Latest / Baba ji Vijay Vats / 2 Mar 26 - अनाहत नाद और आत्म-साक्षात्कार!! गोरखनाथ का रहस्यमयी सूत्र: "सारम सारम गहर गंभीरम"
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- 0:23गोरख नाची का अगला शब्द सारम सारम गहर गंभीरम गगन उछलया नादम माणिक
- 0:38पाया। फेर लुकाया झूठा वाद विवाद सुख की
- 0:54खोज करने वालो, आनंद के रसके को पीने की चाहत रखने वालो।
- 1:10एक बात को गौर से संचालित यह आवश्यक पड़ाव है क्या?
- 1:28यह अनहतनाथ का बज जाना अनासत ना? चौबीसों घंटे दिनभर रात जागते,
- 1:45उठते बैठते, सोते खाते पीते। निरंतर चलता ही रहता है।
- 2:01इसको एक लक्षण की तरह ले लेना। गौरव कहते हैं, अगर किसी व्यक्ति
- 2:15में। अनाहत नाक का स्वर अभी गूंजा नहीं
- 2:21है, वह अभी कोसों तो है। जैसे हम किसी आवाज़ वाली चीज़ के
- 2:38बाद शकर जैसे हम किसी बाग बगीचे के पास शकर सुगंध का अनुभव करते
- 2:46हैं, ऐसे ही ये परमात्मा के होने का।
- 3:00पैमाने एक बात को समझिए, हमने शब्दों को बिगाड़ दिया।
- 3:12गुरु जब नाम दान देता है। एक शब्द कहता है आपसे इसे सोते,
- 3:29जागते बैठते, उठते चलते फिरते, खाते पीते, नहाते जागते ही रहेंगे
- 3:40इसे मेज़रमेंट बना लेना। इसे माप का दंड बना लेना और बाकी
- 3:46सभी बातें भूल जाना अगर सुगंधना आई तो समझना बगीचा आया नहीं, यह
- 4:02बगीचा उजाड़ है या बगीचे में सुगंध गाय का फूल लें।
- 4:08बस एक कनेर के होंगे लेकिन गुलाब, मोतिया, चमेली ये सुगंध दायक फूल
- 4:22देंगे। उसमें बाबा क्या आनंद आनंद के
- 4:39जागने के बाद अवश्य मेव आता है, बहुत लोगों का सवाल है।
- 4:56हाँ, बिल्कुल, क्योंकि यह उस रथ से उठी हुई गोंज है जैसे देसी
- 5:12घृत्य से जीस घर में हलवा बन रहा। आप वहाँ प्रवेश करें तो उस घर के
- 5:24दरवाजे के जो खट पर ये आपको पता चल जाता है की यहाँ कोई देसी घी
- 5:29का पकवान बन रहा है। ऐसे ही रश करीब है, बस इस एक को
- 5:44अपना मापदंड बना लेना। इसलिए मैं कहता हूँ कुछ न करो।
- 6:00कुछ न करने का अर्थ है के तुम्हारे करने से अनंत नाग जगतन
- 6:10तुम लाक से लाओ लाक प्रार्थना करो लाक पूजा तो बस सरिया को छोड़ सो
- 6:17की चार पूजा करो। सुम दान करो, भक्ति करो, पूजा
- 6:24करो, पाठ करो कथा कथा करो, उपवास करो किसी भी चीज़ का संबंध।
- 6:36अनंतनाथ के जगन से पूछा है कि बाबा क्या यह शुरू से ही आनंददायी
- 6:47होता है या कि थोड़ा? ठहर कर आनंद आना शुरू होता है।
- 6:59नहीं मुझे ये बताओ दूध मीठा है या मिठाई मीठी है?
- 7:17यह पूरी मिठाई खाने के बाद पता चलेगा या के प्रथम बुर्के से ही
- 7:23पता चल जाएगा। प्रथम बुर्के से ही पता चल जाएगा
- 7:33कुछ देर बाद अनंतनाथ। रस बरसाता है।
- 7:41यह उनकी बात है जिन्होंने अनाहत का रस जाना अनाहतना जैसे प्रकट
- 7:56हुआ। और जिंगुर की मस्ती बेनी बेनी
- 8:01आवाज तुम्हें मदहोश कर देगी और तुम्हें कुछ करने की आवश्यकता
- 8:08नहीं क्यों? क्योंकि कुछ भी करना था तुमने मन
- 8:15की गति को रोकने के लिए। इसे ठीक से समझ रहा हूँ कुछ भी
- 8:30करना था तुमने, वो था मन की गति ठहर जाए और आनंदनाथ की शुरू होते
- 8:43ही फ्रॉम वेरी बिगिनिंग। की प्रथम बारिश हुई।
- 8:54मन ठहर जाता है यह इसकी पहचान इसका मेजरमेंट है।
- 9:00गफलत में मत रहना बारांती में मत रहना के कुछ वक्त बाद यह चलेगा।
- 9:10और उसके बाद यह हिरासत देना शुरू कर देगा।
- 9:20जब ये अपने मूल उदगम स्रोत नाभि के पास से उठता है तो थोड़ी देर
- 9:26तो लगती है वो थोड़ी देर का मतलब एक 2 दिन नहीं।
- 9:34बस 2410 क्षण क्षण पर सेकंड जितना वक्त नाभि से लेकर गगन मंडल तक
- 9:50जाने में लगता है। और इसका प्रथम श्रवण होने के बाद
- 10:06मन ठहर जाता है। यही तो तुमने चाहा था।
- 10:16अध्यात्म और क्या सीखाता है अध्यात्म सीखाता है।
- 10:24रस, कॉपी और रस उस घड़ी में पिया जाता।
- 10:33जब मन ठहर जाता और मन तब ठहरता जब अनजनाथ साउंड ओपेन स्ट्रक्चर
- 10:50साउंड। का गुंजार शुरू हो जाता है।
- 10:56वह इतनी रसीली है। आवाज क्या उसकी खनक?
- 11:10उसकी खनक से तुम इतने खुशबू से भर जाते हो कि तुम्हारे पास बैठा हुआ
- 11:17व्यक्ति भी उसका मन जाने को करता है और फिर वापस फिर फिर आने को
- 11:26करता है। ध्यान रखना तुम सदा ही उसके गोलम
- 11:35मत बने रहना बहुत से गुरु। अपने निहंत स्वार्थों के लिए
- 11:46तुम्हें कहेंगे तुम बार बार फेरी लगाओ 10 फेरी लगाओ 20 फेरी लगाओ
- 11:54उनका नहीं तो स्वार्थ है, क्योंकि जब तुम आओगे तो कुछ द्रव्य लेके
- 12:01आओगे। उनकी चाहत तुम्हारा सुख ने उनकी
- 12:07चाहत तुमसे द्रव्य इकठ्ठा कर तो आइए गौरव के सूत्र पे चलो।
- 12:26कल ही एक प्रश्न कमेंट में सभी ने पढ़ा बुक बाबा आज तक जीतने भी संत
- 12:35पहुंचे। वो कबीर हों, वो नानक हों, वो
- 12:40नामदेव हों, पलटू हों, दया हों। और चितने में है नाम शरण से
- 12:47पहुंचो। फिर आप कैसे कहते हो की नाम सुमन
- 12:52से व्यक्ति पहुंचते हो। नाम शब्द का अर्थ गलत कर दिया
- 13:06गया। मैं तुम्हें नाम शब्द का सही अर्थ
- 13:11बताता हूँ और जीस नाम स्मरण की आप बात करते हो नाम जपो गर्त करो वण
- 13:21इच्छा को। उन्हीं 38 कौड़ियों में जपजी साहब
- 13:30के नाम की व्याख्या बड़ी सुन करती है।
- 13:35मेरे बार बार समझाने के बाद भी तुम नाम आज भी झप रहा है।
- 13:48वरना तुम मुझे कोशिश करते हो कि ये सभी तो पहुंचे नाम के द्वारा,
- 13:55फिर बाबा आप क्यों कहते हो के नाम सुन मत करो, क्योंकि मुझे तुमसे
- 14:03प्रय। मैं तुम्हें भटकना हुआ देखना इन
- 14:10लोभियों के मन में तुम्हारे तुम्हें लूटने की, पर पंच न हो
- 14:19मेरे भीतर। तो वासना भी नहीं, विचार भी नहीं,
- 14:37और उसके बाद न वासना है, न विचार है।
- 14:43जरूरत भी नहीं है। तीन बिंदु हैं मुख तुम जिन
- 14:57राजनीतिज्ञों को तख्तों पे बैठा देते हो और उनसे उम्मीद रखते हो
- 15:07कि वे तुम्हें आनंद की बरसात में। दबोते थे तुम भ्रम में हो पत्र एक
- 15:23बेसिक बात को। तीन चीजें हैं।
- 15:36सबसे पहले वासना, काम, क्रोटोपमो, अहंकार, मधुमत, मृत्यु, भय।
- 15:50सबसे पहले यह मिटते इस अवसर से समझ लो।
- 15:57क्योंकि ये बेस है काम क्रोश लोभ मोह अंकार मधुमत सह भय जब वासनाएं
- 16:09बढ़ जाती हैं तो मन शुद्ध रूप से बच जाता है।
- 16:18पहले मन अशुद्ध रूप में था, अब मन तो बचा लेकिन शुद्ध रूप में बचा।
- 16:28फिर मन चिंता नहीं करता चिन्तना करता है।
- 16:33उस चेतना को नाम कहते हैं, लेकिन ध्यान रखना, ये चेतना भी खलक है,
- 16:47जहाँ शोर वहाँ परमात्मा नहीं। जब तुम अपने भीतर प्रथम बार
- 16:54जाओगे, वहाँ पाओगे महा रस महा आनंद महासुगंध बरस रही एवं और तुम
- 17:07एक चीज़ और भी पाओगे। कि वहाँ कोलाहल नहीं वहाँ पर मौन
- 17:16है, वो आ रहे हैं साँसों ज़रा आहिस्ता चलो वो आ रहे हैं साँसों
- 17:29ज़रा आहिस्ता। दिल के धड़कने से इबादत में कलल
- 17:36पड़ती है। गौरव का बहुत शानदार सूत्र
- 17:52वासनाएँ आएंगी। अभी तुम उनसे उम्मीद रखो।
- 17:59रखे हो के हमारा उद्धार करेंगे, जिनका खुद का उदाहरण नहीं हुआ।
- 18:11अभी तो वो भिक्षा पत्र लिए तुम्हारे सामने करे।
- 18:19जिसका पात्र भर गया गागर भर गई अमृत से और छलक नहीं लगी वह गुरु
- 18:31बनने के योग्य है। अध जल गगरी छलकत जाए जो अभी खुद
- 18:42ही वासनाओं की पीड़ा ये पीड़ा होती है, कोई भी वासना पीड़ा
- 18:50होती। जो अभी खुद ही वासना की पीड़ा से
- 18:56ग्रसित है, वह पुत्र तुम्हें कैसे आनंदित कर पाएगा?
- 19:09वह तो खुद ही प्यार सा। दूसरा है विचार जब वासना मिटती
- 19:22है, चिंता मिटती है तो चिन्तना शुरू होती है, लेकिन दोनों ही
- 19:34जलाती है। शास्त्र का वचन है चिंता चेता
- 19:41देवरमध्य चिंता अब घरयसी, चिंता और चेता के भीतर एक टिप्पी का
- 19:49फर्क है, जो ऊपर लगी है। चेता, चिंता, चिंता चेता
- 19:57देवरमध्य। चिंता ऐब करिअसिं चिता दाहती नर
- 20:04जीवा आग मर्दे को जल दी चिंता दाहती जीवत चिंता जीवत प्राणी को
- 20:16जी ला दी। जनता जलाती जयवंत को चिंता जलाती
- 20:24मृत्यु तुम्हारा नाम जब तुम्हारे लिए एक कष्ट है, यह तुम्हें दुख
- 20:36देता है। तुम इसको सर पे बैठाइयो और उदाहरण
- 20:41देते हो, कभी उदाहरण देते हो? नानक, नानक जपजी में बिल्कुल
- 20:50स्पष्ट कहते हैं ये सारा पसारा ऑल ऑफ दी यूनिवर्स।
- 20:57हिज़ नाम जीता। कित्ता कित्ता ना इसारा प्रसाद,
- 21:08ओमनी प्रेसिडेंट, दैट इज़ कॉल्ड ए ना।
- 21:14तुमने नाम को शब्दों में डाल लिया तो कसूर किसका?
- 21:22बिन ना में ना ही कोठा और ज्यादा साफ करते हैं।
- 21:27बात नान में कहते हैं कि नाम के बिना।
- 21:34कोई जगह नहीं जिधर देखता हूँ उधर तो ही तो खरघरे में तो ही तोरो
- 21:44बुरो चिंता गई। तुमने क्या करो माला पकड़ ले।
- 21:58रामड्रम कर लो रागह आदि कर लो यह भी जलाएगा तुम्हें तो मैंने उसे
- 22:09जवाब दिया अगर पुत्री नाम जब से नानक को मिला, कबीर को मिला।
- 22:22तो फिर कबीरपंथियों के पास ना नकपंथियों के पास तुम क्यों नहीं
- 22:26चली जाती है? तुम यहाँ क्या करने आई हो?
- 22:30सीधा सीधा सुना रहे है ना चिंता है?
- 22:41फिर चिंता तुम सिनसारती करो या ब्रह्मात्मा की करो चिंता चिंता
- 22:49है जलाती है और तुमने उसके पास जाना है।
- 22:59जो जल ही नहीं सकता नैनम दहती पाबका नैनम क्षगन्ति शस्त्रण जैसे
- 23:16कोई शस्त्र नहीं काट सकता, जिससे कोई आग नहीं जला सकती।
- 23:22तुमने जाना तो बहन। और तुम्हें चिंता की आग नहीं तो
- 23:26तुमने दूसरा पक्ष उठा लिया, तुमने चिंतन करना शुरू कर दिया, तुमने
- 23:31राम राम करना शुरू कर दिया है तो बकवास ही गाली निकालो कि भगवान का
- 23:40बनाया हुआ नाम लो। दोनों कोलाहल हैं, दोनों शोर हैं
- 23:54मैंने का पुत्र तुम तुमको किसने बुलाया है?
- 24:00मेरे पास वो आया है जिनको नाम जपने से मिला।
- 24:09मेरे पास व्यर्थ खोपड़ी को खुजलाने वाले लोग ना पहले आजमा के
- 24:21देखने नाम जब से मिलता है। अगर पानी नहीं मिलता तो फिर वह
- 24:29मेरे पास जब तुम देख लोगे के शब्दों का पानी प्यास नहीं बजाता
- 24:39जब तुम देख लोगे के शब्दों का खाना भूख नहीं मटाता।
- 24:47फिर तुम मेरे पास आना पड़े, मेरा डर खुला है, खुला ही रहेगा
- 24:54तुम्हारे लिए, लेकिन उससे पहले खोपड़ी की खोजला हद करने मेरे पास
- 25:02मत आना। मैं मुंडन मिश्रा की तरह
- 25:04शास्त्रार्थ नहीं किया। मेरे पास तो जो लोग बोत ही बगल
- 25:10में दबाए आजा मैं उनकी तमन्ना तत्व क्षण पूरी कर देता हूँ, उनके
- 25:17हाथ लगा देता हूँ अपने सिर उनके चरणों में रख लेता हूँ प्रभु।
- 25:25तुम जीत गए, मैं हाथ गया, बैठिए, बैराजिए आसन लगा देता हूँ, जलपान
- 25:37की जू खाने का वक्त है, भोजन करके जाइएगा।
- 25:44लेकिन कृपा करके इस सपोथी को अपने बस्ते में डालो।
- 25:53बस जीस काम के लिए तुम आए थे वो हो गया तुम जीत गए पंडित जी तुम
- 26:03जीत गए, मैं हार गया। यही करने आये थे ना मुझको, हराने
- 26:08आये थे ना मैं हार गया अब कुलभुला हट किस बात की?
- 26:15अरे वाह वाह बिना शास्त्र रद्द किए तुम कैसे हार गए?
- 26:19मैंने कहा, जब मैंने स्वीकृति कर लिया, मैं हार गया।
- 26:23अब आगे बात क्यों कर रहे हो? यह परमात्मा की अद्भुत देन है और
- 26:36जब तक तुम्हारे भीतर अनद ना जसुर नहीं होता, यही एक धागा है कच्चा
- 26:46लगता है। लेकिन है स्टील से भी ज्यादा पकता
- 26:50है न कभी टूटता है, न कभी बंद होता है।
- 26:56बस तुम ही इससे दूर चले जाते हो, यह तो गूंजता ही रहता है।
- 27:01यह प्रमाण है इस बात का कि वह तत्व किसे तुम ढूंढ रहे हो, वह
- 27:07सदा से है। तुम सो जाते हो पर यह नहीं सोता
- 27:15बड़े शोक से सुन रहा था ज़माना, हम ही सो गए दास्तां कहते कहते।
- 27:28यह चलता ही रहता है। तुम सो जाती और जैसे ही तुम्हारी
- 27:33आँख खुलती तुम देखते हो ना द तो चल जाता है बंद कब हुआ था?
- 27:42तुम ही सो गए दास्तां कहते कहते बड़े शोक से सुन रहा था जब तुम
- 27:57मुझे पूछा है, मैं किसी भ्रम में आपको डालने वाला हूँ।
- 28:04मैं आपको मीठी गोली नहीं देता, शुगर कोटेड कुनीन मैं नहीं
- 28:10खिलाएगा मैं सीधी, सीधी या तो कुनीन खिलाता हूँ ओरिजिनलटेड
- 28:21ऑथेंटिसिट। या फिर मीठा ही लगता हूँ कि तुम
- 28:27भ्रम में न रह जाओ? लालची लोभी, निहेत स्वार्थ से भरे
- 28:40हुए लोग। तुम्हें मीठी गोलियां खिलाएंगे,
- 28:46उनके भीतर कोनीन होगा। जहरीला कोनीन तो मुझसे पूछा पुत्र
- 28:56तुमने? क्या यह शुरू से आते ही रस देता
- 29:02है? बिल्कुल गुड़ की पहली बोटी ही
- 29:09मिठा देते। ऐसा नहीं कि सारा गुड़, खालों फिर
- 29:15मिठा से। और लहर जीभ को टेस्ट के वर्ड को
- 29:21लगाते ही तुम थू पड़ोगे अनंतनाथ के पहला स्वच्छ बस फिर तुम्हें
- 29:33कुछ कर के की आवश्यक। नथिंग टू डू बहुत से लोगों की
- 29:43अन्नत कब से शुरू हुआ है। लेकिन आज वो डेरों में केंद्रों
- 29:55में। मठों में गुरुओं के पास धक्के खा
- 30:00रहे हैं और उनका मन ठहर सकता है। जब दवाई तुम्हें मिल गई।
- 30:15रोग को भगाने की तुम प्रयोग क्यों नहीं करते, सेवन क्यों नहीं करते?
- 30:23क्यों धक्के करते भरते? बिल्कुल प्रथम बार जैसे ही
- 30:33अनाधनाद शुरू होता है, तुम भक्के भक्के हो जाओगे?
- 30:39ये क्या है? ये मधुर विनी विनी सी आवाज कहाँ
- 30:44से आई? इसने तो मुझे शांत कर दिया।
- 30:51इसने तो मेरे मन को ठहरा दिया, जो मैं यत्न करके भी न कर पाया।
- 30:59वह इस आवाज ने ठहरा दिया जैसे तुम कहीं जा रहे हो और रस्ते में कोई
- 31:06भी न बजा रहा है। बंसरी बजा रहा है उस बंसरी की
- 31:12मधरवाणी को आवाज को सुनकर। तुम ठहर जाते हो, इतना मीठा सा है
- 31:22उस बंसरी में उस वीणा कि तुम्हें रुकना ही पड़ता है।
- 31:32ऐसे ही आनंदनाथ आनंदनाथ प्रकट हुआ।
- 31:41कि तुम्हारा मन ठहरा। यह प्रथम लक्ष्य है और किसका मन
- 31:48ठहर गया? मैं ज्यादा पिचीदा नहीं किया करता
- 31:52बातों को। एक बी के का है कोई दशरथ, दशरथ और
- 32:04बातों को इतना उलझा देगा ने जानी कितने नर्क बना लिए ने कितने
- 32:12स्वर्ग बना लिए इसकी खोपड़ी खुद की ही नर्क है।
- 32:19स्वर्ग कनक भला इतने गहरे विचार रखने वाला व्यक्ति इतने ज्यादा
- 32:25विचार रखने वाला व्यक्ति शांत हो भी कैसे सकेगा?
- 32:29इसको नींद ठीक से आ जाती है। तुमने खाली होना है।
- 32:41मुझे तुझे कबाड़ा जो तुमने भर लिया पहले से ही तुम बहुत भरे हुए
- 32:48हो कूड़े और बीके एक ऐसी संस्था। जो एक अपराधी ने कामी ने
- 33:01वेब्याचारी ने दोष आरोपित व्यक्ति ने शुरू की थी जो कराची से 150
- 33:12लड़कियों को ले कर भागा था। और उसने डेरा डाल लिया।
- 33:18माउंट अब्बू मुझे याद है पीछे जिलम में मुझे इसकी शिकायत मिली
- 33:26थी के बाबा एक बदमाश है। वो सुंदर लड़कियों को लेके आया।
- 33:34पाकिस्तान से कराची उस वक्त बनाने की बात वह ऊंट पटांग से खाता है।
- 33:51मैंने कहा देखो मित्रों। अभी भटकने का समय अभी हमारे सर के
- 34:00ऊपर एक बहुत बड़ा कर्तव्य है। देश को आजाद कराना शेष है।
- 34:09इन व्ययचार्यों से बाद में निपटा लेंगे।
- 34:15क्या तो ठीक है? समझ आ गई बात ये एक नहीं ये तो
- 34:22अनेक है। किस किस से निपटेंगे?
- 34:26गुफाओं वालों से निपटेंगे? डेरों वालों से निपटेंगे।
- 34:35कहाँ सभी ने? हमको लूटा है।
- 34:54इस आनंद के रस को बहुत लोगों ने खंडन किया है।
- 34:59इस आनंद के रस के ऊपर जहरीली लेपन बहुत लोगों ने की।
- 35:10किस किस का ध्यान बेहतर इसके है के दूसरों की ओर ऊँगली करने की
- 35:20बजाय जल्दी ही वापस आ जाओ। और अपने अंत में जाकर अपना आपका
- 35:31कंगार, अपने आप को जानना सबसे पहला लक्ष्य है तुम्हारा।
- 35:44जानने के बाद फिर तुम जो चाहे कर लेना, फिर समाज के प्रति, फिर देश
- 35:52के प्रति, फिर राज्य के प्रति जो तुम्हारे कर्तव्य तुम करना चाहते
- 35:59हो वो कर लेना अन्यथा उस रस को पी लेना।
- 36:04पीते रहना तो तुम्हारी इच्छा क्योंकि तुम उसके बाद परम
- 36:10स्वतंत्र हो जाओगे, तुम्हारी सारी बेड़ियां टूट के जो करना चाहो
- 36:16करो, नहीं करना चाहो तो आनंद से सरस को पीओ।
- 36:22मेरी तीन बातों को याद रखना। पहली वासनाएं, दूसरी इच्छाएं,
- 36:32तीसरी जी विष्णु, जरूरत है इन तीन बातों को याद रखना।
- 36:42तब तक मैं कहानी पूरी कर लेता हूँ आत्मा की उस स्थिति से जहाँ
- 37:04मूल रूप से तो स्थित हो वहाँ से आवाज़ उठती है और यह तुम्हारे
- 37:12होने का प्रमाण। यह आवाज तुम्हारे 1000 तक जाती।
- 37:21कानों में तो मात्र सुनाई पड़ती गहने से सुनें, बाएं से सुनें,
- 37:27दाहें से सुनें कोई फर्क नहीं पड़ता।
- 37:32गूंजती है ये गगन मंडल में कान क्योंकि श्रवण यंत्र हैं इसलिए
- 37:39कान से सुनाई पड़ती है बस तुम समझ लेना की तुम्हारा तागा उस तत्व से
- 37:49जुड़ गया है। जो उदगम स्तोत्र है इस इस उदगम
- 37:59स्तोत्र के पास ही तुमने यह आवाज जहाँ जहाँ तक जाए।
- 38:10इसके पीछे पीछे चलते रहना और तुम अपने मूल उदगम तक पहुँच जाओगी।
- 38:20इसलिए मैंने कहा यह एक परमात्मा की कृपा है जिसे सभी संतों ने
- 38:28कहा। के पहुंचोगे तो तुम तभी गौ प्रसाद
- 38:34जब उसकी कृपा हो वह कृपा क्यों करता है ये मुझसे मत पूछो मेरे
- 38:42पास इस बात का कोई जवाब नहीं लाखों ही पंडित करोड़ों ही सयानी।
- 38:50खुदा की बात है तो खुदा खींचो वह क्यों हो जाता है मेहरबान किसी
- 38:56विशेष व्यक्ति पे मुझसे मत पूछो लेकिन इतना जरूर कम होगा।
- 39:11ये वो नगमा हैं जो हरसाज पे गाया नहीं जाता।
- 39:16मोहब्बत के लिए कुछ खास दिल महसूस होते हैं, जिन्होंने अपनी जमीन को
- 39:23ब्लो कर लिया, पानी दे दिया, खाद दे दिया।
- 39:32उसमें वह परमात्मा अपना बीज डाल देता है।
- 39:36अंकुरित होने के लिए इतना सा जवाब अगर आपके लिए न कभी हो तो आगे मत
- 39:44भूषण। जब तुम समस्त हो जाते हो अपनी
- 39:52धरती को तुम तपचर्या के द्वारा तप के द्वारा तपचर्या क्या है सारी
- 40:00इन्द्रियां तुम्हारे वर्ष में हो जाएं आज तुम इन्द्रियों के गुलाम
- 40:05आज तुम मन के भी गुलाम। कल इन्द्रियां भी तुम्हारी सेवक
- 40:12हो जाए और मन भी तुम्हारा सेवक हो जाए।
- 40:15आज तो मन बड़ा वक वक करता है और मेरे पास रोज़ ऐसे ही केस आते
- 40:20हैं। बाबा क्या करे तुम मन का मन का
- 40:23तुम्हारा ही बनाया हुआ है। तुमने ही रोग लगाया है तुम्हीं ने
- 40:34दर्द दिया और तुम दवा देना तुम ही से रोक सकते हो।
- 40:46सारम सारम सारों का सार यानी रसों का रस उपनिषद कहता है रसोवैसा वह
- 40:59रस है, यह कहता है वह रस का भी रस है।
- 41:04सारम सारम गहर गंभीरम बड़ा गंभीर है बड़ा गहरे से आता है मूल उदगम
- 41:15से आता है सारम सारम गहर गंभीरम। गगन उछलया नादम गगन में उछलता है
- 41:26आके वह नाद उठता कहाँ से है? बहुत अंतरंग तलों से उठता है बहुत
- 41:36अंतरंग तलों से उठता हुआ वह उछलता है।
- 41:42गगन मंडल में आकर सारम सारम् गहर गंभीरम गगन उछलया नादम यह नाद गगन
- 41:52में उछलता है, प्रकट होता है, लेकिन उठता है आपके अंतः के उस
- 41:58मूल उदगम स्रोत से। मानक पाई।
- 42:05अगर किसी के भीतर यह जागृत हो गया और ध्यान रखना, तुम्हारी किसी
- 42:12प्रयास से यह जागृत नहीं होगा। क्या पर कृपा राम की हो?
- 42:23पर कृपा करे सब गुरु प्रसाधन उस पर्म गुरु की कृपा जीस पर हो जाती
- 42:37है उस पर यह है बरसता देहदारी गुरु को।
- 42:44मत मानना, मैं उस गुरु की बात करता हूँ जो गुरुओं का भी गुरु है
- 42:54जो मास्टर ऑफ मास्टर्स है। जीस पर उसकी कृपा हो जाती है उसके
- 43:08ये ना दोस्ता मैं धीरे बोल रहा हूँ कि आपकी समझ में आ जाए।
- 43:19लेकिन थोड़ा सा इशारा कर दिया जिसने अपनी धरती को तप और तपचर्या
- 43:27से तप और तपचर्या है। आपकी इंद्रिया आपके वश में है ये
- 43:33मत मांगे कि मुझे पकौड़ा चाहिए मुझे।
- 43:37गुलाब जामुन चाहिए मुझे रसगुल्ला चाहिए, मुझे अमरती जलेबी चाहिए,
- 43:47सुंदर स्त्री पुरुष से चाहिए, नैना को अच्छे अच्छे दृश्य चाहिए।
- 43:56फिर आप योग्य नहीं हुए मैंने आपको एक छोटी सी उधार में की।
- 44:06यह वो नगमा है जो हर साज़ पे गाया नहीं जाता, किस साज़ पे गाया जाता
- 44:12है, जो उसके योग्य होता है। मोहब्बत के लिए कुछ खास दिल मकसूस
- 44:23होते हैं। वो दिल मकसूस कौन से होते हैं
- 44:29जिन्होंने अपने। जमीन को अच्छी तरह से फ्लो कर
- 44:35लिया, पानी दे दिया, खाद दे दिया। अब वह अंकुरित होने के लिए तैयार
- 44:43है। फिर परमात्मा उसमें बीज डालता है।
- 44:48ये भूमि में तैयार कैसे हो? नाम जब से नहीं नाम जब से तो ओर
- 44:57पथरेली और बंजर हो जाए फिर मौन स मौन साधो मौन में उतरो गहरे में
- 45:07उतरो। तुम पाओगे बहुत मौन है नाम जब से
- 45:12एक खलल है कोलाहल शौर्य नोया है मौन से जिसने मन को धरती को प्लो
- 45:27किया। उसके भीतर उतरता है उसकी कृपा कर
- 45:33रहा कृपा प्रसाद गुरु प्रसाद सारम सारम गहर गंभीरम गगन उछलया नादम
- 45:54मान को पाया। फिर लुकाया झूठा वाद विवादम बड़ा
- 46:00प्यारा शब्द है, सीधा सीधा उसकी कोई डेफिनिशन नहीं।
- 46:10इसीलिए वो अलंकारों में बोला जाता है।
- 46:14तो यहाँ माणी का भी एक अलंकार है गौरख कहते हैं, माणी का पाया फिर
- 46:24लुकाया झूठा बाद विवादम। उस माने को जब वह मिल जाता है फिर
- 46:39वह नाम के द्वारा बताया नहीं जाता है, फिर वह मौन के द्वारा बदलाया
- 46:48जाता है। ये बात अलग है कि मौन होने के लिए
- 46:54बोलना पड़ता है। ये तो कहना ही पड़ेगा ना जो
- 46:58तुम्हें चुप कराएगा कि चुप हो जाओ, यह भी तो बोलना हो गया गौरख
- 47:09कहते हैं। वाद विवाद मत करना यानी आगे
- 47:16शब्दों के रूप में प्रसारित मत करना, इसको ये वादविवाद कहते हैं
- 47:20नाम दान को नाम दान को गोरखनाथ वादविवाद कहते हैं।
- 47:27शास्त्रार्थ कहते हैं। होते नाम दान वगैरह के चक्कर में
- 47:33मत पड़ जाना जप वगैरह के चक्कर में मत पड़ जाना तप के चक्कर में
- 47:39पड़ना। तप क्या है अपनी अंद्रियों के
- 47:42बकरों को साध लेना, उन पर काबू कर लेना।
- 47:48वो भटके ना तुम उनके मालिक हो जाओ अभी तुम उनके बोला मैं तुम्हारी
- 47:58जीवा कहती है रस लव जलेबी खाई तुम जलेबी ले आते।
- 48:12तुम्हारी आँखें कहती कोई सुंदर सी जगह दिखलाओ तुम महिला स्टेशन चले
- 48:18जाते हो तुम्हारे कान कहते हैं मधुर संगीत सुनो तुम कोई अच्छा सा
- 48:25संगीत सुना देते हो। तुम्हारी नाक कहते हैं।
- 48:31सुगंधित बगीचों में चलो तुम सुगंधित बगीचों में निकल जाते हो,
- 48:39गुरस्तांव में निकल जाते हो, तुम्हारी चमड़ी कहती है इसे ठंडा
- 48:48स्पर्श चाहिए। हवाएं शीतल हो वहाँ चलो तुम शीतल
- 48:54हवाओं में निकल पड़ते हो हिल स्टेशन में लेकिन चैन कहीं नहीं
- 49:00मिलता तुमने देखा आज ये दुनिया भरी पड़ी है, ये भरी क्यों पड़ी?
- 49:08तीर्थों पे हिल स्टेशन देखने में सुंदर जगहों पे ये क्यों भरी
- 49:18पड़ी? क्योंकि इनके भीतर शीतलता आई इनके
- 49:24भीतर वो सुगंध उठी। इनके भीतर वो परम स्वाद आया नहीं
- 49:31तो जी भ रचना मांगेगी, न स्वाद इनके भीतर शीतल हवाएं बहिन तो
- 49:41चमड़ी मांगेगी न शीतल हम? सुगंध नहीं बरसी तो नासिक का पुटम
- 49:49मांगेंगे उद्यान गोलस्तां किसी ने उसका दर्शन नहीं किया।
- 49:59जीसको दर्शन करने के पश्चात व्यक्ति परम सौभाग्यशाली हो जाता
- 50:04है। तो आँखें अच्छा सा दर्शन मांगेगी
- 50:08ना तुम अच्छे पुरुष को अच्छी स्त्री को देखने निकल जाते हो
- 50:16लेकिन कारण तुम्हें पसंद नहीं होता, धीरे ढूंढता।
- 50:26हे फिर वो ही दिल ढूंढ सा हे फिर वो ही फुर्सत के रात दिन बैठे
- 50:44रहे। सर सबरे जाना किए हुए दिल ढूँढता
- 50:57है फिर वो। तुम कुछ भी ढूंढ रहे हो डिग्री
- 51:07ढूंढ रहे हो सूचनाएँ ढूंढ रहे हो गद्दियाँ ढूंढ रहे हो मान सम्मान
- 51:14ढूंढ रहे हो, लेकिन तुम्हें पता नहीं मूल रूप में तुम अपने को ही
- 51:22ढूंढ रहे हो। तुम ही हो वो माणिक जिसे गौरव
- 51:29कहते हैं, माणिक अपाया फिर लुकाया कहते उसे लुका लेना।
- 51:39कबीर भी कहते हैं क्यों? यह शब्द क्यों कहा?
- 51:43कबीर ने भी कहा गौरखने भी कहा हीरोपयो गांठ गठ आयो हीरोपयो।
- 52:01गांठ गठ खोले? मन मस्त हुआ।
- 52:20हुआ फिर क्यों वो ल मन मस्त हुआ? फिर क्यों वो ल दिखाने की जरूरत
- 52:34भी कहाँ है और दिखावा तो वो करता है।
- 52:38जिसकी अंत आत्मा अभी प्यासी रहे तुम मस्ती का रस पीओगे या लोगों
- 52:47को दिखाते फिरोगे कि मुझे मांडक मिल गया पीओगे बिल्कुल पीओगे।
- 52:57जो पी लेता है वो दिखा वाणी करता है एक एक वचन को ठहर कर धैर्य
- 53:08पूर्वक सुन माणिक पाया, फिर लुकाया तो उसे छुपा लेना।
- 53:17छुपा लेने का मतलब क्या है? दिखावा मत करना आओ नाम ले जाओ
- 53:23मेरे से आओ मेरे से दीक्षा ले जाओ आओ मैं तुम्हें सच घटा पहुंचा
- 53:31दूंगा ये दिखावा। गुरु ऐसा कहता नहीं गुरु से
- 53:41बांटता है, गुरु बांटता नहीं, उस गगरिया की तरह बढ़ता है जो ऊपर तक
- 53:47ललब भर जाती है और भरने के बाद भी गगन मंडल से तो झड़ रहा है
- 53:52लगातार। फिर वो झलता हुआ गगन गगरिया में
- 53:57तो जगा नहीं वो छलकेगा। बस गुरु जो बोलता है वो छलका हुआ
- 54:04रश होता है। अमृत किसे कहते हैं लुकाया तुम मत
- 54:11बोलना। तुम्हारा रस बोलेंगे माणिकपाया
- 54:19फिर लुकाया झूठा वाद विवादन शंकराचार्य की तरह पोथी, बगल में
- 54:30छुपाकर मुंडन मिश्र से। या कुबे भारती से शास्त्रार्थ मत
- 54:35करने लग जाना चूक जाओ वह वाद विवाद का विषय नहीं है।
- 54:44थोड़ा रात को आसमान की तरफ आँखें उठाकर देख।
- 54:51उसकी वराटिका, उसकी विशालता, उसकी वृहदता जैसे ही तुम देखोगे तुम
- 55:00लुप्त हो जाओगे, तुम अपने को भूल जाओगे इतना सुंदर नजारा।
- 55:09उसके बारे में वाद व वाद करोगे क्या ही कैनट बी दे स्क्वायर ही
- 55:17कैनट बी एक्सप्लेन्ड ही कैनट बी डिफ़ाइन्ड ना तो उसकी कोई प्रभाषा
- 55:24ना कोई व्याख्या बे इतना विराट है।
- 55:29में बस पिया जा सकता है और पीकर भी उसका स्वाद नहीं बताया जा
- 55:35सकता। कबीर कहते हैं, यों गूंगा गुड़
- 55:45खाय के कहे कोण मुख स्वाद। लिखा लिखी की है नहीं देखा देखी
- 55:53बात गंगा गुड़ खा के कैसे बताएगा क्योंकि जुबान नहीं लेकिन उसके
- 56:04हाँ भाव उसकी आँखें की रोशन आई। वह चमक धमक, वह चेहरे से उठते हुए
- 56:12प्यार के भाव, आनंद और लुसफ की बाहर लज्ज़त वह तुम्हें सोचने पर
- 56:21विबुश कर देगी। उसका आहार, व्यवहार, उसके लक्षण
- 56:27तुम्हें सोचने पर बातें कर देंगे। यह किसी दूसरे लोक से आया हो,
- 56:34व्यक्ति है, इतना शांत कैसे है? हम तो भटकते भर रहे हैं, इतनी
- 56:41खुशबू क्यों है इसके हृदयगति? क्यों इसकी बातों में इतना लुप्त
- 56:46है लतजत ये कहाँ से आती है आवाज? ये अनंतनाथ की आवाज तुम्हारे उदगम
- 56:58स्रोत से आती है। गौरव कहते हैं कि अगर तुम्हें ये
- 57:07मानक मिल गया तो इसको गांठ में बांधकर छुपा लेना, वाद विवाद मत
- 57:17करना क्योंकि ये वाद वाद का विषय है ही नहीं।
- 57:22यह कोई विषय नहीं है जिसके बारे में तुम वाद विवाद करोगे।
- 57:27यह अस्तित्व है अस्तित्व के बारे में वाद विवाद हुआ नहीं करता
- 57:33इसलिए मैं शंकराचार्य को मूर्ख कहता हूँ।
- 57:39हर किसी से वाद विवाद कर रहे हैं। कहता भी नहीं जानते।
- 57:42वह इतना महत्त्व है कि उसके बारे में वाद विवाद वह शब्दों में
- 57:47बांधा कैसे जाएगा? पोत ही उठा लेते हैं मुंडन मिश्र
- 57:53को कहते हैं आओ झंडा झंडा उठा लेते हैं, मुझे कभी कभी शक हो
- 58:00जाता है। यह पहुंचा भी था लेकिन फिर जब
- 58:09पाता हूँ अपने नाइनों से एनलाइटन तो था इतना एनलाइटन था।
- 58:20कि धन की देवी को पुकार लगाएं और धन की देवी आचर हो जाए और उससे
- 58:27आदेश करें कि इस गरीब ब्राह्मणी के घर के ऊपर बारिश करो, सोने की
- 58:33तीन प्रहर करें और देवी लक्ष्मी वहाँ बरसने को बाध्य हो जाए।
- 58:42हम तो अपनी इंद्रियों पे खुला है, ये तो देवताओं का मालिक है तो 4
- 58:51दिन पहले मैंने एक शॉट डाल दी, बाकी तो चुप रहे एक दो कमेंट।
- 59:01कि अगर हनुमान जी सुन लेंगे, मैंने कहा हनुमान जी तो सुनते ही
- 59:05हैं, जो पांव दबाता है वह सुनता नहीं है, वह बह रहा है, वो गोटना
- 59:14उठा लेगा। मैंने कहा, गोटना ही तो लेके आते
- 59:16हैं। ये जो छत बारे फुट पे रखवाई उनके
- 59:20घुटने के कारण जो मेरा सेवक है ये मेरे बाल बच्चे हैं जिनको तुम
- 59:31पूजते हो। ये है शेरां वाली ये मेहरम वाली
- 59:38ये पहाड़ वाली ये हनुमान, ये शंकर ये मेरे बाल बच्चे हैं, मैं वो
- 59:49तत्व हूँ। जिसके संकल्प से दुनिया प्रकट
- 1:00:00होती है और जिसके संकल्प से दुनिया बनिष्ट होती है।
- 1:00:10ये सब मेरे अधीन है। वाक्य।
- 1:00:22शंकराचार्य विवाद कर रहे थे, मंडल मिथरा हार गए।
- 1:00:29उभय भारती बोली अभी अर्धांगणी बाकी अभी आधा अंग हारा है शंकर।
- 1:00:40मेरे से सम बात करो और संवाद करने में उलझ गए, उलझ गए क्योंकि
- 1:00:54प्रश्न ही ऐसा कुछ किया था, वो जानती थी वो भारती जानती थी।
- 1:01:03कि काम शास्त्र का कोई प्रश्न पूछ लो या उलझ जाएगा।
- 1:01:09या तो पोल खुलेगी। इसकी अगर जवाब देगा तो अगर मौन हो
- 1:01:16जाएगा तो फिर ये हार जाएगा। लेकिन शंकर ने बिल्कुल तीसरा
- 1:01:23रस्ता चुना। ब्रह्मचारी थे, अखंड ब्रह्मचारी
- 1:01:28थे। वो कहते थे देवी मुझे छः महीने का
- 1:01:35वक्त मिलेगा और भारतीय के तथ्य। सोचा कि ब्रह्मचर्य तो खंडित
- 1:01:45करेगा ना? अब बात काम की है।
- 1:01:51जान से सुन ले थोड़ी गहरी आ गई। शंकर घर आ गए।
- 1:01:59उन्हीं दिनों में अमरुक नाम का एक राजा उसकी मृत्यु हो गया।
- 1:02:06कुछ ज्यादा उम्र का न हो, कुछ 56 साल की उम्र में देहांत हो गया
- 1:02:15उसका। 56 साल की उम्र कोई इतनी ज्यादा
- 1:02:22भी नहीं होती है अमरुक तो शंकराचार्य ने कहा यह मौका है,
- 1:02:34बात उड़ गई, पास ही नवास था, ज्यादा दूर न था।
- 1:02:41शंकराचार्य तक खबर पहुंची। उसने जल्दी से सारा अंदाजामात
- 1:02:46किया। प्रक्रिया तो पहले ही मैंने ली थी
- 1:02:52कि कोई भी हो, कोई गरीब मरे, कोई अमीर मरे, कोई मरे मैंने शरीर
- 1:02:57छोड़ के। और मैंने अनुभव करना है क्योंकि
- 1:03:02मैं सारी बातों का जवाब अनुभव से देता हूँ तो उदय भारती ने सवाल
- 1:03:10पूछा, काम वासना का अनुभव करूँगा और जवाब दूंगा, झूठा नहीं दूंगा।
- 1:03:19यहाँ तो सब झूठ फैलाया जाता है। राजनीतिकों से लेकर धर्मात्माओं
- 1:03:25तक जो देखा नहीं, उसका वखान करें और कहते हैं ही कैनट बी
- 1:03:34एक्सपिरेंट अजूबा। वो तो ये भी को पिया नहीं जा
- 1:03:44सकता। वह व्याख्यात भी नहीं किया जा
- 1:03:48सकता तो फिर क्या किया जा सकता? वह झपवा जा सकता है।
- 1:03:54बिलकुल मिट्टी प्रीत कर दी इन्होंने इनाम पे।
- 1:04:01शंकर को पता चला कि अमरू नाम का राजा मर गया।
- 1:04:07अब बात थोड़ी सी गहरी है। ध्यान से सुनो, आपको प्रत्येक
- 1:04:15प्रश्नकर्ता का धन्यवाद भी होना चाहिए।
- 1:04:17को नई नई गुत्थियां सुलझाने में उसका ही योगदान है।
- 1:04:23अनीता मैं तो एम जस्ट साइलेंट लेक मैं कहाँ बोलता हूँ तुमने डिक्री
- 1:04:32मारी, तरंग उठी। पर वो तरंग जवाब थी आपका?
- 1:04:40लेकिन अगर तुम ठीकरे ना मारते तो तरंगे ना उठते तो इस व्यक्ति का
- 1:04:47धन्यवाद होना चाहिए। जो व्यक्ति परतों को खोल देता है,
- 1:04:52बहुत से प्रश्न अनुशास्त्र रह जाएंगे।
- 1:04:56इसलिए नहीं कि मैं नहीं जानता, नहीं इसलिए कि तुमने पूछा, नहीं
- 1:05:06तो झट से अपना सिर छूटा। उसके शरीर में प्रवेश करके अब यह
- 1:05:10बात समझा। हमारे इस अखंड, हर के भीतर न भी
- 1:05:20क्षेत्र के पास सिल्वर कॉर्ड से हमारे चेतना का वो अंश जो शुरू
- 1:05:28फ्रम दी वेरी बिगिनिंग मैंने समझाया कि छोटी चेतना के रूप में
- 1:05:32चलता है। सिल्वर कॉर्ड के साथ बंदा होता
- 1:05:42है। ये सारा सेट और सिल्वर कॉर्ड पावर
- 1:05:47लेता है। उस चेतना के छोटे बिंदु से अब ये
- 1:05:53बात समझने में नहीं आएगी, लेकिन आप इसे थोड़ा ख्याल में रख लेना।
- 1:05:59शायद कभी गुत्थी खुल जाए। तुम ये पूछ सकते हो कि अगर वो
- 1:06:04जर्रे जर्रे में विद्यमान है तो इस अलग से चेतना की आवश्यकता क्या
- 1:06:10पड़ गई कीमती सवाल है, लेकिन इसका मैं जवाब अभी दे ना पाऊंगा।
- 1:06:17अभी वो वक्त आया नहीं कभी आएगा तो बताऊँगा इसको।
- 1:06:22लेकिन सवाल मैंने ही उठाये हैं। ये ध्यान में रख लो तो शंकर ने
- 1:06:28शरीर को छोड़ा राजा के शरीर में प्रवेश करके राजा के शरीर में
- 1:06:34प्रवेश क्यों करके क्योंकि राजा। जब चेतना को देही को बाहर लेके
- 1:06:41जाता है तो अपनी सिल्वर कोड का कनेक्शन काट जाता है।
- 1:06:52सिल्वर कोड वहाँ पड़ी रह जाती। शंकर जब जाते हैं उसे सिल्वर कोट
- 1:07:02से अपना फूसे जोक लेते हैं। सरी चल पड़ा क्योंकि उनकी देही के
- 1:07:14भीतर तो करेंट है ही, वो तो जुड़े ही हुए।
- 1:07:22उनका देह ही जो छोड़ के आया जीस शरीर को उसकी चेतना से उनकी
- 1:07:28सिल्वर कार्ड अभी भी जुड़ी हुई है, लेकिन ढांचा बदल लिया है।
- 1:07:36थोड़ा प्रश्न गहरा है, आराम से समझिएगा।
- 1:07:38बार बार रिपीट करके ये जो लोग कहते हैं कि मेरे भीतर देवी आ गई,
- 1:07:47देवता आ गया, हनुमान आ गया, सब गप्पा बोलते हैं, झूठ हैं ये जो
- 1:07:53कहते हैं कि दादी माँ के भीतर। ये बाबा जी आते हैं, जूठे हैं,
- 1:07:58पाखंडी हैं, दुष्ट हैं, लोभी हैं, लालची हैं, अपनी संख्या को बढ़ाना
- 1:08:06चाहते हैं और इनकी कोई इच्छा नहीं और संख्या को बढ़ाकर आनंद नहीं
- 1:08:11पाया जा सकता। खैर, इस सब्जेक्ट को ज्यादा।
- 1:08:20शंकर ईस्ट शरीर को देही को बाहर निकालते हैं जैसे एस्ट्रल
- 1:08:26ट्रैवलिंग में मैं अपनी देही को बाहर ले जाता था।
- 1:08:35सिल्वर कॉर्ड के साथ मैं बंधा रहता था, लेकिन मेरी चेतना भीतर
- 1:08:40रहती थी और उस चेतना का करंट देही के साथ लगा रहता था।
- 1:08:46सिल्वर कॉर्ड के द्वारा यह सिल्वर कॉर्ड एक फ्यूज है।
- 1:08:53यह फ्यूज वो छोड़ गया राजा अमरूक और इस वृत्ति को जानते हैं।
- 1:09:02शंकराचार्य शंकराचार्य ने जाकर अपने देही के फ्यूज को अपने साथ
- 1:09:09चोट लिया। राजा पुनः ये बताओ क्या ये बात
- 1:09:15सेंटीफिकली भी है? जो बिजली का काम करते हैं वो
- 1:09:19अच्छी तरह से जानते होंगे। के शूज को तोड़ के चला गया वह
- 1:09:32शंकराचार्य ने अपनी सिल्वर कॉर्ड का।
- 1:09:36कनेक्शन उसकी सिल्वर कॉर्ड से लगा दिया और शंकर की सिल्वर कॉर्ड का
- 1:09:47चेतना के साथ संबंध पहले से ही था।
- 1:09:51वह करंट। जो शंकर के असली शरीर से सिल्वर
- 1:09:57कॉर्ड के द्वारा दौड़ रहा है, वह राजा के शरीर में फैल गया क्योंकि
- 1:10:05उसने अपनी सिल्वर कॉर्ड का फ्यूज उसकी सिल्वर कॉर्ड से जोड़ दिया
- 1:10:10जो वह। छोड़ के गया था।
- 1:10:13राजा अमरुक शायद तुम समझ गए होंगे, मैंने इतनी सरलता से आपको
- 1:10:18समझा दिया तो राजा तो उठ गया लेकिन बोरा जी नहीं थे पर राजा
- 1:10:26नहीं थे। एक बात और भी जान में रखना।
- 1:10:30ये जो दादियों में ये दादों में ये जो दांदा आते हैं, शेव आते
- 1:10:36हैं, ये सब पाखंड है, कोरा प्रखंड है, ये तो मुरली को भी अक्षरों
- 1:10:41में डाल देते हैं। अरे मुरली तो धुन है एक।
- 1:10:51मधुवन में राधिका नाच रे मधुवन में राधिका नाच रे।
- 1:11:08गिरधर की मुरली या बाजे रे, गिरधर की मोरलिया बाजे मधुवन मेरा धिका।
- 1:11:26ना जेरे गिरधर की मुरलिया बाजेरे, मुरलिया बजती है, मुरलिया में
- 1:11:36शब्द नहीं होता, दोनों होती है। ये तो सुबह सुबह मुरली सुनाते हैं
- 1:11:41और लोग लिखते हैं बड़े चाव से लोगों ने ग्रंथ बना लिए हैं।
- 1:11:45इसलिए मैं कहता हूँ, पागलों का इतना जमावड़ा इकट्ठा हो गया है।
- 1:11:50ये पागलों के ग्रंथों को तुम पढ़ के महा पागल हो जाओगे तुम महा
- 1:11:55मानव तो नहीं हो सकते महा पागल तुम हो जाओगे।
- 1:12:00आज सारे धर्मों का ऐसा ही हाल है। किसमें थोड़ा प्रखंड कम है,
- 1:12:08किसमें थोड़ा पाखंड जाता है? धर्म कभी भी भीड़ का विषय नहीं
- 1:12:13होता। धर्म व्यक्तिगत मामला है, कभी
- 1:12:17भीड़ नहीं पहुंचते। उस तत्व तक जो पहुंचा वह अकेला
- 1:12:23पहुंचा। एक होकर पहुंचा, इसीलिए महावीर ने
- 1:12:28उसे नाम दिया कैवल्य केवल हो जाना, एक हो जाना भीड़ कभी नहीं
- 1:12:34पहुंचती इसीलिए जब मैं आया बोलने के लिए बाबा ने मुझे कहा कमी मत
- 1:12:41बनाना। उस वक्त मैं बात नहीं समझा लेकिन
- 1:12:47धीरे धीरे समझ में आ गई भेड़ कभी पहुंचे ही नहीं।
- 1:12:51सॉरी चुट लेट मी लिव अनसीन अननोन एंड उनलेमेंटेड लेट मी डार्क
- 1:12:58स्टील फ्रॉम दी बर्ड एंड नट स्टोन टेल व्हेर आई लार्ज।
- 1:13:05अकेला पहुँचता है व्यक्ति निरवलंब हो के जब तुम्हारा कोई सहारा नहीं
- 1:13:11रहता, तुम एक अकेले रह जाते हो तब पहुंचते हो भीड़ कभी नहीं पहुंचते
- 1:13:17भीड़ तो तुम्हारा सहारा है। और तुमने सारे सहारे खत्म कर देने
- 1:13:21हैं। जब तुम भीतर जाओ तो तो कनेक्शन
- 1:13:30जोड़ लिया अमरूक उठ गए महल के दरबारी कामगार, रानियों, पुत्र
- 1:13:40पोतरा भी बहुत प्रसन्न हुए। जश्न माने।
- 1:13:45शोमृत बिखरे। लेकिन वो राजा नहीं था और शंकर
- 1:13:58शंकर ने इस शरीर को मद्धम बना के राजा के।
- 1:14:03सारे अनुभव किए काम वासना के स्वादिष्ट पदार्थ खाने के सभी
- 1:14:10भोगों को राजसी भोगों को भोगने का उसने पूर्ण अनुभव लिया।
- 1:14:16लेकिन ध्यान रखना भोगती इंद्रिय है तुम सिर्फ देखते हो।
- 1:14:23इसलिए मैं तुम्हें कहता हूँ राजा बन जाओ या कंगाल बन जाओ।
- 1:14:29कंगाली भी इंद्रियां भुगती हैं और राजसी वस्त्र भी इंद्रियां भोगती
- 1:14:36हैं। ये शरीर पहनता है कफन पहन ले।
- 1:14:41चाहे राजा की वो शाख पहन ले, पहनने का शरीर तुम नहीं पहनोगे,
- 1:14:52सारे भौंक हो गए और एक थोड़ी सी बात और बता दूँ, आपके लिए बड़ी
- 1:14:57काम थी अगर कोई योगी व्यक्ति। बस उदय आदित्यनाथ योगिनी वो तो
- 1:15:04गुंडा है एक नंबर का, जो बच्चों की चुटिया पड़ सकता है, जो एक संत
- 1:15:14व्यक्ति पर नाजायज अपराध धारा लगा के।
- 1:15:21उसके ऊपर ऐफ़ आई आर लॉज करा सकता है।
- 1:15:27उसमें बल तो है लेकिन बल दूसरों का है।
- 1:15:34मैं तुम्हें कहता हूँ, कायरो बल कमाओ, अपना कमाओ।
- 1:15:41दूसरों के हाथों से हाथों को काटकर बल कमाया भी तो क्या कमाया?
- 1:15:49इसलिए तुम कायरकार जीते हो और कायरकार मर जाते हो।
- 1:15:56उस काल में छह महीने के शंकराचार्य के उस काल में
- 1:16:00मनेजमेंट इतनी जबरदस्ती शायद तुम्हें यह सारा एक प्रेम काव्य
- 1:16:08लिखा गया है। अमरू शतम अब मैंने पढ़ा है लेकिन
- 1:16:13उसमें थोड़ा सा विवरण आता है, ज्यादा नहीं।
- 1:16:17जब राजा गद्दी पर बैठेगा सच में अगर वह योगी है भीतर से अब किसी
- 1:16:28को तो पता नहीं क्योंकि बाहर से यह नकाब रह जाता है।
- 1:16:33भीतर से वह आत्मयोगी की है तो वह ऐसा शानदार मनेजमेंट करेगा।
- 1:16:43कहते अमरूक का वो छह महीने का काल ऐसा शानदार था प्रजा के लिए।
- 1:16:53कि प्रजा जिधर से अमरु के निकल जाती यानी शंकराचार्य बिछ जाती और
- 1:17:02वो कहती राजा जी अभी ना जाओ छोड़कर।
- 1:17:13ये दिल अभी भरा नहीं अभी ना जाओ छोड़ कर ये दिल अभी भरा नहीं।
- 1:17:31सारी जनता कहती, प्रभु अब मत छोड़ जाना कहीं तब छोड़ गए थे, रोए तो
- 1:17:39हम तब भी बहुत, लेकिन अपने छह महीने के भीतर मनेजमेंट को इतना
- 1:17:46शानदार बना दिया जब योगी जब जब योगी बैठेगा सिंघ।
- 1:17:54तब तक बाहर तब तब बाहर की क्रांति घटित होगी।
- 1:17:59इतना सौंदर्य बिखरेगा वो क्यों? क्योंकि उसमें कुछ भी नहीं है,
- 1:18:04नवासना है। ना विचार है ना ही जीने की
- 1:18:14अभिलाषा है। ये तीनों चीजें अमर है।
- 1:18:19मैंने प्रथम वाक्य आपको कहा वासनो को मिटा दो काम क्रोध, लोह, मो।
- 1:18:26अहंकार, मधु मत्सर भ। इससे आगे जब तुम इनको मिटा दोगे
- 1:18:32तो इन्द्रियां तुम्हारी गुलाम है, फिर आएगा मन विचार करेगा।
- 1:18:38यह भी एक जंजाल है। बादल यह तंग करेगा।
- 1:18:43फिर विचारों को भी आप साक्षी बनकर खत्म कर दो, देखते रहो बादलों की
- 1:18:47तरह। फिर विचार भी उठ जाएंगे।
- 1:18:51उसके बजा उसके बाद एक चीज़ बचेगी, क्या बचेगी वो बचेगी तुम्हारी
- 1:18:57जीने की इच्छा जीवेशणा? धीरे धीरे धीरे धीरे जैसे जैसे
- 1:19:06तुम अपने अंत में जाओगे, उस रस को पीओगे जो आनन्दनाथ के रूप में
- 1:19:12गुंजारित होता है तो 1 दिन तुम लबालब समृद्धि से भर जाओगे।
- 1:19:23जो कहा नहीं जाता, जो सोना नहीं जाता, जो मात्र पिया जाता है, जो
- 1:19:29जप नहीं जाता, जपने की भूल मत करना, इन दुष्टों के ना जाने।
- 1:19:36किस अभागी क्षण में इस जप रूपी राक्षस का निर्माण किया था?
- 1:19:45आज तो कोई भी संस्था जप के बिना संस्था होती नहीं हो।
- 1:19:50कच्ची तुम तुम किसको चाहते हो? मैंने कहा किसको ध्यान होता है
- 1:20:01मैं अपने में सिद्ध होता हूँ, ध्यान देना किसको है?
- 1:20:06दूजा कोई है ही नहीं, उसे उस तल पर पहुंचना है जहाँ पर शिवो हम
- 1:20:14शिवो हम। शिवो हम शिव अमर आत्मा सच्चिदानंद
- 1:20:30शिवो हम शिवो हम। शिव?