Latest / Baba ji Vijay Vats / 14 Jul 25 - अंतस में जाने का सबसे शक्तिशाली सूत्र! अध्यात्म और संसार एक साथ कैसे पाएँ?
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- 0:01बाबा जी प्रणब एक साध है सब सिधय सब साधय सब जाए सब गया।
- 0:20कुछ अन्य गया, एक गया सब जाए इसका रहस्यत्मक अर्थ क्या है?
- 0:35दो तीन प्रश्न और हैं। मैं बहुत प्रसिद्ध होना चाहता
- 0:43हूँ। बाबा बिना प्रसिद्ध हुए मरना नहीं
- 0:50चाहता लीजिए हम मथुरा पे चले। एक जमाने की बात है।
- 1:08आरव नाम का एक व्यक्ति होता था वह जंगल में किसी गुरु के पास।
- 1:19धन और विद्या सीखने के लिए क्या गुरु के चरणों में शीष?
- 1:27न रहे गुरु। ने आने का कारण पूछा।
- 1:38शिष्य बोला गुरुदेव मैं धनविद्या सीखने के लिए आया, गुरु ने पूछा
- 1:49सिर्फ और धन र विद्या? तो आरोप ने कहा नहीं घुसे।
- 2:00मैं धन्यवाद द्याशी के यश पाना चाहता हूँ यश पाकर मैं धन पाना
- 2:09चाहता हूँ धान पाकर। मैं भोग सामग्री पाना चाहता हूँ
- 2:21और धीरे धीरे करके मैं घर बनाना चाहता हूँ, व्यापार करना चाहता
- 2:32हूँ, फिर नगर का सेट हो जाना चाहता हूँ।
- 2:38और अगर वक्त मेरे पर मेहरबान रहा तो मैं संसार का सबसे बड़ा
- 2:45चक्रवर्ती सम्राट होना चाहता हूँ। गुरु हंसा मुक्तसर ने आरव ने
- 3:03पूछा, गुरबे मैंने कुछ गलत कहा? उसने कहा नहीं पूछा?
- 3:17मैं समझ गया तुम क्या चाहते हो, तुम एक नहीं सीखना चाहते, तुम सब
- 3:30पाने के लिए सीखना चाहते हो? दंड भी, यश भी, मान भी, पद भी,
- 3:41सुविधा भी, साधन भी, बल भी, बुद्धि भी सब कुछ पाना चाहती हूँ
- 3:51हाँ भर के। बिल्कुल यही है वहाँ से ये शब्द
- 4:04निकला एक साथ है सब शुद्ध है। सब साथ है सब जाए एक गया सब कुछ
- 4:22गया सब जाए कछु न जाए तो शिष्य ने पूछा करते?
- 4:35ऐसा क्या है जिससे एक के पानी से सब मिल जाता है और ऐसा क्या है कि
- 4:44सब कुछ गुम हो जाए? फिर वह एक गुम नहीं होता?
- 4:51यही अध्यात्म की कला है। संसार की कलाएं तो तुम बहुत सीख
- 4:58सकते हो लेकिन जिसने वो एक कला नहीं सीखी वह सब कुछ सीख के भी
- 5:11अधूरा रह गया। जिसने वो एक गलत सीख।
- 5:17ली है। एक।
- 5:22साथ है सब सब है, उसको सब मिल जाएगा।
- 5:35गुरु द्रोण अपने शिष्यों को सीखा रहे हैं, धनुर्विद्या कौरभी हैं,
- 5:41पांडव भी हैं। आस्तापुर के सभी राजकुमार सभी के
- 5:52हाथ में। धनुष है, वाण है, सभी कष्ट हैं।
- 6:04प्रत्यंचा और गुरु द्रोण पूछते हैं, क्या दिख रहा है?
- 6:10तुम्हें। कोई कहता मुझे वृक्ष दिख रहा है,
- 6:21आसमान भी दिख रहा है, वृक्षों पे लगी हुई फिर तने भी दुख रहे है,
- 6:30पत्ते भी दुख रहे है। फल भी देख रहे हैं तो गरुद्रण
- 6:40कहते तुम छोड़ दो इसको दूसरे को बुला लेते, सभी को बुला लेते।
- 6:53और सभी को कहा गुरुद्रो ने छोड़ दो तुम्हारे बस का काम है।
- 7:05जैसा वृक्ष भी दिखता है, असमान भी दिखता है, ठाणे भी दिखते हैं,
- 7:12चढ़ाएं भी दिखते हैं, पत्ते भी दिखते हैं, हरियाली भी दिखते हैं
- 7:19और फल भी दिखता है। आखिर में अर्जुन राय अर्जुन ने पर
- 7:34चिंता कसे बांध चढ़ाया। प्रिय अर्जुन।
- 7:46तुम्हे क्या दिख रहा है? हमने इस फल को गिराना है?
- 7:55उसने कहा जी कुर्दे तुम्हे क्या दिख रहा है?
- 8:02असमान दिख रहा है नहीं कुर्ता। ये आसमान में उड़ते हुए पंछी दिख
- 8:09रहा। है नहीं क्या?
- 8:14ऊंचा सा पेट दिख रहा है। टहनियां दिख रही हैं, हरे पत्ते
- 8:18दिख रहे नहीं। फिर तुम्हें दिखता रहा है अर्जुन
- 8:36बोलो गुरुदेव मुझे सिर्फ वो फल दिख रहा है जिसके बीचों बीच आपने
- 8:49कहा। जिसके बीचों बीच निशाना साधना है
- 8:57मुझको वह फल का बिलकुल मध्य भाग दिख रहा है।
- 9:07कहो तो वाण छोटु। ग्रोथरों ने कहा बिलकुल छोड़ो
- 9:13पुत्र तुम्हारा निशाना बिलकुल सही लगेगा और अर्जियों ने बांध चला
- 9:21दिया। वह है फल।
- 9:28को क्या उसका तीर बीच में से क्या जो लक्ष्य था उसको क्या दुनिया
- 9:46बाबरी हुई फिरते? मुझसे तरह तरह के प्रश्न पूछ लेती
- 9:53है। मैं उससे पूछता हूँ की तुम ने ही
- 10:04जो प्रश्न पूछने शुरू कर दिए, गीता के श्लोक पूछने शुरू कर
- 10:10दिया। क्या तुम पहले प्रश्न का उत्तर
- 10:15जानते हो? तो साधक मुझसे पूछते हैं बाबा
- 10:22पहला प्रश्न क्या है जो हमें पूछनी चाहिए?
- 10:31मैंने कबूतर पहला प्रश्न यह है जो अध्यात्म के खोजी को पूछना चाहिए
- 10:39कि परमात्मा है, तुमने मूल प्रश्न न पूछा?
- 10:54और तुम आगे का प्रश्न पूछना शुरू उपनिषद के इस लोक की इस सर्दी का
- 11:05अर्थ क्या है? इस शास्त्र के श्लोक का अर्थ क्या
- 11:13है? सारे शास्त्रों के अर्थ परमात्मा
- 11:19के अर्थ अर्थ पूछने से पहले कभी किसी ने यह भी पूछा?
- 11:27कि जिसका अर्थ हम पूछने जा रहे हैं वो है भी।
- 11:40मुझे आज तक किसी व्यक्ति ने ये नहीं पूछा।
- 11:45किसी व्यक्ति ने आज तक नहीं पूछा कि परमात्मा है, ये पूछ लेते हैं
- 11:57क्या हम परमात्मा को देख सकते हैं?
- 11:59क्या आप हमें दिखा सकते हैं? ये दोयम सवाल आ गया प्रथम सवाल
- 12:07नहीं। प्रथम सवाल है कि परमात्मा है भी
- 12:13और यहीं से शुरू होती है यात्रा अध्यात्म की यात्रा का पहला सवाल
- 12:27है कि वह है भी? तुम कहो बिलकुल हमारे शास्त्रों
- 12:32में लिखा गीता में लिखा कुरान में लिखा पुरान में लिखा बाइबल में
- 12:38लिखा गुरु ग्रंथ शास्त्र में लिखा परमात्मा है तो शास्त्रों में
- 12:48लिखे हुए तो कार्यक्ष। और जिसने लिखा उसने देखा होगा
- 13:01जीसको प्यास थी, उसने पिया होगा और जिसने पिया होगा उसकी प्यास
- 13:06बुझी होगी। लेकिन तुमने तो नहीं देखा?
- 13:19शास्त्रों में लिखा है बिल्कुल ठीक है और ऐसा भी तो हो सकता है
- 13:29के लोगों ने गलत शास्त्र लिख दिया हो चारवाक कहता की नहीं है पर।
- 13:35चार वक्त कहता नियम ही नहीं है देर इस नो रिएक्शन ऑफ एनी अक्शॅन
- 13:46यहाँ कर्मफल का भुगतान होता ही नहीं है।
- 13:51क्या करोगे? उसका मार्क्स कोई कमप्रसिद्ध ना
- 13:56था। उसने आंधी दुनिया बाबरी करती है,
- 14:05मार्क्स कहता परमात्मा जी धर्म अफीम का नशा है।
- 14:15बड़े मज़े की बात है। मैं सोचता हूँ ये कुमार की बात है
- 14:24जिसके बारे में सारे शास्त्र पड़े हैं और सारे शास्त्रों को बाच ने
- 14:30की। प्रश्नावली हम करते हैं कि ये
- 14:35बताओ इस कार्स के वह जिसके कारण लिखे गए परमात्मा क्या वो है भी
- 14:52तुम्हारी धरती? लड़खड़ाई गई तुम्हारी नींव
- 14:56हिलेंगी। यो फाउंडेशन लेस हो जाओगे तो
- 15:10थोड़ा सा हम और गहराई में चले। हैं अब इसको।
- 15:16गौर से समझना। शायद किसी शास्त्र में आपको
- 15:21मिलेगा नहीं। प्रत्येक व्यक्ति के अंदर मन
- 15:27होता। है और मन।
- 15:37का? एक आयाम है कि वह सहारा खोजता है,
- 15:54मन सहारा ढूंढ़ता है। यह मन की एक बनियादी कमजोरी है।
- 16:06उस कमजोरी के कारण मन इजाद करता है कि परमात्मा है मुझे तुम्हारे
- 16:16तुम्हें हमारे शब्द नास्तिकों जैसे दिखाई पड़ेंगे।
- 16:21लेकिन ये भी ध्यान रखना जब तक व्यक्तिपूर्ण नास्तिक नहीं होता,
- 16:28नास्तिकता के बाद आस्तिकता की प्रथम पौड़ी शुरू होती है और वह
- 16:39नास्तिकता दिखती नहीं। जैसे इतः विशाल वट वृक्ष तुम्हें
- 16:48दिखाई पड़ता है, लेकिन उसकी गहरी जड़ें पदार्थ को छूएं हैं।
- 16:53यह तुम्हें नहीं दुखती गहरी जड़ों को किसने देखा, जो पाताल तक खड़ी
- 17:01हैं अगर उन जड़ों को काट दिया जाए।
- 17:05सविता, विशाल वाटर ब्रिक्स डैड एरी करके गरजा है।
- 17:13ये खड़ा ही होना अदृश्य रूट्स के कारण है, जड़ों के कारण है।
- 17:23तुम नास्तिक तो कभी होंगे ना तुम सीधे सीधे नास्तिक कभी नहीं होंगे
- 17:33तुमने जन्म लिया और जन्म से ही तुम आस्तिक हो, मेरे पास मुस्लिम
- 17:41आ जाती हैं। मैंने कहा तुम मुस्लिम कैसे हो?
- 17:46हमारा खत्म हुआ है। परमात्मा ने तो खत्म करके नहीं
- 17:51भेजा कि परमात्मा ने खत्म करके भेजा।
- 17:55न सीख। खा जाते हैं।
- 17:59तुम सीख कैसे हो। ये देखो पूरे केस रखे हुए हैं तो
- 18:04परमात्मा ने तो उसने केस देके नहीं भेजा।
- 18:09परमात्मा ने तो क्री प्री बंजा सिर जगह भेजा, तुम सभी कोई न कोई
- 18:16निशानियाँ रख लेते हो धर्मों की। और याद रखना, यह मानव की उपज है
- 18:31तुमने प्रतीक खोजें हैं केस देखो तो समझ लेना सिख धर्म का निवाई है
- 18:38चुटिया देखो तो समझ लेना हिंदू धर्म का।
- 18:43क्रॉस देखो तो समझ लेना ईशा का और खतना और मुझे ना हो दाढ़ी हो तो
- 18:57समझ लेना या मुसलमान है लेकिन परमात्मा को।
- 19:03परमात्मा ने सभी को यकसा पैदा किया।
- 19:10उसने भेद नहीं रखा होगा। ये भेद तुमने बना दिया सारे किसी
- 19:17का धर्मग्रंथ गीता हो जाता है, किसी का धर्मग्रंथ कुरान, किसी का
- 19:22बाइबल। किसी का गुरुग्रंथ साहब और जैसे
- 19:30जैसे धर्म बढ़ते जाएंगे, सभी के धर्मग्रंथ अलग होते जाएंगे।
- 19:41किसने बनाये? ये तुमने अपना है, मैं कहानी सुना
- 19:55रहा था। ऐसे ही गया है गुरु के पास फिर
- 20:05तुम सब कुछ पाना चाहते हो। हाँ।
- 20:09मैं सब कुछ पाना चाहता हूँ कृति जब हम जीवन में।
- 20:16कोई एक लक्ष्य चुनते हो, वह ईश्वर की प्राप्ति हो, आत्मज्ञान की
- 20:22प्राप्ति हो, किसी कला को सीखना हो या कोई उद्देश्य साधना हो और
- 20:30उसी में मन, वचन और कर्म को हम लगा देते हैं।
- 20:39सभी तरफ हमारा मन दौड़ता है, आत्मज्ञान भी पाना है, परमात्मा
- 20:46ज्ञान भी पाना है, कला भी पानी है, धन भी उपार्जन करना है।
- 20:55प्रसिद्धि भी चाहिए हमें संसार की सभी चीजें एकसाचन तो तुम्हारा
- 21:05लक्ष्य एक नहीं हुआ है तुम्हारी शक्ति?
- 21:13डिवाइड हो जाते बहुत सी दिशाओं में विस्तृत हो जाते और याद रखना
- 21:21तुम लक्ष्य को सूख जाओगे ये दृष्ट को देखा आसमान आसमान में उड़ते थे
- 21:30पंच। हरा भरा वृक्ष दिखा, तने दिखे,
- 21:37हरे पत्ते दिखे और फल भी दिखा। कुरुद्र ने कहा छोड़ दो नहीं सर
- 21:51देखा। मैं भी तुम्हें कहता हूँ, एक एक
- 21:57करके अपनी मंजिल को तय करना है अगर तुम ये कहते हो कि इज्जत भी
- 22:11मिल जाए। धन भी मिल जाए, पदार्थ भी मिल
- 22:16जाए, परमात्मा भी मिल जाए तो तुम गलत रास्ते पर हो।
- 22:26जिसने भी खोजा उनके जिंदगानियों को देखो।
- 22:34वो कर्मवार चले स्टेप ब्य स्टेप बुध ने खोजा लेकिन खोजने से पहले
- 22:43उन्होंने भोका एक पड़ाव को पार करके।
- 22:52तुम्हारे भोगना भी बाकी है। भोग कर वह भोगों को छोड़ने के
- 23:05योग्य हो गए। चले गए।
- 23:09फिर अध्यात्म साथ गुरुओं के पास गए।
- 23:14अलग अलग तकनीकें सब ने बताई। कोई रास न व्रत भी रख के देख लिए
- 23:25शरीर दुबला पतला कृष्ण तनु काला शरीर पड़ गया बड़े सुंदर थे बुध।
- 23:35कृष्ण भरण हो गया, उनका श्री नैला पड़ गया।
- 23:42यहाँ भी तो दुविधा हो सकती है तुम्हें गलत मार्ग मिल जाए, उपवास
- 23:51करो। या ज्यादा खाओ।
- 23:56दोनों एक ही बातें हैं अति सर्वत्र वर्जेत, ज्यादा खाओगे
- 24:05होवि का रथ और बिल्कुल नहीं खाओगे होवि का रथ?
- 24:11युक्ताहार विहार से इतखाओ जिससे शरीर भी सुनता रहे और तुम्हारा
- 24:21लक्ष्य भी बंद जाए तो बुद्ध ने 49 व्रत किया।
- 24:30है शरीर। दुर्बल हो गया शरीर तो एक मशीनरी
- 24:33है। ईंधन न डालोगे तो वह ठहर जाएगा।
- 24:43उस दिन उनको ज्ञान हुआ। 49 दिन का वो व्रत और उससे पहले
- 24:52की साधनाएं। बेकार से दो निरंजना नदी के
- 25:01किनारे पे खड़े प्यास लगी थी, अपना भिक्षा पत्र भरने गए थे।
- 25:13भिक्षापत्र भर दिया, लेकिन इतनी जान नहीं थी शरीर में कि वह उन
- 25:23पड़ावों को पार करके जमीन पर आ जाते हैं।
- 25:29शरीर कांपने लग गया। पास ही के गांव की कुछ स्त्रियां
- 25:42पनघट पर पानी भरने को जा रही थीं। पहले ऐसा ही होता था पनघट पर पानी
- 25:52भरने के लिए स्थिर नहीं जाती सामूहिक रूप से।
- 25:562233 टोकनी पात्र रख लेते हैं और गीत गुणगुनाती जाती है तो गीत गा
- 26:06रही थी, जिसका अर्थ था वीणा के तारों को इतना मत कसो कि वो टुक
- 26:15जाए। और इतने ढीले भी मत छोड़ो कि
- 26:21स्वर्ग ही न निकले। यद्यपि ये गीत बुद्ध के लिए नहीं
- 26:28था लेकिन बुद्ध के लिए काम कर गया।
- 26:35वीणा के तारों को इतना मत कसो कि वो टूट जाये, लिख लो इसको पर इतना
- 26:43ढीले भी मत छोड़ो के स्वर ही ना सब थे उस से फैसला किया।
- 26:57कि जो आएगा मैं खर उसी साँझ एक युवती सुजाता नाम की युक्ति ने
- 27:08कोई मन्नत मांगे थे मेरे पुत्र हो जाए वृक्ष देवता।
- 27:17मैं तुम्हारे अर्पण कुछ मन्नत की क्षीर बहुजनम यह प्रदान करूँ।
- 27:27मैं कुछ पकवान लेके आ गए, वो तो भूखे थे 49 दिनों से।
- 27:38और सुजाता बड़ी प्रश्न थे। सुजाता के पुत्र हो गया था अपनी
- 27:47मन्नत लेने आई, उसने देखा आज मेरी मन्नत को ग्रहण करने के लिए।
- 27:54यह वृक्ष देवता स्वयं ही आये बैठे हैं।
- 27:57बडी श्रद्धा से उन्होंने कहा लो प्रभु खाओ, भोग लगाओ, बुद्ध भूखे
- 28:07थे, उनके आस्तीनों के चिट्टघर गए, सर अम्बाल।
- 28:16शरीर में जान आई, रौणक आई और ज्ञान हुआ ज्ञान का हुआ भूखे भजन
- 28:26न होय गोपाल उपवास से वो नहीं मिलता।
- 28:40अधिक मात्रा में अगर दुगणा तिगणा चौगुणा खा जाओगे तो उससे भी नहीं
- 28:45मिलता। आलस से तो कृष्ण कहते हैं युक्त
- 28:53आहार विहार। इतना खाओ जितनी शरीर को आवश्यक
- 28:59होता है और उस रात 49 दिन के भूखे आज पेट भरा था, निद्रा बड़ी सघन
- 29:12आई। भूखे आदमी को नींद भी तो नहीं आती
- 29:21और नींद का बड़ा लगाव है। आत्मा गैंग के साथ इतने फ्रेश हो
- 29:29गए। सुबह तक सारा खाना पच गया।
- 29:35उर्जा में परिवर्तित हो गया। खुश में जाति में उठे सुबह और भोर
- 29:42का तारा देखा डूब रहा था। देखते हैं ज्ञान हो गया।
- 29:56विज्ञान ही परमात्मा का ज्ञान था। यहीं से शुरू होती है यात्रा।
- 30:07ज्ञान था हू आर यू आत्मज्ञान, तुम हो कौन?
- 30:16ये पहला पड़ाव है। तुम पहले पड़ावों को तय नहीं
- 30:21करते। ये बिलकुल ऐसे है जैसे तुमने वार
- 30:26ना मारा, ना सीखे हो, अल्फाबेट ना सीखा हो काका ना सीखा हो।
- 30:32एबीसी न सीखी हो और सीबीपीएचडी की किताबें पढ़नी शुरू कर दो।
- 30:38उद्देश्य चाहे कितने भी हो, एक तीर्थ से सारे उद्देश्य हल हो
- 30:46जाते हैं। एक साथ है, सबसे ज्यादा है।
- 30:51कौन सा तीर है वो जिससे सब निशाने शब्द जाते हैं?
- 31:06लक्ष्य में अपने आपको समाहित कर देना है।
- 31:11इस शब्द को अच्छे से सुन लो। लक्ष्य में अपने आपको समाहित कर
- 31:18देना बड़ा अनूठा शब्द है। मैं कहता हूँ तुम कुछ भी करो, कुछ
- 31:28भी करो। उस करने में स्वयं को पूरन झोंक
- 31:35दो तो तुम्हें वो एक मिलेगा। इसके साधने से सब सज जाता है।
- 31:52लेकिन दुर्भाग्य तो ये कि तुमने कभी भी किसी काम को 100% प्रज्ञा
- 32:00से किया 100% तुम झोंके नहीं बीच में झोंके नहीं गए, बचे रह गए यही
- 32:09कमी। और कितना भी कोई बोल ले, कितना भी
- 32:15कोई संत बोले इसके बिना बात नहीं बनने की तुम पढ़ाई कर रहे हो अगर
- 32:26पढ़ाई भी पूरा कर लो। लक्ष्य को बेंत लो और तुम्हें
- 32:33शायद ये बात बताना है। लक्ष्य का बेंत जाना उस आँख की
- 32:41भाँति है जैसे तुमने देखा कॉन्वेक्स रेंज होता है।
- 32:46हम सूरज के सामने कर लेते हैं। वो करने एकाग्र हो जाती है।
- 32:54क्या होता है जहाँ पर एकाग्र की वो करने पेपर जल जाता है?
- 33:06ऐसा ही तुम्हारा अहंकार जल जाएगा। ये कला आनी चाहिए तुम्हें ये कला
- 33:11ही नहीं आयी तुम्हें जीस दिन ये करा, तुमने साथ ली सूरज के करने
- 33:21सब जगह है परमात्मा की सब जगह है सूरज के किरणों को।
- 33:29एकाग्र करने का ढंग है कन्डेन्स करने का ढंग है, वो है उत्तर लेंस
- 33:36कॉन्वेक्स लेंस सूरज की किरणों को गुज़रने दो उसके बीच में से।
- 33:48और बिल्कुल एक बिंदु बना लो। पेपर के ऊपर पेपर को आग लग जाएगी।
- 33:57जैसे ही तुम अपनी सारी शक्ति को कन्डेन्स कर लेते हो।
- 34:06आग लग जाती है तुम्हारे अहंकार को ये एक तरीका था, मूर्ख लोगों ने
- 34:19इसको रंगत पुत। मैं कहता हूँ तुम कुछ भी कर लो,
- 34:27राम राम कर लो, प्राधरता कर लो, लेकिन उसमें सारी शक्ति झोंककर
- 34:39करम ही बचे। और कुछ न बचे करता, न बचे, कर्म
- 34:53ही बचे बस लक्ष्य सत गया। और बड़े मज़े की बात है।
- 35:05सब साथ जाता है, लेकिन ये नहीं सुनता।
- 35:11बहुत बार तुमने 99 डिग्री के ऊपर पानी गर्म करके छोड़ दिया।
- 35:21बहुत बार तुमने 306090 के ऊपर पानी को छोड़ दिया नहीं उबला तुम
- 35:30दिशा दिशा ही न हो। बस अभी तो थोड़ा सा मुकाम बाकी
- 35:37था। 99 से अगर सो जाते, जो सद जाता वह
- 35:44एक जिसके सदने से सब सद जाता है और अगर तुम सब साधने में लग गए तो
- 35:55सूर्य का प्रकाश सभी जगह है। कहीं कोई आग नहीं लगी।
- 36:01आग लग सकती थी अगर तुम उसको कन्डेन्स कर देते।
- 36:08कोई भी विधि काम कर सकती है, कोई भी विधि काम कर सकती है, बशर्ते
- 36:15का वो तुम्हें गला दे। बस एक ही शर्त।
- 36:21करता मिट जाए, करने वाला मिट जाए, कर्म ही रहे हाँ इसको सर करने
- 36:35वाला मिट जाए। गर्म ही बचे।
- 36:41अगर तुम इस शब्द को समझ गए तो तुमने अध्यात्म का राज़ समझ लिया,
- 36:45अध्यात्म का ही नहीं, संसार का भी राज़ समझ लिया संसार और अध्यात्म
- 36:52दोष की जने। बिल्कुल उसी तरीके से अध्यात्म
- 36:57पाया जाता है और बिल्कुल उसी तरीके से संसार पाया जाता है।
- 37:01या तो मैं आज एक कहानी बदाके मैंने सारे वाण चला दिए, तुम कुछ
- 37:11भी पाना चाहते हो? इन्सर्ट योरसेल्फ कंप्लीटली इन इन
- 37:26कर्मा इन्सर्ट योरसेल्फ कंप्लीटली कंप्लीटली इन कर्मा इन एक्शन?
- 37:40उस क्रम में जब तुम अपनी पूरी शक्ति को निहित कर दोगे तो करता
- 37:48नवाजा ये तुमने अभी तक किया, नहीं तो तुम्हें इसका।
- 37:56यकीन भी नहीं होगा पर इसका इलम भी नहीं है।
- 38:01ज़रा इसे आजमा के देखो, कर लो कर लो कोई बात नहीं लेकिन अगर तुम
- 38:10चुप भी हो गए और आधे अधूरे चुप हो गए फिर भी ना मिलेगा।
- 38:17बाबा कहते हैं चुप है चुप न हो गई यह लाए रहा लिवतार तुम्हारे औंठ
- 38:28खामोश रहे और तुम्हारा मन बोलता रहा।
- 38:36तो फिर चुप भी तुम्हारा नहीं, सदा तुम्हारे शब्द भी नहीं सधते और
- 38:44तुम्हारा चुप भी नहीं सधते। तुमने एक कला सीखी है?
- 39:00वह कला थी, अपने आप को झोंककर पूरा स्वयं का मत जाना, जैसे
- 39:10परवाना क्षमा में विलीन हो जाता है।
- 39:12और खुद का वजूद खो देता है तो मुझे करती क्यों नहीं?
- 39:18क्योंकि डरता हूँ मैंने कहा मन का एक स्वभाव है वह अकेला नहीं रह
- 39:28सकता ये मन का स्वभाव। इसलिए वो ढूंढता है भीड़ भड़क्का
- 39:40अनुयायी फॉलोवर्स। शिष्य तो?
- 39:49उसके अहंकार को रखता है। मैं खुश।
- 39:53हूँ लेकिन। परमात्मा की राह बड़ी अनोखी है,
- 40:02सरल भी है और अनोखी भी है। परमात्मा भीड़ से नहीं मिलता।
- 40:10तुम्हारी सारी दुनिया फॉलोअर हो जाए पर महत्त्व नहीं मिलेगा।
- 40:16मन की एक आदत है, शक्ति को खोजना कोई अवलंबन मिल जाए, कोई सहारा
- 40:23मिल जाए, वह सहारा धन का हो, पदवी कहो।
- 40:30शौर्य का हो, बल का हो, श्रेय का हो, कीर्तिका कोई सहारा मिल जाए
- 40:39जिससे सहारे को पकड़ के तुम कहते हो कि हम संसार में जी लें।
- 40:48लेकिन परमात्मा का रहा तुमसे कहता है कि तुम सारे सहारों को छोड़
- 40:57दो, तुम मेरा विलंब हो जाओ। जीतने भी सहारे हैं तुम्हारे छोड़
- 41:07दो, मन से छोड़ दो बारिश या ना छोड़ दो कोई बात नहीं।
- 41:13इसे ही वैराग्य की स्थिति कहते हैं।
- 41:18इसे ही निर्लिप्त भाव कहते हैं। देखें परमात्मा।
- 41:26सभी कुछ बनाता है सभी कुछ बना के भी नर लिप्त है उसमें लिप्त नहीं
- 41:32होता बस ऐसे ही तुम हो जाओ तुमने जो कमाया अब बांटने की आवश्यकता
- 41:40नहीं उसको वैसा ही रहने को। तो मैं क्या कहता है बाहर पड़े
- 41:46रहेगा जब तुम सो जाते हो रात को तो तुम्हारे द्रव्य आभूषण
- 41:54तुम्हारे मकान, दुकान के रजिस्टर, जमीनों के रजिस्टर तुम्हारे सगे
- 41:59संबंधि कहाँ जाते हैं? क्या तुम्हे छोड़ जाते हैं?
- 42:05नहीं तुम। उनको छोड़ देते हो।
- 42:11तुम कहीं ऐसे स्थान पर निकल जाते हो जहाँ तुम्हारा कोई सगा नहीं
- 42:16होता। कोई समझ में नहीं होता जहाँ तुम
- 42:19किसी चीज़ के मालिक नहीं होते। जहा तुम्हारे सामने कोई रजिस्ट्री
- 42:25नहीं पड़ी होती, जहा कोई मित्र, बंधु, सहारा, कोई पुत्र, पौत्र
- 42:34आदि स्त्री परिवार कुछ। नहीं होता तुम।
- 42:38नितांत अकेले होते। वह तल परमात्मा का है और प्रकृति
- 42:47तुम्हें ये पाठ रोज़ पढ़ाती है। फ्रम दी वेरी बिगिनिंग ऑफ़ युअर
- 42:54लाइफ तुम्हारी जिंदगी की बहुत शुरुआत में तुम्हें?
- 42:59ये सबक सिखाती है तुम उस अंतः में चले जाओ जीस अंतः में तुम घोर
- 43:07निद्रा में चले गए थे। उस कला को सीखने का तरीका क्या
- 43:13है? ुरुद्रो ने बताया अर्जुन को अर्जन क्या
- 43:22दिख रहा है, आज समान दिख रहा है। नहीं ये।
- 43:29वृक्ष दिख रहा है, नहीं गुजर ये पेड़ पत्ते ये शाखाएं।
- 43:37ये दिख रहे हैं नहीं ये फल दिख रहा है दिख रहा है तो इस फल के
- 43:48बिलकुल मध्य भाग में निशाना लगाना है।
- 43:55जब हमारा मन सभी तरफ से अपनी शक्ति को खींच के एक लक्ष्य को
- 44:04स्थापित कर देगा, जैसे हमने कॉन्वेक्स लंच के द्वारा सूरज के
- 44:11किरणों को सब जगह से इकट्ठा कर के।
- 44:15एक बिन्दु में डाल दिया तो आग लग जाएगी।
- 44:20हाँ इसको सर्किल में दे दो सर्किल में तो बहुत सी चीजें आपने दिखीं,
- 44:28लेकिन मुझे लगता है काम नहीं पड़ी।
- 44:32सभी चीजों में बात एक ही। कि कैसे तुम विदा हो जाओ तुम और
- 44:43देखिए तुम जो हो वास्तव में वो कभी फना नहीं हो सकते तो तुम
- 44:52निश्चिंत हो के फना हो जाओ। जो जाली जाली मैं होगा जो नकली
- 44:58नकली मैं होगा जो तुम्हारा कृत्र मैं होगा जो तुम्हारा बनाया हुआ
- 45:03मैन मेड मैं होगा वह जल जाएगा, क्योंकि वह असली नहीं है वह नकली
- 45:11तो फिर बचेगा असली में। असली में जहाँ जाके कृष्ण कहते
- 45:17हैं कि मैं ही जहाँ जाके ऋषि कहता है अहम ब्रह्मास्मय एको ब्रह्मा
- 45:26द्वितीय नास्तय जहाँ जाके बाबा बोलते हैं ए कंकार।
- 45:33यहाँ जाकर मोहम्मद बोलते हैं, नबी बोलते हैं, कोई नहीं है पूज्य
- 45:48नहीं लोग क्या? इलल्लाह एक ईश्वर के अलावा कोई
- 45:55पूज नहीं योगना ल इलल्लाह मोहम्मद और रसूलल्लाह और ईश्वर का नबी।
- 46:09मैं सेंजर है संदेशवाहक है कौन? मोहम्मद सललाहू आलाहै वसरीला बहुत
- 46:29से लोग भड़क जाते हैं। अगर भड़कोगे तो कुछ नहीं, क्योंकि
- 46:37भड़कने का सीधा सा मतलब अभी द्वयत बाकी है जीसको आग लगी, वह नकली था
- 46:47असली में को कभी आग नहीं लगती। इन शब्दों को ध्यान से सुनाएं।
- 46:55मेरे कलमा के पढ़ने से जीसको आग लगी, वो नकली वो झुलस गया और नकली
- 47:02में झुलसे ही जाते हैं, नकली में को झूल से ही जाना चाहिए।
- 47:11लेकिन असली में नैनम छिद्दन्ती शस्त्रण उसको कोई शस्त्र नहीं
- 47:18काटता। नैनम दास्ती बाबा कहा उसको आग
- 47:22नहीं जला सकता, कोई तूफान नहीं, उसको उड़ा सकता।
- 47:26और कोई बाढ़ नहीं उसको बहा सकते। हैं वह अदर।
- 47:33है। वह अमरा है तो मेरी कलमा बोलने से
- 47:38कुछ लोगों को परेशानी है क्योंकि मैं जानता हूँ परेशानी क्यों हुई।
- 47:48क्योंकि उनके मन में जो है तुम अगर ये कहते हो कि मेरा गुरु बड़ा
- 47:57तुम्हारा गुरु छोटा तो तुम गुरु की मेहमान नहीं कर रहे समझना बात
- 48:02को। अगर तुम कहते हो मेरा गुरु बड़ा
- 48:07है, तुम्हारा गुरु छोटा है तो तुम गुरु की महिमा को नहीं व्याख्यात
- 48:14कर रहे हो। तुम अपने अहंकार की महिमा को
- 48:17व्याख्यात कर रहे हो कि मैं कोई एरे गहरे का शिष्य नहीं हूँ।
- 48:22मेरा गुरु बड़ा महान है, सबसे ज्यादा महान मेरा गुरु भाई यह
- 48:27अहंकार की निशानी और तुम इनको शब्द अलग अलग देके शब्दों में ढक
- 48:37लेते हो। लेकिन है जी अहंकार्य द्वैत अगर
- 48:47बता रहे हो तो फिर तुम्हें मुसीबत आएगी, हिंदू को, मुसलमान से या
- 48:54मुसलमान को हिंदू से? इसाई को हिंदू से आएगी हिंदू को
- 49:01इसाई? इससे बस बनियाद में एक ही चीज़ है
- 49:07कि वेद बना हुआ है। अगर वेद मिट जाए, अगर जड़ कट जाए
- 49:15तो पेड़ भी ना बचेगा। पेड़ भी धराशायी हो जाएगा।
- 49:20गिर पड़ेगा ज़मीन पे जब तक भेद है तब तक ये पागलपन है तुम्हारा और
- 49:29जब तक भेद है तब तक तुम समझदार नहीं हो सकते।
- 49:34कबीर कहते है, सब्य से न एक मत। मूर्ख अपनों अपने जब तक भेद है वह
- 49:43मूर्ख और जब व्यक्ति स्याना हो गया तो उसका भेद मिट गया।
- 49:54एक साथ है सबसे क्या है ऐसा? जीसको साधने से सब सद ही आता है।
- 50:03सब साधें सब जाय और सभी कुछ भी साध लो और वो एक ना सधे।
- 50:15तो तुम्हारा सब साधना बेकार हो गया, तुमने धन कमाया, पदवी कमाई,
- 50:21शोहरत। कमाई लेकिन।
- 50:32खाली हाथ का। है संत।
- 50:36भी कमाता है। संत खोया हुआ कमाता है या यूं
- 50:44कहलों के पाता है या यूं कहलों के उसे याद आ जाता है।
- 50:49शब्दों का हेर फेर संत कमाता है आनंद को।
- 50:57और आज संतत्व के नाम पर दुखी चेहरे मेकअप करके बैठा उनके मित्र
- 51:07पीड़ा है, दिखाना नहीं चाहते हैं। उनके वितर नासूर हैं।
- 51:15दिखाना नहीं चाहते, क्योंकि नासूर के भीतर बदबू है, जिसका ये नासूर
- 51:29हट गया। बेहद सवस्थ हो गया और सवस्थ होने
- 51:38का एक लक्षण है। क्या लक्षण है?
- 51:42सवस्थ होने का लक्षण है कि जब तुम अपने आप के बोध हो पाओगे तब
- 51:55तुम्हें कोई दुख नहीं गिरेगा तब तुम्हें कोई दर्द नहीं होगा,
- 52:02तुम्हें कोई दर्द नहीं होगा। दर्द होगा शरीर को और तुम शरीर को
- 52:08दर्द को साक्षी हो आग लगेंगी शरीर को तुम उसे लगे शरीर की आग के
- 52:20साक्षी हो जाओगे, अभाव होगा, शरीर होगा।
- 52:26और तुम उस शरीर के अभाव के साक्षी होगे।
- 52:31तुम ये नहीं कहोगे, मैं गरीब हूँ, तुम कहोगे यह ढांचा गरीब है।
- 52:38राम ऐसा ही बोलते थे। स्वामीराम।
- 52:43विदेशों में चले गए। कहते राम को रात को ठंडी बहुत
- 52:46लगी, सर्दी ज्यादा थी, कंबल था नहीं, सर्दी बहुत लगी राम को।
- 53:02उन्होंने अपने आपको जुदा देख लिया था।
- 53:05शरीर से जुदा देख लिया जिसे तुम राम कहते हो, राम भूखा है, इसे
- 53:13खाने को दो, कुछ सब बदल जाएगा, एक के बदलने से सब बदल जाएगा।
- 53:29फिर तुम्हारी जरूरतें तो होंगी, लेकिन जरूरतें कितनी होती है?
- 53:34आदमी की ज़रा सोच के बताना आदमी की जरूरतें कितनी होती है?
- 53:47थोड़ा सा खाना हो शरीर ढांपने को वस्त्र हो, रैंडम को छोटी सी
- 53:53कुटिया, बस यही जो जरूरत है लेकिन वासना की जरूरत अपूर्वत होती है।
- 54:05कितना बड़ा बंगला बना लो? पड़ोसी ने थोड़ा ऊंचा बंगला डाल
- 54:12लिया। तुम्हारा बंगला छोटा पड़ जाएगा,
- 54:18बस सुनाओ की जरूरत अपूर्त पूरी नहीं होती।
- 54:25शरीर की जरूरत पूरी हो जाती है। वासना की जरूरत अधूरी रह जाती है
- 54:35और जब तक तुम वासनाओं की जरूरतों को पूरा करते रहोगे, तुम अधूरे
- 54:40रहोगे यानी दुखी रहोगे। यही बुद्ध कहते हैं, जीवन दुख है,
- 54:49संसार दुख है और दूसरा शब्द उन्होंने कहा कि दुख का कारण है
- 54:59दुख का कारण क्या है? अज्ञान, अज्ञान का अर्थ स्वयं को
- 55:03नाच। और दुख को मिटाया जा सकता है।
- 55:11दुख है संसार और इस दुख का कारण है अविद्या और इस अविद्या को
- 55:19मिटाया जा सकता है। और अविद्या के मिटने से सत्य का
- 55:26दर्शन होता है तो फिर दुख नहीं रहे दुख नास्य सुख सह।
- 55:42बुद्ध कहते हैं दुःख नाश् जाता है, भाग जाता है, दौड़ जाता है,
- 55:48सुख समाहित हो जाता है। अगर तुमने एक व्रम तोड़ दिया तो,
- 55:54लेकिन तुम्हारे दो हज़ारों भ्रम है, लाखों भ्रम है, तुम्हें तो
- 55:58पता ही नहीं। कि तुम ब्रह्मों का ही पुंज हो,
- 56:03तुम एक ऐसा दागा हो जो चरखड़ी के ऊपर नहीं चढ़ा हुआ हो, जो एक
- 56:10गुंजनों की तरह उलझा हुआ है, ऐसा तुम हो ऐसा तुम्हारा मन।
- 56:24कैसे हल हो गया? इस सामान का चरखड़ी बछड़ा हुआ।
- 56:32जो धागा है वो पतंग को आसमान तक ले जा सकता है।
- 56:37लेकिन तुम्हारा ऊर्जा हुआ, ये दागे का पूंज यह तो खुद ही उलझन
- 56:43है, नहीं तो तुम्हें उलझा देगा तुम लाख कोशिश करोगे इसको सॉल्व
- 56:49करने की लेकिन उलझता ही चला जाएगा।
- 56:57एक साधा सब साधा सब साधा सब जन अगर तुम सब को साधने की चेष्टा
- 57:02करोगे तो फिर एक भी नहीं सदेगा तुमने ठीक प्रश्न पूछा, एक को
- 57:12साधना वह एक को नहीं। जो तुम्हारा लक्ष्य है वो एक है।
- 57:21अगर तुम पढ़ाई करते हो तो पढ़ाई को ही करो, मुश्किल तो पैदा होती
- 57:26है जब तुम पढ़ाई करते हो और पढ़ाई करते करते तुम्हारा मन ललचा जाता
- 57:33है कि परमात्मा की भी खोज कर ले। यहाँ तुम बाई डाइमेंशनल हुए फिर
- 57:41तुम मल्टीडायमेंशनल हो जाते हो खोजना है एक को खोजो पहले जीवन की
- 57:54नैया को। अपने पांव पे स्टैंड कर लो, पढ़ाई
- 58:00करो कोई गुण हासिल करो कोई कला कोई हुनर फिर बड़े हो जाओ फिर उस
- 58:11हुनर का इस्तेमाल करके। सब कमाऊ जो तुम्हारी जरूरत है फिर
- 58:17तुम वृद्ध हो जाओगे, बच्चे हो जाएंगे तो बच्चों की शादी हो
- 58:22जाएगी और आखिर में आखिर में तुम इतने वृक्ष हो जाओ कि तुम्हें
- 58:29संसार व्यर्थ नजर आए। कहीं से भी शुरू करो, कला सीख
- 58:37जाओगे की कला कौन सी है? सभी तरफ से अपनी शक्तियां को
- 58:49एकत्रित करके एक स्थान पर केंद्रित कर ये कला है अगर ये कला
- 58:58तुम सीख गए बहुत से लोग करते हैं। रोज़ मेरे पास ऐसे कमेंट आते हैं।
- 59:06बाबा सिर दर्द करने लग गया। अब तो चक्कर आते हैं, इससे
- 59:11क्वेश्चन लो शक्ति बाहर तुम्हारी बिखरी पड़ी है।
- 59:21और तुम इस शक्ति को त्राटक करने में तीसरे नेत्र को जागृत करने
- 59:25में कार्य हो, जबकि तुमने शक्ति बाहर बहुत सी चीजों में अभी भी
- 59:31इन्वेस्ट कर रखी है। तुम पढ़ते भी हो तुम धन भी कमाते
- 59:36हो। तुम श्रेय भी लेना चाहते हो तुम
- 59:41नाम भी कमाना चाहते हो, तुम बहुत कुछ लक्ष्य लिए करते हो और उन
- 59:49लक्ष्यों के अंदर भी तुमने शक्तियां इन्वेस्ट कर रखी हैं और
- 59:56एक यह भी तुमने लक्ष्य बना लिया। कि तीसरा नेत्र जागृत करना है।
- 1:00:02नहीं हो सकेगा क्यों की? तुम्हारे लक्ष्य ही बहुत हैं।
- 1:00:13जीतने ज्यादा लक्ष्य होंगे, निशाना छूट जाएगा।
- 1:00:20मैं क्यों कहा? सभी तरफ से बाहर की सिद्दियों को
- 1:00:23खींच लो। कच्छप अवतार की तरह जैसे कछुआ
- 1:00:30बाहर से सभी अंगों को समेट लेता है।
- 1:00:33तुमने बाहर से अपनी सिद्धि को समेटा तो है नहीं।
- 1:00:38वरुण तुमने एक और लक्ष्य की तरफ अपनी शक्ति को लगाना शुरू कर
- 1:00:42दिया, ऐसा ही हो रहा है। आज तुमने अपनी शक्ति को बाहर से
- 1:00:49खेचन शक्ति अभी बाहर चहुं दिशाओं में घूम रही है।
- 1:00:57और तुम अंकार का जाप कर। ठाकुर, तुम सर ना?
- 1:01:16आयो ठाकुर तुम सरनाई आयो। उतर गयो मेरे मन का संसा उतर गयो
- 1:01:46मेरे मन का संसा। उतर गए हों मेरे मन का संसार, जब
- 1:02:05दे दर क्षण बायो। ठाकुर तुम शरनाई आया ठाकुर, तुम
- 1:02:27शरनाई आया? दुख?
- 1:02:35नाट है सुख सहज समा, दुःख नाट है सुख सहज समा।
- 1:02:52दुःख नाट है, सुख सहज समाय, सहज समाय, दुख नाट है।
- 1:03:12सुख। सहज समाय सहज समाय सहज समाय
- 1:03:26दुःखनाथ हैं। सुख सहज समान दुख, नाट है सुख सहज
- 1:03:41समान आनंद आनंद। गुण गाय हो ठाकुर तुम सर नाई आय
- 1:03:59ठाकुर तुम सर नाई आन? कह।
- 1:04:13नानक गुरु बंधन काट कह नानक गुरु। बंधन खाते कह नानक गुरु बंधन
- 1:04:41खाते। बंधन काट कहनक, गुरु बंधन काट।
- 1:05:01बिछुरत आ में मिलायो। बिछुरत।
- 1:05:10आ में मिलायो ठाकुर तुम सर नाई। आयो ठाकुर तुम सर नहीं आयो, उतर
- 1:05:32गयो मेरे मन का शमशा। उतर गयो हो मेरे मन का संसार जब
- 1:05:55चंबल। तुम सरनाई आयो ठाकुर तुम सरनाई ह।