Latest / Baba ji Vijay Vats / 5 Jun 25 - तृप्ति ही लक्ष्य है: आनंद के सागर में उतरने की राह। संत और मूर्ख में फर्क? भोग और त्याग?
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- 0:00आनंद किशोर बाबाजी प्रणव बाबाजी कृपया दो अक्षरों में दो शब्दों
- 0:13में बताने की कृपा करेंगे। कि शांत और मूर्ख में क्या फर्क
- 0:22है पुत्र मैं तो दो शब्द भी नहीं बोलना चाहता, मैं तो चाहता हूँ कि
- 0:36तुम मेरे मन से ही कुछ समझ लो। ये झील सी आँखें ये मस्ती से भरी
- 0:47हुई दो प्यारे हैं काश तुम इनको देख कर कुछ समझ पाता है।
- 1:00लंबे प्रवचलों से तुम समझ नहीं पाओगे, मुझे पता है दो शब्दों से
- 1:09समझ जाओ तो बोल देता हूँ। संत और मूर्ख में क्या फर्क है?
- 1:21मूर्ख वह जो माहौल को बदलता है अवस्थाओं को बदलता है व्यवस्था को
- 1:32बदलता है वह मूर्ख। और संत संत वह है जो माहौल को
- 1:44अवस्थाओं को व्यवस्था को जैसे हैं, वैसे स्वीकार कर सकता है।
- 1:53उनकी ओरिजिनलिटी में उनकी प्रामाणिकता में दो शब्द मैंने
- 2:01बहुत ही पूछा, कुछ समझे शांत प्रत्येक परिस्थिति को?
- 2:13आसमान के बादलों की तरह देखता हूँ और मूर्ख आसमान के बादलों को का
- 2:24होना देखता है। संत वह जो परिस्थितियों को।
- 2:32अवस्था को माहौल को बदले की चेष्टा नहीं करता है और मूर्ख में
- 2:40है जो व्यवस्था को अवस्था को माहौल को बदले की चेष्टा करता है।
- 2:51यही फर्क है होता है काश तुम समझ जाती ज्ञानी और अज्ञानी में क्या
- 3:02फर्क है ज्ञानी वह जो उस अमृत को खोज लेता है।
- 3:15और पी लेता है पी के मदहोश हो जाता है वे सुद्धि में कुमारी में
- 3:24डूब जाता है ज्ञान का आनंद लेता है, रस का स्वादन करता है।
- 3:34उसकी सुगंधियों को नशा फूटों में स्नान देता है।
- 3:40उसकी ठंडी हवाओं को पीता है, चरने की कलकल की आवाज को सुनता है।
- 3:54चारों ओर होती हुई आनंद गायक धर्मों को पीता है।
- 3:59वह संत और असंत वह जो अपने ही भीतर छुपे उस अमृत कुंड को खोजता।
- 4:14बिना खोजे उस अमृत कुंड का प्रचार करने में निखिल करता है ज्ञानी और
- 4:26अज्ञान में ये फर्क है। ज्ञानी उस रस को किया गया।
- 4:34अज्ञानी दिना पिए, प्रचार करेगा ज्ञानी जब भर जाएगा उसकी गगरिया
- 4:46तो छड़कने लगेंगी और ज्ञानी के पास गागर होती ही नहीं, अज्ञानी
- 4:52के पास गागर होती है। क्या भरेंगे?
- 4:55क्या छलकेगी रस का स्वादन करो रस का प्रचार में उसको रस को पीने
- 5:12में जितना आनंद है वो पीने के बाद पता चलता है।
- 5:20पीने से पहले तो अंदाजे है और तुम अंदाजों में खोए रहते हो, लेकिन
- 5:31अंदाजे असलियत नहीं हुआ। ज्ञानी उस रस में उतरता है और उस
- 5:40रस को पीता है और निहाल हो जाता है।
- 5:44अज्ञानी उस रस में उतरता ही नहीं है।
- 5:47निहाल भी नहीं होता। थोसी बातों से प्रचार करता है
- 5:54ज्ञान का लेकिन ध्यान रखना। वह प्यासा ही आया, प्यासा ही चला
- 6:00जाएगा, इसी राह से ज्ञानी आया तो प्यासा सा जाएगा इस संसार से तृप
- 6:07हो गए बस यहीं कबीर ने कहा एक सिंहासन चढ़ चले, एक बंधे जात
- 6:14ज़िन्दगी। ज्ञानी और अज्ञानी का यही फर्क
- 6:18है। ज्ञानी पीता है उस रस को और वह
- 6:22पीनी जैसी चीज़ है उसका आश्वासन देकर मस्ती में खो जाता है, झूमता
- 6:29है, नाश्ता है गाता। बस्ती और खुमारी का आनंद लेना
- 6:40ज्ञान और प्रचार करना अज्ञान है। प्रचार तो क्यों नहीं करता है?
- 6:55लेकिन ज्ञानी प्रचार करता नहीं, ज्ञानी से प्रचार हो जाता है।
- 7:03जब तुम्हारी गागर इतनी भर जाएगी तो उसमें एक बूंद और समाने की जगह
- 7:09नहीं बचेगी तो क्या होगा? और छलके भी तो उसकी छलकन बाहर के
- 7:22लोग महसूस करेंगे। जैसे होल की खुशबू कलिबंत थी तो
- 7:29आपको पता न चला था। और कली ने मुख को घोल दिया,
- 7:35पंखुड़ियाँ फैला दी उसकी सुगंध आपके नशा कुत्तों को छुई, आपके
- 7:42ह्रदय को खुश करके मदहोशी में डूबा के।
- 7:53आपका अस्तित्व एक अज्ञात आनंद से लहरा गया।
- 8:00ज्ञानी ऐसा है और अज्ञानी न खुशबू देखी न मृत, प्रिय।
- 8:12सिर्फ बांटने का सर्कस किया था ही नहीं बांटेगा क्या?
- 8:22जिसके पास है वो ही तो बांट सकता है जिसके पास है ही नहीं, वह
- 8:29बांटेगा क्या खाक? यही फर्क है पुत्र, ज्ञानी और
- 8:34अज्ञानी। भोग और त्याग।
- 8:38क्या है स्वयं को जान लेना और स्वयं को पी लेना सच्चा भोग है
- 8:56व्यर्थ को? त्याग देना सच्चा त्याग है।
- 9:02तुम व्यर्थ को भोगते हो, सार्थ को त्याग देते हो कर कहते हैं तुमने
- 9:16पदार्थ को भोग। सुख पाया और अष्टावक्र कहते हैं।
- 9:23जनक ने स्वयं को भोंगा और तृप्त हो गया है।
- 9:30यही भेद है दोनों में संसारी दूसरे को भोगता है।
- 9:41संत स्वयं को भड़ता है इसलिए संसारी सदा वक्त पर रह जाता है।
- 9:49संसारी के जीवन में कभी शांति नहीं आती।
- 9:55संत का जीवन। शांत बना रहता है।
- 10:01संसारिक पदार्थों को भौंकता है, दूसरों को भौंकता है और संत स्वयं
- 10:09को भौंकता है। और जब तक तुम स्वयं को भोगने में
- 10:16समर्थ नहीं हो पाओगे, तब तक तुम्हारा आवागमन का चक्कर नहीं
- 10:20मिलेगा। तुम इस कष्टकारी तूफान में धरे
- 10:25रहोगे, आओगे जाओगे, रीते हाथ आओगे, रीते हाथ चले जाओ।
- 10:40इसलिए अष्टमित्र कहते हैं स्वयं को भोगो पर को न भोगो, दूसरे को न
- 10:49भोगो, क्योंकि दूसरे को भोगने से तृप्ति नहीं होती।
- 11:00यह वो सुख है जो लगता है कि तृप्ति आ गई, लेकिन तृप्ति आती
- 11:08है, संत स्वयं को भोगता है। और उसका लक्षण है।
- 11:21संत को जो मिल जाता है उसमें ही हो जाता है क्योंकि इसकी कोई मांग
- 11:27ना बचे, उसकी कोई इच्छा ना बचे, उसकी कोई भटकन ना बचे।
- 11:35उसने कुछ पाना नहीं, वह कुछ खो नहीं सकता।
- 11:41वह ऐसे तल पे पहुँच गया है जहाँ उसने कुछ भी नहीं पाना होता।
- 11:48वह ऐसे तल पे पहुँच गया है जहाँ वह कुछ भी नहीं खो सकता।
- 11:53आनंद को कैसे कहोगे? आनंद एक बार मिल जाये सेल्फ
- 12:01मेंबरिंग तुम्हें याद आ जाये वह आनंद का खजाना में उसे कहीं रख के
- 12:09बोल दिया। आज उन्हें याद आया।
- 12:14इसे ही स्मरण कहते है, इसे ही सुमरण कहते है।
- 12:20वो भूली दासता लो फिर याद। ओह, भूली दास्तां लो फिर याद आ गई
- 12:47नजर के सामने। गटा से छा गई वह भूली दास्तां।
- 13:04फिर से याद आ जाता है वह भूली दास्तां।
- 13:11और जीस, कड़ी तुम्हें वो भूली दास्तां याद आ गई, तुम मदमस्त हो
- 13:19जाओगे और तुम मौन हो जाओगे बोलना चाहोगे।
- 13:34यही फर्क हैं। फर्क को भोगने में तुम बोलते ही
- 13:40चले जाते हो, फर्क को बदलने में, दूसरे को बदलने में तुम बोलते ही
- 13:50चले जाते हो। और स्वयं को भोगने में स्वयं को
- 13:55पुने में तुम चुप हो जाते हो, हर मन हो जाते हो जो वहाँ खुलते हैं,
- 14:05शब्द निरर्थक मालूम पड़ते हैं। शब्द लाचार में ज़रा बहना विराट
- 14:17है बोले तो बोले कैसे? बाबा नानक कहते हैं।
- 14:31ताकि गला कथिया ना जाए, जे को कहे, पांच छः पछताए, उसका बखान
- 14:42नहीं किया जा सकता। अगर कोई बखान करता है तो उसे
- 14:49पीछे। शर्मिंदा होना पड़ता है क्यों?
- 14:55क्योंकि इतने विराट को तुम कैसे कह पाओ इतना वराट है वो, उसका एक
- 15:05कण भी तो तुम निर्मित नहीं कर सकते।
- 15:11कैसे कहोगे उस बराट की मेहमान कैसे शब्दों में उतारोगे उस बराट
- 15:16की मेहमान बाबा कहते है, अगर कोई कहता है उसे बाद में पछताने करते
- 15:31है। क्योंकि वह इतना विराट है तुमने
- 15:36कभी सोचा नहीं? तुम्हारी बुद्धि इसे बच्चों का
- 15:43खेल समझती है इसलिए बुद्धि सजा रीती रह जाती है आनंद से।
- 15:53सूचनाओं का खजाना भर जाता है लबालब आनंद की एक बूंद भी नहीं पी
- 16:06जब। यह बुद्धि की कला मात्र है।
- 16:17लफ्जों का भंडार होगा, वोकबुलरी भरी होगी नेरोन जो धड़ाधड़ भरे
- 16:23होंगे लबा लब भरे होंगे लेकिन इसके बावजूद से।
- 16:31तुम उस करम पिता पर महात्मा की गाथा को एक अंश भी नहीं बोल सकते
- 16:37है। उसकी शिफ्ट उसकी सलाह ग तुम करनी
- 16:43हो जीव लाचार गुजरती है। शब्द व्यर्थ हो जाती है,
- 16:56लैंग्वेजेज निरर्थक लगने लगती है, भाषण पंगू हो जाती है, किसी को
- 17:07होती है। इसलिए मैं तुम्हें कहता हूँ पुत्र
- 17:19उसको जानने की चेष्टा मत करना। क्यों जाना जाता है बुद्धि से
- 17:28उसको पीने की चेष्टा करना? अलफजों से जानने की चेष्टा मत
- 17:37करना अपनी बुद्धि के नुरोंस को सूचनाओं से मत भर लेना बटकाव बना
- 17:47रहेगा अगर तुम्हें ऐसा तुम सदा भटकते रहे हो आज।
- 17:55आगे भी अगर तुमने उसे शब्दों से जानना चाहता हूँ तो तुम चुक गया
- 18:10क्योंकि वह शब्दों में। ना आता है ना शब्दों में पिया
- 18:16जाता है, उसकी तो भूट भरी जाती है, उसका तो स्वाद चखा जाता है।
- 18:26सुर्थ करारी बई मतवारी मदवा पी गई।
- 18:32और जब तुम प्रथम बार वहाँ जाओगे और पहली बार तुम उस बूंद का स्वाद
- 18:42चखोगे तो तुम्हे इतनी लज्जत आएगी तुम वहीं ठहर जाओगे।
- 18:52मन श्रद्धा के लिए ठहर जाता है। सूरत, कलारी बई मतवारी मदवा पी गई
- 19:02बेनाफतो ले फिर तुम कहो के और। इतनी से तृप्ति नहीं हुई होगी भी
- 19:12नहीं। जन्मो।
- 19:15जन्मो की प्यासी आत्मा? एक बूंद से कैसे तृप्ति आए तुम और
- 19:26मांगोगे और मांगोगे। और पीते ही जाओगे, लेकिन पीने से
- 19:35भी तुम्हे तो वो समुद्र के भीतर ही उतरना होगा, लेकिन पहले पीना।
- 19:50पहले बुद्धि की व्यर्थता को देखना, शब्दों की व्यर्थता को
- 19:57देखना फिर अपने भीतर उतरना से पार फिर अपने भीतर उतर।
- 20:08उस तल पे पहुँच जाना जहाँ वो अमृत का सागर बहता है उसकी एक बूंद का
- 20:18स्वाग चुकन है जब तुम उसकी एक बूंद का स्वाग चुक हो।
- 20:27तो तुम्हारी आँखें नशीली हो जाएंगी, तुम्हारी जीवा तालुए से
- 20:36चिपक जाएगी। तुम्हें खेचरी मुद्रा लगानी
- 20:39पड़ेगी। खेचरी मुद्रा लगती है।
- 20:43उसके पीने से जिसने अमृत पिया खेचरी मुद्रा लग गई।
- 20:49तुम अभ्यास मत करना, खेतरी मुद्रा को लगाना, यह तो व्यर्थ की सर्कस
- 20:56है खेसरी मुद्रा लग जाती है जब तुम आनंद की पहली बूँद पीते और
- 21:05आनंद की पहली बूँद ऐसी की प्यास बढ़ाती है।
- 21:09वो जाती नहीं क्योंकि तुम जन्मो जन्मो से प्यास हो, तुम्हे इतनी
- 21:15प्यास लगी हो, इतनी प्यास लगी हो के तुम्हारा रोवा रोवा पानी पानी
- 21:21की डिमॅंड करता है, बना एक बूंद पानी से प्यास बुझेगी।
- 21:30और यह प्यास तो जन्मो जन्मो की, बस मन करेगा और पी लो और पी लो
- 21:44पीते चले जाना, पीते चले जाना, लेकिन इससे भी जीरा बढ़ेगा नहीं,
- 21:51तृप्ति नहीं होगी। तो तृप्ति कैसे?
- 21:55आनंद को चखना आनंद को पीना और फिर तो तुम आनंद में ही विलीन हो जाना
- 22:03बूंद समान समन्ध में बस ये है अंतिम घड़ी।
- 22:12इस अंतिम घड़ी तक तुम्हे रुकना मत ठहरना मत, अंतिम घड़ी का इंतजार
- 22:21करना तुम्हे किसी से पूछना नहीं पड़ेगा।
- 22:31हमारा अंतः खुद ही बोलेंगे, चुप हो जाएगा उस सागर में उतर के।
- 22:45तुम शांति की उस प्रकार मस्ती में झूठ हो गए, तुम्हारे पांव थिरके
- 22:51जाएंगे मदर सर का संगीत तो तुम्हारे गले से उतरेगा।
- 23:04बुद्धि से पानी की चेष्ठा जिसने भी की, जन्मो जन्मो तक वो बटका
- 23:08मात्र बटका, सबसे पहला तो तुम ये अनुभव लेना के बुद्धि से कुछ
- 23:20पायल। और जैसे ही ये अनुभव गहरा हो जाए,
- 23:28बुद्धि से कुछ मिला भी नहीं करता। सूचनाओं से आनंद का कोई संबंध
- 23:34नहीं, कोई रिश्ता ना आता नहीं दूर दूर तलाक।
- 23:42जब सूचना उसे तुम्हे कुछ नहीं मिलेगा, तो तुम्हे सूचना की
- 23:47व्यर्थता का पता चल जायेगा और जैसे ही सूचनाएं व्यर्थ हुई वैसे
- 23:54ही तुम कचरे के समान उनको क्यों धोओगे?
- 23:57क्यों इकट्ठा करोगे तुम्हारा इकट्ठा करना बंद हो जाएगा।
- 24:02यह प्रथम दक्षिण है। फिर वो सूचनाएं हो, वह धन हो, वह
- 24:09पदवी हो, वह नाम हो, कुछ भी। तुम इकट्ठा करना बंद कर दोगे?
- 24:20इसीलिए पतंजलि ने महावीर ने बुध ने शब्द कहा अप्रिग्रह जहाँ जाकर
- 24:27इकट्ठा होना बंद हो जाता है, अपरिग्रह जहाँ जाकर प्रीग्रह होना
- 24:33खत्म हो जाता है। वहाँ पहुंचे ही जाओगे, तुम तृप्त
- 24:42हो जाओगे और यह तृप्ति ही तुम्हारा लक्ष्य है।
- 24:53इससे ऐसे कह दो कि तृप्ति ही कम हो।
- 24:56तो शब्दों का हेर फेर होगा और कुछ नहीं।
- 25:01तुम ही तपती हो जिसकी तमन्ना है तुम्हें पानी की बस उसकी तरफ जग
- 25:10जाए। जिसके लिए जन्मो जन्मो से भटक रहे
- 25:15हो, पशु उसकी तड़प जग जाए, बेरहा मेरा की तरह फिर बिरहा की अग्नि
- 25:25तुम्हारी यात्रा शुरू कर देगी उस आनंद के समुद्र की ओर।
- 25:35फिर तुम निकल पड़ोगे उस तरह बस बिरहा जगना चाहिए, पर बिरहा जगता
- 25:48है, उसको जीसको संसार की व्यर्थता नजर आ जाती है।
- 25:55वह संसार के पार की चीज़ को खोजने में लग जाता है।
- 26:01जब तक सूचनाओं में तुम्हें रस आता है तुम इस चैनल से उस चैनल पे उस
- 26:06चैनल से इस चैनल पे आते रहो हजारों चैनल बदलोगे लेकिन शांति।
- 26:12और स्वाद ना मिलेगा स्थान बदलोगे? आनंद न मिलेगा और जैसे ही तुम्हे
- 26:24इसकी व्यर्थता का पता चला तो तुम्हारी दिशा बदल जाएगी।
- 26:32तुम बेहरमुखी से अंतर्मुखी होना शुरू हो जाओ और अंतर्मुखी होते
- 26:38होते तुम्हें बिरहा की आग जलाएगी जैसे जैसे बिरहा की आग जलाएगी,
- 26:47तड़प घनी होगी। दर्द गहरा होगा लेकिन इस दर्द में
- 26:51रस हो पाए। मैं मरीज इसको हूँ, मेरी दवा पर
- 26:58दे न कर तो मरीज इसको हो जाओगे। मीरा का दर्द गहरा।
- 27:10मीरा बिरहा के इस दर्द में छटपटाती गाती है जो मैं।
- 27:20ऐसा जानती। एक बार ऐसी व्यवस्था आ जाती है,
- 28:31दर्द इतना गहरा हो जाता है लेकिन आदमी जाएगी तो कहाँ जाए?
- 28:39संसार की आग से त्रस्त होकर तो ये रास्ता बदला था।
- 28:46संसार इतना जला रहा था। कि संसार की तरफ से मुख फेर न
- 28:51पड़ा और मुख फेर के जो इस तरफ आए तो यह बिरहा की अग्नि भी बहुत ही
- 28:58जलाती। लेकिन एक बात बता दूँ बाहर की
- 29:04अग्नि में और भीतर की अग्नि में फर्क है।
- 29:10बाहर की अग्नि तुम्हे जलाती तो है लेकिन उसमें रस नहीं होती।
- 29:21भीतर की अग्नि तुम्हे जलाती है लेकिन उसमें रस हो रहा होता है।
- 29:26और उस रस को छोड़ने का दिल नहीं करता।
- 29:28इसलिए जो व्यक्ति एक बार भी अंतर्मुखी हो गया, उसे बाहर आने
- 29:35में बड़ा संकोच लगता है। क्योंकि बाहर जाकर तो उसने कभी
- 29:41कुछ पाया नहीं, सिर्फ बडकाब था। और बटकन के अलावा कुछ भी ना लेकिन
- 29:48जैसे ही वो भीतर उतरा, दर्द तो गहरा हुआ।
- 29:56आग तो ज्यादा लगी और एक वक्त तो ऐसा आया कि मेरा कहती छोड़ो।
- 30:06ये दर्द हंस से सह नहीं जाता। घायल की गति घायल जान है तुम क्या
- 30:15जानो, या जिन घायल होए, हेरी। मैं तो प्रेम धवन मेरे दर्द न
- 30:24जाने को है तुम्हें क्या पता इस दर्द का?
- 30:28लेकिन इसमें एक मिठास भी है। बाहर के दर्दों में मिठास नहीं
- 30:32होती, कड़वाहट होती है, भीतर के दर्द में मिठास रस।
- 30:40इसलिए व्यक्ति छोड़ना चाहे भी तो नहीं छोड़ सकता, क्योंकि बाहर के
- 30:45रस्सों की तीर्थता उसने देखी और भीतर के रस्सों का स्वादन भी उसने
- 30:51चख लिया। इसलिए चाहे अनचाहे भीतर ही खींचा
- 30:58जाता है। और जैसे जैसे खिसता है, दर्द
- 31:04बढ़ता ही जाता है। दर्द बढ़ता ही गया।
- 31:08झुनझुन दवा की यह दवा कुछ ऐसी है अंतरमुखी होना कि तुम्हारा दर्द
- 31:14बढ़ेगा, देखो। दर्द बढ़ने से वापस मत लौटाना एक
- 31:20बार की तुम वापस लौटे तो फिर पता नहीं कितने जन्मो के लिए फिर भटक
- 31:24जाओगे, लेकिन ये रस ऐसा की तुम्हे वापस जाने भी नहीं देखा।
- 31:33तुम लौटना भी चाहो तो नहीं लूट पाओगे।
- 31:39तो किस गृह की आग में आग ही नहीं है?
- 31:44संतोष भी है, शांति भी है, हल्की हल्की तृप्ति की सुगंध भी है।
- 31:55बाहर तो तुमने तख्तता के सिवा और कुछ न पाया था तख्तता थी भटकनचा
- 32:05भीतर रश है, दर्द गहरा है, आग अभी भी लगी है।
- 32:14जला रही है, रोज़ बढ़ती ही जाती है और मेरा पुकार उठती है अगर मैं
- 32:23जानती पहले के प्रीत किए दुख हुए नगर झिंढोरा पीटती प्रीत न कर।
- 32:37मैं ढोल पिट पिट के बताती हूँ, लेकिन मज़े की बात ये रश ऐसा
- 32:43छोड़ा भी नहीं जाता बड़ा मजेदार एक बार थोड़ा अंतर्मुखी हो के तो
- 32:51देखो। तुम्हारी तमन्ना तो बहुत होती है,
- 33:00किसकी तमन्ना नहीं है? उस रस को?
- 33:02पीने की बड़े से बड़ा पूंजी है, बड़े से बड़ा शक्ति शादी होती है,
- 33:10उस रस के आगे नतनस्तक हो जाता है। बड़े बड़े जनक अष्टापुर के चरण
- 33:14चूमने लगते हैं। वह रस है ही ऐसा स्वाध भी है
- 33:22बिरहा की आग में है अपने जन्मो जन्मो।
- 33:32सेतु ने सोचा था कि वो मुकाम आएगा।
- 33:40एक मुद्दत। से।
- 33:45तमन्ना थी तुम्हें छूने? की एक मुद्दत से।
- 33:58तमन्ना थी तुम्हें छूने? की आज बस में नहीं जज़बात करी।
- 34:18आजा दूर रहकर न करो बात करी बाजा। याद रह जाएगी ये रात करीब आ जाओ
- 34:46सर्दी। झोंकों से धधकते।
- 34:53हैं। बदन में सो ले सर्दी जोकों।
- 35:02से धधकते। बदन में शोले।
- 35:13जान ले ले भी ये बरसाती करी बाजा दूर रहे करना करो।
- 35:32वह बात करीबा जाओ। दूर रहकर ना करो बात करीबा जाओ
- 35:46याद रह जाएगी यह रात करीबा जाओ। सर्द छोंकों से धधकते हैं बदन में
- 35:56छू लें, जान ले लेगी यह बरसात एक मुद्दत से तमन्ना थी तुम्हें छूने
- 36:12कितने जन्म भी थे? बहुत जन्म बिछड़े मेरे माथो ए
- 36:24जन्म तुम्हारे लेख, एक मुद्दत से तमन्ना थी तुम्हें छूनी।
- 36:35आज बस में नहीं जजबात करी जज बिरहा की आँख आज इतनी लगी है ये
- 36:43बजाए से बुजती ये इश्क की आंख है। ये ना तुम पैदा कर सकते हो ना तुम
- 36:58बजा सकते हो। इसका दर्द हमसे।
- 37:13जरूरत क्या है? इस कदर हमसे झिझकने की जरूरत क्या
- 37:29है। ज़िन्दगी।
- 37:33भर का है ये सात करि बा जा और तो और रह कर ना करो बात।
- 37:52गरीब जाने। का दल भी।
- 37:59करता। है वह पुकारना बस तुम अंतर्मुखी
- 38:05होने की थोड़ी देर तैयारी कर लो, बाहर का प्रिग्रह छोड़ो।
- 38:11जनम जनम बीत गए चेहरे पर शांत हो तुम्हारी न्यूरोड से भर गई
- 38:20सूचनाओं से शांति की कहीं कोई दूर दूर तक खबर नहीं मिली।
- 38:30चेहरे पे मर्दानगी है हवा में कोई सुगंध नहीं बिखरते तुम्हारे होने
- 38:41से कुछ आनंद नहीं मिलता तुम भटकते हो।
- 38:50संसार की ये देन है तुम्हें, जब थक जाओ तो संसार से मुँह फेर लेना
- 39:05जब तक बेहर मुखी हो। बहरहमुखी का स्वाद लेना यदि की
- 39:10उसमें स्वाद है लेकिन जब थक जाओ ऊब जाओ तो मुख मोड़ लेना, फिर
- 39:19अंतरमुखी होना आग तो भीतर ही लगेंगी।
- 39:26बिरहा की मेरा की ताई लेकिन वो आदम रस बड़ा होगा बस इस रस की
- 39:34तलाश है तुम्हें जन्मो जन्मोस उपनिश्चित कहते हैं, रसोवैस वह रस
- 39:40है और उस रस के ही तुम्हें तलाश है चलो।
- 39:46अंतर की खोज में चले चलो अंतर की मंजिल की तरफ चले देखें क्या है
- 39:53बाहर तो बहुत देखा कुछ ना मिला भटकन के सेवा चलो भीतर चले।
- 40:08धन्यवाद।