Latest / Baba ji Vijay Vats / 15 Dec 24 - सूक्षम शरीर को कैसे ख़तम करें? सतोरी का मार्ग: समझें आनंदमय कोष को गहराई से!
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- 0:10भारत भूषण, नोएडा बाबा जी कोटी कोटी प्रणाम आपके वादसान श्री
- 0:20जिरनानी अथर्व हाय के तीन प्रवचनों।
- 0:25ने बहुत स्पष्टता दी लेकिन उनके कारण कुछ ऐसे प्रश्न उत्पन्न हो
- 0:36गए जिसकी स्पष्टता अभी होने ही। क्या पांच कोष की अपेक्षा से यह
- 0:51मानना उचित है कि आनंदमय कोष जिसे हम कहते हैं वह सूक्ष्म शरीर का
- 0:59ही हिस्सा है? दूसरा?
- 1:03कर्म सिद्धांत के हिसाब से हर कर्म भोगना ही पड़ता है।
- 1:11क्या सूक्ष्म शरीर जिसमें यह सब जन्म जन्मो के कर्मों का इकट् है,
- 1:20इनके भोगने के बाद ही गलता है? अगर ऐसा ही है तो कर्म भोगने में
- 1:28फिर जनमो जनम लग जाएंगे और नए कर्म शुभ या अशुभ बांधते ही
- 1:38रहेंगे अंतहीन श्रंखला की तरह। समझने में कहीं कुछ गड़बड़ हो रही
- 1:46है। दक्षिणा बिलासी भारत भूषण, नोएडा
- 2:05कहीं कुछ समझने में गड़बड़ हो रही है।
- 2:12सबसे पहली बात समझ लें सिद्धांत, नियम लाश समझ में आते हैं।
- 2:26समझे जा सकते हैं, लेकिन एक तत्व ऐसा है अस्तित्व वह समझ में नहीं
- 2:37आता। बहुत से लोग मुझे अस्तित्व के
- 2:41बारे में सवाल करते थे। तब मैं उन्हें हाथ जोड़ लेता हूँ।
- 2:50अस्तित्व समझ में नहीं आएगा। ये बिल्कुल ऐसा है जैसे तुम कहो
- 2:55कि गागर में सागर को भर दो, जब कोई ज्यादा जिद करता है।
- 3:01ऐसी ही बातों की तो मेरे पास कोई ऑप्शन नहीं होता।
- 3:06मैं उसे ब्लॉक कर देता हूँ। लोग गुस्सा भी होते हैं, लेकिन
- 3:15मेरी मजबूरी है। सिद्धांत समझे जा सकते हैं और 1
- 3:24दिन साइंस विज्ञान आज नहीं कल कल नहीं परसों नर्सों सभी सिद्धांतों
- 3:34को समझ लें तो कोई बड़ी बात नहीं। लेकिन समझाएंगे सिद्धांत नियम लॉस
- 3:47एक चीज़ फिर भी अछूती रह जाएगी जो समझ में नहीं आती अस्तित्व।
- 3:58अस्तित्व के बारे में कोई सवाल ना पूछे।
- 4:05अस्तित्व के बारे में पूछना बिल्कुल ऐसा है कि मेरे गागर में
- 4:08सागर भर्त हो? मेरे पास ऐसा कोई फॉर्मूला है
- 4:12नहीं। किसी के पास भी ऐसा फॉर्मूला नहीं
- 4:19होता। पूछा कि क्या आनंदमय कोश सूक्ष्म
- 4:31शरीर का ही हिस्सा है। देखिये याद रखना मेरी उन बातों को
- 4:37अभी ताजा ताजा तीन परवचन गए दे ही दे ही मैं कहता हूँ, सूक्ष्म शरीर
- 4:44कॉल इस दे ही के भीतर ही सारे वासनाएँ।
- 4:58इच्छाएं, लिप्तताएं, आकांक्षाएं, कल्पनाएं, जन्मों की समृतियाँ सब
- 5:10इसके भीतर भरा पड़ा है। पांच कोष है अन्न मैं कोष अन्न से
- 5:22बनता है प्राण में कोष प्राणों से बनता है मन में कोष मन से बनता है
- 5:34विज्ञान में कोष। और पांचवां आनंदमय कोष आनंदमय कोष
- 5:49के ऊपर आकर ज्ञानी। आध्यात्मिक व्यक्ति यहाँ आके बच
- 6:01जाता है आनंदमय कोश लोग कहते हैं ये साउल है या उसमें नहीं?
- 6:17आनंदा अनुभूति आनंदा अनुभूति जहाँ एकत्रित होती है वह है आनंदमय कोश
- 6:28ध्यान से समझना बहुत गहरा फर्क मिलेगा तुम्हें जैसे एक बलक।
- 6:38बल्ब से दूर बैठे हो तो सरौशनी में तुम पढ़ सकते हो और बल्ब के
- 6:45करीब तुम बलों को हाथ लगाओगे तो तुम्हारा हाथ जल भी सकता है।
- 6:53वह इतना हीटेड होता है। उस रौशनी के कारण देखता है वो
- 6:59रोशनी। लेकिन बल्ब का बाहर का कांच गर्म
- 7:05हो जाता है और तुम अगर कहो की रौशनी गर्म होती है तो ये गलत है।
- 7:14यहाँ फर्क पड़ जाता है। मन्नू में कोष प्राण में कोष अन्न
- 7:24में कोष विज्ञान में कोष इचार तो ठीक है पांचवा आनंद में कोष।
- 7:32आनंद में कोश बिल्कुल वैसे ही है जैसे बल्ब जपता था।
- 7:41बल्ब की रौशनी में सब कुछ पढ़ सकते हो, आप क्रीप जा के भी पढ़
- 7:46सकते हो लेकिन अगर छुओ तो वह गर्म होगा।
- 7:51आपका हाथ। जल भी सकता है।
- 8:01आनंद में कोष बिल्कुल ऐसा ही है जहाँ आनंद की अनुभूतियों का
- 8:07संग्रह होता है। बड़ी भारी बात है समझना हम जब
- 8:12आनंद की घड़ियों में होते हैं। प्रेम की घड़ियों में प्रार्थना
- 8:18की घड़ियों में अश्व पात होते हैं।
- 8:21किसी के बरह में तड़पते हैं आनंद की घड़ियों में जब होते हैं वो
- 8:29आनंद जिसमें कोश में इकट्ठा होता है।
- 8:36आनंद का अनुभव जीस कोश में इकट्ठा होता है वो है आनंदमय कोश।
- 8:45जहाँ अन्न इकट्ठा होता है वो अन्न अन्नमय कोश, प्राण इकट्ठे हैं,
- 8:52प्राणमय कोश। मन इकट्ठा है मनो में खुश जहाँ
- 9:01युक्तियाँ इकट्ठी हैं विज्ञान में खुश और जहाँ आनंद की अनुभूति
- 9:07इकट्ठी है वो आनंद में खुश। लेकिन आनंदमयकोश सब नहीं है इसलिए
- 9:17मैं तुमसे कह रहा हूँ यह षट, दर्शन, न्याय, वैशेषिक, सांख्य,
- 9:26योग, मीमांसा और वेदांत। कोई बड़ी बात नहीं है।
- 9:34आने वाले संत सातवाँ दर्शन इस दर्शन को मानने कोई बड़ी बात
- 9:43नहीं, क्योंकि बहुत सी जगह के ऊपर।
- 9:47यह आपके कट दर्शन से मेल नहीं करता, लेकिन मैं जो कहता हूँ
- 9:56तर्कपूर्ण कहता हूँ जो देखा जो जाना वह तर्क युक्त भाषा में
- 10:05समझाने की चेष्टा करता हूँ। कोई बड़ी बात है कि सातवाँ दर्शन
- 10:15मेरे दर्शन को मान लिया जाए, क्योंकि बहुत ही जगह के ऊपर ये
- 10:20थोड़ा सा भिन्न मालूम पड़ेगा। प्राणम्यपुष जीसको आम भाषा में
- 10:35आनंदमयपुष जीसको आम भाषा में साउल कहा जाता है लेकिन वो साउल नहीं।
- 10:44साउल के बिल्कुल करीब होने के कारण उसकी जो आनंद की जो अनुभूति
- 10:52होती है, इकट्ठी कामों की तरह जो इकट्ठा होता है, वह आनंद में कोश
- 10:59है। इसलिए साउल से इसका कुछ लेना देना
- 11:04नहीं एग्ज़िस्टन्स परमात्मा तत्वों से इसका कुछ लेना देना
- 11:11नहीं, यह अलग है जब आप शास्त्रों को बहुत गहरे से अध्ययन करोगे।
- 11:22तो आनंदमय कोष की परभाषा दी होगी। आनंदा अनुभूति से जो बना हुआ है।
- 11:30अब देखिए क्या फर्क होगा इस बात में जो मैं कह रहा हूँ आनंदमय कोष
- 11:37आनंदा अनुभूति से बना हुआ कोष। जो हमें अनुभूतियाँ ही आनंद पी वो
- 11:44उसमें संग्रहित है और ये पांचों कोश आपस में बड़े घनिष्ठ रूप से
- 11:51मिले होते हैं जैसे हमारे शरीर के सारे तंतु एक दूसरे से बड़े
- 11:57घनिष्ठ रूप से मिले होते हैं। चोट लगती है पांव के अंगूठे में
- 12:03और पता चलता है हमारे ब्रेन का ये सब सूचनाओं के जो केंद्र है वो
- 12:09तक्ष्ण पहुंचा देते हैं। कई अंगूठे में चोट लगी।
- 12:15ये पांचवें इकट्ठे हैं। इनको अलग नहीं किया जा सकता।
- 12:23अब यहाँ समझे या पांच वे इकट्ठे हैं, तो यह सूक्ष्म शरीर का
- 12:28हिस्सा है देही देही का हिस्सा है क्योंकि आत्मा देही से अलग है।
- 12:39आत्म वो है जो इन सबको देखती है। सभी कोषों को अनमय कोष मनमय कोष
- 12:49विज्ञान में कोष आनंद में कोष। इन सबका पांच पुरुषों का दृष्ट था
- 13:06वो है आत्मा। अगर तुम आत्मा को साउल को इन पांच
- 13:14पुरुषों में गिन लोगे आनंद में कोष में अगर तुम साउल को गिन
- 13:19लोगे। तो गड़बड़ हो जाएगा तो गड़बड़
- 13:23मेरे कारण नहीं है गड़बड़ इन दृश्यों की व्याख्या के कारण मैं
- 13:34तो सीधा कहता हूँ के पाँचों कोष। दीज़ आर सेपरेट फ्रॉम साउल साउल
- 13:47आईएस समथिंग एल्स व्हिच इस ओब्सर्वर दृष्टा वो सिर्फ देख रहा
- 13:55है अनुभव कर रहा हूँ। शायद समझा आ गया होगा अनुभव करने
- 14:06वाली सौल दृष्टता ऑब्जर्वर जो जागता है सोता नहीं।
- 14:18वह इन पांच कोषों का हिस्सा नहीं क्योंकि वो इन पांच कोषों को
- 14:24देखता है। जब तुम आनंद में होते हो तो ये
- 14:28देखता है। देखने वाला और वो जो आनंद की
- 14:36अनुभूति होती है वो जहाँ जीस कोष में संग्रहीत होती है, उसे आनंद
- 14:41में कोश कहते हैं। मेरे ख्याल में समझा आ गया होगा
- 14:45तुम्हें अगले सवाल को लें हम। यह आप ठीक से समझ लें।
- 14:54आज भी काम आएगा। अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनंद
- 15:01ये पांच ही मैंने कराए विज्ञान में कोष में सभी प्रकार के।
- 15:12अंतर्ज्ञान खोपड़ी से संबंधित हो या हृदय से संबंधित हो, इसमें
- 15:20भावनाओं भी हैं, बिरसा भी है, दिवेक्ष भी है, खुशी भी है और
- 15:26विचार भी है, अच्छे भी और बुरे भी है।
- 15:30ये विज्ञान में खुश है। अब हम आगे चले।
- 15:33कर्म की सरस्ती में कर्म सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक कर्म भोगना
- 15:41पड़ता है। बिल्कुल सत्य है।
- 15:46इस लाइन को आप टिक मारकर दो। प्रत्येक कर्म भोगना पड़ता है।
- 15:53यह सत्य है आगे चलिए क्या सूक्ष्म शरीर जिसमें सब जन्मो जन्मो के
- 16:02कर्मों का इकट्ठा है, इनके भोगने के बाद ही करता है।
- 16:10यानी जिसे मैंने दे ही कहा, क्या वह तब गलत है जब सभी कर्मों का फल
- 16:21मोग लिया जाता है, बड़ा सुन्दर स्वाद है?
- 16:31देखिए, उसके आगे खुद ही जवाब दे दिया है।
- 16:38अगर ऐसा है तो सब कर्म भोगने में जन्मो जन्मो लग जाएंगे, और ये?
- 16:47भोगने वाले वक्त में नए कर्म भी आएँगे।
- 16:54क्या ये अंत हीन जंजाल बनकर रह जाएगा?
- 17:01सवाल बड़ा पिचगिदा है, लेकिन मैं जवाब बहुत बार दे चुका हूँ।
- 17:07मैं जानता हूँ भारत भूषण मेरे सभी वीडियो को सुनता है, लेकिन तभी
- 17:14मैं कहता हूँ कि सुनने में चूक हो जाती है एक थोड़ा सा शब्द नोट कर
- 17:23लेना। कभी काम आएगा?
- 17:32शिष्य बनना नहीं पड़ता। शिष्य वह जो सर्व स्वीकार करने के
- 17:39बाद बन जाता है। नैचुरली बन जाता है, सहज बन जाता
- 17:47है शिष्य बनने की चेष्टा मत करना शिष्य तुम बन ही जाओगे जब तुम्हें
- 17:56हर चीज़ की सहज स्वीकृति होने लगेंगी।
- 18:00जो होता है वह ठीक होता है। ए खोपड़ी से नहीं मानो जो होता है
- 18:08ठीक होता है। अनुभव से जो जाना जाता है उसके
- 18:12बाद ही व्यक्ति शिष्य बनता है और तुम समझते हो कि शिष्य बनो, सब
- 18:21बात को मानो। तो मानने से शिष्य हो जाओगे नहीं
- 18:30जो मान मान के जान लेता है, जो करता है परमात्मा करता है, उस
- 18:35जानने के बाद शिष्य तो फलीभोत होता है, ऐसे ही महावीर ने श्राव
- 18:41का। तुम सुनते तो हो, लेकिन ऐसा भी हो
- 18:49सकता है कि तुम श्रावक ना हो। सुनने के बाद अगर प्रश्न उठता है
- 18:56तो तुम श्रावक नहीं ना हो श्रावक हो ना?
- 19:01अभी शेष है। इसमें कोई पश्चाताप की बात नहीं
- 19:05है, कुछ गलत नहीं है, बस इतना है कभी और चलना होगा।
- 19:15श्राव के जीस दिन बन गए शिष्य जीस दिन बन गए।
- 19:20उसकी एक पहचान है। जैसे ज्ञानी का रक्षण होता है,
- 19:26वैसे ही शिष्य की पहचान है, शरावक की पहचान है, उसके बाद प्रश्न
- 19:32नहीं उठेगा। अगर प्रश्न अभी उठता है, तुम अपने
- 19:37आप के खुद के मेजरमेंट से ही अपने आप को कसते रहा करो।
- 19:42क्या प्रश्न उठता है? देखो ऐसा ना हो कि तुम प्रश्न तो
- 19:47उठे लेकिन बताओ ना? वह भी गलत हो गया।
- 19:53जैसे लोग को वास नहीं तो उठते लेकिन वह ब्रह्मचर्य का लेवल लगाए
- 19:58रखते हैं। हम तो ब्रह्मचार्य हैं, अक्रोदी
- 20:00हैं, लोग क्या कहें वो तो फिर झूठ हो गया ऑथेंटिफिकेशन न हुआ
- 20:12कॉन्फ्लिक्ट हो गया। जीस दिन शिष्यत्व फलित फलित होगा।
- 20:21श्रावक फलीभूत होगा। भीतर से उसकी पहचान बता रहा हूँ।
- 20:27कस लेना? सिर्फ हीन भावना से मत भरना।
- 20:35उस दिन भीतर से प्रश्न नहीं उठेगा, भीतर से नहीं उठेगा।
- 20:39दबाने की भी कोई आवश्यकता नहीं। अगर प्रश्न आए तो पूछ लो, लेकिन
- 20:45प्रश्न वो पूछना जो नियमों से संबंधित है, मैंने पहले भी बताया
- 20:53था। नियमों को समझा जा सकता है।
- 21:00अस्तित्व को समझा नहीं जा सकता। इसको गोल्डन शब्द में लिख के रख
- 21:05लेना, अपने पास अपने कमरे में रख लेना।
- 21:10लोग मुझे अस्तित्व के बारे में सवाल पूछते हैं।
- 21:16और फिर जब बहुत समझाने की चेष्टा करता हूँ, वह मानते नहीं।
- 21:20जवाब देते ही चले जाते हैं तो मेरे पास कोई ऑप्शन नहीं भाई
- 21:23सुनते जाओ, ऐसे प्रश्न करना मेरे पास वर्जित है।
- 21:29मैंने और भी बहुत कुछ बोलना है, वक्त कम है।
- 21:37ऊंट पटांग सवालों के जवाब देता रहा तो तुम्हारे ये प्रश्न आने
- 21:42वाली जेनरेशन के लिए घातक से दौंगे क्यों उनका समय तुम खा
- 21:46जाओगे इसलिए मेरी करवध प्राप्त है।
- 21:53ऐसा प्रश्न मत पूछना जो तुम्हारे जी का जिंजाल न हो संसारिक सवाल
- 22:00भी तुम्हारे जी का जिंजाल बन सकते हैं।
- 22:03तुम इतने कर्जदार हो के लोग तुम्हें तंग करते हैं, वो प्रश्न
- 22:07मुझसे मत पूछना। वो संसारिक प्रश्न तुम्हारी जी का
- 22:11चिन्ह डालने को गाटा पड़ गया को आग लग गई।
- 22:18प्रश्न पूछना अध्यात्म से संबंधित है, जैसे ये प्रश्न पूछा, भारत
- 22:22भूषण क्या ये कोष सूक्ष्म शरीर का हिस्सा है?
- 22:29या कर्मों के फिलिप्स पे? ये प्रश्न है?
- 22:32जवाब दे नहीं ओके तो प्रश्न तब पूछना जब जी का जंजाल बन जाए,
- 22:39दिमाग को ले जाए, सॉल्व न कर सके गुर की आवश्यकता वही होती है।
- 22:47वह उलझी हुई गांठ के धुआगे को उलझन से निकाल के स्टेज कर देगा।
- 22:55ये रोजा का प्रत्येक कर्म भोगने के बाद ही समाप्त हो गया।
- 23:07पहली बात तो ये आप नोट कर लेना दूसरा प्रश्न पूछा है, मैंने भी
- 23:17कहा। सभी संतों ने कहा भोगने से ही नर
- 23:22झरा होती है। दे ही गल जाता है सारा पूरा का
- 23:28पूरा जैसे पतीले का पानी सारा वाष्प बन के उड़ गया और पतीला
- 23:35खाली हो गया जलने लगा अब तो पतीला जलने लगा।
- 23:41पानी खत्म हो गया तो सब गर्म भोग लिए गए।
- 23:45दे ही गल गया और जब दे ही गल गया तो तुम पारदर्शी हो जाओगे,
- 23:55पारदर्शी हो जाओगे तो स्वयं को जान सकने की क्षमता हो जाएगी।
- 24:06लेकिन ये प्रश्न बीच में आड़े आता है और बिल्कुल सही प्रश्न है और
- 24:10सभी का प्रश्न है तुमने पूछ लिया, बहुत अच्छा किया अगर गलने तक
- 24:21इंतजार किया जाए, दे ही का, सभी कर्मों का जो पिछले कर्म है।
- 24:29भोग कर ही समाप्त होंगे। देही के गलने का सूक्ष्म शरीर के
- 24:36गलने का इंतजार किया जाए तो उस गलने की प्रोसेसर में जो नए कर्म
- 24:42होंगे, क्या वो हमें नहीं बांध लेंगे?
- 24:45बस यही गुरु का काम है। प्रश्न बिल्कुल ठीक है, गुरू का
- 24:52यही काम है, कर्म बनते क्यों हैं? यहाँ पर आ जाओ, पहले कर्म बनते
- 25:02हैं। तुम्हारे अज्ञान के कारण जब तुम
- 25:10करता होते हो तो मैं भाव से किये हुए कर्म तुम्हारे कर्म बनते हैं
- 25:23जो तुम्हें बाँधते हैं। जब तुम अकरता होते हो तो जो भी
- 25:33तुम कर्म करोगे वो तुम्हें बातें करना है।
- 25:37ये कैसे संभव है? दो तरीके से संभव है, एक तो सटोरी
- 25:44की झलक देख लो सबसे पहला। जब तुम सतौरी की झलक देख लोगे ये
- 25:52बाबा नानक ने साढ़े 17 साल की उम्र में सतौरी की झलक देखी और 36
- 25:58साल की उम्र में उन्हें समाधि फलित हुई है।
- 26:07कितने साल लग गए? साढ़े 18 साल सटोरी की झलक देखने
- 26:16के बाद तुम्हारे नए कर्म नहीं बनेंगे।
- 26:22अब इसको आप अच्छी तरह से लिख लेना।
- 26:27क्या है ऐसा? सतौरी की झलक में सतौरी की झलक
- 26:33में ऐसा यह है कि तुम सुस्पष्टियां देख लेते हो कि करने
- 26:42वाला मैं नहीं हूँ। और करने वाला मैं हूँ, यही
- 26:49तुम्हें बांधता है सतोरे की झलक में यही तुम्हें दिख जाता है कि
- 26:55करने वाला वह है जिसे हम विराट कहते हैं।
- 27:03जिसे हम सर्ज को कहते हैं। कर्ता कहते हैं बाबा नानक ने उसे
- 27:08कर्ता कहा इकोनकार कर्ता पुरखों वह करता है।
- 27:20सतोरी की झलक में ये दिख जाता है कि वह करता है मैं करता मैं हूँ
- 27:28और जैसे ही सतोरी की झलक दिखी तुम्हारा मैं भाव क्षीण हो गया
- 27:35तुम्हारा मैं कर गया, कर्म उसके बाद भी हो गया।
- 27:40कर्म तो कृषि भी करते हैं, कर्म बुद्ध भी करते हैं।
- 27:45समादृष्ट होने के बाद घटना घटने के बाद 40 वर्ष तक बुद्ध जीवित
- 27:51रहते हैं और करीब 30 वर्ष तक महावीर जीवित रहता है।
- 28:0172 साल की उम्र में महावीर ने निर्वाण प्राप्त केवल्य प्राप्त
- 28:05किया। 80 वर्ष की उम्र में बुद्ध ने
- 28:13निर्वाण प्राप्त किया। समाधि की घटना के बाद 40 साल जिए
- 28:24बुद्ध और करीब 3032 साल तक जिए भाग नानक भाई 36 वर्ष की उम्र
- 28:35में। स्वादिष्ट हुई 70 वर्ष की उम्र
- 28:39में 34 वर्ष तक की है। यह जो स्वादिष्ट होने के बाद का
- 28:46वक्त है, उसमें कर्म तो होते ही हैं और सही पूछो तो वही कर्म हम
- 28:55लिखते हैं। संत जब पहुंचता है उसके बाद उसने
- 28:59क्या किया? मूर्ख लोग होते हैं जो पहले की
- 29:02बात पूछते हैं, मुझे आज आते हैं प्रसन्न बाबा उससे पहले आप क्या
- 29:07करते थे? मैंने कहा उससे पहले तो मैं आवारा
- 29:10करती थी, आपके साथ हाँ बिलकुल आवारा करती थी।
- 29:21और ध्यान रखना समाधि से पहले जो भी कुछ होता है वो आवारावर्दी ही
- 29:26होता है। उसका कोई मतलब नहीं होता, क्योंकि
- 29:31समादिष्ट होने से पहले या सटोरी की झलक आने से पहले तुम जो भी
- 29:37करोगे उससे तुम्हारा। दे ही मजबूत होगा, बढ़ेगा घटेगा
- 29:46और दे ही का मजबूत होना बंधन का मजबूत होना है।
- 29:56दो तरीके हैं। शुरुआत की बात कह रहा हूँ, ध्यान
- 30:02से सुनता हूँ, या तो सटोरी की झलक दिख जाए।
- 30:05जो करता है वह करता है तो तुम्हारे जो कर्म बनेंगे उसमें
- 30:13कर्ता भाव ना होने के कारण। वो कर्म संग्रहीत नहीं होगा, वो
- 30:22दही को बढ़ाएंगे, नहीं तो नए कर्म नहीं बनेंगे।
- 30:27तो भारत भूषण ने यही प्रश्न पूछा की नए कर्म होते रहेंगे।
- 30:31पुराने भुगते रहेंगे, नए होते रहेंगे, जुड़ते रहेंगे, घटते
- 30:35रहेंगे फिर तो कभी भी। ये तो अन्त हीन जाल हो गया,
- 30:38बिल्कुल ठीक है, लेकिन अन्त हीन जाल नहीं होगा।
- 30:49जब नए करम बनने बंद हो गए, तब सटोरी की झलक के बाद।
- 30:59दूसरा तुम सही शिष्य बन जाओ, श्रावक बन जाओ।
- 31:07घटना बड़ी प्यारी है, गहरी है मैंने जो पहले इसका जिक्र किया
- 31:13आशिषत्व का और श्रावक का। वो जूही नहीं किया।
- 31:17उसका कारण था मुझे पता था मुझे आगे ये काम पड़ेगा जब तुम सुनते
- 31:26हो कभी दत्तात्रेय बीच में फंस जाते है, कभी कभी फंस जाते है,
- 31:33कभी नानक फंस जाते है। वो चले गए।
- 31:36कभी कृष्ण फंस जाते है तो अगर कोई भी फंस गया बीच में जो मैंने बोला
- 31:47तो तुम शिष्य नहीं हुए? तो तुम श्रावक नहीं हुए, महावीर
- 31:55बोलते हैं, बीच में फंस जाते हैं कृष्ण तो तुम श्रावक नहीं हुए?
- 32:03नानक बोलते हैं, तुम्हारे दिमाग में चलता है दत्तात्रेय यशंकर।
- 32:12या कृष्ण तो तुम शिष्य नहीं और शिष्य का ना होना और शराब का ना
- 32:20होना बंधन का कारण है। फिर तुम जो भी सुनोगे वो तुम्हारे
- 32:26लिए गांठ बन जायेगा, मजबूत हो जायेगा और सूचनाएं करती हूँ।
- 32:32देही ओर बढ़ा, सूक्ष्म शरीर ओर बढ़ा गांठ और ज्यादा मजबूत होंगे
- 32:42सुनना ऐसा होना चाहिए जो तुम्हें मुक्त कर जाए।
- 32:47सुनना ऐसा होना चाहिए। जो तुम्हारे भ्रम को खत्म करता है
- 32:53तोड़ देगा और बहुत से भ्रम तुमने पाल रखे हैं, वो सहेज भ्रम तुम
- 33:02तोड़ देते हो। घर से बाहर निकलते वक्त दायां पैर
- 33:08बाहर नहीं निकालना है। बांये निकालना है, दाएं निकालना
- 33:12है। ये सब तुम्हारे भ्रम में है।
- 33:14तुम ये तो छोड़ दोगे, बड़ी आसानी से बड़ी आसानी से छोड़ दोगे,
- 33:21लेकिन बहुत सी ऐसी मान्यताएँ हैं जो तुम्हारे जी का हिस्सा बन गयी।
- 33:27जीवन का हिस्सा बन के देवी देवता। भूत, प्रेत, पित्तर कुलदेवता ये
- 33:42तुम्हारे जीवन का हिस्सा बन के दिन रात तुम इनकी पूजा करते हो।
- 33:48और मैंने पिछले प्रवचन में कहा था, यह एनर्जी है यानी विद्युत और
- 34:02विद्युत के अगर तुम सौठसौ प्रचार पूजन करोगे।
- 34:06तिलक लगाओगे, अक्षत चावल लगाओगे, टीका करोगे, फूल बरसाओगे लगाओगे
- 34:20या बेवकूफ़ नहीं हो गया, बिजली को अगर तुम पूछोगे।
- 34:27यह मुड़ता नहीं है, लेकिन तुम पूछते हो इसका मतलब बात तुम्हारे
- 34:36गले से नीचे उतरी है, तुम बदलें यहाँ से समझाओगे तुम।
- 34:43घर जाके फिर कृष्ण भगवान की मूर्ति का के तुम कल खडकाना शुरू
- 34:48हो जाओ, मंदिर में जाओगे कल खडकर साईं की आरती करोगे, धूपदीप करोगे
- 34:57इनका कोई मतलब नहीं होता। लेकिन तुम करोगे यह तुम्हारे जीवन
- 35:03का हिस्सा बन गया है तो तुमने मान लिया है ये देवी देवता इस रूप में
- 35:13होते हैं। देखिए मैं पहले भी बहुत बार कहा
- 35:17हूँ। मैं नहीं कहता कि देवी देवता नहीं
- 35:19होते हैं। भूतप्रेत नहीं होते हैं।
- 35:22मैं नहीं कहता मैंने खुद की अपनी वाइब्रेशन में मेरे भाई का आना
- 35:27मेरे पास मरने के बाद सूक्ष्म शरीर में आना इसका उल्लेख किया
- 35:33हुआ है तो मैं मानूंगा के भूतप्रेत नहीं हैं।
- 35:40ये कैसे संभव है हैं? लेकिन जीस रूप में आप मानते हो उस
- 35:45रूप में नहीं है एनर्जी पुंज है, और मैं इनकी व्याख्या बहुत गहराई
- 35:53से पूरे पूर्व चुनाव में करूँगा। यह तुम्हारे देय ही का हिस्सा है,
- 36:03क्योंकि सूक्ष्म शरीर में सभी मान्यताएँ और तुम्हारी सूचनाएँ,
- 36:09जो तुम जानते हो तुम्हारा ध्यान जिन्हें तुम नॉलेज कहते हो और सब
- 36:14बराबर है। और इतना बड़ा पड़ा है जन्मो जन्मो
- 36:18का कि गले से ऊपर आगया है, गले से ऊपर आगया है, तो जब तुम इतना खा
- 36:26लोगे कि गले से ऊपर आ जाएगा तो वो मीटिंग होगी, होगी ना?
- 36:32बस ये जो तुम्हारे अंदर देवीयाँ आती हैं?
- 36:35हनुमान आ जाते है। भैरव आ जाते है, ये लाल नाम वाले
- 36:39फलना वाले आ जाते है, ये पीर खीर आ जाते है।
- 36:43ये तुम्हारी उल्टी है, बामन है वो मीटिंग के सिवा और कुछ नहीं है।
- 36:54किसी को जिन्न घेर लेता है। किसी को भूत प्रेत, चंडाल घेर
- 36:57लेता है। और दुकानदारों की मौज बन जाती है,
- 37:05क्योंकि तुम्हें तो दिखता नहीं दिखता, उसे भी नहीं, लेकिन उसकी
- 37:09दुकानदारी है, इसलिए उसे दिखता है हँसना मत करो, उसकी दुकानदारी है।
- 37:19कोई हनुमान नहीं खड़ा होता। इस बाबा बागेश्वर के पास समझे।
- 37:23बिल्कुल साहब बोल रहा हूँ लेकिन क्योंकि दुकानदारी है इसलिए सिर्फ
- 37:31दिखता है और तुम क्योंकि व्याधीग्रस्त हो तुम मान लेते हो।
- 37:38व्याधिग्रस्त व्यक्ति से तो कुछ भी मनोहर ये शक्ति पुत्र हैं, एक
- 37:46और है वो, मैं उसका नाम बार बार भूल जाता हूँ, वो ऑर्डर करता है
- 37:56ठुम ठुम। वो गिर गई वो ले जाओ उसको कहाँ ले
- 38:01जाओ कुछ नहीं दिखता उसको मैंने बड़े गौर से अपनी अंतरात्मा में
- 38:08झांक के देखा है जब भी ऐसे कलाकारी करता ना मैं देखता हूँ,
- 38:12कुछ नहीं होता इसे कुछ नहीं देखता थोथी।
- 38:17कल्पना कल्पना की सडान होती है और कुछ नहीं होता है।
- 38:27पुषा है भारत भूषण अगर हम नए कर्म करते रहेंगे तो वह जुड़ते रहेंगे,
- 38:32पुराने भोगते रहेंगे, अंतहीन शंखरा आ जाएंगे नहीं।
- 38:36अंत हीन श्रृंखला ऐसे कटेगी सटोरी की झलक देख लो दूसरा अपने आप की
- 38:51भूमि तैयार करो। शिष्यत्व श्रावक बनकर।
- 39:01उसकी मर्जी का मानना मतलब गुरु ने जो बोल दिया ठीक है, अगर तुम इतने
- 39:14श्रद्धाणवी तो हो जाते हो तो वहाँ एक शब्द बोला है संतो ने।
- 39:22गले से नीचे नहीं उतरता नास्तिकों के नहीं।
- 39:27आस्तिकों के गले नहीं उतरता, नीचे कहता है गुरु गू के गुरु बां वरे,
- 39:33पागल भी हो ना गुरु गूंगा हो तो चलो कोई बात नहीं बां वरे।
- 39:40गुरु करियो दास गुरु ज भेजे नरक में तो स्वर्क की रखी वास ये गुरु
- 39:53के लिए नहीं कह था तुम्हारे लिए कह था।
- 39:59एक शब्द तुमने सुना होगा अंधा श्रद्धा मैं कहता हूँ वह भी बड़ी
- 40:05कीमती है, अगर हो जाए तो लेकिन कहाँ होती है तुम श्रद्धा और
- 40:13विश्वास के बीच में झूलते रहते हो?
- 40:16श्रद्धा, विश्वास और अनुभव के बीच में झूलते रहते हो किसी भी चीज़
- 40:23को तुम उसकी पीख पे नहीं लेके जाते विश्वास को अगर तुम पीख पे
- 40:29ले जाओ श्रद्धा को अगर तुम पीख पे ले जाओ तो 100 डिग्री पे पानी उभर
- 40:33जाएगा ट्रांसफर्मेशन बिल हैपन। वह पूरे इट हो जाएगा, वास्को बन
- 40:40जाएगा लेकिन तुम पूरी पूरी नहीं करते।
- 40:43मैं कहता हूँ बिल्कुल श्रद्धा करो लेकिन अंध श्रद्धा करो और अंध
- 40:49श्रद्धा करो तो 100% करो ऐसी श्रद्धा करो।
- 40:56अब फिर देखो चमत्कार तुम श्रद्धा भी कहाँ करते हो, अंधश्रद्धा भी
- 41:04तुम नहीं करते, तुम डर को अंधश्रद्धा के लिए बड़ा साहस
- 41:09चाहिए। तुम कुनकुनी श्रद्धा के से जीवन
- 41:22जीते हो, आधे इधर आधे उधर 50% उबलते हो और 50% में तो न खुदा ही
- 41:32मिला। ना वसाले सनम, ना इधर के रह ना
- 41:38उधर के रह अंध श्रद्धा अंध श्रद्धालु को निंदनीय शब्दों से
- 41:49दृष्टि से देखा जाता है। लेकिन ये मूर्ख लोग हैं।
- 41:55अंधश्रद्धा बड़ी कीमती है होती कहाँ है?
- 42:02होती नहीं है तुम अंत श्रद्धा कहते हो उसको जो आँखें मीच के
- 42:10पीछे लग जाए ठीक मैं कहता हूँ आँखें मीच के पीछे नहीं।
- 42:14आँखें ही फोड़ लेंगे। बस ऐसी श्रद्धा की तर्क उठे ही
- 42:21ना। अगर तर्क नहीं उठेगा तो खोपड़ी की
- 42:29ये चालाकियाँ समाप्त हो जाएंगी। अगर पूरी उठेगी अंधश्रद्धा तो से
- 42:37से से लक्खो वे ताई कने चले नाल हज़ारों सैणपों लाखों सैणपों
- 42:44हमारे साथ नहीं चलेंगे तो बाबा ये कहते है की अगर तुम अंधा श्रद्धा
- 42:48से युक्त हुए होगे तो भी मिल जायेगा।
- 42:53गहरे में यही कहते हैं बाबा लेकिन वो ये नहीं कहते कि अंदर
- 42:59श्रद्धालु ही बन जाओ के क्यों नहीं पता अंदर श्रद्धा होना
- 43:05मामूली बात है। बहुत ही टेढ़ी खीर है टेढ़ा मसला
- 43:10है। यह भी नहीं तुम हो सकते और सटोरी
- 43:17भी नहीं दिखी तुम्हें शिष्य तो भी तुम्हारे में नहीं आया, श्रावक भी
- 43:24तुम्हारे में नहीं जन्मा तो क्या किया जाए?
- 43:28कैसे आने वाले कर्म? होने बंद हो जाए।
- 43:33आने वाले कर्म सिर्फ बंद होंगे जब तुम्हारा करता भाव छूटेगा।
- 43:40बस इसके ऊपर सारी ताकत लगा लो करता भाव का खो जाना करता, भाव का
- 43:49खत्म हो जाना। रात्रि को जब तुम सूत्र में होते
- 43:53हो तो करता भाव बिल्कुल खो जाता है।
- 43:56क्या कोई कर्म बनता है? ज़रा सोच सोच के बताओ मुझे रात को
- 44:04गहन सूत्री की अवस्था में जब तुम्हें पता ही नहीं लगता।
- 44:08कहाँ हूँ कौन हूँ, कैसा हूँ, कौन आया, कौन गया वे शुध अवस्था में
- 44:15सशुभती अवस्था में तुम सोए पड़े हो उस अवस्था में क्या होता है?
- 44:27कोई तर खोजता है। नहीं उठता कोई प्रश्न उठता है
- 44:32नहीं उठता आनंद में जाना है, तो नींद से सबक ले लो, नींद में
- 44:45प्रश्न नहीं उठता जब तुम नीस में प्रश्न हो जाओ।
- 44:53नींद में बह नहीं होता अगर तुम मूल मंत्र को देखोगे तो तुम्हें
- 45:00बड़ी जबरदस्त हैरानी होगी। एक कुंकार नींद में एक ही होता
- 45:07है। तुम्हें पता ही नहीं कौन?
- 45:12सत्यनाम करता पूरा नींद में कोई करता है तुम्हें पता ही है तुमने
- 45:18छोड़ दिया उस करता के ऊपर नींद में तुम करता नहीं होता करता कोई
- 45:24और होता है। कोई भय होता है, नींद में
- 45:45निर्विकार कोई विकार होता है, नींद में ब्रह्म ज्ञानी जैसे
- 45:53निर्विकार होते हैं उस वक्त। अजूरे पता नहीं होता तुम किस
- 46:02जोड़ने में हो शेपम खुद से ही प्रकाशित हो तुम्हें कोई नींद
- 46:15नहीं दे रहा हूँ, बस तुम खुद ही नींद में हो।
- 46:26ये सभी समाधि के भी सूत्र हैं। ये सभी नींद के भी सूत्र हैं,
- 46:33लेकिन एक चीज़ दोनों में फर्क है। नींद में होती है शुभ अवस्था?
- 46:46समाधि में होती है जागृत अवस्था नींद में मूर्ख होती है, समाधि
- 46:54में जागरण होता है और इन मूर्खों को जागरण कहा गया था।
- 46:58इन्होंने रात को जागरण शुरू कर दिया।
- 47:06भगवान कृष्ण ने कहा जब सोता है संसार तो मेरा मुनि जागता है।
- 47:20इन्होंने रात को डूल बूटने शुरू कर दिया।
- 47:22रात्रि के जागरण ने शो कर दिया। भजन गाने शुरू कर दिया।
- 47:27कब कहा उसने के भजन गाता है ये कहा कहा उसने के ढोलकड़ गाता है,
- 47:32वीणा बजाता है, मृदंग बजाता है, एक को लगाता है, लोगों को सुनाता
- 47:36है ये कहा क्या सह है, ये शब्द कहें कृष्ण।
- 47:43योगी जागता है जब तुम्हारा संसार सोता है मेरा योगी जागता है सिर्फ
- 47:51जागता है ढोल नहीं बजाता भजन नहीं गाता माँ माँ बाबा हनुमान हनुमान
- 47:59कह के नहीं पुका। कोई बकवास नहीं करता, ये सब बकवास
- 48:03तुम्हारी पुकार नहीं होती बकवास होती है और तुम्हारी बकवास से कोई
- 48:08नहीं आता ये सब तुम्हारे पाखंड हैं, मान्यताएँ हैं, गहरे प्रवेश
- 48:16कर गई हैं। और तुम इन्हें धार्मिक कृत्य
- 48:19मानना शुरू कर दिया। धार्मिक आकृत्य नहीं है, ये पाप
- 48:23है, तुम अपने से भी पाप कर रहे हो, दूसरों से भी पाप कर रहे हो,
- 48:29अपनों से पाप ऐसे कर रहे हो। रात भगवान ने जागने के लिए नहीं
- 48:32बनाई। जिसके लिए बनाई है वो जाग लेगा।
- 48:37उल्लुओं के लिए बनाई जाग लेगा तुम्हारे लिए सोने के लिए बनाई है
- 48:45और तुम जबरदस्ती जागते हो और फिर अगर जागना है तो भगवान कृष्ण की
- 48:52ही बात का अगर तुम हवाला देते हो। तो फिर उस तत्व के पास पहुंचो, जो
- 48:57दिन भर रात जागता रहता है। ऐसा उपाय करो के जो दिन भर रात
- 49:06जागता है, एक तत्व भीतर है, उसके पास पहुँच जाओ।
- 49:12लेकिन तुम ये भी नहीं कर सकते तुम्हारा मैं टूटता है तो मैं तो
- 49:17टूटेगा। अगर कर्मों को बनने से रोकना
- 49:22चाहते हो, आगे कर्म नए न बने, उनको रोकना चाहते हो तो मैं भाव
- 49:28को टूटने देना होगा। ये कैसे टूटेगा बहुत सी चीजें
- 49:36सबसे पहले मैंने बताया, सतौरी की झलक दूसरा उसकी मर्जी में रखो
- 49:45तेरा पाना मीठा लग पहले पहले थोड़े से।
- 49:52शिकायत आएगी, आए कोई बात नहीं मान लो जो होगा वो करेगा और तुम ना भी
- 50:01मानोगे तो भी वो करेगा तुम ये मत भूल जाना तुम अगर ये मानोगे?
- 50:13कि वह नहीं करता, मैं करता हूँ तो भी वह करेगा।
- 50:17ये बहुत आंधी की बात है। अभी तुम्हारी समझ में नहीं आएगा
- 50:22करता तो वही है। ये झूठ है कि तुम करते हो और इस
- 50:28झूठ के कारण तुम दुखी हो। और झूठ के कारण ही तुम्हारे कर्म
- 50:32बनते हैं और कर्म बनते हैं तो भोगने पड़ते हैं।
- 50:37अब इस झूठ को कैसे इससे छुटकारा मिले और झूठ को छुटकारा मिले?
- 50:45दर्शन से अनुभव से अनुभव कैसे आए? या तो गुरु कृपा करते हैं, सिर के
- 50:59ऊपर हाथ रख दे तो मेरे से दूरी में पहुंचा दे।
- 51:03मैंने कल ही एक बात का जिक्र किया था।
- 51:09मेरे पुत्र ने पूछा कि सत्य एक वह दर्शन से योग है, बचपन से मेरे
- 51:24पास है, सब सुनता है, साधना रत है।
- 51:34मैंने उसे दिखा दिया वह मुकाम यह ले देख ले करता, वह है, लेकिन एक
- 51:44प्रश्न फिर रहेगा देख क्या वह करता है बात खत्म हो गई।
- 51:51जिसे पता चल जाता है वह करता है। वह मौज में रहेगा, आनंद में
- 51:55रहेगा। लेकिन फिर एक प्रश्न और रह गया।
- 52:05बाबा मुझे कह गए कि बुरा वक्त विपत्ति काल शुरू हो गया, मैंने
- 52:09बोला अभी। और विपत्ति काल 10 दिन के बाद
- 52:13मेरा चूकना टूट गया। बहुत बड़ी बात होती है पहले जमाने
- 52:17में तो इसका कोई इलाज ही नहीं था। चूकना टूट गया तो कल ही मुझे बेटा
- 52:30कहने लगा कि हो के रहा ना वो। मैंने कहा बिल्कुल हो गया तुम उसे
- 52:36रोक सके, मैंने कहा नहीं क्यों क्योंकि मैं जानता था रोक तो सकता
- 52:46था इस भ्रम में तो मत रहना, लेकिन मैंने रोका है।
- 52:54जो वह करता है ठीक करता है। ये शब्द उसने अलग से कहे और वह
- 52:59पागल नहीं था से के ये शब्द वह करता है।
- 53:10और जो करता है ठीक करता है और तीसरा, जो करता है भले के लिए
- 53:14करता है, फिर मैंने उसे बदलने की चेष्ठा नहीं किया, बदल सकता था
- 53:26निस्संदेह बदल सकता था मेरे लिए बड़ा साधारण मसला था।
- 53:34जंक्चर प्वाइंट पर जाता ठीक हो जाता।
- 53:42संकल्प की भरमार है जंक्चर प्वाइंट पर क्योंकि जंक्चर
- 53:46प्वाइंट आत्मा के परमात्मा के बिल्कुल करीब है और परमात्मा
- 53:50संकल्प का। खजाना है समुद्र है संकल्प के
- 53:56खजाने के पास जैसे जैसे तुम चले जाओगे, खोपड़ी के पास कोई संकल्प
- 54:01ज्यादा नहीं होता। बहुत कम कमजोर।
- 54:05खोपड़ी से नीचे जाते जाते हृदय के पास संकल्प होते है अगर तुम्हें
- 54:09कोई हृदय से बदवाइन दे दें तो सेंटर पर ज्यादा होता है।
- 54:14खोपड़ी से बदवाइन तो तुम रहो ही देते हो कुछ नहीं होता कुछ हृदय
- 54:18से कोई बदवाई दे दे हृदय पर महात्मा से ज्यादा करीब है।
- 54:24और जंक्चर प्वाइंट तो परमात्मा के बिल्कुल ही कृत है।
- 54:27वहाँ तो संकल्पित भारी होता है, घनत्व रूप में होता है, वहाँ तो
- 54:37या तो मैं प्रोसेसर बता रहा हूँ साइंटिफिक घेरा समझने की चेष्टा
- 54:41कर रहे हैं। किताबें वगैरह अपनाने वाले थोड़ा
- 54:45सा को अच्छी तरह से नोट कर लें कि मैंने ये संकल्प के बारे में बोल
- 54:52रहा हूँ जैसे जैसे तुम उस मुकाम के करीब जो के तुम्हारे अपना उसके
- 55:01करीब पहुंचते जाओगे संकर पर गहन होता जाएगा क्यों बिल्कुल वैसा है
- 55:10जैसे जैसे जैसे तुम बगीचे के करीब पहुंचोगे सुगंध गहरी होगे क्यों
- 55:17बगीचा सुगंध मान है? बगीचे के भीतर फूल ही फूल कितना
- 55:24दूर होगे? उतनी सुगंध शायद इतनी दूर हो तुम
- 55:29दो किलोमीटर के ऊपर बैठे हो तो सुगंध आएगी ना, बिल्कुल उसके पास
- 55:35से सड़क के ऊपर से निकल गए तो सुगंध आएगी, तुम ठहर जाओगे।
- 55:39बड़ी भीनी भीनी सुंदर खुशबू है, थोड़ा ठहर जाते हैं, आनंद लेते
- 55:43हैं और अगर तुम उस बगीचे के बीच में ही प्रवेश कर जाते हो तो फिर
- 55:49बाहर आने का मन भी नहीं करेगा। वह आनंद का सागर है, खुशबू का
- 55:57खजाना है। संकल्प का खजाना है।
- 56:04जैसे जैसे उसके करीब जाओगे, संकल्प गहरा कर सकोगे, विलपॉवर
- 56:15बढ़ती जाएगी। उसके करीब जाने से बिल पावर को
- 56:18दिमाग से बढ़ाने की चेष्टा मत करना।
- 56:22बिल पावर बढ़ानी है तो धीरे धीरे अपने आप को उतारना, अपने ही भीतर
- 56:27बिल पावर का खजाना, ओशन ऑफ बिल पावर मौजूद है और उसके करीब
- 56:33जाओगे। तो बल्ब पावर घनी होती जाएगी।
- 56:38जैसे अगर तुम्हे बिल्कुल दिखाई नहीं पड़ता तो बल्ब के करीब ले
- 56:42जाओ जो तुमने परश्न है ज्यादा सुस्पस्त हो जायेगा, दिख जायेगा
- 56:49बल्ब से दूर पड़ोगे तो शायद अल्फाज़ न पड़े जाये।
- 56:55बिल्कुल बलम के पास ले आये तो पढ़े ही जाएंगे बड़े आसान से
- 57:01संकल्प का खजाना हो, तुम या अस्तित्व कह लो परमात्मा कह लो
- 57:07नाम कुछ भी दे दो या कोई धर्म अधर्म की बात नहीं होती।
- 57:16अल्लाह कह लो, ईसा कह लो, राम कह लो, कृष्ण कह लो, एक ही अस्तित्व
- 57:28का नाम है सब कुछ भी चुन लो जो तुम्हें प्यारा लगता है।
- 57:35जो तुम्हें प्यारा लगता है, लेकिन एक बात ध्यान में रखना वह है
- 57:43संकल्प का खजाना आनंद से भरा हुआ सुगंधी से बरफूर खुशहाली देता हुआ
- 57:50मदहोशी से युक्त। तुम्हें खुमारी में धकेल देगा,
- 57:54पूरा ढक लेगा, तुम्हें तुम मद से युक्त हो जाओगे, आनंदमयी हो
- 58:02जाओगे, संकल्प लेना है तो खोपड़ी में बैठ के संकल्प मत लेना, जो
- 58:10आजकल परंपराएं चली। लोग तो हिप्नोटाइज़ करके पीएलआर
- 58:15कर रहे हैं। फर्स्ट लाइफ फ्री क्रश अब इन
- 58:25बुद्धूओं को मैं क्या कहूँ? फास्ट लाइफ को देखने के लिए
- 58:31तुम्हारा संकल्प काम न करेगा। कोई संकल्प उस बीच की दीवार को
- 58:35नहीं तोड़ सकता। दो जन्मों के बीच में जो परमात्मा
- 58:40ने कुदरत ने बना दी वो इतनी घनी है, इतनी सख्त है और दूसरा कोई
- 58:46तोड़ नहीं सकता। इसलिए मैं इन्हें झूठे कहता हूँ।
- 58:50सरे आम झूठे कहता हूँ, एक संकल्प करने वाला व्यक्ति पिछले जन्म में
- 59:01ले जाना व्यक्ति मेरे पल्ले पड़ गया बाबा आप कहते हो कि संकल्प
- 59:08पिछले जन्म में नहीं जाया जा सकता, नहीं जाया जा सकता।
- 59:13मिलाशक क्योंकि पिछले जन्म में व्यक्ति और नितान तो गोपनीय है,
- 59:20वो नितान तो गोपनीय है, वह तुम ही उसकी चाबी तुम्हारे पास है।
- 59:30पर महात्मा ने उस लाकर की चाबी तुम्हारे पास रखी है, कोई दूसरा
- 59:34नहीं खोल सकता और यहाँ मजाक बना रखा है लोगों ने ये बी के वाले
- 59:39लोग पता नहीं कहाँ से सीख के आ जाते हैं।
- 59:45मेरे पास आ गया। मैंने कहा अच्छा बताओ मैं कौन था?
- 59:51पिछले अच्छा उस हरामी को पता था उसने मेरा बायोग्राफी पढ़ा था, आप
- 59:58गाँधी जी थे, मैंने कहा तू बकवास करता है, तुने बायोग्राफी पढ़ी है
- 1:00:06अच्छा तू बता तू कौन थे? खुद की तो वो झूठ बोल सकता है थी
- 1:00:14तो वो झूठ तीसरा आदमी कैसे बता सकता है?
- 1:00:20कौन कहाँ था जिसने खुद को देख लिया है वो बता सकता है के मैं
- 1:00:26कौन? बुद्ध बता सकते हैं कि मैं कौन
- 1:00:28था, महावीर बता सकते हैं मैं कौन था?
- 1:00:34लेकिन चारवाँ मार्कर सुने हैं, बता सकते हैं मैं कौन था क्योंकि
- 1:00:38वो उतरे ही नहीं थे। बाहर से कह सकते हैं कि पिछला
- 1:00:42जन्म होता ही नहीं। ये प्रोसेसर बढ़िया है, शब्द बहुत
- 1:00:49बढ़िया है। जीस चीज़ में कष्ट ना करना हो।
- 1:00:55आचार्य को किधर कह दो वो होता ही पर मातम भी नहीं होता।
- 1:01:00पिछला जन्म भी नहीं होता, एनलाइटनमेंट भी नहीं होता।
- 1:01:04कोई खुशी भी नहीं होती, दुख ही दुख होता है तो फिर ये जीवन जी
- 1:01:09क्यों रहे हो? तुम संकल्प जितना गहरा होगा उतनी
- 1:01:20जल्दी तुम अपने अस्तित्व में प्रवेश करो।
- 1:01:29संकल्प से विकल्प में उतरोगे तुमने सुना होगा कि पहले से
- 1:01:34विकल्प समाधि लगते संकल्प। फिर सब विकल्प समाधि लगती है।
- 1:01:44पहले संकल्प समाधि लगती है, वहाँ संकल्प नहीं होता शुरू होगा
- 1:01:52संकल्प से जाओगे। विकल्प में विकल्प का मतलब है
- 1:01:57जहाँ संकल्प पूर्ण होगा। उससे आगे कोई संकल्प बचा नहीं।
- 1:02:03संकल्प का जहाँ चरम आ गया संकल्प का जहाँ दी एंड हुआ उससे बड़ा कोई
- 1:02:11संकल्प नहीं। परमात्मा से बड़ा किसी का संकल्प
- 1:02:13कोई होता नहीं इसलिए कहते हैं परमात्मा ने संकल्प किया एक आह
- 1:02:19बहुशामी और हो गया। सृष्टि ऐसे ही उत्पन्न हुई।
- 1:02:24खैर, ये मान्यताएं हैं लेकिन है वो संकल्प का रूप इसमें कोई शर्त
- 1:02:29नहीं और तुम अगर उसके करीब पहुंचोगे अपने भीतर उतर कर पहुंचा
- 1:02:37जाएगा बाहर कहीं नहीं है वो। अपने ही भीतर उतरना पड़ेगा और
- 1:02:42उसके लिए बहुत शक्ति की अनिवार्यता हो।
- 1:02:47इसलिए मैं रोज़ कहता हूँ शक्ति को बचाओ, शक्ति को बचाओ।
- 1:02:54मुर्दा न तो अपने पिछले दिनों में जा सकता है।
- 1:03:00ना आनंद को प्राप्त कर सकता है। मुर्दे के लिए सब बेकार है।
- 1:03:07कुछ भी नहीं कर सकता। कुछ पा नहीं हो सकता।
- 1:03:11कर्मों को आने वाले कर्मों को कैसे रोका जाए कि नए कर्म ना बने?
- 1:03:16प्रश्न यहाँ अड़ गया था कि भारत भूषण का?
- 1:03:20उसको मैं खोलने का उपाय बता रहा हूँ।
- 1:03:23तुम्हें सबसे पहला सटोरी की झलक देख लो दूसरा इस योग्य हो जाओ के
- 1:03:34शिष्य हो जाओ। जो गुरु कहता है ठीक बुद्धि से वो
- 1:03:44समझा नहीं जाता और बुद्धि को छोड़ दो बुद्धि बीच बीच में क्लोन
- 1:03:49करेगी वादा डालेगा। स्पष्ट शब्दों में कह दूँ,
- 1:04:00अंधभक्त हो जाओ, अधूरे अधूरे नहीं भाई, तुम्हारे सभी अंधभक्त अधूरे
- 1:04:10हैं? पिछवाड़े पे चार पड़ेगी ना,
- 1:04:14लाठियां बदल जाएंगे। अंधभक्त बनना है तो पूरे पूरे
- 1:04:23गुणों मनसूर के हाथ पांव काट दिए जाते हैं।
- 1:04:25ईसा को लटका दिया जाता है। उनकी अंधभक्ति समाप्त नहीं होती
- 1:04:32है। अंधभक्ति का दूसरा नाम होता है।
- 1:04:36परम श्रद्धा और परम श्रद्धा उत्पन्न होती है।
- 1:04:42दर्शन के बाद अनुभव के बाद ये करिया हैं।
- 1:04:48अब मैंने जोड़ दी, तुम्हे समझाई लेकिन अंत श्रद्धा।
- 1:04:53और पूर्ण अंध श्रद्धा तो मैं बड़ा हे शब्द लगता है ये तो बड़ी खराब
- 1:05:00बात कह दी त्याग ये बात कह दी। मैं कहता हूँ अगर श्रद्धा ही रखनी
- 1:05:06है तो ऐसे अंध श्रद्धालु बन जाओ और मैं जानता हूँ।
- 1:05:12जानता हूँ इसलिए मैं कहता हूँ के अंत श्रद्धालु जैसे ही तुम होगे
- 1:05:20तो सभी प्रकार की शंकाओं को त्यागकर ही श्रद्धालु होगे और जब
- 1:05:29शंकाएं बिल्कुल शून्य हो जाएंगी। तो तुम परमात्मा हो गए।
- 1:05:36शंकाओं का शून्य हो जाना, तुम्हारा परमात्मा हो जाना है।
- 1:05:39परमात्मा कोई शंका नहीं होती इसीलिए वो परम संकल्पवान है।
- 1:05:45ज़रा भी शंका आजाती परमात्मा के मन में जब उसने कहा सोचा।
- 1:05:52एको अहम्भुशियामी तो शंका जीरो थी जीरो संकल्प था 100% तो मैं
- 1:06:05तुम्हें कहता हूँ, तुम अंधविश्वरता भी 100% कर शब्द उलटे
- 1:06:10प्रयोग कर रहा हूँ। बात वही कह रहा हूँ, शंख का शून्य
- 1:06:20हो जाओ, श्रद्धा से ही पहुंचना है, विश्वास से ही पहुंचना है तो
- 1:06:30मैं कहता हूँ 100% करो जो करो। विश्वास करो, 200% श्रद्धा करो
- 1:06:37200% लेकिन यही तुम कर नहीं सको की तुम कोई भी काम करो, मैं
- 1:06:45तुम्हें कहता हूँ वो 100% करो पाप भी अगर कोई व्यक्ति 100%।
- 1:06:53कन्डेन्सेशन से करता है, संकल्प से करता है तो पाप नहीं होता, वह
- 1:07:01पुण्य हो जाता है। ये बातें थोड़ी गहरी हैं,
- 1:07:06तुम्हारी समझ में नहीं आएँगी, तुम इतना ही समझ लो के सटोरी की झलक
- 1:07:11देख लो। अपने आप को योग्य बना लो, अपनी
- 1:07:14भूमि को योग्य बना लो। बीज बोने के बीज तो वह बो देगा,
- 1:07:24वृक्ष भी बन जायेगा, फल भी लग जायेगा।
- 1:07:32कर्ता भाव समाप्त हो जाता है जब तुम्हारी श्रद्धा पूर्ण हो जाती
- 1:07:39है, श्रद्धा पूर्ण होने का मतलब शंका शुन्य शंका जीरो हो जाती है,
- 1:07:50श्रद्धा सो हो जाती है। वहाँ नया करम नहीं बनेगा।
- 1:07:59गुरु की शरण में चले जाओ तैयार हो के देखिए अगर कोई गटर कहे, कह जा
- 1:08:05घी जो है मेरे में उल्टा दो तो गुरु इतना पागल नहीं होता, गुरु
- 1:08:10समझदार है। उसे पता है गटर के काम नहीं आएगा,
- 1:08:14यह और घी भी खराब हो जाएगा। इसमें कोई कृपणता नहीं है, लेकिन
- 1:08:24गटर के अंदर घी को फेंकना घी की बर्बादी है, बस इतना वो जानता है।
- 1:08:31बहुत से लोग मुझे कह देते हैं बाबा मेरे सिर पे हाथ रहो तो मैं
- 1:08:34रख देता हूँ होगा कुछ नहीं पहले कह देता हूँ क्यों?
- 1:08:41क्योंकि गटर के ऊपर हाथ रखने से कुछ नहीं होगा तुम में?
- 1:08:47प्राप्त करने की वो भावना ही नहीं है।
- 1:08:52तुम तो किसी से आशीर्वाद भी नहीं लेते, पूरा पूरा झुकते।
- 1:08:57अगर तुम्हें झुकना ही आ जाए तो आशीर्वाद न मिल जाए।
- 1:09:01तुम्हें झुकना ही तो तुम्हें आता नहीं।
- 1:09:07गर्दन में गुल्ला फंसा रहता है। झुकते कहो दंड व्रत भी हो जाओ तो
- 1:09:14गर्दन का गुल्ला नहीं निकलता। पीठ का गुल्ला नहीं निकलता, पीठ
- 1:09:22सीधी रहती है स्टेट और तुम्हे सगाया भी यही जाता है।
- 1:09:27योग केंद्र से कहा जाता है कि पीठ को स्टेट रखना मैं सदा कहता हूँ,
- 1:09:31पीठ को स्टेट मत रखना, रिलैक्स रखना जैसे होती है झुकती है झुक
- 1:09:36जाने दो ये स्टेट वीटेड कुश्ने ना कुंडलनी जाति?
- 1:09:43और कुंडली जगेगी तो स्टेट देख कर ऊपर नहीं जाएगी।
- 1:09:47वो इतनी महान शक्ति है, वो चली ही जाएगी।
- 1:09:53अगर झुके भी होगे तो भी चली जाएगी।
- 1:09:57अगर स्टेट भी बैठे होगे तो भी वो काहे कष्ट देना है शरीर को?
- 1:10:02तो जैसे भी बैठते हैं आराम से बैठ जाओ, सुखपूर्वक बैठ जाओ, अब हम
- 1:10:10विषय पे आ जाए अगर नए कर्म बनते रहे पिछले हम भौंकते रहे तो फिर
- 1:10:17ये अंत हीन जंजाल। ये खत्म कैसे होगा?
- 1:10:22खत्म होगा, नए कर्म बनना बंद हो जाए, भोगना तो नहीं बंद होगा
- 1:10:29क्योंकि प्रारूप जो यहाँ तक आ गया वो तो तुम्हें भोगना ही पड़ेगा।
- 1:10:34ये तो बंद नहीं किए जा सकते नए कर्मों को बनने से।
- 1:10:41रोका जा सकता है। कैसे समर्पण से उसकी शरणागति?
- 1:10:51बार बार भगवान कृष्ण कहते मेरी शरण में आ जाओ क्यों?
- 1:10:55कहते हैं शरण में चला गया तो नए कर्म बनने बंद हो जाएंगे।
- 1:11:01फिर तुम नहीं करोगे, वह करेगा बाबा कहते हैं, तेरा पाणा मीठा
- 1:11:08लागे जो तुद पांव है सोइपलिकार क्यूँ?
- 1:11:12कहते हैं कि जो तुम करते हो वो मुझे मंजूर है, उससे मैं कर्म
- 1:11:18नहीं बनता। कर्ता भाव से कर्म बनता है उसके
- 1:11:25भाड़े में रह कर अगर तुम जिंदा रहना शुरू हो जाओ, कर्म करना शुरू
- 1:11:30हो जाओ तो कर्म नए नहीं बनेंगे। उसकी रजा में रहना शुरू कर दो
- 1:11:40राजी है हम उसी में जिसमें तेरी रचा है अपनी तो यूँ भी वह वह है
- 1:11:48और यूँ भी वह वह है तुम्हें कोई फर्क न पड़े, वास्तव में फर्क न
- 1:11:52पड़े तुम्हारा नुकसान हो जाए। तो भी शुभ तुम्हारा फायदा हो जाए
- 1:11:59तो भी शुभ ज़रा भी एक लकीर भी न आए भीतर लाघों में खुशी की नुकसान
- 1:12:06में धोखे ऐसी भावना अगर हो जाए इसे ही कहते हैं।
- 1:12:11अंध श्रद्धा समर्पण से उत्पन्न होती है।
- 1:12:15अंधश्रद्धा समझे? अंध श्रद्धा का आगाज होता है।
- 1:12:20समर्पण से समर्पण के बिना अंध क्षरता उत्पन्न नहीं होती।
- 1:12:29ये बहुत बेसिक चीजे हैं। ये तुम्हारी समझ में नहीं आएगी,
- 1:12:33जिसने देखी वो बता सकेगा, वो समझा सकेगा।
- 1:12:37अब मसला यहाँ आके फंसता है कि नए करम बनते रहे और पुराने हम भोकते
- 1:12:42रहे तो कब तक चलेगा सिलसिला हम मुक्त कभी होंगे ही और बात तो
- 1:12:50मुक्ति की है, लिबरेशन की है नहीं तो मुक्त हो जाओगे।
- 1:12:55पुराने कर्मों को भोगने से तो हम नहीं रोक सकते, वो तो भोगने ही
- 1:12:59पड़ेंगे। नए कर्मों को बढ़ने से हम रोक
- 1:13:03सकते हैं तुम्हें दो तीन उपाय मैंने बतला दिए सस्तोरी की झलक
- 1:13:10देख लो। इससे योग्य हो जाओ।
- 1:13:15शिष्य बन जाओ, श्रावक बन जाओ, श्रोता बन जाओ, क्षण हीन हो जाओ
- 1:13:30तुम्हारे भीतर किसी प्रकार की कोई।
- 1:13:33संदेह न उठे, संदेह शून्य हो जाओ, वह जो करता है उसके करने में 100%
- 1:13:41राजी हो जाओ हृदय से भीतर से अगर ये कर सकते हो तो नए कर्म बनने
- 1:13:50बंद हो जाएंगे। तुम जीओ, उसकी मर्जी में जीओ,
- 1:13:57उसकी नाव में चढ़ जाओ पतवार उसको दे दो कि तू चला और जिधर ले जाए
- 1:14:08और भटकाए तो भटक जाओ। वह पहुंचा है तो पहुँच ही जाओ,
- 1:14:17उसकी मर्जी से अगर तुम उसकी नाव में संवार हो जाओ पतवार उसके हाथ
- 1:14:21में दे दो तो नए कर्म बनने बंद हो जाएंगे, तुम कुछ नहीं करोगे,
- 1:14:26क्योंकि पतवार उसके हाथ में। तो नाव जिधर जाती है तुम्हारी
- 1:14:32मर्जी से नहीं जाती, पर उसकी मर्जी से जाती है पतवार उसके हाथ
- 1:14:36में है। पतवार के बेनाही मेरी नाव चल रही
- 1:14:52है पतवार के बिना ही मेरी नाव चल रही है।
- 1:15:09हैरान है, ज़माना मंजिल भी मिल रही है, हैरान है।
- 1:15:25ज़माना मंजिल भी मिल रही है, परता नहीं, मैं कुछ भी सबका।
- 1:15:44हो रहा है। मेरा आप की कृपा से सब काम हो रहा
- 1:16:03है। करते हो तुम कन्हैया करते हो तुम
- 1:16:16कन्हैया मेरा नाम हो रहा। है।
- 1:16:27मेरा आप की कृपा से सब काम हो रहा है।
- 1:16:42तुम साथ हो जो मेरे किस चीज़ की कमी है, तुम साथ हो जो मेरे।
- 1:16:59किस चीज़ की कमी है? किसी और चीज़ की अब दरकार ही नहीं
- 1:17:14है। तेरे साथ में गुलाम अब तेरे साथ
- 1:17:26में गुलाम अब गुलफाम हो रहा है तेरे साथ में।
- 1:17:38गुलाम अब गुलफाम हो रहा है करते हो तुम?
- 1:17:55कन्हैया करते हो तुम कन्हैया, मेरा नाम हो रहा है है।
- 1:18:11मेरा आपकी आपकी आपकी कृपा से सब काम हो रहा है धन्यवाद।