Latest / Baba ji Vijay Vats / 5 May 25 - ध्यान कैसे करें? तुरिया अवस्था तक पहुँचने की सरल विधि! क्या आप सही ध्यान कर रहे हैं?
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- 0:04बाबा आप कहते हैं, भोगो भोग में दुख है, स्टॉक भी यही कहते हैं।
- 0:20हमने सब कुछ भोंका, सब भोंका और भोगने के बाद कोई वास न बाकी न
- 0:33बचे सब देख लिया। जिसे आप कहते हो के कामनेस में आ
- 0:42जाओ ठहरों वो भी हो गया, लेकिन मन फिर भी तड़पता है अब क्या रह गया
- 0:54भक्य? क्या सुंदर सवाल है जिसने भौंक
- 1:09दिया है? जिसके भीतर ठहराव आगे को ही ऐसा
- 1:17प्रश्न पूछ सकता है। भोग भी भोगों से दुख भी मिला।
- 1:28भोगों से काम न भी आए। शोर शराबा रुका क्रिया जो करता
- 1:37हूँ घर दो गवार सब निकल गया, ठहराव भी आ गया रुक गया मन।
- 1:49लेकिन जो आप कहते हैं वो नहीं आया।
- 1:53अब क्या कमी रहेंगी? बाबा अति सूक्ष्म से सूक्ष्म का
- 1:58सवाल है, कोई वरला ही इस प्रश्न को पूछ सकता है इनडैरेक्टली तुम
- 2:08प्रश्न पूछ रहे हो? व्हाटस दी डिफरेंस बिटवीन कलमनेस
- 2:12एंड पीस कोलहल हीनता और शांति पीस में क्या फर्क है?
- 2:32आप घर में बैठे हो? बच्चे शोर कर रहे हैं, खेल रहे
- 2:37हैं, उत्पात मचा रहे हैं, यही उम्र है उत्पात मचाने की।
- 2:44बेवजह शोर शराबा करते हैं, गलकारियां मारते हैं, नाचेंगे,
- 2:49कूद देंगे, भागेंगे, दौड़ेंगे। उनकी उम्र है आपने, वो सब कर
- 2:58लिया, कभी आपने भी किया था उस उत्पाद से आप घबरा जाते हो, ध्यान
- 3:14रखिए इसे कहते हैं कोलाहल। कोलाहल शोर है यह शोर आपको अच्छा
- 3:24नहीं लगता आपका अंतः कहीं ना कहीं कहता है कि इस शोर से दूर हो जाओ।
- 3:39और तो तुम्हें कोई उपाय आता नहीं। तुम उस स्थान से हट जाते हो, ऊपर
- 3:44के कमरे में बैठ जाते हो, वहाँ शोर नहीं है इसे कहते हैं,
- 3:50कामनेस। शोर का न होना कोलाहलहीनता इसे
- 3:59कहते हैं कॉम्बनेस लेकिन अनुज मिश्रा पूछ रहे हैं बाबा इससे आगे
- 4:09और क्या है? इससे आगे एक पड़ाव है।
- 4:17कोलार हीनता से आगे है शांत अभियान से समझना कोलार, हीनता,
- 4:30नॉइज़, लेस, लेस। ये नेगेटिव है, नकारात्मक है, शोर
- 4:38नहीं है, बस विधायक जैसा कुछ नहीं है।
- 4:43इसमें ऋणात्मक है, नेगेटिविटी है, शोर नहीं है।
- 4:55लेकिन लुत्फ भी नहीं है, शोर भी नहीं है, लुत्फ भी नहीं है में से
- 5:03एक कदम और आगे जाने को कहता हूँ कोलाहल से दूर आ गए।
- 5:12नीचे बच्चे थे, शोर मचाते थे, भाग दौड़ करते थे, नाचते कूदते थे, हो
- 5:16हल्ला करते थे, तुम उठ कर ऊपर आ गया, यह शोर नहीं।
- 5:29इस शोर होल न होने का नाम है नॉइज़ लेस्नेस यानी कमनेस शोर
- 5:36हीनता। लेकिन मैं तुम्हें कहता हूँ कि
- 5:40शोर हीनता में ठहर मत जाना। इससे आगे और क्या है?
- 5:47और भी है। और भी गम है जमाने में मोहब्बत के
- 5:59सिवा राहतें और भी हैं। वसल की राहत के सिवा कोलहल हीनता
- 6:15तुम्हारा ध्येय नहीं है। सुख तो मिलेगा, ठहराव आएगा, अच्छा
- 6:24लगेगा तुम यहाँ रुके हुए रह सकते हो, अब रात को तुम निद्रा में
- 6:33जाते हो। निद्रा में कुलाहल हीनता नहीं
- 6:36होती, क्षमा करना कुलाहल हीनता होती है, चुप्पी होती है, साइलेंस
- 6:45होती है, लेकिन पीस नहीं होती। पीस का फायदे मिश्रा की कॉम्नस
- 7:04कोलाहल का अभाव है। कोलाहल नहीं है बस निद्रा में।
- 7:12और जिसकी बात मैं करता हूँ वह मिलती जुलती है कोलाहलहीनता के
- 7:18साथ पीस शांति, वहाँ भी कोई धूम धड़का नहीं है, कोई शोर नहीं है,
- 7:30लेकिन। बड़ा आनंद है, बड़े झरने बहते
- 7:40हैं, सुख के बड़े फूल खिलते हैं। सुगंधियों से भरे।
- 7:55कोलहल हीनता मिलेंगे तुम्हे निद्रा में वो तुम्हे प्रकृति
- 8:01रोज़ ली जाती है कोलहल हीनता में तुम रोज़ जाते हो नॉइसलेस नेस में
- 8:08तुम रोज़ जाते हो? बेहोशी के क्षण में कोलहल हीनता
- 8:13ही होती है। लेकिन एक ऐसा भी क्षण है जहाँ
- 8:22बेहोशी नहीं जहाँ होश होता है होश के उस क्षण में कोलहलहीनता आ जाए
- 8:31ध्यान से समझना इन शब्दों को। होश के उस क्षण में कोलाहल हीनता
- 8:40आ जाए तो उसे कहते हैं शांति पीस देर इस ए लॉट ऑफ डिफरेंस बिटवीन
- 8:46कामनेस एंड पीस कामनेस है चुप्पी। शोर का ना होना और नकारात्मक है
- 8:58कोई चीज़ नहीं है क्या नहीं है शोर नहीं है, लेकिन पीस पीस किसी
- 9:09चीज़ का अभाव नहीं। 30 विधायक है पॉज़िटिव है, किसी
- 9:16चीज़ का होना है वो चीज़ क्या है? वो ही आनंद की फुलकारियां वो ही
- 9:26सुगंधों का आवास। वहीं झड़नों की मंद मंद मुस्कान
- 9:39धीमी धीमी चलती हुई फिजा की हवाएं।
- 9:48कल्पना का वो एहसास जिसमें तुम कभी नहीं डूबे थे, सो ध्यान रखना।
- 10:04तुम आज तक कभी पीस को उपलब्ध नहीं हो रहा हो।
- 10:10पीस को कभी कोई बिरला, बुद्ध, कबीर, नानक उपलब्ध होता है।
- 10:18उलहदहीनता को तो तुम सभी रात्रि में जाकर निद्रा में।
- 10:26कोलाहल हीनता के स्तर को छू लेते हो, लेकिन इससे तुम गलती में मत
- 10:33रहना कि हमने पीस को खा लिया, मैं कहता हूँ पीस तुम्हारा दिये है।
- 10:46इट्स युअर ऐम। तुम्हारी मंजल है वहाँ जाना है।
- 10:5320 विधायक है, शांति विधायक है और कोलहल हिंता।
- 11:04नेगेटिव है प्रकृति तुम्हें ज्यादा से ज्यादा कुलाहलहीनता के
- 11:14भीतर ले जा सकती है। पीस के भीतर जाना प्रकृति के बस
- 11:19से बाहर है। पीस में उतरना तो तुम तुम अपने ही
- 11:38कृत्यु से कर सकोगे। जो तुम करोगे उससे पीस में उतर
- 11:46जाओगे। क्या करना होता है जिससे तुम पीस
- 11:52में उतर जाओ। देखिए सोने के लिए तो कुछ करने की
- 11:56जरूरत नहीं, कोलाहल हीनता के लिए कुछ करने की जरूरत नहीं।
- 12:01आँखें बंद करो, मौन हो जाओ। शरीर को रिलैक्स कर दो।
- 12:05बुद्धि को रिलैक्स कर दो, सोचना बंद कर दो।
- 12:09ऑटोमैटिकली तुम कोलाहलहीनता में चले जाओगे जिससे निद्रा कहते हो
- 12:14तुम वो तो बचपन से ले के आज तक तुम सदा उसका लुत्फ लेते आए,
- 12:23लेकिन एक लुत्फ जो आपने लिया नहीं कभी आज तक।
- 12:30वो लुत्फ शांति का है। शब्द कोष में डिक्शनरी में दोनों
- 12:41शब्दों का मतलब एक ही मिलेगा, ठीक भी है।
- 12:46क्योंकि शब्द कोष को लिखने वाला डिक्शनरी के शब्दों को लिखने वाला
- 12:50व्यक्ति उस स्तर पर पहुंचा नहीं। जीस स्तर पर पीस है, जीस स्तर पर
- 12:58शांति है उसकी समझ में आएगा ही नहीं।
- 13:04व्हाटस दी डिफरेंस बिटवीन दट। टू कमनेस और पीस में फर्क क्या
- 13:10है, वह नहीं समझ पाएगा तो कौन समझेगा?
- 13:19सिर्फ एक व्यक्ति समझेगा, कोई बुद्ध समझेगा।
- 13:24कोई महावीर समझेगा, कोई कबीर और नानक समझेगा और इस पीस के लिए वो
- 13:30सब कुछ छोड़ने को तैयार हो जाएंगे।
- 13:35कोलहल हेन्ता को कुछ भी छोड़ने की जरूरत नहीं है।
- 13:38कोलहल हेन्ता को तो तुम। सहज ही रोज़ पा लेते हो।
- 13:43प्रकृति ही तुम्हें ले जाती है नॉइसलेसनेस में उसके लिए तुम्हें
- 13:52कुछ भी तो नहीं करना होता और तुम रोज़ जाते हो।
- 14:00यहाँ शोर नहीं होता, जहाँ घनी भूत ठहराव होता है तो आइए इसे समझने
- 14:15के लिए हम इसको तीन भागों में विभक्त कर।
- 14:21सबसे पहला है कोलाहल संसार कोलाहल है और अभी तुम्हारी शक्ति इस
- 14:30कोलाहल में व्यस्त है ये पहला भाग हो गया।
- 14:38संसार कोलाहल है अभी तुमने अपनी शक्ति की इन्वेस्टमेंट संसार में
- 14:46लगा रखी है और यह कोलाहल तुम्हें दुख देता है, कोलाहल सदा ही दुख
- 14:53देता है। दूसरा स्टेप है जो बुद्धि के तिर
- 15:04पे होता है। जब मन कुछ नहीं सोचता, निर्विचार
- 15:09अवस्था में होता है। मन के आगे कोई विषय नहीं होता।
- 15:16सब्जेक्ट कुछ नहीं होता, सोचने के लिए तुम विषय ही न होते हो
- 15:21सब्जेक्ट लेस्नेस्स की अवस्था में होते हो तुम कुछ सोचते नहीं हो
- 15:26खाली रह जाते हो तो जिन्हें मैं अक्सर काम कहता हूँ फुर्सत के
- 15:32लम्हे। दूसरी व्यवस्था है पहली घटती है
- 15:37संसार के भीतर कोलाहल दूसरी घटती है कोलाहलहीनता वो तुम्हारी
- 15:44खोपड़ी में घटती है, तुम्हारी बुद्धि शांत हो जाती है, तुम्हारी
- 15:49बुद्धि शोर नहीं मचाती है। तुम्हारा मन वह पोहा नहीं खड़ा
- 15:53करता, तुम थोड़ी देर के लिए ठहर जाते हो, वो निद्रा में भी होता
- 16:01है वो जागते जागते भी किसी क्षण में हो सकता है।
- 16:08कभी कभी अचानक तुम पाओगे के जागते जागते मन के पास कोई विषय ना बचा।
- 16:17मन चुप हो गया, मन ने सोचना बंद कर दिया, भागना बंद कर दिया, विषय
- 16:27हीनता आ गई। उस अवस्था को कहते हैं कामनेस
- 16:35पहली संसार के तल पे आई कुलाहल दूसरी कुलाहल हीनता बुद्धि के
- 16:41स्तर पे आई। और कुलाहल हीनता में तुम रोज़
- 16:48जाते हो, नींद के तल पे भी तुम रोज़ जाते हो, वह तो तुम्हें
- 16:55प्रकृति स्वतः ही ले जाती है रोज़ ये दो तलों का तुम्हें आभास है।
- 17:03संसार का और बुद्धि का, कुलाहल का और कुलाहल हिंता का, लेकिन एक
- 17:09तीसरा तल है, इस बुद्धि के तल से नीचे जाओगे, संसार से हट जाओगे।
- 17:24और बुद्धि से भी हट जाओगे। ये शिक्षण तुम्हारा मन कुछ सोचता
- 17:29नहीं, निर्विषय होता है, निर्विचार होता है, सहजता में
- 17:36होता है, ठहरा हुआ होता है। कुछ सोचता नहीं, उत्पाद नहीं
- 17:41मचाता, उसे कुछ नहीं चाहिए। उस वक्त यह क्षणिक होती है तो तुम
- 17:49ठहरे होते हो। उस वक्त इसका नाम है।
- 17:59ठहर जाना कोलाहल हीनता साइलेंस नोइसे विलेसनेस बुद्धि कतल पे आती
- 18:14है नॉइसलेसनेस और एक तीसरा तल है जहाँ हम नहीं जाना मैंने कहा वह
- 18:23हमारा ध्येय है, लक्ष्य है वहाँ अगर तुम पहुँच जाओ।
- 18:31तो तुम्हें किसी चीज़ की आवश्यकता होगी, संसार में रहोगे।
- 18:401000 तरह की आवश्यकताओं आए शरीर भोजन मांगेगा।
- 18:47टाइम से समझना बड़े गहरे शब्द हैं।
- 18:51आँखें सुंदर दृश्य मांगेंगे, कान सुंदर संगीत मांगेंगे, मन कहेगा
- 19:02चलो हिल स्टेशन चले चलो वहाँ चले। जैसा नजारा हो, उसने अपने मन के
- 19:14भीतर कल्पित किया होगा। वहाँ चले मन कुछ देखना चाहता है।
- 19:26मन को भ्रम है कि उसको देखने से शांति मिल जाएगी।
- 19:35तलाश काहे की वास्तविक तलाश है? शांति जैसे शांति मिल गई।
- 19:47उसकी सारी जरूरतें मिल जाती हैं। मैंने कहा।
- 19:52बड़ा खतरनाक शब्द है, हिलाएगा तुम्हें तुम्हारे प्राणों को
- 19:58कंपाएगा जरूरतें बट जाती हैं, जहाँ शांति आ जाती है।
- 20:11कामनेस बुद्धि के तल पे कामनेस होती है, निद्रा के तल पे भी
- 20:17कामनेस होती है। निद्रा के तल पे पीस नहीं होती
- 20:24नींद में तुम फ्रेश तो बहुत होते हो।
- 20:29बड़े तरोताजा उठते हो सुबह सुबह आँख खुलती है संसार बड़ा सुल्हानन
- 20:37रखता है क्या हुआ? कामनेस के भीतर से अभी अभी आए
- 20:45ताजा ताजा आई हो सारी रात तुम उस कामनेस का आनंद लेते रहे, अब यहाँ
- 20:56थोड़ा सा साधक ठहर जाए। मैं कुछ बात कहूंगा, उसे ध्यान से
- 21:03सुनें। क्रिया योग करने के बाद जब कचरा
- 21:12पचड़ा निकल जाए और मैं कहता हूँ कुछ भी ना करो, ध्यान में तुम बैठ
- 21:20जाओ। जब बिना क्रिया के क्रिया युग
- 21:23किये भी बैठ जाओ, तुम किसी कारण से ला चाह रहे हो, क्रिया युग
- 21:29नहीं कर सकते या नहीं करना चाहते तो तुम बैठ जाओ, कुछ न करो कुछ न
- 21:36करो की स्थिति में पहले आएगी कामन्यास।
- 21:40मन भटकना बंद कर देगा, खूब भटकेगा, खूब भटकेगा।
- 21:46उसके बाद अगर तुम उसकी तरफ ध्यान न किये तो वह भटकना छोड़ देगा,
- 21:53जैसे गंदला पानी अगर तुम। कांच के गिलास में भर के रख दो एक
- 22:02तरफ और सो जाओ और सुबह उठोगे तो क्या पाओगे?
- 22:12माटी नीचे बैठ गई। शुद्ध स्वच्छ निर्मल जल ऊपर आ गया
- 22:21माटी नीचे बैठ गई बस वही होता है नींद में तुम्हारे साथ तुम ठहर
- 22:27जाते हो नींद में जैसे पानी का गिलास हमने गंधला पानी हमने ठहरा
- 22:34दिया एक जगह पे। वैसे ही तुम होते हो और वह गंतला
- 22:41पानी धीरे धीरे क्योंकि उसके साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होती, वे धीरे
- 22:46धीरे माटी नीचे बैठनी शुरू हो जाएगी माटी अलग है।
- 22:53पानी से माटी अलग है। बिलकुल इसी तरह कोलाहल तुमसे अलग
- 22:59है। कोलाहल तुम्हारे मन का हिस्सा
- 23:04नहीं है, तुम कहते हो मेरा मन बड़ा शोर मचाता है, तुम गलती में
- 23:10हो, मन अलग चीज़ है। शोर अलग चीज़ है।
- 23:15ये बिलकुल ऐसे है जैसे गंदला पान और गंदला पानी।
- 23:22तुम ग्लास में कांच के ग्लास में रख देते हो, एक तरफ और आराम से
- 23:31बैठ जाते हो। सो जाते हो।
- 23:35मैं सोने के साथ कंपैरिजन कर रहा हूँ, उसका सो गए, इधर पानी का
- 23:42गिलास रखा, उधर गंदले पानी का इधर तुम अपने भीतर उतरते जाओगे।
- 23:50उधर वो माटी भीतर उतरती जाएगी सुबह उठोगे तो क्या पाओगे?
- 23:58उस ग्लास में शीतल जल ऊपर है। ट्रांसपेरेंट और माटी नीचे बैठ
- 24:08गए। और निद्रा में भी यही होता है।
- 24:13मन ठहर गया, कोलाहल अलग हो गया, मन अलग हो गया, मन मरता नहीं है,
- 24:22ध्यान रखना। मन और कोलाहल इन दोनों चीजों को
- 24:31अगर जोड़ दिया जाए तो उत्पात शब्द मैं कहना ज्यादा ठीक समझूंगा, बह
- 24:39का हुआ मन शोर करता हुआ मन कोलाहल युक्त मन।
- 24:47मन तो रहता है मन मर्तन ही गंदले पानी की तरह अभी तो है अभी
- 24:58तुम्हारा मन शीतल जल और माटी इसका मेल है दोनों का।
- 25:07यह माटी कोलाहल करती है, मन शीतल जल की तरह है इसको शीतल कर दो,
- 25:15ठहर जाओ, तुम ठहर जाओ, आराम से तो क्या होगा, माटी अलग हो जाएगी और
- 25:24जल अलग हो जाएगा। रात को तुम ठहर जाते हो, यह
- 25:30प्रोसेसर सोती रहती है, तुम बड़े फ्रेश हो जाते हो, कोलाहल ठहर
- 25:36जाता है, शुद्ध जल भी ठहर जाता है।
- 25:40पहले दोनों भाग रहे थे। और सुबह जब तुम उठते हो, तरो ताजा
- 25:46उठते हो ट्रांसपेरेंट जल अलग होता है, माटी अलग होती है, गहरी है,
- 25:54बातें ना समझाये तो बार बार रिवाइंड करके, फिर सुन लेना बड़ी
- 26:02सरलता से बोल रहा हूँ। मन नहीं ठहरेगा ठहरेगा, उत्पाद
- 26:17ठहरेगा, शोर शराबा ठहरेगा। कोलाहल वह जो माटी।
- 26:24शोर मचा रही थी वह बैठ जाएगी, अलग हो जाएगी, शीतल जल अलग हो जाएगा।
- 26:34मन तो सभी स्मृतियों का। जो तुमने सीखा सूचनाओं का जो
- 26:46तुमने कुछ देखा समृतियों का, जो तुमने कुछ कल्पना के सपने संजोए,
- 26:53उन स्वप्नों का कुछ भोगने की इच्छाएं का?
- 27:01समूह यह है मन मन के भीतर सभी चीजें हैं।
- 27:13मन में शीतल जल भी है और मन में यह कूड़ा कबाड़ा भी है।
- 27:17स्मृति भी है, कल्पना भी है तुम्हारी वासनाएँ भी हैं।
- 27:24तुम्हारी यादगारियां भी हैं, पिछले जन्मों तक की यादगारियां
- 27:28हैं और तुम शीतल जल की तरह भी हो तुममें मिल गया है ये सारा कचड़ा,
- 27:40ये सारा कचड़ा खत्म हो जाएगा कैसे?
- 27:44जब तुम उस जल की तरह ठहर जाओगे तो पहला प्रमाण तो ये कि तुम रात को
- 27:51भी ठहर जाते हो और रात को जब ठहर जाते हो, मन अलग हो जाता है, शोर
- 27:58अलग हो जाता है। सुबह जब उठते हो तो तुम अपने आप
- 28:05को बड़ा फ्रेश महसूस करते हो क्योंकि कचड़ा अलग हो गया है,
- 28:13जैसे जैसे संसार का प्रतिघात तुम्हारे भीतर दस्तक देता है वह
- 28:20बैठी हुई माटी। फिर फिर जल के भीतर मिलनी शुरू हो
- 28:25जाती है और फिर वही सब कुछ हो जाता है।
- 28:33मन मैला हो जाता है, मन भागता है, मन दौड़ता है।
- 28:39मन कुछ पाने की चेष्टा करता है, मन कुछ याद करने की चेष्टा करता
- 28:44है। चेष्टाओ से युक्त मन गंधला हो
- 28:48जाता है और चेष्टाहीन मन परमात्मा हो जाता है।
- 28:54मन तू ज्योत स्वरूप है अपना मूल पछा।
- 29:01ये शब्द कहाँ है? सन्तों ने मन तुम्हें दुख नहीं
- 29:06देता है, इस मन से ही सब देखा जाता है।
- 29:15मन तो एक शीशे की तरह है। जिसमें तुम अपनी छवि निहार सकते
- 29:21हो। एक दर्पण की तरह है तोरा मन दर्पण
- 29:26कहलाए। अगर इस पर धूल धवास जमी है तो मैं
- 29:32कुछ नहीं देखेगा। और अगर ये साप उजला धूल विहीन कोई
- 29:42कण नहीं इसके ऊपर तो फिर तुम्हें अपना चेहरा साफ साफ देखेगा।
- 29:49बात बड़ी गहरी है लेकिन आराम से समझोगे तो समझ जाओगे।
- 29:59मन रोज़ अलग होता है। कोलाहल से निद्रा में, निद्रा में
- 30:07तुम अलग हो जाते हो, तुम मन तुम्हारा मन अलग हो जाता है, शोर
- 30:13अलग हो जाता है। सब ठहर जाता है मौन में और सुबह
- 30:20तुम उठते हो बड़ा शांत होता है बड़ा फेस्ट दिमाग होता है फिर फिर
- 30:27वो ही क्रियाकलाप रोज़ रोज़ तुम वो ही करते जाते हो जन्मते हो।
- 30:34ये सब कुछ कूड़े कबाड़े करते हो, मर जाते हो साथ ले जाते हो कुछ
- 30:41यादें कुछ कल्पनाएं, कुछ वासनाएं, कुछ भोगने की जो कुछ भोगने कुछ
- 30:49शेष रह गई। कुछ याद कर लिया, कुछ याद करना
- 30:55बाकी रहा क्या ये सब साथ ले के जाते हो?
- 30:59जो किया उसके कर्म साथ ले गए। जो भोग लिया उसका दंश साथ ले गए
- 31:08या उसका सुख साथ ले गए। ये सब साथ लेके जाते हो तुम गंधला
- 31:20मन जब तुम सो जाते हो, छट जाता है, बार बार बोलता हूँ चीज़
- 31:28तुम्हें अच्छी तरह से समझाया जाए। मन अलग, माटी अलग, यह काम निस तुम
- 31:41शांत होते हो, रात को कोई तूफान नहीं होता, शिवशक्ति की अवस्था
- 31:47में जब तुम गहरी निद्रा में होते हो, बड़े मगन होते हो लेकिन संत
- 31:53तुम्हें। एक और अवस्था बताते हैं तुमने
- 31:59जागृता अवस्था देखी तुमने स्वप्न अवस्था देखी जब तुम्हें स्वप्न
- 32:06आता है, तुम सुश्रुति को भी देखते हो, तुम्हें पता नहीं चलता।
- 32:13कि शुशुक्ति कब आती है, लेकिन शुशुक्ति के बाद मन की एक और दशा
- 32:19होती है। मैं आज उसकी बात कर रहा हूँ।
- 32:24वह अवस्था होती है दुर्य अवस्था। तुरियावस्था तुरिया शब्द मैंने
- 32:30पहली बार प्रयोग किया, क्योंकि अब तक तुम योग्य ही नहीं थे।
- 32:34अब तक मेरा पाठ्यक्रम चल रहा था कि मैं तुम्हें तुरिया तक ले आऊं।
- 32:41संसार से जागृत अवस्था। जागृत से सुप्त अवस्था और सपन
- 32:54अवस्था ये तीनों का जिक्र मैंने सदा किया।
- 32:58चौथे का जिक्र तो किया लेकिन शब्द और उपयोग किया शब्द प्रयोग किया
- 33:05आनंद। शांति चौथी एक अवस्था है मन की,
- 33:12वो है तुर्यावस्था तुर्यावस्था में तुम्हें शांति मिलती है जहाँ
- 33:21सब ठहर जाता है। सब खो जाता है रह जाता है सिर्फ
- 33:32एक तत्व जो गहरी शांति पर मौन पर आनंद से युक्त है।
- 33:45जो सत्य भी है और जो चेतन भी है और जो आनंद भी है, ये तीनों कोण
- 33:53हैं उसके इसलिए हम सत्यचित्त आनंद हम रोज़ यह माता बोलते हैं बोल
- 34:02सच्चिदानंद भगवान। सत्यचित आनंद सत्यदानंद वतुर
- 34:13अवस्था में मन शांति को प्राप्त करता है।
- 34:23मैं चला था, कोलाहल से फिर आया कोलाहल हीता के बीच में फिर
- 34:30कोलाहल हीता से आगे चला अब मैं पहुंचा दूरी अवस्था में बात कर
- 34:39रहा था शांति की। ठहरार से चला था कामनेस से चला था
- 34:46शोर शराबी से हट जाओ, शोर शराबी से हट के तुम शांति की तरफ जाओ और
- 34:57थोड़ा सा यह विषय को वहीं विराम देकर।
- 35:02थोड़ा सा इसको और एक्सप्लेन कर देता हूँ।
- 35:08तुम्हें पता है कि जाप पाथ सुमरन। ये कोलाहल है शोर तुम्हारी जीवा
- 35:28ऊपर नीचे हुई दो चीजें टकराईं। आहत नाद हुआ तो कोलाहल पैदा हुआ
- 35:45और तुम इस कोलाहल से इच्छा रखते हो, शांति की तरफ़ जाने के असंभव
- 35:54है। कोलाहल हीनता से तुम शांति की तरफ
- 36:00जा सकते हो, जैसे हमने पहले एक बिंदु पर सफर रोका, लेकिन जब
- 36:08तुम्हारे गुरु तुम्हें समझाते हैं कि कोलाहल से शांति की तरफ तुम
- 36:11जाओगे। तो तुम्हें वटकाते कोलाहल से कभी
- 36:19भी शांति की तरफ नहीं जाया जा सकता।
- 36:25सिर्फ और सिर्फ कोलाहल हीनता से शांति की ओर जाया जाता है।
- 36:34फिर से सुन लो, कोलाहल तुम्हें मोर्चा में ले जाता है कोलाहल से
- 36:42तुम्हारी शक्ति नष्ट होती है, क्योंकि कोलाहल करने में तुम
- 36:48शक्ति को व्यय करते हो। तुम कुछ भी बोला अपना नाम बोला
- 36:55अपना नाम बोला तुमने विजय, विजय, विजय, विजय विजय क्या थक जाओगे?
- 37:02इस समय शक्ति समाप्त हो गई। बोलने में शक्ति समाप्त हो गई।
- 37:08तो अपना नाम जपो या दूसरे का नाम जपो विजय विजय न करो, राम राम
- 37:13करो, रात रात करो यह है दो चीजों के टकराव से पैदा होता है ये शोर
- 37:26है। शोर से तुम शांति की तरफ कभी नहीं
- 37:31जा सकते ए शोर की तरफ गुलालहीनता से तुम शांति की तरफ जा सकते हो
- 37:39बस एक ही मार्ग है। तुम्हारे गुरु तो समझाते हैं कि
- 37:48तुम शोर मचाओ, जागरण करो, बाग दो ऊंचे ऊंचे बोलो शोर शराब भी करो
- 37:58और तुम भगवान तक पहुँच जाओगे, परम शांति तक पहुँच जाओगे नहीं
- 38:02पहुंचोगे तुम थक के घर जाओ। एक वक्त ऐसा आएगा कि शक्ति को
- 38:10खर्च करते करते विजय, विजय, विजय, विजय करते करते तुम शक्तिहीन हो
- 38:15जाओगे और गड़ाम से घर जाओगे क्योंकि शक्ति समाप्त हो जाएगी।
- 38:20शक्ति कभी न कभी समाप्त हो जाती है।
- 38:25और तुम गिफ्ट रहोगे तुम मूर्छित हो जाओगे जो तुम कहते हो कि हमें
- 38:33शांति मिलती है, वह शांति नहीं होते।
- 38:41वह कुलाहल हीनता भी नहीं होती, वह तो और भी निक्कृष्ट दल होता है
- 38:46किसका? मूर्जा का कुलाहल हीनता भी नहीं
- 38:53और शांति भी नहीं। वह तो मूर्चा में होते हो,
- 38:58मूर्छित होते हो? निद्रा में तुम मूर्छित नहीं होते
- 39:04निद्रा में तुम कुलाहल गीनता में होते हो और एक और तन है जहाँ तुम
- 39:13ना निद्रा में होते हो ना तुम मुर्षा में होते हो।
- 39:19ना तुम कोलाहल में होते हो, ना तुम कोलाहल हीनता में होते हो।
- 39:24तुम शांति में होते हो और तुम जागृति में होते हो, ये दो चीजों
- 39:30को बराबर समझ लेना जो मैंने बोला जीस तल की मैं बात कर रहा हूँ।
- 39:36नींद में जागरण नहीं होता। नींद में शोर नहीं होता ठीक लेकिन
- 39:44शांति नहीं होती। जीस स्थल की मैं बात कर रहा हूँ
- 39:49तुर्यावस्था की वहाँ शांति होती है और शांति के साथ साथ जागृति
- 39:57होती है। शब्द बड़े गहरे हैं, क्योंकि
- 40:03बातें अनुभव की हैं और तुम्हें तभी पता चलेगा जब तुम स्वयं उस
- 40:10अनुभव में गहरे उतर जाओगे। तुम उस तुर्यावस्था में जाकर।
- 40:18उस शांति का एहसास कर सकते हो और उस शांति में तुम पाओगे कि तुम
- 40:26जगे हुए हो, तुम सोये नहीं और दो शर्ते हैं जहाँ तुम मुर्षित नहीं
- 40:34होते। और जहाँ तुम परम शांत होते हो और
- 40:41शांति के साथ आनंद तो होता ही है आनंद की प्रतीक्षा है, शांति,
- 40:49शांति और आनंद दो चीजें नहीं। शांति और आनंद एक ही सूझ है जहाँ
- 40:59काम निस है, वहाँ आनंद नहीं है और फिर उलझ मत जाना जहाँ कुल्हा
- 41:08हीनता है शोर नहीं है, वहाँ आनंद नहीं है।
- 41:16लेकिन जहाँ आनंद है, वहाँ शांति है और वहाँ जागृति है जहाँ कामन
- 41:29है, वहाँ जागृति हो ये जरूरी नहीं है।
- 41:33अगर काम मनस के भीतर जागृति आ जाए तो वह बन जाती है तुर्यावस्था तुम
- 41:44जागे होगे और तुम शांत भी बड़े होगे।
- 41:51तुम आनंदित भी बड़े होगे, तुम जागे भी होगे रात को तुम जागे तो
- 41:59होते हो क्योंकि वो जो तुम हो वह तो कभी सोता नहीं रात को तुम जागे
- 42:09तो होते हो। इसलिए कृष्ण ने कहा जब तुम्हारे
- 42:14संसारी सोते हैं तो मेरा योगी जागता है।
- 42:18वह उस तल की बात कही। जीस तल पे तुम कभी सोते नहीं तो
- 42:25कृष्ण कहते हैं कि मेरा योगी जागता है रात को, तुम जागते तो हो
- 42:29तुम? इस शब्द को पकड़ लेना अच्छी तरह
- 42:32से शब्दों की अपनी तुच्छता है। शब्दों की तुच्छता को ठीक से
- 42:41समझना सीखो। रात को तुम जागते हो, तुम जागते
- 42:47हो। तुम जागते हो ये तुमने जानना है
- 42:53तुम्हे जागना नहीं है तुम जागते हो जागते रहते हो ये जानने के
- 43:04बजाय तुमने जागरण करना शुरू कर दिया।
- 43:08यहाँ तुम मरिज गए जब तुम जागरण करना शुरू कर दोगे, तुम जो सदा से
- 43:16जाग रहे हो बिना कुछ किये बिना किसी मेहनत के किये।
- 43:28जो तुम स्वत से सहजता में जाग रहे हो वहाँ पहुँचना है और उसको जानना
- 43:36है कि वो तुम हो बजाय इसके तुमने अर्थ गलत कर दिया।
- 43:42अक्सर शब्दों के अर्थ गलत हो जाते हैं।
- 43:47और अगर कोई गुरु आपको बहका रहा है, जरूरी नहीं कि वह जानबूझ के
- 43:53बहका रहा हो, ये भी है कि वो जानता ही ना हो, वह अज्ञानी भी हो
- 44:00सकता है। उसने जैसा जाना ईमानदारी से
- 44:04तुम्हें बता दिया। लेकिन यह तो हो ही सकता है ना कि
- 44:08उसने उस जागते हुए तत्व को देखा ना वह उस जागते हुए तत्व के पास
- 44:15पहुंचा, ना उसने जैसा जाना वैसा तुम्हें बता रहा है।
- 44:20वह ईमानदार है। वह बेईमान तो नहीं है, वह ठग भी
- 44:25नहीं है लेकिन अज्ञानी जरूर है। मैं जानता नहीं कि कृष्ण किस
- 44:33जागृति की बात करते हैं। मैं उसी जागृति की तरफ आज अग्रसर
- 44:38हूँ। अभिषेक ऐसा समझो मुर्दा कामनेस
- 44:50में है, कोई प्रतिक्रिया नहीं करता और कामनेस के साथ साथ मूर्छम
- 44:57भी है तुम जाप करते करते। जब एनर्जीलेसनेस की अवस्था में
- 45:02पहुँच जाते हो, जाप करते करते एनर्जी को खो देते हो, तब तुम इस
- 45:09मुर्दे वाली मूर्चा में पहुँच जाते हो और इस मुर्दे वाली मूर्चा
- 45:17में वह व्यक्ति भी पहुँच जाता है। जो शराब पीता है वह भी बिल्कुल
- 45:24उसी तल पे पहुँच जाएगा। जीस तल पर ज्यापू वाला व्यक्ति
- 45:29पहुँच जाता है या मुर्दा पहुँच जाता है, मुर्दा भी मूर्छित है
- 45:34एनर्जीलेसनेस है। और जाप वाला व्यक्ति भी नजदीक हो
- 45:39चुका वह भी मूर्छित है और शराब वाला व्यक्ति भी मूर्छित है।
- 45:50उसका दिमाग सुन्न हो गया। मूर्छ में हो गया ये तीनों
- 45:54व्यक्ति एक ही कैटेगरी में है। वो चाहे मुर्दा हो, चाहे जाप करके
- 46:01बिल्कुल थक गया हो और तीसरा जिसने शराब पी ली हो, जिसने मोर्चा देने
- 46:07वाला कोई नशा कर लिया हो। ये तीनों एक कैटेगरी में है।
- 46:14उसके बाद। मैंने कहा संसार कुलाहल है कुलाहल
- 46:19के बाद जब मन ठहरता है तो तुम कामने समय आते हो कामनेस कार्ति
- 46:26जहाँ कुलाहल नहीं है जहाँ शांत सब चुप्पी ठहर जाता है मन।
- 46:34कुछ उहा बहु निकृता भाग दौड़ रही होती और इससे आगे की वर्षा मैंने
- 46:41कहा वो है शांति, संसार से आएगा कोलहल हीनता कोलहल हीनता से आएगा
- 46:51शांत? अब मेरे ख्याल में सारा तुम्हें
- 46:56समझ आ गया सूत्र और शांति में जागृति है तुम्हारी, जाप की
- 47:09मोर्चा में जागृति नहीं। बिलकुल विरोधी पॉइंट्स पे खड़े
- 47:16हैं। दोनों चाहे शराब पी के मूर्छित
- 47:21हुआ हो, चाहे मुर्दा मूर्छित हुआ हो, चाहे जाप करके एनर्जी लसनेस
- 47:30की अवस्था में तुम मूर्छित हुए हो।
- 47:32और कई बार मुर्गी के दौरे वाले भी जाप वाली अवस्था में आ जाते हैं।
- 47:38तुम देखना ज़रा कोई होश नहीं होता उन्हें जूती सुगनी पड़ती है
- 47:43पुरानी देसी उपाय हैं पुरानी मूर्खित अवस्था में जब तुम होते
- 47:51हो। तो उस वक्त एनर्जी खो चूके होते
- 47:56हो और जागृत अवस्था में नहीं होते।
- 48:01कम से कम ये रात को चिल्लाने वाले माता शेरां वालियों के जगराप्ती
- 48:07करने वाले भी सुबह होते होते मूर्छित हो जाते हैं।
- 48:12क्योंकि रात भर को सारी शक्ति गंवा देते हैं तो सुबह मूर्छित हो
- 48:18जाते हैं। जैसा सारा पूरा विज्ञान मूर्छक
- 48:24इससे आगे चले कोलाहल से कोलाहलहीनता में।
- 48:31और कोलाहल हीता से शांति शांति का तल वो तल है तुम कोलाहल हीता से
- 48:44नींद में भी जा सकते हो। नींद में बड़ी फ्रेशनेस है, बड़ी
- 48:48ताजगी है। लेकिन वहाँ एक चीज़ की कमी है
- 48:53क्या वहाँ ठहराव तो है फ्रेशनेस है, तुम उस तत्व के करीब हो जिसे
- 49:03तुम परमात्मा कहते हो, जिसे तुम स्वय कहते हो, बिल्कुल उसके पास
- 49:08बैठे हो नींद में। और वह तुम्हें सारी रात चार्ज
- 49:12जकरता रहता है, शक्ति देता रहता है और तुम सुबह होते ही बड़े
- 49:17फ्रेश होते हो, क्योंकि रात भर उसने तुम्हे शक्ति दी लेकिन
- 49:22जागृति नहीं आती। तुम्हे तुम फ्रेश होते हो।
- 49:28हर होते हो लेकिन जागृत नहीं होते, वो जागृति के पास बैठे होते
- 49:35हो, जैसे सेंट बेचने वाला इतर बेचने वाले के पास तुम चले जाओ।
- 49:42तुमने कोई सेंट लगाया भी नहीं, खरीदा भी नहीं, लेकिन फिर भी
- 49:47तुम्हारे कपड़े। उस गंध से युक्त हो जाएंगे
- 49:52क्योंकि उसके करीब बैठ के आए तो कबीर ने कहा है कि जैसे गंधी की
- 50:07संगति से तुम्हें बिना खरीदे ही बिना मांगे ही सुगंध मिल जाती है,
- 50:14ऐसे ही संत पुरुष के संघ बैठने से तुम्हें शांति मिलती है तो रात्रि
- 50:21भर तुम उस संत के पास रहते हो जो तुम्हारा तत्व है।
- 50:26मित्र के तत्व को मैं संत कहता हूँ।
- 50:29और रात को तुम संत संगत में होते हो सारी रात और वह संत तुम्हे
- 50:35पिलाया ही जाता है। ताज की एनर्जी और सुबह तक तुम
- 50:41बिल्कुल फुल हो जाते हो। ताजगी से ताजगी तो होती है।
- 50:50लेकिन जागृति नहीं होती, लेकिन मैंने कहा दोनों चीजों का होना
- 50:58दुर्यावस्था है कौन सी दोनों, एक तो शांति दूसरी जागृति?
- 51:08तुम कामनेस को शांति समझ लेते हो, यही मार खा जाते हो कामनेस प्लस
- 51:17अवेयरनेस इस इक्वल टु पीस इसको लिख लेना कामनेस प्लस अवेयरनेस।
- 51:28इस इक्वल टू पीस कोलारहीनता प्लस जागृति बराबर है।
- 51:44शांति शांति में कोलार भी नहीं होता और जागृति भी होती है।
- 51:53उसी अवस्था को मैं कहता हूँ दुर्यवस्था देखिये अनुभव की बात
- 51:59को शब्दों में डालना मुश्किल तो बड़ा होता है, लेकिन प्रभु का
- 52:07सहारा हो प्रभु की कृपा। उसकी नजर हो वह करीब हो तो तुम
- 52:19कैसे न कैसे उसको ढाल ही दोगे जीस कुलाहल हीनता में जागृति हो, वह
- 52:31तुरियावस्ता है। अगर अवेयरनेस नहीं है और खुशी है
- 52:41तो तुम शांत नहीं फिर तुम मूर्छित हो ये दोनों चीजों का संगम।
- 52:53शांति अवेयरनेस जागृति जब तक यह नहीं आता तब तक तुम संत नहीं होते
- 53:04तब तक तुम तुरी अवस्था में नहीं पहुंचते सुबह तक।
- 53:10बाग देते देते तुम्हारा गला थक जाता है, तुम शक्तिहीन अवस्था में
- 53:16हो जाते हो तुम मूर्छित हो जाते हो लीजिए।
- 53:20हम मूल प्रश्न पे लौटे फिर ये सिपारिश आ रही है कि मीरा का एक
- 53:26गजन। मोहे भूल गए सांवरिया संसार के
- 53:35कोलाहल से, कोलाहल हीनता में फिर कुछ नहीं करना, तुम भीतर भीतर
- 53:45उतरते जाओगे। और 1 दिन तुम शांति में पहुँच
- 53:51जाओगे वही तल जहाँ निद्रा के तल पे रोज़ जाते हो लेकिन फर्क होता
- 53:57है निद्रा के तल पे तुम मूर्छित होते हो और जागृति के तल पे तुम
- 54:03जागृत होते हो। जागृत जागृत इस अवस्था में पहुँच
- 54:09जाना दुर्यावस्था में वह समाधि का लगता है, उसमें जागृति भी है।
- 54:19उसमें शांति भी बहुत है। आनंद से युक्त भी है।
- 54:25खमारी से नहाया भी हुआ है, सब ठहरा हुआ है, कोई शोर नहीं।
- 54:33पिन ड्रॉप साइलेंस हवाएं ठहर जाती हैं, सब शोर थम जाते हैं।
- 54:45वो आ रहे हैं सांसों ज़रा अहिस्ता चलो वो आ रहे हैं सांसों ज़रा
- 54:56अहिस्ता चलो दिल के धड़कने से। इबादत में खलल पड़ती है, ये जो
- 55:06दिल धड़कता है इससे भी इबादत में खलल पड़ती है।
- 55:12बस समझाने का तरीका था कि सब शोर खत्म कर दो, जो तुम्हें शोर
- 55:20सिखाये। वहाँ से भाग आओ, तुम अपने भीतर
- 55:26चले जाओगे, शोर से तुम बाहर जाओगे और शोर हीनता से तुम अपने भीतर
- 55:34जाओगे। जहाँ मौन की अवस्था है, परम मौन
- 55:39की अवस्था है। ज़रा भी आहट नहीं आहट के बिना जो
- 55:48तल है वह तुम हो, कोई आहट नहीं। लेकिन प्रेम बहुत है, शांति बहुत
- 55:59है, जागृति बहुत है, आनंद बहुत है, खम्हारी बहुत है।
- 56:03सुगंधित हवाएं चल रही हैं, महक के चारों तरफ बिक्री पड़ी शोर ने।
- 56:13तोड़ दिया। महल बना के दिल को दिए क्यों दुःख
- 56:34विरहार? के तोड़ दिया।
- 56:42क्यों महल बना के आस दिला के? ओह।
- 56:57वेधर दे आस दिला के ओह वेधर दे। फिर लिखा है नजरिया भूल गए
- 57:26सांरया। हो गए, सांवरिया कह गए आज हो न
- 57:44आए। ले।
- 58:06नहीं मोरे खबरिया मैं हो गई ऐसा वरिया।
- 58:29भूलकर सांवरिया प्रेमी बगावती। भी हो जाता है।
- 58:43नैन कहें रो रोके सजन। नैन।
- 58:58कहें रो। रोके सजना देख चूके हम, प्यार का
- 59:12सपना देख चूके हम। प्यार का सपना प्रीत।
- 59:25है झूठ। प्रीतम झूठ प्रीत है झूठ।
- 59:39प्रीतम झूठा, झूठी है सारी नगरिया।
- 59:55जूते हैं सारी नगरिया मोहे भोग गए सांवरिया।
- 1:00:16हो गए सांवरिया आवन कह गए आज हो न हाय।
- 1:00:53भूल गए सावरिया भूल गए सां वरिया।