Latest / Baba ji Vijay Vats / 11 Jan 25 - कुंभ में इतने मुमुक्षुओं के एकत्र होने का क्या कारण है? History of Kumbh Mela. Who r u?
Transcript
- 0:16उमाशंकर यह कुम्भ महापर्व क्या है?
- 0:25बाबा क्यों मनाया जाता है? यहाँ जाने के लाभ क्या हैं?
- 0:41कृपया करके अपने आध्यात्मिक वाणी से इस रहस्य को प्रकट करने का
- 0:49कष्ट करें। कुंभ महापर्व होली, दीपावली, ये
- 1:11सब पर्व और कुंभ महापर्व। पहले इसकी कहानी सुनिए जो
- 1:28शास्त्रों में वर्णित है लेकिन स्मरण रहे की ये कहानी है और
- 1:39कहानी तो कहानी ही हुआ करती थी। है इसका राशन जोड़ लेना और फिर ये
- 1:50कहानी कहना क्या चाहती है? हिमालय के पास शिरोध नामक का एक
- 2:07सागर है। शिरोध नामक उस सागर के भीतर अमृत
- 2:14है। देवता जने अच्छे कर्म करने वाले
- 2:24हैं, राक्षस जने बुरे कर्म करने वाले हैं।
- 2:32उस अमृत को दोनों पीना चाहते हैं कौन नहीं पीना चाहता अमृत को सभी
- 2:39पीना चाहते हैं लेकिन उसमें से अमृत निकालना दो रूह है।
- 2:50बहुत मशक्कत करनी पड़ेगी और वह मशक्कत अकेले अच्छे कर्म करने
- 2:59वाले देवता नहीं कर सकते। बुरे कर्म करने वाले राक्षसों को
- 3:07भी सहभागी होना पड़ेगा। देवता भी चाहते हैं वो अमर हो
- 3:16जाये और राक्षस भी चाहते हैं वो अमर हो जाये।
- 3:25जो बुरा कर्म करता है वो अच्छा कर्म करता है।
- 3:31दोनों ही चाहते हैं कि हम अमर हो जाये।
- 3:36इस चाहत ने दोनों को इकट्ठा कर दिया।
- 3:45योजना बनी कि कैसे इस शिरोध पर्वत में।
- 3:53को मथरा जाए और इसमें से अमृत निकाला जाए।
- 4:02राक्षस भी मान गए, देवता भी मान गए।
- 4:13मंद्राचल पर्वत को मथनी बनाया गया।
- 4:22वासु की नाग को सर्प को रस्सी बनाया गया और कच्छप को कछुए को
- 4:35कुर्म को नीचे रखा गया। उसके ऊपर मंद्राचल पर्वत और वासु
- 4:43की नाग की रस्सी एक तरफ राक्षस एक तरफ देखता है।
- 4:54दोनों मचेंगे तो मच जाएगा। यह बिल्कुल ऐसा है।
- 4:59जैसे हम दूध को विलोपते हैं, दही को विलोपते हैं और उसमें से माखन
- 5:05निकलता है, उसकी सुगंधी दूर दूर तक लुभा जाती है।
- 5:14बिल्कुल ऐसा ही मत ना था उससे। एक तरफ राक्षस थे और एक तरफ हम
- 5:22देवता थे। कछुए की पीठ पर रखा गया मंदराचल
- 5:29पर्वत और दोनों ने उस समुद्र को मथुरा शुरू कर दिया।
- 5:36इधर से राक्षस खींचते उधर से देवता खींचते गया।
- 5:44बड़ी मशक्कत हुई, दोनों पसीना पसीना हो गया, देवता भी हो गए और
- 5:53राक्षस भी हो गए। कहानी कहती है कि उस मथने से चोद
- 6:02है रत्न प्रकट हो गए जब क्षिरोध सागरमथा जाता है।
- 6:18तो जहर भी निकलता है और भी बहुत से रत्न निकलते हैं।
- 6:25कामधेनु गाय भी आती है, कल्प वृक्ष भी आता है।
- 6:33जहर भी आता है, हम रत भी आता है। सभी कुछ निकले 14 प्रकार के रत्न
- 6:38निकले हैं। दोनों की मशक्कत लगी थी।
- 6:46इसमें दोनों ने पूर्ण परिश्रम किया था, इसलिए दोनों का बराबर हक
- 6:55बनता था। देवताओं का भी राक्षसों का भी
- 7:07लेकिन क्या हुआ? देवताओं ने अमृत खुद पीने के
- 7:20ज्येष्ठ थे और आखिर में भगवान धनवंतरी वह अमृतकरश लेकर प्रकट हो
- 7:31गए। उससे पहले।
- 7:34तेरा रतन निकज़ुक है। चौहुद म रत्न आया अमृत कलश भगवान
- 7:41धनवंतरि के हाथ में जब वह प्रकट हुए मथने की प्रक्रिया समाप्त हो
- 7:50गई थी। दोनों दौड़ें अमृत के लिए तो नहीं
- 7:59दौड़ता राक्षस भी दौड़ता है देवता भी दौड़ता है जितनी जरूरत देवताओं
- 8:07को है अच्छा कर्म करने वालों को उतनी ही जरूरत।
- 8:12बुरा क्रम करने वालों को कोई नहीं कहता।
- 8:17मैं मर जाऊं और यही बाधा है अमृतत्व के प्राप्त में मरना कोई
- 8:30नहीं चाहता। अमर होना सभी चाहते हैं देवमानी आ
- 8:37गई देवताओं के मन में और देवताओं के जो भगवान हैं इन्द्र स्वर्ग के
- 8:47बैठे हुए सिंहासन पर। उनके मन में भी बेईमानी आ गए।
- 8:55बेईमान लोग सिर्फ राक्षी ही नहीं होते हैं, देवता भी बेईमान होते
- 9:03हैं और देवताओं के महादेवता, जिन्हें परम सुख प्राप्त है, सब
- 9:09कुछ मिल जाता है। कल्पवृक्ष उनके पास काम देनूं
- 9:13उनके पास सुरक्षा सुख उनके पास, लेकिन फिर भी बेईमानी कर जाते हैं
- 9:23तो देवताओं के राजा इन्द्र ने भेजा अपने पुत्र जयंत को।
- 9:30कहने लगे जा जयंत तो वो अमृत कलश छीन के ले आया, जयंत गया, अमृत
- 9:43कलश उसने ले लिया दोनों मशक्कत की थी।
- 9:50दोनों ही बिना चाहते थे। अमर कौन नहीं होना चाहता?
- 9:55बस यहीं से कुंभ शुरू हो जाता है। लड़ाई होने लगी, झगड़ा होने लगा,
- 10:13सीना छपटी होने लगी तो जयंत ने वह।
- 10:17अमृत कलश अपने हाथ में ले लिया। कहानी है 14 दिन क्षमा करना 12
- 10:30दिन लगे स्वर्ग तक जाने का जयंत को।
- 10:38और उन 12 दिनों में इसी छीनाझपटी के बीच में, जो अमृत के लिए
- 10:46राक्षिशों और देवताओं के भीतर हो रही थी, चार जगहों के ऊपर, तीन 3
- 10:54दिन के बाद। एक एक बूंद गरीब अमृत के और उस एक
- 11:01बूंद के अमृत के गिरने के कारण यह चारों स्थान तीर्थ हो गया है।
- 11:16कितनी महम्मा है उस समृद्ध के? मैंने बहुत बार आपसे कहा, काश आप
- 11:29उस अनंत की एक बूंद चख ले। चखने तो ऐसा स्वाद मिलेगा सब छोड़
- 11:39दोगे के पदार्थों को इकट्ठा करना या गद्दियों के लालच मान
- 11:49प्रतिष्ठा की जरूरत ये भीतर के उमड़ते घुमाते हुए बादल।
- 11:56ये ले लूँ वो प्राप्त कर लूँ, जहाज़ पे उड़ लूँ बड़ी कार ले आओ
- 12:03बड़ा सा धन गोदाम भर लूँ सब मेरे हाथ में हो दूसरे भिखमंगे बन जाए।
- 12:15मैं डिक्टेटर हो जाऊं सारी शक्ति मेरे पास हो कौन नहीं चाहता?
- 12:25देवता भी चाहते हैं, राक्षस भी चाहते हैं?
- 12:34छीना छपटी होने लगी जंग लेकर भाग रहा है।
- 12:38अमृत कलश को पृथ्वी के स्वर्ग तक पहुंचने में दिन लगे पा रहा है और
- 12:48प्रत्येक 3 दिन के बाद इससे छीना छपटी के बीच में एक बूंद गिरी।
- 12:53धरती पे और जहाँ जहाँ वो बूंद गिरी चार स्थानों पे गिरी उन चार
- 13:04स्थानों पे कुंभ महापर्व मनाया जाता है।
- 13:07ये कहानी है वो चार स्थान कौन से हैं?
- 13:12नासिक है, हरिद्वार है, प्रयागराज है, उज्जैन है नासिक हरिद्वार
- 13:19प्रयागराज तीन तीन दिनों के बाद एक एक बूंद इन चारों स्थानों पे
- 13:28गिरी और जहाँ जहाँ गिरी। वो तीर्थ बन गए।
- 13:38ये कहानी है और उस तीर्थ पे प्रत्येक स्थान पर 112 वर्ष के
- 13:48बाद मेला लगता है। वहाँ कौन आते हैं?
- 13:54मोमूक्षु भी आते हैं जिन्हें मुक्ति की लालसा है और गुरुजन भी
- 14:04आते हैं। संबोधि और समाधि को।
- 14:11प्राप्त लोग भी आते हैं। समझाने के लिए आपको कैसे मुक्त हो
- 14:15सकते हो? तुम इन दुखों के जंजाल से देखिये
- 14:21एक मज़े की बात बताऊँ जो दुखी हैं।
- 14:27वह तो दुख से निजात चाहते ही हैं लेकिन जो सुखी हैं वो भी जब सुख
- 14:36को भौंकते, भौंकते, ऊब जाते हैं वो भी थक जाते हैं।
- 14:42आनंद की आवश्यकता उन्हें भी होती है।
- 14:47आनंद की आवश्यकता देवताओं की भी होती है।
- 14:50आनंद की आवश्यकता राक्षसों को भी होती है।
- 14:55ऐसा कोई प्राणी नहीं है। धरती पे जीसको आनंद की आवश्यकता न
- 15:00हो यह थीम मोटो। प्रत्येक अपहरणी चाहता है आनंदा
- 15:14जिसे सुख प्राप्त है वो देवता जिसे दुख प्राप्त है वो राक्षस
- 15:20राक्षस दुख से छूटना चाहता है तो अमृत्य चाहता है।
- 15:24और देवता सुख से ऊब जाता है इसलिए मृत चाहता है।
- 15:31चहते दोनों हैं, इस संसार अद्भुत खेत है।
- 15:45जहाँ मिट्टी का एक दर्रा पानी के एक बूंद कोई भी नहीं बना सकता
- 15:54वहाँ तुम अपने अहंकार का मैं पा रहे हो मैं।
- 16:02तो फिर तुम कहते हो कि मैं दुखी हूँ इस रस को समझ लेना, मैं कभी
- 16:13सुखी नहीं हो सकता मैं रहेगा जब तक।
- 16:20सुख नहीं आएगा तब तक दुखी रहोगे तब तक मैं रहेगा जब तक और बड़ी
- 16:32प्यारी बात है कि मैं अच्छे कर्म करने वालों में भी होता है और
- 16:37ज्यादा होता है। तो देवताओं में मैं ज्यादा होता
- 16:41है क्योंकि वो कहेंगे हम दान करते हैं, पुण्य करते हैं, श्रावण करते
- 16:48हैं, हम तीर्थ करते हैं, हम भाजय करते हैं, हम देवता हैं, निश्चित
- 16:54ही उनमें मैं ज्यादा होगा। राक्षसों में बुरे कर्म करने
- 17:02वालों में महत्त्व होता है यानी मैंने किया।
- 17:09लेकिन थोड़ा होता है, वह उसे करने से पश्चात अब करता है।
- 17:16वह उसे करने से दुखी होता है। हत्या करके कौन सुखी रह सकता है?
- 17:22छुपता ही तो फेरेगा झूठ बोल के कौन सुखी रह सकता है वो झूठ
- 17:30तुम्हें कुरेती ही जाएगी, यह बात अलग है।
- 17:34तुम अपने भीतर न उतरो, तुम्हें पता ही न चले कि मैं झूठा हूँ,
- 17:42मैं झूठ बोल रहा हूँ, यह बात अलग है।
- 17:46अक्सर मनुष्य अपनी जिंदगी मोर्चा में गुजार देता है।
- 17:51अपने भीतर उतर के चैतन्य में वह निहारता ही नहीं कि मैं झूठ बोलता
- 18:01हूँ, मैं सत्य बोलता हूँ, मैं जोड़ता हूँ, मैं दानी हूँ, मैं
- 18:08लौटता हूँ। मैं अभी मानी हूँ और भीतर उतरे
- 18:18बिना तुम जान नहीं पाओगे कि तुम्हारे भीतर कचरा क्या क्या है
- 18:25एक अँधेरी कोठरी है। जन्मो जन्मो से बंद पड़ी है, उसके
- 18:33भीतर रोज़ जुड़ता जाता है, रोज़ कचरा फेंक देते हो और द्वार बंद
- 18:40हो जाते हैं और तुम्हें पता नहीं क्याक्या फेंक दिया गया है, वो
- 18:44तुम्हारा अचेतन मन है। इस अचेतन मन में तुम कभी उतरें
- 18:52इसलिए कोई हैरानीजनक बात नहीं कि तुम अगर मुझसे ये पूछते हो बाबा
- 18:58अपने भीतर कैसे उतरे? बात हैरानी की है तुम अपने ही घर
- 19:04में। उतरने के लिए रास्ता दूसरों से
- 19:08पूछते हो, घर तो मारा है रास्ता पूछते हो दूसरों से लेकिन क्या
- 19:16करें मजबूरी है तुम कभी उतरे नहीं वो अँधेरी कोठरी में तुमने कभी
- 19:22दिया जलाया नहीं? रोशन आई वहाँ तक गई नहीं, तुम्हें
- 19:29नहीं पता कि तुमने क्याक्या फेंक दिया है उस कचरे की कोठरी में
- 19:37वहाँ सभी विकास सभी तमन्नाएं सभी भविष्य की योजनाएं, कल्पनाएं,
- 19:46अपेक्षाएं, अतीत की समृतियां क्रमः सब बीच में संग्रहित है और
- 19:56तुम्हें पता भी नहीं है। यही बात हैरानीजनक है।
- 20:12तुम्हारी ही कोठरी है, तुम ही फेंकते हो और तुम ही जानते नहीं
- 20:19कि तुमने फेंका क्या है, तो संत कहते हैं आज नहीं कल या कोठरी भर
- 20:29जाएगी। ऊपर तलक भर जाएगी वहाँ फिर और
- 20:34कचरा फेंकने को बचेगा ना सब भर जाएगा इस अंधेरी कोठड़ी में और
- 20:45तुम कचरा फेंकोगे जैसे कोई आदमी इतना खाले।
- 20:52कोई जगह ना बचे और खाने की लेकिन फिर भी खा ले तो क्या होगा?
- 20:58फिर वमन होगा, फिर उल्टी आएगी क्योंकि स्थान नहीं बचा, लेकिन
- 21:04तुम टेस्ट बर्ज़ के कारण? स्वाद के कारण खाते जाते हो
- 21:11इंद्रिया स्वाद देखते हैं, जीव का अपना स्वाद है, आँखों के दृश्यों
- 21:21का अपना स्वाद है सुनने का अपना स्वाद है।
- 21:26सूंघने का अपना स्वाद है। सभी इंद्रियों के अपने अपने स्वाद
- 21:31हैं और तुम्हें इन्हीं स्वादों के वशीभूत हुए स्वादों के गर्त में
- 21:40ही छिप जाते हो? मर जाते हो?
- 21:48लेकिन उस समृद्ध को प्राप्त नहीं करते।
- 21:56अब हम थीम पे आयें। कुंभ महापर्व क्या है?
- 22:00बाकी सभी पर्व है, दीपावली पर्व है, होली पर्व है शिवरात्रि पर्व
- 22:05है महापर्व तो एक है कुंभ। और कुंभ कहते हैं कड़े को दीज़ आर
- 22:14ऑल प्रतीक चन्न सिम्बोलिक रेप्रेसेंटेशन्स प्रतीकात्मक।
- 22:33चिन्हों के रूप में सत्यों को कहा गया है।
- 22:38कहानियों बिगड़ती जाती हैं। सत्य नहीं बिगड़ता, सत्य बदलता
- 22:44नहीं, कहानियों में रोज़ जोड़ देते हो।
- 22:47तुम सत्य में कुछ नहीं जोड़ सकते। यह।
- 22:52शक्ति की परिभाषा है और सत्य का गुण है उसमें तुम जोड़ नहीं सकते।
- 23:03कुछ घटा भी नहीं सकते। जोड़ भी नहीं सकते।
- 23:09इसलिए अपने सिद्ध में लिखा है। कि उसमें से तुम पूर्ण में से
- 23:14पूर्ण को निकाल लिया तो पूर्ण ही शेष बचेगा तो तुम और नहीं दौड़
- 23:23सकते। जितना है बस उतना ही है और तुम
- 23:28उसमें से निकाल भी कुछ नहीं कर सकते।
- 23:31उतना ही बचेगा जितना है। कहानी है सारी ये तुमने अँधेरी
- 23:42कोठरी में अपनी ही अँधेरी कोठरी में जन्मो जन्मो से कचरा फेंका
- 23:47है। वो क्रोध का हो, वो काम का हो,
- 23:51लोह मोह अंगार का हो लेके कुछ नहीं आया और हर जन्म में तुम यही
- 23:59मुड़ता दोहराते हो और कुम्भ है शरीफ शरीर मान्यता है अमृत।
- 24:11इसके भीतर बैठा हुआ कुछ पुकारना है।
- 24:17वह कहता है मुझे अमृत चाहिए वह जो प्यास तुम्हें लगती है, छटपटाहट
- 24:29जो होती है जो तुम भागते हो सारे तन।
- 24:32जो तुम्हारे भीतर क्षण का भी ठहराव नहीं है, जो तुम्हें दौड़ाए
- 24:37चला जाता है। तुम इधर से उधर पागलों की तरफ
- 24:41भागते हो और तुम्हें पता नहीं तुम्हें चाहिए क्या?
- 24:48तुम क्यों भागते हो? क्यों तुम आई एस करते हो?
- 24:51क्यों तुम यूपीएससी का एग्जाम कॉम्पटीशन रातों रातों जागते हो?
- 24:57क्यों तुम धन इकट्ठा करते हो? क्यों गद्दी की लालसा है?
- 25:01क्यों गद्दी पर बैठने के लिए तुम अपने प्रतिद्वंद्वियों को मरमा
- 25:05देते हो? तंग करते हो, दुख देते हो, उन्हें
- 25:12जेलों में बंद कर देते हो। क्यों करते हो तुम ऐसा भीतर?
- 25:17कुछ तत्व तुमसे कुछ मांग रहा है और तुम्हें पता नहीं वो है तत्व
- 25:23क्या मांगता है। बस इसी गड़बड़ी में तुम अंधों की
- 25:30बाती अंट शंट कर रहे हो। ये मूर्खताएं ये मूर्खताएं
- 25:44तुम्हें न जाने कहाँ ले आई हैं। आज तो अंधेरी कोठरी में तुम खुद
- 25:50ही चले गए हो ऊपर तलक भर गई है वो और ऊपर तलक वहाँ पर कुछ और समा
- 25:59नहीं सकता फिर जो तुम फेंकते हो। वह तो क्षण बाहर वमन के रूप में आ
- 26:05जाता है। ये जो तुम देखते हो, सिर मारते
- 26:10हो। लोगों को यह वमन है वमन और नहीं
- 26:16समाता, इस अचेतन में तुम्हारे सहारे अचेतन भर चुका है।
- 26:24यह घड़ा भर चुका है। इसमें और स्थान बचाएं।
- 26:28फिर जो और कचरा तुम डालते हो वो परट के वापस आ जाता है।
- 26:32वह मन के रूप में उल्टी हो जाती है तुम्हें और फिर तुम कहते हो।
- 26:45कि ऐसे नहीं मिला वो तो कहीं और मिल जाएगा तू नहीं और सही और नहीं
- 26:51और सही तू अगर है हर जाए तो अपना भी यही तोड़ सही।
- 26:58अगर पदवी में नहीं मिला तो प्रतिष्ठा में मिल जाएगा।
- 27:02फिर खुद को भगवान कोशिश कर दो। खुद को अवतार घोषित कर दो नहीं
- 27:07गद्दी में मिला तो भगवान बनने में मिल जाएगा मिलेगा, भगवान बनने में
- 27:13भी नहीं मिलेगा तो होने में मिलेगा, बनने में नहीं मिलेगा।
- 27:21इस छोटे से अर्थ को गांठ मत लेना। मिलेगा होने में जो है वो हो जाओ,
- 27:31बनने में नहीं बनाओ, तुम बनना चाहते हो?
- 27:35कोई पीएमसीएम बनना चाहता है, प्रत्येक व्यक्ति की अपनी तमन्ना
- 27:40है। कोई समाज सुधारक बनना चाहता है,
- 27:47कोई इंजीनियर डॉक्टर बनना चाहता है।
- 27:49प्रत्येक व्यक्ति कुछ और बनना चाहता है।
- 27:52प्रत्येक व्यक्ति जो वह है वह बनना नहीं चाहता और कुबेर बड़ा
- 27:57शानदार एक दोहा कहते हैं। भलो भ्यो हरी भी सरो सर से टरी
- 28:06भला माला जपते हैं, नाम जप करते हैं, 1 दिन हास्यिकता से बिगड़
- 28:17जाती है। माला फेरते फिरते माला गिर जाती
- 28:25है, हरि मिश्र जाता है नाम भूल जाता है कब तक रटोगे शब्दों को कब
- 28:37तक रटोगे? लिपियों को आखिर बोले ही जाओगे,
- 28:41तुम्हें पता नहीं जो गुरु तुम्हें कहते हैं, सोते जपते रात चौबीसों
- 28:46घंटे तुम ये करते रहो राम राम, राधे राधे चार नाम पांच नाम 1000
- 28:52नाम तुम जपते हो? लेकिन तुम्हें पता नहीं जो वचन
- 28:56देकर आये थे गुरु से निभा कहाँ पाते हो तुम वचन देते हो कि हाँ
- 29:03मैं जपूंगा रोवई रोवई से जपूंगा दिन भर रात जपूंगा लेकिन रात को
- 29:10सो जाते हो कहाँ जग पाते हो? रात को तुम्हारा वायदा टूट जाता
- 29:17है, ऐसे वायदे हैं तुम्हारे और ठीक किया।
- 29:26कबीर कहते हैं ये तस भी हाथ से घर गई भरो भयो, हरी भी सरो क्या
- 29:33प्यारा शब्द है। ओर इसे स्मरण ने इस नाम जपने
- 29:42जमाने ने मार जमा कैसे कैसे? जमीं खा गई आसमान कैसे कैसे?
- 30:12जमाने में मारे जमा कैसे कैसे जमी खा गई आसमान?
- 30:30कैसे कैसे जमाने में मारे जमा, कैसे कैसे इस नाम जपनेस स्मरणनेस
- 30:47पांच नामनेस। सहस्रनाम ने ना जाने कैसे कैसे
- 30:51महाभली ढेर कर दिए मिला कुछ वो अमृत न मिला वो अमृत न मिला जिसकी
- 31:00तलाश थी। एक तू न मिला।
- 31:20एक तू न मिला सारी दुनिया मिली भी तो क्या है मेरा मानना खिला।
- 31:42मेरा दिल ना खिला सारी बगिया खिले भी तो क्या है एक तू ना मिला?
- 32:00पूछो उनसे जो महत्त्व गद्दियों पर बैठे हैं, चैन मिला नाक कटके शर्म
- 32:09के मारे से कह सकते हैं कहाँ मिल गया, लेकिन नहीं मिला लक्षण बता
- 32:15देते हैं। अगर मिल जाता तो फिर ये कटोरा
- 32:19मांगने का वोट मांगने का छूट जाता।
- 32:22आज भी मांग रहे हैं ये इस बात का परिचय है कि नहीं मिला, तृप्ति
- 32:28नहीं हुई और कहते हैं संत। कि तृप्ति, संतोष धन ऐसा धन है बस
- 32:38जब वो मिलता है तो ही सच में कुछ मिलता है, अन्यथा कहाँ कुछ मिलता
- 32:45है? गद्दी मिली तो कहाँ कुछ मिला?
- 32:50धन के अम्बार मिले, सुमेरु पर्वत जितना इकट्ठा किया, कहाँ मिला,
- 32:56कुछ नहीं मिला, आत्म रिक्ति रहती गई।
- 33:00बस यह भरेगी यह तृप्त होगी उस तन इसको तृप्त करने का और कोई भोजन
- 33:06है नहीं, इसको तृप्त करने का एक ही भोजन है।
- 33:11कोई पदार्थ नहीं, कोई पदार्थ का सुख नहीं, कोई सुख सुविधा के साधन
- 33:16नहीं। तुम्हारे भीतर की उठती हुई इस आग
- 33:20को एक ही चीज़ चाहिए धरकते हैं। और तृप्ति उस दिन होगी।
- 33:29जीस दिन आनंद मिलेगा और आनंद कहाँ मिलेगा, यह बताते हैं।
- 33:35संत तो कुंभ महापर्व महापर्व। इसलिए इसका नाम रखा गया है और
- 33:45चीजें। तो पदार्थों को जोड़ने के लिए है,
- 33:49सुख सुविधाओं के साधन जोड़ने के लिए है, लेकिन यह महापर्व क्यों?
- 33:55यह मात्र एक अकेला पर्व है जो आनंद को जोड़ने का साधन है।
- 34:01वह आनंद जो तुमने आज तक चखन। और एक बूंद अगर तुम चख लो और इसी
- 34:09बूंद के कारण झगड़ा हुआ। राक्षसों और दंतों का अमृत के
- 34:16कारण यह अमृत की एक बूंद बड़ी आनंददायक है।
- 34:23लहर आ जाती है हवाएं। ठहर जाता है।
- 34:27तुम्हारा मन सिधर हो जाता है। सुमेरू पर्वत की तरह हिमालय की
- 34:35तरह अडोर निष्कम्प भटकना छोड़ देता है मन।
- 34:46क्योंकि सब मिल गया जिसकी तमन्ना थी, जो भीतर का पुकार रहा था कि
- 34:55मुझे ये चाहिए और किसी चीज़ से न मिला जब आवे संतोष धन सब धन दौड़
- 35:03सुन। तो को महापर्व में जरूर जाओ।
- 35:09तुम्हें पता चला जो 12 वर्ष तुमने कमाया संसार में मैं कूड़ा था,
- 35:17कौन बताये तुम्हें कि जो इकट्ठा कर रहे हो?
- 35:25वह कूड़ा करकट माटी के ढेले हैं, जिन्हें तुम हेरे मोती समझे हो।
- 35:33कौन बताये क्योंकि वो खुद इकट्ठा कर रहे हैं?
- 35:41कौन बताये तुम्हें? यहाँ कोई नहीं बता पाता, यहाँ सभी
- 35:46इकट्ठे करने वाले हैं, कोई कुछ इकट्ठा कर रहा है, कोई कुछ इकट्ठा
- 35:54कर रहा है, इसी उम्मीद में उम्मीद एक ही है कि वह मिल जायेगा।
- 36:02वह आनंद मिल जाएगा इसके कमाने से लेकिन मिलता नहीं और जब मिलता
- 36:08नहीं तो 12 साल तुम इंतजार करते रहो नहीं मिलता तो फिर ऋषि होने
- 36:14का परंपरा बने। यह कहानी है।
- 36:18मैंने पहले भी कहा। इसके सभी पात्र नकदी हैं।
- 36:22सभी पात्र कार्तिक हैं। इसमें चंद्र है, इसमें सूर्य है,
- 36:27इसमें बृहस्पति है। ये चंद्र सूर्य व बृहस्पति की
- 36:31आकाशीय स्थितियां तय करती हैं कि कब मनाया जाएगा।
- 36:39लेकिन असलियत क्या है? इस क्षण में एक जगह पर सभी इकट्ठे
- 36:44होते हैं। वो मोक्ष जाने वाले जिन्हें वह
- 36:55शराब चाहिए। जो पीकर तो दो घूंट पीकर प्यास और
- 37:04बूढती है। जैसेजैसे पीओगे प्यास बढ़ती ही
- 37:10जाएगी, दर्द बढ़ता ही गया, झूँझूँ दबा के।
- 37:17दो कुट पीला दे शाकिया, दो कुट पीला दे शाकिया।
- 37:34बाकी मेरे तेरे रोड दे दो, कुट पिला दे बाकी मेरे तेरे रोड दे।
- 37:53दो कुट फिला दे साकि इस दो घूँट के लिए तुम मारे मारे भरते हो।
- 38:03तुम अंधों को कोई बताता कि सूरज कैसा होता है?
- 38:09इसीलिए यह कुंभ महापर्व का आयोजन किया गया।
- 38:15सभी उन प्रबुद्ध आत्माओं को प्रार्थना की गई है कि आप उस
- 38:24स्थान पर एकत्रित होकर इन मूढ़ मतियों को समझाओ के वास्तविक
- 38:29नाकाक्षा क्या है तुम्हारे वितरण। क्या ही है क्या इकट्ठा कर रहे हो
- 38:37तुम क्या बस यही है कुंभ महापर्व के कहानी ये तुम्हारी कहानी यह
- 38:48घड़ा कुंभ तुम हो। इसको जरूरत है अमृत की।
- 38:58इसी के लिए तुम्हारे मरे और अष्टावकर कहते हैं कि ये अमृत
- 39:05तुम्हारे भीतर ही है, कुंभ में ही है।
- 39:10जहाँ गिरी थी एक बूंद, उसी पर इस कुंभ को ले जाना पड़ेगा।
- 39:18ये घड़ा वही जाए जहाँ अमृत की बूंद गिरी थी और वो जो कभी मोक्ष
- 39:28थे। और आज मुक्त हो गए हैं।
- 39:34आज समाधि से युक्त हो गए हैं, संबोधि से युक्त हो गए हैं, वो
- 39:39आते हैं वह बस वो गिनती चुनती के रोग हैं जो तुम्हें बताएंगे।
- 39:47वास्तविक तुम्हारी आकांक्षा क्या है?
- 39:51क्यों तुम भटकते हो क्यों तुम तड़पते हो मानवता क्यों इस वि
- 39:56मत्स्य अग्नि की शिकार हो गए। क्यों जल रही है पल पर मानवता?
- 40:05क्या है जरूरत इसकी? ढूंढ क्या रहे हो चाहिए क्या होता
- 40:13है तुम्हे कौन बताएगा जिसने वो भूत पी ली दो घूँट पी ली या जिसने
- 40:21वो बताएगा तुम्हे ठहर जाओ। उन दो घूंटों को पीलो प्यास जगेगी
- 40:35और जब तक वो प्यास न बुझेगी तब तक तुम तड़पते ही परोगे इस छोर से उस
- 40:41छोर तक पेण्डुलम की तरह तुम ठहरोगे नीमद में।
- 40:46कहानी कहती है कि चंद्र ने सूर्य ने और विस्मित ने इस अमृत कलश की
- 40:59रक्षा की है जो जयंत के पास था और जयंत इंद्र का बेटा था।
- 41:05इंद्र स्वर का स्वामी समझाने की चेष्टा है।
- 41:12एक कहानी के द्वारा इन तीनों ने रक्षा की और चौथा शनि रक्षा तो
- 41:20शनि ने भी की लेकिन शनि ने इंद्र के डर के मारे।
- 41:27रक्षा नहीं की उसने उसने डर के कारण इसकी रक्षा की है।
- 41:33इन तीनों ने सहजता से रक्षा की अपना कर्तव्य समझ गए।
- 41:39गहरे प्रतीक हैं खोलने लगूंगा। तो बहुत से वीडियोज़ बनेंगे,
- 41:46लेकिन मैं विस्तार में जाना नहीं चाहता।
- 41:51यह प्रसंग बहुत बड़ा हो जाएगा और फिर हम मूल प्रश्न से चूक जाएंगे।
- 42:00मूल प्रश्न के उत्तर से चूक जाएंगे।
- 42:03तो हम यहीं से मोल्ड करें। व्यक्ति की जरूरत है उस अमृत को
- 42:13पाना जो अमृत गिर गया। जिसकी बूंद चार स्थानों पर गिर
- 42:23गई। छे न छपती है तुम्हारे पास भी
- 42:29आएगा मृत था कहाँ रखा है वो राख के तुम भूल गए हो?
- 42:40और नासिक में रखा उज्जैन में रखा हरिद्वार में रखा के प्रयागराज
- 42:45में रखा। बस तुम भूल गए हो और संत कहते हैं
- 42:53कि याद करो रिमेम्बर, कहाँ रखा है वो।
- 42:59खत्म तो नहीं हुआ, गोम भी नहीं हुआ।
- 43:03भूले हो सिर्फ तो अगर भूले हो तो स्मरण करो, याद करो और रीमेम्बर
- 43:15और तुमने रीमेम्बर की जगह रीप्रिटेशन शुरू कर दिया।
- 43:20यही गलती खा गया तो इंसान गलती का पुतला है, लेकिन बात तो ये है अगर
- 43:27समझाने पे समय जाए तो फिर गलती का पुतला नहीं रहता।
- 43:33मुश्किल यहाँ आती है के समझाने से।
- 43:37रेपेटिशन बंद न करे और रिमेम्बर न करे, तो वह मूड पति मूड ऐसा ही आ
- 43:45जाए, जानने वाला कहता है नहीं रेपेटिशन नहीं करना है यू अरे नॉट
- 43:52टु रिपीट यू अरे टु रेमेम्बेर ओनली?
- 43:58तुमने सिर्फ याद करना है, स्मरण करना है और स्मरण के शब्द को
- 44:02बिगाड़ लिया गया। स्मरण शब्द को स्मरण में डाल दिया
- 44:07गया और सुमण शब्द को रेपेटिशन में डाल दिया गया।
- 44:10यहीं से गड़बड़ हो गई। स्वाभाविक है।
- 44:15आदमी गलती का पुतला है लेकिन वो गलती गलती नहीं होती।
- 44:25एक कहावत है अगर सुबह का बोला शाम घर आ जाए तो बोला होता है।
- 44:31लेकिन बात तो ये है सुबह का भूला शाम देर और बरसों भी जाए।
- 44:36घारी न आए, फिर क्या होगा? तुम ऊंचे ऊंचे चिल्लाते रहो कि बस
- 44:44राधे रहता है तो हँसी आती है मुझको हरकतें इंसान पर।
- 44:51गलतियाँ तो खुद करे और दोष दे भगवान अरे भाई, भगवान को भगवान ने
- 44:59तुम्हारा क्या बिगाड़ा है जब तुम उसको याद करते हो?
- 45:04गलतियाँ तो खुद करे यू हैव फोरगोटन एंड यू अरे टु रिमेम्बर।
- 45:10तुम भूले हो तुम्हें याद करना और तुम याद करते हो भगवान को पागल
- 45:16हुए हो। किसी गलती ने जमा कैसे कैसे जमे
- 45:32खा गए। आसमान कैसे कैसे तुम वहाँ पहुँच
- 45:43सकते थे जहाँ ये अमृत कुंड पड़ा है और देखिये ये कहानी नहीं है।
- 45:52कल्पना भी नहीं है ये सत्य है लेकिन तुम रिमेम्बर करने के बजाय
- 46:00रिपीट कर रहे हो और संत तुम्हें कहते हैं डू नॉट रिपीट रेपेटिशन
- 46:08करने का मसला ही नहीं है। ये मसला ही रेमेम्बेर करने का है।
- 46:14लेकिन कहाँ मानते हो तुम? इसलिए मैं कहता हूँ भूला अगर शाम
- 46:19को घर वापस न आए और जन्मो जन्मो तक न बरते तो उसे भूला नहीं कहते।
- 46:24उसे मूड कहते हैं और तुम मूड हो गए हो, तुम खुद भी राधे राधे कर
- 46:30रहे हो। और जो तुम्हारे पास आता है बस
- 46:33राधे राधे करते रहो कुछ हो जाए टांग टूट जाए तो राधे राधे कैंसर
- 46:40हो जाए तो राधे राधे बुखार हो जाए तो राधे राधे।
- 46:44राम राम करो राधे राधे करो अल्लाह करो वह करू वह करू करो, सतनाम
- 46:50सतनाम करो, तुम पागल हो गए हो सारी सभ्यता ने पागलपन की वो पानी
- 46:57पी लिया है जो इस सुकु में से निकला है।
- 47:00सारी सभ्यता पागलों की तरह सर मार रही है।
- 47:05क्यों तुमने रेपेटिशन का जहर पी लिया है?
- 47:12और संत कहते हैं नॉट टु रिपीट ओनली टु रिमेम्बर गुरजप ये कहते
- 47:19हैं रिमेम्बर योरसेल्फ, हू आर यू। यही कहते हैं रमन रिमेम्बर
- 47:25योरसेल्फ, हू आर यू यही कहते हैं जिन नो दाई सेल्फ हू आर यू लेकिन
- 47:37मूर्ख है कि मान्यता नहीं है। न माने किसी का क्या लिखा?
- 47:48दुखी रहेगा और जिन को बताएगा उनको दुखी करेगा और ये पाप का बोझा
- 47:54बढ़ता ही जाएगा। महावीर के जीवन की कहानी बड़ी
- 48:04सुन्दर है। महावीर के जीवन की एक छोटी सी
- 48:11कहानी बड़ी सुन्दर है। महावीर अहिंसक थे, परम अहिंसक थे।
- 48:24लोग उनके कानों में खिले ठोक जाते।
- 48:27कुछ न बोलते बेकसूर थे, बोले भी नहीं, किसी को कुछ कहा भी नहीं,
- 48:36अपनी मस्ती में खड़े हैं, लेकिन बात तो ये है।
- 48:39दूसरे को मस्त्र देकर तुम्हारा अंकार खोलता है अरे मेरे होते हुए
- 48:47ये शांत कैसे हो गया? मुझे तो नींद नहीं आती रात
- 48:59तुम्हारा मन सभी चीजों में कॉम्पिटिशन करता है।
- 49:06तुम कहती हो मेरे होते दूसरा पहुँच गया।
- 49:12बस यही दुखड़ा होता है अहंकार को अभी तो मैं हूँ महावीर कैसे पहुँच
- 49:19गए वर्धमान कैसे पहुँच गए? अहंकार को ठेस रखती है, फिर उसको
- 49:27छेड़ते हैं, कानों में कीड़े ठोकते हैं, क्या बिगाड़ा है
- 49:31तुम्हारा? बुध ने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा?
- 49:34ईश्वर ने षड़यंत्र रचे जाते हैं, धाराएं लगाई जाती हैं।
- 49:42देशद्रोह की जहरों में नज़रबंद रखा जाता है।
- 49:47क्यों तुम्हारा अहंकार मानता ही न के मुझ से पहले कोई प्रबुद्ध भी
- 49:57हो सकता है? नहीं?
- 50:01प्रबुद्ध का अर्थ मर जाना होता है, लेकिन तुम यह भी स्वीकार नहीं
- 50:08कर पाते कि मुझसे पहले यह क्यों मर गया?
- 50:14बड़े अफसोस की बात है। कोई मरना भी चाहता है तो तुम उसके
- 50:21भी प्रतिद्वंद्वी हो जाते हो। अरे मुझसे पहले ये कैसे मर गया और
- 50:28प्रबुद्ध संबोधि समाधि खुद का मरना होता है, वह इलूशन।
- 50:36जो तुमने व्यर्थ में पाल लिया है उसके मरने को ही समाधि करते हैं
- 50:42और तुम वो भी जड़ नहीं सकते, उसे भी स्वीकृत नहीं कर सकते और तुम
- 50:51जैद सी करते हो। संतों से भी।
- 50:55इसलिए टांग देते हो, मंदसौर के हाथ पांव काट देते हो, बुद्ध के
- 51:04पत्थरों में मारते हो महावीर का कील ठोंकते हो मीरा अगर नर्सरी है
- 51:11तो मैं क्या कहते? तुम उसे नाचने पर नहीं जीते, गीत
- 51:19गाते हैं, नानक गीत गाते हैं कबीर तुम उसे भी काशी से उठाते हो, चलो
- 51:29वहाँ चलो जहाँ मरने से नर्क मिलता है।
- 51:39कमाल के व्यक्ति हो तुम तुम कुछ भी बर्दाश्त नहीं कर सकते मानवता
- 51:51की बर्दाश्त शक्ति सहन शक्ति शून्य हो गई है।
- 52:01और जब तक तुम सहनशक्ति को परम पे ना ले के जाओगे, सहनशक्ति का
- 52:07दूसरा नाम बढ़ना है। किसका प्रबोधक उस तत्व का बढ़
- 52:23जाना? जीसको तुम चेतना कहते हो
- 52:26कान्शस्नस कहते हो जितनी मात्रा में तुम्हारी मूढ़ता मरेगी, उतनी
- 52:35मात्रा में तुम्हारी कान्शस्नस पढ़ एक है तुम्हारी चेतना पढ़ एक
- 52:41है। तुम मरना भी नहीं चाहते और दूसरे
- 52:47को मरते हुए देखकर तुम बर्दाश्त भी नहीं कर पाते।
- 52:52यही कारण है बुद्धों को तुम पत्थर मारते हो।
- 52:58यही कारण है अपने आनंद में झूमती हुईं मीरा।
- 53:04तब घुंघरू बांध के नाचती है और तुम्हें बर्दाश्त नहीं होता।
- 53:13तुम समाज के नाम पर घूँघट प्रथा के नाम पर न जाने क्या क्या बोल
- 53:22देते हैं। 8 शंट बोल देते किसके कारण सिर्फ
- 53:31अपने ही कुछ निहेत स्वार्थियों के कारण तुम किसी को नहीं बक्शते।
- 53:40और सीधी सी बात है कि तुम भी उस स्थिति में आ सकते हो, मर जाओ।
- 53:47सभी संत कहते हैं, अगर कॉन्शस नर्स के चरम बिंदु को छूना है, तो
- 53:53पूर्ण रूप से शीश काट के हथेली पर रख दो।
- 53:58जे तुम। प्रेम में मिला नतीजा शेष तली धर
- 54:03घर में रहना, लेकिन अगर कोई शेष तली पे रख लेता है तो तुम्हें यह
- 54:10भी बर्दाश्त नहीं होता। यह भी तुम्हें चोभता है।
- 54:20मानवता हद की निजता तक पहुँच गई है।
- 54:28मानवता उस सत्र में पहुँच गई है जहाँ मानवता शर्मशार हो जाती है।
- 54:43कुंभ पे तुम्हें बताने वाले लोग जिनका भ्रम मृग है, जिनका इल्यूशन
- 54:55भंग हो गया है कि मैं हूँ और मैं कुछ कर सकता हूँ।
- 55:04जिसका ये मिट गया कि मैं हूँ और मैं कुछ कर सकता हूँ यह बताने के
- 55:13लिए कुंभ में लोग आते हैं और तुम भी यही सीखने के लिए कुंभ में
- 55:18जाते हो क्यों? तुम दुखी हो और दुःख से तुम
- 55:26द्रसित हो, दुःख तुम्हे जीने नहीं देता।
- 55:32दिन भर रात दिन का चयन क्या रात की नीत गई?
- 55:38तुम इस दुःख से मुक्ति हुए जाते हो।
- 55:43और संत कहते हैं कि दुख से मुक्त होना है तो तुमने एक इलूशन पर रखा
- 55:49है यू आर ऑन मिस्टेक तुम एक गलती कर रहे हो, जीवन में उस गलती को
- 55:58मिटा दो, तुम सुखी हो जाओ है। बस इसीलिए कुंभ बनाया गया था।
- 56:06इस घड़े को वहाँ ले जाओ जहाँ बताने वाले हैं इस घड़े के भीतर
- 56:15ही। वह अखंड धारा बह रही है आनंद के
- 56:22जिसके लिए तुम तरस रहे हो दिन भर रात जिसकी शीतल लहरों के लिए
- 56:32तुम्हारा मन उमंग रखता है। बताने वाले वहाँ आते हैं, हर कदम
- 56:41पे आते हैं, चारों स्थानों पे आते हैं और तुम वहाँ जाते हो, लेकिन
- 56:49अफ़सोस तुम वहाँ जाते हो। एक मेले की तरह और ध्यान रखे।
- 56:58मेले में सिर्फ बताने वाले ही नहीं आते, सीखने वाले भी जाते हैं
- 57:05और जेब कतरे भी जाते हैं। मैंने सुना है कुंभ के मेले में
- 57:13अकबर ने टैक्सी लगा दिया था। कुंभ के मेले में प्रवेश करने
- 57:20वालों से अकबर टैक्स दिया करता था।
- 57:25खुद का मरना भी सीखना हो तो यहाँ शिविरों में फीस भरनी पड़ती है,
- 57:32एंट्रेंस फीस देनी पड़ती है। खुद का मरना सीखना हो तो खत्म हो
- 57:40गया ऐसा ज़माना भी कभी आएगा, सोचा तो न था लेकिन आ गया देखना पड़
- 57:48रहा है। कुंभ महापर्व खत्म हो जाता है।
- 57:56उसके बाद सारा इलूशन बंग सारा खेल खत्म, उसके बाद न जियोगे न मरोगे,
- 58:08न दुख भोगोगे न सुख भोगोगे अपने आनंद की मस्ती में।
- 58:14अठखेरियां खाते हुए उस आनंद के सागर में चौंगते रहोगे सदा वहीं
- 58:23जो पीने का दिल चाहता है सदा और तुम संसार की चीजों में ढूंढ़ते
- 58:30हो या संसार के मैखानों में ढूंढ़ते हो।
- 58:35असली मैं खाना तुम्हें अभी दिखा नहीं असली मैं खाना बताने वाला
- 58:39तुम्हें कोई मिला नहीं और जब कोई एक घूँट पहना देता है।
- 58:50कुम्भ इसीलिए आयोजित किया गया था कि कोई एक घूँट तुम्हें फैला दे
- 58:55एक बूँद तुम्हें कोई फैला दे फिर तुम्हारे भीतर की ये भी श्णाग्नि
- 59:06जागती है जो कहती है बजा दे अब। अब देख लिया स्वार्थ मैंने, अब तू
- 59:14इसे जला दे, राख करते हैं इस आनंद की एक बूंद पहली बूंद पीने ही
- 59:24मुश्किल है, तुम्हारा मन अर्चन बनता है।
- 59:29क्योंकि इसे पीते ही तुम्हारा मन भरता है और जैसे ही मन मरना शुरू
- 59:35हुआ, तुम 1000 तरह के प्रश्न उठाते हो।
- 59:37मुझे रोज़ प्रश्न आते हैं बाबा ये यहाँ से थोड़ा भारी हो जाता है।
- 59:44ये नाक में खुजली होती है, ये शरीर में कीड़ियाँ सी चढ़ती हैं।
- 59:51कहीं मुझे कोड तो नहीं हो गया? मन ऐसा तुम्हारी दुर्दशा कर देता
- 59:59है। थोड़ी सी खुजली और मन उसको कोड
- 1:00:04बना देता है। मन बड़ा शैतान है मन लोभी मन
- 1:00:14लालची मन चंचल मन चोफ कबीर कहते हैं मन के मते नचा लिए, पलक, पलक,
- 1:00:21मन और। तो बाबा फिर मैं वहाँ चला गया, वो
- 1:00:29क्या था? फिर मैं शरीर से बाहर निकल गया।
- 1:00:33वो क्या था ये सब तुम्हारे प्रश्न मन के हैं कि प्रश्न करोगे उतनी
- 1:00:42देर तक के लिए तुम मरने से बच जाओगे।
- 1:00:47तुम अपनी मृत्यु की देरी करना चाहते हो।
- 1:00:50मैं कहता हूँ जल्दी से उठा लो इस डोली को अब देर मत लगाओ पहले ही
- 1:00:57से बहुत देर हो चुकी है बहुत जन्म बीते मेरे मा धो।
- 1:01:05अरे जन्म तुम्हारे लेखे ओह जल्दी से लेखे लगा दो और देर मत करो
- 1:01:12पहले ही से बहुत देर हो गई लेकिन तुम्हारा मन ऐसा कि बस और ठहर जा
- 1:01:22कुछ उठ जाएंगे। अभी सुबह कहाँ हुई है?
- 1:01:27अभी तो सूरज निकला नहीं है, एक नंबर का बहानेबाज असल क्या है?
- 1:01:34असल है कि मन मरने से डरता है। मन का इलूशन भंग ना हो जाए।
- 1:01:44सत्य का दर्शन न हो जाए, आँखें चौंधिया जाएंगी।
- 1:01:50आँखें उस रौशनी को स्वीकृत नहीं कर पाएंगी, झेल न पाएंगी इसलिए
- 1:01:55हजारों तरह के तरकीब में मन उठता है।
- 1:02:00ऋषियों ने यह परंपरा बनाई। ये तुम तैयार हो कर जाना वहाँ आज
- 1:02:08तो सभी चले जाते हैं मुझे एक व्यक्ति कह रहा था कि मैं भी जा
- 1:02:15रहा हूँ उसका काम क्या है वह जेबकतरा तो जेबकतरे भी आपको वहाँ
- 1:02:22मिलेगा। सिखाने वाले भी आएँगे।
- 1:02:29लेकिन तुम बिपासु की तरह जाना तुम मोमोक्षु की तरह जाना तुम एक मूट
- 1:02:39पीकर फिर और मांग करना। और ज़रा सी दे दे साखी और ज़रा सी
- 1:02:49और और ज़रा सी दे दे साखी और ज़रा सी और कैसे रहूं चुपके मैंने।
- 1:03:02पी ही क्या है होश अभी तक है बाकी और ज़रा सी दे दे साखी और ज़रा सी
- 1:03:14और कैसे रहूं चुप के, मैंने पी ही क्या है?
- 1:03:20होश अभी तक है बाकी जब तक होश बाकी रह जाएंगे तब तक अभी ही क्या
- 1:03:26है तो साखी थोड़ी सी और बना दे अभी तो होश बाकी है।
- 1:03:43जब तक तुम ऐसा न हो जाओ, भीतर से तब तक पीते ही रहना और 1 दिन
- 1:03:52प्यास बज जाती है यह कुंभ महापर्व तुम्हारी जन्मो जन्मो की प्यास
- 1:03:58बजाने के लिए आयोजित संतों का एक। साधन थ।
- 1:04:10संतों ने एक ढंग निकाला था। कैसे तुम जन्मो जन्मो से बढ़ते
- 1:04:18जान लो, उस तत्व को। जो इस कुंभ के भीतर है और तुम्हें
- 1:04:26पता नहीं है ऐसे घट में भी वह मू रखा जाने ना तुम तो कुम्भ में भी
- 1:04:35जेब काटने के लिए जाते हो तुम तो कुम्भ में भी।
- 1:04:43ऐसे जाते हो जैसे हिल स्टेशन के दर्शन करने, वहाँ की ठंडी हवाएं
- 1:04:56लहरा के आएं, मंत्र मुग्ध कर जाएं।
- 1:05:00तुम गंगा में छलांग लगाओ, त्रिवेणी संगम में नहाओ वो ठंडी
- 1:05:06ठंडी हवाएं तुम्हारे तन बदन को शीतल करते हैं, लेकिन मन न मरे बस
- 1:05:17तुम पाप मुक्त होना चाहते हो। और पाप मुक्त वहाँ कोई होता नहीं
- 1:05:24जाता है। ध्यान रखना इस गलती में मत रहना
- 1:05:30कि तुम गंगा स्नान कर लोगे, त्रिवेणी स्नान कर लोगे गंगा,
- 1:05:35यमुना, सरस्वती। त्रिवेणी संगम पे स्नान कर लोगे,
- 1:05:38पाप मुक्त हो जाओगे नहीं ऐसा कोई होता नहीं है ऐसा कोई प्रावधान
- 1:05:45मैंने त्रिवेणी संगम के भीतर स्नान करने के बाद घोर पाप से दुख
- 1:05:52भुगतते हुए लोग। मेरे जीजा जी अपने घर की ही बात
- 1:06:02बताता हूँ क्योंकि मैं अनुभव की बात ही बोल के खुश होता हूँ।
- 1:06:11रेलवे में थे। और रेलवे वालों को पास मिलता है
- 1:06:14मुफ्त फर्स्ट क्लास के अंदर जहाँ चाहे चले जाओ और कुम्भ में दो
- 1:06:20गाड़ियां जाती हैं। जहाँ भी कोई तीर्थ यात्रा है वो
- 1:06:24चले जाते, बहन भी चले जाते हैं। सारे तीर्थ कर दिए वो एक रह गया
- 1:06:29क्या सबसे बड़ा? सारे तीरथ बार बार गंगासागर एक
- 1:06:33बार तो गंगासागर चले गए, वहाँ भी स्नान कराए।
- 1:06:41क्षमा चाहूंगा, सड़के मरे, जीभ का कैंसर हो गया।
- 1:06:48टेस्ट पर जवाब दे गए कुछ खाते। मैं पूछता जीजा कुछ पता लगा,
- 1:06:52खट्टी है, मिट्टी है, कड़वी है तो क्या बात, तुम तो गंगा स्नान कराए
- 1:06:58थे, गंगा सागर घुमे थे, फिर अब ये दर्द कैसे?
- 1:07:02अब ये दुख कैसे? अब ये कष्ट कैसे नहीं छोड़ के आए
- 1:07:09क्या? गंगा सागर ने हरा नहीं क्या वो
- 1:07:13गंगा, यमुना, सरस्वती के त्रिवेणी संगम में उसने तुम्हारे पाप नहीं
- 1:07:19खत्म किये करते हुए नहीं? तुम इस गलत फैमि में मत रहना और
- 1:07:27सड़के मरावो? जो पाप करेगा किसी जन्म में किया
- 1:07:36हूँ तुम कह देते हो मैंने किसी जन्म में तो किया नहीं तो भाई
- 1:07:40किसी घर में जाके तुमने पाप करके घर बदल लो तो आरोप तो नहीं बदलता?
- 1:07:49हत्या का आरोप तो तुम्हारे ऊपर रहेगा ना कोई भी घर बदलो देश बदलो
- 1:07:54चाहे तुम ग्रह भी बदलो उसकी इस सृष्टि में लोग घर भी बदल देते
- 1:08:00हैं, ग्रह भी बदल देते हैं, किसी और ग्रह पे चले जाते हैं लेकिन
- 1:08:04दोष मुक्त नहीं होते। परमात्मा के सृष्टि में किया हुआ
- 1:08:08कर्म बीज की तरह पनपता ही पनपता है और फल देता ही देता है।
- 1:08:21इसलिए मैं कहता हूँ लोगों को गुमराह करने वालों भोगना पड़ेगा।
- 1:08:31यह बिल्कुल गुमराह है। मैं पक्का पक्का जानती हूँ राधे
- 1:08:35राधे कहने से नहीं अपना पता चलेगा।
- 1:08:40दूसरे का स्मरण करने से अपना स्मरण स्व स्मरण कैसे हो जाएगा
- 1:08:46ज़रा सोचना। दो घड़ी शांति के आलम में बैठे उन
- 1:08:58लम्हों में जब तुम फुर्सत में हो, तुम्हारा मन भारी न हो।
- 1:09:04बोझल न हो, शांत हो, अकेला हो। उन फुर्सत के लम्हे में बैठे तुम
- 1:09:11सोचना कि दूसरों का नाम जपने से स्वयस्मर्ण कैसे हो जाएगा?
- 1:09:19कोई ऐसा प्रावधान है? क्या तुम फिजिक्स पढ़ते हो?
- 1:09:25और तुम्हें अपना समर आ जाए, ऐसा कोई प्रावधान है नहीं है, बस एक
- 1:09:34ही प्रबंध है, कुछ भी करते हुए साक्षी हो जाओ तो स्वयं को जान
- 1:09:40जाओगे, फिर चाहे फिजिक्स पढ़ो, केमिस्ट्री पढ़ो।
- 1:09:45जादोजी पढ़ो बाटनी पढ़ो फिर जादोजी पढ़ो सिविक्स पढ़ो
- 1:09:50पोलिटिकल साइंस पढ़ो कुछ भी पढ़ो लेकिन जागो भीतर से जागो वे
- 1:09:55चैतन्य की जो भीतर बैठी है, जो घरे के भीतर वो चेतना बैठी है वो
- 1:10:02जागती रहे और देखती रहे। कि यह फिजिक्स पढ़ रहा है, यह
- 1:10:09केमिस्ट्री पढ़ रहा है और वह चेतना में जागते हुए इसको फिजिक्स
- 1:10:16पढ़ते हुए देख रही हूँ तो ही हो पायेगा, ये एल्यूज़न टूट पायेगा।
- 1:10:24अन्यता नहीं टूटेगा, गंगा स्नान कर लो, हज कर लो तीर्थ स्नान कर
- 1:10:29लो, कहीं चले जाओ उसकी इच्छा के बिना बाबा ने कहा है तीर्थनामा
- 1:10:36जयतेस पावैर अगर तुमने उसको। उसने तुमको सद्बुद्धि नहीं दी कि
- 1:10:47तीर्थ होता क्या है? तो तुम ऐसे ही त्रिवेणी के अंदर
- 1:10:52नहा कर वापस आ जाओगे और कल्पनिक रूप से तुम पापों से मुक्त हो
- 1:10:57जाओगे। मैंने शब्द प्रयोग किया कल्पनिक।
- 1:11:03लेकिन सत्य में जब बीज फूटता है, फल काल्पनिक नहीं लगते, भाई फल
- 1:11:11असली होते हैं, कड़वे हो, मीठे हो, सब खाने पड़ते हैं, गुमराह
- 1:11:17करोगे, आज या कोई तर्क दे दो। जाहिद शराब पीने दे मस्जिद में
- 1:11:26बैठकर या वो जगह बता जहाँ खुदा का घर हो या तो बताओ के राम राम,
- 1:11:33राधे राधे करने से पांच नाम लेने से कैसे तुम्हें स्व स्मरण हो
- 1:11:39पाएगा? या फिर शराब पीने दे, मस्जिद में
- 1:11:43बैठकर या फिर चुप हो जा दोनों में से एक बात ही चलेगी भाई अभी फिर
- 1:11:57से एक बयान आया महाराज जी का। ये मौन से भी मिल जाता है।
- 1:12:05मैं कहाँ पीछे छोड़ने वाला था, मैंने कहा फिर शोर से भी मिल जाता
- 1:12:10है। मुझे जवाब चाहिए इस बात का कि शोर
- 1:12:17में मिल जाता है जो तुम रातों रातों जाग कर।
- 1:12:22नकली जागरण करते हो जागरण के नाम पर जगाना था अपनी चेतना को,
- 1:12:28साक्षी के रूप में जगाया तुमने अपनी आँखों को, साक्षी तो बने ना
- 1:12:38वैसे नकली जागरण से। तुम प्रबुद्ध हो पाओगे नहीं हो
- 1:12:47पाओगे सखिया। आज हमें नींद नहीं आएँगे।
- 1:13:04सुना है तेरी मह फिल्मों रत जगह है, सुना है तेरी मह फिल्मों रत
- 1:13:15जगह है सकिया आज हमें नींद नहीं आएगी।
- 1:13:24सुना है तेरी मह फिल्मों रत जगह है, सुना है तेरी मह फिल्मों रत
- 1:13:34जगह है आँखों ही आँखों में। रात कट जाएगी सुना है तेरी मह
- 1:13:47फिल्मों रत जगह हैं, सुना है तेरी मह फिल्मों रत जगह है जागे कोई।
- 1:14:00और नींद तुम्हें न आए, प्रबुद्ध कोई हो और तुम उसकी नकल करके
- 1:14:09प्रबुद्ध अपने आप को मानने लगो। ये कैसे संभव हो सकता है?
- 1:14:16रातो रातो तुम चिल्लाते हो बड़े बड़े यूनिट्स लगा के तुम माता को
- 1:14:23याद नहीं करते हो सही पोज़ीशन में अगर तुम्हारे भजनों को सुन लिया
- 1:14:27जाए तो तुम बातों को रोकते हो जैसे वो मर के हो माँ माँ देखना
- 1:14:35इनको। हम चिल्लाते हैं जैसे माँ
- 1:14:39स्वर्गवास हो गया। ऐसे ऐसे अजूबे मैंने इस धरा पर
- 1:14:46देखे हैं। वास्तविक अर्थ कोई जानता नहीं है
- 1:14:51चले हैं जगरा से करना। धनते हैं, निहित स्वार्थ हैं।
- 1:14:57सबके अपने अपने बाबा कहा करते हैं कि जो घोर पाप किया करते हैं,
- 1:15:07तानाशाह प्रवृत्ति के लोग हुआ करते हैं।
- 1:15:10अब मैं जैसे भूल रहा हूँ उसे बोलने नहीं देंगे।
- 1:15:14ये तानाशाही परवर्ती है तो ऐसे तानाशाह लोग जैसे हिटलर अगले जन्म
- 1:15:22में सूर्दास होते हैं। उन्होंने तो शब्द अंधा बरता था।
- 1:15:27चलो मैं थोड़ा सा शिष्टाचार वर्ष। सूर्यदास से शब्द व्रत लेता हूँ,
- 1:15:38लेकिन लोग कहाँ मानते हैं? परमात्मा दंड दिए हैं लोगों को आज
- 1:15:45एक है मंडलेश्वर है कि महामंडलेश्वर है, मैं जानता नहीं
- 1:15:51हूँ उपाधियों को क्या जानूं मैं। वो अपने ही अलाप रहे हैं।
- 1:16:00अरे भाई पिछले जन्म के तो भोग ले अपनी अपनी डबली अपना अपना राग तू
- 1:16:11ज़रा देख किस जन्म के कर्मों का तुझे फल मिला है आज फिर वो ही
- 1:16:17करने चला। लेकिन लोग कहाँ देखते हैं?
- 1:16:27यही तो जीवन है फिर तुम कहते हो दुखी सारी मानवता दुखी है, वो
- 1:16:36मूर्ख तो है नहीं जिसने तुम्हें दंडित किया।
- 1:16:42वह दंडाधिकारी पागल तो नहीं है जिसने तुम्हें जेल की कोठलियों के
- 1:16:47पीछे भेजा, लेकिन तुम जेल की कोठलियों के पीछे भी जाकर।
- 1:16:58फिर वे रोल लेके बाहर आ जाता हूँ। क्या कहें इस संसार में कहाँ है
- 1:17:09न्याय? न्याय नाम की कोई चीज़ फैसले होते
- 1:17:16हैं। न्याय तो एक ही शक्ति करती है, वह
- 1:17:21जो संचालित करती है, न्यायधिकरण भी उसके हाथ में है और दंडाधिकरण
- 1:17:28भी उसके हाथ में है और जब तक तुम उसको जान नहीं लोगे।
- 1:17:36तब तक तुम इस सर्जनों को ठीक से समझ नहीं सकोगे।
- 1:17:41सर्जनों को ठीक से समझने के लिए? जिसकी व्यवस्था है, उस सर्जन आर्य
- 1:17:49को देखना पड़ेगा, अनुभव करना पड़ेगा।
- 1:17:53यह आवश्यक है। लाज़मी है उसके बिना तुम्हें पता
- 1:17:58नहीं चलेगा। कुंभ के चंद्रमा ये बृहस्पति ये
- 1:18:10ग्रहों के स्थान यह एस्ट्रोलॉजिकल विषय है।
- 1:18:18यह अलग से पढ़ता है। कभी इसके बारे में बात हुई तो फिर
- 1:18:22मैं बताऊँगा तुम्हें लेकिन प्रसंग तो अभी बहुत लंबे हो गए हैं।
- 1:18:291 घंटे से ज्यादा की वीडियो हो गई है।
- 1:18:37हमें शांति चाहिए इस तड़पती हुई जलती हुई रोह को शांत शीतल छाया
- 1:18:49चाहिए जो तुम्हें धूप से आग से बचा दे।
- 1:18:56जमती हुई तप दोपहरी के भीतर जो वट वृक्ष की तरह तुम्हें थोड़ी देर
- 1:19:01के लिए गणे सुख का स्वाद दे, तुम्हारी रक्षक है और वह तुम्हारे
- 1:19:11कुंभ के भीतर है। घट के भीतर रहा जपना ने जानना है
- 1:19:24रिमेम्बर नॉट टू रिपीट, फिर बता दूँ तुम्हें बोला तो बहुत बार,
- 1:19:31लेकिन बोलता ही रहूँगा। और बोलता ही रहूँगा।
- 1:19:44तुम ईसा की तरह टाँग दोगे तुम मंसूर की तरह काट दोगे, तुम मेरा
- 1:19:52की तरह जहर पीला दोगे, ये तुम्हारा काम है।
- 1:19:59तुम्हारा काम है, मेरा काम है सिर्फ अंध बातों को अंधविश्वासों
- 1:20:08को तोड़ना मैं अपना काम करता ही रहूँगा।
- 1:20:12तुम चाहे तो अपना काम कर सकते हो, तुम भी स्वतंत्र हो।
- 1:20:22कुंभ कुंभ इस घड़े को वहाँ ले के जाओ जैसे घट में पीभ हैं।
- 1:20:28मूर्ख जाने ना कबीर तुम्हें मूर्ख कहते हैं।
- 1:20:36पर मैं तुम्हें कहता हूँ कि इस घट को वहाँ ले जाओ, है तो भीतर
- 1:20:42प्रयागराज में भी तुम उसे भीतर पौगे घर में भी तुम उसे भीतर पौगे
- 1:20:48घोर जंगलों में चले जाओ या तुम कंदराव में चले जाओ।
- 1:20:55जाएगा तो वो भीतर तुम्हारे भीतर से ही मिलेगा।
- 1:20:59तुम्हें बाहर से नहीं मिलेगा, भीतर से ही मिलेगा, भीतर से ही
- 1:21:09प्रकट होगा झरना सदा भीतर से। प्रकट हुआ करता है।
- 1:21:13बाहर से तो फौव्वारे प्रकट हुआ करते हैं और तुम फौव्वारों को
- 1:21:19काल्पनिक फौव्वारों को झरने समझे बैठे हो तो ये गलती तुम्हारी है।
- 1:21:27झरने की गलती नहीं है, गलती तुम्हारी है।
- 1:21:34तुमने बाहर से सब आयोजित कर लिया है, लेकिन यह सत्य नहीं है, यह सब
- 1:21:43असत्य है। इसे कुम्भ कहते हैं, यह महापर्व
- 1:21:48है। जो तुम्हें तुम्हारी पहचान बता
- 1:21:51दे, त्रिवेणी में नहाने से पाप नहीं करते हैं, पाप कटते हैं,
- 1:22:01अपना स्वय जानने से स्वय विस्मरण हो गया है।
- 1:22:05स्वयस्मरण करना है। बस कुल बात ये है और इस कुंभ को
- 1:22:11इस घड़े को क्योंकि इस घड़े के भीतर ही है जैसे घाटों में पीवे
- 1:22:16है इसको वहाँ ले जाओ, वहाँ हवाएं, कुछ नशीली हैं वहाँ रौशनाई थोड़ी
- 1:22:27घनी। वहाँ की हवाएं तबदीर हैं, वहाँ
- 1:22:33ऐसे लोग हैं जो अपना आपा जानते हैं और कौन जाने कोई शुभ घड़ी
- 1:22:41मुहूर्त में तुम उनके सम्पर्क में आ जाओ हवाएं तो वहाँ।
- 1:22:49जानने वाले लोग तो हैं आसानी तरंगों से भरा वो माहौल शायद
- 1:22:56तुम्हें भी कोई झोंका साथ बहा के ले जाए उसी स्थान पर ले जाए जहाँ
- 1:23:05वो बैठे हैं। इसलिए कुंभ में जरूर जाना है
- 1:23:14लेकिन ये मान्यता लेके मत जाना है और ये मान्यता लेके वापस भी मत
- 1:23:19आना है कि हम त्रिवेणी के भीतर स्नान करेंगे और पाप मुक्त हो
- 1:23:24जाएंगे न? त्रिवेणी में स्नान करेंगे, संगम
- 1:23:30में और अपना स्वय स्मरण कर देंगे। वहाँ की हवाएं आज बदली हुई हैं
- 1:23:40क्योंकि वहाँ बड़े संत बैठे हैं जो खुद को जानते हैं।
- 1:23:46जलते हुए दीयों की रौशनी में शायद तुम्हें भी अपनी रौशनी याद आ जाए।
- 1:23:55इस संगत का यही प्रभाव होता है सत्संग की, इसलिए इतनी महिमा कही
- 1:24:00गई है। और वहाँ सत्संग इस वक्त गना यही
- 1:24:07वेला है, इस वेला का लाभ उठा उस नशीली हवाओं में, तुम भी थोड़ा सा
- 1:24:19उस आनंद का स्वाद चख लो। कहाँ बह के बह के फिरते हो मैं तो
- 1:24:28यहाँ भी जाएगा, लेकिन यह कुंभ 12 वर्ष बाद आएगा जब सारे जले हुए
- 1:24:38दीपक। यकसा एक स्थान पर इकट्ठे होते
- 1:24:43हैं, वहाँ कुछ माहौल और होगा। निश्चित ही वहाँ तरंगें कुछ और
- 1:24:52होंगी उन तरंगों में नहाने का मौका।
- 1:25:0012 वर्ष बाद फिर मिलेगा इसलिए जरूर जाना लेकिन ये कल्पना लेकर
- 1:25:09वापस मत आ जाना कि मैंने गंगा में गोता लगाया, संगम में गोता लगाया
- 1:25:16और मैं पापों से मुक्त हो गया। नहीं हो पाओगे।
- 1:25:22पापों से मुक्त होता है वह व्यक्ति जो उन हवाओं में साथ ही
- 1:25:28बह जाता है जिनका दीया उन दीयों को देखकर रोशन दीयों को देखकर खुद
- 1:25:35भी रोशन हो जाता है। ईश्वर करे वो सौभाग्यशाली क्षण
- 1:25:42आये और तुम इन मूड ब्रह्मों को त्याग कर उन तूफानों में बह जाओ
- 1:25:52कि तुम्हारी कोरी कल्पनाएं। सब धूल दूषित हो जाएं, खंडहर बन
- 1:25:56जाएं, तुम्हें सत्य का दर्शन हो जाए, अपने ही भीतर बैठे उस परम
- 1:26:02पिता परमात्मा का स्वर्ण हो जाए। इस नीयत से जाना है उस शराब को
- 1:26:10पीने के लिए जाना है। जो घट घट में बह रही है
- 1:26:19प्रज्ञावानों के सिद्धों के समादिष्ट।
- 1:26:31संबोधित व्यक्तियों के उनके संपर्क में जाने का नाम कुंभ कुंभ
- 1:26:37तब साकार होगा। अगर तुम उन नशीली हवाओं में खुद
- 1:26:42को उड़ाने के योग्य हो जाओगे तो तुम्हारा कुंभ में जाना सार्थक
- 1:26:47होगा। अन्यथा ये तो 12 वर्ष के बाद आते
- 1:26:51ही रहेंगे, जाते ही रहेंगे, जिद की आ विती रहेंगी और तुम वहीं की
- 1:26:56वहीं हो गए वक्त का लाभ उठाओ, मौका है, चले जाओ।
- 1:27:04धन्यवाद। श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी
- 1:27:19एनाथ नारायण वासो देव। श्री कृष्ण गोबिंद हरे मुरारी
- 1:27:37हेनाथ नारायण पा सो दे व। पितुमात स्वामी सखा हमारे पितुमात
- 1:27:57स्वामी सखा हमारे क्नॉइस। हे नाथ नारायण वसोदेवन श्री कृष्ण
- 1:28:12गोबिंद हरे मोरा रे हे नाथ? नारायण वासुदेव।