Latest / Baba ji Vijay Vats / 26 Feb 26 - बाबा, जब सब कुछ परमात्मा करता है, तो आप अड़ंगा क्यों डालते है? ध्यान, विचार और साक्षी भाव!
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- 0:17उपासना जब सब कुछ परमात्मा करता है तब आप इस संसार को बदलें।
- 0:38का आयोजन क्यों कर रहा हो? कोई राज़ करे, कोई भूखों मरे, कोई
- 0:49किसी की संपत्ति छीन ले, कोई बलात्कार करे।
- 0:57कोई हत्या डकैती करे आप कौन होते हैं जब विधि का विदा नहीं है ऐसा
- 1:12क्योंकि वही करता है? तो आप बीच में रंगा क्यों डालते
- 1:21हो उपासना? मुज़फ्फरनगर ये भी दांत तेरी दा
- 1:38तार? यह भी परमात्मा ही चाहता है कि
- 1:48मैं अड़ंगा डरूं। जब सब कुछ परमात्मा करता है तो
- 1:56मेरा बोलना। उसकी इच्छा से बाहर कैसे हो सकता
- 2:00है तुम्हारा पूछना उसकी इच्छा से बाहर कैसे हो सकता है, लेकिन
- 2:16व्यवधान कहाँ होता है जब तुमने प्रयोग नहीं किया होता?
- 2:28तो खोपड़ी प्रश्न उठाते है जक, जक, बक, बक ये सब खोपड़ी के है
- 2:43अक्सर जो परमात्मा पर छोर नहीं हो सकती।
- 2:51वो ऐसे बहाने लगाया करता है क्योंकि परमात्मा पर छोड़ना एक
- 3:00दुस्साहस है। इससे बड़ा साहस कोई।
- 3:08मैं अपने घर से गोशाला मंदिर जाया करता था।
- 3:11काली अनक आँखें बांध दो, इतना सहज तुम मत जुटा लेना रगड़ती जाओ कोई
- 3:26कोई मलीगा निकाल दे। लेकिन क्यों?
- 3:37फर्स्टली थे वे? शुड बी स्ट्रोंग फाउंडेशन शुड बी
- 3:41स्ट्रोंग अन्यथा मैं भी ये ना कर पाता।
- 3:53वह ट्रेन की इंसिडेंट किसने बिल्कुल निचले पायदान से उल्टा के
- 4:04मुझे भटक दिया। गाड़ी के यह प्रश्न दिमाग में?
- 4:14परक्षण की तरह ही कौन था वस्तु की तरह हो?
- 4:24क्योंकि ये घटना मेरे साथ हुई थी। जीस तन लागे 100 तन जाने मैं थर
- 4:34थर ये क्या हुआ चाहे मैं बच गया था शुभ हो गया था टाँगिंग कट जाती
- 4:46है भयंकर दर्द होता। और मेरे हाथ हैंडल से छूट जाते और
- 4:54शरीर गाड़ी के नीचे आ जाते। फाउंडेशन शुड बी स्ट्रांग।
- 5:05इसीलिए मैं चल पाया लेकिन अगर तुम चलोगे तो सिर्फ मेरी बात को मानकर
- 5:13चलोगे। और आंधी खोपड़ी कही की होता है
- 5:19आंधी खोपड़ी कही की नहीं होता है तुम यकसा ही नहीं हो पाओगे, इसलिए
- 5:26चुप जाओ नहीं यकसा। अगर उसने करना ही है, फिर तुम
- 5:39काहे बीच में अड़ंगा डाल रहे हो? प्रश्न तो वाकई तार्किक है, लेकिन
- 5:53तार्किक है पुत्री जिससे बुद्धि को ये ही नहीं पता कि रेत का
- 6:01जर्रा बनता कैसे बनाया किसने कोई है भी कि नहीं?
- 6:05सब तुम्हारे दिमागों की इन्वेंशन है खोपड़ी की चक चक बक बक कोई
- 6:14कहता खुद बन गया, बुध कहता खुद बन गया लॉस अरे सुफ्फिसिएंट तो उसने
- 6:20शक्ति को तो नहीं देखा ना? बुद्ध ने शक्ति को नहीं देखा,
- 6:27बुद्ध ने सुखों को देखा बस यहाँ तक आकर व्यक्ति सुख हो जाएगा सत्य
- 6:36क्या है उसने जानना नीचा बुध कहते थे संसार दुख है।
- 6:46और दुख होने का कारण है और इस कारण को नष्ट करने का भी ढंग है।
- 6:52उपाय है बस यहीं तक बुद्धू सीमित रह गया लेकिन राहतें और भी हैं
- 7:01वसल की राहत के सिवा। और भी दुख है जमाने में मोहब्बत
- 7:08के सिवा बुद्धि बहुत प्रश्न उठाये इसलिए जो ज्ञानी जन थे।
- 7:28उन्होंने कहा। जब मंदिर में जाओ तो जूते बाहर
- 7:34निकाल के जाना और ठहरों अकेले जूते ही नहीं, इस खोपड़ी को भी
- 7:42वहीं रख जाए क्योंकि तुम अम्मा के अंदर चले।
- 7:52तुम्हारा लक्ष्य बड़ा विराट और विराट लक्ष्य में बुद्धि बाधा
- 7:58बनेगी। इसलिए सभी बाधाओं को हटा दो।
- 8:06सभी बाधाओं को जहाँ हम जूती निकालते हैं, वह खोपड़ी को भी रख
- 8:11दो, लेकिन तुम्हारी खोपड़ी से मानती कहाँ है?
- 8:22तुम क्या समझते हो ये तुम्हारे बड़े बड़े सर लोग?
- 8:30विकास सिद्धि विकृति खान सर आचार्य प्रशांत इन बात को मान
- 8:38जाएगा, नहीं मानेगा वह शब्दों को शब्दों की तेज तलवार से।
- 8:48काटने की चेष्टा करेगा और काट भी देगा और तुम तालियाँ बजाओगी तुम
- 8:55कहोगे धन है, धन है, लेकिन कोई धन धन नहीं है, ये धन्य है।
- 9:02धन्य है नहीं ये धन धन है, धन धन हो जाती है।
- 9:11सत्य को जानने का प्रयास बताने के सुख को जानने का प्रयास किया।
- 9:25कि क्या इस संसार में सुख भी है? अन्यथा संसार दुख ही दुख है।
- 9:36ऐसा क्यों हो? क्योंकि बुद्ध ने सब भोग लिया था
- 9:42पदार्थ गद्दियाँ दास दासियाँ नौकर चाकर सेवक जो मांगता इशारा और इधर
- 9:54हो जाता कोई भोगों की कमी ना थी खुद के पास और इन सब भोगों को कुछ
- 10:04नहीं पाया। के सुख तो नहीं मिला?
- 10:12ध्यान रखो बौद्ध सुख को अखंड सुख कहते क्षण का सुख नहीं कहते।
- 10:22बौद्ध क्षण का सुख तो सभी को मिलता है।
- 10:28बुद्ध को भी मिलता है, लेकिन जैसे तुम स्वादिष्ट पदार्थ जीवा पे
- 10:36रखते हो, टेस्ट बड्स उसे कहता पड़ा लाजवाब।
- 10:46बड़ा लुत्फ है बड़ी लज्जता और जब वो गले के नीचे उतर जाता है, तो
- 11:00फिर तुम दूसरी ग्रास। की अपेक्षा रखते हो और पेट भर
- 11:09जाता है। नियत नहीं भरता।
- 11:16भूत ने भोग कर पाया, महावीर ने भोग कर पाया।
- 11:26जैन धर्म के 2400 तीर्थंकरों ने भोग कर पाया।
- 11:31क्योंकि सभी राजा थे जनकों ने उन्हीं से पीडिया जनक थी उन्होंने
- 11:40भोग से पाया क्योंकि सभी राजा थे। तुमने पुषा पुत्र अगर सब बह करता
- 12:02है तो फिर आप क्यों बोलते हैं? कहाँ बोलता हूँ पुत्र?
- 12:13मैंने कब कहा मैं बोलता हूँ। अभी दिल धड़कना बंद कर देओ, मैं
- 12:20थोड़ी धड़कता हूँ अभी श्वास लेना बंद कर देओ मैं थोड़ी श्वास लेता
- 12:28हूँ, अगर मैं श्वास लेता तो सारी रात।
- 12:32जब चार 6 घंटे 8 घंटे सोता हूँ तो फिर दिल कौन धड़काता है मैं तो
- 12:39भूल जाऊंगा। गहन सुश्री के उस आलम में डूबा
- 12:46हुआ व्यक्ति दिल को धड़काने की फिक्र करेगा, सांस लेने की फिक्र
- 12:51करेगा। यह शश्रुति में खो जाने का फिक्र
- 12:54करेगा। कौन तड़काता है?
- 12:59हृदय को कौन लेता है स्वास्थ और ध्यान रखना अगर परमात्मा नीचे
- 13:09खुद? जिम्मा अपने हाथ में ना लिया होता
- 13:13तो तुम्हें सोना कभी नसीब नहीं होता।
- 13:18तुम सो ही ना पाते जैसे दिन में तुम्हें कर्ज फर्ज याद आते हैं।
- 13:27वैसे ही रात को भी तुम्हें तुम्हारे घर से याद आते हैं दिल
- 13:31झड़पना है भाई अन्यथा राम राम सत्य राधे राधे हो जाएंगे।
- 13:44स्वास्थ्य लेना है भाई अगर स्वास्थ्य लेना भूल गए।
- 13:53तब दक्षिण में मृत्यु हो जाएगा और यह भी दो कारणों से होता है एक तो
- 14:05स्वयं देखकर होता है उन अज्ञात हाथों को।
- 14:17जो सूरज, ग्रह, नक्षत्र सबको अपनी अपनी सीमाओं में गंवाए जाता है और
- 14:26पृथ्वी का इतना भार है 33,00,000। 13,00,000 पृथ्वी समा सकती हैं
- 14:38सूरज में 1300 पृथ्वीया समा सकती हैं बृहस्पति में और इस पृथ्वी पर
- 14:49तुम्हारी औकात का है जो तुम कहते हो मैं हूँ तो मुमकिन है।
- 14:59इसे ही अज्ञानता कहते हैं। अज्ञानता में भी तुम कह सकते हो
- 15:06यही शब्द हूबहू तुम नकल कर सकते हो यू कैन इमिटेट।
- 15:16लेकिन उसमें खुशबू न होगी, उसमें फूलों की खिलावट न होगी, वो गुलशन
- 15:31की फैजाव की तरह महत्त्व है। और सुगंधित हवाएं बहेंगी नहीं।
- 15:44संत भी यही शब्द कहेगा सब वो ही करता है और सब मंगल दाई करता है।
- 15:57कुछ भी अशुभ वो नहीं करता। अशोक उससे होता ही है क्यों?
- 16:05क्योंकि यह उसकी लीला है। देखिए मैंने कितना बोला, लेकिन
- 16:19पुत्री सवाल फिर भी रह गई। इसलिए मैं कहता हूँ, जहाँ सवाल
- 16:29खत्म हो जाते हैं, उस स्थान पर पहुँच जाओ, फिर से कोई प्रश्न
- 16:37नहीं उठेगा। फिर वही।
- 16:41बाघ होगा वही बाघ में होगा, वही महक होगी, वही स्थान होगा, वही सब
- 16:48कुछ होगा, लेकिन दृष्टि कौन बदल जाएगा अभी तो तुम बिना देखे मेरी
- 16:57बातों को दोहराते हो तो दा रत्न। लेकिन मैं जैसे ही बैठा हूँ 14
- 17:06वर्ष से एक स्थान पे तुम ना बैठ पाओगे और बैठ भी पाओगे तो वो
- 17:14सर्कस होगा मेरी तरह आनंदित खिले खिले।
- 17:22सुगंधित फूलों की तरह महक तुम्हारे में नहीं आओगे, महक कहाँ
- 17:31से लेके आओगे, फूल तो प्लस स्टिक के बना लोगे रोवा रोवा तुम्हारा
- 17:40महक के गाणें। अगर सब कुछ परमात्मा करता है तो
- 17:53आप क्यों बोलते हैं? बाबा ए भी तेरी दांत ए भी दांत
- 17:58तेरी दाता। यह भी उसकी मर्जी है।
- 18:07मैं भी उसके हाथ का खिलौना हूँ, ये बात मैं तुम्हारी पूछने से
- 18:16नहीं कह रहा हूँ और लढ़ी बहुत बार मैंने पहले कहा।
- 18:25वही बोलता है, मैं माध्यम हूँ इस शरीर को माध्यम बना के वो बोलता
- 18:31है क्योंकि इस शरीर को वह योग्य समझता है।
- 18:46और वो शरीर धन्य हो जाता है जिसके भीतर से आके वो बोलता है।
- 18:51इसलिए हमने संतों के शरीर का भोजन किया।
- 19:01ये वो नगमा है जो हर साज़ पे गाया नहीं जाता है,
- 19:15मोहब्बत के लिए कुछ खास दिल मकसूस होते हैं, मोहब्बत के लिए कुछ खास
- 19:25दिल मकसूस होते हैं। ये वो नगमा है जो हर सास पे गाये
- 19:30नहीं जाता। किसी का सा बिगड़ जाएगा, किसी की
- 19:37नहीं बिगड़ जाएगी, किसी का सास बिगड़ जाएगा, हर सास पे गाये नहीं
- 19:43जाता, ये वो नगमा है। फिर मैं क्यों बोलता हूँ नहीं
- 19:58पुत्र मैंने सारी रामायण कह दी तुमने फिर वही प्रश्न पूछा क्या
- 20:04राम सीता के बेटे थे? क्या सीता राम की माँ थी?
- 20:16फिर तुमने सुना क्या पुत्र? सारी रामायण मैंने बाँच दी,
- 20:24तुम्हारे प्रश्न वहीं खड़े हैं और मैं जानता हूँ वहीं खड़े रहेंगे
- 20:30तो फिर इन प्रश्नों को खत्म कैसे करें प्रैक्टिकली?
- 20:35थ्रोटिकली ये खत्म होने वाली नहीं।
- 20:40जो लोग थ्रोटिकली भ्रांतियों को नष्ट कर देते हैं, वह हल्का तो
- 20:47होंगे क्योंकि बाहर उतर गया उन मान्यताओं का।
- 20:55उन ब्रह्मों का जो तुम्हारे सिर पर टोकरी की तरह रखे हुए थे, तुम
- 21:02हल्के हो जाओगे, आनंदित नहीं होगे, मैं तुम्हें आनंदित कर देना
- 21:09चाहता हूँ। ये दो काम करने हैं हमें।
- 21:15पहले तुम्हारे सिर पर नाजायज बोझा जो रखा है, वो फेकवा दो, फिर
- 21:23तुम्हें आनंदित कर दो। इसलिए संत का काम बड़ा भारी होता
- 21:30है। लेकिन शांत नहीं करता, परमात्मा
- 21:48करता है पर उसके लिए कुछ भी वार नहीं है उसकी सरजना।
- 21:57उसकी इच्छा और संकल्प से चलती है। इसमें मैं और तुम, हम और तुम कहीं
- 22:08नहीं ठहरते और इन्हीं बंधनों से मुक्त करने के लिए।
- 22:21वह बोलता है, किन्हीं साजों का सहारा लेकर जिन पर यह गीत गाया जा
- 22:29सके। मान्यताएँ टूट जाएंगी, भ्रम टूट
- 22:41जाएंगे तो तुम नास्तिक हो जाओ, लेकिन नास्तिक भी आनंदित कहाँ
- 22:49होते है? जीतने नास्तिक मुल्क है।
- 22:53वहाँ से जीतने लोग मेरे पास आते है।
- 22:57वहाँ से शायद हिंदुस्तान से इतने लोग नहीं होते क्यों?
- 23:05क्योंकि नास्तिक होके एक बात साफ हो जाती है के पदार्थ तो सारे भोग
- 23:15लिए। अब्सिनलैंड है, नॉर्वे है,
- 23:19डेन्मार्क है, छ गणराज्य है, बहुत से अमीर मुल्क है, नास्तिक हैं,
- 23:26चाइना नास्तिक है, तरक्की हो जाएगी।
- 23:36हिंदुस्तान तू तरक्की भी नहीं कर पाएगा।
- 23:39क्यों? जो वक्त इन्वेंशन में गुजर जाना
- 23:46चाहिए था वह वक्त गंगा किनारे टल्लियाँ खिड़कने में भीग जाएगा
- 23:52जिसका कोई अर्थ नहीं है। अब भला गंगा के करीब तो मंडलियां
- 24:00खड़का कर गंगा के भीतर पदार्थ है जल।
- 24:12और जल को तो ज़रा भी पता नहीं कि तुम उसकी महिमा का गांड कर रहे हो
- 24:17और गंगा माता नाम की कोई चीज़ नहीं होती।
- 24:22ये तुम्हारी मान्यताएँ हैं, तुम्हारी सभी आरतियां बेकार हैं,
- 24:30तुम वाराणसी में करो। तुम त्रिवेणी संगम पर करो तुम
- 24:38हरिद्वार ऋषिकेश में करो तुम्हारी सभी पाठ पूजा आरती व्यर्थ।
- 24:51इसलिए हिंदुस्तान न खुदा ही मिला, न वसाले सायनम न इधर के रह, न उधर
- 25:00के रह। वैज्ञानिक प्रयोग नहीं कर सकेगा,
- 25:07इन्वेंशन नहीं कर सकेगा। हिंदुस्तान ने कितने इन्वेंशन
- 25:11किया, देख ही सकते हो, संख्या के हिसाब से दिखा आज कल के
- 25:19राजनीतिज्ञों के हिसाब से। पांच में बड़ी अर्थव्यवस्था बन
- 25:25गई। यह है पागलपन मुझे मत सीखाना, मैं
- 25:30जानता हूँ 140,00,00,000 लोगों का इकट्ठा धन।
- 25:43और 5,00,00,000 लोगों का इकट्ठा धन प्रति व्यक्ति कितना आता है ये
- 25:50बताओ वो है अमीरी अगर सभी भाई अलगअलग हो जाए।
- 26:00तो एक भाई के हिस्से में कितना आएगा ये बताओ मुझे ये मत बताओ के
- 26:10हिंदुस्तान पांचवीं अर्थव्यवस्था बनके अब चौथी बन जायेगा फिर तीसरे
- 26:16बन जायेगा फिर दूसरे बन जायेगा फिर एक पहेली बन जायेगा।
- 26:20ये पागलपन हमको मत सिखाओ, हम जानते हैं और हिंदुस्तान ऐसे
- 26:37दोराहे पे खड़ा है, वह न तो अमीर हो पाता है।
- 26:46ना वह इन उपासना जैसी वृत्तियों से निजात पा सकता है।
- 26:53नहीं तुम्हारा नाम नहीं ले रहा हूँ।
- 27:05ढोल पिट रहा है उसके आगे जैसे भैस के आगे भीन बजा लो।
- 27:13ऐसे गंगा आरती कर लो और बहुत से हजारों लोग पागल है।
- 27:19वहाँ खड़े होकर तमाशा दिखते हैं पागलपन का।
- 27:27तुम कहती हो ती बस में तो यह है बहता हुआ पानी बस एक पानी तो
- 27:39हमारी होज में है। एक पानी नदी के भीतर बहता है
- 27:45दोनों पानी तुम्हारी श्रद्धा ही पानी को तीर्थ में बदल देती है।
- 27:54तुम्हारी श्रद्धा और श्रद्धा ही तीर्थ को पानी में बदल देती है।
- 28:02वहीं पानी गंदे नाले में भी। वहीं पानी के भीतर क्षीर सागर में
- 28:08तुम्हारे विष्णु भी सोए हुए हैं। लेकिन सब कल्पना और तुम कल्पना की
- 28:17जंजाल। मैं सदियों सदियों से उलझे हो और
- 28:25सदियों सदियों से गला मुझे लोग कहते हैं कि हिंदुस्तान में सबसे
- 28:33ज्यादा अवतार साधू संत ऋषिमुनि हुए।
- 28:42इसका कारण क्या है? यह बड़ी पवित्र भूमि है।
- 28:47मैंने करनी यह बड़ी दुष्ट भूमि जीस शहर में डॉक्टर यादव हूँ।
- 29:00हसो मत वह हम बरीर जी ज्यादा होंगे हिंदुस्तान दुखी मुल्कों का
- 29:11राजा है। अग्रणी विश्व में डंका बजता है
- 29:15उसका। पागल राज़ करते हैं यहाँ और
- 29:24पागलों के पट्ठे इन पागलों को वोट देते हैं तुम कहते हो ये तो धरा
- 29:33है। ऋषियों की मुनियों के परमात्म यही
- 29:38अब तक होता है। देखो कहीं और अवतर हुआ सारी धरती
- 29:46है भाई हिंदुस्तान के पास तो भूमि कोई ज्यादा भी नहीं है।
- 29:52फिर यहीं को अवतरित होना पड़ता है।
- 29:57बाहर क्यों नहीं अवतरित होना पड़ता?
- 30:02तुम इसको गर्व से कहते हो? नहीं, यह शर्म की बात है के
- 30:08ऋषियों को, मुनियों को, कृष्ण को, राम को।
- 30:11परशुराम को यही होना पड़ा वहीं तो जाएंगे डॉक्टर जहाँ मरीज होंगे
- 30:19वहीं तो खुलेंगी दुकानें जहाँ ग्राहक आएँगे भरी अंधेरी गुप पशु
- 30:26प्राब में बरसते हुए मेघ में। कभी कोई दुकान खोल के रात में
- 30:31बैठा है। क्यों नहीं बैठा?
- 30:40क्योंकि संभावना नहीं है ये सब बरसते में में।
- 30:47कोई दुकान पर सामान लेने आ जाए। हिंदुस्तान को पवित्र धरती मत
- 30:55कहना है। साधु संत ऋषि मुनि अवतार यहाँ
- 31:01अवतरित हुए तो उसका कारण इसका महत्त्व नहीं वर।
- 31:09इसके मूड तय है, इसकी थोप नहीं है।
- 31:19रौशनी की जरूरत वहीं पड़ती है जहाँ अँधेरा हो जहाँ पहले से
- 31:27प्रकाश है सूरज निकला है। वहाँ कभी तुमने तार से जगाया
- 31:31मोहब्बती जगाये क्योंकि वहाँ जरूरत ही नहीं।
- 31:50तुमने पूछा पुत्र फिर आप क्यों बोलते है?
- 31:58तुम भी मेरी नकल करके बोल सकती हो और बहुत से लोग मेरी नकल करके बोल
- 32:03रहे है। मैंने देखा है मेरी चन्द्र पर लोग
- 32:07आ जाते है। कैन्टेंट को चुरा लेते हैं और
- 32:13उसको एआई के बीच में डालकर ओशो की आवाज देख कर बोल देते हैं
- 32:18कैन्टेंट सारा मेरा होता है भीतर से आया हुआ।
- 32:26ये क्यों हो रहा है? मैं कर ना देता हूँ क्यों बिचारों
- 32:31ने बच्चे पालने चलो, इन्हें कर लेने का कोई बात नहीं।
- 32:49यह भी परमात्मा ही करता है। कबीर के पास बहुत से लोग आते है।
- 33:08कबीर प्रवचन समाप्त करके लोग उठ जाते, प्रणाम करते और कबीर कहते
- 33:15भाई जाना मत। भोजन करके जन्म दुपहरी के भोजन का
- 33:21वक्त हो गया भूख लग गई होगी कहाँ इतनी दूर जाओगे?
- 33:32बस भोजन बन ही रहा है। और लोई को हवा की थी कि लोई जल्दी
- 33:43कर प्रवचन समाप्त हो गया है। 1 दिन ऐसा हुआ कि घर में कुछ भी
- 33:52नहीं था। अब ऐसे लोगों को घर में क्या
- 33:56मिलेगा? गालिब के घर चोर आ गया रात को और
- 34:05गालिब तो खुद ही फाका किये थे क्योंकि या तो शराब पी लो या रोटी
- 34:11खा लो। अब शराब पी लिए थे, लेकिन वह तो
- 34:19अर्ध रात्रि में उतर जाती है और चोर अक्सर अर्ध रात्रि के बाद ही
- 34:23आते हैं। गालु जाग रहे थे, देख रहे थे कट
- 34:36पट कट पट हो रही है। जब दबे पांव चोर जाने लगा तो गालु
- 34:47ने कहा सुन भाई। चोर तो झटका अंधेरी रात दबी पांव
- 34:59निकल रहा है और यह आवाज मालिक जाग रहा है।
- 35:07कहता भाई ठहरों। चोर तो सेम गया भाई, कुछ मिला तो
- 35:15आधा मुझे भी दे के जाना। चोर ने हाथ जोड़ लिया पर वो कुछ
- 35:22नहीं मिला। गालिब कहता भाई मैं ही अगर कुछ
- 35:30मिलता तो दिन के उजाले में ही कुछ नहीं मिला।
- 35:34रात के अंधेरे में क्या मिलेगा? खुद ही फाका करके सोया हूँ, उधर
- 35:45की पीते थे मैं और जानते थे। रंग लाएगी हमारी फाखा मस्ती 1 दिन
- 35:57उधार की शराब पीते थे, उधर की पीते थे मैं और जानते थे कि हाँ।
- 36:07रंग लाये की हमारी फका मस्त सब परमात्मा करता है और मैंने बड़े
- 36:17विस्तार से समझाए कि तुमने तो यह ज़रा बनाया भी नहीं, बस यह प्रश्न
- 36:23तो ही उठते है। बुध के खोपड़े में भी उठते है।
- 36:30बस बुद्ध कहते हैं छोड़ो झंझट को क्या लेना है परमात्मा परमात्मा
- 36:35से तुम जितना जीवन है, सुखी सुखी हो केजी लो ठीक कह गए।
- 36:45आधे रास्ते तक आ गए बेचारे चलो आज का रास्ता तो तय करो और जैसे ही
- 36:53तुम उस पॉइंट पे आओगे जीस पॉइंट पर तुम अपने आप को जान लेते हो
- 37:01तुम्हें सामने जीने पर्दे के पीछे वह।
- 37:04अदृश्य हाथ वे दिखेंगे प्रत्यक्ष तुम उस रहस्य को जानने की तमन्ना
- 37:12से भर जाओगे, ये हो नहीं सकता के अपने आप को तत्व मसीह।
- 37:29मैं ही हूँ मैं शरीर नहीं मन नहीं विचार नहीं उगती हुई भावनाओं का
- 37:38उफान नहीं मैं उससे पार हूँ। उसके देखने वाला हूँ, उसका दृष्टा
- 37:44हूँ और तुम बहुत से लोगों ने इसे महसूस भी किया होगा।
- 37:48मैं 6 साल से बोल रहा हूँ जब तुम पूरे मौन में बैठ जाते होगे तो
- 37:59भीतर से कोई जगा हुआ तत्व। इस मन को निहारता होगा भीतर से
- 38:09कोई जागा हुआ तत्व जो दिनभर रात चौबीसों घंटे जागता रहता है और
- 38:18लगातार देख रहा होगा। विचारों को आते हुए जाते हुए,
- 38:24तूफानों को आते हुए जाते हुए बेकारों को उठते हुए जाते हुए,
- 38:32विषयों को उठते हुए और विषयों को जाते हुए।
- 38:45तो वहाँ तुम ठहर जाना, ऐसे ठहर जाना जैसे आज समान में तुम्हें
- 38:55बादल दिखाए पड़ रहे हैं और तुम बादलों को झपट के पकड़ने की
- 39:00चिष्टा नहीं करते जानते हो? के आसमान में बादल हैं।
- 39:06इस तरह जानू के छित के पटल के ऊपर बादलों की तरह विचार उठ रहे हैं।
- 39:15बादलों की तरह वासनाएँ उठ रही है, यह काले मेघ है, बादलों की तरह
- 39:22विषय उठ रहे हैं। यह बरसने वाले वेग है लेकिन तुमने
- 39:28कभी कोशिश की कि इन बादलों को उड़ कर पकड़ लूँ नहीं की क्यों तुम
- 39:39जानते हो, यह व्यर्थ है। क्या करोगे?
- 39:44बादलों को पकड़कर तुम उनको आने देते हो, ठहरने देते हो और बादलों
- 39:53को चली जाने देते हो, उनको अवसर देते हो क्योंकि और तुम कुछ कर भी
- 39:59नहीं सकते। बिल्कुल बादलों की भांति हो जाओ
- 40:06तो हमारे निर्मल चित्त के अंदर जब विकार उठे, विचार उठे, वासनाय उठे
- 40:13विषय उठे तो बिल्कुल उसी वेला को याद कर लो।
- 40:20की आसमान में जब सफेद बादल थे, काले बादल आए, बरसने वाले आए,
- 40:29गरजने वाले आए लेकिन तुम बस बैठे रहे।
- 40:38ना श्वेत बादलों को पकड़ने की चेष्टा की, ना काले ना गरजने
- 40:44वाले, ना बरसने वाले किसी मेघ को तुमने पकड़ने की चेष्टा नहीं की।
- 40:49बिलकुल इसी तरह से यहाँ भी हो जाओ, यही प्रैक्टिकल है।
- 40:56और जब तुम इनको पकड़ने की चिष्टा नहीं करोगे नॉन क्लिंगनेस तो तब
- 41:03ये आयेंगे चित के आकाश पर थोड़ी देर ठहरेंगे और चले जाएंगे बस
- 41:11ब्रह्मचर्य सद गया। ब्रह्मचर्य लगोट बांधने से नहीं
- 41:18साध्वता तुम्हें किसी ने गलत को राह पे डाल दिया है मन वासनाओं से
- 41:26भरा हो और तुम वासनाओं से चिपक जाते हो, यह किसी बुद्धू की
- 41:34करामात। जो तुम्हें सिखाई गई, वह खुद भी
- 41:39इन व्याधियों से ग्रस्त होगा। वह खुद भी वासना से मुक्त नहीं
- 41:45हुआ होगा तो वह जो जानता है वही बोलेंगे, इसीलिए मार्क्सस कहता
- 41:52नहीं है ब्रह्मात्मा क्यों देखा नहीं?
- 41:59बुद्ध कहते नहीं है परमात्मा हल्की सी झलक तो मिली लेकिन वहाँ
- 42:07पहुंचने की इच्छा नहीं की। लेकिन यज्ञ बल का कहते हैं कि
- 42:13परमात्मा है। कृष्ण कहते हैं कि मैं ही
- 42:21परमात्मा हूँ। ऋषि कहते हैं मैं ही परमात्मा हूँ
- 42:25आह ब्रह्मास्वा मंसूर कहते हैं अनल हक मैं ही परमात्मा हूँ।
- 42:34ल इलाहा ल इलाहा एक परमात्मा के सिवा कोई पूजने के योग्य नहीं।
- 42:41बिलकुल ठीक सब उसने किम बनाया सब उसकी करियेशन है तुम्हारी कुश।
- 42:50एक बहुत बड़ी भान्ति तोड़ दी। इस कलमिन ल इलाह इलाह वही पूजने
- 42:59के योग्य है जिसने बनाया जिसने क्रियेट किया, तुम पूछते हो
- 43:10मूर्तिकारों। और तुमने सब नकली नकली खड़े कर
- 43:19लिए मूर्तियां बना ली, फिर उसमें प्राण प्रतिष्ठा कर देते हो भला
- 43:24प्राण प्रतिष्ठा चेतना जीस, माटी में आ जाए अब जी जो माटी बोल रही
- 43:32है। यह बोल क्यों रही है?
- 43:36तुम्हारी मंदिर की मूर्ति चुप क्यों है?
- 43:41यह बोल रही है कि इसमें चेतना का प्रवाह तुम्हारी मंत्र की मूर्ति
- 43:47क्यों नहीं बोलती? क्योंकि इसमें चेतना का प्रवाह
- 43:50नहीं है तो हमारे पंडित कहते हैं प्रण प्रतिष्ठा हो गई, लेकिन हुई
- 43:54नहीं। नकली नकली है सब अगर अपना
- 43:58प्रतिष्ठा हो जाती तो भोग भी लगाती, खाना भी मांगती, शौच भी
- 44:03जाती, लघु शंका भी करती कुछ नहीं करती।
- 44:14इसलिए ब्राह्मणों को मैं ठग कहता हूँ, बड़े से बड़े ठग और ठग है तो
- 44:22परमात्मा ने देख लो घंटे खिड़काने की योग्य कर दी।
- 44:29कोई आईएएस नहीं, कोई आईएएस नहीं घंटे खिड़का रहे है टल खिड़काओ
- 44:32बस? वो भी नहीं शपराण मूर्ति के आगे
- 44:40कोई ₹2 टकेगा ये कोई जून है तुम्हारी, लेकिन सब उसकी लीला है।
- 45:01खेल खिलाड़ी आपके खेलन हारा हो, गरीब भी वही अमीर भी वही जब तुम
- 45:12खोपड़ी में आ जाओगे तो यह खोपड़ी यह चेतना प्रश्न उठाना शुरू कर
- 45:17देती है। और जब तुम अपने अंतःस्थल में चले
- 45:22जाओगे तो यही चेतना सर्व स्वीकार में आ जाती है।
- 45:30बात सिर्फ यही है, खोपड़ी से अंतःस्थल की चेतना तक कैसे
- 45:35पहुंचना? यह सफर तुमसे होता नहीं, हजारों
- 45:40जन्म बीत गए, तुम खोपड़ी में ही बने रहे खोपड़े से नीचे नहीं उतरे
- 45:49अपने अस्तित्व में नहीं गए जहाँ सूखा द वातावरण है।
- 45:59जहाँ शहनाइयां बज रही हैं, कितने नाद वहाँ होते हैं, कितने मधुर
- 46:12विणाएं टनकार मधुर आवाजिंग? उसकी सृष्टि की समझ नहीं आती, एक
- 46:30जरिया न बना सकने की हैसियत रखने वाला मानव परमात्मक न होने पर।
- 46:41प्रमाण देता फिरता है। तुम एक दूसरे को समझा रहे हो उसको
- 46:56जो समझ में आता नहीं, इसे ही शास्त्र अर्थ कहते हैं, तुम्हे
- 47:05पता नहीं अगले पल क्या होगा? उधना तेरे लेख किसी के।
- 47:24समझ न आते हैं वेदना तेरे लेख किसी।
- 47:44समझ न आते हैं बिछड़े जाते हैं।
- 48:11हो वेदना तेरे लेखक किसी के। समझना आते हैं जन जन के प्रिया
- 48:37राम लखनौ सिया। बन को जाते हैं
- 48:56लेखकशी। समझी न आते तुम इसे समझने की
- 49:09चेष्टा मत करो पुत्र यही गच्चा तुमने हजारों जन्मों से खाया।
- 49:19इस बुद्धि के तल से नीचे उतरो, जब तक बुद्धि में हो, प्रश्न उठते ही
- 49:25रहे, मैंने अपना शस्त्र पूर्ण करती हूँ तो हमारे प्रश्न खत्म
- 49:35नहीं हुए और नहीं होंगे। तुम्हारे प्रश्न खत्म करने का
- 49:40इंतजामात करो, इंतजामात, यह बहुत बार बोला इस खोपड़ी के तल से नीचे
- 49:49उतरना शुरू करो और वहाँ चले जाओ यहाँ सभी प्रश्नों का हल हो जाता
- 49:54है समाधान हो जाता है जीसको हम समाधी कहते हैं।
- 50:00अन्यथा प्रश्न नहीं खत्म होगा। तुम लाख को हम समझ गए, लेकिन
- 50:05तुम्हारा कुछ समझ में नहीं आता, मुझे पता है।
- 50:20इस सम से दूर बहुत दूर बहुत दूर निकल जाओ, उस स्तर पे चले जाओ
- 50:32जहाँ थोड़ी सी भी हवा की सरसराहट नहीं होती।
- 50:39जहाँ मेघ नहीं गरस्ते जहाँ कोई तप श्वेत में जलाती नहीं, जहाँ कोई
- 50:47शस्त्र में आगाद नहीं कर सकता। यहाँ कोई पानी किवाड़ तुम्हें बहा
- 50:56नहीं हो सकते उस स्तर पर उतर जाओ जहाँ कल्याण ही कल्याण है, वहाँ
- 51:07जाकर तुम पाओगे जो करता है। जिसने बनाया वो ही करता है और वो
- 51:18ही कर सकता है क्षेत्रकार जिसने मूर्ति बनाई हो वो ही मूर्ति का
- 51:29रंग बदल सकता है, वो ही हेर फेर कर सकता है।
- 51:33नए नए नक्श बदल सकता है। वो ही तरमीम कर सकता है।
- 51:41जीस मूर्तिकर ने मूर्ति को बनाया तुमने कुछ किया धरा तो है नहीं कर
- 51:49धर तुम कुछ सकते हो भी नहीं। इसलिए मैं तुम्हें कहता हूँ,
- 52:00प्रश्नों के जंजावाद से बाहर आ जाओ जब तक बुद्धि के भीतर अवस्थित
- 52:08रहोगे, प्रश्नों के जंजावाद तुम्हें सताते ही रहेंगे।
- 52:20इस स्थान को छोड़ो, इस बुद्धि के स्थान से नीचे उतरो और नीचे कैसे
- 52:33उतरोगे बुद्धि को रिलैक्स कर दो। रिलैक्स युअर माइंड कंप्लीट्ली
- 52:43छोड़ दो बुद्धि के संग, क्योंकि तुम्हारी चेतना बुद्धि को पकड़े
- 52:48हुए हैं। अगर चेतना तुम्हारी बुद्धि को
- 52:53पकड़े नहीं होती। तो तत्क क्षण संपर्क टूट जाता है
- 52:59जैसे रात को टूट जाता है तुम सो जाते हो गहरी निद्रा में सुसुक्ति
- 53:03में चले जाते हो क्यों जाते हो सुसुक्ति में?
- 53:08क्योंकि तुम तुम्हारी चेतना का जुड़ाव तुम्हारी बुद्धि से अलग कर
- 53:13देते हो? सीधी सी पर नाली है।
- 53:16तुम रोज़ तुम्हें कुदरत सिखाती है, लेकिन सीख नहीं पाए तुम जैसे
- 53:24रात के निद्रा में तुमने क्या किया था?
- 53:28ये देखो कैसे तुम गणगौर निद्रा में गए गए पर तुम्हें पता ही नहीं
- 53:35चला। नींद कब आई, कब संबंध चेतना का
- 53:41विच्छेद हो गया इस यंत्र से जिसे तुम बुद्धि कहते हो जो प्रश्न
- 53:46उठाते और फिर उसके बाद तुम कहाँ चले गए कोई जानता है?
- 53:58कोई जानता है तुम्हारी यंत्र लाखो पाय कर तुम उनको अर्थ दे पाओगे
- 54:07शब्दों का खोज कुछ नहीं पाओगे और तुम्हारी सभी थ्रोटिकल बुक्स।
- 54:17लफाजी बकवास है, तुम जानते कुछ भी नहीं तो रात को जैसे तुमने बुद्धि
- 54:26से अपनी पकड़ हटा दी। ऐसे ही दिन में जागते जागते
- 54:33बुद्धि से पकड़ हटा दो रात को तुमने सोते वक्त अपनी बुद्धि से
- 54:40पकड़ हटाई तो तुम में चले गए। उसे कहते है मूर्छित ध्यान।
- 54:52दिन में तुम बिल्कुल वही प्रक्रिया करो, कोई अलग से
- 54:56प्रक्रिया करने की आवश्यकता नहीं, यह लोग नाम के नाम पर तुम ठग लेते
- 55:02हैं, कोई एक नाम देता, कोई पांच नाम देता, कोई 1000 नाम देता, कोई
- 55:07कहता सभी नाम उसके। कोई अलह कहता कोई सत नाम कहता,
- 55:13कोई राम कहता कोई राधे कहता, लेकिन सभी मूर्ख हैं।
- 55:22सभी लुटेरे हैं और यह वो लुटेरे हैं जिनके संग कुछ नहीं जायेगा।
- 55:31जिसका लूटा है, उसके संग भी नहीं जाता था और जिसने लूटा है उसके
- 55:36संग भी नहीं जाएगा। देखो ये कितने बुद्धू लोग हैं ये
- 55:43महल अटार ने जो तुम बनाए हों ये सुंदर चिमचमाती कारें जो तुम्हें।
- 55:49लोगों ने भेंट की है। क्या तुम उसका जरिया भी साथ लेके
- 55:53जाओ? नहीं जाओगे फिर काहे कह गिरे?
- 56:05बन को जन जाए। काय?
- 56:18बन को जन जाए? सरबयापी सदा अली पा तोहे संग समा।
- 56:43तोहे संग समा काहे रे हरे बन को जन?
- 57:00जा हाय किसको खोज रहे हो? क्या नामों से वो मिल जायेगा?
- 57:11क्या तीर्थों से वो मिल जायेगा मक्का मदीना से वो मिल जायेगा?
- 57:21नहीं मिलेगा कस्तूरी कुंडल बस है ब्रिकटु है वनवा जहाँ है वहीं
- 57:29मिलेगा ध्यान रखना जो चीज़ जहाँ गुम होती है वहीं से मिला करती
- 57:35है। कस्तूरी कुंडल बस है वह तो
- 57:42तुम्हारे घाट में है मृग ढूंढा अम्मा तुम काबा के बुथरों में
- 57:51ढूंढ़ते हो? तुम तीर्थों में ढूंढ़ते हो
- 57:54गंगासागर में ढूंढ़ते हो? तुम हरिद्वार, ऋषिकेश में टूटते
- 57:57हो, जो पाखण्ड हैं, ब्राह्मणों के पाखण्ड, ये छल कपट हैं या धोखेबाज
- 58:04में लुटेरे ऐसे घर में भी बहन? मोरख जाने ना जो काबा के पत्थरों
- 58:25में ढूंढने निकले, हज करने निकले, जो तीर्थ करने निकले, संगम पर गए।
- 58:38हरिद्वार, ऋषिकेश गए और ना ढूंढ पाएंगे और अगर वह भी मिल गया तो
- 58:51समझना होता तो तुम्हारे भीतर ही है मिलेगा तुम्हे अपने भीतर से।
- 59:01कोई नाम, कोई प्रयास, कोई साधन, कोई सीढ़ी तुम्हें वहाँ तक नहीं
- 59:07पहुंचाता क्योंकि यह कोई यात्रा है ही नहीं।
- 59:12तुमने अपने अपने तक ही पहुंचना है और तुम सदा ही अपने में विद्यमान।
- 59:19तुमने अपने आप को छोटा ही काम था जब दुबारा से फिर उसे ढूंढोगे
- 59:27ढूंढने की कोई आवश्यकता नहीं, तुम्हे कोई यात्रा करने की जरूरत
- 59:32नहीं क्योंकि तुम वो हो वो ही हो। बस क्या हुआ है
- 59:49आँखों पर पर्दा गिर गया है पलकों का पर्दा।
- 59:56ये पलकों का पर्दा हटा दो, देखने वाली आँखें सदा मौजूद हैं कहाँ
- 1:00:06तुम सोए सोए पलकों के गिरने के कारण सोए सोए सपने देख रहे थे और
- 1:00:13आँखें खुलीं? तो सपना खो गया, सत्य प्रकट हो
- 1:00:19गया, ऐसा नहीं सत्य सदासिथा सत्य सदासिथा आध सच जुगाद सच है भी सच
- 1:00:32नानक, होश भी सच। कहाँ बोलता हूँ मैं पुत्र, न मैं
- 1:00:44बदलना चाहता हूँ, न मैं व्यवस्था को ठीक करना चाहता हूँ?
- 1:00:54न कोई व्यवस्था को विकृत करना चाहता है, न कोई कर सकेगा।
- 1:01:05वो ही अपनी व्यवस्था को ठीक कर ले, वो ही अपनी व्यवस्था को गलत
- 1:01:10करता है। तो फिर ऐसी मुसीबत में क्या करें?
- 1:01:25तेरा पाना मीठा लाख है जो तू दब्बा वे सोई पर राजी हैं हम उसी
- 1:01:34में जिसमें तेरी राजा है। अपनी तो यूँ भी वह वह है और यूँ
- 1:01:44भी वह वह है तभी तुम सयाने कहोगे तभी दुनिया तुम्हें कहेगी तू
- 1:01:49सयाने हो गया, तुम उससे पहले मूर्ख थे, जब तुम उसकी वाणी में आ
- 1:01:57जाओगे। तेरा पाणा मीठा लाख है और यह
- 1:02:05पूर्ण प्राणों से हृदय से स्वीकार करना, क्योंकि यह शब्द नहीं है,
- 1:02:13वास्तव में सत्य और मैंने पढ़ी विस्तृत व्याख्या इसकी की।
- 1:02:20वास्तव में तुम नहीं हो। मैंने शब्दों से ही सरलीकृत करके
- 1:02:25तुम्हें समझाया कहाँ थे तुम जन्म से पहले तुम जो अपने आप को शरीर
- 1:02:33को मैं मानते हो कहाँ था ये जन्म से पहले?
- 1:02:36यह तुम्हारे बाप और तुम्हारी माता में अण्डाणु और शुभकरणु के रूप
- 1:02:40में था। दोनों मिले प्रस्प्रस हुआ वह
- 1:02:46भ्रूण और तुम्हारा जन्म हुआ भला उससे पहले तुम थे उससे पहले
- 1:02:53तुम्हारे माँ बाप थे नहीं। वो उनके माँ बाप के सपम और भ्रूण
- 1:02:59के भीतर थे। अंडाणु के भीतर थे।
- 1:03:03ऐसे ही सृष्टि आदिकाल से चली रही। मन्नू और शत्रुओं में समझ लो।
- 1:03:15नाम कोई भी दे लो आदम और ईव कहलो मन और शत्रु का कहलो लेकिन
- 1:03:26कहानियों हैं, मैं आपको बताता हूँ ना कोई जान सका है।
- 1:03:34न कोई जान सकेगा बुद्धि से और तुम सदा ही बुद्धि से खोजते हो उसको
- 1:03:45जीस बुद्धि से वह खोजा नहीं जा सकता तुमने सदा ही गागर में सागर
- 1:03:51को भरने की चेष्टा की है जो कि असंभव है।
- 1:03:57तो फिर क्या करो फिर वही करो जो छोटे बच्चे ने किया था।
- 1:04:03प्याली से कभी समुद्र खाली नहीं होते, समुद्र में ही प्याली को
- 1:04:09छोड़ दो, प्याली समुद्र में समा जाएगी।
- 1:04:14बौद्ध समुद्र में समा जाएगी और तुम एक आकार हो जाओगे।
- 1:04:19तुम उसके रस को भी नहीं लगोगे। यह शब्द नहीं है, यह सिद्धांत है
- 1:04:26यह वास्तविकता है और यह ऐसी वास्तविकता है।
- 1:04:32कि एक बार बूंद समुद्र में समा गई तो फिर उसको ढूंढ के दिखा दो।
- 1:04:39वो ही सेम बूंद तुम गिरा दो समुद्र में और उसी बूंद को फिर से
- 1:04:44ढूंढ के दिखा दो नहीं मिलेंगे वो? यही तो ज़मेला है पानी में मिल के
- 1:05:01पानी पानी में मिल के पानी। अंजाम जे के पान बिगड़ेगी और
- 1:05:18बनेगी, बिगड़ेगी और बनेगी, दुनिया यहीं रहेंगी और कहा जाएगी।
- 1:05:31कहाँ जाएगी होंगे यहीं झमेले, बने रहो, संत कहता है कोई तरह बने
- 1:05:45रहो। होंगे यही झमेले ये ज़िन्दगी के
- 1:05:53मेले ये तो मेले चलते ही रहेंगे दुनिया में कम न होंगे अफसोस हम न
- 1:06:02होंगे। ये ज़िन्दगी के मेले ये ज़िन्दगी
- 1:06:09के मेले सब जगह है वो और वो ही अपनी लीला को ग्रेट करता है और वो
- 1:06:21ही खेलता है उसे समझने की चिश्ता न करो।
- 1:06:26तुम्हारी सब समझने की चेष्टाएँ तुम्हें दुखों में ले जाती है, तो
- 1:06:31फिर क्या करो तुम उस में उतरने का प्रयास करो, अपनी बूंद को समुद्र
- 1:06:46में। मिला देने का प्रयास करो, समुद्र
- 1:06:51में मर्ज करने का प्रयास करो कहीं भी खो जाओ हाँ जी ये रूठ कर अब।
- 1:07:09कहाँ जाइएगा आज ही रूठ कर कहाँ जाइएगा?
- 1:07:30हमें आइएगा जहाँ जाएगा हमें। आइएगा हमें अजीरोटकर कहाँ जाइएगा?
- 1:07:56सब जगह उसी को पाओगे, घर में खोज लो।
- 1:08:04तीर्थों पे खोज लो मक्का मदीना पे खोज लो जब मिलेगा मिलेगा तुम्हारे
- 1:08:11भीतर से क्योंकि तुम्हारे ही भीतर है तुमने झक मारनी है, मार लो।
- 1:08:20कोई नहीं रोकता लेकिन जक मारकर 1 दिन तुम पाओगे जब पहुंचोगे तो
- 1:08:30मिलेगा तुम्हें तुम्हारे भीतर से क्योंकि वो तुम्हारे भीतर ही तो
- 1:08:34है कहीं नहीं गया वो। दादू दूजा को नहीं दूजी मन की
- 1:08:40दौड़ दौड़ मटि संशय गया वस्तु ठोर कि ठोर।
- 1:08:45वो तो वहीं है वहीं है सब जगह वो ही मौजूद है ईसा वस्त्र में दम
- 1:08:53सर्वम ज्यत कीच जगतयाम जगत। जहाँ जाइएगा, हमें पाइएगा, अजी
- 1:09:09रूठकर अब कहाँ जाइएगा। धन्यवाद।