Latest / Baba ji Vijay Vats / 10 Jun 25 - झेन फकीरों की रहस्यमयी सज़ा | विवेक क्या है | Evolution of Consciousness | Must Watch |
Transcript
- 0:01प्रभु प्रसाद ज़ीन फकीर सजा देते थे जब ज़ीन फकीर के पास कोई
- 0:19कर्मात्मक विषय में। उसे कोई काम कहते है?
- 0:33तू ऐसे कर, तू बर्तन मांज तू रसोई का काम कर तू झाड़ू पोछा।
- 0:45और अगर कोई गलत चलता तो सजा देते थे।
- 0:51पहले के टीचर भी ऐसे ही किया करते थे।
- 0:58आज जैन फकीर नहीं रहे। पहले वाले टीचर भी नहीं थे।
- 1:08बाबा यह कैसी नियमावली थी जैन फकीरों की या परमात्मा तक पहुंचने
- 1:17की? यह कैसी अनूठी कला थी?
- 1:24ज़रा समझाइएगा रेन फकीर जानते हैं कि तुम दुखी क्यों हो रेन फकीर?
- 1:39तुम्हारी वास्तविकता को जानते हैं क्या है कारण तुम्हारे दुखी होने
- 1:46का क्यों तुम घबराए करते हो क्यों तुम इधर से उधर एक चैनल से दूसरे
- 1:55चैनल के उपाय? एक संत से दूसरे संत।
- 2:00के पास। एक मंदिर से, दूसरा मंदिर,
- 2:04गुरुद्वारा और धर्म भी। बदल लेते है।
- 2:16मौत का 1 दिन मोयन है, मौत का 1 दिन मोयन है।
- 2:24नींद क्यों? रात भर नहीं आती पता है कि मरना
- 2:29है फिर भी नींद नहीं आती है सो जाएंगे सदा के लिए।
- 2:42आराम करेंगे चिरनिद्रा में कब्रिस्तान की खबर में फिर भी आज
- 2:51क्या है? जो नींद नहीं।
- 2:53आती जैन फकीर जानते हैं कि तुम्हें रोग किस तरह का है।
- 3:05तुम क्यों ठहर नहीं पाते? क्यों इधर से उधर बचते हो?
- 3:12क्यों चैन नहीं आता? क्यों करार नहीं आता?
- 3:24और ज़ैन फकीर तुम्हारी रग पे रार करते हैं, उस दुखती हो, तुम
- 3:33चिल्ला पड़ते हो ज़ैन फकीर जानता है कि ठीक जगह पर लगी है।
- 3:46जेन फकीर तुमको तुम्हारी दुखती रग पे प्रहार करता है, बस यही है
- 3:55कारण तुम्हारे दुख का तुमने देखा कभी रात को नींद नहीं आती तो शरीर
- 4:02का कोई एक पुरजा दुखता होता है। भुगतना पड़ता है।
- 4:08सारे शरीर को चोट लगी है, लूट है के हाथ की अंगुली के सो नहीं सका
- 4:18सारा शरीर सारी रात यही तुम्हारा हाल है।
- 4:25और जेन। फकेर जानते हैं कि तुम्हारा रोग
- 4:29क्या है? इसलिए जो जानता है कि रोग क्या
- 4:33है? वह रोग का उपचार करता है, उसी रोग
- 4:39का उपचार करता है। जेम्स केस तुम्हारे अहंकार पे वार
- 4:49करेगा, दंडित करेगा, प्रताड़ित करेगा, भली भूरी कहेगा तुम्हें।
- 5:00अकारण बे भजा। उलटे पुलटे काम कहेगा, एक हाथ से
- 5:08ताली बजाओ, जाओ जब एक हाथ से ताली बजाना सीख जाओ, तब मेरे पास आना
- 5:16जाओ, पूछा लगाओ। जाओ आए गए हुए संतो के लिए लंगर
- 5:23बनाओ और वर्षों बीती जाती हैं तो मैं समझी नहीं आता इससे परमात्मा
- 5:34के पाने का। क्या ढंग है?
- 5:45ये तरीका क्या है? लेकिन वो जानते हैं कि अगर
- 5:52तुम्हारी दुखती रग पे प्रहार न किया तो तुम चीखो या नहीं चलाओगे।
- 6:03मैं भी ऐसा ही करता, मैं कुछ ऐसा बोल दिया।
- 6:11अगले पल कमेंट आ गया, मैंने उसे ब्राक मार दिया।
- 6:19मेरा कसूर क्या था? मैंने कहा तुम्हारा कसूर ये था कि
- 6:25तुम पहले से ही भगवान हो गए थे, जब हो गए हो तो मेरे पास क्यों
- 6:31आया हो? मतलब मतलब यही?
- 6:36कि जब तुमने मेरा कमेंट काट दिया। तो तुम मुझसे ज्यादा जानते हो ना?
- 6:44और जो मुझसे ज्यादा जानता है वो मेरी शिक्षा को ग्रहण क्यों करें?
- 6:57तुम्हें मेरे पास नहीं आना चाहिए, इससे ब्लॉक मार देता हूँ।
- 7:05तुम कहती हो थोड़ा सा प्रश्न ही तो पूछो कमेंट ही तो किया था।
- 7:12मैं तुम्हारी दुश्ती रग पे प्रहार कर देता हूँ।
- 7:17और जो ठग लोग होते हैं वो तुम्हारी दुखती रग पे उपहार
- 7:24निकालती है। वो प्रहार वह करते है जो रग
- 7:29बिलकुल नहीं दुखती है। जो शरीर सवस्थ है, वह प्रहार करते
- 7:33है। और प्रहार भी नहीं करते और पीठ पे
- 7:36मालिश। करेंगे तुम्हारा सिर्फ कुछ कार्य
- 7:41उससे क्रांति गठित नहीं हो गया। दुख तीरक पे प्रहार करना पड़ेगा
- 7:49जैन फकीर इसको अच्छी तरह से जानता है।
- 7:56इसलिए तुम उसके सामने तो कोई कमेंट कर नहीं सकता है क्योंकि वह
- 8:03तुम्हें जजित करेगा। उसकी इच्छा है कि तुम किसी ना
- 8:08किसी तरह भाग जाओ। मतलब भाग जाओ जब तुम्हारी दुखती
- 8:15रग पे ब्रार होगा तुम भाग जाओ आए थे आनंद के लिए।
- 8:26लेकिन जैन फकीर जानता है कि तुम्हारे भीतर एक सड़ाध है, वो
- 8:34सड़ाध यह है कि मैं तो पहुंचा। हुआ।
- 8:40कौन ऐसा व्यक्ति है जो यह नहीं सोचता कि मैं तो पहुंचा हुआ?
- 8:46मुझे गुरु की जरूरत क्या है? इसलिए वह अन्य अन्य धार्मिक
- 8:52उपदेशों को अपना लेता है। कोई निरंकारी वो कहता ये देखो ये
- 9:03आकाश, यही तो प्रमा। फिर गीता को उठा लेते हैं।
- 9:08नैनम छिद्दंती शस्त्र राणी बिके शस्त्र से कटता नहीं नैनम।
- 9:14दाहती पावका आग। जलती है जी जलता नहीं नैनम क्ले
- 9:20धन त्यापो। हवाएं चलती है, पानी बरसता है, यह
- 9:24गलता नहीं है, यह सोचता नहीं है। यही तो प्रवाहटना है ओके नरंकार्य
- 9:35मेरे पास आ गया, आया करता था। कभी कभी कोई बात पूछ लेता।
- 9:44बाबा आज लॉटरी कितनी बिकेंगे बाबा सुबह नंबर क्या आएगा बता दो मैं
- 9:53उसे बता दिया करता था। किस दिशा में जाऊं, इस दिशा में
- 9:58जाऊं ज्यादा बिक जाएंगे। कितने बिकेंगे इतने बिक जाएंगे जो
- 10:07कुछ आता आंटी सेंट बोलता जाता है, मुझे खुद भी नहीं पता होता इसकी
- 10:16कितनी बिकेंगी? लेकिन हैरानी की बात ये है कि वह
- 10:21बिक जाती है। उतनी ही बिक जाती है और हैरान तो
- 10:28वो भी होता और हैरान में भी रहता। 1 दिन तो मैंने झल्ला के उसे कहा
- 10:38कि तुम आज मत जाओ। मेरे से बड़े थे।
- 10:4626 साल बड़े थे। उनका 1926 का जन्म मेरा 1952 का
- 10:54जन्म कहीं कहीं 1950 लिखा है। पिताजी कहा करते थे हमने उम्र
- 10:59ज्यादा कम लिखा दी चलो। कोई बात नहीं।
- 11:02लिखने से तोहर थोड़ी घटती बढ़ती है, जितनी है उतनी ही होगी।
- 11:15कल खुलनी है लॉटरी बच जाए की 100 लॉटरी से मैंने कहा तुम मत जाओ।
- 11:22नुकसान हो जाएगा तो हो जाएगा हो जाने दो, ठीक है, मैं।
- 11:28तो जाऊंगा। अब देखिए जब व्यक्ति पर कर लेता
- 11:40है। मेरा आह की।
- 11:47कृपा से ही सबका हो रहा। मेरा हाथ की कृपा से सब काम हो
- 12:14रहा है करते हो तुम? कन्हैया कर रहे हो तुम कन्हैया
- 12:32मेरा नाम हो रहा है। मेरा हाथ।
- 12:42की कृपा से सब काम में हो रहा है, जो उसकी शरण में 100% समर्पित हो
- 12:57जाता है। भीतर से फिर वही बोला करता है जो
- 13:06उसकी क्षण में 100% समर्पित हो जाता है।
- 13:11उसका काम वह खुद करता है। बड़े मज़े की बात है।
- 13:17उसकी सर्जना निराली है। बस तुमने उसके ऊपर पूर्णतया छोड़
- 13:25के नहीं। देखा?
- 13:27आधा छोड़ दिया होगा आधा पतवार। अपने हाथ में रख लिया होगा।
- 13:34कुछ तो है जो उसने पूरा को संभालना।
- 13:44और जब तक तुमने पूरा समर्पण नहीं किया, तब तक वह तुम्हें संभालेगा
- 13:50भी। फिर काबा जाने का कोई?
- 13:53फायदा नहीं काबा किस मुँह से जाओगे गालिब काबा किस मुँह से
- 14:02जाओगे गालिब? शर्म तुमको मगर नहीं, लेकिन ऐसे
- 14:07लोग भी कब जाते है? जो अपने नाव की पतवार अपने हाथ
- 14:16में रखते है फिर कब जाने का कोई फायदा है?
- 14:23कब मत जाओ। नाव की पतवार 100% उसके हाथ में
- 14:28दे दो तुम जहाँ बैठे हो वहीं काबा तीर्थ मत जाओ, मत जाओ कुम्भो में
- 14:39अपने नाव की पतवार उसके हाथों में दे 200%।
- 14:43जहाँ बैठे हो वही कुंभ है, वही तीर्थ का स्नान है फिर वही
- 14:53चलाएगा। तुम्हारे जीवन के नैया को रेन
- 15:02फकीर तुम्हारी रग पे वार करता है क्योंकि तुम हो तो कुछ और।
- 15:11तुमने मान लिया है अपने आप को कुछ और और इससे भलीभाँति जानता है?
- 15:16सेन फकिर सेन फकिर गर्मी के महीने में गर्म कंबल लेते।
- 15:28दोपहर के वक्त सूरज के सामने बैठता है।
- 15:33तुम कहोगे ये पागल हो गया है, लगता भी है, लगता है ये पागल है।
- 15:46क्योंकि असामान्य हरकतें करने वाला व्यक्ति तुमको असामान्य ही
- 15:51लगेगा। अब नॉर्मल है गर्मी में बैठेगा।
- 16:04धूप के अंदर जलती धूप में 50 डिग्री सेल्सियस तापमान है।
- 16:10गर्म कंबल है सर्दियों वाला। तो यहाँ पर आते हैं।
- 16:20मेरे पांव के पास गर्म कंबल पड़ा होता।
- 16:22है। रोप मुँह से पूछते हैं पापा ये
- 16:26गर्म कंबल कम इतनी गर्मी है? एसी चलाना पड़ता है।
- 16:36मैं चुप हो जाता। हूँ अब समझना बात को।
- 16:45वह गर्मी में बैठता है ऊपर से धूप है, सूरज अपनी।
- 16:51चरम सीमा पर है आग उगल रहा है ऊपर से तुमने कंबल उठ उस गर्मी के
- 17:02भीतर वो बैठा है। जैन फकीरों की यही साधना है।
- 17:09क्या करता है जैन? रेन अपने शरीर के ताज़ात में से
- 17:17अपने को दूर करता है अपने शरीर के ताज़ात को तोड़ता है अपनी
- 17:23आइडेंटिफिकेशन जो उसने शरीर के साथ बना ली की मैं शरीर हूँ इसको
- 17:28तोड़ता है। और धीरे धीरे धीरे धीरे अभ्यास
- 17:36करते करते कर्त कर्त अभ्यास के जड़मती होत सुजान, रसरी आवत जातते
- 17:44सिर पर पड़ते निशान। 1 दिन कामयाब?
- 17:48हो जाता है। तुमने जान लिया तुम वास्तव में
- 18:01कौन पांव ये धूप तुम्हें जला नहीं सकता, ये प्रैक्टिकल है यह
- 18:11थ्रोटिकल नहीं, यह मात्र जीवों की लबालब नहीं।
- 18:17यह प्रयोगीक प्रयोग शाला है और अगर तुम जीवों की लपलप करते रहे
- 18:24प्रशांत की तरह तो फिर तुम कुछ नहीं पाओगे।
- 18:31जीवन समाज के नियम बदलते रहेंगे, तुम्हारे प्रश्न भी बदलते रहेंगे।
- 18:37और इन आचार्यों की भी अक्ल कभी ठिकाने नहीं आएगी।
- 18:46मैंने पहले। ही तो कहा था जब विकास से दिव्य
- 18:49कृति जैसे लोग। अजामिल की कथा कहनी शुरू कर दें।
- 18:53समझ लेना कि आध्यात्मिकता का बेड़ा गर्क हो गया।
- 18:57हो गया क्योंकि इन विचारों को क्या पता जिन्होंने कभी अपने जीवन
- 19:05में फुर्सत के लम्हों का स्वादन ना किया हो?
- 19:14ओके अच्छा नहीं आनंद का स्वाद कैसे हो?
- 19:21जिसके प्रेरणा पति विवाह सो क्या जानें?
- 19:37फिर परा जिसके पैर न फटी तो क्या जानने फिर परा?
- 20:00बड़ा अफसर बनना हो, राज़ करना हो, हुकम चलाना हो, राजगद्दी पे बैठना
- 20:09हो, ढंग पूछने हो, अमीर बनने के ढंग पूछने हो।
- 20:15कोई तर्क को सुलझाना हो, कोई उलझी हुई गांठ को संसारिक खोल न हो तो
- 20:23इनसे बेहतर इंसान कोई नहीं मिलेगा।
- 20:27आचार्यों से विकास से खान सर से ये सब।
- 20:33लोग। और भी भविष्य है।
- 20:37प्रसंग वश मैं सबका नाम नहीं ले सकता, लेकिन जब भी यह जहाँ मिल्क
- 20:43तथा कहनी शुरू कर देंगे समझ लेना। ये समुद्र का डीड्डू कुएं में आ
- 20:57गया। इसी उदाहरण से समझ लेना उज्जैन
- 21:04फकीर बैठता है 50 डिग्री गर्मी है, दोपहर का वक्त है, तुम तो एसी
- 21:11चला के भीतर बैठ जाओ। क्योंकि तुमने शरीर को अपना मान
- 21:15लिया। है।
- 21:18और इस मान्यता को तोड़ने में तुम्हें शर्म आती है लज्जा आती है
- 21:23भय लगता है मृत्यु का वह तुम्हें कब आता है तुम कहते हो का भाई
- 21:27पंगा लेना है, जीतने बर्ष है, आराम से गुजार लो।
- 21:31डंडप के गद्दों पे सो जाओ, बढ़िया खाना खा लो, कुछ नहीं होता
- 21:42परमात्मा भरमा उस अज्ञात के चक्कर में उलझने की बजाय।
- 21:50ज्ञात के आश्वासन से मत चूको ज्ञात का आश्वासन करो जो तुम्हारे
- 21:56पास है उसको भोगो, ये तुम्हारे पास नहीं है, उसका तो पता ही है,
- 22:03वो है भी कि नहीं और जब तुम्हें पता नहीं।
- 22:09तो तुम्हें मानना भी नहीं चाहिए क्योंकि अगर तुम किसी के कहने से
- 22:17मानोगे तो बिल्कुल वैसा ही होगा जैसे किसी के भोजन करने से
- 22:26तुम्हारी भूख नहीं मरती। प्यास तुम्हें लगी है और पानी कोई
- 22:31पी ले तुम्हारी प्यास नहीं भजती तुम्हारा पेट नहीं भरता किसी
- 22:38दूसरे व्यक्ति के खाने से तुम्हें खुद ही।
- 22:49भीतर उतरना होगा। अपने खुद अपने भीतर उतर के जाना
- 22:57होगा। अगर भटकना नहीं चाहे।
- 23:06अगर इस मन के जंजाल से कबाड़े से बाहर निकलना चाहते हो पहले वर्टीक
- 23:12लो अच्छी तरह से वर्टीक। लो।
- 23:17और जब तुम इस वर्टीकन से थक जाओ तो एक ही रास्ता है।
- 23:24वो है संत संत शरण सच्चे संत के शरण में बैठ मिला है विश्राम वहाँ
- 23:38विश्राम मिलेगा, संसार के थपेड़ों से थके हारे।
- 23:47संसार के आपाधापी से नफे नुकसान से डरे डराए, मृत्यु के व्यय से
- 23:55डरे डराए, तुम्हें एक ही ठोर है गुरु के शरण गुरु कोण।
- 24:04गुरु वह जो अपने अंत में आखिरी तत्व तक पहुँच।
- 24:08गया है शती प्रज्ञा हो गया है। उस गुरु की क्षण में जाने से
- 24:13तुम्हें शांति मिलेंगे तो तुम्हें ढूंढना।
- 24:16पड़ेगा। इसलिए ओशो मरते हुए कहते हैं।
- 24:24मेरे जाने के बाद किसी जीवंत गुरु को तलाश कर लेना, शस्त्र तुम्हें
- 24:32ना बता पाएंगे। शस्त्र तो भरे पड़े।
- 24:40पड़ पड़े गड्ढे लग दिए ते पड़ पड़े हुए अख्हार नानकर लिखे एक
- 24:45गलत है बाकी चकनाचार कितने शास्त्र है भरे पड़े आज देखिए
- 24:54चैनल कितने अपने अपने। सभी का मार्ग होना चाहिए वह परम
- 25:09गंतव्य जहाँ रस बरसता। है।
- 25:13खुमारी का आनंद का शांति, यही तो चाहिए तुम्हे।
- 25:22शांति की तलाश में तुम अशांति के उपकरण बना लेते हो, जैसे आज सारी
- 25:32दुनिया ने विश्व में शांति कैसे हो?
- 25:35इसके लिए नुक्लेअर बम बना लिया है।
- 25:40बना ये शांति का कारण है। यह शांति का कारण है।
- 25:48ये भय का कारण है और दुनिया विनाश के कगार पर हर्प पर खड़ी है।
- 25:59कौन जाने? कब कोई बुद्धिमान?
- 26:03आखिरी नहीं चलाती सबसे बड़ा शक्तिमान परमाणु बम रशिया के।
- 26:10पास है। इसलिए रशिया में अहंकार ज्यादा
- 26:14है। शांति नहीं नागरिक मार दिया
- 26:19उन्होंने। वह आदमी, वचन, छोटी छोटी लड़कियों
- 26:25से कहा जाता है तुम बच्चे पैदा करो सकुली लड़कियों से क्या हो
- 26:31गया है इस पागल को देखिये कितनी जनता है इस एक व्यक्ति को गद्दी
- 26:39से हटा दे। लोगों में इतनी ताकत।
- 26:41रही। तुम जैसे निर्बल हो के काया से भी
- 26:47और मस्तिष्क से भी तुम बलहीन हो गए हो सर, रशिया मर जाएगा एक
- 26:56व्यक्ति के कारण। लेकिन तुम एक व्यक्ति को नहीं मार
- 27:00सकोगे। एक व्यक्ति को गद्दी से नहीं हटा
- 27:03सकोगे। बस राजनीतिकों को गद्दी से हटा
- 27:07देना ही मर जाना होता है। तुम शरीर।
- 27:17हो, यही तुम्हारा पैमाना है। टू लिव लाइफ ज़िन्दगी को जीने का
- 27:30यही पैमाना है तुम शरीर तुम मन हो, तुम विचार और ज़ैन शकीर जानता
- 27:39है कि जब तक यह नहीं टूटेगा। तब तक तुम उस तलहटी पे नहीं जा
- 27:46पाओगे वाज्जनाद अनेक आशंका जहाँ जगकृत होती है उस अनाहतनाद की
- 27:53आवाज जहाँ प्रेम का रस जहाँ बंसरियां बजती हैं।
- 28:01जहाँ मृदंग ढोलक, क्षेने गाजे बाजे अपना सुर साधित्य जहाँ वीणा
- 28:12के तार जनकृत। होते हैं वह।
- 28:15तुम न जा पाओगे रस वरसता है हर पर।
- 28:22जब तक तुम इस इल्यूश़न को नहीं तोड़ पाते, ये बहुत बड़ा इल्यूश़न
- 28:27है मानव मात्र के लिए और मानव शरीर ही इसके योग्य है।
- 28:35इसलिए देवताओं को भी दुर्लभ है ये मानव शरीर, क्योंकि यही एक रथ है
- 28:41ऐसा जैसे सिर्फ हवाई जहाज और रॉकेट ही उड़ सकता।
- 28:46है। घोड़े वाला रथ न उड़ सकेगा।
- 28:57जहाज उड़ सकेगा गर्मी आवे कपड़ा नदरी मुख्य द्वार।
- 29:07बहुत से जीवनों में कब से यात्रा चली तुम्हारी पत्थर से
- 29:13यूनीसेल्युलर ऑर्गेनिज्म बने। पहले पेड़ बने पौधे बने फिर मल्टी
- 29:21सेल्यूलर ऑर्गेनिस्म बने। फिर तुम दो पाएं बने, फिर चारपाई
- 29:28बने, फिर मानव शरीर। में आ गए।
- 29:36और मानव से बड़े भाग्य से मिलता है कारण क्या है?
- 29:41मैंने पिछली वीडियो में बताया था कारण है कि बस एक यही शरीर है
- 29:50जिसमें बुद्धि तो है। लेकिन बुद्धि के साथ अविवेक भी है
- 29:58और प्राणियों में बुद्धि तो होती है सब में होती है, विवेक नहीं
- 30:03होता विवेक का मतलब अच्छा क्या बुरा क्या यह पहचानने की शक्ति
- 30:12व्हाटस राइट? एंड व्हाटस रॉन्ग?
- 30:18इसका फासला जो कर पाता है, वह बुद्धि विवेकशील है।
- 30:26विवेक के बिना सब बेकार है और वह इसी शरीर में संभव है।
- 30:35इसलिए इस शरीर को मात्र इस शरीर को एनलाइटनमेंट के पीक पर पहुंचने
- 30:43का एकमात्र साधन माना गया। ना घोड़ा पहुँच सकता है, ना गधा
- 30:49पहुँच सकता है, हालांकि तुम गधे भी रहो घोड़े पर हो, मैं भी रहा
- 30:52हूँ। पत्थर भी रहे हो पेड़ भी रहे।
- 30:58हो? सब रहे हो तुम, लेकिन तुम्हारी
- 31:04भावना भीतर से ये रही कि मैं शरीर हूँ पत्थर को ये रहा कि मैं पत्थर
- 31:11हूँ। कुल कुल हल्की सी चेतना फलकी सी न
- 31:16मत सिर्फ इसे कह देते हैं निकली जी बल इसकी कोई गणना नहीं, इतना
- 31:24सा भीतर प्रभाव होता है वहाँ से चेतना चली थपेड़ों पौधों में।
- 31:32चल नहीं सकते, फिर नहीं सकते, लेकिन महसूस कर सकते।
- 31:38हैं। फिर?
- 31:42यूनीसेल्युलर ऑर्गनिस्म लेकिन ये भ्रांति बने रही कि मैं शरीर हूँ।
- 31:51तुम भूल गए उस देही के साथ लगी हुई उस चेतना को जिसने पहली
- 31:57यात्रा के साथ जो पत्थर से शुरू हुई, वहीं से वो चेतना का छोटा सा
- 32:02हिस्सा हमारे साथ चिपक गया। यह प्राकृतिक प्रयोजन की प्रणाली
- 32:08थी। यह अंत तक आपका साथ देगा।
- 32:15जैसे ही तुम पत्थर से चले अपनी यात्रा पर और इसलिए पत्थर को पूजा
- 32:22जाता। है।
- 32:23यहीं से यात्रा शुरू। फ्रॉम स्टोन टू ह्यूमन के बाहर की
- 32:34यात्रा है, शरीरों की यात्रा फ्रॉम।
- 32:40कॉन्शन्स तो सुपरकॉन्शसनेस। फ्रम नेगलिजिबल कॉन्शॅस टु
- 32:46सुपरकॉन्शियसनेस ये अपने भीतर की यात्रा है, पत्थर में थोड़ी होती
- 32:52है, फिर बढ़ती चली जाती। है।
- 32:54थपेड़ों में थोड़ी ज्यादा होती। है।
- 32:58बढ़ती गई, बढ़ती गई, बढ़ती गई। घोड़ों में कुछ और गधों में, कुछ
- 33:06और हाथी में कुछ और और फिर तुम भाग्यशाली हुए जब तुम्हें मानव का
- 33:15जन्म मिला। मानस का जीवन भाग्यशाली जीवन है।
- 33:21लेकिन इसमें एक त्रुटि भी है। इस अविवेक के कारण तुम्हें ये भी
- 33:28पहचान आती है क्या ठीक क्या करे इतने जन्मो का।
- 33:40तुम्हारा जीवन का सफर तुम्हारे उन संस्कारों को निर्मित कर गया क्या
- 33:49मैं शरीर हूँ मैं विचार हूँ मैं भावना हूँ ये बढ़ती ही चली गई
- 33:57रोज़। और जब तक तुम मानव शरीर में
- 34:01प्रवेश किए तब तक ये हिमालय और समिरू पर्वत के बराबर हो गए।
- 34:08इतने बड़े हो गए मानव जीवन एक प्रकार से धन्यता है और दूसरे
- 34:16प्रकार से। एक कुरूपता तुम्हारे साथ लगी है
- 34:23संस्कारों के रूप में वो कुरूपता क्या है यह कि तुम अपने आपको
- 34:28जानते हो? इतने वर्षों का अनकॉन्शियस सफर?
- 34:39तुम्हारे मूड संस्कारों को बढ़ाता ही चला गया और आज तुम्हारे मूड
- 34:46संस्कार इतने ऊंचे हो गए कि हिमालय की एवरेस्ट को छूने लगे।
- 34:59ये तुम्हारी दुविधा है। बाकी जीवों की ये दुविधा नहीं
- 35:04होती क्योंकि उनमें विवेक नहीं होता।
- 35:10सिर्फ मानव जीवन है, जिसमें विवेक होता है अच्छा क्या बुरा क्या यह
- 35:15पहचानने की ताकत। बाकी जीवों में नहीं होता, इसलिए
- 35:23तुम देखना सारी सृष्टि बड़ी शांत है।
- 35:29सुबह दोपहर सांझ तुम प्रकृति की गोद में निकल जाओ।
- 35:38प्रकृति की शरण में कुछ लम्हे बिताना तुम्हें बड़ा मज़ा आएगा।
- 35:43बड़ी शांति में देखी क्या है? क्योंकि प्रकृति के प्रत्येक कण
- 35:49से पेड़ पौधा। हो?
- 35:53वो जीव जंतु हो, बड़ी शांति की तरंगे निकलते है।
- 35:58ज़रा भी दुविधा नहीं है। ज़रा भी आपाधापी नहीं है, सारी
- 36:03प्रकृति ठहरी। हुई है।
- 36:06कोई भाग नहीं रहा। किसी ने कमाना नहीं, किसी ने
- 36:11जोड़ना नहीं। किसी को फिक्र नहीं कलका बस एक
- 36:19मानव है, जीसको कलका फिक्र है, किसी को फिक्र नहीं कालका बस एक
- 36:31मानव है। जीसको काल का फिक्र है यही दुविधा
- 36:41तुम्हारा तनाव है, यह दुविधा दो छोर से जैसे खींच लिया गया हो तुम
- 36:50खिचे खिचे से रहते हो। इसी विवेक के कारण विवेक एक
- 36:58प्रकार का तोहफा भी है। प्रकृति।
- 37:00का और विवेक एक प्रकार का अभिशाप भी है प्रकृति का।
- 37:08इस संग संग चलते हैं दोनों पुश्ते हो।
- 37:13कि तनाव क्यों है? ये खिंचाव क्यों है?
- 37:20ज़रा भी तो बोझ नहीं सब है, लेकिन फिर भी एक अज्ञात बोझ है।
- 37:27यह बोझ विवेक के कारण है। प्रकृति ने तुम्हें गिफ्ट दिया,
- 37:34मानव शरीर जगह और प्रकृति ने तुम्हें एक संस्कार दिया।
- 37:44सभी जन्मों का संस्कार बड़ा ऊंचा है।
- 37:50और तुम्हें इन दुविधा के बीच में दुविधा को तोड़ना है एक को मिटाना
- 38:00है और एक को रखना है और एक ही रह जाना है।
- 38:08द्वैत में तो तुम खिचे खिचेर हो गए, द्वैत तुम्हें तड़प पाता है,
- 38:19अद्वैत तुम्हें शांत करता है, प्रकृति के शरण में चले जाना,
- 38:27महंतो गढ़ी बैठना। तुम अपने आप को बड़ा हल्का महसूस
- 38:31करोगे, क्योंकि सारी प्रकृति शांत है, शांति की लहरें वहाँ से
- 38:36निकलती हैं, प्रत्येक जीव शांत है, किसमें भगानासी नहीं है?
- 38:43किसी को कोई फिक्र नहीं, कालका ना?
- 38:46कालका हालांकि मरते सभी प्राणी हैं।
- 38:50लेकिन फिक्र किसी को नहीं है। मानव को फिक्र है कल का भी और काल
- 38:55का भी उसका कारण है तुम्हारा विवेक यह विवेक तुम्हें एक तोहफा
- 39:02भी दिया प्रकृति ने और एक दंड भी दिया प्रकृति ने अब क्या करे
- 39:08व्यक्ति? तो ज़ैन फकीर कहते हैं कि इसको
- 39:12तोड़ना तुम्हें वहाँ पहुंचना है, जहाँ कबीर कहते हैं अमृत झर रहा
- 39:19है भगतो नाचो जहाँ मधुमन में। निधि वन में राधा नाचती है, मधु
- 39:37में राधिका नाचे रे मधुवन में। राधिका ना चेरे गिरधर की मुरली
- 39:57आवाज, गिरधर के मुरली आवाज। अरे मधुबन मेरा धीका नाच उस नृत्य
- 40:17के पास चले जाना है और सदा ही हो रहा है हमारे भीतर उस मकाम को
- 40:24छूना है। वो है कौन बताएगा, गुरु बताएगा वो
- 40:34है और ये बहुत बड़ी क्रांति है। गुरु तुम्हें तसल्ली देता है,
- 40:42घबराओ। पथ।
- 40:44मैं जानता हूँ उस स्थान को। जहाँ राधा नाचती।
- 40:49है। मैं जानता हूँ उस जगह को जहाँ
- 40:54अमृत बरसता। है चलो मेरे संग चलो गुरु गीत में
- 41:02पता पायेगा। हमारी उलझन मैंने तुम्हे बताती।
- 41:07है। इस द्वन्द में तुम जी रहे हो इस
- 41:13भव्य के कारण की जब तुम ज्यादा दुखी होते हो तो नशीला पदार्थ
- 41:21सेवन कर लेते हो। कोई शराब पी लेता है?
- 41:26कोई काम वासना को भोग लेता है? कुछ पल आसानी से बीत जाते हैं,
- 41:35लेकिन फिर वही। बात।
- 41:41फिर वो ही शाम, वो ही गम, वो ही तनहाई है, फिर वो ही शाम आके
- 41:55तुम्हें तड़पाती है जब उसकी जात आती है।
- 42:02यही तुम्हारा दर्द है और जैन फकीर इसको अच्छी तरह जानता।
- 42:08है। जैन फकीर क्या करता है?
- 42:17वो तो तुमसे न हो सकेगा। जैन फकीर अपनी शक्ति को, अपनी
- 42:25ऊर्जा को, अपनी चेतना को शरीर से अलग कर लेता है।
- 42:33अब ध्यान से सुनना बात गहरी है, वैज्ञानिक भी है, अध्यात्मिक भी
- 42:37है। जब तुमने अपनी चेतना को शरीर से
- 42:43खींच लिया तो तुम्हारी चेतना का फासला हो जाता है।
- 42:50शरीर से शरीर है जड़ और तुम हो चेतन।
- 42:59तुम अलग हो गए शरीर से, जो कि जड़ है और तुम्हारे अलग होने से शरीर
- 43:10का टेम्परेचर डाउन आ जाएगा। तुमने देखा?
- 43:15जब आत्मा शरीर को छोड़ देती है, चेतना शरीर को छोड़ देती है तो उस
- 43:20व्यक्ति की हिट कम होने लगती है, हम हाथ लगा कर देखते हैं, ये तो
- 43:26ठंडा पड़ गया, इसका मतलब इसके भीतर के यंत्रों ने।
- 43:34हिट की पैदाइश बंद कर दी। इसके यंत्र रुक गए और अगर थोड़ा
- 43:40सा गर्म मालूम पड़ता है तो हम उसको ले के भागते हैं।
- 43:44डॉक्टर के पास डॉक्टर साहब लगता है, जिंदा है, शरीर गर्म है।
- 43:56जब चेतना और शरीर की बेलगाव होती है तो प्रथम लक्षण है के हिट का
- 44:05प्रोडक्शन घटता है और यही करता है।
- 44:09जैन जैन फकीर शरीर से बेलगाव कर लेता है, अपनी चेतना का।
- 44:15यह प्रोसेसर उसे पता। है।
- 44:19और चेतना का वेलगाव रोज़ बढ़ाता है।
- 44:23आज एक इंच, कल दो इंच, परसों तीन इंच नर्सों, चार।
- 44:29इंच। ऐसा बढ़ता जाएगा।
- 44:34और 1 दिन इतनी दूर हो जाएगा जब उसके शरीर को आग में भी रख दो तभी
- 44:43उसे गर्मी नहीं लगेंगी। मुझे तुमने देखा होगा भरी गर्मी
- 44:51है अब। यहाँ पंखा एक के ऊपर चल रहा है और
- 44:59मैं गर्म मफलर जो सर्दी में पहनता हूँ वो लपेटे हो भीतर से गर्म
- 45:08बनियान, कभी कभी गर्म। पैजामी पहन लेता हूँ क्यों शरीर
- 45:22से बलगाव के कारण रात भर का शरीर से बलगाव पूरी रात शरीर से बलगाव
- 45:31में रहता हूँ। शरीर सोया रहता है।
- 45:37मैं उससे अलग रहता हूँ। मैं अपनी चेतना में मग्न मतवारा
- 45:45मेरी सुरती में मैं कन्डेन्स हुआ उस मतवार के अमृत को पीता रहता।
- 45:55मदवापी गयी बिन तोल मदवापी गयी बिन तोल मना।
- 46:11लाग्यो मेरा राम, मैं उस जगह पहुँच जाता हूँ वहाँ मेरा मन लगता
- 46:18है जहाँ मदवा बिना तले बिना बोले मैं पीता रहता हूँ सारी रात और
- 46:29सुबह जब जगता हूँ। आपके प्रश्न का जवाब है तो वह जो
- 46:36रात की पी हुई इतनी मात्रा में अमृत की धारा वह 4:00 बजे तक
- 46:43टूटती नहीं इतना मस्त इतना आनंदित इतना खुमार?
- 46:51इतनी शांत इतनी भीतर भरी होती है, थोड़ी सी आहट थोड़ा सा खटख।
- 47:10भी मेरे वितरण नहीं होता। कोई विचारों की ऊहा पोहा नहीं
- 47:16होती, कोई कल और काल का फिक्र नहीं होता।
- 47:24बस सिर्फ मैं होता हूँ मेरे शुद्धतम रूप में।
- 47:29मेरे अमृत तत्व में मेरे अपने आपे में मैं होता हूँ और दूसरा कोई
- 47:34नहीं होता शरीर से बहुत दूर अकेला में उस तल पर जहाँ जाकर शरीर से
- 47:47पूर्ण बेलगाव हो जाता। है।
- 47:49तो शरीर हिट पैदा करना करीब करीब नकलीजीबल मात्रा में कर देता है।
- 47:59इसलिए सुबह सुबह ब्लड प्रेशर बहुत कम होता है।
- 48:02मेरा और सुबह सुबह हिट हुई शरीर। में बहुत कम।
- 48:10के निशानियाँ मैंने तुमसे बहुत बार कहा कि थोड़े से ब्लड प्रेशर
- 48:15को ज्यादा कम ना कर लो, तुम अभी अज्ञान है।
- 48:20ब्लड प्रेशर को 110 ₹70 ले। आओ।
- 48:23बस। और शरीर की हिट को ठीक ठीक रखो,
- 48:30ज्यादा बढ़ने ना हो। बुखार के अंदर कोई व्यक्ति पहुँच
- 48:36नहीं पाएगा अगर किसी को बुखार हो जाए।
- 48:41तो अपने आपको शरीर से अलग करने की चेष्टा मत करना बेकार हो जाएगी।
- 48:46वह कम तापमान में ही संभव। है।
- 48:51इसलिए संतों ने बेहतर उपाय समझे कि हम ठंडक में निकल जाएं।
- 48:55हिमालय की गोद में चले जाएं बर्फ़ के भीतर।
- 49:00शरीर भी ठंडा हो जाएगा। उन्होंने एक इजी उपाय ढूंढ लिया।
- 49:06लेकिन ज़ैन फकीर थोड़ा मुश्किल उपाय ढूंढ़ते हैं।
- 49:13ज़ैन फकीर कहते हैं कि तुम्हारे शरीर के चिपकाहट को।
- 49:21तोड़ना हमारा लक्ष्य है क्योंकि यही है बाधा तुम अपने आपको शरीर
- 49:27समझ रहे हो, मन समझ रहे हो, मैं तुम्हें दंडित करता है और जैन
- 49:36फकीर तुम्हारी परीक्षा ले रहा है। वह सोचता है कि अगर ये शरीर के
- 49:43साथ इतना तादाद में भी नहीं तोड़ सकता, कुछ ऐसा वैसा कह दिया, तुम
- 49:52बुरा मान जाओगे, कुछ ऐसा वैसा काम कह दिया।
- 49:58वहाँ राजा जाएगा बह कहेगा उठाओ, झाड़ू पोछा लगाओ, साफ सफाई करो,
- 50:10ऐसा ही किया करते थे। संत लोग को।
- 50:20बाहर भी देते जाओ, अपने बाल खिला लो, अपने कपड़े पाल लो, शरीर के
- 50:31ऊपर रेत गिरा लो, मत मैले हो जाओ और बाजार में निकल जाओ।
- 50:41और सारे बाजार का चक्कर लगा के आ जाओ।
- 50:50जो भीतर से प्यासा होगा उसको तो पानी चाहिए।
- 50:56कीमत कोई भी हो इसलिए मैं सदा ही कहता हूँ कि तुम्हारा।
- 51:04प्यासा होना अनिवार्य है। बिरहा की अग्नि जलने अनिवार्य है।
- 51:10तुम उसके अभाव में तड़पने लगो मछली की तरह, इसलिए हमने मछली को
- 51:15अवतार माना, कछुए को अवतार माना जब तुम मछली की तरह तड़पते नहीं।
- 51:24तब तक तुम उसकी हल नहीं निकालते हैं।
- 51:29उसके विरह में तड़प हो गए तो हल निकालने में नेसेसिटी इस दी मदर
- 51:34ऑफ इन्वेंशन जरूरत पैदा करती है कि इस बंधन से मैं मुक्त कैसे हो
- 51:43जाऊं। इस अभाव से मैं मुक्त कैसे हो
- 51:46जाऊं? तुम अपनी इमेज बनाई हो लुफ्त
- 51:56दिखावे के लिए मुझे बनाते। हैं।
- 52:00काला पीला रंग लेते हैं। आज दुनिया देखाबी क्यों हो गयी?
- 52:10संत हैं तो देखाबा राजनीतिज्ञ है तो दिखावा बस दिखावा, माँ तरफ
- 52:16दिखावा, असलियत कुछ। नहीं।
- 52:24और ये दिखाना तुम्हें भरमाता है। बाबा नानक कहा करते थे के वक्त
- 52:40आएगा, जब हाथ को हाथ खा जाएगा तो लोग पूछते बाबा इसका मतलब क्या
- 52:48हुआ? बाबा नानक कहते हैं, जब भाई को
- 52:52भाई खा जाएगा, एक भाई दूसरे भाई के हक को खा जाएगा।
- 53:00अक्सर बड़े भाई छोटे भाई के हक को खा जाते हैं मैं मैंने अब ये केस
- 53:07से। कहा।
- 53:08बड़े भाई ने किसी तरह चंगुल में फंसा के छोटे भाई का माल हड़प
- 53:15लिया और छोटे भाई पागल हो गए। अभी कुछ दिन पहले उसने रिपोर्ट
- 53:22दिखाई, मुझे तो मेंटल जानकारों ने उसे।
- 53:29पागल करारदेव यू अरे मेंटली इम्बैलेंस यू अरे मेंटली अबनोरमल
- 53:37यू अरे नॉट नॉर्मल, नॉर्मल मेंटली याने तुम पागल।
- 53:41हो? और तुम्हें शायद पता नहीं।
- 53:48इन्होंने आग से खिलवाड़ किया, बड़े भाई ने आग से खिलवाड़ किया
- 53:57क्योंकि जब डॉक्टर कहता है यू आर मेंटली एब्नार्मल तुम पागल हो और
- 54:03तुम ये भी जानते होगे। कि हमारे संविधान की धारा 84 ये
- 54:11कहती है कि अगर पागल, क्योंकि वह आपे में नहीं होता, उसे पता ही
- 54:15नहीं होता, मैं क्या कर रहा हूँ, वह कोई कतल भी कर दे।
- 54:201000 कतल भी कर दे, वह माफ़ होता है।
- 54:27तो? उसमें विवेक नहीं।
- 54:30होता। विवेक मनुष्यत्व की पहचान यही तो
- 54:36मिली थी हमें मुझसे लोग पूछ लेते हैं कि शेर मास्क क्यों खाता है?
- 54:42और अगर खाते उसे पाप नहीं लगता नहीं लगता क्योंकि शेर के भीतर
- 54:47विवेक नहीं है, बुद्धि है, विवेक नहीं है, भूख लगी है, उसे भूख
- 54:52मिटानी है और वह दूध तो पीता नहीं।
- 54:56मैं तो माँ से ही खाता है। इसलिए शेर को पाप क्यों नहीं
- 55:01लगता? यह प्रश्न मेरे पास बहुत बार आया,
- 55:04लेकिन जवाब मैं पहली बार दे रहा। हूँ।
- 55:08वक्त पर ही जवाब अगर मिले वही लाभदायक होते हैं।
- 55:13शेर को पाप नहीं लगता तो नहीं लगता है, लेकिन तुम भी जब अपना
- 55:19विवेक हो देते हो। तो पाप तुम्हें भी नहीं रखता, पाप
- 55:24साधना को भी नहीं लगता। ये भी प्रश्न मेरे से बहुत बार
- 55:27पूछा गया क्योंकि साधना का विवेक नहीं होता जब वो कतल करता है जब
- 55:38वो कर्मा पड़ता है। और सिर कलम कर देता है।
- 55:43कलम पर वह विवेकहीन होता है। इस ए मेंट्री एबन नॉर्मल अनिका
- 55:55गणिका को पता नहीं विवेक नहीं कि वह वैश्य है।
- 56:03विवेक शून्य औरत जानते नहीं स्तित्व क्या होता है?
- 56:09तो उस विवेक शून्यता के मार्ग से उठकर 100% तक पहुँच जाना ये ईश्वर
- 56:17कृपा से ही हो सकता है। यह संत दया से ही हो सकता।
- 56:21है। मैंने तुम्हें कारण बता दिया कि
- 56:26सतना क्यों पहुँच जाता है, अणका गणका क्यों पहुँच जाती है और सती
- 56:33सावित्री क्यों रह जाती है? क्योंकि सती सावित्री का विवेक
- 56:37उलझा रहता है। कि मैं शरीर हूँ और बड़ी पवित्र
- 56:41हूँ। इसलिए मैंने तुम्हें कहा यह बीके
- 56:45यहीं उलझी रह जाएंगे क्योंकि इनके विवेक ने वो चीज़ खंगाली नहीं जो
- 56:52सत्य थी। यह जैन शादिकाएं यहीं रह जाएंगी।
- 56:58जख्म मारती हैं क्योंकि जो मूल तत्व था वो तोड़न है।
- 57:03भ्रम नहीं तोड़ा के मैं शरीर हूँ, मैं मन हूँ, मैं विचार हूँ और अगर
- 57:08यह नहीं टूटा तो फिर कुछ भी नहीं। टूटा?
- 57:11यही तो भ्रम है, यही तो तोड़ना है।
- 57:17सब तोड़ दो, तुम पानी छान के पीओ, तुम वस्त्र पहनो या नग्न हो जाओ।
- 57:26यह मात्र शारीरिक क्रियाक लाभ है, लेकिन जब तक तुम इस भ्रांति को
- 57:32नष्ट नहीं करते। हूँ आर यू।
- 57:34तब तक तुम मुक्त नहीं होते और यह काम किसी संत की कृपा से ही रोकता
- 57:41है और बाबा नानक कहते हैं कर्मी आवे कपड़ा उसे अगला शब्द क्या है?
- 57:48नदरी मोख दवार। उस प्रभु की कृपा के बिना तुम
- 57:53मुक्त नहीं हो। ओके?
- 57:56ये दोनों फिकरे मैंने आपको बता दी तो वह निरंकारी मेरे पास आता, मैं
- 58:03कुछ भी बोल देता अड़ंगा बड़ंगा बिलकुल सत्य कहता हूँ, मैंने कभी
- 58:08सोच समझ के नहीं बोला। बस आपकी कृपा से सब काम हो रहा है
- 58:14100% मैं तो आँखें बंद करके मर जाऊंगा, मर जाऊंगा कुछ ले जाऊंगा
- 58:19कुछ ले जाऊंगा तू बचा ना बचा नहीं बचाना मत बचा तेरी मर्जी तेरा
- 58:25पाणा मीठा लग 1% के अगर। 99 हिस्से भी चले गए और 1% का 1%
- 58:38भी बच गया। तो वो तुम्हारी नैया की पतवार
- 58:42थमेगा नहीं, यह बात समझ लेना मैं क्या बोल रहा हूँ 100% उसे
- 58:48समर्पित करना पड़ेगा। 99 में पॉइंट 9% पर भी पानी नहीं
- 58:53उबलता और ट्रांसफर्मेशन नहीं होता ट्रांसफर्मेशन होता है 100 डिग्री
- 58:59सेल्सियस पे। तुम चूक जाओगे बहुत बार तुम
- 59:05बिल्कुल पड़ाव के ऊपर से आखिर वापस आए।
- 59:09बहुत बार चूके हो और बहुत बार छलांग लेते लेते रह गए।
- 59:14हो? बहुत जन्म बिछड़े मेरे माथो ए
- 59:22जन्म तुम्हारे लेखे इस जन्म में चुक मत जाना इस जन्म में तो पार
- 59:27लग ही जाना। इस जन्म में तो 100 डिग्री ऊपर ही
- 59:31जाना। इस जन्म में तो वाष्प बन ही जाना।
- 59:35देखिए ये जन्म मत चूक। किसी गुरु के पास किसी मार्गदर्शक
- 59:45के पास जो खुद जानता है राह। उससे राह पूछ लेना और यह भी ख्याल
- 59:54रखना कि पाखंडियों के जाल में उलझे मत जाना बहुत से लोग।
- 1:00:04हैं जो तुम्हें भरमाएंगे गलत रास्ते दिखलाएंगे, लेकिन तुम्हें
- 1:00:10अपने विवेक का ध्यान रखना। वहाँ मूर्छित नहीं होना बस यही
- 1:00:16बात ध्यान में रखना कि शांति और आनंद जहाँ बैठकर मिलता है जहाँ
- 1:00:24तुम्हारी मान्यताएँ टूटती हैं और जहाँ तुम मौन होते हो साँसों।
- 1:00:32बो आ रहे हैं साँसों ज़रा अहिस्ता चलो बो आ रहे हैं साँसों ज़रा
- 1:00:43अहिस्ता चलो धड़कनों से भी इबादत में खलक पड़ती है।
- 1:00:51इतना भी शोर ना हो की इबादत में खलल पड़ती है।
- 1:00:56शोर से नॉइज़लेसनेस बाहर नहीं भीतर चुप पे चुप ना हो भाई जा लाय
- 1:01:07राह लिवतार। तुम चुप हो गए ऊँट सी लिए निकम्
- 1:01:13तुम्हारा मन बोलता रहा राधे राधे राधे तुम नहीं पहुँच पाओगे ये शोर
- 1:01:18है इतना भी शोर ना हो, प्रिंट ऑफ साइलेंस भी न हो।
- 1:01:32बिल्कुल मूक वह मूक है पर मौन में है वो वहाँ जाना है, तो उस जैसा
- 1:01:39हो के जाना पड़ेगा भूत जब समुद्र में मिलती है तो याद रखना।
- 1:01:44उसका फॉर्मूलेशन होता है तो मिलती है, एच टूबो होती है तो मिलती है
- 1:01:49एच टूबो में अगर एनएसीएल कहे के मैं मिल जाऊं तो वह घुल तो सकता
- 1:01:55है, पानी में मिल नहीं सकता, एक आकार नहीं हो सकता उसमें मिलने के
- 1:02:02लिए। तुम्हें उस जैसा केमिकल
- 1:02:04फॉर्मूलेशन बनाना पड़ेगा, वह पर मौन है और पर मौन तुम्हें होना
- 1:02:12है। इन मूर्खों के जंजाल में फंस मत
- 1:02:15जाना पुत्रो अन्यथा बड़ी मुश्किल से यह मानव चेतना उपलब्ध हुई है।
- 1:02:23बड़ी मुश्किल से दिल की बेकरारी को करारा कि जीस ज़ालिम ने लड़
- 1:02:31पाया। उसी पे हमको प्यारा आया।
- 1:02:40इस बार चूक मच। तुम्हें अच्छे लगेंगे, लेकिन
- 1:02:46अच्छा लगना ही काफी नहीं। जहाँ शोर हो वहाँ से हट जाना, शोर
- 1:02:55से मौन में जाना और मौन से परम मून में जाना।
- 1:03:00क्योंकि वही है तुम्हारी मंजल जहाँ चुप है परमात्मा बोला कभी
- 1:03:07कभी भी तो नहीं। बोला तुम कुछ भी कर देते हो,
- 1:03:13परमात्मा नहीं बोलता वह पर मौन है।
- 1:03:19पर मौन में मिलने के लिए तुम्हारा पर मौन होना आवश्यक है।
- 1:03:25समान चीज़ ही समान चीज़ में समा सकती।
- 1:03:28है। इस मंत्र को मूलभूत आधार बना
- 1:03:35लेना। समान फॉर्मूलेशन समान फॉर्मूलेशन
- 1:03:40में समा सकती है। ओनली एच टू ओह कैन मर्ज ओनली एच
- 1:03:49टू ओह कैन मर्ज इन एच। टू समुद्र भी एच टू ओह है।
- 1:03:57बोध भी एच टू ओह है, इसलिए बिल्कुल मज़े से मिल सकती है।
- 1:04:01जब भी चाहे तो वह मेरे पास आता। है।
- 1:04:08मैं तो आज जाऊंगा, मेरी तो लॉटरी पड़ी है, बच जाएगी।
- 1:04:15मैंने उससे कहा अच्छा जा, तेरे ना सिर में ऐसा बाटा लगेगा कि पत्थर
- 1:04:22लगेगा, तेरे सिर में फूट जाएगा। मेरी थोड़ी तबियत खराब थी, मैंने
- 1:04:29कहा ये बैठ जाएगा गिरला बाटा मारते रहवागे।
- 1:04:36लेकिन वो तो नहीं रुका है, वो तो ट्रैन पकड़ ली।
- 1:04:42उसके पास पास था आने जाने का बट टिंडा से आपको घर तक ट्रैन में
- 1:04:49बैठ गया और फक्रसर के पास आके? पटरियों के किनारे से पड़ा हुआ
- 1:04:55बड़ा सा पत्थर ट्रेन की छोटी खिड़की के बीच में से होता है
- 1:05:03उसके सर में लगना। था।
- 1:05:05इत्तफाक से उसने 1 मिनट पहले ही उठके दूसरे सामने वाले सीट।
- 1:05:11पे बैठा था। बच गया वहाँ।
- 1:05:17कोई भी नहीं था और देखिए मैंने जानबूझ के नहीं, मैंने कुछ देखा
- 1:05:23नहीं था, मैंने कुछ सोचा नहीं था उन मुँह के लम्हों में वही बोल
- 1:05:29गया जो है। जो कण कण में मौजूद है वही बोलता
- 1:05:36है, बोलता है उन मूक लभो में तुम्हारे शोर शराबे में वह बोलता
- 1:05:43नहीं और अगर बोलता है तो तुम्हारे शोर शराबी में उसकी आवाज दब जाती
- 1:05:49है सुनाई नहीं पड़ती। वह तो भागकर सर उतर गया, बस पकड़ी
- 1:05:55मेरे पास आ गया, मैंने कहा वापस आ गए, क्या बात गए नहीं क्या गया तो
- 1:06:01था वही हुआ, बच गया बोबरा नहीं। फूटा।
- 1:06:09जब तुम नहीं होते तो भीतर से जो बोलता है वह पर्वत दीगार बोलता
- 1:06:16है। शर्त यही है कि तुम जब नहीं होते
- 1:06:22तब वो बोलता है। उसने सारी उम्र मुझे तरजीह दी,
- 1:06:27मेरे हुक्म का पालन करता। उसे जब कुछ भी करना होता मुझसे
- 1:06:32पूछता मैं ये कर लूँ कमल, वह तो मेरे पर ऐसा हो क्या जैसे मेरे पर
- 1:06:48वो निर्भर हो? क्या हो?
- 1:06:51वह अपने स्वयं से कुछ सोच ही नहीं सकता।
- 1:07:00कैसे होता है? तो ये तो मैंने तुम्हें बता दिया
- 1:07:07कि ज़ैन फकीर कैसे अपने शरीर से बेलगाव करता है और कैसे इतनी धूप
- 1:07:12में बैठता है? अपने शरीर से बिलगाव कर लेना
- 1:07:19क्योंकि ये दो चीजें हैं और तुम ईजिली इन दोनों चीजों को रिमूव कर
- 1:07:27सकते हो अलग अलग। तो जैन फकीर तुम्हें पहले
- 1:07:33प्रताड़ित करता है तुम्हारे अहंकार।
- 1:07:35को तोड़ता है। भीखा जाते हैं गुरु के पास भीखा
- 1:07:41कहते हैं तुम ऐसा करो, बड़े सेठ हैं भारी सेठ हैं ब्याज पर चलता
- 1:07:46है पैसा तुम फटे कपड़े। डालो।
- 1:07:51ये रेत उठाओ मुँह सिर के ऊपर मर। लो।
- 1:07:54और बाजार में सारे चक्कर निकाल के।
- 1:07:57आओ। बेका ऐसे ही करते हैं, लोग हंसते
- 1:08:02हैं, कहते हैं चलो पीछा छूटा पागल हो गया इसके इतने देने थे, अब
- 1:08:08नहीं मांगेगा। पागल व्यक्ति क्या मांगेगा?
- 1:08:16यह दौड़ के गुरु शरण में आता है, गुरु से शाभास देता है और मीका
- 1:08:21कुछ ही दिन में पहुँच जाती है। यह पूर्ण समर्पण के कारण होता।
- 1:08:27है। तुम समर्पण की क्रिया को फोकट में
- 1:08:31नवारें आज तुमने उस प्रैक्टिकल को मात्र एक इवेंट बना के रख दिया है
- 1:08:41और फिर तुम कहते हो कि परमात्मा मिल जाए असंभव।
- 1:08:44है। कल्पनाओं से कभी चेतना के फूल
- 1:08:50नहीं खेला करते, कल्पनाओं से कभी सुगंधी नहीं आया कल्पनाओं की
- 1:08:59सुगंधी सच में सुगंधी नहीं होती। वो तुम्हारा सोच होता।
- 1:09:07है। आज बड़ा मुश्किल ज़माना है।
- 1:09:16तो बाबा कहते हैं हाथ को हाथ खा जाएगा, फिर लोग पूछने लगे बाबा।
- 1:09:23फिर। कौन बचेगा बाबा कहते जो किसी पे
- 1:09:29विश्वास नहीं? करेगा बड़ा सुन्दर शब्द का।
- 1:09:36मेरे इस शब्द को हृदय में उतार ले, मेरे शब्दों पे भी यकीन मत
- 1:09:44कर। क्योंकि जो गुरु जानता है कि जो
- 1:09:49खायेगा पेट उसी का भरेगा, जो गुरु जानता है कि जो पानी पिएगा प्यास,
- 1:09:55उसी की वजह से वह गुरु सच्चा। है।
- 1:10:01जो गुरु कहता है मैंने पानी पी लिया, मेरी प्यास बूझ गई इसलिए
- 1:10:05तुम बैठ जाओ, तुम्हारी भी बूझ जाएगी तुम राधे राधे करते रहो
- 1:10:10तुम्हारी भी बूझ जाएगी। वो गलत कहता है।
- 1:10:14वह खुद भी पागल है। खुद भी अभी अधर में लटका हुआ है।
- 1:10:20जो कहें मैं खाना खा लिया, मैं तृप्त हो गया और तुम भी बैठ जाओ,
- 1:10:24तुमने भी खाना खा लिया, समझ लो बस ये समझ लो कहीं तुम्हें मार ना दे
- 1:10:32तुम्हारी अध्यात्म की यात्रा को समाप्त ना करते और बहुतों की
- 1:10:37यात्रा से ऐसे समाप्त भी हो जाती है।
- 1:10:41लेकिन तुम होशियार रहना होशियार यार जानी ये रास्ता ठगों।
- 1:10:47का? होशियार यार जानी ये रास्ता ठगों
- 1:10:52का यहाँ ज़रा नजर चुकी तो माल दोस्तों।
- 1:10:56का? मेरी बातों के इशारों की गहराई
- 1:11:02में जाना तुम खुद जाके देखना मैं जो बोल रहा हूँ क्या बोल सकते हैं
- 1:11:12फिर तुम्हारी भूख मटे। फिर तुम्हारा दंड मिटेगा जब
- 1:11:20तुम्हारा विवेक अपनी खुली नगन आँखों से देख लेगा हुआ एमआइ खुद
- 1:11:27अपने आपका अप्पा याद कर लेगा रिमेम्बरिंग सेल्फ रिमेम्बरिंग तब
- 1:11:34खोज पूरी। होगी।
- 1:11:38फिर। जब तुमने अपनी नगन आँखों से देख
- 1:11:42लिया तब तुम वास्तव में शांत हो जाओगे, तुम शांत हो जाओगे बिना
- 1:11:48किसी अवलंबन के विथाउट एनी सपोर्ट।
- 1:11:56बिना किसी सहारे के तुम खुद के अनुभव से जब तक आनंदित नहीं होगे
- 1:12:05तब तक पराधीन रहोगे तुम्हारा अपना भी भाग्य है, तुम साथ लेके आए।
- 1:12:14गुरुओं की कृपा के ऊपर तुम निर्भर न रहना, गुरुओं से सिर्फ मार्ग ले
- 1:12:19लेना और विकट परिस्थितियों में आशीर्वाद।
- 1:12:24ये दो चीज़ गुरु पर निर्भर न हो जाना तो बड़ा मुश्किल हो जाएगा
- 1:12:32तुम कहीं नहीं पहुंचोगे। तुमने अपना बोतल छूना है और सभी
- 1:12:37के भीतर बोतल है, तुम अपने ही तर्प को छूओ वहाँ जाकर तृप्त हो
- 1:12:46जाओ, मैंने खाना खा लिया, मैं तृप्त हो गया, तृप्त हो गया, देख
- 1:12:52लो। तुम भी ऐसे ही तृप्त हो जाओ मैं
- 1:12:59तृप्त हो गया ये जान के तृप्त मत हो तुम खुद खाना खा के तृप्त हो
- 1:13:04जाओ तुम खुद पानी पीकर प्यास को बुझा लो।
- 1:13:13जब तक तुम खुद पानी न पिओगे तब तक प्यास न बुझके तो जैन फकीर भगा
- 1:13:24देते उसे कि जब तू इतना सा काम नहीं कर सकता।
- 1:13:30तू इतनी सी आइडेंटिफिकेशन को नहीं तोड़ सकता तो सबसे बड़ी
- 1:13:35आइडेंटिफिकेशन जब आएगी जब मृत्यु सामने खड़ी होगी और तू चिल्लाएगा
- 1:13:41मैं गया मैं मरा कांपेगा सूखे पत्ते की तरह तो फिर उसका क्या
- 1:13:47होगा? तो अभी निकल जा अभी निकल जा, बस
- 1:13:53यही थी प्रोसेसर उनके पास लाख लोग आते हैं, रुकते 100, 5050 में भी
- 1:14:04वो छाँट लेता। मुश्किल से पांच सात लोग उस पॉइंट
- 1:14:11ऑफ़ नो रिटर्न पे पहुंचते हैं जहाँ जाके व्यक्ति वापस नहीं
- 1:14:15होता। प्यास चाहिए आनंद की बिरहा की आग
- 1:14:24चाहिए भीतर जलती हुई। अगर ये दोनों नहीं तो इस राह पे
- 1:14:29मत चलना, फिर पैसा कमाना, यूपीएससी करना, आईएएस बनना,
- 1:14:34आईपीएस बनना, राजनीति में चले जाना, बड़ी बड़ी पदवी लेना, मान
- 1:14:39सम्मान ले लेना, धन के अंबार लगा लेना, द्रब्यों को इकट्ठा कर
- 1:14:43लेना। सुविधाओं को देने वाले पदार्थ
- 1:14:47इकट्ठे कर लेना, लेकिन इस राह पे मत जाना इस राह पे तभी जाना अगर
- 1:14:54पदार्थों के सुख से तुम्हें वास्तविक सुख न मिला हो जब तुम थक
- 1:14:59जाओ और तुम प्यासे हो जाओ। आज का संदेश मर्ज होना है,
- 1:15:09डिसोलवे नहीं होना है क्योंकि डिसोलवे हुई चीज़ फिर से अलग की
- 1:15:17जा सकती है। जैसे नमक समुद्र में डिसोलवे होता
- 1:15:23है। तुम जब चाहे उसे अलग कर सकते हो,
- 1:15:28लेकिन पानी की बूंद समुद्र से अलग नहीं की जा सकती क्योंकि वह मर्ज
- 1:15:35हो गई तो आज का संदेश। मर्ज होना है, मिलना है, घोलना
- 1:15:42नहीं डिसोलवे नहीं होना। वहाँ तुम्हारी प्यास बुझ जाएगी,
- 1:15:52मैं गौरी। आ
- 1:16:12मैं गौरी तू कं हमारा। मैं नदियाँ तू मेरा किनारा, मैं
- 1:16:29गोरी तो कंत हमारा, मैं गंगा। तू मेरा किनारा अंग लगाओ, प्यास
- 1:16:45बुझाओ अंग लगाओ, प्यास बुझाओ। नदियाँ बन कर प्यासी मन की प्यास
- 1:17:06बोझाने आई। मन की प्यास बुझाने आए अंतर्घट तक
- 1:17:24प्यासियों में तो है मेरा प्रेम। देवता तू है मेरा प्रेम देवता, इन
- 1:17:40चरण की दासी हूँ मन की प्यास। बुझाने आई मन की प्यास बुझाने आई
- 1:17:59अंतर्घट तक प्यास सिहों में तो है मेरा।
- 1:18:08प्रेम देवता तू है मेरा प्रेम देवता डम डम डम डम रुबाजे।
- 1:18:37डम डम डम डम डम रुबाजे मैं नाचूँ। शंकर के आगे हो के रहेंगी जी तुसी
- 1:18:54की हो के रहेंगी जी, तुसी की जा की कला से।
- 1:19:04क्षण कर जागे मन की प्यास भुझाने आई मन की प्यास भुझाने आई।
- 1:19:21अंतर्घट तक प्यासियों में तू है मेरा प्रेम देवता, तू है मेरा
- 1:19:34प्रेम देवता इन चरणन की ता। सिहों में मन की प्यास बुझाने आए
- 1:19:48मन की प्यास बुझाने आए अंतर्घट तक प्यासियों में।
- 1:19:59तू है मेरा प्रेम देवता, धन्यवाद।