Latest / Baba ji Vijay Vats / 12 Jan 25 - अपने भीतर कैसे उतरें? नॉन रिएक्टिव हो जाओ! छोड़ना सीखो! Must Watch
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- 0:10बाबा जी प्रणव जब से मैंने आपको सुनना शुरू किया है, मैंने किसी
- 0:20दूसरे चैनल को नहीं सुना। काफी कुछ छोड़ दिया पर बाबा जी
- 0:30अपने अंदर कैसे जाऊं कुछ समझ नहीं आ रहा।
- 0:38इतना समझाया कि बाहर से कुछ मिलने वाला।
- 0:44नहीं है और आज तक कुछ मिला भी नहीं।
- 0:51इसको सत्य पाया कैसे अपने को जानू अंदर उतरु।
- 1:03आप कुछ कृपा करें। मेरे से नहीं हो रहा प्रणाम
- 1:26प्रश्न सिर्फ एक आदमी का नहीं है। प्रश्न समस्त जगत का है, विश्व
- 1:39प्राणियों का है, अपने भीतर कैसे उतरूं?
- 1:51अपने भीतर उतरना नहीं है। इसके एक एक शब्द को ध्यान से समझो
- 1:59अपने भीतर उतरना नहीं है। तुम तो अपने ही भीतर कब से बैठे
- 2:05हो? बाहर की पकड़ छोड़ देनी है।
- 2:13फिर समझिये सूत्र को इस सूत्र को आप लिख लेना, कागज़ पे लिख लेना,
- 2:21हृदय पे लिख लेना। अपने अंदर नहीं उतरना है अंतर तो
- 2:32तुम हो ही मात्र बाहर की पकड़ को छोड़ देना है।
- 2:43उससे क्या होगा जब तुम बाहर की पकड़ को छोड़ दोगे, जो कि तुमने
- 2:54गलत पकड़े रखे थे? बाहर की पकड़ को पकड़ने के कारण
- 3:00ही तुम अपने अंतर में उधर नहीं रहे थे।
- 3:05ये बाधा है इसलिए बाधा को काटने की जरूरत है।
- 3:15मार्ग को तय करने की जरूरत नहीं है।
- 3:18फिर इस शब्द को आप ध्यान से सुनिए।
- 3:23बाधा को काटने की जरूरत है। मार्ग को तय करने की जरूरत नहीं
- 3:31है। अब भला तुमको किसी ने सीखा दिया
- 3:45है ऐसा अभिव्यक्ति? प्रश्न कौन पूछता है ये मूलता भरा
- 3:53प्रश्न है? कि मैं अपने तक कैसे पहुँच जाऊं।
- 3:59इससे ज्यादा मूर्खता भरा प्रश्न हो ही नहीं सकता और तुम चिल्ला
- 4:07रहे हो और संत कहते हैं कि चलाओ मत।
- 4:14तुम तो आनंद के सागर हो, तुम तकलीफ काहे झेल रहे हो और तुम
- 4:21कहते हो कि अपने अंदर जाऊं कैसे? अब ये बड़ी मुसीबत है और आप कहोगे
- 4:27ये प्रश्न मैंने क्यों उठा लिया? क्योंकि ये प्रश्न एक व्यक्ति का
- 4:32नहीं। यह प्रश्न समस्त जगत का है।
- 4:39सच पूछो तो तुम सभी यही प्रश्न पूछना चाहते हो, इसलिए मुझको यह
- 4:47प्रश्न अलगअलग ढंग से आपको समझाना पड़ता है।
- 4:52ये कोई पहला ढंग नहीं है जो मैं आपको आज समझा रहा हूँ।
- 4:57इससे पहले मैंने अन्य अन्य ढंगों से आपको बहुत समझाया है।
- 5:04अब इस ढंग से समझ लीजिए अपने भीतर उतरना नहीं है।
- 5:12सिर्फ बाहर की पकड़ को छोड़ देना जैसे आपके शिविर लेने वाले लोग
- 5:24योग निद्रा के शिविर लगाते हैं। वो क्या करते हैं?
- 5:32सिर्फ आपको रिलैक्स होने के लिए कहते हैं सिर को छोड़ दो, हाथों
- 5:44को छोड़ दो, हृदय को छोड़ दो, पेट को छोड़ दो, जिगर को छोड़ दो।
- 5:56किडनीस को छोड़ दो, पांव को छोड़ दो उँगलियों को छोड़ दो, छोड़ दो
- 6:03मतलब मतलब तुमने ये पकड़ रखी है और तुम्हें पता भी नहीं।
- 6:16तुमने अपने शरीर के प्रत्येक अंग को बुरी तरह से जकड़ रखा है और
- 6:23तुम्हें इसे पता भी नहीं है। यही दूध है तुम योग निद्रा में ले
- 6:32जाने व्यक्ति वाले व्यक्ति। आपसे कहते हैं कि यह पकड़ छोड़
- 6:37दो, एक एक अंग को वो छोड़ने के लिए कहते हैं, यही घटना जो आप
- 6:48सीवरों में जाकर सीख के आते हो, मैंने आपको सरल ढंग से समझा दी।
- 6:55क्रिया योग के द्वारा आप सहजीवी गूढ़ योग निद्रा में डूब जाते
- 7:03हैं। आपको किसी मास्टर की जरूरत नहीं
- 7:07पड़ती किसी व्यक्ति के। हिप्नोसिस की जरूरत नहीं पड़ती।
- 7:20किसी दूसरे व्यक्ति का सहारा नहीं चाहिए।
- 7:24कहाँ ढूंढोगे रोज़ यहाँ तो रोज़ ही योग निद्रा में जाना होता है
- 7:32और ध्यान रखना। प्रकृति आपको रोज़ योग निद्रा में
- 7:39ले जाती है। आपको बिना बताये कंप्लीट
- 7:47रिलैक्सेशन जब आप रात को सो जाते हैं ये जो सांझ ढले सूरज ढलता है
- 7:55और आपके भीतर। एक हार्मोन क्रियेट होना शुरू हो
- 8:00जाता है, जिसका नाम है मैलाटोनिन। यह मैलाटोनिन ऐसा पदार्थ है जो
- 8:11आपके अंगों को सिथल करने का काम करता है।
- 8:18और शरीरों को पकड़ो से मुक्त करता है, तो मैलाटोनिन जैसे ही पैदा
- 8:28हुआ, ईश्वर को पता है, प्रकृति को पता है।
- 8:34ये सारे दिन का थका मादा अब इसे विश्राम करना चाहिए तो भीतर वैसे
- 8:46ही करी सिंधुर कर देता है। और उस मेलाटोनियन के कारण आप
- 8:54शीतल, शीतल, शीतल होना शुरू हो जाते हो, छोड़ते चले जाते हो
- 9:00प्रत्येक आम को वो ही योग नेत्रा वाली कहानी फिर तुम तुम्हारे तक
- 9:09पहुंचते नहीं। तुम तुम्हारे तक तो पहुंचे ही
- 9:16हुए, तुम तुम क्या हुए अगर तुम तुम को छोड़ सके फिर समझना इन
- 9:26शब्दों को तुम तुम क्या हुए। अगर तुम अपने आप को छोड़ सके, वह
- 9:35स्वभाव नहीं होता, जो छोड़ दिया जाए अग्नि अपने स्वभाव को, आग
- 9:43अपने स्वभाव को, गरमाइश को कभी छोड़ नहीं सकती ये उसका स्वभाव।
- 9:56ऐसे ही तुम तो तुम्हारे भीतर ही हो।
- 9:59तुम कब से अपने अंदर ही स्थित हो? लेकिन तुम कहते हो मैं बाबा अपने
- 10:14अंदर उतरूं कैसे नहीं? ये काम भी तुमने नहीं करना है
- 10:21प्रकृति रोज़ खुद ब खुद कर लेती है तुम कभी सोए अगर तुम्हारे सोने
- 10:30की कोशिश तुम करोगे तो उस कोशिश में ही नींद गायब हो जाएगी।
- 10:38तुम जब सभी कोशिशों को छोड़ देते हो, सभी सोच सभी चिंताएं छोड़
- 10:47देते हो तो प्रकृति तुम्हें निद्रा के गहन तलों पे ले जाती
- 10:54है। बस यही प्रोसेसर तुम्हें करना
- 10:59होगा। प्रकृति तुम्हें रोज़ से करती है,
- 11:03लेकिन तुम आज तक कुछ नहीं सीख पाए कुछ सीखा प्रकृति से प्रकृति के
- 11:12करीब आओ। प्रकृति से दूर हटते चले जाते हो
- 11:20रोज़ और एक बात को हृदय में बसा लेना, प्रकृति से जीतने भी दूर हो
- 11:29जाओगे, उतने ही दुखी हो जाओगे। इसलिए मानव आज इतना दुखी है, उसके
- 11:39दुखी होने का कोई और अन्य दूसरा कारण नहीं है।
- 11:43प्रकृति से दूर हो गया प्रकृति को काटना पीटना शुरू कर दिया।
- 11:53प्रकृति से दूर होना दुख का सबब बनता है।
- 11:59प्रकृति की गोद में आ जाओ, प्रकृति की सांनिधि में आ जाओ
- 12:06उसकी सानिधि का। स्वाद जखो जैसे रात को प्रकृतित्व
- 12:20में सुसुक्ति के उन गहरे अंधेरे कमरों में ले जाती है, वहीं तुमने
- 12:27जाना है। बस सुशुक्ति में तुम जहाँ चले गए
- 12:39जीस प्रोसेसर को अपना के गए प्रकृति ने तुम्हें रोज़ सिखाया
- 12:45कि शीतल हो जाओ सोच को बंद कर दो। बस अब कुछ नहीं करना है।
- 12:52अब सुबह अगर जागेंगे तो करेंगे, अन्यथा राम नाम सत्य है, बस यही
- 13:02फॉर्मूला आजमाना पड़ेगा। रोज़ सिखाती है कुदरत?
- 13:08तुम सीखते हैं गुरु भी यही सीखाता है, छोड़ दो, उसके ऊपर छोड़ दो
- 13:23जैसे रात को पृमात्मा के ऊपर छोड़ देते हैं।
- 13:27आपको डर लगता है नहीं, नींद में जाते वक्त आप अज्ञात के हाथों में
- 13:34जब अपने आप को छोड़ देते हो तो क्या तुम डरते हो?
- 13:38ज़रा भी नहीं तुम्हें आनंद आता है हाँ क्यों आता है क्योंकि तुम्हें
- 13:45पता है? कि सोने से जब मैं उठूंगा तो अपने
- 13:52आप को तरोताजा पाऊंगा। तुम्हें परिणाम पता है नींद के
- 14:01परिणाम का तो तुम्हें पता है। लेकिन मृत्यु का एक दूसरा नाम है
- 14:09वो भी नींद है चिर निद्रा सदा के लिए सो गया तुम नींद से नहीं
- 14:18डरते, चिर नींद से डरते हो? अगर ये नींद लंबी हो जाए, सदा के
- 14:26लिए हो जाए तो तुम बड़े कांपते हो।
- 14:29तुम डरते हो बस यही संत तुम्हें समझाते हैं।
- 14:33यहीं गुरु की आवश्यकता पड़ती है। गुरु कहता है जब तुम नींद में
- 14:39मरते नहीं। सुबह ज्यादा ताजा होकर उठते हो।
- 14:46इसी तरह जब तुम अपने भीतर जाओगे तो अपने आप को छोड़कर जाना होगा,
- 14:54जो आप अपने आप को अब तक समझे बैठे हो।
- 14:59तुम अपने आप को अब तक क्या समझे बैठे हो?
- 15:04मैं शरीर हूँ, मैं मन हूँ, मैं विचार हूँ, इसीलिए तो थोड़ी सी
- 15:09आपके विचारों की काट होते ही आप फ़ौरन अदालतों का दरवाजा खटखटा
- 15:15देते हो। मानहानि का दावा कर देते।
- 15:22इसमें कसूर आपका है। आपने ये मान्यताएँ बनाई ही क्यों?
- 15:30ये झूठी मान्यताएँ ये आपने मनाई ही क्यों?
- 15:38शिवलिंग पत्थर की मूर्ति होता है, उसके ऊपर दूध ही चढ़ाते हैं।
- 15:47अगर कोई कह देता है कि ये पत्थर के ऊपर दूध क्यों चढ़ा रहे हो?
- 15:52बाहर जो पिंजर लिए बैठा है। जीसको खाना नसीब नहीं हुआ, उसे
- 15:58क्यों नहीं पीला दिया? तो आपकी भावनाओं आहत हो जाती हैं।
- 16:03आप अदालतों के दरवाज़े खटखटाते हो और दूसरे व्यक्ति को सजा हो जाती
- 16:13है। सजा देने वाले भी आप जैसे ही मूड
- 16:18क्योंकि वो भी वास्तविकता का ज्ञान नहीं रख सकते, यहाँ तो खुद
- 16:26को अध्यात्म्य कहने वाले लोगों का पता ही नहीं।
- 16:32कि उन्होंने साधना की किस वक्त जन्म लिया?
- 16:39बड़े हुए पर वर्षपाई पढ़े लिखे बड़े हुए कॉम्पिटिशन लड़ा।
- 16:49आई ए एस बने। फिर अचानक से आध्यात्मिकता के
- 16:56क्षेत्र में उतर के कृष्ण की गीता और उपनिषदों की व्याख्या करनी
- 17:03शुरू कर दी। 1 दिन भी इन्होंने।
- 17:09अपने अंत में उतरने का प्रयास नहीं किया और फिर शब्दावली ये
- 17:16प्रयोग करते हैं कि एनलाइटनमेंट होती ही नहीं तो फिर मार्कस में
- 17:25और इन आचार्यों में ज़रा सोचो। बताओ फर्क क्या है?
- 17:34समाज की प्रणालियाँ के ऊपर आपको गाइड करते रहेंगे ये लोग, लेकिन
- 17:41समाज की प्रणालियाँ के ऊपर गाइड करने से आध्यात्मिकता का कोई
- 17:47संबंध नहीं। क्योंकि सामाजिक प्राणनियां
- 17:51बुद्धि और मन से जुड़ी हुई हैं और आध्यात्मिकता, बुद्धि और मन से
- 17:58पार की बात है। दोनों में संबंध जुड़ोगे बिद्ध
- 18:03कैसे जुड़ोगे? लेकिन नहीं।
- 18:08ये आचार्य गण है और मैं रोज़ बोलता हूँ भाई तुम ये तो बता दो
- 18:18कि तुम कुर्सी पे बैठे बैठे, अचानक कमंडल उठा लिए।
- 18:25तुम अपने अंतश में गए तो इनके पास कोई जवाब नहीं होता।
- 18:34इनको देखकर संत पुरुषों को एकांत में बताए हुए।
- 18:43लम्हों को लज्जित होना पड़ता है और उन लोगों को ये गालियां
- 18:50निकालते हैं जो आध्यात्मिकता की बात करते हैं।
- 18:58तर्क की कसौटी पर बातें ठीक लगेंगी इन लोगों की।
- 19:05क्योंकि बुद्धि परखर है, तर्क से ही तो जीते हैं।
- 19:10यूपीएससी तर्क से ही तो बने हैं आईएएस सूचनाएं संग्रहित हैं इनके
- 19:17न्यूरोस में बहुत ज्यादा मात्रा में।
- 19:21और इन सूचनाओं के कारण ही ये आपको बुधु बनाते हैं और प्रलोभित भी
- 19:28करते हैं। असल में देखा जाए तो ये मार्क्स
- 19:35हिटलर, स्टालिन के दूसरे रूप हैं। नकाब ओढ़ लिया है।
- 19:40आध्यात्मिकता का ये बात जुदा है। आध्यात्मिकता की बात इनसे आपको
- 19:50सुनने को मिलेंगे इस बात की उम्मीद कभी भी मत करना।
- 19:56क्योंकि जिसने एकांत के उन गहरे पलों का उन गहरे सतलों का अनुभव
- 20:03नहीं किया, वह आपको एकांत में है क्या?
- 20:09क्या बताएगा किस वह बता नहीं पाएगा?
- 20:18अगर वह बताएगा बिना अनुभव किए तो ध्यान रखना बुद्धि के तल से बता
- 20:24पाएगा। लेकिन अध्यात्म बुद्धि के तल से
- 20:28पार है, अध्यात्म, मानव और बुद्धि की पकड़ से परे।
- 20:36इनका गीता का उपनिषद का व्याख्या आपको सटीक मालूम पड़ेगा।
- 20:45लेकिन बेईमानी है जब मैं गहरे से देखता हूँ वरुणन को।
- 20:53तो सरासर बेईमानी प्रतीत होती है। भला वहाँ पहुंचे बिना वहाँ के
- 21:02नज़रों का व्याख्यान किया कैसे जा सकता है नहीं किया जा सकता, लेकिन
- 21:12ये लोग करते हैं। करते हैं तो फिर अंदाजे से करते
- 21:16हैं, खुद के अनुभव से नहीं करते और अंदाजे तो सदा गलत हो सकते
- 21:22हैं। अंदाजे गलत ही होते हैं।
- 21:29अंदाजों को ऐसा बोला जाएगा जैसे उनके भीतर।
- 21:33कोरे थोथे शब्द हैं। शब्दों के भीतर अमृत की रस्सधार
- 21:40नहीं बहते। इनके शब्द उस अमृत के सागर में
- 21:45लिवड़ के नहीं आते, लेकिन संत के शब्द?
- 21:53अपने अंत के खुमारी के आनंद के सागर में लिपट कर आते हैं।
- 22:01शब्द वही है यह जानने वाला चाहिए संत के शब्द उस खुमारी से।
- 22:12ओतप्रोत होते हैं। देखने में आपको यकसा लगेंगे।
- 22:21शब्द दोनों बराबर है। इसने भी तो वही कहा जो उसने कहा
- 22:27लेकिन एक बात चूक जाओगे। क्योंकि आपने उस खुमारी का कभी
- 22:33अनुभव नहीं किया? ये दोनों शब्द तो ठीक थे, बराबर
- 22:39थे लेकिन एक खुमारी के आनंद से सुगंधित था।
- 22:47और एक रस विहीन था शब्द दोनों वही थे लहज़े में फर्क था बारीक फर्क
- 22:59था आपने समझा नहीं ये लोग? आध्यात्मिकता के लाभ पर कलंक है।
- 23:16क्योंकि ये लोग इतने तथाकथित आस्तिकों को पैदा कर जाएंगे, जो
- 23:24वास्तव में नास्तिक होंगे। बस यही डर है आध्यात्मिकता को
- 23:31नास्तिकों से ज़रा भी डर नहीं आध्यात्मिकता को डर है तो इन तथा
- 23:40कथित आस्तिकों से डर है। तथाकथित आध्यात्मिक केंद्रों के
- 23:47संचालकों से डर है क्योंकि इनके पास आध्यात्मिकता के पास जाने का
- 23:57अनुभव नहीं है। शब्द बहुत है, शब्द घने हैं।
- 24:05लैंग्वेजेज घनी है, वोकबुलरी बहुत है, सूचनाएं अनंत है।
- 24:17ये आपको भरमालिक है, बड़े आसानी से भरमालिक है।
- 24:25इसलिए मैं कहता हूँ मार्क्स, स्टालिन, हिटलर, मानवता के लिए
- 24:33आध्यात्मिकता के लिए कोई विशेष नुकसान नहीं करके जाते।
- 24:40नुकसान करते हैं तो ये झूठे पपंची लोग जो लवादा उड़ लेते हैं,
- 24:49आध्यात्मिक तक होते हैं, नास्तिक प्रकट करते हैं, आस्तिक।
- 25:00यही मुशकलात आ जाती है। सत्य के अनुभवी व्यक्ति को संत
- 25:10इन्हीं से प्रताड़ित होता है। क्योंकि इनके शब्द सटीक मालूम
- 25:24पड़ते हैं। चिकन सब होगा, पौष्टिकता न होगी।
- 25:34भोजन में सब हो, स्वाद हो, पौष्टिकता न हो।
- 25:39तो भोजन का आपने करना क्या है? जिसने आपको एनर्जी ना दी वो भी
- 25:46कोई भोजन होता है। स्वाद भले कितना ही हो, बात तो
- 25:52एनर्जी की है भोजन हम जीस नीयत से जीस पर्पस से कर रहे हैं।
- 25:58वो पर्पस तो हमारा हल नहीं है, पूछा है अपने भीतर कैसे उतरो
- 26:11नहीं, अपने भीतर नहीं उतरना है, फिर से समझ लो शायद।
- 26:18कोई क्षण ऐसी सौभाग्यशाली आ जाए कि तुम्हें मेरी बात अंत समय उतर
- 26:25जाए। अपने भीतर नहीं उतरना है अच्छी
- 26:34तरह से समझ लो बात को। बाहर की पकड़ छोड़ते देखने में
- 26:42दोनों बातें जकसा लगेंगी। लेकिन है विरोधियो अपने भीतर जाने
- 26:53का प्रयास परिश्रम है। और बाहर से पकड़ छोड़ना विश्रांति
- 27:05है, फिर सन्न अपने भीतर अपने भीतर जाने का प्रयास परिश्रम है।
- 27:18मेहनत है, प्रयास है बाहर से पकड़ को छोड़ देना प्रयास नहीं है,
- 27:27बाहर से पकड़ को छोड़ देना प्रयास है विश्राम।
- 27:38जैसे ही बाहर से पकड़ को छोड़ते हो आप निद्रा में चले जाते हो,
- 27:47वैसे ही आप बाहर के प्रयास को छोड़ोगे पकड़ो को छोड़ोगे तो
- 27:53ध्यान में भी चले जाओगे। प्रोसेसर इस दी सेम बट कंडीशन
- 28:03आईएस डिफरेंट एक कंडीशन में तुम थके हरे होते हो, उसमें प्रकृति
- 28:11तुम्हें अपनी गोद में ले जाती है। और एक में तुम तरुता जाओते हो अगर
- 28:24उस स्थिति में तुम वही प्रक्रिया अपनाते हो और छोड़ते हो अपने आपको
- 28:31तो तुम वहाँ पहुँच जाते हो। जहाँ मैं कह रहा हूँ थके हारे
- 28:39व्यक्ति को प्रकृति नींद में ले जाएगी और परम जागरूक एनर्जेटिक
- 28:49व्यक्ति को प्रकृति। स्वभाव में ले जाएंगे फिर से सुनो
- 28:56उसको थक्का मांदा विक्री जब छोड़ेगा अपने आप को तो प्रकृति
- 29:07अपना काम करेगी और तुमको अपनी गोद में ले जाएंगे, विश्रांति देगी।
- 29:15और आप तरो ताजा हो के उठ जाओगे, ये दो पार्ट कर लो।
- 29:19इसमें यह थी समाधि की अवस्था सोये सोये, अब जाग गए, तरो ताजा हो गए,
- 29:33एनर्जेटिक हो गए। तो अब आपको छोड़ो जागे जागे साँझ
- 29:40ढले, रात गए आपने छोड़ा था अपने आपको थके थके हार ही हार और
- 29:50प्रकृति आपको सुनाने के अलावा कुछ कर भी नहीं सकती थी।
- 29:55मजबूरी थी तो प्रकृति आपको शशक्ति के गहरे तलों में ले गई और आपने
- 30:03रात भर विश्राम पाया। आप तरो ताजा होक तरो ताजा होक।
- 30:13जब तुम जागृत होकर वही प्रोसेसर को दोहराते हो तो तुम ध्यान में
- 30:23चले जाओगे। अब शायद आपको बात समझ में आ गई
- 30:28हो। जब तुम परम फेश हो, वो वक्त है
- 30:39ध्यान करने का। इसलिए संतों ने कहा अमृत वेला में
- 30:44जाकर ध्यान करना, प्रभु स्मरण करना कहने का ढंग था।
- 30:51आज वो भाषा इस्तेमाल नहीं होती। आज तर्क की कसौटी पर एक एक अक्षर
- 30:57की मात्रा कसी जाती है। संतों ने कहा मनीषियों ने कहा कि
- 31:07अमृत वेला का लाभ उठा लेना उसका अर्थ क्या था?
- 31:14कोई ऊपर से अमृत की बूँदें झरती हैं क्योंकि वही वेला है जब आप
- 31:23सारी रात विश्रांति में से निकलकर बरफूर एनर्जेटिक हो के बाहर आया।
- 31:34और जब तुम एनर्जेटिक तरो ताजा हो के बाहर आए हो, तो वही वक्त है
- 31:39ध्यान में जाने को रात उसी प्रोसेसर को दोहराने से आप जाते
- 31:50हो नींद में। नींद आपको तरो ताजा कर देती है,
- 31:55लाद देती है, आपको ऊर्जा से ओत प्रोत कर देती है आपके अंग
- 32:00प्रत्यंग को ऊर्जा से और सुबह आप तरो ताजा हो के उठते हो, आपका अंग
- 32:07अंग शक्ति संपन्न होता है। तो फिर क्यों कहा के ब्रह्मवेला
- 32:15में उठकर से मरण करना, याद करना, क्या याद करना तुम हो?
- 32:22कौन हू आर यू सेल्फ रिमेम्बरिंग? ये याद करना है याद कैसा आएगा वो
- 32:40ही प्रोसेसर जो आपने रात को नींद में जाते हुए छोकी थी अपने आप के
- 32:48सारे अंग प्रतंग। को छोड़ दिया था।
- 32:55यह छोड़ ना शब्द बड़ा प्यारा है इस छोड़ ने शब्द से अगर आप कुछ सब
- 33:08कर ले सको। तो अति शुभ होगा।
- 33:14जब आप छोड़ना जानते नहीं आप पकड़ना जानते हो तो आपको संत
- 33:21सिखाते हैं कि छोड़ना कैसे? इसलिए दान की इतनी महिमा बताई गई
- 33:29है। शरीर की इंद्रियों के बाद आप अगर
- 33:35कहीं पकड़ रखते हो तो वो है धन मान इज्जत।
- 33:47इन चीजों से पकड़ को हटाओ किसने गाली निकाल दी?
- 33:56आप तो मन के भीतर गांठ बांध लेते हो, इससे जब तक बदला नहीं लेंगे,
- 34:04चैन से नहीं सोएंगे। आपने खुद ही अपने रातों की नींदे
- 34:09हराम कर दी क्योंकि अब बदला लेना होगा और बदला लेना होगा तो आप
- 34:20अपने भीतर जहर घोलते चले जाओ। तो उस व्यक्ति ने आपके जीवन को
- 34:27दूषित कर दिया। ऐसा नहीं।
- 34:31वह व्यक्ति सिर्फ कारण बन दूषित हुए।
- 34:35तुम तुम्हारे कारण थूक तो बुद्ध के ऊपर भी रोक जाते है, लेकिन वह
- 34:42तो परम प्रसन्न रहते है। क्यों?
- 34:47क्योंकि वो नॉन रिऐक्टिव है, वह मन में ना तो गांठ बांधते हैं ना
- 34:57ही आपसे तुरंत कोई रिएक्शन देते हैं।
- 35:01वह शांत बैठे रह जाते हैं। बल्कि आपसे पूछते हैं कि ये तो
- 35:08ठीक है, बनते कुछ और भी कहना है उनकी शांति को आपका थूकना ज़रा
- 35:20भी? कामना कर सका।
- 35:23बाधित न कर सका, लेकिन आप गांठ बांध लो, इसने मेरे ऊपर थूका था।
- 35:35मैं इसका सर्व सत्यनाश कर दूंगा। और उसका सर्व सत्यानाश हो न हो,
- 35:43तुम अपना सर्व सत्यानाश अवश्य कर लेते हो, क्योंकि दूसरे से बदला
- 35:51लेने की वृत्ति आपके भीतर कितने जहरीले हार्मोन पैदा कर देते है।
- 35:57दिन भर रात आप सोचते ही रहते हो। इस आदमी से बदला कैसे लूँ?
- 36:03इस आदमी से बदला कैसे लूँ? कैसे इसका कोई नुकसान कर दे?
- 36:10आप तरह तरह के मार्ग खोजते हो, तरह तरह की खोजें करते हो?
- 36:21और अपने भीतर आपको पता ही नहीं कि तुम नरंतर अपने खून को जहरीला कर
- 36:29रहे है। तुम बदला उससे नहीं लेते, तुम
- 36:36बदला स्वयं से लेते हो। तुम नुकसान उसका नहीं करते हो,
- 36:43तुम नुकसान स्वयं का कर लेते हो, इसे ही अज्ञानता कहते हैं।
- 36:49संत संत कहते हैं, अगर किसी ने आपके ऊपर थूक दिया।
- 36:58दुर्वचन कह दिए तो आप उनको एक अनवर करते ना?
- 37:05इसलिए मैंने आपको एक सूत्र दिया नॉन रिऐक्टिवनेस आपने प्रतिक्रिया
- 37:17नहीं करी। और तुमने अगर इसको अपने जीवन में
- 37:22उतार लिया तो तुम पाओगे कि तुम्हारी जिंदगी फूलों से लग गई।
- 37:27खुशबू गायक फूलों से लग गई। 99% दुखड़े आपके प्रतिक्रिया देने
- 37:35से होते है। 1% दुख होता है तुम्हारे कर्मों
- 37:44के कारण पारबध के कारण 99% तो तुम खुद समय पर ही पैदा कर लेते हो
- 37:53अपने दुखों को। तो मैंने आपको एक सूत्र बड़ा
- 37:59शानदार समझाया था कि जीवन में सिर्फ मात्र सुखी जीने के लिए एक
- 38:05ही फार्मूले को आजमा लेना, इम्प्लिमेंट कर लेना अपने जीवन के
- 38:12आचरण को। 10 कमेंडमेंट्स को इम्प्लिमेंट मत
- 38:17करना घरों में रिश्तों में तनाव धृष्टता जहरीलापन।
- 38:34आने का मात्र एक ही कारण है रोज़ झगड़े देखते हो?
- 38:39आपको? इसकी बुनियाद में कभी झांकने की
- 38:44चेष्टा भी नहीं की और आपने किसी सयाने व्यक्ति से पूछा भी नहीं।
- 38:52आप अपने मन के अनुरूप चलते हो और मन तो मूर्ख है स्यानी व्यक्ति के
- 39:00कहने के अनुरूप नहीं चलते। अगर आप किसी स्यानी व्यक्ति के
- 39:06अनुभव के अनुरूप चलो तो आप पाओगे कि अपनी जिंदगी में।
- 39:13उजाड़ था, खिंजा थी, गुलशन खेल गया, बाहर आके फूल लग गए हवाएं
- 39:25जहाँ जहरीली थी वहाँ खुशबू बिखेरने लगी।
- 39:30चाहे वो मंत्र बहुत पहले आपको समझाया था, प्रतिक्रिया मत कराओ,
- 39:40नॉन रिऐक्टिवनेस किसी ने कुछ भी कर दिया आप प्रतिक्रिया मत कराओ।
- 39:50गहरी शांति में जाने का यह अद्भुत सूत्र है।
- 39:5999% दुखड़े तुम्हारे स्वयं के बनाए हुए होते हैं 1% दुखड़ा।
- 40:12तुम्हारे प्रारूप से आता है और तुम जानकर बड़े हैरान हो गए।
- 40:20अगर तुम नॉन रिऐक्टिवनेस को छोड़ दो तो घर में खुशहाली हो जाएगी आज
- 40:27ही से आजमा के। अगर एक व्यक्ति भी इसकी शुरुआत कर
- 40:35दे तो यह रोग छुआछूत का है। उस एक व्यक्ति को देखकर दूसरा भी
- 40:43अपने जीवन को बदलेगा और 1 दिन ऐसा आएगा।
- 40:48की सारा घर उस वृति को अपना लेगा, फिर पड़ोसी भी अपना लेंगे।
- 40:56फिर सारा शहर भी अपना लेगा। फिर सारा राज्य भी अपना लेगा और
- 41:02फिर सारा देश भी अपना लेगा। ऐसे ही चलती है व्यवस्थाएँ।
- 41:08लेकिन चलती है एक आदमी से समूह यहाँ काम नहीं करता शुरू होती है
- 41:16एक आदमी से और आप वो व्यक्ति बन जाओ।
- 41:21पहले व्यक्ति आप होनी चाहिए आज ही से ये निश्चय कर लो।
- 41:28अगर आपको कोई गाली निकालता है, आपका क्या है?
- 41:33शब्द है लिपिया है उस गाली का अर्थ हमने अगर शब्दों में
- 41:40आशीर्वाद के रूप में बना दिया होता तो हम प्रसन्न होते।
- 41:48जीस गाली को हम आज गाली समझते हैं।
- 41:52जब लिपियों की रिसर्च हुई तो इस गाली को हम आशीर्वाद का रूप दे
- 41:59देते हैं तो फिर यह आपको गाली लगती के आशीर्वाद लगता है?
- 42:05आशीर्वाद लगता क्यों? क्योंकि हमने गाली बनाई, उसकी जगह
- 42:12आशीर्वाद बना दिया और आशीर्वाद की जगह अगर हमने गाली बना दी होती,
- 42:18उलट पुलट कर दिया होता तो हम किसी को आशीर्वाद देते।
- 42:22वह दुखी हो जाता कि तुमने मुझे। ये गाली क्यों न कर ली?
- 42:29ये तुम्हारी लिपियों की खोजीन थी और लिपियों से न तो संसार चलता है
- 42:37और परमात्मा तो बहुत दूर है। परमात्मा तो शब्दातीत है।
- 42:42परमात्मा तो अखरा तो मुखर है तो आज से ये शुरू करो।
- 42:51अगर कोई तुम्हें गाली निकालता है, अपशब्द कहता है, तुम्हारी
- 42:56बेइज्जती करता है तो उसे कुछ मत कहो, तुम पाओगे?
- 43:04जो तो को कांटो बो वे तू ही बो तू फूल जो तेरे लिए कांटे होता है,
- 43:12उसके लिए तू फूल बो तो ही फूल को फूल है बा को है तरसूल।
- 43:21तुम्हें फूल की जगह फूल मिलेगा, उसको फूल की जगह त्रिशूल मिलेगा,
- 43:29तीन कांटे मिलेंगे और तुम उसकी फिक्र मत करो।
- 43:35तुम अपने फूलों की श्रृंखला को टूटने मत दो।
- 43:40बस तुम अपना आपा संभालो जब तुम्हें कोई तुम्हारे साथ अभद्र
- 43:46व्यवहार करता है, जो शरत से पार है, जो अशिष्ट है, जो शिष्टाचार
- 43:55में कतई नहीं आता, तो आप नाराज मत हो।
- 43:59क्योंकि नाराज होकर आप अपने ही भीतर जो रस प्रवाहित होता है,
- 44:07उसको मार दोगे और जहर को फैलाना शुरू कर दोगे तो नुकसान किसका
- 44:12हुआ? आपका हुआ सहज बने रहो।
- 44:19और उसको उसी वक्त क्षमा कर दो दो बातें याद रखना, उसी वक्त क्षमा
- 44:28कर दूंगा, बदला लेने की भावना ना रखो।
- 44:35अगर आपने ये दो काम कर दिया। और ये दोनों काम हृदय से होने
- 44:42चाहिए। जुबानी कलामी कागजी पैगाम नहीं
- 44:47होनी चाहिए। हृदय से ही क्षमा हो और हृदय से
- 44:55ही। बदला लेने की भावना समाप्त करता
- 44:59हूँ। ये दो काम अगर तुम कर सकते हो तो
- 45:02तुम पाओगे तो हमारी ज़िन्दगी में उपवन खेलने लगे खुशबू ही खुशबू
- 45:13से। हर तरफ से अच्छे अच्छे पैगाम आते
- 45:18हैं। तुम जो चाहती थी ये लोग मेरी
- 45:26बुराइ ना करें वो तुम्हारा तरीका गलत था।
- 45:31तरीका से ही अपना। तुम प्रतिक्रिया करनी बंद कर दो,
- 45:40तुम्हें लोग बहुत कुछ कहेंगे, लेकिन तुमने उसके ऊपर अपने आप को
- 45:49दंडित नहीं करना है, कसूर उसका। दंड तुम खुद को देते हो यह क्या
- 45:59तुमने प्रतिक्रिया नहीं करनी और तुम पाओगे आज कल वक्त आएगा जब तुम
- 46:06खुशी हो जाओगे और तुम्हें गाली देने वाला पर दुखी हो जाएगा।
- 46:14लेकिन तुम बदला लेने की भावना को त्याग दो और उसको तुरंत क्षमा
- 46:20करता हूँ। जैन धर्म के भीतर एक प्रदुषण पर्व
- 46:25आता है। हर साल उसका थीम क्या होता है?
- 46:29उसका थीम यही होता है कि सभी एकत्रित होते हैं।
- 46:35अब एक शहर के लोग हैं। आपस में कभी बातचीत हुई होगी?
- 46:40कलह, क्लेश भी हुआ होगा, मतभेद भी हुए होंगे, मनभेद भी हुए होंगे।
- 46:47तो वह 1 दिन पर्युषण पर्व के ऊपर यह सप्ताह भर चलता है, बैठते हैं,
- 46:56पाठ पूजा करते हैं, जैसा भी विधान उन्हें सौंपा जाता है, गुरु के
- 47:03द्वारा वो करते हैं। और एक काम बहुत बढ़िया करते हैं।
- 47:09वो इकट्ठा होकर एक दूसरे के पांव के हाथ लगाते हैं।
- 47:14वर्ष भर में अगर मेरे से कोई गलती हो गई तो मुझे मूर्ख जानकर क्षमा
- 47:21करते हैं। कहीं बदला लेने की भावना तुम्हारी
- 47:25रह गई तो उसे मन से निकाल देना। मैंने गलती में कह दिया मुझे
- 47:33क्षमा कर और वह व्यक्ति उसको माफ़ कर देता जब पाम ही छूट दिया।
- 47:46हृदय से माफ़ करते है, ऊपर ऊपर से नहीं बदला लेने की भावना जो रखता
- 47:52है वह नुकसान अपना ही करता है क्योंकि यह भावना जहरीली है।
- 48:02यह भावना आपको ही दुख देगी। इस परूषण पर्व में जैन धर्म के
- 48:11अंदर बड़ी अद्भुत यह प्रथा थी और वो आदमियों को छोड़ो।
- 48:17वो तो जीवों से माफी मांगते थे। हे छोटे छोटे जीवों, गलती से आपके
- 48:24ऊपर पांव पड़ गया होगा। मेरा भार ज्यादा है शरीर का और
- 48:29आपको मृत होना पड़ा होगा, आपकी हत्या होगी होगी, आपको कष्ट हुआ
- 48:38होगा, अंग भंग होगा होगा। इसलिए मुझे क्षमा कर देना क्योंकि
- 48:43मैंने ये जानबूझ के नहीं किया। उस दिन वर्ष भर का सारा कचरा वो
- 48:53साफ कर देता हूँ। यह प्रथा एक व्यक्ति शुरू करें आज
- 49:05ही से तुम शुरू कर दो। और तुम पाओगे 1020 50 साल में
- 49:16पूरी सृष्टि ही प्रेममयी हो जाएगी, पूरी सृष्टि को यक सा यक
- 49:23दंभ। प्रेम पूर्व को बनाने की चेष्टा
- 49:25का पागलपन कभी मत करना जो भी क्रांति होती है, एक व्यक्ति से
- 49:31ही शुरू होती है। मार्कस अकेला था, माऊ अकेला था,
- 49:38उसने क्रांति की शुरुआत की तो तुम।
- 49:42इस क्रांति की शुरुआत करो, तुम पहले व्यक्ति हो जो मौन
- 49:49प्रतिक्रिया का आगाज़ करो और फिर ये फैलते फैलते ईश्वर कृपा करें
- 49:57कि ये पैगाम सारी सृष्टि में फैल जाए।
- 50:01और सारी सृष्टि प्रेम और आनंद में मग्न हो जाए अपने भीतर जाने के
- 50:11लिए मैं क्या करूँ? अब तो आप ही कुछ करो, कैसे अपने
- 50:18को जानूं, अपने अंदर उतरूं। बाबा आप ही कुछ कृपा करो, मेरे से
- 50:25तो नहीं हो रहा, आप सदा दूसरों से सहायता मांगते हो, मन की पुरानी
- 50:36आदत है सहारा। और परमात्मा मैंने बहुत बार कहा
- 50:44है उस अवस्था में आता है जब आप असहाय होते हो, जब आप सहारे की
- 50:54अपेक्षा ही नहीं रखते। गुरु का एक ही काम है और वह काम
- 51:04मैं किए देता हूँ। अगर आपने मेरा सहारा मांगा तो आप
- 51:10गलती खा जाओगे। अगर आपने मेरा मार्गदर्शन मांगा
- 51:16तो आप सही। मुझे मार्गदर्शन की तरह लोगे तो
- 51:23सही 1 दिन पहुँच जाओगे, अगर आपने मेरा सहारा मांगा तो चूक जाओगे।
- 51:31बात यद्यपि एक ही है। बाबा अपने भीतर कैसे उतरूं, अपने
- 51:39भीतर नहीं उतरना अपने भीतर तो तुम सदा से हो, वह स्वभाव ही क्या जो
- 51:47छोड़ दिया जाए या जो छोड़ा जा सके रात की गहन सुसुक्ति के भीतर भी
- 51:53आपको पता नहीं होता कहाँ हो? लेकिन फिर भी सुबह चंगे भले उठते
- 51:58हो तुम अपने आप को कभी खो नहीं सकते, तुम तुम्हारा स्वभाव कभी खो
- 52:06नहीं सकते, वह स्वभाव ही क्या जो खो दिया जाए फिर तो वो परा भाव है
- 52:13वह स्वभाव नहीं। खोया जा सकता है पदार्थ क्योंकि
- 52:20वो पराभाग है, खोयी जाती है डिग्रियां क्योंकि वो पराभाग है
- 52:26खोया जाता है धन पद्मिया क्योंकि पराभाव है स्वयं को कैसे खोज।
- 52:36जीसको खोने का कोई उपाय न हो उसको कहते हैं स्वभाव और तुमने जाना है
- 52:43स्वभाव के भीतर और तुम्हारे मन की आदत है कि दूसरे का सहारा लेकर
- 52:51मैं खुद के पास जाऊं। यही गलती कहा जाता है फिर दूसरे
- 52:56तुम्हें बहका देते हैं, यही मन की गलती तुम्हें भटका देती है जन्मों
- 53:04तक अगर तुम भटक रहे हो, आज इस धरा पर बैठे हो तो इसका और कोई कारण
- 53:11नहीं। इसका मात्र एक ही कारण है कि आपने
- 53:15सदा दूसरे से सहारा मांगा और संत कहते हैं कि सहारा मांगना बंद
- 53:23करो, दिशा मांगनी शुरू करो सहारा। फिर ये गुरुजन आपको सहारा देते
- 53:35हैं। ये माला पकड़ा है राधे राधे को
- 53:43राम बनेंगे सहारा, राधे राधे का नाम बनेगा सहारा?
- 53:51नहीं गलती खा जाते हो अगर गलती खाये हो तभी तो बाबा नानक के ये
- 53:58शब्द सही हो रहे हैं कोटिन में कोई एक जलक है, सच्ची में मोक्ष
- 54:05करोड़ों में से एक व्यक्ति जगती है।
- 54:09कोट में चलत एक पहुँच जाता है और जो करोड़ों आदमी चलते है वो
- 54:14रास्ते में बह के जाते है। एक पहुँचता है कारण आप कहीं ना
- 54:20कहीं सहारा अंकों के दूसरों का और सूत्र ये कहता है कि बेसहारा हो
- 54:27जाओ। जीस घड़ी तुमने सभी बलों को छोड़
- 54:32दिया निर्बल हो गए वह अज्ञात शक्ति जिसका आपने कभी दर्शन नहीं
- 54:40किया, वह आपकी बाह पकड़ लेगा वह आपको ग्रह अंध को।
- 54:47गहरे गहरे अंधेरे समुद्र कुंए में से निकाल लेगा वहाँ पकड़ लेकिन आप
- 54:59बेसहारा होकर पुकारो तो बेसहारा होना बहुत बड़ा।
- 55:09ये है परम योग्यता देखिए जज बनने के लिए डिग्रीज़ की योग्यता होती
- 55:18है और फिर इतिमा पाने के लिए कागजों की डिग्रीज़ की जरूरत होती
- 55:24है। लेकिन अपने अंत में उतरने के लिए
- 55:29किसी प्रकार की डिग्री की आवश्यकता नहीं होती।
- 55:32यहाँ तो जो बल इकट्ठे किए हैं वो भी छोड़ देने होते हैं।
- 55:39निर बल हो जाना होता है निर अवलंब हो जाना होता है निश्चित ही।
- 55:44ये जो आचार्य लोग आपको सीखा रहे हैं ये धन कमाना सखाएंगे आपको
- 55:50जचेगी भी बात जचती है क्योंकि बिना इसके काम चलेगा कैसे?
- 56:00लेकिन। ये भी कहना नहीं चाहते और आप भूल
- 56:07जाते हो पूछना कि जब जरूरत पूरी हो जाए और इतना ज्यादा हो जाए तो
- 56:14क्या मैं छोड़ दूँ? इकट्ठा करना ये आप उससे और खुद से
- 56:21समझते नहीं। कि बस काफी हो गया, अब छोड़ दो अब
- 56:26मिलिनियर बन गए अब फिर तुम्हारे ये गुरूजन सिखाएंगे कि बिलिनेयर
- 56:33कैसे हो जाओ फिर महंगाई बढ़ेगी तो फिर ये कहेंगे कि बिलिनेयर कैसे
- 56:40हो जाओ। और ये भाग दौड़ सारा जीवन भर चलती
- 56:46रहेंगी और तुम्हारा जीवन आपाधापी के अंदर दुखी रहेगा, क्योंकि
- 56:53ठहराव न आएगा और जब तक ठहराव न आएगा तब तक सुख की तो आप कल्पना
- 56:59ही कर सकते हो। ठहराव के बिना सुख कहा, ठहराव के
- 57:04बिना तो मृगदृश्य और कुछ भी जोड़ने की तमन्ना बल हो, धन हो
- 57:15बाहु बल हो, व्यक्ति बल हो। पदवी का बल हो या कोई भी बल हो,
- 57:22इन बलों को इकट्ठा करना है। उसमें आप दौड़ते हो, दौड़ने के
- 57:32कारण आप कुछ पाते हो निश्चित। और कुछ बड़ा है जो चूक जाते हैं,
- 57:44पाते हो बहुत थोड़ा और चूक जाते हो बहुत बड़ा वह अनंत समुद्र आनंद
- 57:54का वह खुमारी का चूक जाता है। छोटे छोटे आनंद की झलकों के कारण
- 58:04आप खोज लेते हो इकट्ठा कर लेते हो, पदार्थों को आप इकट्ठा कर
- 58:09लेते हो, रुतबों को आप इकट्ठा कर लेते हो लोग आपको मान सम्मान दें।
- 58:17ये इकट्ठा कर लेते हो, लेकिन कहाँ इकट्ठा करते हो आप आनंद को, कहाँ
- 58:27उस आनंद को, उस परम सुख को, उस चरम सुख को, उस अखंड आनंद को तुम
- 58:33इकट्ठा कर पाते हो जो एक बार आ जाए और फिर।
- 58:37टूटे ना उसकी लड़की नहीं कर पाते। क्यों नहीं कर पाते क्योंकि तुम
- 58:43बाहर के बलों को इकट्ठा करते हो और इसमें कोई बुराइ भी नहीं है,
- 58:49लेकिन एक वक्त आने पर उन्हें छोड़ भी तो देना चाहिए।
- 58:55यह तुम भूल जाते हो, तुम इस पागलपन को जीवन का एक अटूट हिस्सा
- 59:02समझ लेते हो, लेकिन हमारे ऋषियों ने बड़ी सुंदर अवस्था बनाई थी।
- 59:09पहले इकट्ठा करो ब्रह्मचर्य फिर उसे इकट्ठा करके।
- 59:15अपनी जीवन निर्वाह को करो, अपनी संतुति को बढ़ाओ, उनका बाल नपुषण
- 59:23करो। ग्रहस्थ फिर वाण प्रस्थ अपने
- 59:29बच्चों को दिशा निर्देश भी देते रहो आधे।
- 59:32और आधे जहाँ अब आपने आगे जाना है संयस्त में वनों में, उसकी तरफ भी
- 59:39आपका ध्यान रहे आधार तो दो तरफ़ रहो, इधर संसार को भी सहारा दो,
- 59:46उधर परमात्मा की तरफ भी उन्मुख हो जाओ।
- 59:51और फिर एक वक्त आएगा इसको सालों में मत डालो।
- 59:58ये मानसिक अवस्थाएं हैं। जब आप सारे फर्ज निभा दो और
- 1:00:03बिल्कुल निश्चिंत हो जाओ तो आपकी उम्र कुछ भी हो, तुरंत आप सन्नस्त
- 1:00:09हो जाए। संयस्त का मतलब संयस्त का मतलब
- 1:00:14छोड़ देना, संसार के सभी प्रकार के जोड़ने की परंपराओं को वह
- 1:00:22रिश्तों को जोड़ना, वह सगे संबंधियों के साथ प्रेम प्यार को
- 1:00:29बढ़ाना। जब भी जुड़ना हो गया बाकी तो
- 1:00:34रोज़मर्रा की बातें, धन, वैभव, संपत्ति, पदवी इनको जोड़ना है।
- 1:00:43एक वक्त आने के बाद जब आपके फर्ज पूरे हो जाएं।
- 1:00:50तो छोड़ देना है क्योंकि एक वृहत काम आपका बाकी है।
- 1:00:58ये जो अब तक आपने किया ये महज एक ट्रेलर था, असली फ़िल्म तो अब
- 1:01:06चलेगी। आगाज तो फ़िल्म की कहानी तो
- 1:01:11फ़िल्म की अब शुरू होगी, इसलिए मैं कहता हूँ कि फ़िल्म की कहानी
- 1:01:17शुरू होती है, आखिरी पड़ाव है जीसको हम संयस्त कहते हैं और
- 1:01:25संयस्त ही वो अवस्था है। जो आपको चर्म सुख देते है।
- 1:01:33अगर में आप पूरा पूरा डूब गए उतर गए तो दुनिया की कोई ताकत आपको उस
- 1:01:43पर आनंद के खजाने तक पहुंचने से रोक नहीं सकती।
- 1:01:48बशर्ते कि आप अपना सारा कार्य ईमानदारी से करो, छोड़ देना तो
- 1:01:56छोड़ देना, जियो तो ऐसे जियो जैसे शब्द तुम्हारा मरो तो ऐसे मरो।
- 1:02:06जैसे तुम्हारा कुछ भी बस ऐसे मर जाना, मानसिक रूप से तृष्णा के
- 1:02:12रूप में ये मेरा कुछ नहीं और अंत में मेरा कुछ नहीं इसकी भावना
- 1:02:21प्रबल होते होते जब आपको अंतिम। जिसके साथ मोह था।
- 1:02:26जिसे हम शरीर का अपनत्व कहते हैं वह छोड़ने में कष्ट नहीं होता।
- 1:02:35यही छोड़ना दान के द्वारा हमारे ऋषियों ने समझाया दान करने में
- 1:02:42कोई बोलने वाली बात नहीं होती। दान करने का मतलब था कि हम अपनी
- 1:02:49पकड़ की आदत को छोड़ें। कैसे शुरू कहाँ से करें, तो दान
- 1:02:54धन को छोड़ने की पकड़ को शुरू कर दो, जहाँ से शुरू कर दो वस्तुओं
- 1:03:00को बांटना शुरू कर दो। इसलिए अलग अलग हमने मुहूर्त बनाई।
- 1:03:08यह सोमवती अमावस्या है, यह भूमवती अमावस्या है।
- 1:03:12यह कुंभ का मेला है। यह ग्रहण लगा है तो बांटो।
- 1:03:18बांटने का महज एक ही प्रवचन था। कि आपको छोड़ने की आदत पड़ जाएगी
- 1:03:25और अगर छोड़ने की आदत आपको पड़ गई और यह आदत अपनी चर्म सीमा तक
- 1:03:32पहुँच गई तो फिर आप अपनी भ्रांति को भी छोड़ दोगे, जो सबसे बड़ी
- 1:03:38भ्रांति है। जीस दिन आपने उस भ्रांति को छोड़
- 1:03:42दिया आपने वो अत्यंतिक मंजल पाटी छोड़ दो, अपने आप तक पहुंचने के
- 1:03:55लिए छोड़ दो, बाहर की पकड़ छोड़ दो।
- 1:04:01अपने अंत तक पहुँचने का प्रयास मूर्खता के अलावा और कुछ भी नहीं
- 1:04:09क्योंकि तुम अपने आपको कभी छोड़े थे ही नहीं।
- 1:04:13तुम सदा ही अपने पास रहे हो। जगते हो या सोते हो, अपने स्वभाव
- 1:04:19को छोड़ सकते ही नहीं। इसलिए ये परिकल्पना कभी मत करना
- 1:04:26कि हम अपने आपको छोड़ दिए हैं। नहीं नहीं।
- 1:04:30जब तुम रात को सोए थे तब भी तुम तुम्हारा आपा नहीं छोड़ पाए।
- 1:04:36चाहते हुए भी जो छोड़ा न जा सके वो होता है अपना आपा तो इसको तो
- 1:04:43तुम छोड़ नहीं पाते और तुम पूछते हो ये बात बार बार और क्योंकि ये
- 1:04:49प्रश्न सभी का है फिर तुम। बाहर की पकड़ के कारण ही अपने आपे
- 1:05:01को याद नहीं रख पाते हैं। यही समस्या है।
- 1:05:05इसी को गुरजियाफ ने कहा, रेमेम्ब्रेंस अभी आप नॉन
- 1:05:12रेमेम्ब्रेंस में हो। अभी आप भोले भोले से फिर रहे हो
- 1:05:18भोला भोला, फिर जगत में कैसा नाता रहे यह भूलने को यादास्त में
- 1:05:30बदलो, सेल्फ रेमेम्ब्रिंग में बदलो।
- 1:05:34कैसे बदलोगे? ये जो पकड़े हैं आपको जाने नहीं
- 1:05:40देती इन पकड़ो को छोड़ दो, खुद तक पहुंचने का इच्छा मत करो।
- 1:05:52क्योंकि खुद को तो तुम कभी त्याग सकते ही नहीं इट इस इम्पॉसिबल
- 1:06:00लेकिन बाहर की पकड़ों को आप छोड़ सकते हो आपके हाथ में वह तो असंभव
- 1:06:07है अपने आप को छोड़ा तो कभी जाता है।
- 1:06:11बाहर से जो पकड़ा था उसको तुम छोड़ सकते हो जहाँ जहाँ भी आपकी
- 1:06:19पकड़ है आपको पता है देखो परखो उसको छोड़ो, एक एक करके छोड़ो।
- 1:06:29इन सभी पकड़ो को छोड़ देने से क्या होगा?
- 1:06:341 दिन धर्म से तुम अपने स्वभाव में पटक दिए जाओगे।
- 1:06:40जब आखिरी पकड़ छोड़ दी गई तो तुम पाओगे आह क्या आनंद है?
- 1:06:50क्या खुमारी है, क्या सुगंधी से भरा हुआ ये गुलशन है बाहर ही बाहर
- 1:06:59है, अमृत ही बरस रहा है कबीर कहते हैं नाचो, नाचो, शीशो नाचो।
- 1:07:08अमृत बरस रहा है और शिष्य नाचते हैं लेकिन नाचते हैं, सिर्फ नाचते
- 1:07:15हैं, सिर्फ अक्टिंग करते हैं। कबीर के भीतर अमृत बरस रहा है।
- 1:07:29वह कोई नाटक नहीं करता, शिष्य नाटक करते हैं क्योंकि अमृत नहीं
- 1:07:35बरसा, मीरा के अमृत बरसा। नानक के अमृत बरसा, कबीर के अमृत
- 1:07:45बरसा और तीनों ने अमृत को आपके ऊपर बरसाया ज़रा बताना तो मीरा ने
- 1:07:54नाचने का आपसे कुछ दाम लिया। कबीर अपने घर से खाना खिलाकर वापस
- 1:08:03भेजते हैं। लेते आपसे कुछ नहीं तो कबीर ने उस
- 1:08:09प्रभु का गुणगान आपको सिखाया तो आपसे कुछ दाम वसूला।
- 1:08:15नानक ने मधुर स्वर में अपने वाणी के शब्द।
- 1:08:19आपके हृदय के भीतर जंकृति की है, उसने आपकी कोई फीस मांगी तो इस
- 1:08:28बात को आप कसौटी पर कस लेना अभी एक नए भगवान जन्मे।
- 1:08:39वो कहते हैं कि मैंने सारा सृष्टि का निर्माण किया है, मैं हूँ
- 1:08:44ब्रह्म और मुझे आश्रम बनाने के लिए तुम्हारे पास जो है 1000 2000
- 1:08:52करोड़ रुपया वो दे दो पांच 7000 भी चलेगा।
- 1:08:59तो मैंने कहा, भाई जब सारी सृष्टि का निर्माण कर दिया तो फिर आश्रम
- 1:09:06का विनिर्माण कर लो, वो आश्रम का निर्माण लोगों की जेबें खाली करा
- 1:09:14के करो। जब तुम सृष्टि करता हो, जब तुम
- 1:09:19ब्रह्म हो, तो सारी सृजना तुमने रच दी तो आश्रम भी तो रच दो।
- 1:09:30विश्वामित्र ने स्वर्ग का निर्माण कर दिया था।
- 1:09:36तो अगर तुम भगवान तो अपने लिए आश्रम का निर्माण दूसरों से मांग
- 1:09:44के क्यों करते हो? दूसरों की जेबों को खाली कर यहाँ
- 1:09:53से पोल पत्तियाँ खुलती हैं। जो आपको प्रभु गीत सुनाने का हराम
- 1:10:02कथा सुनाने का मुआवजा वसूल करता है।
- 1:10:08समझ लेना वो ढोंगी है, पखंडी है शास्त्र बढ़कर।
- 1:10:13आपको सुनाए होंगे। वोकबुलरी बहुत है, समझ बहुत है
- 1:10:19बुद्धि बड़ी तीक्षण है, कवि है माना लेखन संत ऋषि में और कवि में
- 1:10:30यही फर्क है। ऋषि बांटता है बे शर्त और बांट कर
- 1:10:35खुश होता है और कभी कभी बांटता है शे शर्त और बांटकर खुश नहीं होता
- 1:10:45खुश ये होता है कि आप से मुआवजा वसूल।
- 1:10:51इतनी संगोष्ठियों को संबोधित कर दिया।
- 1:10:54इस बात पे खुश होता है। हमने इतने प्रोग्राम तय किए।
- 1:10:59ये किशोरियां ऐसा ही करते हैं। ये शिविर लगाने वाले ऐसा ही कुछ
- 1:11:05करते हैं। किस किस की बात को उगाडूं?
- 1:11:11बर्बाद गुलशन करने को बर्बाद गुणसत्ता करने को बस एक ही और
- 1:11:19लुका से था। हर शाख पे बोलू बैठा है।
- 1:11:29हर शाख पे उल्लू बैठा है, अंजाम है गुलस्ता क्या होगा?
- 1:11:35बच सकते हो तो बच जाओ फख्त है जब जागो।
- 1:11:45तब सभी रहा ये कसौटियां मैंने बदला जो तृप्त हो गया वो मांगता
- 1:11:53नहीं इसको हृदय में लिख लेता है जो तृप्त हो गया वो मांगता नहीं।
- 1:12:06और जो मांगता है, वह अभी अत्यन्त है।
- 1:12:13इन दो शब्दों को हृदय में उतारे उतारे, आप जगत में सभी कामों को
- 1:12:21करते रहें। जो तृप्त हो गया, वह मांगता नहीं।
- 1:12:27उसकी मांग खत्म हो गई और जो अभी मांग रहा है वो तृप्त नहीं होगा।
- 1:12:34वो अत्रप्त है इन दो शब्दों को। अपने हृदय में उतार लेना और मुझे
- 1:12:43अज्ञात है धन्यवाद।