Latest / Baba ji Vijay Vats / 20 Aug 25 - मैं और मेरा विराट रूप! बाबा आप जल्दी जल्दी बीमार क्यों हो जाते हैं?
Transcript
- 0:00बाबा जी प्राणों जब भी हम दुखी होते हैं या किसी समस्याओं में
- 0:13घरे होते हैं, तो आप हमें एक शब्द अक्षर का हक।
- 0:29मैं फरियाद करूँगा फरियाद आप किस के सामने करेंगे?
- 0:46आप फरियाद किसके सामने करते हैं? मैं फरियाद करता हूँ, स्वयं के ही
- 0:55विराट रुक के इसे ऐसा समझो। जैसे समुद्र से एक बूंद पानी के
- 1:09निकाल लो है तो वो पानी रहेगा। वो पानी रासायनिक संरचना उसकी वही
- 1:25एच टू ओह। लेकिन बूंद बूंद है समुद्र समुद्र
- 1:39है एक मुकाम ऐसा आता जहाँ मैं ही अपना विश्वरूप धड़के।
- 1:55अनंत हो जाता हूँ, मेरी कोई सीमा नहीं रहती, असीम हो जाता हूँ, कोई
- 2:06भेद नहीं रहता अभेद हो जाता हूँ। मेरे ही दो रूप हैं एक वो रूप जो
- 2:21आप देखते ना दूसरा वो रूप जो आप देखते नहीं।
- 2:32जैसे किसी पदार्थ के भीतर इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन, न्यूट्रॉन
- 2:37घुपे आपको दिखेगा सिर्फ ए मैटर मैटर के भीतर घूमती हुई।
- 2:51इलेक्ट्रॉन प्रोटन न्यूट्रॉन की शक्ति में दिखेगा बूंद समुद्र ही
- 3:02है इसको ऐसा भी प्रभावित कर सकते हैं और समुद्र बूंद ही है।
- 3:16इसको ऐसे भी परिभाषित कर सकते हैं।
- 3:23बौद्ध समुद्र का हिस्सा है फिर से समुद्र में मिल जाना चाहती है,
- 3:35लेकिन। मिल नहीं पाती यही तुम्हारा दुख
- 3:38है। बूंद में सारे रासायनिक संरचना
- 3:49दोनों के समान है, लेकिन फिर भी बूंद समुद्र के पास से जाना होता
- 3:58है उसे। थोड़ा इसको गहराई से समझने की
- 4:03चेष्टा कीजिएगा जैसे बूंद समुद्र को छू रहे हो लेकिन मिली न हो।
- 4:14कल्पना कीजिए आप इस बात की एक समुद्र की बूंद।
- 4:21बिछड़ गई किसी विला में आज फिर समुद्र में विलीन होने को तत्पर
- 4:32है। उसने छुआ पोषण को।
- 4:42ओशन भरा पड़ा है, ओशन भरा पड़ा है तुम्हारे समाधानों से।
- 4:59बोध चाहती है उस समुद्र में खो जाना, विलीन हो जाना, मिल जाना
- 5:14मैं अपने बलबूते पे आपको नहीं बता सकूंगा।
- 5:20यद्यपि। समुद्र का ही एक अंश है, एक बम
- 5:25था, फिर भी समुद्र का ठों ठुकाना कहाँ तक है?
- 5:34कितना विस्तार है कितना ऊपर, कितना नीचे?
- 5:41ये बूँदने बता पाए तुम भी जब उस तल पर पहुंचोगे तो पाओगे पहले
- 5:55पहले डरोगे कि मेरा वजूद खत्म होगा लेकिन तुम्हारा वजूद खत्म
- 6:03नहीं होता। तुम छोटी बोन से विश्वरूप समुद्र
- 6:13हो जाती हो, चेतना आनंद का छोटा सा रूप है।
- 6:23और एक दूसरी चेतना भी है जो समुद्र के रूप में विश्वरूप में
- 6:32है। यही दिखाया था कृष्ण ने।
- 6:36अर्जन को, ये देख पहले तू कौन? जिनके मरने का तुन दुख मना रहा है
- 6:48ओह वास्तव में कौन है ये देख ले नो दाये सैफ पहले दूसरे फिर मुझे
- 7:00मेरा विश्व रूप देखना। लेकिन ध्यान रखना अगर बूंद एक सूत
- 7:10भर की दूरी पर भी है, समुद्र से बस उसके साथ लग जाती है, बढ़ जाती
- 7:16है, उसको उसका टेस्ट पता चल जाता है।
- 7:22बूंद को समुद्र का टेस्ट पता चल जाता है।
- 7:26जैसे ही बूंद टच करती है सतह उस तल पर वो ही बदला सकेगा जो वहाँ
- 7:37चला गया। अन्यथा आपके प्रश्नों के जवाब
- 7:43बहुत है, लेकिन सटीक जवाब किसके पास है ये आप भी नहीं जानते।
- 7:53मुझे बाबा ने कहा उठो बोलो मैंने पहला प्रश्न किया बाबा।
- 8:0235 सुबह से बड़े आनंद मगन में हूँ, किसी और से कहता हूँ और मेरे
- 8:13सारे रोम रोम में झरनाटक हो गया जब बाप ने कहा और दूसरा कोई है ही
- 8:17नहीं बोलने वाला। उसी दिन ये बोलने वाले पखंडी हो
- 8:25गए है। वह विराट स्वरूप शिव कहता दूसरा
- 8:34कोई है नहीं बोलने वाला क्योंकि दूसरे के पास ही अनुभव नहीं है जो
- 8:39आपके पास है, बोलना ही पड़ेगा। बूंद को समुद्र की आज्ञा सिर
- 8:49उधारित करनी होती है। देर अवेर उसमें समाना भी होता है।
- 8:56किसी देर अलग रहेगा। बहुत ज्यादा देर तक सुंदर से
- 9:02अलगाव सहन नहीं कर सकते। बहुत जनम बीते मेरे माथुर ये जनम
- 9:12तुम्हारे लेखे है एक जनम तो उसके लेखे करना ही होगा।
- 9:23फरियाद कर दूंगा उसके पास जो विश्व रूप है चेतना का विश्व रूप
- 9:31आनंद का विश्व रूप, खुमारी का विश्व रूप सुगंधी का विश्व मैं जब
- 9:39विराट हो जाता हूँ। रहता तो मैं ही हूँ लेकिन बूँद का
- 9:48अस्तित्व खो जाता है, पूर्णतया लीन होने से पहले अस्तित्व बचा
- 9:56रहता है। बूँद का बस ऐसा ही गुरु।
- 10:03गुरु का तीर दो तरफ के फलक निशाने लगते हैं इस ओर भी उस ओर भी दो
- 10:18फलक वाला तीर। इधर परमात्मा से टच हुआ और उधर
- 10:24तुम्हारे सिर टच हुआ तुमने अपनी वृथा बता दी, मैंने जा के व्यथा
- 10:30अपने ही उस विश्वरूप चेतनों को बदला दी और वह सर्वज्ञ है।
- 10:44ऐसा कौन सा कठिन काम है जो उसे पता है?
- 10:48इसका हाल उसे पता है? मैं किसको कहता हूँ मैं विश्व
- 10:57चेतना को करता हूँ? तुम भी ऐसा ही हो जाओगे बट जो
- 11:04प्रोसेसर मैंने तुम्हें बताई ईमानदारी से उत्तर मेरा सेंसे
- 11:11जाता रहा और भी कोई बोल सकता है? बाबा ने स्पष्ट इनकार किया और कोई
- 11:20है ही नहीं। उस दिन से मेरे लिए तुम कहते हो,
- 11:28मैं निंदा करता हूँ, मैं सत्य कहता हूँ, तुम्हें निंदा जैसी
- 11:34लगती है। जब 2020 में बाबा ने मुझे कहा
- 11:48बोलो दूसरा कोई नहीं है। बोलने वाला दूसरा कोई नहीं है, जो
- 11:53उस तल्ख को टॅच करे तो मैं क्या समझू बाकी ज्ञानी है?
- 12:01इसलिए मैं इन मूर्खों को दुरुस्तों को, पखण्डियों को,
- 12:04लालचियों को लोकियों को लताड़ लगाता हूँ।
- 12:11ये सब तरफ से मेरे से बली है। मैं आपकी फरियाद उस अवश्य योजना
- 12:22को लगाता हूँ, फिर वह जाने उसका काम ज्यादा है, वह तुम्हारी
- 12:29समस्याओं को उसे लेकर या ना करे, मेरा दायित्व खत्म हो।
- 12:51जे तेरा मसरि र द हो त वध गुण हो त वध गुण रखे शरिनाले कॉल।
- 13:11मेरा वाले आओ साईयाँ मेरा वाले आओ मेरा रोम रोम दुष्कर्मों से ढला
- 13:27हुआ है। फरियादी फरियाद करता है।
- 13:31उस विश्व चेतना के आँखें जेते रहो हम शरीर ते हैं औतों वध गणों
- 13:47चेतना विश्व चेतना को जानती है, उसका स्वाद भी जानती है।
- 13:55तुम्हारा प्रश्न वहाँ तक पहुंचा जाता है।
- 13:59तुमने मुझे कहा मैंने पहुंचा दिया, फिर जाने वह विश्व चेतना
- 14:10मेरा काम खत्म। यही प्रश्न कहता है मेरी शहनाज
- 14:23अपने दुख मुझे बता अपने कष्ट कलिश रो मुझे बता अहम तो हम सर्बपा
- 14:32वैभव मोक्ष श्याम। पाप से दुख उत्पन्न होता है और
- 14:38मैं तुम्हारे सब पापों को वर्ण कर लूँ तो बस मेरी शरण में आज शरण का
- 14:44अर्थ है जैसे मैं चलाऊँ वैसे चल तू मेन मेघ मत कर, तू आड़ मत कर
- 14:49ऑस्ट्रक्शन मत कर मान ले जैसा मैं चलूँ।
- 14:56किंतु परंतु न कर जिसने किंतु परंतु करना छोड़ दिया, वह उस सागर
- 15:06के साथ टच हो सकता है और चाहे तो विलीन भी हो सकता है।
- 15:11ऑप्शन होती है आपके पास। जैसे राहुल के साथ हुआ, बुद्ध का
- 15:18बेटा राहुल पहुंचा और निकल गया। पिताजी बैठे हैं, बोलने वाले एंड
- 15:28लाइटन्ड होते ही वह गया। दो ही ऑप्शन होती है या तो मिल
- 15:38जाओ, समुद्र में समुद्र ही हो जाओ या उसका स्वाद ले लो, समुद्र के
- 15:44साथ टच हो जाओ वह सब जानता है, लेकिन ये बड़ी कारीगरी है।
- 15:50कुशल कारीगरी का एक नमो न। बहुत संभालना पड़ता है, अपने आपको
- 15:58संत को सहेजना पड़ता है, इसलिए मैं कहता हूँ धैर्य रखना, धीरे
- 16:09चलना और धैर्य से चलना। स्लो आइरन स्टडी वेज़ तारिस धेरे
- 16:16चलोगे? धेरे पूर्वक चलोगे?
- 16:221 दिन उस मुकाम को छू लोगे मैं तुम्हारी समस्याएं कैसे कहता हूँ?
- 16:28जहा तक तुम अभी पहुंचे नहीं। जब तुम वहाँ पर चले जाओगे, एक बार
- 16:33जाकर उसका स्वाद भी लोगे तो तुम्हारे में काबिलियत आ गई।
- 16:39तुम संसार के कष्ट उस परमात्मा तक पहुंचा सकते हो।
- 16:47फिर आगे वह जाने। उसने क्या करना है?
- 16:54मेरे हाथ में फरियाद है सर मैं तुम्हारे दुख रोग, पीड़ा, कष्ट,
- 17:03प्ले, श्री चिंतन, चिन्ता। इसको परवर दीगार के सामने रख सकता
- 17:13हूँ। हल करेगा वह विश्व चेतना पहुंचाने
- 17:17का काम मेरा जैसे एक पोस्टमैन होता है।
- 17:21उसमें क्या बांचा गया, हल तो वह करेगा।
- 17:27जिसके पास मैं गुहार लगाऊंगा। आप दूसरा प्रश्न जल्दी जल्दी
- 17:34बीमार क्यों हो जाते हो? मैं दीक्षा देते वक्त आपके थोड़े
- 17:43से पाप पोट लेता हूँ। प्रत्येक व्यक्ति के अपने कर्म जब
- 17:53वह भोग नहीं सकता तो गुरु की श्रवण आवश्यक हो जाती है।
- 17:59अगर तो गुरु लोभी होगा, लुटेरा होगा।
- 18:04तो तुम्हे गलत मार्गदर्शन देके लूट लेगा।
- 18:08अगर पुरुष सही होगा तो तुम्हे सही मार्गदर्शन देके वह काम करेगा जो
- 18:22संत सदा से करते हैं। शांत न होते जगत में तो जल मरता
- 18:28संसार।