Latest / Baba ji Vijay Vats / 23 Jan 25 - मैं ओशो का संन्यासी हूं, साक्षी की साधना करता हूं पर परिणाम शून्य है! कहाँ कमी आ रही है? Part - 1
Transcript
- 0:19बाबा जी प्रणब मैं साक्षी की साधना करता हूँ पहले।
- 0:32अनापान, सती, विपश्यना वगैरह का अभ्यास किया था।
- 0:42एक बड़ी दिक्कत आती है ओशो के द्वारा से नष्ट हो बहुत पुराना
- 0:51साधकों। दिक्कत ये आती है कि श्वास को ठीक
- 1:00देख लेता हूँ आति जाति श्वास पूर्ण साक्षी हो जाता हूँ।
- 1:10श्वास ने पेट भर दिया। पेट खाली हो गया, बाहर चली गई,
- 1:18स्वास्थ्य भीतर आने लगी। यह मैं परिपूर्ण तरीके से देख
- 1:23लेता हूँ, परंतु जब वेग आते हैं विचारों के।
- 1:35वहाँ निष्फल हो जाता हूँ हार जाता हूँ बेकार अपना काम करके गुजर
- 1:44जाते हैं, मैं साक्षी बना रहता हूँ, लेकिन परिणाम शून्य।
- 1:53बोग लेता हूँ कहाँ कमी आ रही? है।
- 2:03कमी सिर्फ आपको ही नहीं आ रही है। जो भी साक्षी का अभ्यास करता है
- 2:08उन सबको आ रही है। ये सवाल सिर्फ तुम्हारा नहीं है,
- 2:17जो भी साक्षी की साधना करते हैं, उन सभी का सवाल है पहली बात।
- 2:29आप इसे लिख लो क्योंकि ये बहुत जगह काम आएँगे।
- 2:35तुम जो भी क्रिया करते हो उसका परिणाम आना चाहिए।
- 2:39उसके लक्षण आने चाहिए तो वह क्रिया सफल हुई है।
- 2:45अगर लक्षण नहीं आए। परिणाम नहीं आए तो क्रिया सफल
- 2:51नहीं हुई। तुमने कहा मैं साक्षी के साधना
- 2:57करता हूँ, श्वास को ठीक से देख लेता हूँ श्वास को देखना कोई
- 3:03मुश्किल नहीं है, यह प्राकृतिक क्रिया है।
- 3:09मुश्किल होता है। प्राकृतिक क्रिया जब विचारों में
- 3:14प्रवेश हो जाती है, काम आता है, क्रोध आता है, लोह मोह अहंकार आता
- 3:22है, शराब पीने का दिल करता है। मत मत सर तुम कहते हो वहाँ मैं
- 3:33चूक जाता हूँ फिर साधना में चूक है कहाँ चूक है तुम देखना।
- 3:45मैं तुम्हें सारी साधना की प्रोसेसर बताता हूँ।
- 3:50मेरी दृष्टि से तुम जो कर रहे हो वो गलत कर रहे हो।
- 3:55साक्षी की साधना ठीक से नहीं हो रही।
- 4:05साक्षी के साधना। क्या है?
- 4:10शास्त्रों में एक कहानी आती है भगवान शिव को काम उठा ज्ञान से
- 4:24सुनना। भगवान शिव ने तीसरा नृत्य खोला और
- 4:34काम भाषण हो गया। तीसरा नृत्य खोला।
- 4:44यह क्या है? काम भाषण हो गया।
- 4:50परिणाम आ गए ना तो उसी शब्द को याद करो।
- 4:55मैंने कहा परिणाम आना चाहिए। फिर तो दर्शक की तरह तुम फ़िल्म
- 5:03में पहले एन्टेंगल होते थे? अब साक्षी बन के देख रहे हो, उससे
- 5:13कुछ फर्क नहीं पड़ेगा। चूक हो रही है, कहाँ हो रही है और
- 5:20अक्सर चूक होती है। एक मज़े की बात बताऊँ?
- 5:27आनंद बुद्ध से कहने लगे भगवान मैं आपका शिष्य तो बन जाऊंगा, बड़ा
- 5:33भाई हूँ, लेकिन एक शर्त है चौबीसों घंटे मैं आपके साथ
- 5:39रहूंगा। वास्तव में आनंद के क्या था मन
- 5:45में? अनंत समित तथा के बुद्ध चोरी छिपे
- 5:52काम में चले जाते हैं। इस बात को वह समझ नहीं पा रहा था।
- 6:03ये ब्रह्म उसके मन में समया हुआ था।
- 6:05कैसे एक व्यक्ति अपने पूरे जीवन में ब्रम्हचारी रहे?
- 6:12लेकिन पतंजलि कहते हैं, महावीर कहते हैं बुद्ध भी कहते हैं सत्य,
- 6:20अहिंसा, स्त्री, ब्रह्मचर्य, ग्रह अगर ब्रह्मचर्य हो नहीं सकता।
- 6:31तो महावीर ने पतंजलि ने बुध ने क्यों कहा क्या वो गलत?
- 6:43कह गए नहीं, गलत नहीं कहा। यह सद्धता है।
- 6:52तभी कह दिया अनीता ने भी कहे तो सुसाल था, अब तुमने कहा अगर
- 7:01प्राकृतिक रूप से काम चलता रहे, खूब चलता रहे, हम उसे देखते रहे।
- 7:10तो क्या साक्षी की घटना घट गई? नहीं घटी फिर वही परिणाम आना
- 7:17चाहिए। परिणाम क्या आना चाहिए?
- 7:26अगर तुम सही वास्तव में सही से साक्षी हो गए, जिसे महावीर सम्यक
- 7:33रूप से साक्षी कहते हैं, तो क्या होगा?
- 7:40तो क्षण का नष्ट हो जाएगा। काम का आवेग आवेग तो मैं नेचुरल
- 7:47प्रोसेसर है। अब ध्यान से ये बात आप ध्यान से
- 7:52समझ लेना काम का आवेग आएगा, क्रोध भी आएगा।
- 8:08लोह भी आएगा, मोह भी आएगा, अंकार भी आएगा, मद भी आएगा, सब आयेंगे
- 8:14विकास, लेकिन उन विचारों के आते ही तुम्हारे पास एक मंत्र है।
- 8:22शिव के पास एक मंत्र है। और शिव अपना तीसरा नेत्र खोल लेते
- 8:27हैं और वह विकार नष्ट हो जाता है। कामदेव राख हो जाता है।
- 8:36यह मंत्र क्या है? साक्षी तो तुम होते हो, तुमने कहा
- 8:42हम साक्षी होते हैं बराबर। हमें शरीर की सारी क्रियाएं का
- 8:47पता चलता है। शरीर ऊपर गया, शरीर नीचे आया,
- 8:53शरीर ऊपर गया, शरीर नीचे आया, लेकिन साक्षी होने के बावजूद काम
- 9:06नहीं रोकता। काम भोगने के बाद ही रुकता।
- 9:10है। तो परिणाम नहीं आया।
- 9:18तुम बुध को भी चुक गए, महावीर को भी चुक गए, पतंजलि को भी चुक गए।
- 9:26यह तीसरा नृत्य क्या है? जिसे शंकर खोलते हैं और काम नष्ट
- 9:32हो जाता। है।
- 9:34काम ही नहीं क्रोध भी नष्ट हो जाता।
- 9:36है। एक बात और।
- 9:38सोचता। हूँ।
- 9:42संत पुरुषों को जहाँ इन आवेगों की जरूरत होती है वहाँ प्रयोग भी
- 9:47करते हैं। राम को जब मार्ग नहीं देते,
- 9:53समुद्र तो अग्नि मान निकाल लेते हैं, क्रोधित हो जाते हैं, मैं
- 9:58तुम्हें भस्म कर दूंगा, जब नहीं सम इतना शिशु पाल।
- 10:06100 गालियाँ निकालते थे तो कृष्ण उस क्रोध का उपयोग करते हैं, बस
- 10:13यहाँ सिर्फ ये बात समझी लेना की बेकार संतो के वश में होते हैं और
- 10:21तुम बेकारों के वश में हो। इतना ही फर्क क्या है?
- 10:25और ये बहुत बड़ा फर्क है। बेकार संतों के वश में होते हैं,
- 10:32कठपुतली की तरह नहीं चाहते हैं। बेकारों को जहाँ चाहते हैं, काम
- 10:36लेते हैं, जहाँ नहीं चाहते हैं ना ही काम लेते हैं।
- 10:42लेकिन तुम चाहती हो कि रोक नहीं सकते हैं, तुम्हें आवेग न चाहते
- 10:49हैं, संत वेगों को न चाहते हैं, देखिये कभी काम की भी जरूरत पड़ती
- 10:56है। कृष्ण को काम की बड़ी जरूरत पड़ी,
- 11:01इतने से बच्चे पैदा। महावीर को भी जरूरत पड़ी है।
- 11:08बुद्ध को भी जरूरत पड़ी लेकिन तब तक वो ज्ञानी नहीं थे, लेकिन
- 11:13कृष्ण तो ज्ञानी थे। कबीर को नानक को सभी को जरूरत
- 11:18पड़ी तब वो उसका प्रयोग करते हैं। बस यहाँ फर्क समझ लें बहुत से
- 11:25प्रश्न रोज़ आते है मेरे पास एक एक प्रश्न को काटता चला जाऊंगा,
- 11:36संत के वश में होते है ये विकार चाहे तो उन्हें रोक सकता है लेकिन
- 11:42तुम चाहे तो रोक नहीं सकते, देखो कहाँ रुकता है।
- 11:49बेकार हैं तो ऊर्जा का स्वरूप है। शंकर की ये गाथा कामदेव आता है
- 12:06आता है। शिव को भी आता है, राम को भी आता
- 12:11है। कृष्ण को भी आता है, लेकिन शिव,
- 12:20राम और कृष्ण नष्ट कर देते हैं। किसके द्वारा?
- 12:28तीसरे नेत्र के द्वारा अब यहाँ चूक हो गई, तुम साक्षी तो हो,
- 12:35तुमने सारा दृश्य तो जाग कर देख लिया शरीर ने क्याक्या हगते की
- 12:41शरीर में क्याक्या उत्तेजनाएँ? आईं।
- 12:47कैसे उसने अंतरंग क्षणों में प्रवेश किया और तुम उसको
- 12:56परिपूर्णता तक ले जाते हो, फिर यह तो पशुता हो गयी?
- 13:03पशु व्यवसाय करता है। पशु भोग के ही वापस आता है तुम
- 13:11लेबर लगा लेते हो साक्षीतों का, लेकिन भोग के ही वापस आते हो।
- 13:18क्रोध जब गुजर जाता है तभी तुम्हें होश आता है।
- 13:24काम जब भोग लेते हो। तो ही तुम्हें हो चाहता है तो फिर
- 13:28तुम में और साधारण जन्म में क्या फर्क है?
- 13:32तुमने एक शाक्षित का लैब लगा दिया, सिर्फ इतना ही फर्क है ओशो
- 13:39के द्वारा सिनिष्ट हो ये तो ठीक लेकिन इतने साल में तुम्हें?
- 13:45साक्षी तो वह साधना नहीं आया, मैं कहता हूँ परिणाम आना चाहिए जैसे
- 13:52शिव के परिणाम आया, शिव ने अपना तीसरा नेत्र खोला, काम भस्म हो
- 14:00गया, कामदेव भस्म हो गया, रोने लगी उसके धर्मपत्ने।
- 14:09ये तो अच्छा है नैचुरल प्रक्रियाएं सबके भीतर चलती है,
- 14:21वो ही भूख लगती है कृष्ण को, वो ही कबीर नाल को वो ही भोजन खाते
- 14:26है, वो ही भोजन पछता है, उसी तरह पछता है।
- 14:30वैसी ही सारी क्रियाएं विकार के रूप में आती हैं।
- 14:37यहाँ बहुत से मित्र सोचते हैं कि संतों को विकार नहीं आता।
- 14:41तुम गलती में हो नेचुरल प्रोसेसेस हैपन आवेश।
- 14:51यह प्राकृतिक प्रक्रियाएं हैं। सभी के शरीर बिगड़ती हैं, लेकिन
- 14:59संत जानता है। इनसे निपटना दुष्यंत संतों के भी
- 15:06होते हैं। मित्र भी संतो के होते हैं लेकिन
- 15:13संत जानता है निपटना तुम निपटना नहीं जानते तुम बिखेर देते हो
- 15:23सारा मसला। तुम धागे को उलझा देते हो गांठों
- 15:31में और संत गांठों को धीरे धीरे खोल देता है।
- 15:36सरल धागा सीधा धागा बना देता है। तुम जल्दबाजी में गांठों को खोलने
- 15:44की चेष्ठ में और गांठ दे देते हो, गोल गांठ हो जाती है।
- 15:53अब हम मूल मु्द्दे पर आ जाएं। यह तीसरा नेत्र जो खुला है क्या?
- 16:01था। मैं मु्द्दे के आस पास ही रहूँगा,
- 16:06कहीं चला जाऊं, मु्द्दे पे आ जाऊंगा, घबराना मत बेकार, शिव को
- 16:14भी आया उसके पास भी पार्वती है। उसने भी शादी कर पाई।
- 16:22है। अगर बच्चों की आवश्यकता न होती तो
- 16:29शिव भी शादी न कराते। देखिये शिव की शादी में क्याक्या
- 16:34नहीं होता भूत प्रेत चंडाल राक्षस बेताल?
- 16:40यक्ष दक्ष, यक्ष्मी, दक्षिणी कितनी सुन्दर बारात आप की तरह
- 16:49बारात ले के जाते हैं, बच्चे भी पैदा करते हैं, गणेश पैदा किया
- 16:58है। कार्तिकेय पैदा की है पार्वती ने।
- 17:11लेकिन हम मुड़ों की जमात सनातन और हिंदू एक नहीं है।
- 17:17समझ लेना बात को हिंदू बबोर पंथी है।
- 17:24स्नातन से निकला है। स्नातन का दूसरा रूप है, लेकिन
- 17:29जिन्होंने यह भागवत सप्ताह वगैरह की कहानियों लिखनी शुरू कर दी
- 17:33उरान लिखनी शुरू कर दी, वो सब गबोरपंथी हैं, वो भी हिंदू
- 17:37कहलाया। हिंदू जीने का एक तरीका?
- 17:43है। बेव हीडबिंग और सनातन धर्म है,
- 17:52हिंदू धर्म नहीं, हिंदू जीने का तरीका, वे टु लिव लाइफ।
- 18:02और सनातन सनातन धर्म यहाँ पर समझ लेना आप इस्लाम, इस्लाम धर्म और
- 18:15मुस्लिम मौसम सम्प्रदाय है। इन दोनों को आप बराबर समझ लेते हो
- 18:24और इस्लाम का शब्द वो ही जो सनातन का होता है।
- 18:29शांति हमारा स्वभाव शांतिप्रिय है, शांत हमारा स्वभाव सदा है।
- 18:38आध सच जुगाद सच है भी सच नानक उसी भी सच सनातन सदासी है।
- 18:45ठ है, रहेगा वह सनातन लेकिन हिंदू हिंदू तरीका जी ने कहा मुसलमान?
- 18:57जीने का तरीका उनका धर्म ए सलाम ये तुम दोनों को बराबर कर देते
- 19:02हो, बराबर नहीं। मुसलमान के अपने कुछ नियम हैं।
- 19:13जब धर्म नियमों में ढल जाता है तो वह हिंदू मुसलमान बनता है।
- 19:21फिर नमाज़ करो, फिर तीर्थ करो फिर जाप करो, फिर ये करो वो करो जब
- 19:32करने में उतर जाता है वह। इन्नर मोक्ष तत्व तो धर्म से
- 19:42सम्प्रदाय बन जाता। है।
- 19:46धर्म तो सनातन इस्लाम इनके एक ही अर्थ हैं तुम्हारा अंत बड़ा
- 19:52शांतिप्रिय है, इसलिए तुम सदा क्रोध में नहीं रह सकते।
- 20:00सदा प्रेम में रह सकते हो, सदा शांति में रह सकते हो, सदा क्रोध
- 20:05में नहीं रह सकते क्यों? क्योंकि तुम्हारा स्वभाव नहीं है,
- 20:12सनातन प्रेम है। इस्लाम शांति है, प्रेम प्रेम में
- 20:22शांति है और शांति में प्रेम है। ये दोनों का अर्थ एक ही है।
- 20:30शब्दों का फर्क है, लैंग्वेजेस का फर्क है।
- 20:37लेकिन इसके आगे जब संप्रदाय में आ जाती है चीज़ जैसे शिष्य सिख सिख
- 20:52धर्म है शिष्य। धर्म है और जब शिष्य से आगे उनके
- 21:01सम्प्रदाय आ जाते हैं तो बिगड़ जाता है।
- 21:08शिष्य का अर्थ है जो कहते हैं मैं कुछ नहीं जानता।
- 21:16मैंने सीखना है जानता, मैं कुछ नहीं समझना इस बात को शिष्य का
- 21:26अर्थ है मैं जानता कुछ नहीं सीखने आया हूँ, तुम भी तो सीखने जाते हो
- 21:31ना विश्वविद्यालय में। और तुम्हारे संत शिष्य नहीं हैं।
- 21:40तुम्हारे संत गति मैं सब जानता हूँ, पहले से ही जानता हूँ।
- 21:44वो सूचनाओं को ज्ञान समझ लेते हैं इसलिए गपोट बोलते हैं।
- 21:54फिर प्राणों की रचना होती है और प्राणों में कहानियों गबोड़ शंख
- 21:59लेकिन सनातन में कहानी नहीं है। इस्लाम में कोई कहानी नहीं है।
- 22:05कहानियों बाद में बनी इस्लाम के भीतर के उस तत्व को कहते हैं जो
- 22:11शांति प्रिय है। जो शांति में झूमता है, जो नाचता
- 22:15है, शांति से जब इस्लाम बदलता है, संप्रदाय में तो कबाड़ा हो जाता
- 22:26है, जब सनातन बदलता है, संप्रदाय में तो कबाड़ा हो जाता है।
- 22:38जब सीखने की नम्रता की बात आती है धर्म में, धर्म से, संप्रदाय में
- 22:50तो फिर तुम बोजल हो जाते हो फिर तुम कहते हो मैं सब जानता हूँ।
- 22:56वो शिष्य ना। रहा है जो जानता है वो शिष्य तो
- 22:58है जो जानने की क्षमता रखता है और जानना चाहता है पोटेंशिअलिटी टु
- 23:08नो उसमें संभावना है जानने की। जानने के लिए आया है।
- 23:18विश्वविद्यालय में तुम अगर सब जानते होते तो विश्वविद्यालय में
- 23:22क्यों जाते? क्यों जाते स्कूल?
- 23:25में। तुम जानने की।
- 23:28इच्छा से जाते हो? तो सिख का।
- 23:31मतलब है मैं कुछ नहीं जानता। मैं अज्ञानी हूँ, मैं अनजान हूँ,
- 23:38मैं सीखने के लिए आया हूँ, उसे शिष्य धर्म कहते है।
- 23:45शिष्य धर्म का अर्थ जानने की इच्छा से जो भर गया वह सिख हो
- 23:50गया। लेकिन जब वो।
- 23:54संप्रदाय में बात आती है। तो फिर वो।
- 23:57लक्षणों में पहचानी जाती है। हिंदू भी।
- 24:00मुसलमान भी, सिख भी। बस लक्षणों।
- 24:04से पहचान लो ये क्या है? भीतर जानने।
- 24:08की इच्छा हो न हो। लेकिन बाहर।
- 24:11ये पांच इक्के नजर आने चाहिए। बस फिर तुम।
- 24:15सीखोगे नहीं सिख। सिखों के लक्षण।
- 24:20तुमने थोप लिए शिष्य बहुत बेतरी बात है।
- 24:28जानने की। इच्छा प्रबल इच्छा मैं अज्ञानी
- 24:32हूँ जानना चाहता हूँ, लेकिन तुम पांच कपकों को अपना के ज्ञानी
- 24:42होने का नाटक करते हो? बाहर के विशभूषण को बदल के और
- 24:53ड्रामेबाजी है। और सर्कस है, कर लो, केस रख लो,
- 25:04कृपाण रख लो। कंधी रखलो कच्चा कड़ा ये पांच
- 25:15रखलो। क्या सीखने की क्षमता से भर जाओगे
- 25:18नहीं भरोगे? ये तो सिर्फ।
- 25:24एक साधन थे देखने के। कि यह व्यक्ति किस धर्म से बिलौंग
- 25:29करता है, लेकिन तुम सिर्फ उन नाटकों को बाहर के आडंपरों को
- 25:38अपना कर धार्मिक हो जाना चाहते हो।
- 25:43धर्म इतनी सस्ती नहीं बात। धर्म तो आता?
- 25:47फूंकना होता है। धर्म तो आग।
- 25:50लगानी होती है अपने ही घर को जो घर पर है अपना चले हमारे साथ।
- 25:59ये इतनी। बात नहीं है कि पांच कक्के डालो।
- 26:06और तुम सिक्ख। हो गए न शिष्य जानने की क्षमता
- 26:12मैं अज्ञानी हूँ, मैं कुछ जानता नहीं प्रभु मैं ठकने में नान का
- 26:18गुण जंग या या तथ्य यह निवापन है, मैं कुछ नहीं जानता।
- 26:26यह शून्यता है, मैं अज्ञानी हूँ तुम मुझे सिखाओ, तुम मुझे वहाँ ले
- 26:34जाओ, जहाँ सब कुछ जान लिया जाता है जानता, मैं कुछ नहीं हूँ, यह
- 26:42शिक्षा तो है, यह सिख है। सभी धर्मों को संप्रदायों ने
- 26:50बिगाड़ लिया। धर्मों का तो मतलब ही है जो नमन
- 26:57होना जानता है। जो नमाज़ करनी जानता है वह
- 27:01मुसलमान, वह इस्लाम। क्योंकि जो झुक।
- 27:06जाएगा। वह शांति प्रिय है, उसने हार मान
- 27:10ली है। तुम्हारे सामने भी कोई झुकता है।
- 27:16उसने हार मान ली है। जो छाती चोरी करता है उसने हार
- 27:21नहीं मानी है। मिठत।
- 27:24नीमी नान का गुड जींग या तट? तुम नमाज़ पड़ते हो, लेकिन नमन
- 27:33कहाँ होते हो? अहंकार तो अकड़ रहता है।
- 27:38तुम शिष्य बनते हो, लेकिन कहाँ सीखते हो?
- 27:43शब्द सीख लेते हो मेरे पास रोज़ ग्रंथियों के फ़ोन आते बाबा हम तो
- 27:5028 मिनट में जब भी पढ़ लेते हैं। मैंने कहा ठीक?
- 27:56है, पढ़ते हो? और आप तो।
- 28:00एक छोटे से प्रवचन के ऊपर पूरा दिन गुजार देते हो।
- 28:06ये तुमने पढ़ना। होता है।
- 28:09मैंने समझना। होता है।
- 28:11कहीं तो कोई। फर्क है ना तुम पढ़ते जाओ, मैं
- 28:17समझाकर चला जाऊंगा। अपनेअपने काम पे निकल जाओ।
- 28:24धर्म जब बिगड़ता। है।
- 28:25बाहर आकर सम्प्रदाय बन जाता है और सम्प्रदाय खून क रवा कहते हैं।
- 28:31इसलिए मैं कहता। हूँ, सम्प्रदाय से बाहर आ जाओ अगर
- 28:35भगवान कृष्ण भी कहते हैं। सर्वधर्माण प्रत्यक्ष माँ बेगम
- 28:39शरणं वृक्ष और ये कहते हैं सभी सम्प्रदाओं को छोड़ दो।
- 28:46न हिंदू रहो। न मुसलमान, न सिख, न ईसाई इंसान
- 28:49बन जाओ। इंसान बनना।
- 28:53काफी है। परमात्मा ने इंसान अदा किया।
- 28:59अगर सिक्ख पैदा किया होता तो केस कड़ा किच्छा कृपाण दे के पैदा
- 29:04करता। उसके घर कोई?
- 29:07कमी है क्या? और फिर जब।
- 29:12वो बाल छीन लेता तो किस का क्या करते हो तुम?
- 29:16कैसे बनाओगे? फिर तुम नहीं, ये तुम्हारी सोच
- 29:21गलत है। ये सब भीतर।
- 29:27की बातें हैं, तुम बाहर से थोप लिए हो।
- 29:30और समित के हो के हम। धार्मिक हो गए।
- 29:33ये धर्म नहीं है। तुम सांप्रदायिक हो, ये ठीक है
- 29:45सिक्षत्व का अर्थ तुम सीखना चाहते हो स्वीकार करना कि मैं कुछ नहीं
- 29:52जानता प्रभात यह नमाना होना है। और नमाज़ का अर्थ भी नमाना होना
- 29:59है। और हिंदू का?
- 30:04धर्म में नमना होना है, तुम नमस्कार करते हो, नमन करते हो
- 30:09जोकते हो मूर्ति के आगे। यह प्रथम।
- 30:14पड़ाव है तुम्हें सिखाया जाता है सबसे पहले, क्योंकि यह बुनियाद
- 30:18है। अगर नियमा होना।
- 30:20ना सीखोगे? झुकना ना सीखोगे और दंडवत पूरे के
- 30:25पूरे झुकने जाओगे। तो फिर वह।
- 30:29ना बरसेगा पकड़ी हुई रीड छाती चौड़ी।
- 30:38परमात्मा नहीं बरसता, उस पे ध्यान रख लेना।
- 30:43परमात्मा। बरसता है झुके हुए।
- 30:47नमन किये। हुए दंडवत प्रणाम किये हुए नमाज़
- 30:51में तुम पूरे झुक जाते हो। यह अकड़ी हुई।
- 30:54रीढ़ की हड्डी पूरी झुका लेते हो, बेड कर लेते हो।
- 31:02भीतर की बात। है।
- 31:05बाहर झुकना। सर्कस है, सर्कस ही ऐसा करते हैं।
- 31:10आसन? करने वाले ऐसा करते हैं।
- 31:13हलासन में सब मोड़ रहते हैं। लेकिन ये सर्कस?
- 31:24है। ये शरीर के।
- 31:26लिए है। भीतर तक पहुंचने का कोई साधन नहीं
- 31:31है। ऐसा जो भीतर से शांति भीतर से
- 31:39प्रेम भीतर से आन। भीतर से न।
- 31:43मन जिसके आ जाता है उसके चलने का पोस्चर भी बदल जाता है।
- 31:51संतरे न बात बाहर के चलने के पोस्चर से।
- 32:00तुम पता ले सकते हो कि जब व्यक्ति कितना अंगारी है या कितना नमन
- 32:06कितना झुका तुम जब चलते हो बिल्कुल पहचान लिए जाओगे, बॉडी
- 32:15लैंग्वेज भी होती है। तुम पहचान।
- 32:18लिए जाओगे सह जवाब से तुम चलो कोई।
- 32:22भी पहचान। लेगा।
- 32:23जानने वाला। कि तुम कितने।
- 32:26निर अहंकारी हो कितने हमकारी हो। यह पहचान है।
- 32:36अब हम मु्द्दे पर आ जाएं। तुमने पूछा।
- 32:43पुत्र? कि मैं अपने शरीर।
- 32:46को सब हरकतें करता हुआ देखता हूँ। बिल्कुल ठीक साक्षी बना।
- 32:51रहता हूँ, बिल्कुल ठीक। फिर भी मैं।
- 32:56काम वासना के अंतरिम छोर पे क्यों पहुँच जाता हूँ?
- 33:01यहाँ गलती हो। गई।
- 33:05यहाँ समझने। में गलती हो गई।
- 33:06समझाने वाले में तो गलती नहीं होती क्योंकि समझाने वाला शब्दों
- 33:10से समझाता है और शब्द सीमित है। हो सकता है।
- 33:15समझाने वाला। जिन शब्दों का अंत में प्रयोग
- 33:19किया वह उससे आगे जाते ही न हों तो उसकी तो मजबूरी है, लेकिन आप
- 33:27उन शब्दों को पकड़ के। इशारे की।
- 33:31सीध में नहीं देख पाओगे, स्ट्रेट लाइन में दिखता है, हो रहा है
- 33:35चंद्रमा। तो चंद्रमा ऊँगली के टॉप पर नहीं
- 33:38होता। चंद्रमा ऊँगली।
- 33:41के सीध में होता है, टॉप पर नहीं होता।
- 33:45और जो लोग। टॉप के ऊपर ऊँगली के टॉप के ऊपर
- 33:49चंद्रमा को देखेंगे वह नहीं पा सकेंगे, कभी नहीं मिलेगा।
- 33:54ऐसा ही धर्मों। के साथ आज हो रहा है।
- 33:59तुमने शब्द पकड़ लिए हैं इशारों की स्टेट लाइन में तुम गए नहीं
- 34:06इसलिए तुम दुखी हो। इसलिए तुम काम?
- 34:09व्यवस्था से ग्रसित हो, क्रोध से ग्रसित हो, अंगकार से ग्रसित हो।
- 34:14सभी बेकार। तुम्हें घेर लेते हैं बेकारों से
- 34:17तुम मुक्त नहीं हो पाते। तबूतने का?
- 34:20ठीक आनंद, तुम मेरे साथ रहो। चौबीसों घंटे।
- 34:24साथ रहो, अब उसकी नीयत तो बदनीयत थी।
- 34:29उसे तो शक। हो गया था।
- 34:34ये कैसे हो सकता है? यह व्यक्ति ब्रह्मचारी रहे।
- 34:38व्यक्ति में काम। आई ना और वो जीवंत सब कुछ खाता
- 34:41है। आता है भाई।
- 34:44काम आता है। लेकिन तुम्हें बेतरी।
- 34:48प्रोसेसर का नहीं पता कि बुद्ध करते क्या हैं?
- 34:52तुम्हें बेहतरीन प्रोसेसर का नहीं पड़ता कि शिव करते क्या हैं?
- 34:57राम और। कृष्ण क्या करते हैं?
- 34:59जब रोकना होता है काम नहीं, क्रोध, लोभ, मोह, हुंकार मतलब
- 35:07बहुत कुछ रोकना होता है। विकार एक नहीं है, विकार बहुत है
- 35:16और मैंने एक विकार और जोड़ा था। पिछले दिनों में वो था भय, जो
- 35:20सबसे ज्यादा है। तुम्हारे मित्र मृत्यु का भय है।
- 35:28इसको संत लोग पता नहीं क्यों भूल गए?
- 35:31सबसे बड़ा विकार यही है। भीतर जाने में अगर कोई रोकता है
- 35:37विकार तो 70% मृत्यु का व्यय होता है।
- 35:45मेरे पास जीतने भी आते हैं कमेंट्स।
- 35:49उसमें कुछ। एक को छोड़कर बाकी सभी मृत्यु के
- 35:53ब्याह होते हैं। कोई विरला बिरला।
- 35:57कहता है मुझे ग्रोध आता है। कोई विरला बिरला।
- 36:00कहता है मुझे काम आता है। ऐसा नहीं कि उन्हें काम आता नहीं।
- 36:04आता है भोग लेते हैं वो। अब हम काम की।
- 36:08बात पे आ जाये। अगर तुम प्रकृति।
- 36:13के रूप से चलोगे। तो मैंने पहले भी तुम्हें बताया
- 36:17मुकु तो तुम फिर भी हो जाओगे। वन डे यू।
- 36:21विल बी लिबरेटेड? लेकिन लाखों जन्म लग जाएंगे।
- 36:28तो प्राकृतिक रूप से चलते रहो, काम आये, तुम साक्षी बनो, लेकिन
- 36:35अगर सकलित हो गए तो तुमने भोग लिया?
- 36:39फिर तुम साक्षी। न हुए कहीं कोई गड़बड़ है वो
- 36:42गड़बड़ कहाँ है बदमुगा? क्रोध आया।
- 36:46तुम क्रोध में चले गए। क्रोध सब।
- 36:50खंड खंड कर गया। बाद में तुम पश्चाताप किया, भय
- 36:56आया, लोभ आया, भय अपना काम कर गया, भय आया तुम बाहर आ गए डर के
- 37:01कहीं मर न जाओ, भय अपना काम कर गया।
- 37:06सभी। बेकार।
- 37:07अपना काम कर जाते हैं तो मैं बाद में हो पाता हूँ।
- 37:14मद्रा क्या? है।
- 37:17और वह क्या? है शिव का तीसरा नेता?
- 37:21इससे शिव? खोलते हैं और उसे सिर्फ काम ही
- 37:25नहीं। सभी विकास निष्ठ हो जाते।
- 37:29हैं शिव की वह तकनीक मेरी दृष्टि में।
- 37:39तुम समझ नहीं पाए। बताने वाले।
- 37:43ने तो बताया होगा। खैर, मैंने पढ़ा नहीं ओशो का।
- 37:46इतना ज्यादा सुबह है थोड़ा। ऐसे तो बात।
- 37:50भी नहीं होती। लेकिन तुम कहो।
- 37:54कि परिपूर नहीं पड़ा है तो अपने को पड़ा है, मैंने सिर्फ अपने को
- 38:03पढ़ा है। और अपने को।
- 38:05पढ़कर मैंने सब जान लिया जीसको एक को जानने से एक साथ है।
- 38:12सब सब जाते। हैं, सब जान लिया जाता है।
- 38:15मैंने उसको जान लिया। फिर ज्यादा जानने।
- 38:19की जरूरत तो नहीं है। फिर दूसरों को।
- 38:22तो मैं तो पढ़ता हूँ। के बताने के लिए सरल भाषा में और
- 38:28ज्यादा व्याख्याय तो कर सकू। और आगे।
- 38:35आगे दुनिया और सरलता मांगेगी। तुमसे समझे न बात को?
- 38:43पहले संस्कृत चलता था। कृष्ण के वक्त की गीता आज आचार्य
- 38:50फीस ले ले के समझाते है जुड़ जाओ भाई इतने लोग हो गए हैं, तुम भी
- 38:56जुड़ जाओ और जो भिखारी होता है ना भिखारी।
- 39:01क्षमा करना तू? हमेशा।
- 39:05वो जब घर से। चलता है।
- 39:08तो एक घर। में पहले जब जाता है तो घर से ही
- 39:12कुछ डाल के जाता है। कुछ पैसे टके, कुछ अनबन।
- 39:21और पहले। घर में जाएगा वो खड़काएगा उसे
- 39:27खड़काएगा खड़काने का अर्थ क्या है कि किसी और ने भी उसे कुछ दिया
- 39:32है? इसका ये मतलब है तो 50,000 लोग
- 39:36जुड़ गए। इसका मतलब तुम भी जुड़ जाओ।
- 39:39सर बहकाने के लिए है। देखिए गीता कृष्ण बोल सकता है
- 39:45सिर्फ। फिर सुनना मेरी।
- 39:49इस बात को गीता को सिर्फ कृष्ण बोल सकता है, आचार्य नहीं बोल
- 39:54सकता। आचार्य तब बोल सकता है जब वो उस
- 39:59स्थल पर पहुंचा है और उस स्तर पर पहुंचने के लिए।
- 40:05जीस चीज़ की। आवश्यकता पड़ती है वो इनमें नजर
- 40:08नहीं आता। फिर वही।
- 40:13बात। लक्षण आना।
- 40:22चाहिए। परिणाम?
- 40:26आना चाहिए, परिणाम दिखाई नहीं पड़ता।
- 40:31ना मिठास। है।
- 40:34ना प्रेम। की पुल काहट है ना मृदुता है।
- 40:42ना अभय मुद्रा है। भय से अग्र सत्य है।
- 40:46अगर मैंने ये बोल दिया तो मुझको मार देंगे।
- 40:51कुछ भी नहीं। है और मैंने वो ही शब्द जब मैं वो
- 40:55ही कहूँ तो याद कर लिया करो। परिणाम?
- 40:59आना चाहिए। कोई आनंद की मुद्रा।
- 41:02में झूमते नहीं झूमते हैं। और झूमते हुए।
- 41:06को देखना बड़े बद्दे लगेंगे पेट आगे।
- 41:11कृष्ण का पेट। आगे नहीं मिलेगा।
- 41:15राम का? पेट आगे नहीं मिलेगा तुम्हें बड़े
- 41:18सुडौल। सदेह हुए शरीर संत का कभी पेट आगे
- 41:24नहीं मिलेगा, जो जैन मुनि इनके पेट देखना बस पेट से समझा जा सकता
- 41:32है। सिर्फ मात्र।
- 41:35एक पेट और चार्ज। यह बता देती।
- 41:38है कि व्यक्ति कैसा है? ये दो चीजों का अवलोकन कर लेना
- 41:44तुम समझ जाओगे पेट बड़ा है और चार थोड़ी सी।
- 41:56रीढ़ सीधी। है।
- 42:01तो लक्षण नहीं। है बाहर की बातें हैं 99% सही
- 42:07होंगी 1% मैं स्पेयर कर देता हूँ उन लोगों के लिए कि चलो।
- 42:14अपने आप को। समझा ले कि हम उन्हीं में से ही
- 42:16हैं। तो 99 प्रतिशत मैं कहता हूँ।
- 42:22क्योंकि तुम बच। जाओ जो बचना चाहते हो ये आचार्यगण
- 42:27इस 1% में बच जाए। मैं स्पेयर कर देता हूँ, इसलिए और
- 42:31मैं जानता हूँ कि नहीं। वह पुल काहट नहीं है।
- 42:36वो मदमस्ती और बच्चों जैसी खिलखिलाहट ओह निर्दोस्ता ओह अभय
- 42:46मुद्रा नहीं है, बच्चों को सर्व के पास छोड़ दो, वो खेलेगा।
- 42:56तुम डरोगे बच्चा खेलेगा। बच्चा आने दे लेगा, किलकारियां
- 43:03मारेगा, उसको चलते हुए देखते रोमांचित होगा।
- 43:10आश्चर्यचकित होगा। और ये आश्चर्य तुम्हें पहुंचा
- 43:15देगा। आश्चर्य भी एक्सीडी है।
- 43:22अगर तुम विश्व। में से भर जाते हो।
- 43:25तुम विश्व में से कहाँ? पर हो।
- 43:28विश्व में तो तुम्हारे। भीतर आता ही नहीं।
- 43:31अन्यथा एक जर्रा रेत का न बनाने की समस्या रखने वाले व्यक्ति इतना
- 43:40व्रत संसार देखकर कोई विस्मय नहीं आता, उनमें हैरानी के बाद शांत
- 43:49विस्मय से भर जाता है। और संत विस्मय के साथ साथ श्रद्धा
- 43:59से भर जाता है। संत के भीतर से निकलती है शिकायत
- 44:08नहीं, धन्यवाद। वह धन्यवाद देता है, वह
- 44:15शुक्रगुजार होता है। एक संत ऐसा।
- 44:19था जब वह दरवाजे के भीतर से निकलता और दरवाजे को शाबाश दे के
- 44:24जाता धन्यवाद तुम्हारा तुम्हारे। तुमने भीतर जाने का रास्ता छोड़
- 44:30दिया। संत बड़ा।
- 44:34पुलकित होता है, विस्मय का जन्म होता है आश्चर्य से मर जाता है
- 44:40बच्चे की तरह, इसलिए बच्चा इतने प्रश्न पूछता है।
- 44:49बाबा जी क्या है, ये कहाँ है? ये क्या है?
- 44:54ये चिड़िया है 1000। प्रश्न पूछता है।
- 45:01तुम थक जाते? हो बताते बताते लेकिन बच्चा नहीं
- 45:04थकता क्योंकि बच्चे में हर चीज़ विश में पैदा करते।
- 45:09विश में। बड़ा लम्बा चौड़ा सब्जेक्ट है,
- 45:10इसके बाद बारे में बाद में बोलेंगे।
- 45:16अब हम मूल। मु्द्दे पर आ जाएं।
- 45:23तुम भोग लेते। हो साक्षी हो।
- 45:28तो फिर पशुओं। की तरह भोग लेना या साक्षी में
- 45:33होके भोग लेना, उसमें क्या फर्क है?
- 45:37तुम्हारी तकनीक कहीं फेल हो गई। काम नहीं कर रहे।
- 45:44बुध भोगते ही नहीं बुध प्रथम पड़ाव पे ही।
- 45:54उसे खत्म कर देते है। महावीर?
- 46:00प्रथम पड़ाव पे खत्म कर देता है। पतंजलि और जिन्होंने।
- 46:08प्रथम पड़ाव पे खत्म किया। उन्होंने संदेश दिया ब्रह्मचर्य
- 46:13का। बुद्ध पतंजलि।
- 46:18महाब्रेश। क्या क्या करते?
- 46:23हैं। ऐसा क्या हुनर है मेरे पास जो इन
- 46:32विचारों को तुमने कहा? हम स्वास्थ्य को तो देख लेते हैं,
- 46:36आते जाते ये तो महज असम सी बात है, स्वस्त आ रहा है, जा रहा है
- 46:41देखना। इससे कोई ज़्यादा क्रांति भी नहीं
- 46:44होती। ज़्यादा क्रांति हुई होगी इस बात
- 46:48से शंका है। इसमें लोग विपसना के शीवर लेके
- 46:55आते हैं। लेकिन मैं देखता।
- 46:58हूँ कि कोई किसी प्रकार का परिणाम नहीं आता बदलाव नहीं आता।
- 47:03बस सिर्फ सीख। जाते हैं।
- 47:04न्यूरॉन जो और बढ़ जाते हैं कि साक्षी कैसे होना है शरीर से अलग
- 47:14कैसे होना है दो तत्व है एक शरीर जो जड़ है एक साक्षी जो चैतन्य
- 47:21है। बस इतना।
- 47:23सा सीख के और शेवर वाले इतना सा ही से गाते हैं और क्षमा करना
- 47:28इतना सा ही जानते हैं। इससे आगे वो।
- 47:32जानते भी नहीं अगर पूछोगे तो वो चुप हो जाएंगे, उनके पास कोई जवाब
- 47:39नहीं। सी के।
- 47:41सिखाई सिद्धांत और नियम है उनके पास।
- 47:45वो तुम्हें बता। देंगे।
- 47:46साक्षी कैसे? हो ना?
- 47:49लेकिन ये? तकनीक गलत है।
- 47:52हाँ, तकनीक गलत है, इसलिए कारगर नहीं होती इसलिए परिणाम नहीं आता।
- 48:01इसलिए। लक्षण नहीं आते।
- 48:04क्यों? क्योंकि विपक्षणा की ये तकनीक गलत
- 48:08है। तुम सीखो ये धंधे हैं खुद के लिए।
- 48:16धंधा नहीं था। इनके लिए धन्यवाद शिविर लगाने
- 48:21वालों के लिए ऑनलाइन सिलेबस बेचने वालों के लिए सब धंधा है।
- 48:30करुणा होती तो जाके बांटते, मंच लगाते।
- 48:38परमात्मा। तक जाने की विधियों भी बिकती हैं।
- 48:42मैंने कल ही। एक महंगे कवी का जिक्र किया था।
- 48:46बस आगे। आगे ऐसा अंधकार में योग आने वाला
- 48:49है। जब कोई।
- 48:53तथाकथित संत बोलने के भी पैसे लेगा।
- 48:59और फिर तुम। हैरान हो गए ये कबीर इतना बोले
- 49:05उसको इतना बोले साहित्य रच गए बुद्ध महावीर इतना बोले।
- 49:12और उन्होंने। तुमसे कोई पिसा नहीं मांगा।
- 49:16मांगा नहीं। तुमने दिया ठीक तुमने रॉयज़ दी
- 49:21ठीक, लेकिन उसने मांगा कहाँ? वो तो हजारों।
- 49:27एकड़ जमीन अमेरिका के भीतर छोड़ के ऐसे आ गए।
- 49:32जैसे व्यक्ति। मलमुत्र का त्याग कर देता है।
- 49:36यहाँ से लक्षण। पहचान में आते हैं।
- 49:40इन्हें मैं कहता। हूँ लक्षण।
- 49:44इन्हें मैं कहता। हूँ परिणाम?
- 49:47ज़रा भी शिकन। नहीं आया चेहरे पे।
- 49:51शायद 64,000 एकड़ जमीन थी वो। अगर मैं गलती।
- 49:57में नहीं हूँ तो। लेकिन एक।
- 50:01इंच के लिए यहाँ सिर कट जाते हैं एक इंच जमीन के लिए भाई भाई का सर
- 50:08काट देता। है।
- 50:10और महाभारत इसका प्रमाण जमीन के लिए सिर कटे 40,00,000 लोग मरे
- 50:20जमीन। के लिए।
- 50:26लेकिन वो सुन है फिर जनिशपुरम। को छोड़ के आ जाता है।
- 50:31और कोई शिकवा। नहीं कोई शिकवा नहीं, कोई शिकवे
- 50:34नहीं, लोग मुझे कहते हैं आपको ये गालियां देते थे, आप इनकी प्रशंसा
- 50:44क्यों करते हैं? भाई?
- 50:45प्रशंसा के योग्य। प्रशंसा के योग्य हैं, प्रशंसा के
- 50:52नहीं। ये किसी दिन।
- 50:56पूजा के भी योग्य हो जाएंगे। ओशो जो दे।
- 51:02के गया है लोगों को। वो कम मूल्यवान।
- 51:05नहीं है। ये बात ठीक है, तुम नहीं समझ सके।
- 51:12बुद्ध को तुम। नहीं समझ सके तुम समझे किसको तुम
- 51:15किसी को नहीं समझे तुम अपने को समझते हो, जहाँ भी जाते हो अभी
- 51:22पिछले दिनों किसी सिख परिवार के किसी व्यक्ति ने मुझे एक प्रश्न
- 51:26पूछ लिया। मैंने उस ऑपरेशन।
- 51:29में। भंग वगैरह।
- 51:31का जिक्र कर दिया। बिल्कुल ठीक है।
- 51:35भंग खाने से व्यक्ति। एक बार।
- 51:38काल्पनिक रूप से उप स्थान पर पहुँच जाता है।
- 51:45वो तो मेरा नाम क्यों लिया आपने? काट दो मत प्रकाशित।
- 51:51करो। तो मैं कहता हूँ, तुम।
- 51:53मुझे कब कहाँ सुनते हो? संतों को तुम।
- 51:57नहीं सुनते, भ्रम है तुम्हारा? इसलिए अगर तुम।
- 52:01नहीं पहुंचोगे तो मुझे कोई अफसोस नहीं होगा।
- 52:05मुझे कोई विस्मय नहीं होगा। मैं जानता हूँ तुमने मुझे सुना
- 52:09नहीं तुम स्वयं को ही सुनते हो और स्वयं को सुनते हो तो कमेंट करते
- 52:17हो अन्यथा कमेंट कहाँ आएगा जब मेरी बोली हुई चीज़ तुम्हारे भीतर
- 52:24रम जाएगी, रस जाएगी। तो उल्टी।
- 52:28कैसे आएगी ये कमेंट? उल्टी होते हैं, समझाती हैं मनीषा
- 52:37सर ये तुम कमेंट करते हो, ये उल्टी है, ये वमन है।
- 52:48मैं बोलता हूँ तुम कमेंट करते हो इसका अर्थ तुम मुझसे ज्यादा।
- 52:56जानते हो फिर मुझको कैसे सुनोगे? जिससे शिष्य।
- 53:00के वितरीय भ्रम हो गया। कि मैं गुरु से।
- 53:04ज़्यादा जानता हूँ वो शिष्य न रहा, वो सिख न रहा और यही मैंने
- 53:09देखकर दिया था। तुम इसी भ्रम।
- 53:13के बीच में तुम गलतियाँ निकालने आते हो, गुरु को सुनने नहीं आते
- 53:21गुरु। में क्या गलती है ये देखने के लिए
- 53:25आते हो एक एक शब्द को देखते हो बाबा तुमने ये कहा था ट्रेन
- 53:29इंसिडेंट में ये हुआ अरे भाई 50 साल पुरानी बात हुई थी, कुछ शब्द
- 53:34भूल भी गया होगा। मिट जाते हैं निरोज के भीतर फिट।
- 53:41कुछ थोड़ा। बहुत उलटे पुलटे हो गया होगा।
- 53:51तो मुझे नहीं सुनने आते कि यह भ्रम मत पालना।
- 53:55और एक बात और। बता दो।
- 53:59जीस दिन, तुम मुझे सुनने आ गए। उस दिन तो दिली।
- 54:03भी आ जाएगा। तुम मुझे सुनने।
- 54:08नहीं आते, तुम खुद को ही सुनने आते हो।
- 54:12तभी तो याद। रह जाता है।
- 54:14मैं शेख परिवार से हूँ। और तुमने भंग का।
- 54:18नाम ले लिया। मेरे परिवार।
- 54:22वाले सुनेंगे। तो मैं रह गया ना मैं बदलने की
- 54:27चेष्टा से कैसे आया तुम सीखने आए कहाँ?
- 54:31तुम बदलने आए कहाँ? सीखने का मतलब बदलने की तैयारी,
- 54:39रेडी टु ट्रांसफॉर्म। और अगर बदलने।
- 54:44की तैयारी नहीं है तो फिर सीखने की तैयारी नहीं है।
- 54:49सीखने की। तैयारी का मतलब है अगर तुम गलत
- 54:52जानते हो तो वह टूट जाए। जो गुरु आज सीखा रहा है वो फीड कर
- 54:57लो और बाकी का तो मिटा दो, डिलीट कर दो।
- 55:03इसे कहते हैं सिख जो गुरू आज। बोल रहा है।
- 55:10उसे फीड कर। लो।
- 55:13जो तुमने। पहले से फीड कर रखा है उसको मिटा
- 55:15दो। इसे सिख।
- 55:17कहते हैं वह सीखने की इच्छा से आया है।
- 55:22और सिख सीखने की प्रोसेसर में अगर कुछ डिलीट करना पड़ गया तो डिलीट
- 55:29भी करेगा। फिर तुम कहते हो।
- 55:35हम पहुंचे नहीं, गुरू जितना कर सकता है कर?
- 55:43मैं तुम्हें विशुद्धि तक ले आ सकता था क्योंकि बिना तुम अपनी
- 55:52धरा को सही पलो के पानी दिए खाद दिए।
- 55:58तुम योग्य न हो सकोगे शक्तिपात के इतना मैं बखूबी जानता हूँ तुम
- 56:03विवेकानंद हो नहीं। कि मैं राम कृष्ण?
- 56:07बन के हाथ रख दूँ तुम्हारे? वो जीस दिन हो।
- 56:11जाओगे, हाथ रखा ही जायेगा। उसकी चिंता न?
- 56:15करो। तुम्हारे कहने।
- 56:18से कुछ नहीं होगा। गंदा नाला।
- 56:20अगर कहे कि ये घी मेरे में डाल दो ना।
- 56:25तो जानता है। घी डालने वाला घी भी बेकार हो
- 56:31जाएगा। गंदे नाले में मिलके गंदा नाला ही
- 56:33हो जाएगा। तो वह ज्यादा।
- 56:37सयाने है, जिसके पास अमृत है या घी है।
- 56:43तुम कहते हो हम। सीखना चाहते हैं नहीं सीखना चाहते
- 56:47हो तुम तुम्हारी करतूतें बताती हैं कि तुम सीखना नहीं चाहते।
- 56:57तुम ट्रांसफार्म। को राजी नहीं।
- 57:03थोड़ा सा इधर। उधर, और।
- 57:05तुम्हारी आँखें लाल। हो जाती हैं।
- 57:09तुम शेक हो। जाते हो तो पूरे प्राण कम हो जाते
- 57:13हो। क्योंकि पुराना मरेगा जर्जर मरेगा
- 57:20तो नया जन्मेगा और शुद्ध जन्मेगा लेकिन शुद्ध जमता नहीं क्यों?
- 57:30क्योंकि तुम जो पुराना हो गया उसको मिटने के तैयार नहीं हो।
- 57:40प्रश्न पूछा इन्होंने कि मैं साक्षी हो जाता हूँ हर चीज़ में।
- 57:46साक्षी। बनके सारी शक्ति को एकत्रित करके।
- 57:53होती हुई क्रियाएं। को देखता हूँ।
- 57:59बिल्कुल ठीक फिर परिणाम क्यों नहीं रहता यही मैं पूछता हूँ, मैं
- 58:08कहता हूँ। परिणाम आना चाहिए।
- 58:11बदलाल तो होनी चाहिए। मेरे पास यहाँ।
- 58:16मैसेजस आते हैं। और मैसेज के।
- 58:20नीचे लिखना लिखा होता है कि बाबा मेरा नाम मत लेना, मैं बहुत हस्ता
- 58:27हूँ, अकेला बैठे और ये लोग। गाँधी को गाली निकालते हैं।
- 58:37और इतनी छोटी। सी बात कि बताने में कोई हर्ज भी
- 58:39नहीं है। पर गाँधी को गाल निकालते हैं, जो
- 58:46गाँधी सरे राह लिख देता है कि आईबास।
- 58:54ऑन कस्तूरबा। बैड ऑर माइ फादर वॉज़ ऑन द डेथ
- 58:57बैड। मेरे पिता मृत्युशैया पे थे और
- 59:03मैं कस्तूरबा के सिरा पे थे। सत्य के प्रयोग।
- 59:10करते हैं तो लोगों के सामने आते हैं।
- 59:12मन्नू और आभा उनके दोनों तरफ होते हैं।
- 59:19और तुम छोटी। सी बात लिख देते हो, नीचे लिख
- 59:22देते हो बाबा नाम मत लेना, तुम्हें यही सिखाया।
- 59:31महावीर ने तुम्हे यही सिखाया, गाँधी ने तुम्हे यही सिखाया,
- 59:36बुद्ध ने तुम्हे यही सिखाया नहीं। तुम ठगी मार।
- 59:40रहे हो? इन लोगों से महावीर खुद नगण होते
- 59:47हैं। जो छोटा सा।
- 59:52चादरा बंदा होता है ना, वो भी उतार देते हैं।
- 59:58खुद नग्न। होते हैं वो?
- 1:00:02ये नहीं। कहते बताना मत के नग्न हुआ वो।
- 1:00:05नग्न हो ही? जाते हैं।
- 1:00:10कि नगंथा को पूर्ण खुली आँखों से देख लो, संदेह हैमिट जायेगा और
- 1:00:24महात्मा गाँधी को गाली निकालते हैं।
- 1:00:30इन्होंने। हमारे अचेतनों में इतना जहर भर
- 1:00:35दिया है, तुम जहर से मुक्त होने में कितने जन्म लगा दोगे, ये मैं
- 1:00:41जानता हूँ। तुम्हें नहीं पता तुम सिर्फ इनसे
- 1:00:46संपर्क बनाए रखो। और तुम अपने।
- 1:00:51भीतर भी तलाशते रहो कि तुम रोज़ दुखी हो रहे हो।
- 1:00:58नफरत फैलाने वाला दुखी नहीं होता, सिर्फ नफरत अपनाने वाला भी दुखी
- 1:01:05होता है, ज्यादा दुखी होता है। सुखी कोई नहीं।
- 1:01:08होता ना नफरत फैलाने वाला? ना नफरत।
- 1:01:12अपनाने वाला। दोनों दुखी हो।
- 1:01:15जाते हैं, इसलिए बुद्ध ने क्या कहा?
- 1:01:18कि दूसरे की। बात को मत मानो नहीं।
- 1:01:23और तुम तो मानती। ही हो, व्हाट्सएप के हो, फेसबुक
- 1:01:26के हो। तुम अब दीपोभाव के ऊपर कब जरे,
- 1:01:34तुम कब महावीर की इस बात को समझ सके, जो इशारों में कही गई थी, जो
- 1:01:40नग्न हो गए थे, वह तुम्हें बहुत बड़ा संकेत दे गए थे।
- 1:01:45कि तुम नाम को छुपाते हो, उसने तो स्वयं को ही नहीं छुपाया, खुल गए,
- 1:01:51नग्न हो गए मुझे मेरी नग्नता में तुम देख लो अपनी नग्न आँखों।
- 1:01:56से सत्य के प्रयोग। में क्या है जो गाँधी नहीं लिखा?
- 1:02:07और तुम्हारा आज। का मीडिया क्या है जो छुपा नहीं
- 1:02:11रहा? सब छुपा दिया।
- 1:02:14भला छुपाने से कोई दबता है। तुमने कितना कुछ।
- 1:02:18छुपाया। कितना?
- 1:02:20दबाया। काम क्रोध।
- 1:02:24लोह, मो। अहंकार मधुम सर शब्द दबाए तुने सो
- 1:02:28प्रेस किया, आज क्या हालत हो गई? 1 दिन भरेगा अच्छा फिर जो आज
- 1:02:39दुनिया की हालत। है उसपे रोना एका क्योंकि वह
- 1:02:47बम्मन बनकर उल्टे का बाहर और तुम सिर मारोगे तुम वो हरकतें करोगे
- 1:02:56जो पागल करते हैं। फिर किसी ओझा।
- 1:02:59को लेके आओ, किसी शक्तिपुंज को लेके आओ।
- 1:03:08किसी नाम। उसका भूल जाता हूँ, बार बार में
- 1:03:11उसको लेके आओ वो तो हुकुम देता है ले जाओ इसको।
- 1:03:15हुकुम चल नहीं? सका।
- 1:03:17हुकुम करना चाहता था हुकुमराण बन नहीं सका तो हुकुमराण ऐसे बन गया
- 1:03:23कल्पना में और बेवकूफ लोग उसके पीछे लग गए।
- 1:03:28इस जिन्न को। उधर ले जाओ भाई, मेरे पास भी
- 1:03:31जिन्न भेज 212 मैं कितनी बार कहा तुने कोई एक आंधी भेज दो।
- 1:03:39ये हरामखोर होते। ही नहीं, तो भेजोगे कहाँ से?
- 1:03:44सब ने व्यापार को धंधा बना रखा है।
- 1:03:49कोई किसी को। मार रहा है, कोई किसी को मार रहा
- 1:03:51है। सभी अपनी अपनी पीड़ाओं से ग्रसित
- 1:03:54हैं। हिंदू देवी।
- 1:03:56देवताओं से ग्रसित हैं। मुसलमान पीर पेगंबरों से ग्रसित
- 1:04:01हैं। सिख अपनी।
- 1:04:04त्रासदियों से त्रस्त। हैं ईसाई अपने।
- 1:04:09पोस्चर से ग्रस्त हैं, सबके अपने अपने दुख हैं।
- 1:04:16कभी खुद पे, कभी हालात पे रोना आया।
- 1:04:32कभी खोद पे, कभी हालात पे रोना आया बात निकली तो।
- 1:04:49हर एक बात पे रोना आया कभी खुद पे, कभी हालात पे रोना।
- 1:05:12कभी खुद पे, कभी हालात पे रोना आया।
- 1:05:18जीस तरफ। देखता हूँ।
- 1:05:22तुम्हारा दुखड़ा। देख के रोना आता है।
- 1:05:27और बेबस हूँ। कुछ नहीं कर सकता हूँ।
- 1:05:31अगर कुछ करता। हूँ।
- 1:05:33तो तुम्हारी। मान्यताएँ आड़े आती हैं।
- 1:05:38नाम मत लेना। बाबा?
- 1:05:41कह दो ना। विष्णु होते हैं।
- 1:05:46क्या फर्क पड़ता? है, कह दूंगा।
- 1:05:52लेकिन तुम्हारा। दुखड़ा तुम्हारा लटका हुआ ये
- 1:05:55चेहरा जो कत्यू बना रहेगा, यही दुख है।
- 1:06:06मेरा दुःख तो। कब का खत्म हो चुका?
- 1:06:09है स्वयं का कोई। दुःख नहीं रहा।
- 1:06:15अब तो तुम्हें। जब देखता हूँ आँख भर के बात निकली
- 1:06:22तो हर एक बात पे रोना आया। प्रत्येक इंसान।
- 1:06:30भरा पड़ा है। दुखों से क्यों दबाया है?
- 1:06:34सुप्रेस किया है? इसलिए।
- 1:06:39पतंजलि ने कहा सबसे पहला सत्य। और तुम्हारे।
- 1:06:45तथाकथित सुप्रीमो झूठ बोलते हैं। झूठ की राजनीति, झूठ का डंडा, भय
- 1:06:58और लोभ का डंडा तुम्हें दिखाते हैं।
- 1:07:02राज़ करते हैं। बाबा के ये।
- 1:07:08शब्द जब ये के सुन लो। फिर प्रसंग को।
- 1:07:11आगे बढ़ाऊंगा, वक्त बहुत हो गया है।
- 1:07:15वक्त है कि। बीत दिया जाता है।
- 1:07:20असंख मूर्ख। अंधकोर।
- 1:07:26असंख मूर्ख अंधखोर असंख चोर हरामखोर।
- 1:07:33या हरामखोर कुछ नहीं किया। बस पार्टी बदल गया।
- 1:07:43लेन देन। हुआ है।
- 1:07:48ओह, राज़ कर रहे हैं इन्हें कहते हैं बाबा इन्हें ध्यान से सुन लो
- 1:07:56असंख मूर्ख अंध कोर घोर कलि उगा गया अंधा युगा गया।
- 1:08:05असंख चोर। हरामखोर।
- 1:08:10असंख। अमर कर जाहि चोर असंख गलवड हत्या
- 1:08:17कुंबा गर्दनों को काटते हैं, हत्या करते हैं ये बाबा कहते हैं।
- 1:08:23जब जी में। असंख्य।
- 1:08:26पापी पाप कर जा। पापी पाप।
- 1:08:31करके चले जाते हैं, लेकिन ये भुगतान कहाँ भुगते हैं?
- 1:08:36कर्म तो तुमने? कर दिया।
- 1:08:41कल को देना। पड़ेगा ये इन्हें पता नहीं।
- 1:08:44बेचारों को ये बेचारे लोग हैं। असंख।
- 1:08:49कुड़यार कूड़े फरा असंख मलेच्य मल पक्का बताओ जो मल खाता है वो कोन
- 1:08:59होता है, सूअर होता है, वरा होता है।
- 1:09:04ये जपजी के वाणी। है।
- 1:09:10ये किसी। असंत की वाणी नहीं ये परम संत की
- 1:09:13वाणी है। असंक।
- 1:09:16मलेछ मल पखखा। मल खाते हैं, मूत्र खाते हैं?
- 1:09:25असंख निंदक सिरकर ही पार कड़े मुर्दे उखाड़ते हैं।
- 1:09:39तुमने बिठाया था विकास के लिए? तुम उखाड़ने।
- 1:09:45लगे घड़े मोटे। इन्हीं की बात।
- 1:09:53करते हैं बाबा नानक नीच कह विचार। इससे ज्यादा।
- 1:10:01बाबा नहीं बोल सकते। नानक कहते हैं, ऐसे लोग नीच होते
- 1:10:05हैं। नीचों का जिक्र किया बाबा ने और
- 1:10:17महावीर दोती खोल देते हैं, नगन हो जाते हैं और आज का मीडिया सब
- 1:10:28दबाता है। लेकिन दबाने से सोप्रस करने से
- 1:10:31बीमारियां ज्यादा बढ़ती हैं। भीतर बैक्टीरिया।
- 1:10:35रहेगा ना वो फलेगा फूलेगा, पनपेगा?
- 1:10:40अपने घर भीतर। ही बसा लेते हैं वो।
- 1:10:44अपनी औलाद। भीतर ही बढ़ाते हैं वो।
- 1:10:48उनकी संख्या घटती नहीं है, बढ़ती जाती है।
- 1:11:01तीसरा नेत्र क्या है जिसके खुलने से ये आया हुआ विकार?
- 1:11:11खत्म हो जाता है। साक्षी तो काम न आया, साक्षी काम
- 1:11:18आएगा भी नहीं, देखो साक्षी यहाँ तक ले आई बहुत है।
- 1:11:25उसके आगे कुछ। और करना पड़ेगा।
- 1:11:28साक्षी सिर्फ। तुम्हें बता देगा कि भोग कौन रहा
- 1:11:31है। शरीर भोग रहा।
- 1:11:34है, शरीर को भोग रहा है, शरीर भोग रहा है, भोजन को भोग रहा है।
- 1:11:42शरीर भोग। रहा है सुंदर शब्दों को भोग रहे
- 1:11:46हैं कान शरीर भोग रहा है, सुंदर दृश्यों को भोग रहे हैं आँखें।
- 1:11:53शरीर भोग। रहा।
- 1:11:55सुंदर सुगंध को भोग रही है नशा ये सब भोग है।
- 1:12:01किसी से गले। मिल जाना मथुर स्पर्श चमड़ी भोग
- 1:12:06रही है ये तुने जान लिया बिलकुल ठीक।
- 1:12:12लेकिन जानने से। परिवर्तन नहीं होता है।
- 1:12:16तुम रोज़ जानते हो देखते हो मेरे पास रोज़ आ जाते है इससे आगे।
- 1:12:22इससे आगे हमें। उसको नहीं पता था।
- 1:12:26बस कहते है ऐसे। ही चले जाओ, साक्षी बने रहो।
- 1:12:32नहीं होगा भाई ऐसा नहीं होगा ऐसे तो खुद ओशो भी कहाँ काम से मुक्त
- 1:12:40होते हैं? अगर यहीं रुक गए।
- 1:12:45तो फिर कोई भी। काम से मुक्त नहीं होगा।
- 1:12:48भोंकेगा और भोंकता तो पशु भी है। लेकिन पशुता के भीतर आनंद की वो
- 1:12:56सुगंध नहीं होती है। तो फिर कहाँ?
- 1:13:01चूक हो गई। चूक बड़ी गहरी।
- 1:13:05हुई है। आइए इसका विश्लेषण करते हैं चूक
- 1:13:09कहाँ हुई है? प्रसंग लम्बा।
- 1:13:12जाएगा। और वीडियो करीब।
- 1:13:15सवा घंटे की हो गई है। क्या हम इसको?
- 1:13:20दो भागों में विभक्त कर दें। ऐसा ही शुभ।
- 1:13:26रहेगा क्योंकि इतनी लंबी वीडियो आप देख नहीं पाते हैं।
- 1:13:33इसको दो भागों। में प्रसारित कर देंगे।
- 1:13:35इसका बाकी एंड से शाम को प्रसारित कर देगा।
- 1:13:39ऐसा कर लो चूक हुई। बुद्ध के चेहरे पे।
- 1:13:49शांति है। ओशो के।
- 1:13:54चेहरे पे शांति है। संत के चेहरे।
- 1:14:01पे शांति स्वाभाविक है, कृष्ण बड़े मनमोहक हैं।
- 1:14:09और परम भोगी हैं। लेकिन कहाँ चूक हुई बुद्ध से,
- 1:14:23कहाँ चूक हुई उस से अब हम इस बात के ऊपर आंट है इसका विश्लेषण
- 1:14:29करेंगे। चूक तो हुई है हुई है तो कहाँ हुई
- 1:14:34है? इसका खुलासा मैं अगली वीडियो में
- 1:14:37कर दूंगा। इसका दूसरा पार्ट है।
- 1:14:40इसी को मैं। तो बोलना कंटिन्यू रखूँगा, लेकिन
- 1:14:43प्रकाशित आपको दो भागों में हम कर देंगे श्रीकृष्ण गोविन्द।
- 1:14:52हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी।
- 1:15:13हे नाथ नारायण वासुदेव पितमात स्वामी सखा हमारे पितमात स्वामी।
- 1:15:32सखा हमारे हमारे हमारे पितुमात स्वामी।
- 1:15:51सखा हमारे हेनाथ नारायण वासुदेव, श्रीकृष्ण गोविंद हरे मरारी हेनाथ
- 1:16:08नारायण। वासुदेव हो।
- 1:16:17धन्यवाद।