Latest / Baba ji Vijay Vats / 10 Nov 25 - हुक्म की रजा में रहो चेतना जागृत होगी, आत्मा मुक्त होगी! चेतना और आत्मा की अद्भुत यात्रा! Baba Ji Vijay Vats Satsang
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- 0:03परम बाबा जी कर्ण सिंह मध्यप्रदेश से बाबा राजनीति करने वाले लोग।
- 0:28नफरत क्यों फैलाती? प्रेम का विरोध क्यों करते हैं?
- 0:43बड़ा सुंदर सवाल है पुत्र? ईशा ने कहा, प्रेम करो लव इस गॉड
- 1:03राजनीतिज्ञों को भय नहीं राजनीतिज्ञों ने सूली दे दी।
- 1:15हाथो पांव में केले काटनी है, उसे मारती है।
- 1:28राजनीतिक व्यक्ति कौन होता है? अहंकारी व्यक्ति राजनीतिज्ञ होता
- 1:42है, दूसरी को अगर प्रेम करने की इजाजत देते है तो दूसरे मिल
- 2:01जाएंगे वापस। लव करियर्स यूनाइटेड प्रेम एकता
- 2:13पैदा करता है और जब इकट्ठे हो जाएंगे।
- 2:22तो इनको राज़ करने को देगा। इसलिए राजनीति करने वाले लोग नफरत
- 2:31फैलातें हैं। सीधा सीधा असोल समझ लेना।
- 2:41नफरत फैलावोगे डिवाइड हो जाएंगे नफरत मूल फार्मूला है नफरत
- 2:56फैलावोगे डिवाइड हो जाएंगे। डिवाइड हो जाएंगे तो लड़ेंगे,
- 3:11लड़ेंगे तो तुम बिचोल गिरी करोगे। बिचोल गिरी करोगे तो तुम्हारी
- 3:18कीमत बढ़ेगी। इतना सा माजना होता है।
- 3:24हर राजनीतिक का सब अहंकार की तरकीबें है।
- 3:35अहंकार दिखाना चाहता है मैं भी हूँ अहंकार दिखाना चाहता है अपनी
- 3:44मौजूदगी को मैं भी हूँ इसलिए बुद्ध ने।
- 3:57बुद्ध को एक नाम दिया गया तथागत अपनी मौजूदगी का एहसास नहीं
- 4:05करवाया। बुद्ध ने तथ जैसे आए आगत आकर चले
- 4:13गए। कोई हवा का झोंका यह न बता सका कि
- 4:21बुद्ध आए भी थे, यकीन नहीं जैसे आए वैसे चलेगा।
- 4:34इस तरह की प्रवृत्ति के लोग जो असली राज़ है वो करते हैं, राज़
- 4:45भी दो प्रकार के होते हैं। ध्यान से समझ लेना इन शब्दों को
- 4:56एक राज़ होता है हुक्म चलाना, ऑर्डर करना।
- 5:10इनकी उंगलियां लंबी होती है। एक राज़ होता है हुकुम चलाना
- 5:25रुकोम चलाने वाला व्यक्ति। कभी आनंद की झलक मान नहीं सकता,
- 5:34पा नहीं सकता। वह रोता हुआ ही पैदा हुआ, रोता
- 5:43हुआ ही जाएगा। राजनीतिज्ञों का अंत यही होता है।
- 5:51अहंकारियों का अंत यही होता है जो अपनी मौजूदगी का एहसास करे और जो
- 6:02अपनी मौजूदगी का एहसास ना करे। होता है गैर राजनीति का वह चुपके
- 6:13से आता है। अपने संग हवाओं की तरह सुगंध
- 6:19लिया। और हवाओं की तरह चला जाता है
- 6:25सुगंध बिखेरकर यह भी राज़ करना है जिन हवाओं के भीतर सुगंध बड़ी
- 6:36बड़ी है। पहले तो उन सुगंधों का आनंद हवा
- 6:42खुद लेती है। फिर वो बहती है।
- 6:47जब बहती है तो वो सुगंध बंट जाती है और किसी को पता भी नहीं चलता।
- 6:54हवा का झोंका सुगंध मान झोंका। आया था और चला गया।
- 7:03ऐसे भी लोग धरती पे हुए जैसे बुध हुए तथ आगत ऐसे ही अलेक्जैंडर
- 7:14पोप। उनकी कविता मैक्सर बोला कर बिलकुल
- 7:27राजनीतिज्ञों से 36 का आंकड़ा उलट।
- 7:33लेट मी लाइव उनसीन अन्नोन मुझे ऐसे रहने दो, संसार में तो मुझे
- 7:41कोई देखे भी लेकिन पहचान न पाए। लेट मी लाइव उनसीन अन्नोन मुझे
- 7:51देख कर भी। जान न सके यह कौन जैसे आए, वैसे
- 8:00चले गए एंड उनले मेंट लैट में डाल और मुझे मर जाने दो इस तरह।
- 8:14कि मेरे मरने पर कोई दो अश्क ना बहाये कोई शोक ना करे कोई देश
- 8:25अपना झंडा ना झुकाए। माटी से आया था और माटी में ही
- 8:33गफन हो जाऊं बिना किसी को पता है यह भी जिंदगानी होती है लेकिन
- 8:41इनका फर्क समझे उनका बात है लेट मी लाइव।
- 8:47उनसीन अन्नोन एंड अनलिमिटेड लेट मी दा स्टील फ्रॉम दी वर्ल्ड एंड
- 8:53नॉट ए स्टोन मैं संसार से चुरा लिया जम स्टील फ्रॉम दी वर्ल्ड।
- 9:04एंड नॉट ए स्टोन कोई शिला लेख बता न सके नॉट ए स्टोन टेल्वराय ला कि
- 9:15मेरी कवर गाह कहाँ है मैं ऐसे जीव और ऐसे मर जाऊं?
- 9:22अंकारी व्यक्ति कहेगा ये भी कोई जी न हुआ जब तक छ छलांग न कर लूँ,
- 9:35जब तक दिखावे वह जी न कर लूँ। मेरे होने का कीड़े मकोड़ों को भी
- 9:41पता चल जाए कि कोई होगा था और ऐसे धूम धड़ाका करके जाऊं के आने वाली
- 9:55जेनरेशन कहे कि कोई पाया था? ये लोग रोते ही आते हैं, रोते ही
- 10:05चले जाते हैं। जैसे आपने देखा जागरण में लोग आते
- 10:10हैं, तुम्हें नहीं पता बहुत से। भगत तो इसीलिए आते हैं कि सुबह
- 10:20उन्हें प्रशाद मिलेगा। बस वो एक प्रशाद और एक का परिचय
- 10:28के लिए सारी रात भौंकते रहते हैं कितनी सी आकांक्षा है?
- 10:39बिल्कुल ऐसी ही अंतकक्षा राजनीतिक लोगों की होती है।
- 10:47आते हैं, चले जाते हैं कि मुझे आने वाली पीढ़ियाँ याद रखें के
- 10:53कोई आया। और याद कोई किसी को रखता नहीं।
- 11:01कौन याद करता है पूरी जिंदगानी राजनीति का गुजार देते हैं सिर्फ?
- 11:22इस छोटी सी बात के लिए कि मुझे लोग याद रखें के में आया था, ज़रा
- 11:35ध्यान से सोचिएगा, किन्हीं फुर्सत के लम्हों में।
- 11:42किसी एकांत घर के कोने में बैठ जाना, शांति से प्रेम से सोचना।
- 11:54अगर मरने के बाद 21 तोपों की सलामी मिली तो सुने का कौन?
- 12:05यहाँ बहुत से लोग हैं जो व्यक्ति जब मर जाता है जब उसकी इंद्रियां
- 12:12प्रकृति सर्जरी करनी शुरू कर देती है कानों से, आँखों से, मुँह से।
- 12:20सारे शरीर के ऑर्गन से अपना कनेक्शन काट लेती चेतना प्रकृति
- 12:28इतनी बड़ी सर्जरी करते है और आप कहते हो कि गीता के अठारहवें
- 12:40अध्याय का पाठ सुना दो। आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक
- 12:55कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक आह को चाहिए एक उम्र असर
- 13:03होने तक। कौन जीता है तेरी?
- 13:08जुल्फ के शर्म में धक्का वो 21 तोपों की सलामी जो तुम सुन न
- 13:20सकोगे उसके लिए तुमने जीवन बेकार कर दिया है।
- 13:26तुम्हारा नाम शिलालेखों पर लिखा रहा है, भला इससे तुम्हें क्या
- 13:34फायदा होगा? जाने वाला चला गया शिलालेखों पर
- 13:46तुमने लिख दिया तुम याद भी करोगे। राम को याद करते हो, कृष्ण को याद
- 13:55करते हो, अजरत को याद करते हो, उसे कोई फर्क पड़ता है और
- 14:03उन्होंने अच्छे काम इसीलिए थोड़े किये थे।
- 14:06मर्यादाएं इसलिए थोड़ा बांधी होती हैं कि उनका नाम जबा जाए।
- 14:13फिर तो वो लोभ ही लालची स्वार्थी हो गए।
- 14:23उन्होंने तो सिर्फ बांटा था अपना प्रेम का संदेश राम ने मर्यादा
- 14:32बांधी, प्रेम बांधा, कृष्ण ने प्रेम बांधा मिठी वणसरिया की धुन
- 14:42से। हजरत ने प्रेम बाटा एकता पाठ
- 14:55लेकिन आए तुम उनका नाम लेते हो ज़रा सोचियेगा।
- 15:02एक अकेले कमरे में बैठकर एकांत में सोचियेगा आज तुम्हारी प्रशंसा
- 15:10करने से क्या फर्क पड़ेगा कृष्ण को, राम को, अदरक को?
- 15:21आज तुम नाम लोगे ईशा का, शुक्र टीस का मीरा का जिनको ज़िन्दगी
- 15:32में तुमने रुला के तड़पा के मार दिया कौन जीता है तेरी जुल्फ के
- 15:40सर होने तक? आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक
- 15:50ज़िन्दगी वो जो जीते जी लूतफ उठा ले इसे फिर सुन लीजिए ज़िन्दगी
- 15:59वो। जो जीते जी लुतफू उठा ले अन्यथा
- 16:05अच्छे बच्चे पैदा मत करना जो आग के मरने के बाद किसी दूसरे
- 16:10ब्राह्मण को श्राद्ध खिलाएं। ऐसे बच्चे नालायक हुआ करते हैं।
- 16:19जो जीते ही अपने माँ बाप को पानी ना दे, वृद्धावस्था के दर्द की
- 16:30बिमारी की दवा न ला के दे। आराम से जीने का प्रबंध न करें
- 16:43ऐसी नालाय कोलादों से तुम समते हो कि जो श्राद्ध करे, मरने के बाद
- 16:54वो सुपात्र हैं नहीं। वो कुपात्र है, इन श्रद्धाओं की
- 17:01परंपरा ने तुमसे जीने का मोह छीन लिया ज़िन्दगी जीने के लिए है ना
- 17:15के नाम कमाने के लिए? ज़िन्दगी जीने के लिए है न कि धन
- 17:24कमाने के लिए क्योंकि जो तुम कमाते तुमने देखा संग नहीं जाता
- 17:33किसी के। शंक किया जाता, तुम्हारा समाज
- 17:43कहता, तुम्हें लोग याद करेंगे मरने के बाद अच्छा था, कितने दिन
- 17:48कहेंगे और कौन कहता है किसे गरज, बढ़िया?
- 17:55तुम्हारे बाल बच्चे भी तो तुम्हें अच्छा नहीं कहते?
- 18:00तुम लोगों की बात करते हो, दूसरों की फिक्र मत करना।
- 18:13तुम अपनी फिक्र करना तुम ज़िन्दगी को जीना शहंशाह किस तरह जीना
- 18:22तुम्हारी ज़िन्दगी के आनंद को देख कर शहंशाह।
- 18:28सम्राट शर्मा जाएं ऐसी जिंद की जीना, बुद्ध जैसी ज़िन्दगी जीना
- 18:36महावीर जैसी जिंद की जीना, कृष्ण जैसी, जिंद की जीना, कबीर नानक
- 18:41जैसी जिंद की जीना मेरा जैसी जिंद की जीना।
- 18:45तुम ज़िन्दगी के मसले में स्वार्थी हो जाना, ज़िन्दगी जीना,
- 18:50आनंद के लिए और आनंद दूसरे को दिया नहीं जाता, समझे न बात को
- 19:00दूसरों को सुविधाएं बांटी जा सकती हैं।
- 19:05नंगे पांव वालों को सर्दी न लग जाए तो मोजे दे दोगे सर्द हवाएं
- 19:14उसकी छाती को चीर कर बाहर न निकल जाए, तुम उन्हें गर्म स्वेटर दे
- 19:19दोगे, ओवर कोट दे दोगे? भूखा न मर जाए, तुम्हें उन्हें
- 19:27आनंद दे दोगे, आनंद दे दोगे, लेकिन एक बात याद रखना तुम आनंद
- 19:38किसी को न दे सको, आनंद ऐसी चीज़ नहीं।
- 19:45जो दूसरों को ट्रांसफर किया जा रहा है।
- 19:49इसी भ्रम में दुनिया मारी गई। मेरे पास रोज़ लोग आ जाते हैं।
- 19:58बाबा थोड़ा सा आनंद में भी दे दो इनका पुत्र।
- 20:06ये तुम्हारे पंडितों, पुरोहितों की चाल है।
- 20:15तुम ज़रा देखो कोई दर्द से कराह रहा है अस्पताल में।
- 20:24क्या वह तुम्हें दर्द दे सकता है? थोड़ा सा निकाल के तुम कह दो कि
- 20:29भाई आधा दर्द मेरे को ट्रांसफर कर दो घुटके मर रहा है कोई तुम उसे
- 20:43कहते हो कि ये दर्द मुझे दे दो थोड़ा हल्का हो जाएगा।
- 20:47तुम बाहर तो हल्का कर सकते हो, दर्द हल्का नहीं कर सकते, तुम
- 20:58सुविधा की सामग्री तो दे सकते हो, सोने के लिए पलंग और वस्त्र दे
- 21:05सकते हो। ओढ़ने के लिए कपड़े दे सकते हो,
- 21:10मोजे दे सकते हो, ठंडा पानी पला सकते हो, लेकिन तुम आनंद नहीं दे
- 21:17सकते किसी को यह असंभव है। इसीलिए संतो को बार बार आना पड़ता
- 21:26है अन्यथा उनकी वश चले। जैसे तुम किसी को दर्द नहीं दे
- 21:33सकते। लाचार दर्द मांगने वाला तुमसे
- 21:39कहता है कि लाओ मुझे दर्द दे दो। लेकिन सभी असमर्थ हैं, डॉक्टर भी
- 21:47असमर्थ तुम भी असमर्थ कैंसर से दर्द दिखाता हुआ व्यक्ति हाय हाय
- 21:55कर रहा तुम कहते कि लाओ थोड़ा दर्द मुझे दे दो, वह मजबूर है।
- 22:02चाहेगा भी तुम्हें ट्रांसफर न कर सकेगा।
- 22:08बस आनंद बिलकुल ऐसी ही चीज़ है अगर कोई कल को ऐसा कहे दर्द होता
- 22:16ही नहीं, आनंद होता ही नहीं। ये मूढ़ता की बातें परमात्मा आनंद
- 22:29ही तो है। इसका नाम बिगाड़ लिया गया झूमो
- 22:36नाचो गाओ। यही तो आनंद है खाओ पियो मौज करो
- 22:44ऐश नहीं मौज करो मौज और ऐश में बड़ा फर्क है ऐश करती हैं
- 22:54तुम्हारी अंद्रिया मैंने तुम्हें समझा है मौज करते हो तुम।
- 23:00मौज आनंद का दूसरा नाम है आई मौज फकीर की दई झोंपड़ी फूंक जब आनंद
- 23:10में होता है मस्ती के आलम में संत फकीर।
- 23:16इतना उमड़ घुमड़ जाता है गगरिया भर जाती और छलकने लग जाता।
- 23:22वो रस जिसे आनंद कहते हैं, उसे मोज कहते हैं वह छलकता हुआ आनंद
- 23:32का रस उसे कहते हैं मोज। और जो भोगती हैं तुम्हारी
- 23:39इन्द्रियाँ और बाद में दुख पाती हैं।
- 23:41उसे कहते हैं, ऐश चुनना तुमने है, तुम कुछ भी चुन लो।
- 23:51एक व्यक्ति कहता है कि मेरे मरने पे 2,00,000 लोग आ जाते हैं।
- 23:56क्या हो जाएगा 2,00,000 लोगों को तुम पहचान पाओगे क्योंकि तुम सेंस
- 24:05में नहीं हो, तुम बेहोश हो प्रकृति मरने के वक्त तुम्हे
- 24:11एनेस्थीसिया दे देती है बहुत भारी।
- 24:16तुम देखते हो पहचान नहीं पाता डिस्कनेक्ट कर देता है तुम्हें
- 24:24संसार से, क्योंकि उसने एक भारी ऑपरेशन करना होता है।
- 24:32तुम्हारा सारा सामान, तुम्हारे जीवन भर के कर्म, तुम्हारी
- 24:35स्मृतियाँ, तुम्हारी लालसाएँ, तुम्हारी वासनाएँ, तुम्हारी
- 24:40स्मृतियाँ, तुम्हारी कल्पनाएँ तुम्हारी योजनाएँ।
- 24:47जो तुम्हारे सुपर सेंसिटिव कंप्यूटर में फेड हुआ।
- 24:51आज तक प्रकृति उस सारी की पोटली को इकट्ठा करती है और तुम्हारे इस
- 25:00शरीर के सभी कनेक्शन्स को काट के तुम्हारे देय ही को।
- 25:06अगले जन्म के लिए ले जाते हैं। उस वक्त तुम्हें इक्की तोकों की
- 25:14सलामी देने का फायदा क्या है उस वक्त तुम्हें गीता सुनाने का
- 25:24फायदा क्या है? मरते हुए व्यक्ति को कुरान, बाइबल
- 25:32ग्रंथ, गीता सुनने का फायदा क्या है, जब वह सुन नहीं सकता?
- 25:42वि। योगी राम राम जपले अभि फिर भी तो
- 25:48राम राम होती है लेकिन वि योगी राम राम जपले अभी अभी जपले राम
- 25:57राम वो तुम जपोग। फिर भी तो राम राम होती है फिर वो
- 26:04राम राम दूसरे जपेंगे इससे पहले के दूसरे जपें तुम खुद ही जपलो
- 26:14इतना फर्क है बात राम राम की ही है।
- 26:20जब राम राम हो जाती है तो फिर लोग जागते हैं।
- 26:25राम, राम और तुम जीते जी राम राम जागते हो और तुम्हारा अपना आनंद
- 26:34का पुरस्कार है। हुकुम दो तरह के होते हैं एक
- 26:48हुकुम करण संत कहते हैं, उस हुकुम करने में दुख मिलता है मेरी बातों
- 26:57को बड़े ध्यान से सुनना। हो सके तो अपने अंतर में उतार दे।
- 27:11अगर बात तुम्हारे हृदय के पार उतर गई तो बस तुम्हारे कई जन्मों का
- 27:19क्लेश मिट गया। द्वंद खत्म हुआ दुविदा खत्म हो
- 27:24गया। दो ही खत्म हुई और एक पर वो जब एक
- 27:32हो जाता है तो रस बिखरता है। चार।
- 27:43हुकुम दो तरह के होते हैं बड़े मज़े की बात है, एक हुकुम तुम्हें
- 27:53दुख में ले जाता है, एक हुकुम तुम्हें परम सुख में ले जाता है।
- 28:03हुकुम करना तुम्हें महा घर नर्क में ले जाता है।
- 28:12हुकुम करना तुम महा नर्क में जाने का रास्ता।
- 28:19बना लेते हो हुकुम कर्क और वो ही हुकुम, अगर तुम मानने लग जाओ तो
- 28:30तुम परम स्वर्ग के द्वार खोल लो। और बाबा कहते हैं, चलते तो सभी
- 28:39हुकुम नहीं, हुकुम से बाहर कोई चलता नहीं उसका अर्थ क्या है,
- 28:51उसका अर्थ था कुछ और ले लिया तुमने कुछ।
- 28:59जो हुकुम दुख में ले जाए वो रस्ता शुभ नहीं जो हुकुम आनंद में ले
- 29:12जाए। वह हुकुम का रास्ता शो गया है।
- 29:20हुकुम करने का रास्ता तुम्हें दुख में ले जाता है।
- 29:26इसलिए सन्तों ने तुम्हें ये शब्द कहा।
- 29:33क्योंकि वैसे तो तुम इतने गहरे जा न सकोगे।
- 29:40इस तरह से सरल शब्दों से तुम्हें समझाने की चिष्ट एक हुकुम तुम्हें
- 29:47दुःख में ले जाता है, वो है हुकुम कर्ण।
- 29:52हाकम सदा दुखी रहता है। उसका दिखावा उस फूल की भाँति है
- 30:02जो कि किसी फैक्टरी में निर्मित हुआ है।
- 30:07ना भीतर खुशबू है ना कली। ना पंखड़ियां ना तने, ना पत्ते।
- 30:16उसके छाती के गर्व को फाड़ के नहीं आया और जो खुशबू है वो भी
- 30:23तुमने बाहर से स्प्रे करके उड़ा ली यह नकली है।
- 30:33एक हुकुमबो जो धरती की गर्भ को पार किया है, असली पत्ते असली तने
- 30:46धूप में क्लोरोफिल का निर्माण किया।
- 30:49धूप में खिली बांछ कली फूल बन गई और उस सुगंध पे आपने देखा कभी गौर
- 31:01करना जो प्लेस्टिक के फूल होते हैं।
- 31:07उन्हें शायद मनुष्य न पहुंचा सके। जानवर पहचान लेते हैं बाबरा पहचान
- 31:17लेते हैं बाबरा कभी भी नकली फूल के ऊपर जब तुम सुगंध।
- 31:25छिड़क तो होंगे भाबरा उसके ऊपर नहीं आएगा तुम देखना पहचान करके
- 31:32भाबरा सदा ही उस पुल पे जाएगा जो धरती माता की कोख से आया है।
- 31:41जो तुम्हारी फैक्टरी में बना उसके ऊपर तुमने सुगंधित।
- 31:45इतर छिड़क दिया। उसके ऊपर भंवरा नहीं आएगा, यह
- 31:49पहचान तो मैं बता देता हूँ। माँ के गर्भ से आया हुआ बच्चा
- 32:03सच्चा जीवन होता है। कलियों ने घूँघट खोले, हर फूल पे
- 32:19घँपरा दो ले, कलियों ने घूँघट खोले।
- 32:28हर फूल पे भरा ढोल के आया प्यार का मौसम गुलजार का मौसम।
- 32:46कलियों ने घूंघट खोल हर फूल पे बंपरदो ये पहचान है असली हो कम।
- 33:06हुकुम अगर तुम उस विश्वरूप सज्जन हारे का हुकुम मानते हो तो फिर
- 33:16प्यार का मौसम आएगा, प्यार खिले का और प्यार वह है जो बारिश।
- 33:25प्रेम की बारिश तुम्हारे डाल डाल पात पात को नहला जाती है, सारी
- 33:35मलिनता उतर जाती है। तुम्हारे पत्ते तुम्हारे डालें,
- 33:39तुम्हारे तने हरे भरे हो जाते हैं, तुम्हारे फूल रंगत पकड़ जाते
- 33:44हैं। वह असली प्रेम वह आता है हुकुम
- 33:54मान्यता हुकुम करना तो बिल्कुल वही।
- 34:02जो फूल फैक्टरी में बना पत्तियाँ तनी फैक्टरी में बने, उसके ऊपर
- 34:07तुमने फैक्टरी में बना हुआ इदर शर्ट किया वह नकली है?
- 34:18भाई तुम्हें खुशबू दे सकता है, भ्रम डाल सकता है भंवरे को भ्रम
- 34:22नहीं डाल सकता भंवरा कभी उस फूल पे नहीं आएगा संत एक भंवरे की तरह
- 34:29होता है। संत को खींचता है असली फूल की
- 34:36सौगंध। संत को चाहिए मद्भूषी का वो
- 34:49जिसमें वो आनंदित हो सके जिसमें वो छलांगें लगा सके।
- 34:56अठखेलियां कर सकें खेल सके जीस आनंद के साथ वो गच मच हो सके।
- 35:06संत को वह चाहिए सदा दिवाली सादकी आठों पहर आनंद एक पल भी वो।
- 35:16आनंद के बिना नहीं गुजारता। यह संत की खुराक है और असंत की
- 35:25खुराक क्या है? असंत का दुर्भाग्य है।
- 35:34तुमने अभी तक अपने इतने जीवनों में आनंद की एक झलक कभी नहीं
- 35:41देखी। इसे मैं इसलिए पक्के तौर पर कह
- 35:47सकता हूँ कि जिसने एक बार की आनंद की झलक देख ली।
- 35:55वह नकली फूलों के ऊपर मंडराएगा ना धन इकट्ठा करेगा, ना पदवियां, ना
- 36:03डगरियाँ, ना सूचना, ना ना गद्दियाँ।
- 36:09वह असली मँवरा हो गया। संत असली भँवरा है असंत नकली
- 36:22भँवरा है वह उस भूल के ऊपर जायेगा।
- 36:31जो फैक्टरी मेड है वह उस इतर पे जाएगा जो मेन मेड है, लेकिन उसके
- 36:44भीतर जीवन का रस नहीं होगा। जो फूल बना, पत्तियाँ बनीं, तना
- 36:54बना फैक्टरी में उसमें जीवन का रस नहीं होता और जो छाती पाढ़ के आया
- 37:07गर्भ को पाढ़ के आया माता के। धरती माँ के उसका तना भी जीवंत
- 37:15होगा। अक्सर मेरे पास द्वन्द आ जाता है।
- 37:24संत कहते हैं। जो करता है परमात्मा करता है,
- 37:31तुम्हारे वाले के लिए करता है तो फिर हमारी स्वतंत्र सत्ता क्या रह
- 37:39जाती है? बाबा इस दुविधा से निकाली।
- 37:54आप बोलें कृष्ण बोले लावजे बोले कोई बोले लेकिन हमारी दुविधा
- 38:02मिटती नहीं, हम मान लेते हैं बस। कि जो आप कहते हो ठीक कहते हो,
- 38:09नहीं मालूम मत ठहरों मैं इस राज़ को आज खोल देता हूँ, थोड़ा ठहरों
- 38:27संत करुणामान है, संत नहीं चाहता हूँ।
- 38:31तुम दुखी हो संत चाहता है तुम खुश रहो, खुशहाल रहो, तुम्हारी आत्मा
- 38:44जूमे आनंदम। तुम्हारी शूरती व्रती पिए आनंद के
- 38:53रस को नाच गाय अब सुनिए इसका जो भाव हमारी स्वतंत्रता सत्ता कहा
- 39:06गई प्रभु। कहीं नहीं गई पुत्र जो बात संतो
- 39:13ने आप के भले के लिए छुपा के रखी ये भी कल जो मैंने विविषा ग्रंथी
- 39:21की बात कही। बार बार सभी संतों ने दोहराया,
- 39:27जानते हुए कि तुम्हारी स्वतंत्र सत्ता है तुम करना करने के लिए
- 39:40स्वतंत्र हो कुछ भी करम। आज तुम्हारी यह बुनियादी भ्रांति
- 39:49पर टूट जाएगी। तुमने कोई भी शास्त्र पढ़ा, दो
- 39:54बातें मिलेंगी तुम्हे जो करता है, परमात्मा करता है और भले के लिए
- 40:00करता है। उसी शास्त्र में लिखा होगा
- 40:05कर्मण्य वाधकार तू कर्म कर कर्म करने में तू स्वतंत्र है, कहीं
- 40:15कोई तुक नहीं बनती। कहीं कोई गांठ नहीं जोड़ती, कहीं
- 40:22कोई मेल नहीं होता, धागे का बिखरा बिखरा सा रह जाता है आप योग कीजिए
- 40:31न प्रभु हमें इस दंड से निकालिए न प्रभु।
- 40:39लो पुत्र, मैं तुम्हें इस संभ्रम से भी निकाल देता हूँ।
- 40:45संत महा करुणाबान है जैसे आप अपने बच्चों के प्रति महा करुणाबान
- 40:51होता है, कुछ चाहिए या नहीं, लेकिन तुम अपने बच्चों का मल
- 40:58मूत्र भी करते हो। स्नान भी करवातें हैं, देख रेख भी
- 41:02करते हैं। उसके लिए झूठ कफर भी तोलते हैं।
- 41:06सब कुछ करते हैं लेकिन करते क्यों हो बच्चे के भले के लिए?
- 41:22सभी शास्त्रों में आपको दो बातें मिलेंगी।
- 41:32दुख दीनें दुख होता है सुख दीनें सुख गोय।
- 41:42चार वेद छः शस्त्र में वात में लगता है, दो चारों वेदों छः
- 41:49शस्त्रों में दो वात ही मिलती है, पढ़ लू सारे निचोड़ निकलेगा यही
- 41:57चार वेद छः शस्त्र में वात। मिलत है दो दुख दी ने दुख होते
- 42:05हैं सुख दी ने सुख और संत फिर कहता है लावजे परमात्मा जो करता
- 42:12ठीक करता और ठीक ही नहीं तुम्हारे भले के लिए करता हूँ।
- 42:20तो तुम्हारी बुद्धि इस बात से सामंजस्य कर नहीं सकती।
- 42:24नहीं बाबा जी कैसे है तुम्हारी बुद्धि की समझ में आता नहीं लो
- 42:32मैं तुम्हें समझा देता हूँ बेटा आज तुम्हारे ये बंधन भी टूट
- 42:38जाएंगे। संत महा करूणावान है माता पिता की
- 42:47तरह परमात्मा की तरह दाता दे लंदा थक पा जुगा जुगांतर खाई ख।
- 43:03संत तुम्हारा हित चाहता है, संत चाहता है कि एक पल के लिए भी
- 43:10तुम्हारे चेहरे पर उदासी का भावना है संत चाहता है।
- 43:22खाईबो खेलिबो गरीबों ध्यान खाओ, खेलो, मौज करो और आनंद में डूबो
- 43:35हँसीबो खेलिबो हँसते रहो, खेलते रहो।
- 43:40गीत गुणगुनाते रहो और गीत गुणगुनाना सिर्फ आनंद के क्षणों
- 43:47में ही होता है। गम के क्षणों में दुख के क्षणों
- 43:51में तुमने कभी गीत गुणगुना शमशान घाटों में तुम जाते हो।
- 44:00कभी गीत गुण गुण आते हो नहीं, खुशी के लम्हों में तुम्हारे
- 44:06कंठों से वह स्वर फूटते हैं जिन्हें गीत कहते हैं, संत जानता
- 44:15है। संत तुम्हारा भला भी करना चाहता
- 44:23है, भला ही करना चाहता है। संत जानता है, कहता भी है तुम
- 44:36देखना सभी शास्त्रों में तुम्हे दोनों ही बातें मिलेंगे।
- 44:40यह भी मिलेंगे। फिर सभी शास्त्रों ने गुमहपरा के
- 44:45इस बात को सिद्ध करने की चेष्टा की, लेकिन नाकाम हो गए।
- 44:50तुम्हारी बुद्धि तालमेल नहीं बिठा पाई जो आज मैं इस दुविधा को तोड़
- 44:58देता हूँ। मैं कोई घूमा फिरा के बात नहीं
- 45:01करूँगा सीधा कोई इसमें छलकपट, फरे घूम फिर के आने की जरूरत नहीं है।
- 45:13मैं तुम्हें दंड भी देता है, नाराज भी होता है और तुम पाप भी
- 45:17करते हो। वह पापों को क्षमा भी कर देता है।
- 45:21ऐसा कुछ मैं कहने वाला नहीं हूँ। अब मेरे मुख्य द्वार की बात
- 45:27सुनिए, आप संत परम करूणावान होता है, संत हृदय नवनीत समान, अगर तुम
- 45:36दुखी हो। तो वह तुम्हें दुखी देख नहीं
- 45:39सकता। उसका ह्रदय पिघल जाता है क्योंकि
- 45:43मक्खन के समान कोमल होता है और शांत चाहता नहीं कि तुम दुखी हो।
- 45:51इसलिए दुखी न होने का एक ही फार्मूला है क्या?
- 45:58उसकी रज़ा में राजी रहना, फिर तुम्हारे पास धन हो न हो, बिस्तर
- 46:09हो, न हो, खाना हो, न हो, वस्त्र हो, न हो, मकान हो न हो।
- 46:20संत जानता है कि तुम खुशी चाहते हो और ये सत्य भी है।
- 46:28संत अपने जीवन के अनुभव से तुम्हें बताता है।
- 46:33तुम्हें सिर्फ एक ही चीज़ मिल जाए।
- 46:37आनंद का रस और तुम्हें भूख कहाँ लगती है?
- 46:43कहाँ प्यास लगती है तुम्हें तुम्हें शांति चाहिए, तुम्हें
- 46:49आनंद चाहिए और आनंद मिलेगा। उसका फॉर्मूला संत बखूबी जानता
- 46:55है। उसकी रजा में चलोगे तो सुख
- 47:06मिलेगा। राजी यारी राजी यारी?
- 47:17रजा विचरण राजी आर दी रजा विचरण को लिच पावे कख ना रवे?
- 47:37राजी आर दी रजा विच रेणा को लिच पावे कख नारवे ऐसी व्रती संत
- 47:53जानता है अगर आनंद मिल जाए। तो सब बेकार है तुम भोजन की बात
- 48:02तो छोड़ो, धन कमाने की सोना इकट्ठा करने की बात तो छोड़ दो,
- 48:10फिर जीवन की तमन्ना भी तो शेष नहीं रह जाती।
- 48:17संत बेसिक फॉर्मूलेशन जानता है, अगर उस वृहद के हाथों में तुमने
- 48:24अपनी नाव की पतवार सूप दी तो तुम सुखी हो जाओ।
- 48:36और वह क्योंकि बेसिक फॉर्मूला जानता है और वह तुम्हें दुःखी
- 48:41नहीं करना चाहता, इसलिए तुम्हें कहता है जो करता है परमात्मा करता
- 48:47है सर्वधर्माण प्रत्यक्ष मानने का शर्म प्रश्न मेरी शरण में आजा।
- 48:55तू अपने जीवन की नौका की पतवार खुद के हाथों में न रख मेरे हाथों
- 49:04में दे दे तू पायेगा कि तू आनंद से भर गया, उस रस से भर गया उस
- 49:12रहस्य से भर गया। और बात सच भी है, तुम्हारे भले के
- 49:19लिए होता है, जैसे बुद्ध ने तुम्हारे भले के लिए आत्मा से
- 49:26परमात्मा तक का रास्ता छोड़ दिया अधूरा कोई बात नहीं फिर कर लूँगा।
- 49:33यह तो रास्ता मैंने भी तय नहीं करना।
- 49:36यह रास्ता तो परमात्मा ने तय करना लेकिन इतना वक्त मैं न खूं छः
- 49:45वर्ष और न खूं छः वर्ष में तुम्हें मैं बहुत आक्रांति बना
- 49:52दूंगा। बहुत सुखी बना दूंगा, आनंदित कर
- 49:56दूंगा, रस का प्याला पीला दूंगा। ये करुणा के ही कारण है करुणा की
- 50:03एक अकथ कहानी, जो बुध ने साकार करते हैं।
- 50:19संत तुम्हें दुखी नहीं देखना चाहता, वो इतना भावुक है।
- 50:23माँ की तरह तुम धरती की छाती फाड़ देते हो।
- 50:31हल चालाकी लेकिन फिर भी बीज बोने पर वो तुम्हें वट वृक्ष देते हैं।
- 50:38आम के मिठ फल देते है, अन्न देती है जीवन के लिए प्राण उर्जा के
- 50:46लिए तुम्हें सब्जी देते हैं। तुम हल्के द्वारा लोहे के हल्के
- 50:55द्वारा। धरती की ख्याति फाड़ देते हो,
- 51:00लेकिन माँ तुम्हारा भला ही मांगती है।
- 51:09संत तुम्हारा भला ही चाहता है और भला चाहता है भला कैसे होगा यह भी
- 51:20वो जानता है। इसकी बेसिक फॉर्मूलेशन भी वो
- 51:24जानता है। इसलिए वो तुम्हें कहता है बार बार
- 51:34कहता है विभीषा ग्रन्ति में ये बात है, जम जाए।
- 51:39और जो बात बार बार दोहराई जाती है सभी शास्त्रों में दोहराई गई।
- 51:43सभी संतो ने जानते हुए भी दोहराया कारण तुम्हारा सुख तुम्हारा आनंद
- 51:56का वो खजाना। तुम्हारे भीतर इतना भर दिया जाए
- 52:01कि तुम ही हो पर मत तुम ही हो वो रस तुम ही हो आनंद तुम दुखी नहीं
- 52:15हो शहंशाह आलम हो तुम दृद नहीं हो तुम राजा हो सम्राट।
- 52:30भावना नानक भी कहते हैं, हुक्मय अंदर सब कुछ हुक्म के अंदर चलता
- 52:38है, वह जो चाहता है वही होता है। ध्यान रखना उनका अपना कोई इसमें
- 52:47लोभ न था। यह झूठ भी नहीं, जो दूसरों के भले
- 52:55के लिए बोला जाए वो झूठ नहीं होता।
- 53:03हुक्म में अंदर सबको यह सारी सृष्टियां हुक्म में चलती है और
- 53:09एक कारण से देखी जाए तो हुक्म से चलती है, क्योंकि उसी ने बनाई यह
- 53:17पक्का है कि तुमने नहीं बनाई, तुम तो जानते ही।
- 53:21जब से जन्मी आज तलक तुमने रीत का एक ज़रा बनाया पानी की एक बूंद
- 53:29बनाई हवा का एक अणु बनाया नहीं बनाया।
- 53:35जो बनाया उस कैरिएटर ने बनाया, सृजन हरता ने बना फिर सृजन करता
- 53:41ने बनाया तुमने कछु नहीं बनाया इसलिए बाबा नानक हूँ, कृष्ण हूँ
- 53:51लव से हूँ, चंगस से हूँ। कोई भी संत हो तुम्हारी भयभीष्या
- 53:58ग्रंथि को भरने की कोशिश करता है क्योंकि यह है सत्य पाप है झूठ
- 54:06फैलाना सत्य की फॉर्मूलेशन फैलाना झूठ नहीं, पाप नहीं।
- 54:15हुक्म में अंदर सबको बाबा कहते है सारा संसार हुक्म में चल रहा है,
- 54:22उसके हुक्म में ही चल रहा है और यह बात वो बड़ी करूणा जनक भाव से
- 54:28बोलते है। तुम्हारे प्रति प्रेम है उन्हें।
- 54:33क्योंकि अंत से जा के देख लिया कि मैं अलग नहीं हूँ, दूसरा अलग नहीं
- 54:42है, वरना दूसरा कोई है ही नहीं वहाँ पहुँच गए।
- 54:49जहाँ दूसरा नहीं तो वैर किस्से करे निर्वैर जहाँ पहुँच गए वहाँ
- 54:56भय नहीं, भय किस्से करे जब दूसरा ही कोई नहीं डरे किस्से अकाल मूरत
- 55:06मृत्यु भी तो नहीं है। मृत्यु भी तो दूसरा है तो डरे
- 55:11किस्से तो बाबा ने जो ओंकार मूल मंत्र दिया, एक ओंकार सत्नाम करता
- 55:21पुरख वो ही करता है तो ये बात तुम्हें।
- 55:27आनंद में ले जाने के लिए थी। अगर तुम्हें इस बात के ऊपर चल
- 55:41पड़े हुकुम में अंतर सबको बाहर हुकुम न कोई जो हुकुम से बाहर
- 55:49चलेगा, बाबा जानते हैं वह दुखी हो जाएगा।
- 55:54बाबा जानते हैं और तुम पूछते हो कि बाबा हम दुखी हैं और बाबा
- 56:00जानते हैं कि दुखी तुम क्यों हो दुखी तुम क्यों हो क्योंकि तुमने
- 56:06अपने जीवन की नैया अपने हाथों में पकड़ी है?
- 56:09आई कैन डू करके दिखाएं। नहीं, तुम कुछ नहीं करके दिखा
- 56:16सकते, तुम खाक हो जाते हो आँखें तुम्हारा करा धरा परमात्मा की इस
- 56:27सृजना में ही धरा का धरा रह जाता है।
- 56:33इसलिए संत कहते हैं कि व्यर्थ में परिश्रम क्यों करना है?
- 56:40तो सन्तो ने ये एक फॉर्मूलेशन खोजा हुक्मय अंतर सबको बाहर
- 56:48भूकम्बनों को यह सत्य है। क्योंकि आनंद कौन नहीं चाहता, गम
- 56:55के मारे बेचारे रोज़ मेरे पास न जाने कितने लोग आते हैं हुक्म
- 57:05मानने वाला सुखी है। जो भी हो जाये क्योंकि तुम्हारा
- 57:13यहाँ कुछ नहीं है, कुछ भी बिगड़ जाये टूट जाये फूट जाये जी जाये
- 57:18कुछ भी हो जाये तुम्हारा कुछ है ही नहीं यहाँ तुम गवाने के लिए
- 57:24नहीं क्योंकि तुम्हारा कुछ है ही नहीं गवाने के लिए।
- 57:28और तुम पाने के लिए भी नहीं हो क्योंकि जो तुम पाओगे वो तुम्हारा
- 57:31नहीं होगा। वो किसी और का है और किसी एक तल
- 57:37पर जाकर पता चलता है कि तुम उस अखंड के एक धारा हो।
- 57:47वहाँ तुम्हारे सारे भ्रम टूट जाते है और बाबा कहते है क्यों न सत्य
- 57:51ही बदला दिया जाए। कृष्ण कहते है, क्यों न अंतरिम
- 57:55सत्य ही बता दिया जाए हुक्मय अंदर सबको ये सारी सृजना हुक्म के अंदर
- 58:05ही घूम रही है। बाहर हुकुम न कोई हुकुम से बाहर
- 58:11कोई भी नहीं जानते हैं। अगर तुम हुकुम से बाहर चलोगे तो
- 58:15दुखी हो जाओगे और दुखी तुम होना नहीं चाहते।
- 58:20वो तुम्हारी चाहत को प्राइऑरटी देते हैं।
- 58:26नानक हुकुम मैं ये बुझे नानक कहते हैं कि जो हुकुम को कुछ क्या जो
- 58:33हुकुम के अनुसार चला जो हुकुम के अंदर चला, जो हो गया।
- 58:44जो मिल गया उसी को मुकद्दरी समझ लिया मुकद्दरी समझ लिया।
- 59:00जो खो गया, मैं उसको बुलाता चला गया।
- 59:08जो खो गया, मैं उसको बुलाता चला गया।
- 59:15जो मिल गया उसी को मुकदर समझ लिया मुकदर समझ लिया जो खो गया मैं
- 59:31उसको। बुलाता चला गया।
- 59:36जीने की एक राह दिखाता है तुम्हें मोक्ष द्वार जो खो गया मैं उसको
- 59:45बुलाता चला गया क्योंकि वो तुम्हारा नहीं है, यह सत्य है।
- 59:51जो मिल गया उसी को मुकद्दर समझ लिया, क्योंकि वो तुम्हारा था तो
- 59:56नहीं, लेकिन उस दाता ने रहमत कर दी तो उसे मैंने जिगरे से लगा
- 1:00:02लिया, कलेजे से लगा लिया। इसलिए संत तुम्हें दुखी नहीं
- 1:00:09देखना चाहिए। देखिये, संत का हृदय कितना करना
- 1:00:15है, इन्हीं शब्दों से पता चल जायेगा कृष्ण जैसा व्यक्ति
- 1:00:19तुम्हें सिरे की बात बता देता है, रास्ता भी क्यों बताना?
- 1:00:26रास्ते में कंकड़ भी हैं, पत्थर भी हैं, कांच का भी बिखरा पड़ा
- 1:00:30है, पांव में जूतियां भी नहीं, रेगिस्तान की भूमि है दुपहरी का
- 1:00:36वक्त सूर्य जो तपता है। तुम्हारा शरीर का सारा
- 1:00:44डिहाइड्रेशन हो गया है। तुम्हारा गला कंठ सूख गया है और
- 1:00:48पानी नहीं है। तुम दुखी हो तो ऐसी नौबत ही क्यों
- 1:00:52आये ये नौबत न आये इसलिए कृष्ण कहते हैं, सर्वधर्माणपत्र जमाने
- 1:01:01का मिश्रण। वो तुम्हारा ख्याल करते हैं, उनका
- 1:01:05अपना कोई लोग नहीं, कृष्ण को तुमसे कुछ नहीं चाहिए, कृष्ण को
- 1:01:17तुम्हारी फिकर है। कृष्ण तुमसे कुछ मांगते नहीं, कुछ
- 1:01:25चाहते नहीं कृष्ण चाहते हैं तुम्हारा सुख तुम्हारा आनंद, तुम
- 1:01:32रस से बेबोर होके नाचो। उसकी दुनिया में रंगीनियां छाई
- 1:01:37रहे। दुख की तप्त धूप किसी प्राणी को
- 1:01:45भी न लगे संत यह चाहता है तो संत अंतिम सत्य बता देता है तुम्हारा
- 1:01:52यहाँ है कुछ नहीं। इसलिए जो करता है, वह अपनी सृजना
- 1:01:58के अंदर करता है। सूर्य उसने बनाया तो जीतने बजे
- 1:02:04निकालेगा निकालने का जीतने बजे छुपायेगा छुपायेगा चंद्रमा उसने
- 1:02:11बनाया कलाएं बदलेगा बदलेगा। बढ़ाएगा, बढ़ाएगा घटाएगा, घटाएगा
- 1:02:17उसकी संग रचनाएँ भाई कैसे खेले और संत इस बात को दूसरे ढंग से कह
- 1:02:24देता है। कृष्ण उस बात को दूसरे ढंग से
- 1:02:28लौसली उस बात को दूसरे ढंग से लेकिन।
- 1:02:34अंत तो गतवा उनका टारगेट है। तुम्हारा आनंद, सुख, रहस्य, मौज
- 1:02:45मस्ती, नाचना, कूदना, गाना खेलना, हँसना, लुक ऑफ लेना।
- 1:02:54यह जिंदगी बड़ी प्यारी है। यह सृजना भी बड़ी प्यारी है।
- 1:02:59कोई भ्रम वगैरह नहीं है, चूम लो इसको इसमें कोई दुख वगैरह नहीं
- 1:03:07है, परमात्मा की सृजना। परमात्मा के समान ही प्यारी है
- 1:03:16जितना प्यारा परमात्मा उतनी ही प्यारी उसकी सृजन तुमने देख कोई
- 1:03:22प्रेमिका तुम्हें प्यार से एक फूल भेंट कर देती है।
- 1:03:26फूल की कितनी और तुम उसको? लॉकर में संभाल के रखते हो, छाती
- 1:03:36से लगा के रखते हो, प्रेम की कीमत नहीं होती, प्रेम तो एक पुरस्कार
- 1:03:44है, उसको हृदय से लगा के रखते हो। तो संत इसीलिए कहते हैं कि संत
- 1:03:57तुम्हारा भला चाहता है, संत को पता है।
- 1:04:06अगर ये उसके हुक्म में नहीं चलेगा यानी होने को स्वीकार नहीं करेगा
- 1:04:10तो यह दुख पाएगा। रोयेगा, पीटेगा, काँपेगा,
- 1:04:15थर्राएगा और इसलिए दुखी होगा? लेकिन इसका उपाय कोई नहीं है।
- 1:04:23उपाय ढूंढेगा, मिलेगा नहीं। कौन मौत को जीत पाया?
- 1:04:27आज तलक कौन दुःख को हरा पाया आज तलक कौन बुढ़ापे को रोक रोक पाया
- 1:04:34आज तलक कौन मृत्यु को रोक पाया आज तलक कोई नहीं रोक पाया फिर भी तुम
- 1:04:41प्रयास करते हो। प्रसंत यही कहता कि यह प्रयास गलत
- 1:04:45है। छोड़ दो इसको वो तो आए तो आए,
- 1:04:51बुढ़ापा आए तो आए आएगा, जवानी आए तो आए आएगी, बचपन आए तो आए आएगा।
- 1:05:01तुम उसके ऊपर छोड़ दो, अपने नाव की पतवार संत कहता है जो वो करता
- 1:05:08है वो ही करता है और आपके भले के लिए करता है, आपका भला इसमें क्या
- 1:05:17है? तुम अगर इसको पूरा गुण लो, इसके
- 1:05:24ढंग से चल पड़ो तो तुम रिलैक्स हो जाओगे, भार मुक्त हो जाओगे,
- 1:05:29वेटलेसनेस की स्थिति में आ जाओ, निरभोज हो जाओगे और तुम शांति भी
- 1:05:37हो जाओगे। तुम आनंदित भी हो जाओगे और यही
- 1:05:41तुम्हारा मुकाम है शांति और रस आनंद का हुक्म में अंदर सबको बाहर
- 1:05:53हुक्म ना कोई। नानक हुक्म में जो बुझे, जो इस
- 1:05:58बात को पूछ लेता है कि होना तो वही है, क्योंकि उसकी सृजना उसके
- 1:06:03नियम तुम क्या कर सकते हो? यू कैनट चेंज एनी लॉ ऑफ दी लॉर्ड?
- 1:06:12परमात्मा के मालिक के किसी भी विधान को तुम बदल नहीं सकते हो,
- 1:06:17उसका उपयोग कर सकते हो। प्रत्येक इलाका लाफ ग्रैविटेशन का
- 1:06:23कोई भी नियम है। गति का नियम है सभी।
- 1:06:31नियमों का तुम उपयोग कर सकते हो बदल नहीं सकते और जब तुम बदल नहीं
- 1:06:38सकते, तो फिर तुम कर क्या सकते हो तुम्हारे हाथों में क्या है
- 1:06:46तुम्हारे हाथों में कुछ भी है इसलिए संत कहता है भगवान कहते
- 1:06:51हैं। कि तू मेरी शरण में ही आज इतने
- 1:06:55जनम बीत गए, दुखी होते होते माँ धो ए जन्म तुम्हारे लेखे बहुत जनम
- 1:07:05बीते मेरे माँ धो ए जन्म तुम्हारे लेखे बस तू मेरे लेखे कर दे।
- 1:07:13क्योंकि दुख आएगा तो तुम रोक नहीं सकते, सुख आएगा, तुम रोक नहीं
- 1:07:19सकते तो फिर तुम कर क्या सकते हो तुम स्वीकार कर सकते हो।
- 1:07:27और ध्यान रखना, ये अमूल्य सूत्र आज मैं तुम्हें दे रहा हूँ होता
- 1:07:35है वही जो मंजूर है खुदा होता है अगर यह बात तुम गहराई के साथ हृदय
- 1:07:43में उतारने में सक्षम हो गए। तत क्षण तुम सुखी हो जाओगे और अंत
- 1:07:52में तुम देखोगे जाकर उस मुकाम पर तुम्हारी आँखें फटी की फटी रह
- 1:08:01जाएंगी। तुम जानोगे आखिर में।
- 1:08:07उस पड़ाव पे उस मुकाम पर के मेरे सिवा दुजा कोई है ही नहीं।
- 1:08:16उसे तुम नगर्जनों का शून्यवाद कह लो, उसे तुम ऋषियों का अहम
- 1:08:22ब्रह्मस्म कह लो। मैं ही परमात्मा हूँ, उसे तुम
- 1:08:27मंदसौर का अन्न हक कह लो, उसे तुम नागार्जुन का शून्य वाद कह दो कि
- 1:08:34कुछ नहीं, मेरे सिवा कुछ नहीं और ऋषि कहता है मेरे अलावा कुछ नहीं।
- 1:08:45दोनों बातों में कोई फर्क है? नागार्जुन कहता है, मैं नहीं हूँ
- 1:08:54एक ही है और ऋषि कहता है कि मैं ही हूँ दूसरा कोई नहीं है।
- 1:09:04आवेद में बु आ गया। नागार्जुन आवेद में ही बु आ गया।
- 1:09:09संत दोनों एक में आ गए। एक ओंकार ये रस निकाल लिया।
- 1:09:16बाबा ने नान कहूक में जे बुझे। तुम करने में स्वतंत्र हो, लेकिन
- 1:09:26तुम्हारा करना तुम्हें दुख में ले जाएगा।
- 1:09:29संत जानता है और संत यह भी जानता है कि अगर तुमने उसके ऊपर छोड़
- 1:09:38दिया तो तुम उस पॉइंट पर पहुँच जाओगे।
- 1:09:41जहाँ तुम्हारी बुद्धि तुम्हें नहीं चलाएगी जहाँ तुम्हारा
- 1:09:45अस्तित्व तुम्हें चलाएगा और अगर तुमने अस्तित्व के हाथों में अपनी
- 1:09:52बागडोर सौंप दी तो वह तुम्हें चलाएगा।
- 1:09:55वह तुम्हें लेजीनेस नहीं देगा, तुम खाटड़ी पर पडकर।
- 1:10:00मरने के लिए नहीं जियोगे तुम अपना कर्तव्य कर्म पूर्णता से पूरी
- 1:10:05दक्षता से निभाओगे और जियोगे मज़े से हंसोगे खेलोंगे नाचोगे कूदोगे
- 1:10:13और जियोगे ज़िन्दगी जीने के लिए। ये व्यर्थ की बकवासों के लिए नहीं
- 1:10:20के राधे राधे करते रहो राम राम करते रहो अल्लाह अल्लाह करते रहो
- 1:10:27ज़िन्दगी जीने के लिए है मैं फिर कहता हूँ बड़ी छोटी सी ज़िन्दगी
- 1:10:31है तुम्हारे पास। रात गंवाई सोयकर दिवस गंवाया,
- 1:10:45खाये रात गंवाई सोयकर दिवस गंवाया खाये हीरा जन्म अमूल का कौड़ी
- 1:10:56बदले जाय। यह अमोलक हीरा सह जीवन तुम बेच
- 1:11:02देते हो कौड़ी के भाव रात सो के गंवा देते हो दिन खा पी के गंवा
- 1:11:12देते ताश खेले में मूवी देखने में।
- 1:11:19खीर खलैया करने में गँवा देते हो कब तुमने उसके ऊपर भाग दौड़ छोड़ी
- 1:11:30तुम सांझ ढले जब घर जाते हो तो फिर कहते हो ठीक मैंने जो किया।
- 1:11:38वो तेरे अर्पण गलत है, ये झूठा है, उसी वक्त अर्पण करो जीस वक्त
- 1:11:43कर्म करो साँझ सारे कर्मों को उसके अर्पण तुम कर ही नहीं सकते
- 1:11:50कर्मों को अर्पण तभी किया जा सकता है जब तुम उन्हें कर रहे हो।
- 1:11:57व्हेन यू अरे डूइंग उसी क्षण तुम कहो मानो कि यह तू ही कर रहा है,
- 1:12:08दूसरा भी ऑप्शन है कि तुम उस प्वाइंट में पहुंचाओ।
- 1:12:11जंगसर प्वाइंट से नीचे। जहाँ उसका हुक्म तुम्हें चलाता
- 1:12:15है, वह बड़ा वृहद है। वह इतना संकीर्ण नहीं कि तुम उसे
- 1:12:20बुद्धि से सोच सको। ये बड़ा विराट है, फिर वहाँ से
- 1:12:28उसके हुक्म आने शुरू हो जाते हैं। पहले हल्की सी आवाजें आती है, फिर
- 1:12:36साक्षात आवाज़ आती है और फिर जब तुम छोड़ देते हो उसके हाथों में
- 1:12:44अपने जीवन की नैया को, तो फिर वह चलाना शुरू कर देता।
- 1:12:49मैंने तुमसे बोला। क्या मैं अपने साधना काल में
- 1:12:54आँखें बंद करके गोशाला मंदिर जाया करता था और मेरी बंद आँखें देख कर
- 1:13:01लोग कहते हैं इसकी आँखें तो बंद है चला जा रहा है, ये क्या माजरा
- 1:13:07तो बहुत से लोगों ने मुझे कहा। तो मैंने आँखों पर काला चश्मा
- 1:13:12लगाना शुरू कर दिया। आँखें बिल्कुल नो पर नो थीं,
- 1:13:17बिल्कुल सही थीं लेकिन मैंने किसी को पता न लगाया कि आँखें बंद हैं
- 1:13:23कि खुली हैं और एनक भी वो लगानी शुरू कर दी जो साइड से ढकी होती
- 1:13:29है। मोतियाबिंद के ऑपरेशन करने के बाद
- 1:13:32डॉक्टर लोग देते हैं। वो लगता मैं चारों तरफ से किसी को
- 1:13:37दिखे ही नहीं, आंख के बंद है या आँखें खोल रखीं और चला जाता हूँ।
- 1:13:45क्या था ये? नानक हुक्म ये बुझे ता हो मैं कहे
- 1:13:52न कोई जिसने अपने जीवन का कवैया नाव का कवैया उस विराट को जिसने
- 1:14:04ये विराट बनाया उसके ऊपर सौंप दिया।
- 1:14:09वह कभी ये न कहेगा कि मैं करता हूँ क्योंकि वह इतना आनंदित होगा,
- 1:14:18वो कहेगा हमने तो कुछ किया भी नहीं, फिर भी आनंदित है।
- 1:14:22और मज़े की बात है। जब तुम कुछ नहीं करते तभी तुम
- 1:14:26आनंदित होते हो जब तलक तुम कुछ करते हो तब तक तुम दुखी ही रहते
- 1:14:33हो। जब तुम सब करना धरना छोड़ देते हो
- 1:14:38तब तुम सुखी हो जाते हो। और ये करते करते तुम उस स्थान पर
- 1:14:44पहुँच जाते हो जहाँ मात्र वही करता है वही खेलता है वही कर्म
- 1:14:51है, आप खेले खेल खिलाड़ी आप खेलनहारा हूँ वहाँ पर तुम पहुँच
- 1:15:00जाते हो। जो करता है वो ही करता है और भले
- 1:15:04के लिए करता है, आज ये दोस्ता भी तुम्हारी निकल गई होगी।
- 1:15:09अगर फिर भी कोई प्रश्न हो तो मुझसे पूछ लेना तुम्हें बनाया तुम
- 1:15:17कर सकते हो। तुम करने के लिए स्वतंत्र हो,
- 1:15:23लेकिन परमात्मा जानता है, संत भी जानता है और संत महकरवान है एक
- 1:15:36गुसाखी कर। संत परमात्मा से भी ज्यादा दयावान
- 1:15:42है। कुकी परमात्मा ने तो नियम बनाया,
- 1:15:48सृष्टि बनाई लेकिन नियम समझाया। सन्तों ने परमात्मा ने नियम
- 1:15:55बनाया, परमात्मा ने प्रकृति बनाई। संत ने तुम्हें समझाया कि इस
- 1:16:05प्रकृति के नियमों से तादाद में कर लो, गम भी आएँगे।
- 1:16:13खुशियां भी आएंगी लेकिन समझौता कर लो।
- 1:16:19समझौता गमों से कर लो समझौता गमों से कर लो ज़िन्दगी में गंभीर
- 1:16:34मिलते हैं। समझौता गमों से कर लो समझौता गमों
- 1:16:47से कर लो ज़िन्दगी में हम भी मिलते हैं।
- 1:16:58समझौता गमों से करलो अच्छा हो या बुरा हो जो तू दबावे साईं पलिका
- 1:17:10जो तेरे को अच्छा लगा वो ही कर। इसलिए संत बड़ा धयालु भगवान से भी
- 1:17:20ज्यादा धयालु हो इसलिए कबीर ने कहा कि परमात्मा खड़े और एक तरफ
- 1:17:27मेरे गुरु खड़े का के लागू पांव। बलिहारी गुरु आपने जन गोबिंद दियो
- 1:17:42मिला, गुरु गोबिंद दोनों खड़े का के लगूं।
- 1:17:51परमात्मा सृजना बनाई, परमात्मा ने तुम्हें भी बनाया सृष्टि बनाई,
- 1:18:00सभी भोग पदार्थ बनाए, जिनके लिए तुम लालायी तो हो।
- 1:18:08सृष्टि की हर चीज़ उसने बनाई है, लेकिन संत संत तुम्हें जीने की
- 1:18:19राह सखाते हैं। संत कहता है कि तुम?
- 1:18:26क्योंकि तुम्हारा यहाँ कुछ है नहीं।
- 1:18:29यू आर नॉट द करीएटर सब उसका है यह सत्य को जानते हुए संत कहता है कि
- 1:18:36भला इसी में है अन्यथा तुम बुरी तरह दुखी हो।
- 1:18:42और दुखी तुम होना नहीं चाहते तो शांति का फॉर्मूला निकालता है,
- 1:18:49जिससे तुम दुखी न हो और तुम्हारी विभीषाग्रंथि में हो थोपता चला
- 1:18:53जाता है। सभी संत तुम्हारी विभीषा ग्रंथि
- 1:18:56को थोपते चले जाते हैं। और तुम्हें जची जाती है बात जो
- 1:19:04करता वो जो करता है और इसमें भला है और ये सत्य भी है क्योंकि
- 1:19:10जिसने संघ रचना की, उसी का तो है सारा माल मालिक का मालिक के शब्द
- 1:19:19माल से बना। जो माल का स्वामी, वह मालिक तो
- 1:19:28सारा माल किसका? जिसने बनाया उसका और तुम्हारा
- 1:19:34क्या है? हमारा कुछ भी नहीं है, यही पता
- 1:19:40चलता है आखिर में। कि तुम्हारा यहाँ कुछ नहीं, ऐसा
- 1:19:44नहीं है। तुम ही नहीं आखिर में यही पता
- 1:19:50चलता है और बड़े मज़े की बात है। यही तुम्हारा कुछ नहीं और तुम कुछ
- 1:19:57नहीं। बूंद समुद्र में समा जाती है।
- 1:20:03पर अद्भुत परिणाम सामने दिखता है तुम्हें के बूंद तुम बूंद की तरह
- 1:20:09तो न रहे तुम विराट की तरह हो गए तुम समुद्र की तरह हो गए बूंद
- 1:20:15सामान्य समुद्र में। तुम्हारा वजूद खत्म हो गया,
- 1:20:21तुम्हारी तरफ से बूंद का वजूद खत्म हो गया।
- 1:20:27परमात्मा की तरफ से विराट का वजूद आ गया, तुम्हारा वजूद खत्म हो
- 1:20:38गया। यह थ्रोटिकल चीजें नहीं हैं मुख्य
- 1:20:48द्वार में प्रैक्टिकल करने के लिए मैं तुम्हें।
- 1:20:58रिद्ध करो, कहा कि तुम प्रैक्टिकल करो, फिर जो बोला संतों ने अनुभव
- 1:21:06की कसौटी पर कसो और तुम पाओगे तुम पाओगे संतों ने सत्य बोला एक एक
- 1:21:16कर लफ्ज़। एक एक हर्ष संतो का बाग कमाल था
- 1:21:22और तुम्हारे भले के लिए था माँ की तरह था, बाप की तरह था जो तुम्हें
- 1:21:29दुखी नहीं देख सकता। संतान को कभी माता पिता दुखी नहीं
- 1:21:34देख सकता। ज़िन्दगी में गम भी मिलते हैं सुख
- 1:21:44आए सुख को स्वीकार करना क्योंकि तुम्हारे कुछ बिगड़ेगा नहीं।
- 1:21:53दुख आए। दुःख को स्वीकार करना क्योंकि
- 1:21:56तुम्हारा कुछ लूटेगा नहीं तुम्हारा कुछ था नहीं तुमने कुछ
- 1:22:01बनाया नहीं तो लूटेगा क्या सुख आये तो चौड़े मत होना तुमने कुछ
- 1:22:09पाया नहीं क्योंकि क्या खाक पाया जब कुछ संघ नहीं जाएगा।
- 1:22:17तो फिर पाओगे क्या खाक यहीं से लिया माटी से, पानी से वायु से
- 1:22:26लिया पर यहीं पर छूट गए फिर नफा नुकसान आखिर में बजट क्या हुआ
- 1:22:32बैलेंस शीट का? शून्य बैलेंस सिटी जीरो लास्ट
- 1:22:40स्टेज पर तुम्हारा कुछ नहीं रहता और बड़े मज़े की बात तो मैं बता
- 1:22:45दूँ लास्ट स्टेज पर सब कुछ तुम्हारा हो जाता है, कर करके भी
- 1:22:51तुम कुछ बानो सकोगे। खो खो के भी तुम कुछ गंवा न
- 1:22:59सकोगे। इस बात को हृदय में उतार लेना कर
- 1:23:06करके भी तुम कुछ पा न सकोगे। खो खो के भी तुम।
- 1:23:12कुछ लूटा, न सकोगे क्योंकि तुम्हारा कुछ यहाँ है ही नहीं, न
- 1:23:18पाने को न लुटाने को धन्यवाद।