मैं चला जाऊं लेकिन मैं।
- 1:15:33छाया चली जाय लेकिन छाया बड़ी कीमती छाया तुम्हें तुम्हारा जवाब
- 1:15:40देती है। बस जवाब न दे बंक मौन मूक सहज
- 1:15:50तुम्हारी दास्तां ने गम की। सारी कहानी सुनूंगा और उसे बेहतर
- 1:16:04तेफ़ सिख हटा के। बात कर तेफ़ कर दूंगा।
- 1:16:11तरतीब में ला दूंगा, तुम्हें जीना सीखा दूंगा।
- 1:16:18लेकिन आना तभी आना। जब तुम्हारे पास कोई चारा नहीं
- 1:16:24है, पहली मेरी। कोशिश यही है कि तुम।
- 1:16:29काश उसी तर पे पहुँच जाओ। जो तले यहाँ आके होता है तुम्हें
- 1:16:34जो नाइट्रस ऑक्साइड से वेलियम से जो गांजा से जो अफीम से जो एलएसटी
- 1:16:41से जो बाहरी चीजों के मादक द्रव्यों से तुम जीस क्षण में
- 1:16:46टेंपररी पहुँच जाते हो। उस।
- 1:16:51शिक्षण में तुम रहते रहते। एक बार मेरी मौजूदगी में भी वो ही
- 1:16:58होता है, वही कंडीशन होती है। बट आर्टिफिशियल यह कृत्रिम।
- 1:17:07होती है सदा के लिए। नी।
- 1:17:11श्रद्धा के लिए नहीं होती। श्रद्धा बाहर नहीं होती थोड़ी।
- 1:17:14देर के लिए होती आएगी, चली जाएगी लेकिन तुम उतरो, उस।
- 1:17:19जगह पे जहाँ जंक्चर प्वाइंट। वास्तव में है समझ तो यहाँ आकर
- 1:17:23समझना है तुम्हें तुम घर जाके सोचना क्या हो गया सामने वह क्यों
- 1:17:29नैन छल काय थी? क्यों ये पथरीला हृदयद्रवित हो
- 1:17:38गया था? क्यों?
- 1:17:42नैना सावन बहादों की? तरह रिमझिम रिमझिम बरस पड़े थे।
- 1:17:52तुम्हें पता नहीं चलेगा। लेकिन मैं बता देता हूँ हम उस
- 1:17:57जंक्चर पॉइंट के करीब पहुँच गए थे पहुँच गए थे सच में पहुँच गए थे,
- 1:18:02लेकिन जब तक यहाँ हो तब तक यहाँ से गए कि धीरे धीरे संसार की
- 1:18:11लाशानी तरंगें। उन्हें काटते जाएंगे, काटते
- 1:18:15जाएंगे और पांच 7 दिन के लिए प्रभाव रहेगा।
- 1:18:18इस दिन मैंने कहा जाते वक्त 7 दिन के लिए तो बंद हो जाना कमरे में
- 1:18:24वहीं खाना पीना, स्नान करके आना, क्रियायोग करना, सुबह ध्यान में
- 1:18:28बैठ जाना, वहीं 7 दिन के लिए बैठ जाना।
- 1:18:31बड़ी क्रांति गठित हो सकती है। यही है मकान यही है।
- 1:18:39मुकाम तक जाने का रास्ता। पुरुष।
- 1:18:51शाम। जब।
- 1:18:54आंसू बहति आ गई शाम जब आंसू बहति आ।
- 1:19:08गई। हर तरफ गमकी उदासी छा गई।
- 1:19:20दीप यादों के जराकर रो। दिए आपके पहलू में आकर रो दिए
- 1:19:40दास्तां गम सुनाकर रो दिए। आपके पहलू में आक रो दी, गम जलाई
- 1:20:02का सह जाता। नहीं हूँ।
- 1:20:09गंज दाई कारसा जाता नहीं आपके बिन अब रहा जाता।
- 1:20:26नहीं प्यार में क्या, कुछ गँवा कर रो ये आपके पहलू में आकर।
- 1:20:44रो की गम मत कर। सब छिन जाए तो भी फिक्र मत कर कुछ
- 1:20:53नहीं छिना तुमसे अभी भी सब तुम्हारा, अभी भी तुम क्योंकि तुम
- 1:21:02शिव सो। तुमसे कभी कोई छीन नहीं सकता।
- 1:21:08तुम पूर्ण हो और पूर्ण में से पूर्ण को निकाल लिया जाए।
- 1:21:15पूर्ण से पूर्ण माताएं पूर्ण मृवा व शिष्य थे।
- 1:21:19तुमसे कुछ भी निकाल लिया जाए। प्यार में क्या क्या गवा कर
- 1:21:24रोटिये कुछ भी गवा पाओगे, लगेगा के गवा दिया सब कुछ गवा, कुछ भी
- 1:21:33नहीं पाओगे तुम सदा से पूर्ण हो और सदा ही पूर्ण रहोगे पूर्ण से
- 1:21:39पूर्ण माताएं पूर्ण में भाव शिष्य।
- 1:21:51धन्यवाद, सर।