Latest / Baba ji Vijay Vats / 9 Jul 25 - मन दौड़ता है और इसकी दौड़ के कारण सारी दुनिया दुखी है! आखिर मन दौड़ता क्यों है? Must Listen!
Transcript
- 0:06जगदीप राठौर बाबा जी प्रणब मन दौड़ता है।
- 0:21और इसकी दौड़ के कारण सारी दुनिया दुखी है।
- 0:28लेकिन बाबा मन दौड़ता क्यों है? मन दुखी है।
- 0:39इसलिए दौड़ता है तुमने कहा पुत्र मन दौड़ता है और उसके कारण सभी
- 0:58संसार दुखी है तो आखिर ये मन दौड़ता क्यों है?
- 1:06गहरा प्रश्न और जब से मैंने रहस्य की विवेचना करनी शुरू कर दी आपके।
- 1:18प्रश्न भी ज्यादा गूढ़ आने शुरू हो।
- 1:22जड़ तक मार करने लगे। आपके प्रश्न आने भी चाहिए यही मैं
- 1:29रोज़ कहते हूँ, जीतने गोण से गोण गहरे से गहरे प्रश्न तुम कर सको
- 1:41उतने मेरे बैठे बैठे कर? मैं हल कर जाऊंगा, लेकिन मैं
- 1:52देखता हूँ चारों तरफ अंधियारा, भविष्य की बात छोड़ो आज ही है
- 2:00अंधियारा, आज ही पूछ लो। भविष्य में तुम्हारी संतति के काम
- 2:09आए। मन दौड़ता क्यों है?
- 2:18बड़ा बेसिक प्रश्न है, जड़ से जुड़ा हुआ प्रश्न भूख क्यों लगती
- 2:30है? तुम्हारे प्रश्न का कन्डेस्ट जवाब
- 2:39भूख क्यों लगती है? पुत्र पेट खाली हो गया है भीतर के
- 2:48एंजाइम को भीतर के जुइसेस को एसिड्स को बचाने के लिए कुछ
- 2:53बचाने। पेट मांगता है कुछ खाने को तो
- 3:01अन्यथा इस तेजाब से इन रासायनिक तत्वों से पेट के भीतर की त्वचा
- 3:09गल जाएगी। किंतु मर जाएंगे मुझे कुछ खाने को
- 3:15दो इसे भी भूख कहते हैं। भूख का अभाव है, मन दौड़ता है मन
- 3:27के भीतर भी कोई अभाव। भूख लगती है, भोजन दो मन तोड़ता
- 3:39है शांति दो। खुशी दो, आनंद दो।
- 3:51इसलिए मन दौड़ता। है और दौड़ता ही रहेगा, जब तक तुम
- 4:01अल्टिमेटली अल्टीमेट पीस को नहीं भरते हो।
- 4:09गहरे से गहरा सागर की तलहटी में छुपा हुआ रहस्य आनंद जब तक तुम
- 4:18पाना सकोगे तब तक यह दौड़ता ही रहेगा।
- 4:24तो क्या करें दो उपाय? इस दौड़ का सदुपयोग कर लो, हैरान
- 4:34मत होने, मन की दौड़ का सदुपयोग कर लो।
- 4:44मन की दौड़ का सदुपयोग। क्यों?
- 4:49हाँ मन दौड़ता है तो इसका उपयोग कर लो संसार की पदार्थों को कमाने
- 4:58के लिए? क्योंकि मन को चाहिए कुछ ऐसा
- 5:06जिससे वह शांत हो जाए। उसकी उह पोह मिटे उसकी भटकन कम हो
- 5:19तो मन की इस दौड़ को उपयोग। में ले आओ।
- 5:26धन कमा लो, पदवी कमा लो, नाम कमा लो, बड़े से महल चौबारे बना लो।
- 5:41अच्छी चमचमाती कार ले आओ विवाह शादी कर लो बच्चे पैदा कर लो मन
- 5:54दौड़ता है मन की इस दौड़ का उपयोग करना।
- 6:05यह सांसारिक कार्यों में उपयोग है मन का और जब तुम धन कमालों के
- 6:13पदार्थ इकट्ठे कर लोगे, घर भरलो के पदार्थों से।
- 6:23ख्याति पालोगे विश्व प्रसिद्ध हो जाएंगे।
- 6:30सब कुछ पालोगे जो पानी योग्य संसार में है, फिर तुम्हारी
- 6:41खुलेगी आँखें। क्योंकि मन फिर भी भागेगा
- 6:53तुम्हारी ये भाग दौड़ के पदार्थ ये डिग्रीज़ तुम्हारा मंत्री गण
- 7:07होना। मुख्यमंत्री होना, प्रधानमंत्री
- 7:10होना, विश्व के सर्वश्रेष्ठ एथलेटिक्स होना।
- 7:20मैं तुम्हारे मन को संतुष्ट नहीं कर पायेगा तो मन के दौड़ का पहले
- 7:26तो इस्तेमाल करो। सांसारिक कामों सांसारिक कामों से
- 7:37तुम। उपजाओ मन की दौड़ से जो भी
- 7:42तुम्हें मिले और तुम्हें सुविधा तो दे।
- 7:49आराम। से गद्दे खींच लाओ।
- 7:51एयर कंडीशनर लगा लो जो तुम खाना चाहते हो वो खा लो पी लो मोज़
- 7:59उड़ा लो, यही चार वक्त कहते हैं ऋण कृतवा अगर तुम।
- 8:08जदा जीवित सुखी जीवित अकमल की बात ये हैं।
- 8:15चारबाक ने बात। ऐसे कह दी सहजमती से जदा जीवित,
- 8:21सुखी जीवित जैसे सुखी हो न तुम्हारे वश में।
- 8:28इसलिए मैं चरवा को मूर्ख कहता हूँ, सुखी हो न तुम्हारे बस में
- 8:35कहाँ है सुविधापूर्ण हो न तुम्हारे बस में है सुविधाएं तुम
- 8:44जुटा सकते हो पदार्थों के। इकट्ठे करने से लेकिन उन सुविधाओं
- 8:51को इकट्ठा करके सुख भी मिलेगा। इसका तुम्हें ज़रा भी पता नहीं है
- 9:02तो एक ढंग से चार वाक जो कहते हैं यदा जीवित सुख जी।
- 9:11यह कल्पना मात्र है। क्योंकि सुखी होना किसी व्यक्ति
- 9:16के वश की बात नहीं होती। अगर किसी व्यक्ति के वश की बात
- 9:22सुखी होना होता तो वह सुख होने के लिए प्रयास न कर।
- 9:32सुखी होना तुम्हारे वश में है नहीं तो तुम पदार्थों को ढूंढ़ते
- 9:39हो, इकट्ठा करते हो, शायद इसमें मिल जाए।
- 9:44मान सम्मान को श्रेय। जब तुमने किया नहीं, उसका शरीर
- 9:48लेते हो। हाँ मैंने किया था तो उससे लोग
- 9:52मैंने देखे है। जब कोई अच्छा काम हो जाता है,
- 9:57चुपके से कह देते है कि मैंने किया था।
- 10:03जो बड़े लोग होते है वो झंडी उठा रहे है।
- 10:07मैंने किया क्षणिक सुकून मिलता है, क्षणिक सुकून मिलता है, बस
- 10:24चार बाकी यही कहते हैं क्षणिक सुकून ले लो।
- 10:32चारवाक को अखंड सुकून का कुछ पता है।
- 10:38इसलिए क्षणिक सुकूनो की आपको तरकीब भी बताते।
- 10:44हैं। कर्ज उठा लो गिबी लो 1 दिन कर्ज
- 10:56देने वाला मर जाएगा और कर्ज लेने वाला भी मर जाएगा।
- 11:06अस्मबुतस देहस्य पुनर आगमनम कुतहा।
- 11:10दोनों की देह समाप्त हो जाएगी। और फिर आना जाना होता नहीं,
- 11:18बिलकुल जो दिखता है वही सत्य है, जो नहीं दिखता वह असत्य है।
- 11:27इस धारणा के ऊपर टिक्की है सारे चार।
- 11:36उसे लोग पूछ लेते हैं आपने परमात्मा को देखा?
- 11:43मैंने कहा वो देखा जा नहीं सकता। अगर देखा नहीं जा सकता तो तुम
- 11:52कैसे कह सकते हो कि परमात्मा है? हाँ तो पुत्र बहुत सी चीजें हैं
- 11:59जो देखी नहीं जाती लेकिन होती हैं मैं तुम्हारी छूट की।
- 12:06मैंने छूट की वरली दर्द हुआ। चिल्लाता हाथ उठाने को था, मैंने
- 12:15हाथ पकड़ लिया, मैंने कहा क्या हुआ, कैसे दर्द हुआ, दिखाओ, इस
- 12:24दर्द को बाहर निकाल के मुझे आँखों से दिखाओ।
- 12:29बाबा ये दिखता नहीं, दर्द दिखता नहीं, मैंने कहा परमात्मा कैसे
- 12:35दिखता? छोटी सी चीज़ दर्द नहीं दिखता,
- 12:41वृहद परमात्मा को देखने का यत्न करते हो।
- 12:51यही यत्न तो करते हैं तथा कथित आध्यात्मिक तथा कथित आस्तिक नाम
- 13:02जप लो प्राणायाम कर लो आसन कर लो। ये कर लो वो कर लो उस वृहद को
- 13:22बांधने की चेष्टा। मिल भी पाएगा।
- 13:34ये तो सत्य है कि प्रत्येक व्यक्ति का मन भटकता है लेकिन
- 13:45भटकता क्यों है? जैसे भूख लगती है, भूख क्यों लगती
- 13:50है? भूख लगती है कि खाने को दूँ, मन
- 13:58भटकता है कि कुछ दो से मैं भटकना छोड़ दूँ, ठहर जाऊं।
- 14:06किसी नज़र को तेरा इंतजार।
- 14:25इंतजार आज भी है कहाँ के ये दिल बेकरार आज भी है किसी नजर?
- 14:45को तेरा इंतजार आज भी है। आज भी इंतजार कर रहे हो तुम कहाँ
- 15:03हो तुम के जो दिल बेकरार आज भी है।
- 15:11पहले तो ये भ्रम निकालना चाहिए कि कहीं और से मुझे मिल जाएगा, ये
- 15:23भ्रम तुम्हारा निकलना चाहिए। और भ्रम निकालने के लिए इस मन की
- 15:30भागदौड़ का सदुपयोग कर रहा। हूँ।
- 15:35इस भागदौड़ को धन कमाने में लगा दो, इज्जत कमाने में लगा दो
- 15:43गद्दियाँ कमाने में लगा। दो।
- 15:47डिग्रीज़ कमाने में लगा दो बड़ी कुर्सियां पाने में लगा दो लोग
- 15:51वाह वाह ही करण किस्में लगा दो, बड़े से बड़ा कमीन बना लो।
- 16:06मन जहाँ जाना चाहता है जाओ मैं नहीं रोकता मन कहता है ठेके पे
- 16:18जाऊंगा, शराब पियो, फिर मन कहता वैशयाल में जाऊंगा।
- 16:25जाओ बस तुम्हारा भ्रम निकलना अच्छा जीस दिन कहीं भी जाकर जहाँ
- 16:40तुम्हारा मन करता है। तुम बेकरार ही रहे और तुम्हें
- 16:47उसका इंतजार ही रहा। किसी नजर को तेरा इंतजार आज भी है
- 16:56कहाँ को तुमके मेरा दल बेकरार आज भी है।
- 17:03आज भी है हजारों जन्म पहले भी था। याने हज़ारों जन्म तुमने जाया कर
- 17:15दिए, अकारण जाया कर दिया, मन भटकता क्यूँ है?
- 17:23जैसे पेट भटकता है खाने के लिए। खाने की कमी हो गई है।
- 17:29पेट भटकता है, आनंद की कमी हो गई है मन।
- 17:36भटकता है फिर खाने के नाम पे तुम कुछ भी खा लो।
- 17:47माटी फांक लूँ। एक बार की तुम्हारी भूख शांत हो
- 17:54जाएगी, लेकिन वो माटी तुम्हे कलोरी न दे।
- 17:58सकेगी। तुम भूखे के भूखे रह जाओगे।
- 18:09मन को जो चाहिए वो नहीं मिलता। इसलिए मन दौड़ ही चला जाता है।
- 18:21दौड़ता क्यों है उसे आनंद के लिए दौड़ता है।
- 18:25और तुम पहले यह भ्रम निकाल लेना। कि फला सुखी है फला सुखी है गणपति
- 18:33सुखी है राजा सुखी है यह जमींदार सुखी है यह सूजखोर सुखी।
- 18:46यह भ्रम निकाल। जैसे ही भ्रम निकला एक घटना
- 18:56घटेगी। सारा संसार दौड़ रहा था और तुम उस
- 19:03दौड़ में सुमार थे मैराथन में। मैराथन की दौड़ से तुम बाहर हो
- 19:09जाओगे, बस यही वो मुकाम है तुम्हारे मन ने तोहफा कर ली
- 19:19तुम्हारे मन ने हार मान ली और मन हार मान जाए।
- 19:30नहीं मिला इन पर पंचों में, धन में, पदार्थों में, सुखसाधनों में
- 19:42तुम्हारे सारे नृत्य क्रमों में वह नहीं मिला।
- 19:49धर्म भी एक तो है तुम चित्र लगा लेते हो, उसकी पूजा करते हो, शोट
- 19:58से चारो पूजन करते हो, उसी का दिया हुआ उसे भेंट करते हो।
- 20:08इसे मैं पागलपन कहता हूँ जो नारियल तुम्हें भेंट चढ़ाया और
- 20:15तुम्हारे पास कहाँ से आया? जो प्रसाद तुमने भोग लगाया
- 20:21तुम्हारे पास कहाँ से आया, उसी का तो दिया था।
- 20:29तुम ना समझोगे ये बात कभी और इसलिए रूपांतरण नहीं हो पाएगा कभी
- 20:38रूपांतरण का मतलब? तुम दुख से बाहर नहीं आओगे।
- 20:45तुम्हारी यात्रा दुख से आनंद की यात्रा नहीं बनेगी।
- 20:50रूपांतरण का अर्थ होता है तुम दुख से कैसे आनंद की दिशा में बढ़ जाओ
- 20:59और तुम्हारे कदम उलट दिशा में चलने लगे जो आज।
- 21:04जीस तरफ कदम है तुम्हारे उससे बिलकुल विपरीत अवस्था में तुम चल
- 21:17मन में अभाव है किसी चीज़ का अभाव।
- 21:19है। इसलिए मन को इंतजार है उसे लम्हे
- 21:25ने कहा। जैसे प्रेसी या प्रेमी को प्रेमी
- 21:34या प्रेसी का इंतजार रहता है। सुख मिलेगा जब प्रेमी या प्रेसी
- 21:43आए। सुखु मिलता भी है, लेकिन सुखु
- 21:51होता है, थोड़ी देर कटता है। यह सृष्टि भी तो परमात्मा ने बनाई
- 21:58किसी शैतान की रचना? सृष्टि भी उसकी रचना है।
- 22:09किसी दूसरे ने क्रियेट नहीं किया है, यह भी मजेदार है, अन्यथा
- 22:16बनाता क्या? सृष्टि में रस आएगा, छोटे छोटे रस
- 22:30के चम्मच मिलेंगे। स्पून्स समुद्र ना मिलेगा, तैलाब
- 22:36ना मिलेगा, सरोवर ना मिलेगा सपुंज मिलेंगे बस यही सुपुन्स तुम्हें।
- 22:44एक बार की ठहरा देंगे तुम्हारे मन को जो बचपन से तुम लगे थे बड़ी
- 22:57कक्षाएं पास कर। लो बैचलर डिग्री ले लो मास्टर
- 23:02डिग्री ले लो। डॉक्टर कुसुम हो गए।
- 23:10खोपड़ी भर गई सूचनाओं। से लेकिन कुछ पाया एकांत में
- 23:18बैठकर कभी सोचना आज तुम दुनिया को सीखा सकते हो।
- 23:26लेकिन कभी खुद अपने भीतर ज्यादी मार के देखे कि दुनिया को सिखाने
- 23:33वाले तू आचार्य हो या सर या कोई भी कलाकार?
- 23:42ये कलाकारों की श्रेणी मुझसे भी आ जाती है।
- 23:48क्या तुम्हें भी सुकून मिला? ये जो तुमने इकट्ठा किया उससे तुम
- 23:59सर बन गए, तुम अचार बन गए? कुछ सीख लिया, इधर से उधर से उधर
- 24:06से उधर से इकट्ठा कर लिया और तुम लोगों को बांटने लगे।
- 24:17क्या ये सिर्फ? शरीर के निर्वाण का डंगडी।
- 24:25वास्तु की जो आग लगी थी वास्तु की जो भूख लगी थी जन्मो जन्मो से,
- 24:31क्या वो मिटी उसका एक अंश भी मिट और ध्यान रखना, वो जब मिटती है तो
- 24:38एक अंश भी मिटता उसको। वो भूख पूरी की पूरी उठती है।
- 24:55सभी तुम्हारे खिलौने साबित हुए है, सभी तुम्हारी कल्पनाएं स्वपन
- 25:01साबित हो। खिलौना 1 दिन टूट जाता है, सदा
- 25:06नहीं रहता कहाँ है तुम्हारे बचपन के वो खिलौने किने तुमने छाती से
- 25:13लगा दिया था। आज वो कहाँ है?
- 25:18पर आज सिक्के तुमने छाती से लगा दिए सोने के चांदी के डॉलर,
- 25:22रुपया, जमीन जायदाद की रजिस्ट्रेशन तुमने छाती से लगा
- 25:29लेकिन 1 दिन धड़म से घर जाओगे कहाँ जाएंगे?
- 25:39परमात्मा की प्रकृति तुम्हें हर पर राह दिखाती है, मार्गदर्शन
- 25:48करती है। तुमने क्यों आज तक जोड़ा?
- 25:53क्या उससे वो तत्व मिल पाए जिसे रस कहते हैं?
- 25:56उपनिषद यज्ञ भी उपनिषद तुमने बहुत पढ़े होंगे।
- 26:07लेकिन उपनिषद में शब्द रसो वैसा वह रस है।
- 26:16ईमानदारी से कभी बैठ जाना अपने घर में कोई देखता नहीं अपने भीतर
- 26:21उतरना देखना क्या बुरा मैंने पिया जीसको पीकर सरे।
- 26:30आम कबीर। गाते हैं हंसा पायो मानसरोवर ताज
- 26:42तलैया क्यों ढूंढ रहे हो? मन मस्त हुआ फिर क्यों बोले तुम
- 26:51कभी देखना कहीं ये तुम्हारी सूचनाएं?
- 26:56तुम्हारे धन के अंबार, तुम्हारी डिग्रीज़ का अंबार, तुम्हारी
- 27:02पद्मियों के अंबार, तुम्हें भारत रत्न मिल गया, तुम्हें पद्मश्री
- 27:07मिल गया, पद्म विभूषण मिल गया। इन लोगों ने तुम्हें सम्मान दिया,
- 27:15सही पूछो तो मुड़ों ने मुड़ों को सम्मान दिया।
- 27:20सच्चा आदमी इन पचड़ों में पड़ता है।
- 27:25वो जानता है इनमें रस नहीं है। एकक्षणिक तसल्ली है, सटिस्फैक्शन
- 27:35मैं हैज ए सटिस्फैक्शन मिर सटिस्फैक्शन और सटिस्फैक्शन
- 27:43तृप्ति नहीं होती यह। समझना।
- 27:46आप, आप? सटिस्फैक्शन को तसल्ली समझ लेते
- 27:49हो। तुम्हारा कोई प्रिय मर जाता है और
- 28:00कोई दूसरा पड़ोस का या गांव का कहता है तुम रो मत तुम चलाओ मत।
- 28:10मेरा भी ऐसे ही मर गया था। तुम्हे तसल्ली मिलती?
- 28:17है। हाँ, मेरा हमदर्द कोई है जो दर्द
- 28:22मैंने चखा वो इसने भी चखा ये मेरा हमदर्द है जो दर्द मैंने चखा।
- 28:31वही धरती स्नेचर। वह तसल्ली है, तृप्ति तृप्ति देते
- 28:41हैं, कृष्ण कृष्ण कहते हैं, फौके लब्बाजों से शब्दों से, कागज की
- 28:53नावों से। बाबू सागर पार नहीं हुआ करते,
- 29:01कागज के बेमानों से परदेश गमन नहीं हुआ करता और तुम्हारे संसार
- 29:09के जीतने भी द्रव्य हैं। अब तुम कमा लो, कमा के देख लो।
- 29:16मैं कहा करता हूँ कहा मेरे पास सांप है, बिच्छू है, काट जाए दवा
- 29:22लगा लेना तसल्ली नहीं तो सांप भी है, बिच्छू भी है कटवा के तो ज़रा
- 29:30भी तुम्हारे मन में संदेह नहीं रहना चाहिए।
- 29:38मन की दौड़ का उपयोग कर। लो।
- 29:43अगर यह थमता नहीं, संत संगीत में जाने को तैयार नहीं संसार से परे
- 29:52की लफ्जों को सुनने का ज़रा भी इच्छुक नहीं।
- 29:57तो फिर तुम एक काम करो, मन की दौड़ का सदुपयोग करो, तुम भी
- 30:07दौड़ने लग जाओ इस मैराथन की दौड़। में।
- 30:111 दिन आएगा तुम एक नंबर पे हो जाओगे, बिल्कुल एक नंबर पे हो
- 30:16जाओगे। हम बच्चे को कॉम्पटीशन करना
- 30:20सिखाते है, कंपैरिजन करना सिखाते है, मुकाबला सिखाते है, तुलना
- 30:29सिखाते। है।
- 30:31और यही बच्चे के लिए नर्क बन जाता।
- 30:33है। माँ बाप ने कभी सोचा भी नहीं मेरे
- 30:43पिताजी कहा करते थे तू लेना मत करना, कंपैरिजन मत करना,
- 30:53कॉम्पिटिशन मत करना, तुम सहज भाग से ही कर लो।
- 31:03जो मिल जाए ठीक जो नहीं मिले बाबू ठीक जो।
- 31:14मिल गया उसी को मुकर दर्द समझ लिया।
- 31:24मुकदरी समझ लिया जो खो गया मैं उसको बुलाता चला गया।
- 31:36जो खो गया मैं उसको बुलाता चला गया।
- 31:46हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया।
- 31:53हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया।
- 31:58फिकर आता है अचेतन से तुमने दबा लिया है, फिकर फिकर चाहे कुछ भी
- 32:07ये तुम्हारे अचेतन से आता। है।
- 32:11और आता है चेतन में। चेतन में आता तो तुम इस स्वीकर से
- 32:16घबराते। हो?
- 32:20घबराते हो हाथ पांव कपते कल मेरे पास एक।
- 32:25मट्ठी आई बाबा। न तो मैंने कभी जप किया, न तप
- 32:31किया, न पाठ, न पूजा। ना कोई तीर्थ स्नान किया, ना कोई
- 32:35धार्मिक ग्रंथ पड़ा, बस सहजे सहजे 1 दिन बैठी और आपकी?
- 32:41वीडियो आ गयी, आवाज़ सुना हृदय में उतर गयी, सुनती ही रह गयी और
- 32:50फिर तो सुनती ही चली गयी। और 1 दिन कुंडल नीचे गए हाथ पांव
- 33:02कमते मृत्यु सामने साक्षात् नजर आती है।
- 33:12अब मरी तब मरी और दिन तो किसी तरह गुजर जाता।
- 33:17है। ये रात क्यों आ जाती है?
- 33:26रात में आस पास कोई नहीं होता जो बंधु जन हैं सोए पड़े।
- 33:31होते हैं बे खबर? और मैं जगती हूँ ये भय कपराता है
- 33:45इस शब्द को गौर से सुनना हर फिकर को धुएं में उड़ाता जाता है।
- 33:52बिलीन कर दिया अट्मोसफियर में धुएं की तरह सिगरेट के धुएं।
- 34:00ये धुआं है जो तुमने सिगरेट के द्वारा भीतर खींचा।
- 34:04था। और बाहर एक्स्पर्ट हो रहा है ये
- 34:12तुम्हारे विचार मृत्यु के। तुम्हारी बात सुनाएं, तुम्हारी
- 34:20विषय इकट्ठी की हुई सूचना, जैसे ही तुम शांत।
- 34:26हो गए, रिलैक्स हो गए। तो यह अचेतन से चेतन में आना शुरू
- 34:34होगा और तुम्हें पता भी नहीं चलेगा।
- 34:42हमारे मनोविज्ञान ने अभी इतनी तरक्की नहीं की, लेकिन हमारे
- 34:49संतों ने बड़ी तरक्की की। मन के मामले में क्यों?
- 34:52बात ही मन की थी उस विशुद्धि तक जाने के लिए मन को क्रॉस करना
- 35:02होता है और जीस पगडंडी से राह से तुम निकल गए उस राह को अच्छी तरह
- 35:11देख के जाओ। यह क्या है, कांटे हैं, फूल हैं,
- 35:17उपवन हैं, राहें सीधी हैं, उबड़ खाबड़ हैं, पगडंडियाँ हैं, राजपथ
- 35:26हैं, ये तुम जाग के देखोगे। बस यही यात्रा संत करता है, संत
- 35:39मन के शुरू से लेके आखिर तल के जा।
- 35:43के जो रास्ते में आता है, हर चीज़ का जागृत साक्षी होता है इसलिए
- 35:52तुम्हारी उलझनों को इतनी आसानी से।
- 35:54सॉल्व कर देता है। क्यों?
- 35:59क्योंकि उसने प्रैक्टिकल किया है इसलिए नहीं किया कि तुम्हें कुछ
- 36:05तुम्हारी समस्याओं को सॉल्व किया था, ये उसका उद्देश्य नहीं है।
- 36:12उसका उद्देश्य है स्वयं तक चले जाना।
- 36:16उसको सपने में भी ख्याल नहीं होगा कि मैं स्वयं तक पहुँच के जीस
- 36:21रास्ते से आया उस रास्ते का। मुझे लोगों को व्याख्यान भी करना
- 36:25पड़ेगा, लोगों की बहुत सी भ्रांतियां भी टूटेंगे।
- 36:31लोगों के बहुत से थोपे हुए भ्रम वो भी खंडित होंगे।
- 36:36उसे नहीं पता होता, लेकिन वह चलता है आत्म खोज।
- 36:41में स्वयं को जानने के लिए वो एमआइ।
- 36:50तो वह चलता है, अपने भीतर उतरता है और भीतर उतरने का मतलब मन को
- 36:54पार कर देना। मन की जागृत अवस्था से चेतन से
- 37:00लेकर अवचेतन सबकॉन्शियस, अचेतन, अनकॉन्शियस और फिर कलेक्टिव।
- 37:07अनकॉन्शियस फिर उसके बाद। कोलेक्टिव कॉन्शस, ये पूरी यात्रा
- 37:16है। मानव की पूरी यात्रा यही है।
- 37:22लेकिन जन्मो बीत गए, तुमने कहीं भीतर डुबकी लगाई?
- 37:30क्या पड़ा है तुम्हारे स्टोर में ये चेतन मन मैं स्टोर कहता हूँ
- 37:35इसको क्या फेंक दिया तुमने इसके भीतर तुम्हें पता नहीं कूड़ा
- 37:42कबाड़ा, ये सारी सूचनाएं जो तुमने सीखीं?
- 37:49जो आज लोगों को बता रहे हो कचड़ा कचड़ा इस अर्थ में के जीवन यापन
- 37:59के साधन तो ये देंगे तुम बड़ी गद्दियाँ बड़ी चेयर्स?
- 38:07लोगों में मान प्रतिष्ठा तुम्हारे पांव छुए जाएंगे, दो दो के पिए
- 38:11जाएंगे लेकिन पांव छुए जाएंगे, दो दो के पिए जाएंगे।
- 38:22क्या तुम्हें खुद को भी तसल्ली मिल गई?
- 38:27तुमने ऐसा कभी देखा? बस यहीं चूक गए लोग पांव पूछ रहे
- 38:37हैं, तुम उनके साथ एकाकार हो गए यही तुम्हारे।
- 38:41सुख का सबब बन गया। क्योंकि उसके पास सूचनाओं का
- 38:45भंडार था और तुम बड़ी ललचाई दृष्टि से अपने सर की तरफ देखते
- 38:52हो, तुम्हें पता भी नहीं होता भीतर से तुम्हारा अनकॉन्शियस
- 38:58सोचता है, काश मैं भी कभी ऐसे ही बच्चों को पढ़ाऊँ।
- 39:03पढ़ा दूँ के भाई, लगे रहो मुन्ना भाई ये समूह को इकट्ठा करो 1 दिन
- 39:12तुम भी लोगों को बताना शुरू कर दो लेकिन बात ये नहीं।
- 39:18है। असल बात यह है कि।
- 39:26क्या ये जो मन भटक रहा है वह भटकने से हटा?
- 39:34मन के भटकाव का तुमने सदुपयोग कर लिया।
- 39:37सूचनाएं संग्रहित कर धनपति ने धन जोड़ लिया।
- 39:47गद्दियाँ कमा लीं। राजनीतिक व्यक्ति ने पांव
- 39:51पुजवालिये जो श्रेय चाहता था लोग इतने श्रेय से ग्रस्त हैं कि अपने
- 39:57आप को भगवान घोषित करने में बड़े उद्यान।
- 40:02कि कब लोग मेरा मंत्र बना दें, कब लोग मुझे भगवान घोषित कर दें, भाई
- 40:07हो भी जाओगे, कोई भगवान घोषित कर भी देगा लेकिन तुम क्या तुम चैन
- 40:17से बैठ पाओगे? बात तुम्हारी है तुम्हारे मंदिरों
- 40:22की और तुम्हारी मूर्तियों की नहीं।
- 40:31घुट से मरा टाँग दिया गया। वो कैसे मरा इससे तुमने क्या लेना
- 40:37तुम उसका मंदिर बना दो पूजा कर दो, उसे ज़रा भी पता नहीं चलेगा।
- 40:43मैं भटकता है, भटकता रहेगा क्योंकि वह बड़ा शान से मरा है वह
- 40:52जानता है मैं मरूंगा और जो ये जानता कि मैं मरूंगा, वो जल्दी
- 40:58जल्दी जीवन में मिलता उसको प्रकृति, मैंने एक सिद्धांत।
- 41:01आपको समझाया था अहमदाबाद के। जिसे पता नहीं मैं मर जाऊंगा, वो
- 41:09जल्दबाजी करता है। मेरा घर दो जल्दी करो और प्रकृति
- 41:13जल्दबाजी में उसे घर दे देती है। इधर बहुत से जोड़े जन्म देने के
- 41:19लिए उदित है, लेकिन यह जो व्यक्ति साजिश है, रच के किसी को मारता।
- 41:24है। वह भटकता है, बड़ा भटकता है गोट।
- 41:30से आज भी भटक। रहा है।
- 41:38जिसे मारा था वह संबोधि। को प्राप्त हो गया।
- 41:49इसे घर की। तलाश है?
- 41:50अभी गोडसे को घर की तलाश है। और गाँधी को घर बेकार।
- 41:58हो गया। गाँधी को घर नहीं दे पाएगी?
- 42:05प्रकृति। क्यों घर लेने की वासना बची है?
- 42:10वासना ही नहीं बची। कुछ वासना ही तो पिछले दिनों में
- 42:15ही रोहित हो गई थी। तुम उनका मजाक उड़ाते हो?
- 42:19मन्नू के साथ सोया आभा के साथ सोया।
- 42:25क्या बाप अपनी बेटी के पास में सोता है?
- 42:28छोटी बटी आवती चिपट जाती हैं। बाप के साथ।
- 42:33लेकिन तुम्हारे मन में जो विकार। है।
- 42:38वो ऐसी चीजों को गंदगी की तरह पेश करें।
- 42:49बापू चलते तो लड़कियों के ही कंधे पे हाथ क्यों रखते हैं?
- 42:57अब इन्हें समझाओ हर बात। अरे भाई, ये लड़कियां छोटे करके।
- 43:04जहाँ। से हाथ शुरू होते हैं वहाँ से ऊपर
- 43:06हमारी गर्दन होती है और उनके कन्धों तक हमारे हाथ बड़े आसानी
- 43:10से आ जाते हैं। आदमी के कन्धों तक नहीं आएँगे
- 43:16इसलिए वो लड़कियों के कन्धों में चलता है।
- 43:20तुम हर चीज़ को वासना के साथ जोड़ लेते हो।
- 43:23क्योंकि तुम अपूरी तवासनाओं से युक्त व्यक्ति तुम्हारा मन अपूरी
- 43:31तवासनाओं से भरा पड़ा है, इसलिए तुम जो भी कुछ सोचोगे फ्रॉइड सही
- 43:36कहता है सेगमेंट फ्रॉइड कहता है व्यक्ति जो भी कुछ करता है दिन भर
- 43:40रात। वह सिर्फ काम वासना के भोग के लिए
- 43:45करता है बिल्कुल ठीक है, वह खुद की खबर देता है सेगमेंट फ्राइड
- 43:53खुद की खबर देता है कि मैं जो करता हूँ यह फ्राइड की बात है, वह
- 43:59सारे दिन काम वासना की व्यक्ति घूमता है।
- 44:02खुद की खबर देता है। हर संत की खबर नहीं दे सकता हूँ।
- 44:12संत हृदय व्यक्ति जिसकी वासनाएँ खत्म हुई इसीलिए तो ब्रह्मचर्य के
- 44:15प्रयोग की उसने गाँधी को लगा वासना नहीं है।
- 44:22तो उसने प्रयोग किया और प्रयोग में सफल रहा।
- 44:26लोग कहते हैं कि पता नहीं सफल रहा कि नहीं रहा।
- 44:30बिल्कुल सफल रहा तो मन्नू से पूछते हो जो पास में सोती थी तुम
- 44:37जब सोई गाँधी के साथ तो कैसा लगा? तो मन्नू कहती है, मैं ऐसे।
- 44:43सोई जैसे पिता के साथ माँ के साथ कोई बेटी सोती है छोटी बेटी।
- 44:56तुम लांछन लगा सकते हो, लेकिन कभी मन्नू ने, आभा ने, शुचेता ने।
- 45:03कभी लांछन लगाया, बताओ कोई एफआइआर दर्ज नहीं करवाई।
- 45:10उन्होंने बड़ा नाम मिलता इतने महान।
- 45:17पुरस्कार बापू का, राष्ट्र पिता का।
- 45:21ऐफ़ आई आर कोई कराए उसे कितना सम्मान मिलता और लोगों की
- 45:25भ्रांतियां भी टूट जाती हैं। लेकिन किसी ने कंप्लेंट की कोई
- 45:30दबदबा नहीं था। अहिंसक व्यक्ति था, हाथ में तलवार
- 45:33नहीं थी, कोई ईडी का आईटी का कोई किसी संस्था का डर नहीं था।
- 45:45लेकिन विकार ही नहीं होता। तुम लाख बार पूछ लेते हो विकार ही
- 45:51नहीं विकार खत्म हो जाते हैं एक पल ऐसा भी आ जाता है और तुम।
- 46:02जो देखा है वो है, जो नहीं देखा वो नहीं है तुम क्योंकि तुम
- 46:08स्त्रियों को देखते ही मेरे पास। लोग आ जाते हैं।
- 46:11स्त्रियों को देखते ही मैं सकलित। हो जाता हूँ।
- 46:15क्या करूँ बाबा? मैंने कहा कोई उपाय सूरदास की तरह
- 46:21आँखें फोड़ दो और कोई? सूर्यदास मूर्ख सूर्यदास मृगनयिनी
- 46:30को देख के अपनी नैन फूट लेते हैं यहाँ कोई हल न हुआ हल तो तो था।
- 46:41रम्भा उर्वशी मेनका तुम्हारे सामने नग्न नाचतीं और तुम्हारे
- 46:45भीतर कोई भाग भी ना उठता तुम बिलकुल बुद्ध का वो जवाब देती है
- 46:51जो डाकुओं ने पूछा वो तो से एक स्त्री पूर्णिमा की रात को नग्न
- 46:58भागी जा रही है। पैरों की आहट सोनी आँखें बंद थीं
- 47:04बुदकी मस्ती के आलम में, खोया हुआ पूर्णमासी की हो रहा किसी के
- 47:16भागने की आवाज आती है कानो में। आँखें खोल कर देखता है।
- 47:22थोड़ी परछाई नजर आती है और सहसा पांच 4 मिनट बाद कुछ डाकू आ जाते।
- 47:29है। पूछते है हे प्रभु?
- 47:37तुम यहाँ वृक्ष के नीचे बैठे हो, बड़े शांत नजर आते हैं, सोए भी
- 47:43नहीं हो जाग रहे हो क्या तुमने अभी अभी कुछ पल पहले किसी नग्न
- 47:50स्त्री को भागते हुए यहाँ से देखा है उस स्त्री को?
- 47:58चुरा के ले गए थे, अपहरण करते और बलात्कार की कोशिश किए जा रहे थे।
- 48:05स्त्री? भाग।
- 48:06गए वह दारू का प्याला पीने में मगन रहे।
- 48:11स्त्री ने फायदा उठा लिया। भाग बुद्ध ने आवाज सुनी थी
- 48:23बुद्धजूठ ने। व्रत।
- 48:29खुद कहते हैं यहाँ से कोई गुजरात। था।
- 48:34मेरे कानों ने आढ़त सुनी लेकिन ये नहीं पता।
- 48:42कि वह स्त्री थी या अनुमित। यह नहीं पता कि उसने वस्त्र डाल
- 48:51रखे थे या नगम। थे यह नहीं पता।
- 48:56कानों ने आवाज़ सुनी। आँखों ने परछाई देखी लेकिन ये
- 49:02नहीं पता की स्त्री थी या? पुरुष था।
- 49:04नगल थी या ढकीं हुई थी? ऐसा ही जब व्यक्ति का चित हो जाता
- 49:12है। तो बाहर के नक्शे बाहर के साजु
- 49:22सामान बाहर के दृश्य बेकार। हो जाते हैं।
- 49:32भीतर अगर रस का झरना रहता हो। किस्से सोचती है मेनका, परम्भा और
- 49:41उर्वशी किस्से सोचती है तुम्हारे लिए?
- 49:49इसमें रस है लेकिन रस क्षण? इस रस को लेने के बाद तुम पुनः
- 49:57पुनः इस रस को लेना चाहते हो। स्त्री, औरत, औरत, स्त्री ये आग
- 50:04दो तरफा है एक तरफा तुम महज दक्षिणिक वासनाओं से।
- 50:15तरफ तो हो के इसे ही समझ लेते हो कि बस ठीक मिल गया, लेकिन बुद्ध
- 50:23यहाँ शांत नहीं होती, बुद्ध यहाँ शांत नहीं होती।
- 50:30सब है। दास दासियां हैं, एक से एक
- 50:33खूबसूरत हैं। मैं नहीं कहता कि वो तो उन्हें
- 50:39भोकते नहीं भोकते हैं, लेकिन भोककर परिणाम निकालते हैं।
- 50:49लज़ीज़ ए व्यंजन मैं नहीं कहता तो वो खाते नहीं, बिल्कुल।
- 50:53खाते हैं। अगर खायेगा नहीं तो छोड़ेगा कैसे
- 51:01अगर भोगेगा नहीं तो त्यागेगा कैसे?
- 51:07बिल्कुल भोग बुद्ध ने, खूब भोग बुद्ध से अपना भोगी को और फिर जब
- 51:15भोग में कुछ न मिला तो वैराग्य का।
- 51:17जन्म होता है। क्यों?
- 51:23अष्टावक्र कहते हैं, भोगों से दुख मिलता है।
- 51:29अष्टाबकर खुद भोकते हैं, अष्टाबकर खुद शादी कर और अपना अनुभव बताते
- 51:39हैं। किसी की लेखनी की बात नहीं करते
- 51:41वो पढ़ी, पढ़ाई सुनी, सुनाई बात नहीं करते।
- 51:46अष्टबक्र अपने अनुभव की बात करते हैं, अष्टबक्र कहते हैं, नहीं
- 51:50मिलता मिलता हुआ लगता है क्षण के लिए, लेकिन फिर कहीं खो जाता है
- 51:56आसमान में। खेजाओं की परतों में छिप जाता है।
- 52:04कहीं जाकर ये खेजाओं की बलि चढ़ जाती है।
- 52:13मिला तो था लेकिन फिर कहाँ चला गया इवैपरेट?
- 52:18हो गया वास्तु? बन गया।
- 52:21तुम्हारा अचेतन मन इन्हीं चीजों से भरा पड़ा है और पूरी तवा
- 52:25सुनाएं जो पूरी नहीं हो सके। कभी साधन नहीं मिले, कभी उपकरण
- 52:34नहीं मिले, किसी ना किसी तरह तुम चूकते चले गए।
- 52:40तुमने सोचा था तृप्ति हो जाएगी, लेकिन इंद्रियों से तुम्हें
- 52:45तृप्ति नहीं मिली, जिसने पूरा भोग जनक ने पूरा भोग, बुद्ध ने पूरा
- 52:52भोग, महावीर ने पूरा भोग और जो पूरा भोग लेता है वह शांत शरण में
- 52:57आ जाता है। उससे पहले संत के शरण में आना,
- 53:01बेकार भोगने में कभी कैसे मत करना बहुत से लोग मुझे कह देते हैं
- 53:13बाबा ने हमने हमने तो नाम ले रखा है।
- 53:18हम तो नहीं पीते, मैंने कहा फिर ठीक है, नहीं पीते तो डटे रहो
- 53:25यहाँ आगे भी न चल पाओगे क्योंकि आगे की प्रक्रिया शुरू होती है
- 53:33भोग से। और त्याग घटित हो जाएगा ये सपने
- 53:39में भी ना सोचना भोगने से ही त्यागना होता है।
- 53:47भोग के बिना त्यागना। होता है।
- 53:52महावीर के पास। कोई आ गया?
- 53:58वर्धमान उनका नाम था प्रभु आप महान त्यागी आपने सब कुछ चाहती
- 54:04है, शर्त लगा के जाते हो भिक्षा मांगने?
- 54:11यद्यपि हर घर तुम्हें बिक्षा देने को तैयार है, लेकिन तुम उस घर से
- 54:16मांगते हो, तुम न जाने क्या सोच के जाते।
- 54:19हो? यह शर्त पूरी होगी तो मैं खाऊंगा,
- 54:28परम समर्पण की अवस्था है, तुम्हें समझी नहीं आयी?
- 54:35छोटी सी बात से समझा जाए तो बता देता हूँ जिसके लिए तुम अपनी
- 54:40जिंदगी की ईशना जीव बेशना दांव पे लगा दो तो परम समर्पण गठित हो
- 54:46गया। उस गृहस्थ व्यक्ति ने पांव छुए,
- 54:55तुम बा कमार व्यक्ति हो संत देखा तुम्हारी जैसा कोई नहीं देखा।
- 55:06तुम मांगने भी जाते हो अपनी शर्त कमार।
- 55:09की। बुद्ध अपनी शर्तों पे मांगने नहीं
- 55:14जाते, बुद्ध किसी की शर्तों पे ही जो मिलता है ले आते हैं।
- 55:18ये जीने के दो ढांगे हैं बुद्ध कहते हैं जो मिल गया वही
- 55:22ब्रेकफास्ट जो मिल गया वही लंच और वही डिन्नर लेकिन महावीर कहते हैं
- 55:29नहीं, ऐसा नहीं। जो मिल गया बोले मिलने को तो सब
- 55:34तैयार है मिलने को तो स्थानक में भी ट्यूशन लेके लोग आ जाएंगे,
- 55:40लेकिन मैं जाऊंगा खुद जाऊंगा मैं शर्त मन में ही लगाऊंगा तुम्हें
- 55:45बताऊँगा और जहाँ। अब यहाँ समझना बात उस परम पिता ने
- 55:56मेरी शर्त पूरी कर। दी।
- 55:59तुम प्रकृति कहो या परमात्मा कहो, कोई फर्क नहीं पड़ता अल्फा से कभी
- 56:03शक्ति बदला करते हैं। और इतना बड़ा अगर कोई व्यक्ति
- 56:09त्याग करता है, समर्पण करता है, जिंदगी तक की ईषणा का त्याग कर
- 56:14देता है तो उसने विराट हस्त को देख लिया है।
- 56:19उसने उन अज्ञात हाथों को देख लिया है ना तभी तो समर्पण संभव हो
- 56:25पाएगा। अन्यतः समर्पण होगा कैसे?
- 56:29लोग कहते हैं महावीर नास्तिक थे, लेकिन नहीं परम आस्तिक थे महावीर
- 56:36जो ज़िन्दगी को दांत पे लगा दे उससे बड़ा आस्तिक और कौन होगा?
- 56:41उसने देख लिए वो। अज्ञात हाथ जो नचा रहे हैं सारी
- 56:47सजना को, तुम कहते हो महावीर कहते हो भगवान नहीं है गलत कहते हो
- 56:54महावीर के लिए जैसा भगवान है तुमने तो कभी वैसा सोचा भी नहीं?
- 56:58होगा। महावीर के लिए ऐसा भगवान कि वो
- 57:02जिंदगी को जीने की इच्छा भी दांव पे लगाते महावीर कहते नहीं मुझे
- 57:08भोगी कहो त्यागी न कहो गृहस्थी व्यक्ति नहीं तो पांव पकड़ लिया
- 57:17नहीं प्रभु तुम कहाँ से भोगी हो गए?
- 57:21भोगी तो हम तो माँ भी रहस्य कहते हैं।
- 57:28देखो सुद्र को भोगने वाला भोगी या विराट को भोगने वाला, भोगी, सुद्र
- 57:35को भोगने वाला, भोगी या विराट को भोगने वाला?
- 57:39भोगी? करो फैसला वो व्यक्ति कहने लगा जो
- 57:45विराट भुगता है वही सही मात्रा में भोगी है।
- 57:50तो महावीर बोले मैं विराट को। भोगता हूँ, तुम शुद्र को भोगते
- 57:57हो। तुम्हारी जीवेशणा बनी हुई है
- 58:02क्योंकि तुम शुद्र को भोगते हो, इसलिए परिपृप्त नहीं हो।
- 58:05पाते। मैं विराट को भोगता हूँ इसलिए
- 58:09परिपृप्त हो जाती हूँ और परिपृप्त होने का यही परिणाम है कि मेरी
- 58:13जीने की इच्छा भी खत्म हो गयी। ध्यान रखो, संत को परखना हो, तो
- 58:21यही यही एकमात्र फॉर्मूला है। जीने की इसना कितनी है?
- 58:28क्या वह मेकअप करता? है।
- 58:32क्या वह वैजयंतीमाला डालता? है।
- 58:35क्या ऑटो पे लिपस्टिक हल्की से लगा लेता है?
- 58:38क्या श्रृंगार करता है? दाढ़ी को काली पीली करता है?
- 58:44यह प्रकृति के अनुसार ही चलता है। क्यों बदलेगा कोई जीसको परम स्रोत
- 58:51का व्रत मिल गया। बदलेगा काहे?
- 58:57को। जीसको मिल गया वो फिर पत्थरों की
- 59:06कामना क्यों करेगा हीरो? पायो।
- 59:15गांठ गठ आयो हीरो पायो गांठ गठ आयो।
- 59:32बार बार को क्यों खोले? मन मस्त हुआ हाँ फिर क्यों बोल मन
- 59:45मस्त हुआ तो क्यों बोल? चुप हो जाता है।
- 59:54जो जो बोलता रहे कुछ भी बोलता रहे तुम कहते हो भगवान का नाम लेने।
- 59:59से। जी, वह पवित्र हो जाती है।
- 1:00:04मैंने कहा फिर भारतीय शरीर का क्या बनेगा जी, वह तो आपने पवित्र
- 1:00:09का? सारा शरीर ही तो हमारा है, बाकी
- 1:00:14शरीर का कैसे पवित्र करो? क्या तो चुप हो जाते हैं लोग?
- 1:00:21भगवान का नाम लेने से जीवा पवित्र हो जाती है।
- 1:00:25बोलो सदगुरु महाराज की जय। अरे भाई बाकी शरीर का क्या होगा?
- 1:00:3837,00,000 करोड़ सेल रहे हैं हमारे शरीर में 37,00,000 करोड़
- 1:00:45तुम गिन न सको, तुम्हारी मशीनें भी हार जाएंगी।
- 1:00:51इतने शैल हैं महावीर कहते हैं मैं परम भोगी, मेरे से बड़ा भोगी कोई
- 1:01:01नहीं और तुम्हें भी कहता हूँ शरावक तुम भी भोगी बनो, परम भोगी
- 1:01:08बनो। जब तक उस विराट को न भोगोगे तब तक
- 1:01:12जीने की तमन्ना बनी ही रहेंगी। जीसको विराट ने भोग लिया जो विराट
- 1:01:19को भोग गया, एक मिक हो गए, दोनों वही सास्वत हो जाता है।
- 1:01:30बूंद समुद्र में ही नहीं मिलती या मत भूल जाना समुद्र भी बूंद को
- 1:01:36अपने में एकाकार कर देता है। वह विराट तुमको पी।
- 1:01:44लेता है और तुम वेराट में। विलीन हो जाते हो।
- 1:01:50महावीर कहते हैं, विराट को। भोगो?
- 1:01:53शूद्र को भोगने से नहीं मिलेगा शूद्र, शूद्र शूद्र एक एक बूंद
- 1:01:59इकट्ठा करके कब दुख तुम? विराट को भोगोगे विराट को सीधा
- 1:02:05ही। भोगलो।
- 1:02:08संत जलता है मन के उस पार से और परले पार तक चला जाता है।
- 1:02:16वह उदगम स्थल जहाँ से ओंकार की ध्वनि उगती है, अनंतनाथ जिसे कहते
- 1:02:22हैं। वहाँ तक पहुंचाओ।
- 1:02:28रास्ते में आएगा मन का सारा प्रारूप, अवचेतन भी आएगा अचेतन भी
- 1:02:34आएगा सामूहिक अवचेतन भी आएगा कलेक्टिव अनकॉन्शियस।
- 1:02:43पर फिर फिर वो आएगा जो तुम हो सामूहिक चेतन कलेक्टिव कॉन्शस,
- 1:02:54लेकिन मन के पार होना पड़ेगा। रोओगे पछताओगे व्यग्रस्त होगे काम
- 1:03:02बस हो जाओगे विकार बस हो जाओगे, विषय घेर लेंगे, वस्तु घेर लेगी
- 1:03:08इन सब चीजों से के बीच में से गुजरते हुए साक्षी में स्थित हुए
- 1:03:16हुए ज़रा भी डोलो न तुम्हारी। अग्न लो अकंप बने रहे डोले न तुम
- 1:03:31अकंप बने रहो भूकंप न जाए तुम्हारे बेटा।
- 1:03:38तुम ठहर जाओ, सहज उन सब के भीतर से निकलो और वहाँ पहुँच जाओ।
- 1:03:44जहाँ वो विराट बैठा है जहाँ वो सुमद्र है तो बूंदो समुद्र में
- 1:03:49मिल गई। मैंने कहा।
- 1:03:53बेटी। यह तुम्हारे भीतर से आता हुआ वो
- 1:03:59है जो तुमने दबा लिया। किसी भी जन्म में दबा लिया उसको
- 1:04:02सदा साथ लेकर चलोगे और वो किसी भी जन्म में निकलेगा।
- 1:04:09जन्म लेते ही व्यक्ति कुछ मानसिक क्षतिग्रस्त।
- 1:04:16बच्चे पैदा हो जाते। हैं।
- 1:04:19क्या कसूर किया उन्होंने? प्रकृति ने उन्हें क्यों दंडित
- 1:04:23किया? प्रकृति ने दंडित नहीं किया जितना
- 1:04:26भोंगा उन्होंने भोंगा बाकी बसता उठाओ आगे चलो।
- 1:04:34तो फिर जहाँ तक होगा उसके आगे यही कुछ था।
- 1:04:38अपंग मानसिकता तुमको मिलनी थी और उसको लिए लिए तुम पैदा हो गए।
- 1:04:47इसलिए मैं जब कोई व्यक्ति मेरे से प्रार्थना करता है, बाबा इसकी
- 1:04:51मृत्यु का उदास कर। मैं पूछता हूँ यानी कि ये मर जाए?
- 1:04:57अरे बाबा बस ये शब्द मत कहो इसको दुखों से मुक्ति दिला दो, मगर
- 1:05:02दुखों से मुक्ति। तो इसके नहीं।
- 1:05:11तुम मुक्त हो जाओगे इसके दुखों से, क्योंकि तुम चिपटे हुए हो,
- 1:05:15तुम लिप्त हो इसके साथ और इसने प्राण त्याग दिए तो तुम मुक्त हो
- 1:05:21जाओगे दुख से लेकिन आगे जिसके ये जन्म लेगा उसको भुगतने पड़
- 1:05:25जाएंगे। तो इसको भोग लेने दो।
- 1:05:31जब तक प्रकृति भगवाती है, प्रकृति विराट है, विराट का सृजन है, उसके
- 1:05:40नियम बड़े सटीक हैं, सरल हैं, सटीक हैं।
- 1:05:48और प्रकृति जब तक भुगतती है, तुम भुगत।
- 1:05:51हो? तुम्हें क्यों दर्द हो रहा है
- 1:05:56क्योंकि तुम चिपते हो क्लिंकिंगनेस के कारण तुम्हें
- 1:06:01देखा नहीं जाता वह तड़पता। होगा।
- 1:06:04जबकि प्रकृति अपना काम कर रही है। तुम कहते हो प्रकृति बड़ी अन्याय
- 1:06:08है नहीं, प्रकृति अन्याय नहीं है, न्याय कार्य तुम इसको यहीं भोग
- 1:06:16लेने दो अन्यथा आगे से ये मानसिक विक्षिप्त पैदा होगा।
- 1:06:22भोगने तो पड़ेंगे ही। जो किया जो बीज वो दिया वह
- 1:06:28अंकुरित तो होगा, फलीभूत भी होगा। जहाँ तक फलीभूत हुआ, वहाँ तक रोको
- 1:06:35मत। उसको प्रकृति जहाँ तक फलीभूत करती
- 1:06:39है, वहाँ तक होने दो। जब ये शरीर ठहर गया, स्वयं से ठहर
- 1:06:46गया तो प्रकृति उसको न्याश्रय दिलवा देंगे।
- 1:06:53अभी अमृता की खोज हो रही है। ईश्वर करे, तुम कामयाब हो जाओ तो
- 1:06:59एक बहुत बड़ा भ्रम टूट जाएगा। एक बात तय है अगर तुम अमर हो गए।
- 1:07:10शारीरिक रूप से वैज्ञानिक ने खोज लिया तो व्यक्ति के भीतर मुक्ति
- 1:07:18की संभावना जगेगी। विभाषा जगेगी।
- 1:07:22क्योंकि व्यक्ति की मुक्ति में सबसे बड़ी से बड़ी वादा है जीने
- 1:07:27की इच्छा ईष्ण जी वैष्णव और वो तो साइंस ने मौका दी।
- 1:07:36साइंस कहता है अब तुम मज़े से जियो, तुम मरोगे नहीं कभी।
- 1:07:42जी भी इतना ही वादा है, वह साइंस ने विज्ञान ने खत्म कर दी।
- 1:07:48कर भी देगी, इंतजार करो उन दिनों का, खुदा करे कि कयामत हो और तू
- 1:07:57आए तो ज्यादा मुमुक्षु पैदा होंगे।
- 1:08:02समझ आ जाएगी अमर होने में कुछ नहीं रखा।
- 1:08:09ये कहानी जो तुम सुनते हो अश्वत थामा कि उसे अमरता का वरदान।
- 1:08:14था। तुम सब ठीक कर लोगे, लेकिन दर्द
- 1:08:18क्या करोगे? जब दर्द आएगा फिर क्या करोगे,
- 1:08:23एनेस्थीसिया ले लोगे, लोकल एनेस्थीसिया लगा दोगे या रीड की
- 1:08:30हड्डी में लगा दोगे ये भी कोई जीवन हो उम्र को बढ़ा दोगे
- 1:08:37बिलकुल। ठीक।
- 1:08:39लेकिन दर्द को मिटा दोगे? अगर दर्द को भी तुमने मिटा दिया,
- 1:08:46कोई साइंटिफिक हो, जैसी हो गई तो याद रखना एक और चीज़ फिर और चीज़
- 1:08:52फिर और चीज़ तुम चढ़ते चले जाओ और प्रकृति नई नई बाधाएं बनती चली
- 1:08:58गई। यह प्रकृति का भी उत्थान है।
- 1:09:03प्रकृति तुम्हें चाहती है कि तुम कैसे ना कैसे अमृता का खोज कर लो।
- 1:09:08अमृता की खोज हो चुकी है। बहुत बार और खोज होने के बाद वह
- 1:09:16ऋषियों ने खुद ही खत्म कर दी। क्यों?
- 1:09:22क्योंकि बहुत मुश्किल था ये फिर प्रत्येक व्यक्ति मरना चाहेगा।
- 1:09:29अब जीने की तमन्ना है फिर फिर मरने की तमन्ना होगी?
- 1:09:36आज जीने की तमन्ना है क्योंकि मृत्यु है और जब मृत्यु न रहेंगी
- 1:09:41तो फिर मरने की तमन्ना होगी तुम बड़े लाजवाब हो तुम्हारा कोई
- 1:09:46मुकाबला? नहीं।
- 1:09:48फिर तुम कहोगे है तो कुछ है नहीं इतना लंबा जीवन।
- 1:09:55सब चख लिया देख लिया, भाग लिया वो ही पुराना मर्द वो ही पुरानी
- 1:10:01स्त्री रोज़ खेल कलैया करते रहो वो ही पुराना बिस्तर वो ही पुराने
- 1:10:09बच्चे 1 दिन ओख जाओगे। और यह उबा हुआ मन क्या चाहेगा
- 1:10:18मरना चाहेगा तुम देखो ज़रा आने दो वक्त आदमी को अमर होने की
- 1:10:26प्रक्रिया खोज लेने दो फिर तुम पाओगे कि तुम ऊब जाओगे रोज़ रोज़
- 1:10:32वही दुकान खोल। रोज़ रोज़ वो ही ऑफिस जाना, वो ही
- 1:10:36कंप्यूटर के आगे वो ही स्क्रीन, वो ही कुछ ताम झाम तुम बड़े हो।
- 1:10:43हो गए। सुबह उठो।
- 1:10:45वही स्कूल जाओ, बच्चों को पढ़ाओ, मैतेमेटिक्स पढ़ाओ इतिहास पढ़ाओ।
- 1:10:52तुम कहोगे इस पंगे खाने को छोड़ो, फिर तुम मृत्यु को ढूंढोगे आदमी
- 1:11:02बड़ा मूड है, इसलिए मैं तुम्हें कहता हूँ कि नाम मृत्यु?
- 1:11:10ना जीवन किसी की कामना ना करो तुम अपने आप को उसके हाथों में छोड़
- 1:11:17दो जो तोत पांव है साईं परिका तुम मृत्यु दे तुम मृत्यु ठीक, तुने
- 1:11:25ठीक ही चुना। होगा।
- 1:11:28क्योंकि तेरे से बड़ा दिमाग और किसका तेरे से ज्यादा समझदार और
- 1:11:34कौन मैं अटिंचन मैं क्षुद्र हूँ मैं तुझे बैराट को क्या जानूं कण
- 1:11:46क्या जाने ये समुद्र क्या होता है?
- 1:11:50इसलिए मैं अपने आप को तेरे हाथों में सोंपता हूँ, लेकिन ध्यान रखना
- 1:11:56ये सोंप के तुम गर्भान्वित मत हो जनों, यह गरब भी तुम्हें घेर सकता
- 1:12:03है और यह अहंकार का रुख शुरू। है।
- 1:12:07इसने लबादा उड़ लिया त्याग का कि मैं अहंकार हीन हो गया।
- 1:12:15बड़े संकट हैं, विकट परिस्थितियां हैं।
- 1:12:19ये भीतर चेतन में जो है इसको बाहर आने दो, वह स्वभावता बाहर आएगा।
- 1:12:25फुर्सत के लम्हों में आएगा और दिन में तो कोई न कोई काम होता है।
- 1:12:30खाना बनाना, बच्चों के लिए कोई नहाना धोना और सब काम करने कोई
- 1:12:37गेस्ट आ गया 1000 काम होते हैं रात को सोना होता है सर फुर्सत के
- 1:12:43लम्हे होते हैं रात को। इसलिए कृष्ण ने कहा जब तुम्हारा
- 1:12:49संसारिक। व्यक्ति सोता है तो मेरा योगी
- 1:12:54जागता है। हमने नवरात्रे बनाए, हमने रात
- 1:13:00बनाई, शिवरात्रि बनाई जीतने हमने। आध्यात्मिक उत्सव बनाई।
- 1:13:06रात को बनाई क्यों बनाई? रात को कोई काम नहीं।
- 1:13:11होता है। रात को तुम खाली मन होते हो और
- 1:13:19खाली लम्हों में उतरना आसान होता है।
- 1:13:27आज के लिए यही संदेश है। आपको खाली लम्हों में उतरना आसान
- 1:13:34होता है अगर रात के खाली लम्हों की तरह।
- 1:13:41तुम दिन के लम्हों को भी रात के लम्हों की तरह बना लो खाली जब
- 1:13:48ज़रा गर्दन झुकाई देख ली दिल के आईने में थी तो सवेरे जा काम धाम
- 1:13:55करो, कर्तव्य निर्वहन करो रात को तो कोई कर्तव्य निर्वहन नहीं
- 1:13:59होते। इसलिए रात ज्यादा बढ़िया अध्यात्म
- 1:14:05में कपूर सुन ने रात को चुना क्योंकि तब कोई कहीं नहीं जाना।
- 1:14:10कोई बाजार खुला नहीं है कि चलो दो शेर मूंगफली ही ले आए।
- 1:14:18कोई नहीं मिलेगा सब बनिया सो रहा है, कोई दवा बूटी चाहिए तो अभी
- 1:14:28नहीं मिलेगा रात को खाली होता है चित्र तुम्हारा रात सहयोग कर सकती
- 1:14:38है तुम्हे पहुंचने के लिए। रात बेशकीमती है और उसका कारण है
- 1:14:49यह खाली लम्हे। फुर्सत के लम्हे रात को तुम
- 1:14:54फुर्सत में बिल्कुल फुर्सत में खाली।
- 1:15:01इसका उपयोग भी तुम कर सकते हो, लेकिन दिन में जैसे तुम जागो,
- 1:15:10तुम्हारा मन सक्रिय होगा। अचेतन की भावना चेतन में आएगी।
- 1:15:14ऐसे डरो मत। बहुता तो मृत्यु का व्यय तुम्हें
- 1:15:18सताएगा, लेकिन मरोगे नहीं। तुम पक्का मृत्यु का भय मृत्यु
- 1:15:25नहीं हुआ करता। मैं 1000 बार बोलूं मैंने देखे
- 1:15:29हैं वो रास्ते जहाँ सूखे पत्ते की तरह व्यक्ति कंपता है, वो पत्
- 1:15:35झड़के पत्ते की तरह कंपता है। लेकिन मरता उन रस्सों को मैंने
- 1:15:47छानबीन के बिल्कुल अंतिम पड़ाव पे पहुंचा हुआ खिलाड़ी हूँ मैं।
- 1:15:55सब जानता हूँ। रस्ते में क्या और पैदल चला किसी
- 1:16:01का सहारा नहीं लिया। कोई वाहन नहीं जाता वहाँ पैदल ही
- 1:16:08चलना होता है, वहाँ पैदल ही जाना है, खुदा के पास जाना है।
- 1:16:17सजन रे झूठ मत बोलो वहाँ हाथी न घोड़ा है वहाँ पैदल ही जाना।
- 1:16:33सब चीजों के रास्ते के मुकाम पर क्या आया?
- 1:16:36माइलस्टोन आया, कोई नीम लगा आया, कोई कचरा था, कोई बबूल था, कोई आम
- 1:16:41था ये सब देखते चले जाना, लेकिन शांत गंभीर साक्ष्य बस सिर्फ।
- 1:16:52साक्षी टेक्स्ट ही जाना खो मत जाना, लिप्त मत हो, जाना लड़ने मत
- 1:17:00लग जाना। इस तरह चलते चलते तुम अपना रास्ता
- 1:17:07तय कर लेना। मुकाम 1 दिन तय हो जाएगा।
- 1:17:11और मंजिल मिल जाएगी और मंजिल पे जाके तुम पाओगे अब नहीं का पता
- 1:17:18शरीर अब नहीं उठती भावनाओं खाली हो गया सारा अचेतन सब कॉन्शस भी
- 1:17:27अनकॉन्शस भी। कलेक्टिव अनकॉन्शियस भी खाली हो
- 1:17:33जाता है। जब तक तुम्हारा कलेक्टिव
- 1:17:38अनकॉन्शियस रहता है, तब तक तुम दूसरों के कलेक्टिव में जा सकते
- 1:17:42हो। लेकिन फिर तुम्हारा कलेक्टिव वॅन
- 1:17:47कॉन्शस दूसरों के कलेक्टिव वॅन कॉन्शस में मिल जाएगा।
- 1:17:52तुम्हें कौन सा तुम्हारा कौन सा दूसरे का ये पता नहीं चलेगा।
- 1:17:55ये शब्द थोड़े से ज्यादा गंभीर हैं और गहरे हैं इनको आराम से दो
- 1:18:00चार बार रिपीट करके सुन लेना। जब तक तुम्हारा कलेक्टीव
- 1:18:04अनकॉन्शियस, सामूहिक अवचेतन अचेतन यह विद्यमान रहता है तब तक तुम
- 1:18:13दूसरों के अचेतन में जाकर ठीक ठीक से नहीं खोज पाओगे क्यों?
- 1:18:18क्योंकि तुम्हारा अचेतन मन उनके अचेतन में प्रवेश हो जाएगा।
- 1:18:23तो कौन खोज सकता है सही? दूसरे के कोलेक्टिव अनकॉन्शियस की
- 1:18:29बात जो खुद खाली हो गया, जिसका खुद का कोलेक्टिव अनकॉन्शियस खाली
- 1:18:35हो गया, वह खाली दूसरे के कोलेक्टिव अनकॉन्शियस में जा सकता
- 1:18:41है। और भली भांति देख सकता है शुद्ध
- 1:18:45स्वरूप में इसके भीतर क्या चल रहा है?
- 1:18:50अब अगर तुम जाओगे जा तो सकते हो लेकिन फिर ठीक से तुम्हें तहना
- 1:18:55मिलेंगे क्या तुम्हारा है क्या उसका है गड़बड़ हो जायेगा।
- 1:19:01तो इसको आने दो बहुत गहरी जड़ों से आता है ये पहले तुम्हारा
- 1:19:08कॉन्शस चेतन मन चूकेगा। अभी तो चेतन मन पे आघात करता हूँ
- 1:19:15मैं, तुम फौरन प्रतिकार लेना शुरू कर देते हो बाबा हमने।
- 1:19:20हमारी भावनाओं को तोड़ दिया तुमने हम तो मानते हैं कह दो ना एक बार
- 1:19:25विष्णु जी होते हैं, मैंने कहा मेरे कहने से कहाँ होते हैं भाई?
- 1:19:31विष्णु पुराण होते हैं, वो पढ़ लो जाके विष्णु नहीं होते हैं।
- 1:19:38पहले तो तुम्हारी चेतन की मूड़ताएं ही तुम नहीं तोड़ देने
- 1:19:42पाओगे, यही मुश्किल है। इसे ही कहा बाबा नानक ने सिख बनो,
- 1:19:48शिष्य बनो गुरु तोड़ता है जो भ्रांतियों को उन्हें तोड़ने दो,
- 1:19:53गुरु को अपना काम करने दो। गुरु तुम्हारी भ्रांतियों को
- 1:19:59जोड़ेगा पहले कन्सीस की भ्रांतियों को, चेतन मन की
- 1:20:04भ्रांतियों को और यहाँ तो थोड़ी सी है तुम कहते हो बहुत हैं,
- 1:20:11लेकिन बहुत है नहीं सिर्फ एक जन्म की इसी जन्म की अभी तक की।
- 1:20:20फ्रम बर्थ टु टेल बस इतनी ही स्मृति है चेतन में उसके गहरे में
- 1:20:28जाओगे है चेतन में तो पिछले स्मृतियां भी मिलेंगे।
- 1:20:33इस सारी को क्रॉस करना है। तुम जैसे जैसे उतरे गहरे वैसे
- 1:20:38वैसे वो जगह खाली हुई। तुमने कभी देखा टब के भीतर जब तुम
- 1:20:42बाल्टी को भरने के लिए डुबोते हो तो बाल्टी भरती बाद में है, टब का
- 1:20:50पानी थोड़ा सा बाहर बिखर जाता। है।
- 1:20:53बस ऐसा ही ये अचेतन मन का जो है यह चेतन मन में आ जाता है।
- 1:21:03वो टब थोड़ा सा खाली हो जाता है। अचेतन ऐसा ही खाली होता रहेगा।
- 1:21:09पहले चेतन को खाली करेगा गुरु फिर तुम्हारे सबकॉन्शियस को, अवचेतन
- 1:21:16को, फिर तुम्हारे अनकॉन्शियस को, अचेतन को और फिर गुरु खाली करेगा।
- 1:21:21तुम्हारे सामूहिक अचेतन को कोलेक्टिव अनकॉन्शियस को इतनी
- 1:21:27लंबी यात्रा है लेकिन तुम चाहो। तुम चाहो योग्य हो, मोमुक्षा गहरी
- 1:21:37है, प्यास गहरी है तो तुम सीधे भी क्रॉस कर सकते हो।
- 1:21:41इनको सूचनाएं अपनी जगह पे पड़े रहेंगे, जहाँ है वहीं रहेंगी और
- 1:21:49तुम अचानक से जम्प कर। जाओगे?
- 1:21:52सीधा सीधा चेतन को छोड़ोगे अब ये शब्द बड़े काम के हैं।
- 1:22:00शायद फिर कभी मिले ना मिले, चेतन को छोड़ दो उससे नीचे अब चेतन को
- 1:22:08छोड़ दो। उसके नीचे अचेतन को छोड़ दो, उसके
- 1:22:15नीचे सामूहिक अचेतन को छोड़ दो एक पूरी भरपूर छलांग ले लो।
- 1:22:22भरपूर छलांग लेने के बाद क्या आएगा फिर आएगा सामूहिक चेतन?
- 1:22:29जिससे तुम परम पिता परमात्मा कहते हो, सीधे छलांग तुम ले सकते हो
- 1:22:36यही पद्धति बताई अष्टब करनी आसान बहुत है, लेकिन मुश्किल।
- 1:22:43भी बहुत है। क्योंकि मृत्यु का तूफ़ान ऐसा
- 1:22:47घेरेगा तुम्हें? तुम स्वामी विवेकानंद की तरह बाहर
- 1:22:53घबरा के आ जाओगे, वहाँ मृत्यु हुई, मृत्यु भरी पड़ी है, एक दम
- 1:22:58से छलांग तुम ना ले सकोगे। इसलिए गुरु के ते क्षण धीरे धीरे
- 1:23:05रे मना, धीरे सब कुछ होए माली सीचे सोकड़ा ऋतु आय फल होए इसको
- 1:23:11थोड़ा थोड़ा कछार से सोने सूक्ष्म से पूछा है कि अगर हम सीधे लगा
- 1:23:18सकते हैं छलांग तो फिर इतने? देरी करने की आवश्यकता क्या है?
- 1:23:27बिल्कुल चालान ले सकते हो बिशर्ते कि तुम्हारे में साहस हो मिटने का
- 1:23:34तुम तुम तुम्हारे चेतन अवचेतन अचेतन।
- 1:23:41और। सामूहिक अवचेतन में कमाई गई सारी
- 1:23:46सूचनाओं अनुभवों को मैं समझता हूँ।
- 1:23:52अब ये मैं सारे रूप में बोल रहा हूँ, ये मोरल है फिर समझ लो तुम
- 1:23:57तुम्हारे चेतन कॉन्शस। अव चेतन समकॉन्शियस अचेतन,
- 1:24:04अनकॉन्शियस, सामूहिक अवचेतन कोलेक्टिव अनकॉन्शियस इसको तुम
- 1:24:10मैं समझते हो जाने तुम पंच कोषों को मैं समझते हो दूसरी भाषा में
- 1:24:19बोलूं। यानी तुम इन चक्रों को मैं समझते
- 1:24:24हो, सात चक्रों को मैं समझते हो, जबकि ना तो तुम सात चक्र हो, ना
- 1:24:34तुम पंचकोष हो, ना तुम ये चारों मन हो।
- 1:24:39चेतन अवचेतन, अचेतन, सामूहिक, अचेतन तुम क्या हो तुम सामूहिक
- 1:24:51चेतन हो यू आर कलेक्टिव कान्शस्नस।
- 1:24:59बिल्कुल सीधी छलांग लग सकती है, लेकिन अष्टावक्र जितनी सहज बात
- 1:25:06करते हैं उतनी ही छलांग लेना बड़ी मुश्किल है।
- 1:25:12पात्र देखकर रामकृष्णा ने हाथ रखा था सिर पे।
- 1:25:18इतना मोमक्षु है हर किसी से पूछ लेता है परमात्मा है तुमने देखा
- 1:25:22है मुझे दिखा सकते हो तो यह मोमक्षु है प्यासा है नहीं जाने
- 1:25:30कितने जन्मों से प्यासा है, इसकी प्यास भुजा ही देनी चाहिए।
- 1:25:34और उसने सारी शक्ति को संग्रहित किया और विवेकानंद नरेंद्र थे।
- 1:25:39उस वक्त उसके ऊपर फेंक दिया, हाथ रखा धीरे धीरे शक्ति जा रही है,
- 1:25:45वो भीतर ही भीतर चले जा रहा है। बड़ी मामूली बात है गुरु के लिए 5
- 1:25:51मिनट से 7 मिनट से ज्यादा नहीं। लगता वो।
- 1:25:56बस इतना सा ही वक्त लगता है। इतने वक्त में गीता बोली जाती है।
- 1:26:05वैसे 700 स्लोक हैं। बात 7 मिनट की है, टाइम का अपना
- 1:26:12परिणाम होता है चलने का। तो अस्तबकर कहती हैं, बड़ा असर
- 1:26:18लगा तुम होगी भाई ऑलरेडी यू अरे इन्फनाइट तुम असीम हो।
- 1:26:30हो? लेकिन हो तो वसीम लेकिन ये जो
- 1:26:34कचरा के टाकिया इतने जन्मो में, उसका क्या होगा?
- 1:26:39ये या तो क्रॉस करो भाई या ज़रा ज़रा करके इसको टपकाओ बाहर उदयपुर
- 1:26:44उठ करो छोड़ो। इसको वातावरण में दोनों में से एक
- 1:26:50काम करना होगा। मध्य मार्ग कोई नहीं है।
- 1:26:56या तो तुम थोड़ा थोड़ा करके इसको गलाते रहो एवपोरट होता रहेगा,
- 1:27:03वातावरण में जाता रहेगा। 1 दिन तुम खाली हो जाओ।
- 1:27:06ये तरीका है लेकिन लंबा। तरीका है।
- 1:27:11या फिर गुरु कृपा गुरु कृपा के लिए तुम इतने साहस से भर जाओ बहुत
- 1:27:18से लोग मुझे कहते हैं बाबा अभी गर्दन काट के हाथ में थे तुम?
- 1:27:22मैंने कहा ये ऐसा मसला नहीं है, तुम्हारा साहस गड़बड़ा जाएगा।
- 1:27:28यही तो विवेकानंद भी। जब मृत्यु तुम्हारे सामने खड़ी
- 1:27:35होगी, तुम कब जाओगे ये कहने की बातें और हैं जब वो सामने आएगा तो
- 1:27:41वो बातें कुछ और होंगी। साहसी चाहिए, गुरु को परम साहसी
- 1:27:47इसलिए वर्धमान को? महावीर का खिताब दिया गया।
- 1:27:52महावीर उनका नाम नहीं था, क्योंकि मृत्यु से ज़रा कोई डरे नहीं।
- 1:27:58यहाँ तक कि जीने की इच्छा को भी जो त्याग दिए हैं, उससे बड़ा कोई
- 1:28:03और कौन जो मौत को के तरह गले जब जा?
- 1:28:10मैं भी तरस रहा हूँ आओ मेरे गले से लग जाओ आओ ईद मनाई ऐसा जिगरा
- 1:28:22अगर है तो गुरु भी मिल जाएगा, लेकिन अभी नहीं।
- 1:28:28अभी तो कूड़ा कचरा भरा पड़ा है। अभी तो गट रहा हूँ।
- 1:28:32गंदे नाले हो सडान दो अभी तो हड्डा रोडी दूर दूर तक बदबू आती।
- 1:28:39है। जब कोई मुझे कहता है बाबा गर्दन
- 1:28:42काट के दिल मैं उसके ओरे की तरफ देखता हूँ, न्याय काला ब्लैक मैं
- 1:28:49समझ जाती हूँ ये कहने की बातें हैं।
- 1:28:52लफासी है राजनीति को जैसी ये वो वायदे हैं जो कभी पूरे।
- 1:28:57दिन होते हैं श्री कृष्ण लोगन हरे मुरा।
- 1:29:13हे नाथ नारायण, वासुदेव, श्रीकृष्ण, गोविन्द, हरे मुरारी।
- 1:29:29हे नाथ नारायण वासुदेव हे कृष्ण गोविंद रे मुरारी हे नाथ नारायण
- 1:29:41वासुदेव। पितुवात स्वामी।
- 1:29:47सखा हमार पितमात स्वामी सखा हमार हेनाथ नारायण वसुदेव श्रीकृष्ण ओह
- 1:30:02बिंद हरे मुरारी। धन्यवाद।