Latest / Baba ji Vijay Vats / 9 Oct 25 - वासनाओं की पूर्ति या वासनाओं की मुक्ति? व्यक्ति का लक्ष्य क्या है? मन परेशान क्यों करता है?
Transcript
- 0:15शीतल प्रसाद बाबा जिंदगी बेहाल है, दर्द है, ख्वाब है, कल्पनाएं
- 0:34हैं। समृत्तियाँ हैं।
- 0:44मन हर वक्त परेशान करता है। मैं आपसे ये पूछना चाहता हूँ कि
- 0:56व्यक्ति का लक्ष्य क्या है? शीतल व्यक्ति का लक्ष्य तो तुमने
- 1:10बता ही दिया, पुत्र। यह जो तुमने त्रुटियां बताईं देन
- 1:25रात परेशान के आलम से गुजर रहे हो, न चैन है, न विश्राम, विचारों
- 1:34का तूफान है, मन बोलता है। वासनाएँ हैं, इच्छाएं हैं,
- 1:43कल्पनाएं हैं, योजनाएं हैं प्रतीत की, गुजरे हुए स्मृतियां तुमने
- 1:52अपना दुख गिना दिया पुत्र इसी से आजाद होना हमारा पक्ष।
- 2:00जैसे आजाद हो गया सबका भंडार है यह शरीर तुम्हारा
- 2:23अचेतन मन वासनाओं से। इच्छाओं से, योजनाओं से, कल्पनाओं
- 2:31से, समृतियों से भोगने की इच्छाओं से भरा पड़ा है।
- 2:39इसी कारण तुम दुखी हो। मैंने बहुत बार बुरा पुत्र।
- 2:48लेकिन तुम्हारे मन को ये बात जश्न दी है।
- 2:55मतलब क्या है असल में ज़रा गौर से सुनना।
- 3:01तुम्हें किसी शास्त्र को पढ़ने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
- 3:09मसला है कि हम वासनाओं को पूरा करना चाहते हैं।
- 3:16सुनिए अगर अच्छे से सुन लिया तुमने।
- 3:21और मेरे चार शब्द तुम्हारे हृदय के भीतर उतर गए तो समझ लेना सारे
- 3:28दुख तरोकी तो हो गए। मनुष्य वासनाओं को पूर्ण करना
- 3:39चाहता है। और वासनाओं की पूर्ति के लिए जूट
- 3:46कफर तूफान, गुंडा गर्दी सब कुछ करता है और इनका परिणाम दुख के
- 3:57रूप में सामने आता है। क्योंकि यह सारा संसार इंटरमीगल्ड
- 4:03है जैसे ये शरीर तारों की यूनिफिकेशन से शरीर बना कहीं भी
- 4:14चोट लग जाए, हमें पता चलता है इसी तरह ये यूनिवर्स।
- 4:21तारों से वायरिंग से गुंठा हुआ है।
- 4:26हमारा सारा ब्रमंड जितना भी है क्रिएशन मनुष्य कोशिश करता है
- 4:35वासनाओं को पूर्ति करने की। वासनाओं को पूर्ति करने की कोशिश
- 4:43में करता है और आपको जानकर हैरानी होगी वासनाओं की पूर्ति के लिए भय
- 4:52पुण्य भी करता है। अप्रत्यक्ष रूप से बड़ी बारीक बात
- 5:00है पुण्य करोगे तो स्वर्ग में शराब के चश्मे व्यस्त है।
- 5:10हुरे? यह भी वासनाओं की गोस्ती है, अब
- 5:17नहीं, मरने के बाद इसलिए ऐसे गुरुओं का जमावड़ा इकट्ठा हो गया
- 5:27जो तुम्हें कहते हैं अब करो मरने के बाद मैं आऊंगा तुम्हारी ऊँगली
- 5:31पकड़ के ले जाओ, कोई प्रमाण नहीं, कोई प्रूफ नहीं।
- 5:38और तुम चुकी अंधे हो इसलिए तुम उनके पीछे लग जाते हो।
- 5:50प्रकृति ने कर्म सिद्धांत में अभी करो अभी भरो, आग में हाथ डालो जल
- 5:56जाओगे अभी। पुण्य करो, अभी सुख मिलेगा और वह
- 6:08सुख इतना कम होगा कि तुम्हें पता नहीं चलेगा क्योंकि बाप जाता है
- 6:15तो मेरे इन अक्षरों को कॉन्डेन्स होके कॉन्सेंट्रेट होके सुन लेना।
- 6:24तुम वासनाओं की पूर्ति करना चाहते हो और मैं तुम्हें वासनाओं से
- 6:31मुक्ति दिलाना चाहता हूँ। वासनाओं की पूर्ति के लिए सारे
- 6:39पापड़ बेरना पड़ता है तुम्हें? जूट कफर तूफान या अच्छा दिन आएँगे
- 6:51ये मूड तरह के लोग हैं इनके अच्छे दिन भी अभी नहीं आए तुम्हारी
- 7:01गालियां। अच्छे दिन सिर्फ एक ही व्यक्ति के
- 7:05आते हैं जो वासनाओं से मुक्त हो गया, जिसने वासनो का खेल यहाँ
- 7:14नहीं, अमेरिका में खेलना शुरू कर दिया, रशिया में चाइना में खेलना
- 7:18शुरू कर दिया, वह वासनो से मुक्त नहीं हुआ।
- 7:23और मैं तुम्हें सीधे सीधे कहता हूँ कि तुम दुखी हो क्योंकि तुम
- 7:27वासनव की पूर्ति चाहते हो और मैं तुम्हें एक ही सबक सीखा रहा हूँ
- 7:36कि वासनव की पूर्ति नहीं वासनव की मुक्ति।
- 7:44इन शब्दों को ठीक से हृदय में उतार लेना तुम्हारा हर कदम
- 7:51वासनाओं से मुक्ति में सहयोगी सिद्ध हो।
- 7:57तुम 1 दिन चलते चलते संतत्व की मंजिल तक पहुँच जाओगे, तुमने खुद
- 8:08ही अपने दुख का कारण बता दिया। वासना की पूर्ति के लिए मन
- 8:13दौड़ेगा, मन भागेगा। मन उपाय करेगा, इधर उधर से तिकड़म
- 8:23बाजी करेगा। शतरंज के मोहरे विषय का उतना ही
- 8:27तेज चलेगा और जितना तेज चलेगा उतना ही तुम दुखी होते चले जाओ।
- 8:34दिन का चेंज या रातों की नींद गई। किस कारण से वासियों की पूर्ति के
- 8:43लिए है और मैंने तुम्हें शुरू से ही एक ही लक्षण पता है संत वह जो
- 8:52वासियों से मुक्त हो जाए ना कि वासियों की पूर्ति हो जाए जिसकी
- 8:56वासनाय तो दुसपुर है, कभी किसी की वासनाय पूरी नहीं होगी।
- 9:07वासनाय अगर पूरी हो गई तो आगे बढ़ती।
- 9:18मैंने सुना एक छोटी सी कहानी गरीब व्यक्ति किसी तरह खुले मैदान में
- 9:27एक तरफ़ डाल के रह रहा था। छोटा सा मकान था उसका उसी में सो
- 9:34जाते। परिवार बड़ा सुखी था।
- 9:41जितनी जरूरतें कम है, उतना ही सुख है इसको आप हृदय में लिख लो, अगर
- 9:50सुख चाहते हो तो जरूरतों को बता दो, जरूरी नहीं।
- 9:57कि 5,00,000 का बूट ही डालना है, ₹50 का बूट भी डाल सकता है।
- 10:02कोई वक्त ऐसा था जब बूट ईजाद नहीं हुआ था, व्यक्ति बिना बूट के चलता
- 10:07था। जरूरी नहीं कि 10,00,000 का सुख
- 10:13पहनना पांच ₹400 के सुख से गुजर हो सकता है।
- 10:22सुख चाहते हो, कोई जरूरतों को घटाओ, तुमने जरूरतों को नहीं
- 10:30घटाया। तुमने वासना को बढ़ा दिया और
- 10:34तुम्हारा मन कहता है कि वासना की पूर्ति होती है, लगती है कि होती
- 10:42है होती कहाँ है? वासना ही दुष्पूर रही वहाँ से
- 10:49अकबर जा रहा था। अकबर ने देखा कि छोटी सी एक झुम
- 10:55पड़ी है, कोई नाच रहा है, संगीत बज रहा है।
- 11:10भीतर से राग के अलाप गूंज रहे सर लहरियां उठ रही है नृत्य का संगम
- 11:24जैसे राधी का नाच दिखाओ। नीती वन में और ऐसा ठहाके लगा लगा
- 11:38के वो हँस रहे हैं तो उसने कहा देखा जाए रोको रथ रथ रुका, बादशाह
- 11:51उतरा। जाके झोपड़ी का पल्लू हटाया सभी
- 11:59बतिया रहे थे, नाच रहे थे, गा रहे थे।
- 12:04मधु बनु मैं। राजी का नाच रहे मधुवन में राजी
- 12:17का नाच रहे गिरधर। की।
- 12:24मुरली या बाजे मधुवनु में राधी का नाचरे?
- 12:40देख के दंग रह गया। उनकी झोपड़ी में कुछ भी नहीं था।
- 12:46आज शाम तक का आटा, दाल भात और पे ये इतने प्रसन्न हैं मेरे पास तक
- 12:56तो ताज है हीरे जोहरा मोती मुनिया इतना सम्राज्य।
- 13:03लेकिन ऐसी खुशी तो मैंने जीवन में कभी देखी नहीं।
- 13:09अंहकारी व्यक्ति बराबरी तो नहीं कर सकता और बराबरी करना आसान पड़ा
- 13:20है, दूसरे की लकीर को छोटा मत करो।
- 13:29तुम अपनी भाषाएं और अपनी जरूरतों को बता दो अगर बादशाह अकबर को
- 13:36इतनी बात समझ नहीं आती कि इन्होंने अपनी जरूरतों को सीमित
- 13:40कर लिया, जितना है बस पेट ही तो भरना है।
- 13:48और भीतर से संगीत उमड़ेगा। होंठों के लभों पे बाँसरी बनके
- 13:53गूंजेगा तो हमारे हृदय को स्पंदित कर देगा लेकिन अहंकारी व्यक्ति
- 14:05दूसरे को खुश नहीं देख सकता। इसलिए संतों को खुश रहने वालों को
- 14:12जहर दे दिया जाता। सूली पे लटकार दिया जाता कोई भी
- 14:16बात झूठ सच बना के पर सीधी सी बात के दिखाई ना पड़ें।
- 14:25इनके खुशहाल चेहरे देखने से हमारे अहंकार को आग लगती है।
- 14:35इनकी मजबूरी है ये अपनी वासनाओं को कम तो नहीं कर सकते, अपनी
- 14:40जरूरतों को कम तो नहीं कर सकते वही सहाना ठाक।
- 14:44अगर यह पांच तत्व का पुतला हीरे, मोती, जोहरा तो स्वर्ण युक्त
- 14:50पोशाकी नहीं लेगा तो भी अगर भीतर से दुखी हो तो नींद परमात्मा की
- 14:56देन है। जीसको यह बक्शी है वो तो सड़क
- 15:03बनाते बनाते। उन टूटी फूटी डलियों पर भी हो
- 15:10जाएगा बात नींद की है बात बिस्त्री की बात ये नहीं कि छोटी
- 15:21सी झोपड़ियां में बैठा हुआ 2 जून का अरचा है।
- 15:28वो भी ना हो तो ये गुजर कर लेगा। मैंने ऐसे व्यक्ति देखे हैं जो 3
- 15:35दिन की वासी रोटी को पानी में भोग के खा जाते हैं और नाचते हैं।
- 15:43तुम ऐसी कल्पना भी नहीं कर सकते तुम्हारी वासनाएँ दोषपुर हैं
- 15:50तुम्हारी वासनाएँ ना जाने क्या कुछ करवा देती हैं तुमसे फिर
- 15:57तुमने पूछा है पुत्र के हमारा लक्ष्य क्या है?
- 16:02लक्ष्य बता तो दिया तुमने मन दौड़ रहा है तुम दुखी हो एक चैन हो रात
- 16:10के नींद गई, दिन का चैन गया आग लगी है सारे बदन में, मन में तन
- 16:20में। यही तो तकलीफ है और यही तो लक्ष्य
- 16:26है और बड़ी हैरानी की बात है तुम्हारे घर में आग लग जाए, तुम
- 16:38जोशी से आके पूछोगे। इसका इलाज क्या है?
- 16:44तुम जोशी से पूछोगे नहीं, तुम आग को भझाने में लग जाओगे, तुम्हारे
- 16:54तन मन में आग लगी है। वासन की।
- 16:58तुमने जरूरतें इतनी बढ़ा दी है और यही तुम्हारी बदहाली का कारण
- 17:15मेरे शब्द को फिर हृदय में बसा लेना, वासना को पूरा करने की तरफ
- 17:24नहीं जाना। वासनए दुष्पूर हैं कभी पूरी होंगी
- 17:29बिना वासनो को समाप्त करना है वासनो से पीछा छुड़ाना है और इन
- 17:39वासनो के बिना तुम मज़े से रह सकते हो जब संत रह सकता है।
- 17:44तुम कब नहीं रह सकते हो? तुम्हारे भीतर भी तो वो ही
- 17:50अंडरस्ट्रक्चरल और बाहर स्ट्रक्चरल ढांचा वही तो है।
- 17:55ज़रा भी तो भेद नहीं है जब वह चिंता है मस्ती में मौज में।
- 18:07तो तुम क्यों नहीं हो सकते? तो पुत्र एक बात तो नोट कर लो दुख
- 18:14तो तुम्हें बता दिया जो तुम्हें है दुख का उपाय तुम्हें मैं बता
- 18:20देता हूँ तुम वासनव को पूरा करने के चक्कर में ज़िन्दगी पूरी कर
- 18:25देते। मैं कहता हूँ, वासनव को पूरा मत
- 18:30करो वासनव से पिंडा छुड़ाओ, वासनव से पीछा छुड़ाओ कैसे हो सकेगा ये
- 18:40बस इसी बात के ऊपर आज की चर्चा तो।
- 18:45अकबर ने क्या किया? आप इससे पर सालारों से कहा कि ऐसा
- 18:54करो, यह मुझे खुश नहीं दिखना चाहिए।
- 19:03इसलिए पहले बुरे दिन लेके आओ फिर अच्छे दिनों का लोपन देखो।
- 19:13पहले जनता को भूखों मार दो। गुलबर्ग की यही पुलिस है और जब वो
- 19:20भूखों मर जाए तो उनको पांच शेर अनाज दे दो।
- 19:26बस यही जीवन है। और तुम कहो जय जय कार जय हो
- 19:32महाराज लेकिन नहीं ये ज़िन्दगी कोई ज़िन्दगी नहीं है।
- 19:44बा जाए। इस महक से उठा लो पान दान अपना
- 19:49ऐसी ज़िन्दगी को जीने का कोई अर्थ भी तो नहीं रहेगा क्या अर्थ है
- 19:55जीस जीव में कोई सुख नहीं, कोई आनंद नहीं, चैन नहीं, विश्राम
- 19:59नहीं, मन दौड़े चला जाता है। तूफ़ान वासनाओं का उठ रहा उस जीवन
- 20:05को जीने का अर्थ भी क्या है? तो मीटिंग बुलाई गई।
- 20:13मुख्य सलाहकार, मंत्रीगण परिषद सब बुलाई गई।
- 20:18बैठ कर फैसला हुआ। इसको दुखी कैसे किया जाए?
- 20:22यह एकमात्र व्यक्ति है जो मुझे दुख देता है।
- 20:28जब बादशाह सलामत चलता है तो मेरे आगे हाथ पर सारे लोग खड़े होते
- 20:32हैं, नाचता हो व्यक्ति मैंने पहली बार देखा और मेरा अहंकार इसके
- 20:39सामने बोना पड़ गया। यह व्यक्ति दिखना नहीं चाहिए।
- 20:54बस एक समझदार था व्यक्ति वह उठा जहाँ अपना उसने हाथ जोड़ा इसका
- 21:08सीधा रास्ता मैं तुम्हें बता सकता हूँ।
- 21:11इसको मारने के बजाए इसको दुःखी कर दूंगा और बड़ा प्रसन्न हुआ वो दीन
- 21:22एलाही को जलाने वाला व्यक्ति भीतर तो वही है ना?
- 21:29बाहर कुछ भी कहे हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई सब एक लेकिन भीतर तो वो
- 21:35एक है वो ही है जो दुख देना चाहता है दूसरों पे जो आधिपत्य करना
- 21:40चाहता है दूसरों पे ये बड़ी से बड़ी वासना है, डिक्टेटरशिप बड़ी
- 21:46से बड़ी वासना है। उसने कहा शाबाश बताओ, उसने कहा
- 21:58महाराज बताना क्या करण ने बस मैं कर दूंगा?
- 22:08रात गए हो गया सोने के सिक्के ले लिए 99 एकदम सो और झोपड़ी में
- 22:24थोड़ा सुराख था, गरीब व्यक्ति थे, सुराख भी नहीं भर सकते थे।
- 22:30तो वहाँ से टपका दी पोटली, रात के अंधेरे में कोई पता भी न लो और
- 22:34भाग गया कि टनाटन की आवाज कहाँ से आई।
- 22:40नींद खुली मस्ती में सोए हुए व्यक्ति पूरा परिवार जग गया।
- 22:46उठ के देखा तो सोने की मोहरें बढ़ी हैं।
- 22:54व्यक्ति गरीब भी हो जाए तो वास में उसके भीतर छिपी रह जाती हैं।
- 23:02बस उन्होंने सिर्फ़ अपनी जरूरतों को कम कर लिया है।
- 23:08वासनाओं को समाप्त नहीं किया। वासनाओं से पीछा नहीं छुड़ाया।
- 23:13संत वासनाओं से पीछा छुड़ा लेता है, पंडित छुड़ा लेता है, उसके
- 23:17सामने सोने के सर्फ में पड़ी हो। 3600 प्रकार के भोजन पड़े हो वो
- 23:26जागता है। यह वासना से पीछा छुड़ाना वह बस
- 23:33शरीर को चलाने का उपाय करता है और फिर अगर शरीर भी ना चल पाए कोई
- 23:40ऐसी अवस्था हो जाए। तो प्रभु इच्छा में अपने आप को
- 23:45विलीन कर देता है, उसे ही संत कहते हैं, लेकिन वह संत न था,
- 23:51गरीब था और गरीब वह जो अपनी वासनाओं को दबा ले, जैसे कि
- 24:01राजनीतिक लोग करते हैं। पहले सबसे छीनकर कुछ गिनी चुने
- 24:06व्यक्तियों को दे दो, फिर उनसे पैसा लेके गरीबों में बाँट दो, जय
- 24:12जयकार करवा लो बस यही तुम्हारी कमजोरी है कि तुम छीन जाने देते
- 24:18हो अपना। यही पाप है, बड़े से बड़ा अगर पाप
- 24:25है तो यही है तुमने अपना द्रव्य छिन जाने दिया, कोई अंग्रेज ले गए
- 24:31कोई हुन ले गया, कोई फ्रैंसीसी ले गया कोई कुछ ले गया, कोई कुछ ले
- 24:39गया। सब तुम्हारा माल लूट गया।
- 24:41सोनी की चिड़िया मलंग हो गया। कैसे तुम लूटे आज दर दर की भीख
- 24:49मांग रहे हो फिर तुम्हें पहले गरीब करो।
- 24:57गोल वर्कर की यही नीती थी। कुछ व्यक्तियों को दे दो वह
- 25:03व्यक्ति तुम्हारे गुलाम हो गया। खैर, उन व्यक्तियों से लेके चंदा
- 25:11बस मात्र जीवन मात्र जीवन दे दो तुम्हें।
- 25:16और तुम जय जयकार करोगे, तुम बांड बन जाओगे, यही तरीका है, मैंने
- 25:21तुम्हें समझा दिया। संत राज़ भी नहीं करना चाहता
- 25:30क्योंकि वह पहले से ही राज़ कर रहा है।
- 25:35जो चीज़ तुम पर तुम तुम्हारे पास होती नहीं, उसकी तुम सदा काम न
- 25:41करते हो, जो पहले से ही मौजूद है। तुम पहले से ही राज़ कर रहे हो,
- 25:48आनंद में हो मग्न हो कुमारी में हो मस्ती में हो।
- 25:52तुम्हारा रोम रोम अठखेलियां खा रहा है, उस अमृत कोटा में है तो
- 25:59तुम्हें आनंद भी नहीं चाहिए। इसे आनंद भी नहीं चाहिए में ही।
- 26:12वही संत होता है। तुम इच्छाएं के गला में हैं और
- 26:17तुम्हारी इच्छाएं बहुत ही ज्यादा हैं और पैदा तुमने स्वयं की है।
- 26:25पड़ोस में पांच मंजिला मकान ढल गया।
- 26:28तुम्हारे आग लग गई रात को नींद तुम्हें क्यों नहीं आई?
- 26:34पड़ोस नई कार लिया है। चमचमाती महंगी आग तुम्हें लग गई
- 26:39रात की नींद तुम्हारी हराम हो गई तुम्हारी नींद क्यों हराम हो गई?
- 26:46उसको देख लेते तो अमीरी का लुत्फ अमीरी में सुख होता है कि नहीं
- 26:50होती? हर्ज क्या है?
- 26:54परखना चाहिए, देखना चाहिए और भोग कर ही तो पता चलेगा, लेकिन राजाओं
- 27:02का सदा से ही ये ढंग रहा है। राज़ करने का आपस में लड़ा दो
- 27:08तुम्हें। धीरे धीरे तुम्हारा किसी युक्ति
- 27:13से छीन लो और छीन कर कुछ गिने चुने व्यक्तियों को दे दो, जिन को
- 27:19दोगे वो गला में हो जाएंगे और जिन को छीनोगे वो मांगने लग जाएंगे,
- 27:25फिर उनसे ले के थोड़ा थोड़ा बांट दो, पेट भर रहे हैं।
- 27:29ताकि वोट भी देते रहे। मर जाएंगे तो वोट कौन डालेगा?
- 27:37ये जीते रहे और जीने भर का सामान दे दो और जैन अमीरों के पास सारी
- 27:45संपत्ति तुम नाम कर दोगे। सबसे बड़े बोर्ड वो वह सिकंदर
- 27:53जैसे बोर्ड हैं पर कोई सिकंदर आज तक अपने साथ नहीं ले जा पाया और
- 28:01सिकंदर कहते हैं हाँ ले आओ, हम संभाल लेंगे कहाँ संभालना जाता
- 28:06है। धर्म से गर पड़ते हो आखिर में तुम
- 28:11ये भ्रम है के हमारे बच्चे, हमारे बच्चे बुद्धू पैदा होंगे जब कमाया
- 28:18कमाया मिल गया तूफानों के होलों के।
- 28:29तांडव बना सही, उस फसल में फल नहीं लगता इसलिए राजनीतिज्ञों के
- 28:37बच्चे देख ले ना बुद्धू पप्पू गुड्डू ऐसे उनके।
- 28:45ये राजनीतिज्ञों के बच्चों का हार कमाया कमाया मिल गया और अमीर अगर
- 28:53गरीब अगर अमीर हो गया वह बुद्धू हो जाएगा इसलिए मैं तुम्हें कहता
- 29:00हूँ राजनीति। राजनीति खुद में ही एक रोग है।
- 29:10अगर ऐसा रोग चाहते हो तुम जो तुम्हे चैन भी दे, जो में दर्द भी
- 29:16दे तो राजनीतिज्ञ हो जाओ। वो तुम्हें चैन भी देगा और वो
- 29:25तुम्हें भीतर से दर्द भी देगा। तुम दुखे भी होते जाओगे?
- 29:31और अगर वो दर्द चाहिए जिसे मीरा भगवान कहती है बिरहा की आंख।
- 29:42वह तुम्हें आनंद में ले जाएगी, वह भी दर्द देगी, वह भी आग लगाएगी
- 29:48भीतर, लेकिन उस आग का मज़ा कुछ और होगा, यह आग है।
- 29:59अभाव ना हो जाये उसकी कंपनी वह आग है, प्रेम मिल गया और पूर्ण कैसे
- 30:07हो जाये प्रेम दोनों में बड़ा फर्क है।
- 30:1499 सिक्के ग्रा दिए थे उन्होंने गिने।
- 30:18इतना सब तो एक कम थे तो मियां बीबी दोनों ने फैसला किया एक कम
- 30:26है इसको खर्चना नहीं यही तुम्हारी बात सुना है इसको अगर एक और मिल
- 30:35जाए। तो फिर सोना हो जाएगा, बस यही
- 30:40सोचता है गृहमंत्री के प्राइम मिनिस्टर कब बन जाऊं यही सोचता है
- 30:46मंत्री के मैं गृहमंत्री का पढ़ना तुम्हारी यही तमन्नाएँ तो तुम्हें
- 30:52जीने नहीं देते। रौब तो तुमने बता दिया पुत्र इस
- 31:07गरीब झोंपड़ वाले को रोक लग गया, अब ये जोड़ेगा डरेगा कोई छीन न ले
- 31:18अब रात भर पहरा देगा पहले घोड़े बेच के सोता था।
- 31:22अब रात भर जागेगा कोई चोर उचक्का ना आ जाये रातों की नींद गई दिन
- 31:35का चयन गया क्योंकि शो करना है वह ज्यादा समयदार था कोई गोल वर्क कर
- 31:41रहा होगा। और बड़ी सुंदर पॉलिसी है और हाथ
- 31:49इनके भी। ये नंगे हाथ जाते हैं।
- 31:51तुम देख लेना सिकंदर नहीं इसलिए बड़ा समझदार था सिकंदर सिकंदर,
- 31:56तुम्हें एक बहुत बड़ी सीख देके गया था जो तुम्हें समझ नहीं पड़े,
- 31:59तुम सीख नहीं पाए सिकंदर तुम्हें समझाना चाहता था।
- 32:05कह दुनिया के लोगों तुम सिकंदर बनने की चेष्टा मत करना या देखो
- 32:12सिकंदर खाली हाथ चला यद्यपि कभी किसी का जनाजा उसके बाहर हाथ नहीं
- 32:18खाली होते हाथ भीतर होते हैं। लेकिन सिकंदर कहता मेरे हाथ बाहर
- 32:24निकाल देना तुम्हें एक सीख दे के जाना चाहता था, लेकिन बेकार करा
- 32:29धरा सब बेकार हो गया। सिकंदर जो तुम्हें सीखा के जाना
- 32:34चाहता था वो तुम सीख नहीं पाए। बस आज सिर्फ उसकी कहानी रह गई।
- 32:41उसकी सीख नहीं, तुम सीख नहीं पाए तो उसका दिल का चयन गया क्योंकि
- 32:50शो करनी है सिक्के अब नगरपालिका के सदस्य प्रेसिडेंट हो गए हैं तो
- 32:57चलो ऊपर एम एलए भरु। अरे मला बन गए तो एमपी एमपी बन गए
- 33:07तो मिनिस्टर मिनिस्टर बन गए तो फिर उच्च मंत्री फिर घृणा होगी,
- 33:12ऊपर वालों से प्रकट नहीं करोगे, लेकिन तो हमारा जीरा जलेगा, यह है
- 33:18दुष्ट कब मरे और हम इसकी जगह बैठे।
- 33:23इसलिए राजनीतिक तुम कितनी ही जपियां डालो, तुम इनके मन में
- 33:29झाँक नहीं सकते। संत अपने भीतर जाकिर इनके मन में
- 33:32झाँकता है। सबसे करीबी व्यक्ति जो होता है
- 33:35वही तुम्हारा दुश्मन होता है, वही चाहता है की तू मरे और मैं इसकी
- 33:39जगह बैठू क्यों? क्योंकि वासनाओं की पूर्ति उसने
- 33:44करनी है। अभी वह परम नहीं हुआ।
- 33:49कितने ही भारत रत्न दे दो लेकिन एक बाकी रह जाएगी।
- 33:57तड़प परम मिनिस्टर नहीं बना और यह तड़प।
- 34:03न जीने देखी, न मरने देखी। संत वह नहीं जो अपनी वासनाओं को
- 34:14पूरा कर रहे हैं। संत वह जिसे समझ आ जाए के वास्य
- 34:22दुष्पूब हैं। बस नाए भोगने से और बढ़ेंगे, आग
- 34:31में भी डालोगे तो आग ज्यादा प्रजर्वित होगी।
- 34:36जैसे कुछ ना था तो शो का जुनून ना था झोपड़ वाले से।
- 34:43कुछ ना तो मज़े से नींद आती थी, सोते थे अब रात भर जागते हो अगर
- 34:49कोई आपको रात को जागता हुआ मिले ना समझ लेना इसके किसे में कुछ है
- 34:55जो घोड़े बेच के आराम से सो जाए? वह सुनते हैं।
- 35:04उसके पास है ही नहीं। कुछ तुम छीन करोगे और उसको तो ये
- 35:09भी पता चल गया गरीब व्यक्ति का तुम शरीर तो छीन सकते हो, लेकिन
- 35:14संत तो वह है जिसे पता चलेगा कि शरीर भी मैं नहीं हूँ अब उससे
- 35:19क्या छीनोगे तुम? जो उसके पास है वह छीना नहीं जा
- 35:23सकता। नैनम छदन ती शस्त्र नईनम दाहती
- 35:30पांव का नई चैनम कलैजन त्यापो न शरश तिमारोता क्या छिनोगे तुम?
- 35:40बाहर से फटे हाल हो या सोने की पोशाकें पहने कृष्ण की तरह कोई
- 35:47फर्क नहीं पड़ता। इसलिए गंधारी ने दिया था श्राप
- 35:53सोचा था कि कृष्ण पांव पकड़ेगा। गांधारी ने कृष्ण को बुलाया,
- 36:00कृष्ण चले हैं, द्वारका काम निपटा दिया है अपना माता को प्रणाम करने
- 36:10आए पाम छुए माता मेरा प्रणाम स्वीकार करें, मैं द्वारका जा रहा
- 36:17हूँ। लेकिन गांधारी तो विद्वेष की आग
- 36:21में चल रही थी, उसके सो के सो पुत्र मार दिए, एक भी तो नहीं बचा
- 36:27धृतराष्ट्र का एक पुत्र बचा यू युसुफ वह गंधारी पुत्र नहीं का
- 36:32दासी पुत्र। उसके आग लगी हुई थी और उसका कारण।
- 36:39कोण? कारण कोण?
- 36:41तुम्हें पता नहीं होता। कारण कोण?
- 36:44कृष्ण सदा ही पीछे रहते हैं और कृष्ण इसीलिए पीछे नहीं होते हैं।
- 36:55वो कायर हैं नहीं, हर बार कृष्ण का वार है।
- 36:59लेकिन कृष्ण इसका चेहरा अपने सिर पे नहीं सजाने चाहते इसलिए कृष्ण
- 37:06कहते हैं अर्जों से मेरे इन मारे होवों को तू मार दे अर्जुन और
- 37:11चेहरा अपने सिर पे ले ले, वो जानते हैं गृहस्थ व्यक्ति सेहरा
- 37:18चाहता है। झंडी दिखाना चाहता है बस ये पूरी
- 37:22कर दो उसको बना कोई भी दे नाम किसके भी कर दो लेकिन झंडी मुझे
- 37:30दिखा लेने दो। कृष्ण पीछे से वार नहीं करते।
- 37:38कृष्ण उसको सेहरा दिलाना चाहते हैं।
- 37:41जीत का सेहरा झंडी तू दहार जो बनाने दूंगा सब कुछ सब बोलते हैं
- 37:48कृष्ण कि मेरे द्वारा इन मारे गए व्यक्तियों को हनन कर दे मैं मार
- 37:56चुका हूँ इन्हें। तू सेहरा अपने सिर पे से जा ले,
- 37:59उसे पता है जो संत नहीं हो गया वे सेहरा अपने सर पर बांधने की
- 38:06चेष्टा करेगा। इसलिए सभी राजनीतिक लोग सेहरा
- 38:12बांधने की फिराक में करते हैं। तुम्हारी लड़ाईयाँ।
- 38:16सेहरा बांधने की लड़ाईयाँ है। वो कहती है मैंने किया वो मैंने
- 38:20किया, तुमने कहाँ किया, मैंने किया बस ये ही लड़ाईयाँ है।
- 38:30एक लहर चली। सबको सम्मान दे दो बराबर एक
- 38:43ज्यादा बोलता हूँ मारकस तो मर गया था कम नहीं समझना चाहिए सबको
- 38:49बराबर सबको हक है। संत व्यक्ति अपना हक कभी नहीं
- 38:54जपता। संत व्यक्ति अपना कर्तव्य पालन
- 38:59करता है। अधिकार बस यही मज़ा है।
- 39:05संत कहता है मुझे जरूरत भी नहीं है, यहाँ तक जरूरत नहीं है।
- 39:13इच्छाएं वर्किंग। और जीने की इच्छा भी न रहे।
- 39:17बड़ी से बड़ी इच्छा है जीव वैष्ण जीने की इच्छा महावीर की वो इच्छा
- 39:23भी कहाँ रहती है? संत जीने की इच्छा भी नहीं रखता
- 39:37इसलिए संत। से कुछ छीना नहीं जा सकता क्योंकि
- 39:42उसका कुछ है ही नहीं। वही संत जीसको पता चल गया न मैं
- 39:49हूँ न कुछ मेरा इसी भ्रांति को पाले पाले हम दुखों के समूह में
- 39:56दुखी होते रहते हैं। रातों की नींद गंवा देते हैं, दिन
- 40:02का चैन गंवा देते हैं। इसे हम जीवन कहते हैं।
- 40:07दिनों को धक्के देना है, यह जीवन नहीं, जीवन देखना तो किसी संत की
- 40:13कुटिया में आके एक बार निहार लेना।
- 40:17तुम्हारी आँखों से अश्रु धारा बहे तुम रहोगे तुम चलाओगे ओह ऐसा तो
- 40:28हम भी हो सकते थे, काश हम भी ऐसा हो जाते।
- 40:34उसकी इस हालत को देखकर तुम्हें रोना आता है, ऐसा तो हम भी हो
- 40:39सकते थे इसलिए मैं कहता हूँ जीते जी असली संत को एक बार जरूर देख
- 40:48लेना तुम्हारे भीतर वो आग जग जाएगी वह बीज।
- 40:54वो दिया जाएगा तुम्हारी भूमि में प्रस्फुटित हो जाएगा 1 दिन तुम आज
- 40:59नहीं कल तुम मुक्त हो जाओगे क्योंकि एक बीज बहुत दिया गया और
- 41:05जो बीज बहुत दिया जाता है वह अंकुरित होता है और जो अंकुरित
- 41:09होता है, उसमें फल लगते हैं। तो मेरी इस बात को याद रख लेना,
- 41:18संत को मात्र एक बार निहार लेना, पूरी भरपूर आँखों से देखना और
- 41:25अच्छी तरह से छानबीन करना क्योंकि बुद्धि बड़ी तर्क है।
- 41:31बुद्धि कहती अनशन पर बैठा है तो जरूर रात को खा लेता होगा अपने घर
- 41:38में बैठा कौन जा रात को मूली के फरोठे खा लियो पता चलता है आलू के
- 41:45फरोठे खा लियो चाट भलाई सज्ञा हो रात।
- 41:52अपनी तार्किक बुद्धि का पूर्ण रूप से प्रयोग करना और जब्त तुम्हारी
- 41:58ये तार्किक बुद्धि धड़म से घर जाएगी।
- 42:01संत के आगे घर की जाएगी क्योंकि संत की।
- 42:09वासना गिर गई। संत ने वासनाओं को पूर्ण करने की
- 42:15इच्छा नहीं की, उसे पता चल गया वासनाएँ दुष्पूर हैं और जब
- 42:21दुष्पूर हैं तो कितना अच्छा होगा कि नहीं छोड़ दिया जाए पूर्ण करने
- 42:27की इच्छा। वह तुरंत से छोड़ देता है।
- 42:35तुमने बहुत भोग लिया। इसी पल छोड़ दो वसनों को पूरी
- 42:45करने की इच्छा को गिरा। यह पूरी नहीं होती।
- 42:53यह श्रद्धा तुम्हें मृग तृष्णा की तरह दूर दिखाती रहेंगी।
- 42:58सं 47 हमें कर देंगे तुम्हें अमीर बना देंगे कहो हमने अमीर नहीं
- 43:04बनना हमने संतुष्ट होना। जो सुख पायो, रामभजन में जो सुख
- 43:23पायो। राम भजन मैं हूँ वो सुख, ना हीं
- 43:35अमीर मैं मनडोला जो मेरे। फकीर मैं फकीर मैं मनगला जो मेरा
- 43:58रहा हूँ। फकीर?
- 44:02जो सुख पायो राम भजन मैं जो उसके साथ योग में आनंद आया उससे मिलन
- 44:08में आनंद आया वह सुख अमीरी में नहीं अमीरे तो कोई छीन सकता है
- 44:16किसी वक्त, लेकिन वह तत्व तुमने पा लिया।
- 44:22जो न छीना जाता न कटता, न पीटता न जलता, न सूखता न गड़ता।
- 44:31वो तत्व जिसने पा लिया उसका कुछ ही छीना नहीं जा सकता।
- 44:41पुत्र मेरी बात को अच्छी तरह से समझ लो।
- 44:46तुमने पूछा आखिर इस दर्द का दुआ क्या है?
- 44:54दर्द तो तुमने बखान कर दिया, दुखी हो, तुम क्यों दुखी हो जभी
- 45:01तुम्हें बता दी? तुम इस लश्क पश्क को देखकर इसके
- 45:07पीछे स्वर्ण पुषकें पहनना शुरू कर देते हो, लेकिन संत बड़ा पारदर्शी
- 45:12होता है। संत की आँखें ट्रांसपेरेंट होती
- 45:16हैं। तुम्हें आर पार झांक लेती हैं।
- 45:19वह तुम्हारी सोने की प्रसातों के पार देख लेता है भीतर जलता हुआ
- 45:24हृदय तुम जल रहे हो भीतर से तुम्हे चय नहीं जो ज़िन्दगी के।
- 45:41जो वस्तुओं के प्यार में फंसा जाल में फंसा वह बेकरार हो गया।
- 45:55पदार्थों को इकट्ठा करने में के प्यार में जो उलझा।
- 46:02उसका चैन भी गया, उसका करार भी गया और उससे मिला भी कुछ नहीं।
- 46:10इतने दुख सहन करके उसने जो इकट्ठा किया और उसका नाम था।
- 46:19यहीं गलती हो गई हम। प्यार में जलने वालों को चैन कहाँ
- 46:34हाय? आराम कहाँ हम प्यार में जलने
- 46:45वालों का चैन कहाँ है आराम कहाँ। हम।
- 46:57प्यार में जलने वालों को। जो इसके प्यार में जला वस्तुओं के
- 47:08प्यार में जला इकट्ठे करने के प्यार में जला सारी धरती कम हो
- 47:12सकती है। तुम्हारी चक्रवर्ती सम्राट हो
- 47:14सके। चक्रवृत्ति सम्राट कितने हुए और
- 47:17चले गए विदा हो गए एक तुम भी हो जाओगे तो तुम भी विदा हो जाओगे,
- 47:26लेकिन बात तो ये है जिसने इसके साथ मुँह किया।
- 47:29माया तो ठगनी भाई फगत फिरत स्वदेश।
- 47:36वर्कनाथ यह वस्तुएं तो ठगने को फिर रही है तुम्हें माया तो ठगनी
- 47:45भाई ठग त फिरत स्वदेश या ठगनी ठगनी ठगी इस सत्य ने इस ठगनी को
- 47:53ठग लिया। तो जान लिया कि वासनाई दुष्पूर
- 47:58हैं नहीं पूरी हो सकती। उसने वासनव को त्याग दिया, वासनव
- 48:08से पीड़ा छुड़ा दिया, वासनव को छोड़ दिया तो क्षण छोड़ दिया और
- 48:13देखो। तुम आज की बात कल पे मत छोड़ना के
- 48:16कल छोड़ देंगे। आज आज वो बोले थे इसी गलती में
- 48:22रावण मारा गया, रावण मरने लगा। राम बोले भैया यह मर तो गया।
- 48:33लेकिन विद्वान बहुत मरने वाला है अभी स्वांसवा के तू जा इसे जिंदगी
- 48:39का निचोड़ पूछ ले बड़ा विद्वान है, बड़ा ज्ञानी है जीस रावण को
- 48:48राम ने मारा। और राम अपने भाई को भेज रहा है कि
- 48:52देखो विद्वान है। इससे शिक्षा लिया।
- 48:58तुम उन्हीं पर बहस करते हो बैठे बैठे राम ठीक था कि राम ठीक था,
- 49:08राम भी ठीक था। बस बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी, राम
- 49:12की बुद्धि ठीक थी, रावण की बुद्धि भ्रष्ट हो गई।
- 49:16जाको में दारूण दुख देंही जाको में दारूण दुख देंही ताकि मत पहले
- 49:23घर लें विख हो गया उसका बुद्धि हो गई उसके।
- 49:31तो रावण के सर के तले बैठ गया जाके बड़े भैया ने कहा है तुम
- 49:39बड़े विद्वान हो, अंतिम वेला है, कुछ चार अलफाज़ मेरे लिए भी
- 49:46कहेगा, मेरा कल्याण हो जाए। जिंदगी को मज़े से जी सकूँ रावण
- 49:55कुछ ने बोला लक्ष्मण राम के पास गए भईया।
- 50:05लगता तो है वह जी रहा है, लेकिन बोल नहीं पा रहा।
- 50:10राम बोले नहीं, थोड़ा शिष्टाचार्य भी निभाना होगा।
- 50:16यह परम परम विद्वान है, लेकिन शिष्टाचार्य भी है।
- 50:23तुम इसके चरणों की तरफ बैठो, फिर तुम्हें ज्ञान मिलेगा लक्ष्मणचरण
- 50:31की तरफ बैठ गया प्रार्थना की, के हे महाविद्वान ब्राह्मण रावण।
- 50:45मैं क्षत्रिय गुरु का जन्मा रघुकुल वंशी तुम्हारी चरण में
- 50:51पड़ता हूँ, मुझे कुछ को प्रतीश दीजिये, इसके बाद तो आप चले
- 50:56जाओगे। तो रमन ने कहा भैया आज का काम कभी
- 51:05कल पे मत छोड़ना, बस मेरी शिक्षा को याद रखना, कल का मतलब कार्य
- 51:12तुम्हे कोई भरोसा नहीं है कल तुम रहोगे कि नहीं रहोगे?
- 51:16यही मैंने गलती कर ली। बहुत बार आया, बहुत बार राम की
- 51:27शक्ति दिखी हनुमान आके मेरे पुत्र को मार गया छोटे अक्षय कुमार को।
- 51:34अंगद ने आके पांव जमाया, बहुत बार शक्ति देखी और बहुत बार मन में
- 51:39आया कि सीता को छोड़ दूँ, ऐसी कथा शायद तुमने कभी सुनी नहीं होगी,
- 51:51लेकिन मैं कल के ऊपर टालता रहा देखेंगे।
- 51:54कल देखेंगे और इससे कल ने ही मुझे काल का ग्रस बना दिया तुम भैया यह
- 52:01गलती मत करना आज का काम कल पे मत छोड़ना मैंने सीता को छोड़ने की
- 52:06बहुत बार इच्छा की देख लिया था बल चमत्कार राम का।
- 52:13छोड़ने की इच्छा भी हुई, लेकिन मैं आज का काम कल पर छोड़ता चला
- 52:20गया। इसलिए आज तुम्हारी सबने मेरी दशा
- 52:23देखो। चारों वेदों का ज्ञान कल की आड़
- 52:31में काल का ग्रहस बन गया। तुम कल पर मत छोड़ना, आज जो करना
- 52:38वो आज कर लेना अभी कर लेना, मैं भी तुमसे कहूंगा कल और आज भी नहीं
- 52:49अभी छोड़ दो मुझे सुनते सुनते छोड़ दो।
- 53:03हम किसी को छीनने नहीं देंगे और किसी का छीनने के बिना हम किसी पर
- 53:12आधिपत्य नहीं जमाएंगे और किसी को अपने ऊपर आधिपत्य जमाने भी नहीं
- 53:18देंगे। हम तानाशाह नहीं बनेंगे और किसी
- 53:22को तानाशाह अपने ऊपर बनने भी नहीं देंगे।
- 53:25मैं तुम्हें कायर बनने के लिए प्रेरित नहीं कर रहा हूँ।
- 53:31उठो जागो वीर हो वीर बनो। तुम्हारी भीतर की आत्मा न मरती, न
- 53:38गलती, न जलती न सोबती, न कटती तुम उठो और कल नहीं आज नहीं अभी उठो।
- 53:56दुष्टों का हनन करो दुष्टों का मतलब आदमी को मारना नहीं होता,
- 54:08दुष्टता का हनन करो। वासनाय इच्छाएं इनको पूर्ण करने
- 54:19की तरफ नहीं दौड़ना। ये पूर्ण होती नहीं ऐसा जान लेना
- 54:31है खुली आँखों से वाश नाएँ दुष्पुर हैं, यह जान लेना है यह
- 54:41प्रत्येक भज्ञा ही तुम्हें संत बनाई।
- 54:54और जो यह जान लेता है कि वासिनी दुष्पूर है वह वासिनी को तुरंत
- 55:00छोड़ देता है, वासिनी तो तुम्हारी भी पूरी नहीं है सोचा था एक छोटा
- 55:10सा मकान ले लूँ ले लियो। बहुत कुछ आपका पूरा हो गया और जो
- 55:17बाकी बच गया वो भी पूरा हो जाये तो वासना और बढ़ती रहे।
- 55:26यह वो मृग तृष्णा है जैसे। मृग मारिच का मृग भागता है प्यासा
- 55:35और उसे रेत में चमकता हुआ अवरक पानी जैसा लगता है हो रहा सरोवर
- 55:40वहाँ जाकर पानी पी लूँगा और रेगिस्तान की उस तकती हुई जमीन
- 55:45में भागता चला जाता है। मृग तृष्णा की तरह अभ्रक चमकता
- 55:49होता है। सदा दूर दिखाई पड़ता है।
- 55:53इसी चीज़ का लाभ उठा लेते हैं। अब नहीं 47 में आपकी इच्छाएं पूरी
- 56:07और हम झांसी में आ जाते हैं। तुम एक तरफ़ हो जाओ।
- 56:17भीखा उतर रहा था, ऊपर से सफाई सेविका ऊपर जा रही थी।
- 56:23अपनी मस्ती के आलम में गुम हुए भीखा सूझ रहा था।
- 56:27सब कमा लिया, मिला तो कुछ है नहीं।
- 56:32किसी सोच में डूबा डूबा नीचे उतर रहा था।
- 56:36सीढ़ियों से सफाई सेविका ऊपर जा रही थी।
- 56:41उसने देखा, आज सेठ जी किसी उलझन में और भीखा सोच रहा था।
- 56:51कि मिला तो कुछ नहीं। ऐसा ही व्यक्ति संत हो सकता है।
- 56:58जिसने जान लिया वासनाएँ दुष्पूर हैं, पूरी नहीं होती।
- 57:05जब पूरी होती हैं तो आप देखते हो जैसे कभी गाड़ी में बैठे हुए आपने
- 57:10देखा। आपको दिखता है कि दूर कहीं आसमान
- 57:14प्रथु से मिल रहा है, लेकिन आप वहाँ भी पहुँच जाते हो, लेकिन
- 57:19आसमान कहीं प्रथु से मिलता नहीं, बस बिल्कुल ही ऐसा है।
- 57:25तुम्हारी बातों में तो भीखा नहीं जान लिया कि कुछ नहीं मिला।
- 57:30सब है। आज बेखा का पैसा बाजार में ब्याज
- 57:33पर चलता है। अपने विचारों के आलम में खोया
- 57:47हुआ। जब सफाई सेविका ने देखा किया तो
- 57:54टकरा जाएगा तो उसने ऊंचे से आवाज़ दी बेखा।
- 58:01सेठ जी एक तरफ हो जा और पुड़ियाँ थोड़ी सी ज्यादा चुड़ाइयों में
- 58:11मैं एक पार से चली जाऊंगी, ऊपर तुम दूसरे पार से नीचे आ जाना।
- 58:17भीखा की धंधा खोली। उसने कहा ओह सोच रहा था भीखा इधर
- 58:25जाऊं, उधर जाऊं छोड़ दूं या भोग लूँ?
- 58:31क्या करूँ सब है इसी द्वंद्व में, गुम हुआ हुआ भीखा भीतर।
- 58:38दंध से घिरा हुआ नीचे उतर रहा था, सीढ़ियों के तो सफाई सेबका ने
- 58:45कहा, बीखा एक तरफ हो जा और बीखा ने चण पकड़ लिए सफाई सेबका के।
- 58:56हे देवी तू मेरी प्रथम गुरु हो गई, आज तुने मुझे दंड से मुक्त
- 59:03किया, बस समझा गया और उसी रात बीकानेक्रह त्याग कर दिया।
- 59:14तुम भी एक तरफ हो जाओ, छोड़ना है बहुत बार आया होगा रावण की तरह,
- 59:21मन में अभी छोड़ दो अभी अभी ना कल ना आज अभी अभी वचन लो।
- 59:32के मैं इन मृग तृष्णाओं के पीछे नहीं भागूंगा।
- 59:36नहीं भागूंगा अभी छोड़ता हूँ मैं और तुम कहोगे तुम तृ क्षण सुखी हो
- 59:42गए दादू दूजा को नहीं दूजी मन की दो दादू कहते हैं।
- 59:55तुम जब दूसरे हो जाते हो तो दुखी हो जाते हो।
- 1:00:01दादू दूजा को नहीं दूजी मन की दौड़ जब भेद पैदा होता है मन
- 1:00:07दौड़ता है दौड़ गई सन से गया बस तू ठोर के ठोर।
- 1:00:13तुम आनंद की तलाश में हो, तुम दुखी हो यही तुम्हारी मंझले तुमने
- 1:00:20पूछा बेटा यही तुम्हारी मंजिल है कैसे मिलेंगे एक तरफ़ हो जा, एक
- 1:00:28तरफ़ किधर हो जा जान ले जितना भी होगा।
- 1:00:33उसमें सुख पाया रस पाया। तुम्हें स्थाई रस की आवश्यकता है।
- 1:00:41तुम्हारा भीतर स्थाई रस की चाहत में मारा मारा फिरता है, इसलिए
- 1:00:50कभी धन के पीछे हो जाते। कभी प्रतिष्ठा के पीछे, कभी
- 1:00:53गदियों के पीछे, कभी ज्ञान को जोड़ने लगते, कभी सूचनाओं को आबध
- 1:01:01करने लगते, अपने न्यूरोस में फीड करने लगते हैं।
- 1:01:04तुम्हें कहीं भी चैन नहीं आता। यार में जल में बालों को।
- 1:01:13चैन कहाँ हाय आराम कहाँ? प्यार।
- 1:01:25में जलने वालों को। चैन कहूं आराम कहूं सब खो दिया
- 1:01:39तुमने और संत ने सब कह लिया और संत का लक्षण तुम्हें समझा दिया
- 1:01:43मैं जिसने जान लिया वासनाएँ दुसपुर हैं।
- 1:01:52के जीवन के लक्षणों से तुम्हें पता चल जाएगा।
- 1:01:56इसने जान लिया आवास में हिंदू दोस्तों ने कैसे वासना को भोगना
- 1:02:03छोड़ दिया। ना राज चाहिए, ना काज चाहिए, ना
- 1:02:11धन चाहिए, ना दौलत चाहिए, ना जमीन चाहिए, ना जायदा चाहिए, ना
- 1:02:16मिष्ठान, भोजन चाहिए, ना सैर सपाटी चाहिए, ना जहाज पे उड़ना
- 1:02:21है, ना खुसपना है ना कोने का डर। उस जहान में पहुँच जाता है जहाँ
- 1:02:31आनंद ही आनंद है, खुशियों की बौछार है, बदमस्ती का आरंभ है,
- 1:02:42खुमारी में डूबा हुआ तुम। अठखेलियां करते हो आनंद के सरोवर
- 1:02:48में मग्न अभी छूटता वासनाय दुष्पूर है प्रत्येक ने भोंगी
- 1:02:58होंगी बहुत जन्म बीते मेरे माधव ने जन्म हमारे लिखे जन्म नहीं अभी
- 1:03:04से अभी से उसके लग जाओ। तेरा पाना मीठा लगा है और चलो
- 1:03:12मेरे संग बोलो पहले परखो मैंने परखना सीखा दिया तुम्हें चाह गई
- 1:03:21चिंता, मिट्टी मनवा बे परवाह। इनको कुछ होना चाहिए, वही सहिंसा
- 1:03:29उसको कुछ नहीं चाहिए, ना सुंदर भोगने को उसकी जीवा को पकौड़े
- 1:03:36चाहिए, ना बल्ले चाहिए ना बढ़िया 10,00,000 के सूट वूट चाहिए ना?
- 1:03:428,00,00,000 का जात चाहिए। ना रूतबा चाहिए, ना सम्मान चाहिए,
- 1:03:49ना वह वही चाहिए, ना जीवन का अनुमोब है।
- 1:03:52उसे ना लो जो इन सब चीजों से पार उस आनंद के मधुमस्त माहौल में
- 1:04:01खोया खोया रहता है। उसको संत करते है तो चलो मेरे संग
- 1:04:08अभी चलो छोड़ दो इनको, यह है दुष्पुर।
- 1:04:23वासना ही पूरी नहीं होती, वासना को छोड़ना होता है, वासना से
- 1:04:30पिंडा छुड़ा लो और मेरे संग चलो आओ चले और।
- 1:04:38है जो रे तुम को। सितारों पे ले चलूँ।
- 1:04:50आओ आओ। सितारों पे ले चलो, दिल जो जाए।
- 1:05:07ऐसी। बाहरों में ले चलो अब वो।
- 1:05:17हजूर तुमको सितारों पे ले चलूँ दिल जो मज़ा ऐसी बहारों पे ले
- 1:05:35चलूँ। ओह हजूर, तुमको।
- 1:05:41और संत ऐसे ही बहारों में सितारों पे बैठा आनंद में मगन सराभौर रहता
- 1:05:48है, यह उसका लक्षण है, आओ देखो। संतत्व की पहचान कोई मुश्किल नहीं
- 1:05:57है। यही संतत्व की पहचान है।
- 1:05:59जिसने पालिया वाशनाएँ दुष्टपूर हैं वह वासनाओं को छोड़ देगा।
- 1:06:04कभी कोई गंदगी को खाता है? धन्यवाद।