Latest / Baba ji Vijay Vats / 5 Oct 25 - मेरी कहानी: अंदर उतरने के महासूत्र! कैसे धारणा की शक्ति बढ़ती है और मेरी ज़िंदगी बदली!
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- 0:02प्रमोद कुमार बाबाजी पतंजलि योग पर देख अष्टांग योग में से।
- 0:22छठा अंग है धारणा कृपा करके धारणा के बारे में सरल व्याख्या कीजिये
- 0:40और व्याख्या भी कीजिये। रहस्यत्मक ढंग से उस स्थल पे जाते
- 0:58एक बात तो आपको क्षेत्र से याद होगी, मैंने आपसे बहुत बार कहा
- 1:04है। जय से जय से आप अपने भीतर रोपे
- 1:15संकल्प गहन होगा। संकल्प पर जाने के तुम चाहते क्या
- 1:23हो उसकी इच्छा। और तुम्हारी इच्छा खोपड़ी में
- 1:32बैठे बैठे पूरी नहीं होगी नीचे उतरना पड़ेगा जीतने गहरे जाओ
- 1:40संकल्प गहरा हो जाएगा। और जब संकल्प इतना गहरा हो जाए,
- 1:51एक तल आता है। जहाँ तुम जो भी कह दोगे वो सत्य
- 1:58हो जाएगा। ये बातें मैंने बहुत बार बताई
- 2:11बचपन में बहुत मेहनत के क्योंकि बचपन में मैं अकेला ही था।
- 2:20सबसे बड़ा भाई बीमार हो गया। से टीबी से ग्रस्त हो गया तो उस
- 2:31साल मुझे ही काम करना पड़ा तो उसका काम था पहले पैदल या गांव से
- 2:41लेके आता। फिर यहाँ नजदीक ही गांव में फकर
- 2:47सर थैडी क्षमा कीजिएगा कर्मगढ़ सरदारगढ़
- 3:05वहाँ से में दूध लेके आता फिर सारे जो हमारे नित्य के।
- 3:11ग्राहक से उनके घर में पहुंचा था। उन वर्षों में मैंने बहुत काम
- 3:19किया लेकिन जैसे ही जवानी आई कॉलेज में।
- 3:31तो काम बिल्कुल भी नहीं किया और इस घटना के बाद ट्रेन की घटना के
- 3:38बाद तो मैंने बिल्कुल भी कोई काम नहीं किया।
- 3:47बस घंटों बैठा रहता और धीरे धीरे मैं अपने भीतर खिसकता चला गया।
- 3:58एक वक्त आया, मुझे महसूस होने लगा कि मैं जो कह दूंगा, ठीक हो
- 4:03जाएगा। वो बात भी आने लगे।
- 4:14मैं कभी किसी से कुछ लेता नहीं था।
- 4:18कोई फिश नहीं जितना ज्ञान था, बिल्कुल मुफ्फत बांटता।
- 4:29सुबह रोज़ गौशाला मंदिर जाने की आदत थी तो गौशाला मंदिर में मैंने
- 4:39देखा वृक्ष बहुत थे और वंशी बहुत थे, बड़े बड़े वृक्ष थे, वटवृक्ष
- 4:47थे, दो पीपल का वृक्ष थे। जाम था, आम था और वे बहुत से
- 4:55वृक्ष थे, हरियाली बहुत थी और वाट वृक्ष तो इतना विशाल था कि उसके
- 5:04ऊपर हजारों पंचियों के घोसले थे। 25 सुबह सुबह भूखे होते मैंने
- 5:20बाबा से फरियाद की के बाबा कोई उपाय बताओ कि इन पंछियों के लिए
- 5:28दानच होगा। का इंतजाम हो जाए।
- 5:39बाबा कहते तुम ऐसे कर। एक नंबर होता है।
- 5:55हम भाषा में उसे सट्टे का नंबर कहते हैं क्योंकि तुम सारे दिनभर
- 6:04कुछ भी नहीं करते, ध्यान में बेहतर चाहते हो।
- 6:09इसलिए बाहर से तुम कुछ मेहनत का काम नहीं कर पाओगे, करना भी नहीं
- 6:13चाहिए तो तुम्हारी दिशा संसार से विपरीत है और कामना है कि पंछी
- 6:20भूखी न मरे। कामना है कि गर्मी में प्यास ही न
- 6:25मारे। तो दो तीन कुंडे ले आओ।
- 6:29उनको धोलो और पानी भर के सुबह रख दिया
- 6:43तो मैंने कहा चोगी का इंतजाम क्या होगा?
- 6:45खाना धान बाप रे कहते तुम ऐसा किया करो।
- 6:54मेरे से नंबर ले लिया करो, लगाया करो तुम ये पैसे आ जाया करेंगे,
- 7:06जब खत्म हो जाए तो फिर मांग लो गौशाला मंत्र में।
- 7:19एक वृद्ध व्यक्ति आते थे, जिसका नाम था प्रभुदयाल।
- 7:26मुझे अक्सर बातें बताया करते थे कि यहाँ का जो संत था, गिरि नारी
- 7:32बाबा। उसने इस मंदिर का निर्माण किया।
- 7:39वह पहले टीला हुआ करता था, आबादी नहीं थी।
- 7:45जब मैं जाया करता था तब भी कोई आबादी नहीं थी।
- 7:48विशेष चारों तरफ सुनसान। और थोड़ी दूर जाके जहाँ आज कचहरी
- 7:58है वहाँ तो बिल्कुल ही सुनसान हुआ।
- 8:07उसके सामने जो गौशाला मंदिर वहाँ गुआ पाली जाती थी उनकी एक गौशाला
- 8:17मंदिर। डबवाली में भी है।
- 8:24हमारी नदी के यहाँ से 35 किलोमीटर दूर तुम मुझे बातें सुनाया करते
- 8:32कि यहाँ गिरनारी बाबा जो हैं, अपने गुरु के पास जाते।
- 8:38जब गऊ में भूखी होती तो अपने गुरु से प्रार्थना करते कोई कोई नंबर
- 8:46देगा नंबर लगा दूंगा, पैसा मिल जाएगा, महीना 20 दिन गुजर जाएगा।
- 8:59जीस समाधि पे मैं बैठा करता था वहाँ की बात कर रहा हूँ बाबा
- 9:06धर्मदास की समाधि वह उसके गुरु से गरी नारी बाबा के गुरु से अपने
- 9:14गुरु से मांगते। कि कोई नंबर दे दिया करो, मैं
- 9:18पैसा लिया करूँगा। उन दिनों में जो सट्टे का धंधा है
- 9:23ना तो डब्बा वाली चलता था ना यहाँ चलता था, थोड़ी दूर चला करता था
- 9:33शायद। हनुमान का उनके पास एक गुणा था।
- 9:42ये शक्ति कहानी है बाहर के मुल्कों की कहानियों मैं कम ही
- 9:55सुनाया करता हूँ क्योंकि ऑथेंटिक ज्यादा नहीं यह ऑथेंटिक कहानी।
- 10:01जो मैंने बुजुर्गों से सुनी और आजमाई तो उसके गुरु से नंबर बताते
- 10:15उसके पास घोड़ा था, बड़ा आलीशान घोड़ा था वो यहाँ से डब्बा ली
- 10:20जाते डब्बा ली से वो। शायद संग्रिया जाते है और
- 10:25संग्रिया से वाहन मान घर जाते है कहते हैं कि वहाँ नंबर लगा आता है
- 10:38वहाँ नंबर लगा आता है। और वहीं रात को रुक जाते हैं।
- 10:46फकरों का क्या होता है कहीं रुक जाए, दो फुलके तो मिल ही जाएंगे।
- 10:52किसी से मांग लो वाले जमाने थे। तो सुबह वो नंबर आ जाता है और
- 11:05उनसे पैसे ले जाता तो रास्ते में जब डब वाली आता तो उन्होंने सोचा
- 11:13की डब वाली भी एक ऐसी ही गौशाला बना दी जाए।
- 11:18उन दिनों में जमीनों के भाव। शून्य से फालतू जमीन पड़ी थी,
- 11:25टीले थे, वहाँ के मालिक से पूछा तो ग्रीनारी बाबा से कहने लगे कि
- 11:33आप ऐसा करो कितनी चाहे जमीन रोक लो, गौशाला बना लो, मंदिर बना लो।
- 11:43तो आज जो डबवाली के अंदर मंदिर है और गऊशाला है, यह है उस गिरनारी
- 11:52बाबा की ही बनाई गई थी रहते यहाँ थे वो कभी कभी डबवाली चले जाओ।
- 12:03मुख्यतः यहाँ रहा है भारत यह उनका कि दोना भी था, मैं भी अक्सर उनके
- 12:12दोने के पास बैठा रहा। रात को जाके बाबा धर्मदास की
- 12:17समाधि में बैठ जाता। बहुत वर्षों तक करीब 20 वर्षों तक
- 12:26मैंने कोई काम नहीं किया, बस सिर्फ।
- 12:35खाली फुर्सत के लम्हों में कुछ न करता।
- 12:38आराम से बैठ जाता कि मूड धीरे धीरे मन ने काम करना बंद कर दिया।
- 12:45मन ठहरना शुरू हो गया। मन के ठहरते ही रस आने लगा।
- 12:54और फिर जब रस आने लगता है तो फिर वो रस ही खेच लेता है, तुम्हें
- 13:00भीतर बस रस लग जाए, एक बार एक बार रस लग जाए।
- 13:14फिर तुम्हें कुछ करने की आवश्यकता ही ना मंत्र जाप, ना तंत्र जाप,
- 13:19ना साधन, ना पांच, ना ना राधा, ना राम।
- 13:24कुछ करने की आवश्यकता नहीं। शंकर मंदिर में भी मैं बैठता तो
- 13:29कुछ ना करता। मैं तो भजन गाता।
- 13:35या आराम से बैठ जाता आके बंद करके घंटों बैठ जाते यही मेरी दिनचर्या
- 13:42थी। मैंने कहा जब गिरि नारी बाबा आप
- 13:51हैं। गुरु से मांग सकता है तो मैं भी
- 13:54बाबा से मांग लूँ। कबूतरों को, पंछियों को, चिड़ियों
- 14:01को, गाँव को बहुत पंछी दीवार दो, ते थे इनका पेट भर जाए करेगा।
- 14:12बेचारे शान से आराम से सोएंगे मैंने बाबा से फरियाद की, बाबा ये
- 14:25नंबर वगैरह क्या होता है मुझे भी दे दिया करो पक्षियों के लिए कुछ
- 14:32चोगा वगैरह लिया है घर से तो? खाने पीने को तो खूब मिल जाता है।
- 14:39जितना चाहे दूध पीओ, जितना चाहे मलाई खो जितना चाहेगी रोटी वगैरह।
- 14:46मज़े से मिठाई खाओ जितना कोई कमी नहीं है, लेकिन इन पंछियों का
- 14:52क्या होगा? इन क्रय को बंदोबस्त कर दो।
- 14:59बाबा के आंटी ठीक है, जब तुम्हें चाहिए हो मुझे बता दिया करो, मैं
- 15:06तुम्हें नंबर दे दिया करूँगा। उस वक्त यहाँ आस पास से लगता था।
- 15:14डब्बा ली रखता था, मलोट लगता था भजिंडा लगता था हम आमतौर से डब्बा
- 15:22ली चाके लगाया करते है, सुबह पैसे आ जाते है।
- 15:33और मैं करीब ढ़ाई क्विंटल कनक बाजरा चावल महीने भर में डाल देता
- 15:48बस इतना ही खा सकते है। इतने पंछी थे एक महीने भर में
- 15:58सारे पंछी, ढ़ाई क्विंटर चावल, कनक बाजरे।
- 16:07इससे पूरे संतुष्ट हो जाते तरफ हो जाते।
- 16:10थोड़ा सा बच जाता है तो मैंने हिसाब लगाया की 8.25 किलो अगर डाल
- 16:17दिया जाए तो उनका पेट भर जाता है। गोशल मंत्र आते हुए मैं रोज़ जिले
- 16:27के आता नित्यप्रति का काम था। तो पैसे खत्म हो जाते।
- 16:33कई बार तो मैं कहता चलो मांग लेंगे मिल तो जाएंगे तो किसी
- 16:40मित्र से मैं उधारित ले लेता हूँ ना।
- 16:44कई बार तो ऐसी नौबत भी आई की मैं ब्याज के ऊपर भी पैसे।
- 16:50और चोगा डाल देता चोगा नहीं, मैंने रुकने दिया।
- 16:54मैं तो तुम तक बरसों तक मैं चोगा डालता जब तक मैं गया हूँ साला तब
- 17:04तक ये रूटीन बन गया था मेरा। नीचे फर्जी का कर्म बन गया था।
- 17:09पंछियों के लिए चोखा जरूर ले के जाता और सुबह कुंडों को मांगता
- 17:14ताजा पानी भरता हूँ और दो तीन कुंडों से वहाँ भर के रख देता
- 17:20हूँ। फिर जब पैसे की तंगी आती, कम ही
- 17:28आती और मांगने वाले मांगते तो बाबा से कहता बाबा नंबर देता,
- 17:36बाबा नंबर दे देते, सुबह लगा देते पैसे आ जाते, ऐसे ही सर्कल चलता
- 17:42रहा। मुझे कोई जरूरत नहीं थी।
- 17:49खाना पीना सब ठीक था, मैं जैसे जिंदगी गुजर रही थी, कुछ नहीं
- 17:56करता था। शोक कुछ था नहीं।
- 18:04जैसा मिल गया, कुरता पजामा जैसा डाल लिया, कदर का मिल गया ऐसे
- 18:17क्योंकि बड़े मज़े से लेकिन 1 दिन।
- 18:27क्या हुआ कि जीस व्यक्ति के पास में जाके लगाता था।
- 18:34वो तंग आ गया मेरे उसने पॉलिसी में शिकायत कर दी।
- 18:40योर ये लोग जो होते हैं पॉलिसी वगैरह को पैसे देते हैं।
- 18:49अभी तक मैं जाप करता था और जाप भी कभी शंकर जी का, कभी हनुमान जी
- 19:02का, कभी काली माता का, कभी भैरव जी का।
- 19:11जब तक एक का पता नहीं चलता तब तक व्यक्ति अनेक में ही उलझा रहता
- 19:17है। अनेक तब छोड़े जाते हैं जब एक का
- 19:23पता चल जाता है। और एक का पता चलता है समोदी के
- 19:30वक्त समाधि के, इसलिए कबीर ने कहा एक साध है सब साध है, सब साध है,
- 19:39सब जाय। ज़िन्दगी मज़े से चल रही थी।
- 19:46दिन में भी मैं जब मन करता ज्योति जला लेता हूँ और मंत्र जाप करता
- 19:54हूँ ये मंत्र जाप की आज जो मैं इतना आपसे बता रहा हूँ ये निंदा
- 19:59नहीं करता, आज मेरा अनुभव है मंत्र जाप से खुश।
- 20:05बहुत वर्षों वर्षों तक मैंने किया करोड़ों करोड़ों जाप किए मैंने
- 20:12लग्न वक्त सब था, कोई काम नहीं तब समझ सकते हो कि मैं कितना जाप
- 20:20किया? ऐसे ही नहीं मैं बोलता हूँ, मैं
- 20:24प्रैक्टिकल अनुभव के बिना कोई बात नहीं बोलता हूँ।
- 20:27मैंने बहुत ही जब्त किया है लेकिन उसका परिणाम कुछ नहीं है।
- 20:35पंचों के बोख और पंछों के साथ में।
- 20:39कीड़ों के भान बहुत होते थे वहाँ पर तिल, चावल, शक्कर, रोटी डालते
- 20:44रास्ते में कुत्ते भी मिल जाते हैं उनके लिए बिस्कुट ले जाता, घर
- 20:49से रोटियां ले जाता रात की। ऐसा नित्य प्रति का कांत और कोई
- 21:03साधना, नीती, मन आया तो कर लिया कोई अनुष्ठान नहीं, कोई कुछ नहीं,
- 21:08कोई मन में संकल्प नहीं कि जे मैं इतना करूँ, मैं इतना करूँ।
- 21:17योग किया वस्ती, धोती नेती, न्योली, बजरौली सब किया मैंने
- 21:29परमात्मा तक पहुंचने के जीतने रास्ते उसमें से काफी मैंने आजमा।
- 21:35मिला। किसी से ऐसे ही मैं किसी को कंडम
- 21:44नहीं करता हूँ। मैंने इन गलियों कूचों को खूब
- 21:49छाना। फिर भाई ने दुकान कर ली।
- 22:00फिर मैं थोड़ा थोड़ा काम करने या परचेजिंग करने लगा।
- 22:03बाहर 1980 में मेरे भाई की मृत्यु हो गई।
- 22:111979 में मेरे पास तो गौशाला में अंदर आया।
- 22:14ये बायोग्राफी में लिखा हुआ है। उसके आगे की कहानी तुम पढ़ सकते
- 22:19हो तब तक का सफर है। 1973 में मैंने घर छोड़ दिया।
- 22:33बिराद बहुत आ गया 1970 की घटना ट्रेन इंसिडेंट की घटना 1975 में
- 22:42प्रथम बार भगवान शंकर के दर्शन किसी की दुकान के ऊपर बैठा और
- 22:48मैंने। परसों बाहर आये थे।
- 22:52इतना सुन्दर रूप मूव तो करने वाला भगवान शंकर मुस्कराहट से बोले
- 23:04क्या मानते हो? मैंने देखा सामने एक लड़की को।
- 23:17अब मेरे जी का जंजाल बन कर ये मैं क्या मान लिया?
- 23:24प्रथम बार आया कोई भगत ही नहीं, कुछ नहीं किया था उससे पहले।
- 23:35लेकिन वो ही 73 में जब घर छोड़ा तो हनुमान जीके रूप में जब टीटी
- 23:40मिले तो मैंने कहा तुम्हारी पूछ तो है नहीं कद इतना ऊंचा की गाड़ी
- 23:51की छत से लगता बस थोड़ा सा। विशाल चेहरा लाल सुर्ख डीटी का
- 23:58वस्त्र पहन रखा वर्दी हाथ में टिक टिक टिक टिक मुझे बाबा कहने लगे
- 24:09दिखाओ मुझे पता नहीं था बाबा बेधड़क।
- 24:16मैंने कहा पकड़ लेंगे जेल में डाल देंगे वहाँ पड़े रहेंगे कोई बात
- 24:20नहीं अपूर्ण कोई करना छोड़िए, मुझे कहने लगे बेटा टिकट मैंने
- 24:34कहा टिकट। नहीं है नहीं है।
- 24:41मैंने कहा नहीं है हम्म सभी हँसने लगे आस पास के नहीं है क्या?
- 24:52मैंने कहा फ्रेश है नहीं। कहाँ से आए बदलवा क्यों आए, संत
- 24:59बनने आए कहाँ चले हरिद्वार घर से भाग किया नहीं कुछ किया।
- 25:16वो आगे चले गए। लश्कर जंक्शन से बुला के मुझे
- 25:20कहने लगे चलो मेरे साथ चलो वेटिंग रूम में बैठ गए, भूख लगी, पराठे
- 25:31खायी, चाय पिया, खूब घनी सारी चाय पिया।
- 25:35आगे ही था मैं मुझे कहना था कि मुझे पहचानना मैं हनुमान, मैं कहा
- 25:51हनुमान तो पूछ तो है। और थोड़ा मुस्कराये कहते तुम ऐसा
- 25:59करो, वापस चले जाओ बच्चे हो यहाँ सब दुष्ट बैठे है लुच्चे दफ्फार
- 26:06बैठे है बदमाश बैठे है यहाँ 73 की बात।
- 26:13राजनीति में कोई रुचि नहीं। मुझे नहीं पता उस वक्त कौन चीफ
- 26:17मिनिस्टर होते थे। लोग से रफनते बैठे हैं यहाँ साधु
- 26:21और संत और सब बेईमान है। धोखेबाजी किसी ने कुछ उपाया नहीं
- 26:28सब। सबका धंधा है लूटना तुम जाओ, उलझ
- 26:33जाओगे, बच्चे हो वैसे भी भोले लगते हो जाओ मैं कहा नहीं जाऊंगा,
- 26:46एक बार तो मैं जाऊंगा। ऋषिकेश जाऊंगा वहाँ कब करूँगा?
- 26:54मैं फिर अपना टारगेट पाके और फिर मैं कहीं जाऊं तो।
- 27:07बाबा कहते नहीं जा सकोगे तुम तुम कहते हो तो मैं तुम्हें टिकट ले
- 27:12लेता हूँ वापसी लेकिन मुझे जाना पड़ा सारे बायोग्राफी में लिखा
- 27:20हुआ है। खैर, धारणा की बात।
- 27:31तो जहाँ मैं लगा के आया करता था नंबर, उसने मेरी शिकायत कर दी और
- 27:41मैं कोई ऐसा इल्लीगल काम नहीं करता था जो है तुम्हें बता दिया
- 27:46ऐसा करता था। तो मैं आराम से बैठा हूँ, माला थी
- 27:55मेरे पास 1000 मनके की बैठा राम राम कर रहा था राम राम राम राम।
- 28:12विजय भगवान शंकर के अंदर ऐसा करो जहाँ से निकल जाओ।
- 28:19मैंने क्यों नहीं पूछा मैंने चटकनी खोली दरवाजा लकड़ी का
- 28:31दरवाजा था। बाहर निकल गया और बाहर निकल गया
- 28:35तो मैं क्या देखता हूँ? सारी तरफ खूब पुलिस भरी पड़ी है।
- 28:48बाबा ने कहा धरना कर रही हूँ कि तुम्हें कोई नहीं देख रहा हूँ
- 28:56मैं। मुझे ढूंढने आए और मैं उनके बीच
- 29:01में खड़ा हूँ, मैंने धारणा की तो मुझे कोई नहीं देख रहा है और सब
- 29:10के बीच में खड़ा हूँ आराम से जा रहा हूँ मेरे घर कुच्चा और उन तरफ
- 29:16से घर। करीब 7080 पॉलिशकर्मी होंगे।
- 29:25पूरा स्टाफ मुख्सर का सियास्ता बुलाएगा।
- 29:31ये धारणा की शक्ति होती। जैसे ही तुम अपने भीतर जितना गहरी
- 29:37चले जाओगे, धारणा उतनी ग्रहण हो जाएगी।
- 29:40तुम जो सोचोगे वही हो जायेगा। बाबा कहते तुम धारणा कर देना के
- 29:46तुम्हें कोई नहीं देख रहा है, कोई नहीं देख सकता।
- 29:53और मैं काफी देर उनके भीतर खड़ा रहा हूँ।
- 29:58मुझे ही ढूंढने आये, मुझे ही पकड़ने आये, उनको पता ही नहीं था
- 30:02कि हमारे भीतर है वहाँ से मैं चला गया हमारे धोबी हो जाता है सूरज
- 30:08या धोबी अब तो पता। उसके दुकान के ऊपर बैठ गया।
- 30:13मैं जाके बातचीत करने लगा। इतने एक मोहल्ले से व्यक्ति बच्चा
- 30:22आया, मुझे कहने लगा आपके घर में पॉलिसी मैंने कहा।
- 30:32नहीं कोई इल्लीगल धंधा तो करता हूँ, आ गई तो आ जाने को उनका घर
- 30:38बैठ जाएंगे पानी पानी पी जाये। थोड़ी देर में एक मित्र मुझे आया
- 30:50और कार में बैठाया। और कहते हैं यहाँ से निकलो ये जो
- 30:58यहाँ का सी आई स्टाफ का हेड है बदमाश करनैल सिंह ब्रॉड नाम बता
- 31:04दो, अब तो पता नहीं कहाँ है बड़ा तिरिन्ता व्यक्ति है ऐसा।
- 31:18चलो तुम बैठो, तुम्हें भटिंडा छोड़ के आता मैं बैठ गया मुझे
- 31:25भटिंडा छोड़ रहा है धारणा पी सकता है धारणा।
- 31:38कैसे परिपक्व होती है जैसे जैसे तुम अपने भीतर गहरा होता है सूत्र
- 31:45मैंने बता दिया आरती कैसे फुर्सत के लम्हों में चुप करके बैठ जाओ।
- 31:52पहले मन बहुत बोलेंगे। कितना भी बोले तुम शांत बैठे रहो।
- 32:03कितना ही बोले कितना ही डराए। कितना ही ऊहा पांव करे, कितना ही
- 32:09शोरगुल मचाये। तुमने उसमें भगवान नहीं करना
- 32:13इंटरफेरेंस नहीं करना बोले तो बोले धीरे धीरे उसकी आवाज कम होती
- 32:24जाएगी और धीरे धीरे उसकी आवाज चुप हो जाएगी।
- 32:31बाबा नहीं आये, इशारा किया शुरू शुरू में चुप बे, चुप ना हो भाई
- 32:37ये लाय रहा ले बतार अगर तुम आराम से बैठ जाओ होठों को बंद करके।
- 32:54तो मन पहले तो बोलेंगे खूब बोलेंगे, लेकिन तुम आराम से बैठो,
- 33:01कुछ ना करो ध्यान कॉन्सेंट्रेट भी मत करो, बस बैठ जाओ सहज जैसे तुम
- 33:08बैठ जाओ। चुप पे चुप न हो गई धीरे धीरे
- 33:15धीरे धीरे धीरे धीरे ऐसे नहीं चुप होगा मैं ऐसे चुप होगा ऐसे बाबा
- 33:20कहते हैं बस आराम से बैठ जाओ जैसे लीव लगी हो, व्यक्ति की आँखें
- 33:27मूँद लो। मन चलेगा, खूब चलेगा, खूब चलेगा,
- 33:31चलने दो, रोको मत, एक सूत्र याद रखना, इससे लड़ाई मत करो और उसके
- 33:38पीछे मत लगो। इस सूत्र को याद कर लो मन जितना
- 33:43भी बोले बोले उसे रोको मत। ना उसके पीछे चलो ना उससे झगड़ा
- 33:52करो यह सूत्र अगर तुम्हें याद रह गया और तुम्हारे अंत में चला गया
- 33:57तो समझ लो 1 दिन तुम अपने भीतर अंत स्थल में पहुँच जाओगे इसको
- 34:02आखिरी छोर कहते हैं। धारणा की शक्ति ऐसी हाँ जी कैसे
- 34:16है चुप करके बैठ जो लोग ज़िन्दगी में कभी चुप नहीं हो रहे।
- 34:30जिन्होंने फुर्सत के लम्हे कभी मानी नहीं, पहले कॉम्पिटिशन लड़ते
- 34:37रहे। आयास के एग्ज़ैम में पास हुए, फिर
- 34:41नौकरी लग गए, फिर त्यागपत्र दे दिया।
- 34:45फिर गीता पे आज प्रवचन कर रही है अष्टावकर गीता पे प्रवचन कर रही
- 34:49है। देखा दिखाया कुछ अनुभव कुछ है
- 34:54नहीं। गीता के ऊपर प्रवचन करते हैं,
- 34:57व्याख्या करते हैं तो ये खोपड़ी की व्याख्या है, क्योंकि भीतर तो
- 35:02गए नहीं। उपनिषद की व्याख्या करो, अष्टवकर
- 35:10की गीता की व्याख्या करो, लेकिन ध्यान रखना खोपड़ी की व्याख्या
- 35:15सही नहीं है। व्याख्या वही सही होती है जो तुम
- 35:21उस स्तर पर। जहाँ आनंद का खजाना भरा पड़ा है,
- 35:25उस सतल को छूकर हम किसी की भी यात्रा करते हैं।
- 35:30फिर तुमने पढ़ा नहीं पढ़ा, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता तुमने
- 35:35अपनिश्चित पड़े गीता पढ़ी अष्टबकर गीता पढ़ी, पढ़ी कि नहीं पड़ी,
- 35:40कोई बात नहीं। लेकिन तुम सिर्फ उस छोर को छू लो,
- 35:46फिर प्रत्येक शब्दकार तुम बहुत ढंग से अनुभवी ढंग से बोल सको,
- 35:52अन्यथा तुम खोपड़ी से एनालिसिस करोगे और खोपड़ी तार की खोपड़ी
- 35:59अनुभवी नहीं है। खोपड़ी तार्किक है।
- 36:03इस बात को आप अंडरलाइन खोपड़ी तार्किक है, खोपड़ी अनुभवी नहीं
- 36:12है और तार्किक एक्सप्लेनेशन सदा ही गलत होती है।
- 36:17अनुभवी एक्सप्लेनेशन सदा ही सही होती है।
- 36:22तो मेरी इन बातों को और से सुन कुछ नहीं करना, आराम से बैठना एक
- 36:35स्थान पे कितना आसान है बड़ी बात है थकोगे भी नहीं।
- 36:45जाप करोगे पांच नाम का राधे राधे का एनर्जी लाइसेंस हो जाओगे, थक
- 36:51जाओगे तो नींद आ जाएगी। अगर खाली बैठे रहे तो नींद आएगी
- 36:58तो वो नींद होगी। योग निद्रा और अगर जाप करके नींद
- 37:05आई तो योग निद्रा नहीं होगी, वो होगी एनर्जिलेस थकी हुई निद्रा
- 37:17जैसे तुम दिन भर काम करते हो। एनर्जी से खाली हो गए थकावट की
- 37:28नीयत और मैं बात कर रहा हूँ योग नेत्रा जहाँ तुम मिलते हो
- 37:35क्रमात्मक वह बड़ी आनंद आया होती है।
- 37:40और यह निद्रा जो थकावट से आएगी। पांच नाम से आई चार नाम से आई राम
- 37:45नाम से आई राधे राधे से आई यह थकावट की नींद में ले जाएगी।
- 37:52योग निद्रा में नहीं ले के जाएगी और मुर्छा में योग निद्रा में
- 37:57जमीन आसमान का फर्क है। मोर्चा में आनंद नहीं होता, आराम
- 38:02होता है, योग नेत्रा में आराम नहीं होता।
- 38:07आनंद होता है एक एक शब्द को ध्यान से खंगाल लेना।
- 38:20बहुत आसान जितना मुश्किल बना दिया दार्शिकों ने उतना ही मुश्किल
- 38:29तुम्हारा जीवन हो गया परमात्मा को पाना।
- 38:37बलेशा कहते हैं वो तो पटना के दरलाना रब दा की पाणा वो तो फूटना
- 38:46ए दरलाना इतना आसान है इसलिए जिसे मिल जाता है उसके लिए बड़ा असर।
- 38:56जिसे नहीं मिलता उसके लिए तो जैसे पहाड़ है।
- 39:02एवरेस्ट की चोटी के ऊपर चढ़ना भी आसान परमात्मा को पाना बड़ा
- 39:09मुश्किल है लेकिन कोई मुश्किल नहीं है।
- 39:12आसान से आसान अगर इस धरती पे कोई काम है तो वो है।
- 39:15परमात्मा को पाले क्योंकि परमात्मा तुम हो और तुम्हें तुम
- 39:22तक पहुंचाने के लिए कुछ भी तो नहीं करना होता।
- 39:26कुछ भी किया तो तुम चूके परमात्मा से ये कर कर ही के तो तुम दूर
- 39:33निकले हो। 1% छोटा आ रहा है कि अगर तुम
- 39:43परमात्मा ही हो तो फिर परमात्मा हो ही क्यों नहीं जाते?
- 39:54पता क्यों नहीं लग जाता कि तुम परमात्मा हो?
- 39:59तुम परमात्मा तो हो, लेकिन तुम दूर निकल गए हो सपना देख रहे हो
- 40:09और यह आराम से बैठना आँखें बंद करके आँखें मूँद के यह तुम्हें रस
- 40:16विभोर कर देगा और रस तुम्हें ले जाएगा।
- 40:20अंत स्थल में तो रस एक काम करेगा अंत स्थल में ले जाएगा कैसे ले के
- 40:31जाएगा क्योंकि तुम स्वप्न देख रहे हो?
- 40:38इस स्वप्न में तुम राजा हो गए, तुम भिखारी हो गए स्वप्न में तुम
- 40:43कंगाल हो गए स्वप्न में तुम सेंसे हो गए तो जब तुम अपने आप से जुदा
- 40:53हो गए, दूर निकल गए, सपने में ही निकल गए।
- 40:59लेकिन सपने को भी तो तोड़ना ही होता है।
- 41:02कई बार नींद बड़ी गहरी हो जाती है, सपना भी बड़ा ऐसा सुंदर आता
- 41:09है कि तुम तोड़ने का मन नहीं करता तो सपना भी तो तोड़ना होता है,
- 41:16कुछ तो करना ही होगा। सपना तोड़ने के लिए सपने लेने
- 41:22वाले को जोड़ना होगा कि उठ भाई लेकिन सपना देखने वाला अगर सुन्दर
- 41:32सपना देख रहा है। तो कहेगा तुम मुझे सो लेने दो।
- 41:38आराम से हवा ठंडी चल रही है। सारी रात सोनी सका।
- 41:43गर्मी थी अब ठंडी हवा में थोड़ा विश्राम ले लेने दो तो उसको भी
- 41:51झंझोड़ना पड़ता है, सपना भी तोड़ना पड़ता है।
- 41:59और बस सपने को तोड़ने के लिए किसी मंत्र की आवश्यकता नहीं।
- 42:06सपने को तोड़ने के लिए तुम्हें हिलाना है तुम्हें शेक करना है
- 42:13तुम्हें जोड़ना है। कोई मंत्र उच्चारण नहीं करना
- 42:19होता, उससे नींद नहीं करती, सपना नहीं जुड़ता हिलाना है, जी जोड़ना
- 42:25है। अब ध्यान रखो अगर तुम मीठे मीठे।
- 42:33पांच नाम सुनाने शुरू कर दिए तो नींद और गहरे हो सकते हैं।
- 42:38ऐसा ही हुआ है। कभी कभी राधा राधा बोलने से मेरी
- 42:45माँ मुझे सुनाया करती थी राधे बोल राधे बोल मैं सो जा।
- 42:52नींद गहरी हो जाया करती थी तो कभी कभी राधे राधे बोलना नींद को और
- 42:59गहरा कर देता, लेकिन तुम्हें जागना है परमात्मा तो तुम हो,
- 43:04सपना देख रहे हो, सपने को तोड़ना है और कभी कभी तुम्हारा न हो लोरी
- 43:11बन जाता है। फिर वह लोरी तुम्हे और गहरे सपने
- 43:17में धकेल देती है और तुम और मूड हो जाती हो तुम उससे और दूर हो
- 43:26जाते हो। इसलिए मैं कहता हूँ इन नाम वाम के
- 43:31चक्करों में मत पड़ो, जब तुम्हारी लोरियां बन गई हैं, तुम पहले से
- 43:37ही सोए हुए हो, नींद गहरी है, सपना भी आ रहा है, बड़ा सुंदर
- 43:43सुबह का वक्त है, हवा ठंडी है, संसार तुम्हें अच्छा लगता है।
- 43:51जागो जागना ही एकमात्र हल है सपने को तोड़ने का अनथा से ज़िन्दगी
- 44:03में उलझुल के तुम सपने ही लेते रहोगे।
- 44:08बस और कुछ नहीं करना कोई कुछ विज्ञान भैरव तंत्र के 112 विद्या
- 44:12नहीं अपनाना तुम सपना लेते लेते पता नहीं कहाँ पहुँच गए हो, लेकिन
- 44:20याद रखना सपने में पहुँच गए हो, सत्य में नहीं पहुंचा।
- 44:26सपने में कोई कलकत्ता निकल गया, कोई बॉम के कोई दिल्ली, कोई
- 44:29मद्रास, कोई फॉरेन में निकल गया। मैं बहुत बार सपने में फॉरेन में
- 44:34निकल जाया करता था। अपने भाइयों के पास अमेरिका में
- 44:43वहाँ बैठा हूँ उनके कोठे। सपने का क्या है सपना तो यू चाहे
- 44:48ही ले लो और बड़ा मजेदार सपना होता है।
- 44:55एक संत कहते है की तुम जागो सपना तो पहले से ले रहे है।
- 45:02सपने में नाम जब से नहीं होगा नाम जब तो लोरी बन जाएगा तुम्हारा
- 45:06सपना और गहरा हो जाएगा इसका एकमात्र हल है जागो जागते ही
- 45:17सपना, टूट जाएगा आँखें खोल। देखोगे ये सपना था जो मैं देख रहा
- 45:25था पाओगे कि जहाँ भी निकला, इतनी दूर निकला हूँ तो मैं वहीं उसी
- 45:33चारपाई पे सोया हूँ, कहीं केरकेट्टा नहीं गया, कहीं
- 45:38न्यूयॉर्क नहीं गया। वहीं पाओगे अपने आपको जहाँ रात को
- 45:43सोए इसलिए दादू कहते हैं को नहीं दूं जी मन की दौड़ दौड़ मिटी संसह
- 45:54गई वस्तु ठोर की ठोर जहाँ रात को सोए जाएं उसी को।
- 46:01उसी टूटी खाटड़ी पे पाओगे अपने आप को तुम देख लेना जीस पे सोये थे
- 46:10उसी पे मिलोगे सूपने में कहीं भी चले गए।
- 46:17सपने में ज्यादा मत उलझो और सपने को तोड़ने के लिए इन लोरियों का
- 46:22इस्तेमाल ना करो। ये लोरियां तुम्हारे सपने को और
- 46:27गहरी कर देंगी। नहीं कभी कभी मीठे गायन की तरह बन
- 46:32जाती है तुम्हें थपथपाती है और जैसे बच्चा सो जाता है, वैसे तुम
- 46:36भी सो जाते हो, नींद और गहरी हो जाती है मूर्छा और गहरी हो जाती
- 46:42है छोड़ो इन नामों को तुम जाओ। आँखें खोलना ही एक मात्र उपाय है,
- 46:51दूसरा कोई उपाय नहीं और संक्षेप में बोलूं की मैं कुछ नहीं कर
- 46:58सकता। क्या मेरा सौभाग्य हुई है?
- 47:05क्या मुझे ऐसा हुआ था? वर्ण मिला।
- 47:08प्रकृति ने मुझे ऐसा कर दिया, ऐसे संसाधन दिए सब खाने पीने को मिला
- 47:25और खाली वक्त मिला। यह मेरे लिए सबसे बड़ी इनायत थी
- 47:30बर्मा। तुम भी खाली वक्त बहुत है।
- 47:36बेरोजगारी बनी तो खाली वक्त में तुम नारेबाजी करके थक जाओ, लट्ठ
- 47:46वगैरह खा लो। पानी के बछारें वगैरह सह लो, ठंडी
- 47:51में तो घरा के खटड़ी पे आँखें बंद करके रह जाया करो, कुछ मत किया
- 47:57करो और कुछ नहीं तो अपने ही भीतर उतर जाओ, रोजगार वगैरह की उम्मीद
- 48:06मत करना। महंगाई कम होने की उम्मीद मत
- 48:12करना, यह तो मुमकिन नहीं है। तो मेरी बात को ध्यान से सुन के
- 48:23मैं खुश नसीब हूँ। कि मुझे कोई काम नहीं करना पड़ा।
- 48:28बचपन में बहुत काम किया लेकिन जवानी जवानी पड़े मज़े से गुजरे
- 48:33और उसका मैंने भरपूर लाभ उठाया। भगवान शंकर की कृपा और उनका
- 48:42मार्गदर्शन। कुछ ना करो का एक या माटो सीधा सा
- 48:48रस्ता कुछ ना करो, कुछ न करो नथ्थिंग टु डू और ये मुझे वहाँ ले
- 48:57गया जो कुछ नहीं करते। कुछ न करने से शुरू करो पर वहाँ
- 49:12पहुँच जाओ या कुछ नहीं करना हल्का हल्का शुरू रहेगा और आनंद से शुरू
- 49:20करो, वहाँ पहुँच जाओ, जहाँ पर आनंद की सुगंध आएगी।
- 49:27जहाँ प्याले भरे पड़े हैं जहाँ आनंद के और खुमारी के प्याले भरे
- 49:39पड़े हैं, भर भर के प्याले के मस्ती से, समुद्र में अठखेलियां
- 49:45करो, स्नान करो, उस तीर्थ में कहीं मत भागो।
- 49:50बाबा की बातें पर कुछ सत्य निकली घर मिलेगा जो मिलेगा मत जाओ यहाँ
- 49:56रुचे लफंगे चोर बदमाश सब करते हैं और उसके बाद मैंने जाना कि बाबा
- 50:03ने कितना अपकार किया मेरे? तुम मेरा आभार न किया करो, तुम
- 50:18आभार करो, शंकर भगवान का करो, तुम आभार करो हनुमान इन दो शक्तियां
- 50:29ने इन दो महानुभावों ने इन दो। करूणाजनक उपस्थितियों ने मुझे उस
- 50:41स्थल पर जाकर खड़ा कर दिया जहाँ कोई इच्छा शेष नहीं हो जहाँ कोई
- 50:47वासन शेष नहीं हो। जहाँ कोई डर नहीं, कोई बह नहीं,
- 50:53कोई वैरी नहीं और किसी का कोई भी लालच लोग नहीं निर्वासन जो मरता
- 51:06नहीं, जो जन्मता नहीं। जो किसी योनी में नहीं जाता।
- 51:14जो आनंद शुरू है, अकाल मूर्ति है और मिलता है गुरु प्रसाद से मुझे
- 51:22भी गुरु प्रसाद से मिला बस ये ठीक के गुरु?
- 51:30शरीर में नहीं था। असरीरी गुरु था, असरी ही हनुमान
- 51:36जी थे और असरी ही शंकर जी थे। दोनों ने मेरा मार्गदर्शन किया और
- 51:44दोनों की कृपा से आज मैं आपको बोला।
- 51:47और सरलतम ढंग से बोलने की मैंने तुम समझना और समझ कर भीतर हृदय
- 51:57में उतार लेना छोड़ो इन बकवासों को नाम दाम में कुछ नहीं रखा है
- 52:02ये जो बनाया। अहंकार मैं का मरना तो पड़ेगा,
- 52:22शरीर को भी सुर शरीर को भी। अहंकार को भी सूक्ष्म शरीर दोनों
- 52:33ही मरेंगे। दोनों ही राख होंगे।
- 52:36पशु में भूतों के इनको बचाने की चेष्टा न करना, इनको बचाने के
- 52:43चक्कर में तुम इतनी बड़ी खुशी से। मेहरू हो जाओगी?
- 52:54जो खुशी एक बार हो आती है और फिर कभी जाती है बाकी खुशियां आती
- 53:03हैं, थोड़ी सी देर के लिए आती हैं, फिर चली जाती हैं।
- 53:08लेकिन यह खुशी ऐसी खुशी कि एक बार आई और फिर कभी न करें के बैठ जाओ
- 53:17कुछ न करो बस इंतजार करो, धीरे रखो वो जब आएगा आ जायेगा,
- 53:23जल्दबाजी न करो। अभी आ जाए क्यों नहीं आया?
- 53:28ऐसी शिकायत न करो, बस इंतजार करो और धीरे रखो जब आना है आ जाएगा आ
- 53:38जाएगा बस तुम तो ये धीरज बनाए रखो, प्रतीक्षा रखो।
- 53:44प्रतीक्षा और पुकार तुम्हें बिरहा की अग्नि में ले जाती और बिरहा की
- 53:51अग्नि उसे खींचने में समर्थ हो जाती है।
- 53:56हज होना। आज हो न आये सावन वे सजा।
- 54:41सावन भी ता ज है आज हूँ ना आए बालमा सावन भी।
- 54:59आज इंतजार, प्रतीक्षा और धीरज जब आएगा आजायेगा धन्यवाद।