Latest / Baba ji Vijay Vats / 8 May 25 - तैत्तिरीयोपनिषद् - अन्न ब्रह्म है! Philosophical Way से समझें, रहस्य क्या है?
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- 0:01तौत्रेय उपनिषद का नवम अनुवाक अन्नम बहू पुरवित अन्न को बढ़ाएं
- 0:13तद व्रतम यही व्रत है पृथ्वी बा अन्नम।
- 0:19आकाशु अन्नादाह पृथ्वी ही अनह आकाश अन्नादाह पृथ्वी, पृथ्वी
- 0:34ब्याह, माँ का क्ष प्रतिष्ठित। आकाशो पृथ्वी प्रतिष्ठित था।
- 0:43पृथ्वी में आकाश प्रतिष्ठित है। आकाश में पृथ्वी प्रतिष्ठित है।
- 0:52यही वह अन्न में अन्न प्रतिष्ठित है।
- 0:55आप देखिये बहुत भारी शब्द है। इसलिए मैं कहता हूँ अगर व्यक्ति
- 1:05को शास्त्र भी मिल जाए तो उस शास्त्र में से निकालेगा क्या?
- 1:14काला अक्षर भैस बराबर। इन शब्दों में से क्या निकाली अगर
- 1:27भीतर का ज्ञान रखने वाला व्यक्ति है नहीं और सिर्फ आचार्य है।
- 1:39भाषा अनुवाद कर सकता है तो भाषा के अनुवाद तक ही जाएगा।
- 1:49इसे आगे कैसे जाएगा? मैं बार बार कहता हूँ।
- 1:57भाषा का अनुवाद होना ही पर्याप्त नहीं थिस इस नॉट सुफ्फिसिएंट
- 2:11अनुभव होना भी आवश्यक है। भरे पड़े हैं सारे शास्त्र।
- 2:18अर्थ कौन करे? आप कर दो अर्थ के मित्र का रहस्य
- 2:23कौन करेगा? आप ना कर पाओगे रहस्य वो करेगा
- 2:30जिसने रहस्य में प्रवेश कर लिया। यही वह अन्न में अन्न प्रतिष्ठित
- 2:40है जो मनुष्य अन्न में अन्न प्रतिष्ठित है, इसे जान लेता है।
- 2:47शब्द सुनिए जो मनुष्य अन्न में अन्न प्रतिष्ठित है, इसे जान लेता
- 2:54है। वह प्रतिष्ठित हो जाता है।
- 2:57अब क्या करें? क्या भाषा है गज़ब की भाषा?
- 3:07जो व्यक्ति अन्न में अन्न प्रतिष्ठित है, यह जान लेता है वह
- 3:13प्रतिष्ठित हो जाता है। तदैतगन मने प्रतिष्ठितम स य एतद
- 3:32अने मने प्रतिष्ठितम वेद प्रतीति अष्टितम अन्नभाण।
- 3:41अन्नाध भवती महान भवती प्रजया। जो व्यक्ति अन्न, अन्न में
- 3:54प्रतिष्ठित है, जो ये जान लेता है वह प्रतिष्ठित हो जाता है।
- 4:00हम सूत्र को पकड़ें ये सूत्र। जड़ और चेतन दो सत्ताओं को हम
- 4:13मानते हैं वस्तु में वेदांत दो में से एक को खोज लेता है।
- 4:25जड़ और चेतन दो नहीं, जड़ की चेतना बढ़ती बढ़ती बढ़ती बढ़ती
- 4:35चेतन मात्र रह जाती है। पत्थर से शुरू हुआ चेतना बढ़ती
- 4:40गई, पेड़ बने। चेतना थोड़ी बढ़ गई, एक कोसीय जीव
- 4:49बने, बहु कोसीय जीव बने, बड़े जीव बने और बड़े जीव बने।
- 4:59फिर एक जीव ऐसे बने। जिनमें बुद्धि आ गई बुद्धि ये
- 5:10बुद्धि शब्द के ऊपर बड़ा विवाद होता है।
- 5:16अभी आज ही डॉ। कमला।
- 5:21का प्रश्न आया क्या सभी पशुओं, छोटे बड़े पशुओं में मनुष्य के
- 5:35समान बुद्धि और विवेक होता है? बुद्धि होती है, विवेक नहीं होता।
- 5:49जीस वक्त व्यक्ति विवेक संपन्न युक्त हो जाता है उसी वक्त वह
- 5:57योग्य होता है। मानव का जमा प्राप्त करने में यह
- 6:04विवेक ही है। विवेक ही है जो कि मानव मात्र के
- 6:18अलावा और किसी में नहीं होता है। यह विवेक ही अन्न प्राणियों से
- 6:26मनुष्य के चोले को। बाकी पशुओं में बुद्धि होती है।
- 6:36बुद्धि तो सिर्फ एक ही यंत्र है, आइंस्टीन की बुद्धि यहाँ रखी
- 6:44मस्तिष्क विवेक हो गया। जिसके कारण बुद्धि में विवेक का
- 6:51जन्म होता था, वह नहीं रहा। अब इसको ध्यान से समझेना तो
- 6:56समझाया जाएगा। अन्न भी दो तरह के होते हैं कि
- 7:03कहाँ जिसकी बात। आपको बाहर बाहर से समझ आती है
- 7:09तैत्रीय उपनिषद के इस वक्त जो कि शरीर को पोषण देता है, वह अन्न एक
- 7:23दूसरे अन्य की बात भी है। जिसकी बात आपके तथा कथित विद्वान
- 7:30व्याख्याकार न कर पाएंगे। बस उसी की बात मैं करता हूँ और
- 7:36उसी को मैं रहस्य कहता हूँ, वो ही रहस्य है।
- 7:42उस तक पहुंचना ही मुश्किल है। शरीर को तो आप आज नहीं कल जानोगे।
- 7:48करीब करीब काफी मात्रा में जान लिया गया है, लेकिन बात तो उठती
- 7:55है उस अन्न की जो रहस्य है। तो आखिरी शब्द देखिए तैत्रीय
- 8:08उपनिषद के इन अनुभाकों का आखिरी शब्द है कि दोनों एक दूसरे पर
- 8:20आश्रित हैं। सृष्टि और ब्रह्म दोनों की सत्ता
- 8:29है, लेकिन दोनों एक दूसरे पर आश्रित हैं।
- 8:35जब एक दूसरे पर आश्रित हैं तो दो सत्ताएँ कैसे होंगी?
- 8:41जैसे मैंने समझाया कि गर्मी और सर्दी एक ही चीज़ के दो रूप हैं।
- 8:52मेज़रमेंट ऑफ़ टेम्परेचर तापमान के दो छोर हैं।
- 8:58माइनस में चले गए तो सर्दी। और प्लस में चल गए तो गर्म लेकिन
- 9:05क्या दो हुए क्या यंत्र दो लगाने पड़े नहीं लगाने पड़े।
- 9:10एक ही यंत्र से दोनों माप लिए गए तो सत्ता दो कैसे हो गई?
- 9:16सर्दी और गर्मी की सत्ता दो कैसे हो गई?
- 9:20जब एक ही यंत्र से माप लिए गए ब्रह्म और सृष्टि यह सत्ता तो दो
- 9:31दिखती हैं, दो हैं दोनों एक दूसरे पर आश्रित हैं।
- 9:39यही मैंने बात कही सेक्स एंड। एक दूसरे के परिपूरक हैं।
- 9:44एक दूसरे पर आश्रित भोजन न खाओगे तो कैसे?
- 9:51आपके भीतर बल और वीर की वृद्धि होगी।
- 9:55तो फिर दोनों विपरीत कैसे हो गए? अन्न से ही बाल और वीर की वृद्धि
- 10:04होगी। दोनों उलट कैसे हो?
- 10:09हंगर क्या है? जब शरीर अन्न मांगता है, वह हंगर
- 10:14और अन्न का उसने क्या करना है? बाल पैदा करना है रोज़मर्रा की?
- 10:20कामकार करिये और क्या पैदा करना है।
- 10:24रिप्रोडक्टिव सिस्टम में भी पैदा करना है, अंडाणु पैदा करना है,
- 10:30होते तो उसी अन्य के द्वारा ही हैं, जो हंगर में आप खाते हैं तो
- 10:36फिर दो कैसे हो? इसी प्रकार सृष्टि में सभी जड़ वे
- 10:45चेतन सृष्टि एक दूसरे पर निर्भर है।
- 10:55यही रहस्य है। आखरी शब्द सुनी है तैत्रीय उपनिषद
- 11:05का नवम वक्त यही रहस्य है। क्या ब्रह्म और सृष्टि दो सत्ताएँ
- 11:15हैं लेकिन एक दूसरे पर आश्रित हैं?
- 11:23शब्दों में तो ऐसा ही बोला जाएगा। क्या करें शब्द बड़े शूद्र शब्द
- 11:31बड़े सीमित हैं तो प्रज्ञा पूछती है।
- 11:39ये बाबा मेरी तो समझ में नहीं आई, समझ में नहीं आई रहस्य कभी समझ
- 11:44में नहीं आता, सृष्टि समझ में आ जाती है।
- 11:49डॉक्टर्स ने आज हर चीज़ का विश्लेषण कर लिया है।
- 11:53काँट पीट के सब चीजें आपके सामने रखती हैं।
- 11:58और जो रह गया वो खोजबीन और हो जाएगा लेकिन बात तो रहस्य जड़
- 12:08आपकी समझ में आ जाएगा। चेतन आपकी सब्ज में नहीं आएगा जड़
- 12:14वह जो आपकी बुद्धि। के द्वारा नाप लिया जाए और चेतन
- 12:25वह जो बुद्धि में किसी हालत में छू भी न पाए, उस चेतन को आप, आपकी
- 12:34बुद्धि। छू भी नहीं पाती।
- 12:36बहुत दूर खिसकी रह जाती है तो तरेतरी उपनिषद का यह नवम अनुवाक
- 12:49लोगों ने तो बड़ा। व्याख्या करने वालों ने तो बड़ा
- 12:54व्याख्या किया, लेकिन इसका भीतरी रहस्य है क्या?
- 12:59लिख तो दिया कि ये रहस्य बट व्हाटस दी?
- 13:03सीक्रेट बिहाइंड इट थोड़ा सा इसके बारे में तो बोल दो फिर चुप हो
- 13:09जाते हैं ऋषि। तीसरी क्या देते हैं?
- 13:15अब शास्त्र का अनुवाद करने वाले भी तो इतने जानकार हैं।
- 13:22शब्दों तक की व्याख्या कर देंगे। ये आचार्य लोग बिल्कुल कर देंगे,
- 13:27लेकिन शब्दों के भीतर का रहस्य। इशारा करना बड़ा आसान है।
- 13:32इशारा मैं कर देता लेकिन रहस्य कहाँ ये ये रहस्य है क्या?
- 13:38इस स्किट टॉप पे नहीं, अब इसको अज्ञानी व्यक्ति टॉप ऑफ़ दी साइन।
- 13:49इस साइन के इस इशारे के डाक को पकड़ लेगा।
- 13:56कहाँ है चंद्रमा, दिखाओ कहाँ है परमात्मा दिखाओ, नहीं दिखाया जा
- 14:01सकता, रहस्य की तरफ इशारा था, इसको आपने खो दिया।
- 14:07इशारे किसी में स्ट्रेट लाइन में झाँक लेते तो बात स्पष्ट हो जाती
- 14:16तो कहा कि अनभ्रम है बिल्कुल ठीक है, अनभ्रम है अब मेरी बात को
- 14:24विस्तार से समझने की। चेष्टा कीजियेगा, थोड़ी थोड़ी समझ
- 14:29आयेगी क्योंकि इशारों में समझाऊंगा शरीर जब पैदा होता है तो
- 14:38कितना होता है यही तीन पांच किलो? और वही शरीर जब गर्भ में प्रवेश
- 14:46करता है तो कितने वजन होता है, कितना भी वजन नहीं होता, नेगलिजबल
- 14:52वजन होता है। जब गर्भ में प्रवेश किया, स्पर्म
- 14:56में अंडाणु से मिला तो कितना भजन होता तोल क्या बताये, वैज्ञानिक
- 15:02से कहिए। तो कहेंगे माइनस के अंदर दशमृत
- 15:07कितने इतने ग्रह और जप ग्रह में प्रवेश भी नहीं किया था तो कितने
- 15:16ग्रहण का था? कुछ भी ग्रहण नहीं था।
- 15:19फिर तुम हो कहाँ? उससे पहले तुम अपने पिता के भर्म
- 15:27में विद्यमान थे और तुम्हारी माता के अंडाणु में विद्यमान थे और ये
- 15:33दो चीजें थी एक को जड़ कह लो, एक को चेतन कह लो।
- 15:42वाय क्रोमसोम को आप चेतन कहलू समझाने की बात कर रहा हूँ?
- 15:46एक्स क्रोमसोम को आप सृष्टि करें। दोनों का मिलन हो गया लेकिन दोनों
- 15:52का मिलन हो के ही तो आप बने और फिर ऊपर से पोषण हो गया।
- 15:59पानी चाहिए, खाद चाहिए, सूरज की रोशनई चाहिए, हवाएं चाहिए क्या
- 16:06नहीं चाहिए पोषण किरण आप धीरे धीरे धीरे धीरे वेट गेन कहते रहे
- 16:12माता के जरिए बढ़ते रहे, बढ़ते रहे।
- 16:16किसी वक्त ऐसा आया कि मटर के दाने के समान आपका वजन हो जाता है और
- 16:23फिर बढ़ता रहता है। माता के गर्भ में आपको पोषण मिलता
- 16:27रहता है और नाल कहते हैं हम और नाल वह जो बच्चे के जनम के पश्चात
- 16:35हम काट देते हैं। जो नाभि में छिद्र होता है ना वो
- 16:38ओरनाल को काटने का छिद्र होता है। यहीं से पोषण मिलता है।
- 16:45यहीं से जीवन मिलता है। बच्चे।
- 16:54आप जो इतना अभिमान करते हो कि मैं मैं हर वक्त अब थे कहाँ ज़रा बहक
- 17:01में जाइए, अगर थोड़ी भी बुद्धि है तो आप थे कहाँ?
- 17:05जन्म के वक्त आप दो पांच किलो के थे।
- 17:09और जीस वक्त आपने घर में प्रवेश किया सपरम और अंडाणु के रूप में
- 17:14आत्मा को तो छोड़ दीजिए उसका तो अभी आपको पता नहीं है लेकिन साइंस
- 17:19इतना तो समझा पाएगी के सपरम और अंडाणु मिले तो आपकी उत्पत्ति
- 17:27हुई। क्योंकि वह सिर्फ साइंस सिर्फ
- 17:33आपके शरीर को ही आपका होना मानती। उसके बाद डेवलपमेंट हुई और सारा
- 17:40ब्लू प्रिंट था। उस बीज के भीतर वहीं विकसित होना
- 17:45शुरू हो गया और वह 1 दिन पेड़ बन गया।
- 17:48पेट बन गया तो बाहर आ गया, बाहर आ गया बच्चा दो पांच किलो का था
- 17:54बढ़ता गया आज आप क्विंटल हो गए दो क्विंटल हो गए किस्से बड़े अन्न
- 18:03से बड़े तो अन्न को भ्रम इसी लिए कहा गया।
- 18:07ब्रह्म या नहीं? फैलाव अनम भ्रम अन्न भ्रम है,
- 18:15बिलकुल ठीक है अन्न से ही आप बड़े अन्न से ही आप फैले सप्रम की
- 18:22नेगलिजबल वेइट से लेकर। आप आज दो क्विंटल के क्विंटल के
- 18:2760 किलो के रह गए और वेट कहाँ से गेन किया?
- 18:31आपने अन्न से और अन्न कहाँ से आया?
- 18:36पृथ्वी से, वायु से, आकाश अग्नि से, सूर्य की अग्नि से?
- 18:47इन सब का सबमिश्रण एक बूथ खड़ा हो गया।
- 18:52लेकिन एक बात को ध्यान रखना जो तितरिय उपनिषद में आप समझ नहीं
- 18:56पाओगे, याद पे लिखा हुआ है बस इसी रहस्य से आप चूक जाते हो
- 19:02व्याख्याकार लोग। क्या रहस्य कि सृष्टि और ब्रह्म
- 19:15ये दो हैं और दूसरे एक दूसरे के ऊपर निर्भर हैं?
- 19:23रस पर निर्भर है। तो फिर क्या दो खाक हुए फिर तो एक
- 19:31ही हो गए। जब एक दूसरे के ऊपर निर्भर हैं तो
- 19:37दो हो कैसे गए? बहुत आगे की बात है मैं समझाऊंगा
- 19:47तो आप समझ तो ना पाओगे लेकिन मेरे इशारों की तरफ बराबर देखने में
- 19:54ज़रा भी खुदाई मत करना। अब शरीर की बात तो मैंने समझा दी।
- 20:01लेकिन अब एक उस रहस्य की बात को मैं समझा दूंगा जो इस त्रेतरी
- 20:06उपनिषद के नम वाक्यांश में बिल्कुल आखिर में कहा गया कि यही
- 20:12रहस्य है। जड़ और चेतन दो हैं और परस्पर एक
- 20:17दूसरे पर निर्भर हैं। यही रहस्य है।
- 20:24कुछ तो समझाने में आता नहीं कुछ इनको खुद भी समझें वो रहस्य क्या
- 20:33वो रहस्य ये है कि आप सपरम और अन्धाणु कितना ही मिल जाए?
- 20:41अगर उसके भीतर ये रहस्य ना उतरेगा जैसे हम पर बात ना कहते हैं तो
- 20:46उसमें ज़िन्दगी नहीं आएगी, जान नहीं आएगी और आप अब दो दो क्विंटल
- 20:52के हो गए हो, क्विंटल के हो गए हो।
- 20:5460 किलो के हो गए अगर आप अब ये रहस्य निकल जाए आपके शरीर में।
- 21:01तो धड़ाम से आपकी सारी मिट्टी गरज आयी, ये किसके कारण था?
- 21:10ये उस रहस्य के कारण था जिसे उपनिषद के रिशियों ने बाद में
- 21:16जाकर कहा कि यही रहस्य है। वो क्या रहस्य मैंने आपको समझाया
- 21:24गर्व में जब अंडाणुष पर मिला अगर आत्मा न उतरती तो उसमें जीवन ना
- 21:29होता, बस डेड पैदा होता है, कई बच्चे डेड पैदा होते हैं, मांस का
- 21:36फैलाव होता जाता है। सारा ब्लूप्रिंट है दोनों में वो
- 21:43बस बढ़ता जाता है, पोषण बचता जाता है लेकिन श्वास लेने वाला कहाँ
- 21:50है? वो चेतना कहाँ उतरी, चेतना उतरी
- 21:55नहीं, यह छोड़ के चली गई। और जैसे ही चेतना छोड़ के चली गई
- 22:02बच्चा वेट में तो पूरा होगा, जीवंत ना होगा और आज आप एक
- 22:13क्विंटल के हो, दो क्विंटल के हो, 60 किलो के हो।
- 22:16आपको पता नहीं है कि यह पुतला चल कैसे रहा है?
- 22:24यह उस रहस्य के कारण से चल रहा है अगर वह रहस्य ना होता सृजना के
- 22:32भीतर। तो प्रकृति होती सिर्फ प्रकृति
- 22:37होती प्रकृति को रचन हरा जिसे परमात्मा कहते हैं वो न होता तो
- 22:48आपका शरीर पुतले के समान होता। इसी रहस्य के आने से जीवन आता है
- 22:57और इसी रहस्य के शरीर से बाहर चले जाने से जीवन चला जाता है।
- 23:02यानी रहस्य जीवन है। संत लोग आपको इस रहस्य के बारे
- 23:12में ऐसे ही। इशारे कर सकते हैं।
- 23:19इशारों से अलावा उनके पास और कुछ नहीं है।
- 23:25इन इशारों से आप समझ जाओ। ये इशारे भी बड़े महत्वपूर्ण है।
- 23:32आपकी मूडता को मिटाने के लिए ये इशारे भी।
- 23:36बड़े महत्वपूर्ण हैं। रैदास ने कहा माटी को पुत्रो कैसो
- 23:42निचित है, अब वो क्या कह रहे, ये नाचता किस कारण से है?
- 23:49क्या है इस नाच के पीछे की व्यवस्था?
- 23:53वह कौन है? जिसके कारण यह माटी का पुतला
- 23:58नाचता है। वे उसकी बात कर रहे हैं।
- 24:04भजन तो गाते हैं रहदास लेकिन भजन के पीछे का मर्म भी आपको इशारों
- 24:10इशारों में समझा देते हैं कि ज़रा उसकी तरफ झांकिए।
- 24:15जिसके होने के कारण यह माटी का पुतला नचत है।
- 24:21वह कौन है? वहीं रहते सर दैट एस दी।
- 24:36लेकिन वैज्ञानिक कहेंगे, साइंटिस्ट कहेंगे, नास्तिक कहेंगे
- 24:43हमने तो देखा नहीं कभी हम तो मानते हैं ठीक है मतलब आपने तो
- 24:49बहुत कुछ नहीं देखा। आपके पास कोई पेशेंट आता है।
- 24:55कहते हैं डॉक्टर साहब दर्द बहुत हो रहा है तो आप उससे पूछते हो कि
- 24:59दिखाओ दर्द को निकाल के दिखाओ, कहाँ है वो दर्द?
- 25:03मैं ठीक करू पूछते हो कभी नहीं तो फिर कैसे मान लेते हो कि ठीक है,
- 25:10दर्द होता है? वायु चलती है, वायु वेग से चलती
- 25:17है, आपके शरीर को शीतलता और गर्मी प्रदान करती है।
- 25:22लू लग जाती है, ठंडी लग जाती है कहाँ है, ठंडी कहाँ है गर्मी
- 25:30दिखाओ। ये दर्द होता है।
- 25:38कहाँ है दर्द? ये आपका तर्क बर्द है, जो चीज़
- 25:48दिखती नहीं, हम उसे मानते नहीं, फिर दर्द को भी मत मानो।
- 25:53फिर ठंडी गर्म को भी मत मानो फिर आग की तपिश को भी मत मानो, ये तो
- 26:00दिखती नहीं आग दिखती है तपिश कहाँ दिखती?
- 26:06बर्फ़ दिखती है, बर्फ़ की ठंड कहाँ दिखती है।
- 26:13तो ठंड को आप इंकार कर दो और फिर आप चूक जाओगे, एक सत्य से चूक
- 26:20जाओगे, ईश्वर की इतनी बड़ी संरजना का सत्य चूक जाओगे।
- 26:25आप अपने आपको बहुत बुद्धिमान समते है और आपको यह पता नहीं।
- 26:32कि आप जीतने बुद्धिमान हों, उसकी संख्या कितनी कह?
- 26:41वैज्ञानिक कहते हैं कि हमारी धरती पर जीतने रेत के कण हैं, अब ध्यान
- 26:47से सुनें बापू। वैज्ञानिक कहते हैं कि हमारी धरती
- 26:52पर जीतने रेत के कण हैं, उतने ही इस सर्जना में इस सृष्टि में उतने
- 27:00ही तारे हैं अवगणीय कितने तारे हैं?
- 27:05पहले तो रेत के कण घने। जीतने रेत के कण हैं उतने ही तारे
- 27:13हैं हमारे ब्रह्मण्ड में आपकी क्या उगाता है सूरज के भीतर
- 27:2313,00,000 पृथ्वीया समा सकती हैं। सूरज के भीतर 13,00,000 पृथियों
- 27:31समा सकती हैं, इतना व्यास है सूरज का और आपकी धरती पर एक आदमी
- 27:45हनुमान जी सूरज को निगल लेता है। आपने कभी जानने की चेष्टा की
- 27:58मानने पर ही आपने ज़ोर दिया और इसीलिए बुद्धू रह गए साइंस हमारे
- 28:08पास थी। साइंस के हम विद्वान् थे, साइंस
- 28:15के हम महारथी थे। हमारे मनीषियों के पास साइंस ही
- 28:21तो थी। लंका निवासी रावण के पास पुष्पक
- 28:28विमान था। उससे पहले आप पुष्पक विमान या
- 28:31विमान किसी के पास था और वो रिमोट कंट्रोल था?
- 28:42रावण हाथ ऊपर करता, विमान ऊपर उठ जाता, रावण हाथ नीचे करता।
- 28:48विमान नीचे हो जाता, दायें हाथ लहराता विमान दायें मुड़ जाता,
- 28:55बाएं लहराता बाएं मुड़ जाता, रिमोट कंट्रोल का आज तो बन गया,
- 29:02आज तो हमें पता चल गया अगर इसकी खोज न होती।
- 29:06तो हम अपने दिमाग की सड़ी हुई खोपड़ी में यह इन्फॉर्मेशन लिए
- 29:10चलते रहते हैं कि नहीं? ऐसा कुछ नहीं था और बहुत से लोग
- 29:16महाभारत तथा रामायण को एक कपोल कल्पित नावल उपन्यास कह के इसकी
- 29:23अवहेलना कर देते हैं कि ऐसा कुछ हुआ।
- 29:28खैर, ये उनका मसला है। आस्तिकता नास्तिकता का स्वयं का
- 29:33मसला होता है। किसी दूसरे को इससे कोई लेना देना
- 29:37नहीं होता तो आपने आस्ती को होना या नास्ती को होना है।
- 29:45दैट सी यू आर ओन चॉइस यह आपकी खुद की चॉइस है ये बाहर की चीजें तो
- 29:55बड़ी विशाल है ध्रुवतारा। करीब 440 प्रकाश वर्ष दूर है
- 30:12हमारे से और ऐसे तारे जो हमें नजर आते हैं धरती से चमकीले तारे उन
- 30:21तारों में से 45 तारे हमें नजर आते हैं खुली आँखों से।
- 30:27जो हम देख सकते हैं 45 चमकने वाले तारे हम देख सकते हैं तारे तो
- 30:33बहुत है चमकने वाले लेकिन हम नग्न आँखों से या किसी हल्की सहायता से
- 30:41दूर होने से 45 तारे चमकते हुए देख सकते हैं।
- 30:45उनमें शुक्र भी है। मैं ध्रुवता अभी लेकिन इतना ही
- 30:59संसार कहाँ है? अभी मुझसे कल ही एक सवाल पूछा
- 31:03किसी कि आप एस्टर ट्रैवेलिंग की बात करते हैं भला?
- 31:09बता पाओगे कि जीवन किस क्षेत्र में विद्यमान है।
- 31:15मैंने कहा बता तो पाऊंगा, लेकिन आप जा नहीं सकते।
- 31:19आज तो हर्बल टेलीस्कोप थी। पहले आज जेम्स वेव टेलीस्कोप की
- 31:24संरचना हो चुकी है तो हम कैसे जान पाएंगे।
- 31:29जान तो पाओ गया थोड़ी सी और। व्यवस्था महीनकर सूक्ष्म,
- 31:37पारदर्शी ऐसी व्यवस्था कर लो कि थोड़े और दूर झांक सको।
- 31:43देखिए तारामंडल आता है सतदर्शी सप्तर्षी तारामंडल की बिल्कुल
- 31:50सिद्ध है। ध्रुव तारा पाओगे जिसे हम नॉर्थ
- 31:53पोल का देते हैं। सप्तऋषि किसने नहीं देखे?
- 31:59ये सात तारे हैं जो आप शाम को रात को देख सकते हैं।
- 32:04चार तारे तो वर्गाकार और तीन तारे पुछ की तरह।
- 32:12ये किसने नहीं देखे होंगे? सभी ने देखे होंगे तो सप्तर्षी
- 32:19मंडल के बिल्कुल ऊपर नॉर्थ पूल नॉर्थ पूल के अगर वेस्ट में हम
- 32:25जाएंगे, यह नॉर्थ में है। नॉर्थ पोल नॉर्थ में है और जब
- 32:32हमारे पास कंपास वगैरह का आयोजन नहीं होता था तो हम इस ध्रुव तारे
- 32:37को ही या सप्तर्षी मंडल को ही अंदाजे के साथ गिरकर अपनी
- 32:45यात्राएं करते थे। समुद्र की यात्राएं लेकिन आज तो
- 32:54बहुत विज्ञान ने तरक्की कर दी। वो देखिये मैं आपको समझा दूँ।
- 32:58सतर्शी मंडल के बिल्कुल ऊपर सतर्शी मंडल का सारा समूह
- 33:04ध्रुवताय के आसपास भ्रमण करता है। ये दोनों नॉर्थ में हैं, सप्तर्षी
- 33:14मंडल भी और ध्रुवता तो उसके वेस्ट में जाइएगा।
- 33:21पश्चिम में जैसे जैसे आप पश्चिम में जाओगे आपको अनेकों धरतियाँ
- 33:27मिलेंगी। एक नहीं अनेकों धरतियाँ मिलेंगे।
- 33:35देखने में वो गरीब लगेंगे, लेकिन दूर बहुत देखने में तो हमें
- 33:42ध्रुवधारा भी गरीब लगता है लेकिन उस तक पहुंचने के लिए।
- 33:49करीब 430 लाइट ईयर्स 430 प्रकाश वर्ष ऋतु यानी प्रकाश की गति से
- 34:01अगर आप एक रॉकेट तैयार करते हो तो आपको 430 वर्ष रखेंगे।
- 34:07प्रकाश की गति क्या होती है? 1,86,022 पर एक सेकंड में
- 34:141,86,000 मिल कैसे थप पाओगे इसके और आप इसके ऊपर बहस करने आ जाते
- 34:23हो? छोटी छोटी पोतियां।
- 34:26बगल में पौथी थी। भाई आओ बाबा शास्त्र हसकर किसके
- 34:32बारे में परमात्मा के बारे में उस विराट के बारे में जीस?
- 34:39विराट की सृजना के भीतर पृथ्वी के ऊपर जीतने कण हैं रेत के?
- 34:46उतने तारे बनाए उसने और लगातार बनता जा रहा है।
- 34:53वैज्ञानिक कहते हैं कि फैलाव हो रहा है, सारी सृजना का फैलाव हो
- 35:03रहा है। बढ़ रहे हैं।
- 35:05लगातार कौन बना रहा है उसने बंद नहीं किया है।
- 35:10सर इसे ही रहस्य कहते हैं जब आपके अंडाणु और स्पर्म के मिलने से जब
- 35:26तक वो रहस्य प्रवेश नहीं कर पाता। तब तक तो वो लोत होती है और जब वो
- 35:32रहस्य उसके भीतर से निकल जाता है तब फिर लोत हो जाती है।
- 35:36यानी के आप तो पहले भी लोत थे, आप बाद में भी लोत हो गए तो बीच में
- 35:42अगर गति मान रहे? अगर जीवंत प्रतीत नजर आए तो किसकी
- 35:47वजह से प्रतीत नजर आए। इस रहस्य के कारण पूर्व रहस्य
- 35:55क्या है? अब तेतरी उपनिषद ने आखिर में आके
- 35:59कह दिया कि यही रहस्य जड़ और चेतन दो सत्ताएँ हैं।
- 36:04लेकिन ये दो सत्ताएँ परस्पर निर्भर हैं।
- 36:08बोथ अरे डिपेंडेंट ऑन ईच ऑदर तो बड़ा सुन्दर शोक है।
- 36:16अगर परास्परिक एक दूसरे पर निर्भर हैं, तो फिर दो सत्ताएँ हो कैसे
- 36:23भी? अगर पानी निर्भर है वाष्प बनने
- 36:30में और पानी निर्भर है फ्रिज होने में तो ये तीन सत्ताएँ कैसी हो गई
- 36:36लिक्विड वाष्प और सलत ये तीन सत्ताएँ कैसे हो गई?
- 36:42सत्ता तो एक है। वो जब तरल की तरह होता है, पानी
- 36:47तो लिक्विड नजर आता है, उबाल दिया जाता है तो वास्वा बन जाता है तो
- 36:54गैस की तरह नजर आता है और कन्डेन्स कर दिया जाता है, फ्रीज़
- 36:58कर दिया जाता है, बर्फ़ बन जाता है तो सॉलिड की तरह नजर आता है।
- 37:05लेकिन सत्ताएँ तीन कैसे हो गई? फॉर्म तीन हो गई।
- 37:10बिल्कुल ठीक लेकिन सत्ताएँ तीन कैसे हो गई इसके लिए मैं कहता हूँ
- 37:14जड़ और चेत दो सत्ताएँ हैं तैतिया के हिसाब से लेकिन दो सत्ताएँ
- 37:21हैं। दो हैं कहाँ जब पानी वाष्प बनता
- 37:28है तो सत्ताएँ दो होती हैं नहीं वो ही एचिट वो वाष्प का रूप ले
- 37:36लेता है और जब फ्रिज होता है बर्फ़ बन जाता है वो ही एचिट वो।
- 37:41बर्फ़ का रूप ले लेता है, लेकिन कहीं उसकी बुनियादी गुणवत्ता
- 37:46बदलती और अगर हम तोड़ भी लें तो फिर भी कैसे बदलेगी?
- 37:55हाइड्रोजन और ऑक्सीजन रह जाएगा, हम उनको तोड़ भी दें।
- 38:01तो दो आइटम्स हाइड्रोजन की ओर एक आइटम ऑक्सीजन बच जाएगी।
- 38:08मूलभूत परिवर्तन कहाँ हुआ कहीं नहीं हुआ, लेकिन आपकी आँखों ने
- 38:16परिवर्तन देखा बिल्कुल सख्त है। जब पानी लिक्विड्स रूप में था तो
- 38:23आपने उसका कुछ और रूप देखा। जब पानी उड़ गया, नजर भी नहीं
- 38:29आया, वाष्प बन गया, वह प्रायः हो गया तो भी आपने उसका कुछ दूसरा
- 38:34रूप देखा और जब पानी ठोस बनकर। बर्फ़ की तरह आपको बिल्कुल दिखने
- 38:40लगा, आपको चोट भी पहुंचा सकता है। आपने देखा बर्फ़ की धार तलवार की
- 38:45धार के सामान घुस जाती है। सर में हमारा खून निकलेगा, वही
- 38:51पानी वही गैस जीसको सिर में लगने से चोट नहीं पहुंचती।
- 38:56तो अगर आप कहो कि मैं गैस के द्वारा दो हाइड्रोजन के एटम और एक
- 39:03ऑक्सीजन का और आपके सर फाड़ दूंगा, आप कहोगे हो ही नहीं सकता,
- 39:07लेकिन सर फट जाता है अगर वो ही पानी, बर्फ़ में फ्रिज हो जाए तो
- 39:12सर फट सकता है, तलवार की धार जैसा काम करेगा।
- 39:18लेकिन आप मानने को तैयार नहीं होते।
- 39:20आप तो बहुत सी बातें मानने को तैयार नहीं होते, आप तो कुछ भी
- 39:24मानने को तैयार नहीं होते। सही देखो और आपकी आँखों की दृष्टि
- 39:30है कितनी? बड़ी महीन दृष्टि लिए भरते हो आप
- 39:34और आप कहते हो मैं को नमन मत मानो भाई आपको कहता भी कौन है तो
- 39:46कुश्ती हैं प्राची प्रज्ञा के बाबा मुझे तो समझ नहीं आया।
- 39:54देखिये बात यह। रहस्य कभी समझ आएगा ही नहीं।
- 40:00पहले तो इस भ्रांति को अपने कोपरे से निकाल दो और ये जो रोग
- 40:07गपोड़पंथी लोग तुम्हें समझाने की चेष्टाओं में व्यस्त हैं, सारे
- 40:13दिन भर रात 2400 घंटे। यह आपकी बुद्धि के साथ खिलवाड़
- 40:18मात्र कर रहा है। वह जो बुद्धि की पकड़ में आता उसे
- 40:29आप बुद्धि के द्वारा समझने की चेष्टा में संलग्न हूँ।
- 40:33और ये सारे महान पुरुष उस रहस्य को आपको बुद्धि के द्वारा समझाने
- 40:39की चेष्टाओं में संलग्न हैं, इसलिए मैं इन सबको बुद्धू कहता
- 40:46हूँ, ये बुद्ध नहीं अगर बुद्ध होते।
- 40:51तो बुद्ध अगर बताना नहीं चाहते तो एक बात कहते थे देखो भाई ये 14 तो
- 40:56अब व्याकृत प्रश्न इनका जवाब तो मुझसे पूछना ही मत, क्योंकि ये वो
- 41:03प्रश्न है जिसके जवाब के ऊपर अगर आपने सवाल कर दिया।
- 41:10ये वो प्रश्न है कि जिनके जबाव के ऊपर आपने कोई सवाल कर दिया तो फिर
- 41:18मैं उसका जुगाब न दे पाऊंगा, क्यों?
- 41:22बात तो बुध्वी को ही कह रहे। अगर मेरे आपने कोई सवाल पूछा और
- 41:29मैंने जवाब दे दिया और मेरे जवाब के ऊपर आपने कोई सवाल कर दिया तो
- 41:35मैं उसका जवाब ना दे पाऊंगा। क्यों ना दे पाऊंगा?
- 41:38क्या मैं जानता नहीं? बिलकुल जानते।
- 41:42लेकिन वो जवाब दिया नहीं जा सकता। दट कैन नॉट बी एक्सप्रेस इन
- 41:46वर्ड्स। इसलिए मैं पहले ही आपसे कहता हूँ
- 41:50कि ये 14 प्रश्न तो मुझसे पूछना ही मत यद्यपि बुध से भरा और जानता
- 41:57कौन है बुध उस रहस्य को? समझ लेते हैं, उतार लेते हैं अपने
- 42:03पति इसलिए तो मौन हो जाता है। आप चाह कर भी मौन नहीं हो पाता
- 42:09है, लेकिन बुद्ध ऐसे मौन हो जाते हैं कि देवताओं को डर लगने लगता
- 42:17है। की कहीं ऐसा ना हो की ये मौन ही
- 42:22ना हो जाए और फिर इसने जो देखा उसको व्याख्याय नहीं कर सके तो
- 42:30फिर ये संसार जल रहा है, इसको शीतलता मिलेंगे।
- 42:34कैसे? इसका मौन होना खतरनाक है?
- 42:39जिसने जान लिया उसका मौन होना सदा ही खतरनाक रहता है।
- 42:43हालांकि वह व्यक्ति मौन होना चाहता है।
- 42:49बड़े मज़े की बात है। वह मौन होना चाहता है।
- 42:59और आप चाहते हो कि ये कुछ बोले लेकिन उसकी अंतः आत्मा उसको भीतर
- 43:08खचती है तो पी ले इसको जन्मो जन्मो की प्यासी रूप सूरत कलारे।
- 43:19भाई मतवारी मतवा पी गई बिन तोले विथाउट एनी मेजरमेंट कोई जाम का
- 43:27प्यारा न था, जिससे इसका माप कर लिया जाए की मैं इतनी उड़ेल रहा
- 43:33हूँ, इतनी गटक रहा हूँ। बिन तोले मदवा पी गई, बिन तोले
- 43:42बुद्ध बोलना नहीं चाहते सही बुद्ध जितना उपकार आप लोगों के ऊपर करते
- 43:48हैं, उतना उपकार कोई भी नहीं कर सकता।
- 43:56वैज्ञानिक भी इतना उपकार नहीं कर सकते।
- 43:59वैज्ञानिक मात्र शरीर के सुख के लिए उपकरण पैदा कर देंगे,
- 44:04सिद्धांत खोज देंगे, चीजें बना लेंगे, जिंदगी आसान कर देंगे, समय
- 44:11की बचत कर देंगे। लेकिन समय से पार नहीं हो पाया।
- 44:16समय से पार तो कोई बुद्ध होता है, महावीर होता है, कृष्ण होता है और
- 44:24समय के पार जो हो गया, वह इन बेवकूफों में पड़ेगा नहीं।
- 44:34कि वह समझाया जा सकता है। वह तो पहले ही बुद्ध की तरह कह
- 44:38देगा। देखो ये 14 प्रश्न अब व्याकृत
- 44:41प्रश्न है, ये व्याकृत किए ही नहीं जा सकते, इनके बारे में
- 44:47पूछना मत और पूछ लेना। आपका ज्वलंत प्रश्न और बहुत है और
- 44:51बुद्ध अच्छी तरह जानते हैं। आपका असली ज्वलंत प्रश्न क्या है?
- 44:56आपका असली ज्वलंत प्रश्न क्या है? एक गम निष्ठ ऊंचे ऊंचे आवाज लगा
- 45:03रहा था। उसके साथ उसके मित्रगण खड़े थे।
- 45:08बड़ा हो हल्ला था, बहुत रश था, बड़ी भरी पूरी जमात थी, इंकलाब
- 45:15जिंदाबाद के नारे चल रहे थे और वो बीच में बोला जा रहा था अच्छा
- 45:21भक्ता रहा होगा, वोकबुलरी अच्छी रही होगी।
- 45:25वह बोले जा रहा था, धड़ाधड़। बूँ कर देंगे, बूँ कर देंगे, मिटा
- 45:30देंगे बराबर लेकर आओ सब ये पूंजीपतियों को ऐसा ऐसा ऐसा और
- 45:37पूंजीपत दो बराबर है न कहे तो काम खराब करे, चिंगारी को इससे पहले
- 45:43के आग बन जाए, चिंगारी को ही दबा देना अच्छा।
- 45:50तो इसको दबा दो, वो सेठ लोग पान साथ इकट्ठे हो के किसका इलाज तो
- 45:59करना पड़ेगा चले गए उसके पास। हाँ भैया, तुम इतनी ज़ोर ज़ोर से
- 46:06बोल रहे थे कम नहीं जमाना चाहिए, समाजवाद आना चाहिए, सब में बराबरी
- 46:09बराबरी बढ़ जाना चाहिए। बिल्कुल बोल रहा था बोलेंगे जब तक
- 46:15जान है बोलेंगे मर जाएंगे, मिट जाएंगे, सिर धड़ से अलग करवा
- 46:21लेंगे, पर बोलेंगे। तो उसने 510,00,00,000 की गुटियां
- 46:27रख दी। वो कहते ये लो भाई अब बोल रहे है
- 46:33तो बोल लो तो उसने चुपके से उठा के अलमारी के भीतर रख दिया।
- 46:41और दूसरे दिन बाहर न निकला। अब उसके ये तो कम्युनिज्म खत्म हो
- 46:47गया ना? कम्युनिज्म की व्यवस्था उसके लिए
- 46:52तो खत्म हो गई, वह तो खुद ही पूँजीवती हो गया।
- 46:57अब जनता उसके दरवाजे पे खड़ी है। निकलो, बाहर आओ क्या बात है?
- 47:01वो कहते है मैं बीमार हो, मुझसे तो चला ही नहीं जाता, आप एक बार
- 47:08कैसे कैसे काम चल रहा हो? सो चाणक्य ने चार व्यवस्थाएँ खोजी
- 47:14राजनीति की शाम दान दंड है, लेकिन वो चूक गया इस बात से।
- 47:21कि काम तो सिर्फ सांप और दान ही आता है।
- 47:25दंड और भय तो एक बार लगते हैं कि काम कर गए आप जीसको दंड दोगे, तुम
- 47:32याद रखना वह ज्यादा ताकत के साथ आपके ऊपर प्रहार करेगा।
- 47:38तो भूल के भी कभी किसी को दंड मत दे देना भूल कर भी कभी किसी को
- 47:44दंड मत कर देना, आप खुद का विनाश किसी को दंड दे के खुद का विनाश
- 47:51भी आमंत्रित कर रहे हो राजनीतिज्ञों के लिए एक सबक।
- 47:57भूल कर भी किसी को भय मत दिखा लेना क्योंकि जिसे आप भेद खाओगे
- 48:03और दमन किया हुआ भय इतने तेज प्रहार से बली होकर बाहर आक्रमण
- 48:09बनेगा के उसे आप समेट न पाओगे, उसे आप निपट न पाओगे, इसलिए गलती
- 48:16मत करना। राजनीति को चलाने वाले शासकों
- 48:23चाणक्य कुछ भी कह गए हों लेकिन चाणक्य का हश्र देखो।
- 48:28जब चाणक्य मरा तो सुबंधु ने आज तक लोग कहते हैं, उनकी मृत्यु का पता
- 48:35नहीं चला, मैं बता देता हूँ। उनकी मृत्यु कैसे हुई?
- 48:41चंद्रगुप्त मौर्य का बेटा बिंदु सर जब राजा बना हो तो चन्हक मौजूद
- 48:49था। उर्स बंधु नाम का एक।
- 48:58अधिकारी राजा के करीब था और उसको चाणक्य की करीबी बिंदु सार से
- 49:08बिल्कुल भांति न थी। उसने कहा कैसे चाणक्य को उलट कर
- 49:13दिया जाए? बिंदु साहब से तो उसने बहका दिया
- 49:18कि आपकी माता की मौत के लिए चाणक्य जिम्मेदार हैं।
- 49:25हालांकि चाणक्य जिम्मेदार नहीं थे।
- 49:27चाणक्य। चंद्रगुप्त मोरू को थोड़ा थोड़ा
- 49:30पॉइज़न रोज़ दे देते थे। खाने में हल्का सा पॉइज़न बिना
- 49:35बताए वो क्यों देते थे? क्योंकि थोड़े से पॉइज़न से आदमी
- 49:39मरेगा तो है नहीं तो उसके भीतर की व्यवस्था जैसे लुई पोस्चर ने ये
- 49:45बात गूंज ली। कि अगर हम उसी ही रोग के कीटाणुओं
- 49:50को निर्बल करके उस व्यक्ति के भीतर इंजेक्ट कर देंगे तो हमारे
- 49:55जो डब्ल्यूबीसी वगैरह प्रतिरक्षा प्रणाली है वह उसको मार देगी।
- 50:01और फिर जब असली घटावों आएँगे तो वह उसको भी मार देगी।
- 50:05यह लुई पाछर की खोज थी तो ये खोज लुई पाछर से बहुत पहले चाणक्य ने
- 50:12कर ली थी कि अगर शरीर को थोड़ा थोड़ा जहर रोज़ दिया जाए तो वह उस
- 50:19जहर से लड़ने की ताकत रखे। दो 4 दिन थोड़ा सा ढीला हमेशा
- 50:23रहेगा लेकिन फिर उससे लड़ने का वह इम्युनिटी पैदा कर लेगा इसलिए मैं
- 50:30कहता हूँ बच्चों को मिट्टी में खेल लेंगे बच्चों को मिट्टी में
- 50:37खेलने देने से। उनकी इम्युनिटी रोगों के प्रति
- 50:42विकसित हो जाएगी। लेकिन आप तो संगेमरमर के फर्शों
- 50:52के ऊपर बच्चों को पालते हो, उसके ऊपर भी डंडप के पिल्लों भी झा
- 50:56देते हो। और धूल गर्द का तो मतलब ही नहीं
- 50:59की वो आ जाए। इसलिए आपके बच्चे आज ढोलमुल है।
- 51:06वो लड़े नहीं उनकी प्रतिरक्षा पर नाली विकसित नहीं हुई तो चाणक्य
- 51:15थोड़ा थोड़ा जहर। बिंदु सार को दे देते थे।
- 51:22माफ़ करना चन्द्रगुप्त को दे देते थे तो चन्द्रगुप्त को जब थोड़ा
- 51:27थोड़ा जहरा आता था तो उसकी प्रतिरक्षा प्रणाली जहर के।
- 51:35मार्क तत्व को परास्त करने में कामयाब हो गई।
- 51:40वो देखते क्यों थे? जहर के कोई राजा यहाँ इन्वैट करे
- 51:48और जहर दे दे तो इससे मरे ना उसके भीतर की इम्युनिटी इतनी स्ट्रांग
- 51:53हो जाए। कि उस जहर को मात दे दे।
- 51:57इसलिए थोड़ा थोड़ा जहर रोज़ खिला देता था।
- 52:02हुआ ये कि 1 दिन गलती से राजा का वो भोजन बिंदुसार के माता ने खा
- 52:10लिया है। चन्द्रगुप्त मौर्या की गर्भवादी
- 52:16ने खा लिया। जैसे ही बिंदुसार की माता
- 52:24दुर्धारा ने वह भोजन खा लिया। तो उसकी तबियत बिगड़ गई क्योंकि
- 52:32उसमें जहर मिला था और उसके भीतर की प्रणाली जहर को मात देने में
- 52:41सक्षम ना थी। गलती से खा लिया था अब क्या करें?
- 52:49गर्भवती थी, गर्भ में बिंदु सार थे, चाणक्य को पता लगा भूल हो गई।
- 52:57या तो दुर्धारा खा गई तो जल्दी से सर जायरीन को बुलाया गया, सर्जन
- 53:05को बुलाएगी। फिर जायरीन किया गया।
- 53:09और बच्चे को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया।
- 53:14मृत्यु हो गई दुर्व्यधारक इसमें किसी का कसूर चाणक्य का कसूर
- 53:24बिल्कुल भी नहीं था। गलती थी भोजन परोसने वाले।
- 53:29तो बंधु ने यह बात राजा के कान में बिंदु सर के कान में उधेल दी
- 53:36और उसके अंदर जहर फैलाना शुरू कर दिया और बिंदु सर ने जब यह बात
- 53:41सुनी तो उसने चाणक्य के प्रति नफरत और हीन की भावना रखनी शुरू
- 53:45की। और जब ऐसा व्यवहार देखा चिणक ने
- 53:51तो चणक बड़े गट्स वाले आते थे। अभी माने नहीं थे, स्वाभिमान ही
- 54:00थे। मुकाम छोड़ दिया।
- 54:06राजदरवार छोड़ दिया जंगलों में अकेले निकल गए लेकिन सुबंधु को
- 54:11पता था कहाँ ठहरे हुए हैं। सुबंधु ने रात को सोए हुए चाणक्य
- 54:20के ऊपर मिट्टी का तेल छिड़क कर आग लगा दी।
- 54:27सोए हुए चाणक्य इतनी गहरी निद्रा में थे कि वह करीब करीब आधे से
- 54:34ज्यादा जल गए। चीखो चिल्लाटो हुई।
- 54:37सुनने वाला कोई किसी ने बचाए नहीं।
- 54:42कोई उपाय न था। अति जली हालत में महीनों तक चाणक
- 54:47वहीं तड़पते रहे और सुवन्धु लगातार उनका पता लेता रहा बाहर से
- 54:54कि अभी मरा नहीं है और इसी। महाकष्ठ काली लम्हों को सहते हुए
- 55:05चाणक्य निधन प्राणता करीब तीन महीने तक उन्होंने यह जलन की।
- 55:13व्याधि और वेदना सही, ऐसे चाणक का अंत हुआ।
- 55:22तो समधान दंड है या भेद, ये बाद वाली जो दो प्रवृत्तियाँ हैं इनको
- 55:31राजशाही कभी ना अपना अगर दंड दोगे तो याद रखना दंड पाने वाला
- 55:38व्यक्ति एक बार दब जाएगा। यह परमानेंट उपाय है ही नहीं।
- 55:43वह फिर ज्यादा बली होकर सर उठाएगा और फिर आपको कुछ और जीसको वेद
- 55:49खाओगे? 1 दिन वो आपके भय में एक बार दब
- 55:53जाएगा अनिश्चित लेकिन ये तो वो औषधियाँ हैं जो तत्काल प्रभाव से
- 55:58काम करती हैं। लंबे असर नहीं होते।
- 56:02इसके आयुर्वेद की तरह जड़ को खत्म नहीं करते।
- 56:08भय दिखाओगे। वह व्यक्ति एक बार डरेगा, बिल्कुल
- 56:11डरेगा, स्वभाव है आत्म, लेकिन वक्त बात कर वो भय उसके भीतर के
- 56:17आत्मसम्मान को जगाएगा। और वह कितने ही ज्यादा बल से आपके
- 56:24ऊपर अटैक कर देगा? सो ये काम तो मत करे।
- 56:28राजनीति में आने वाला व्यक्ति न किसी को भय दिखाए और ना ही किसी
- 56:35को दंड दे। अकारण।
- 56:39जो योग्य है उसको दंड देना। यह तो न्याय प्रियता का सबूत है।
- 56:46अकारण दंड न दे। अगर राजनीति चलानी है तो मेरी इस
- 56:50व्यवस्था को सो लेना। चाणक से विपरीत बढ़ेगा सांग दान
- 56:56समझौता कर और दान दो। खेद है ये दो काम कर जाए बाकी के
- 57:04दो तो आप खुद की ही खबर खो दो, बाकी दो तो आज़माने की चेष्टा भी
- 57:12मत करे राजा, अन्यथा मारा जाएगा शाम।
- 57:20समझौता कर कुछ बाट ले, कुछ ले दे का फॉर्मूला आजमा ले या दान उसको
- 57:28कुछ भेंट कर चल ठीक है, तुम जाओ इसीलिए उछलते थे तुम जाओ, तुम ये
- 57:37कुर्सी दे दो। अगर ऐसा राजनीति करेगा, वह
- 57:44व्यक्ति ज्यादा देर तक शासन में बना रहेगा।
- 57:51दंड और भैंसे राजनीति कभी चलते हैं।
- 57:57जो भी राजा आप देख लेना भविष्य में भी जो राजे होंगे और जो आज भी
- 58:02राजा हैं। संसार में आज कौन सा राजा नहीं है
- 58:05जो आज भी राजा हैं? देर तक वो दंड और भय के सिर के
- 58:10ऊपर राजकाज कभी भी अपने हाथ में नहीं रख पाएंगे?
- 58:15आखिर में उनका हजर कैसा होगा? मसोलिन जैसा हिटलर जैसा अंत में
- 58:26हजर ऐसा ही होगा क्योंकि प्रजा जीस वक्त उसके व्यय और दंड से
- 58:33सुरक्षित हो गई। उनका आत्म सम्मान जागेगा, उनका
- 58:38भीतर का बल जागेगा। वो इतनी प्रबलता से जागेगा कि
- 58:42किसी भी राज़ को दबा सकता है, दोष सकता है क्योंकि संख्या पर
- 58:48ज्यादा। किसी भी देश का संख्या बल इतना
- 58:55ज्यादा होता है कि उसके आगे मिलिट्री का संख्या बल कुछ भी
- 58:59नहीं होता। इसलिए कभी भी मिलिट्री के बल पर
- 59:03राजा राज़ करने की चेष्टा मत करें।
- 59:07मिलिट्री के बल पर सिर्फ सीमाओं की रक्षा करने की चेष्टा करें।
- 59:13जो सही मिलिट्री का काम किये है या उग्रवादिता को दबाने की जेष्टक
- 59:19है। सो मैं कह रहा था जो बल दो तरह के
- 59:27अन्न हैं, जो बल देते हैं एक बाहर का।
- 59:31अगर बाहर का आनंद नहीं खाओगे, महावीर ने बाहर का अन्न त्याग
- 59:35दिया, लेकिन भीतर का अन्न तो था भीतर का।
- 59:40वो रहस्य का बल तो था जहाँ से सब धाराएं निकलती हैं बल्कि वो
- 59:48आत्मा, वो परमात्मा। वह था, लेकिन शरीर के यंत्र ने
- 59:53काम करना छोड़ दिया क्योंकि उसे अनुरूप बल नहीं मिला।
- 59:59अगर अनुरूप बल महावीर त्याग न करते या जो आज परंपराओं में जैन
- 1:00:05धर्म में ये संथारा की प्रवृत्तियाँ चलती हैं।
- 1:00:10अगर ये संसार ना करें, भोजन को त्यागना ना करें तो बाहर की
- 1:00:16मशीनरी चलती रहेंगी और भीतर की मशीनरी, भीतर का बल यानी के भीतर
- 1:00:21का अन्न, वह अपने बल को बखेरता रहेगा जब तक के आपकी शरीर की
- 1:00:28संरचना की। यह सारा इंस्ट्रूमेंट प्रणाली सही
- 1:00:32रूप से सुचारू ढंग से काम कर रही है तो इसका अर्थ है के अन्य दो
- 1:00:39तरह के होते हैं जड़ और चेपन। इसका सीधा सीधा मरम आपको सुझाती
- 1:00:45तैतरी और परिषद का। यह श्लोक आपको बताता है कि अन्य
- 1:00:51दो तरह के होते हैं एक वो जो शरीर को बल देता है, पुष्ट करता है और
- 1:00:56दूसरा वो जिसके कारण शरीर गतिमान होता है।
- 1:01:00उसको आप भूल जाते हो। ये दो तरह के अन्य हैं।
- 1:01:06इसलिए अन्न ही अन्न में प्रतिष्ठित हो प्रतिष्ठित हो जाता
- 1:01:13है। अब इसका अर्थ क्या करोगे आप जो
- 1:01:18मनुष्य अन्न में अन्न प्रतिष्ठित है?
- 1:01:26इसे जान लेता है, वह प्रतिष्ठित हो जाता है।
- 1:01:31अब क्या करोगे? इसका ये प्रतिष्ठित शब्द इसने तीन
- 1:01:34बार प्रयोग कर दिया। जो व्यक्ति जो मनुष्य, अन्न में
- 1:01:41अन्न प्रतिष्ठित है यह जान लेता है।
- 1:01:45वह प्रतिष्ठित हो जाता है। क्या मतलब निकालो आपकी समझ में
- 1:01:49नहीं आएगा लेकिन इसका मतलब मैंने आपको समझा दिया है।
- 1:01:53एक अन्न इस शरीर को बल देता है और दूसरा अन्न आपकी आत्मा है।
- 1:02:06और तीसरा अनु प्रतिष्ठित हो जाना है जिसे कृष्ण कहते हैं अपने
- 1:02:15स्वभाव में प्रतिष्ठित हो जा, अपने आपे में ठहर जा।
- 1:02:21वह तीसरा बल है। अगर आप सहज रूप से इस शरीर की
- 1:02:27प्रक्रिया को चलने दोगे, बड़ा गहरा सब्जेक्ट है, इसको अवश्य
- 1:02:30सुनिएगा। जो भी फिलोसोफिकल वे से समझना
- 1:02:36चाहते हैं वो इस वीडियो को अवश्य सुनें।
- 1:02:42एक प्रतिष्ठित अन्न जो आपके शरीर को बल देता है, एक अन्न जो आपके
- 1:02:49भीतर बैठा है बल और तीसरा अन्न उस अन्न में जो प्रतिष्ठित हो जाता
- 1:02:55है सही बलित वही है। जो स्थिति प्रज्ञ हो गया,
- 1:03:03प्रतिष्ठित यानी जो स्थित हो गया, जो अपनी स्थिति के भीतर अपनी
- 1:03:09प्रज्ञा के भीतर स्थित हो गया, वही बली हो गया, वही अमर हो गया,
- 1:03:17वही सर्वज्ञ हो गया, वही परमात्मा हो गया।
- 1:03:20सभी जगह उसका खराब है, उसे ही भ्रम कहते हैं और इसी ब्रह्म के
- 1:03:25भीतर प्रतिष्ठित होना तुम्हारा अंतिम उद्देश्य है और तुम्हारी
- 1:03:31अंतिम जरूरत भी है। धन्यवाद।