Latest / Baba ji Vijay Vats / 1 Apr 25 - आत्मबोध से परमात्मबोध की यात्रा! “पहले माना फिर जाना” और अब तीसरा Step "होना" Must Listen
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- 0:00बाबा जी प्रणव मैं गायत्री परिवार के एक सदस्य कृपया नाम डिस्क्लोज़
- 0:12न करें, व्हाटस दी टाइम ट्रैवेल? टाइम टेबल क्या है?
- 0:30आपने कहा ऐसे कुछ लोग हैं जो एनलाइटन होने के फौरन बाद निकल
- 0:39लिए। और अपने पीछे कोई फिंगर प्रिंट
- 0:47छोड़ के नहीं गया। क्या उन में से कुछ लोगों का
- 0:53विवरण देना चाहेंगे? तीसरा प्रश्न।
- 1:01अक्षय तृतीया का रोहिणी नक्षत्र के साथ योग?
- 1:06आपने कहा तो मुझे याद करा देंगे। कुछ व्यक्ति ऐसे हो गए जिन्होंने
- 1:35बताना ठीक न समझा चुपचाप विदा हो गए।
- 1:44उनमें से कुछ व्यक्तियों के नामों में से आप बताना चाहोगे हाँ एक।
- 1:59अलेक्जैंडर पोप जब पार्ट थे इंग्लैंड में थे।
- 2:25उन्हें शुरू से ही प्रकृति बड़ी प्यारी लगती थी।
- 2:30एकांत में रहना बड़ा प्यारा लगता था।
- 2:34अभी यहाँ रुक जाइए जिसे एकांत बाने लगे वह प्रभु के मार्ग की
- 2:43तरफ। चल पड़ा है।
- 2:46ये एक लक्षण है जिसे भीड़ सुहावने लगे।
- 2:52वह परमात्मा से दूर निकला जा रहा है, ये समझ लेना 1688 में उनका
- 3:01जन्म हुआ। और जब वो 12 वर्ष के थे, सिर्फ
- 3:08करीब 1700 के आसपास उन्होंने पहली कविता लिखी सॉलिच्यूट लेट मी लिव
- 3:17उनसीन अननोन एंड अनलिमिटेड लेट मी डॉग।
- 3:22स्टील फ्रॉम दी वर्ल्ड एंड नॉट एस्टॉर्म टेलवेयर आई लव ये पहली
- 3:29कब तक थी? और बड़े सुंदर भावों का समावेश यह
- 3:37वर्णित करती है। एकांत का महत्त्व और ध्यान रखना
- 3:46जब तक आप एकांत में नहीं उतरोगे तब तक उज्ज्वय और खुशी और कुमारी
- 4:00और मदहोशी। वो प्यास जीवन तुम्हें नहीं
- 4:06मिलेगा जिन्हें जीवन की खोज करनी है जिन्हें जीवन में।
- 4:20एक आकार होना है, रमणा है, उन्हें एकांत की खोज करनी ही होगी।
- 4:27देर अबेर सारी छूट एकांत और सभी ऋषियों ने यही कहा, उनके भीतर का
- 4:40मर्म आओ, हम समझें। कैवल्य भगवान महावीर कैवल्य का
- 4:47मतलब केवल रह जाता है। वहीं एक सभी छूट ऋषिगण जो पहुंचे
- 5:03उस स्थल पर उन्होंने कहा। एको ब्रह्म द्वितीय नास्त एक ही
- 5:13ब्रह्म है। बाबा नानक ने कहा एको जो अकेला
- 5:20होना। कि डगर पे चल पड़ा, उसको अच्छा
- 5:29लगने लगा। एकांत तो ये लक्षण है, लोग मुझे
- 5:35पूछ लेते हैं परमात्मा की तरफ यात्रा शुरू ही इसका प्राथमिक
- 5:40लक्षण क्या है बाबा? प्राथमिक लक्षण है कि आपको एकांत
- 5:49अच्छा लगने लगेगा, बहाने लगेगा, शोर से कहीं दूर दूर निकल जाऊं और
- 5:59आपका मन करेगा। किस शोर गुल में?
- 6:03अब नहीं रहना और प्रकृति में जा बैठोगे अलेक्जैंडर पोप ऐसे ही थे।
- 6:13एकांत वाने लगता है जीसको परमात्मा की तरफ यात्रा हुई हो
- 6:18उसकी समझो। वक्त बीतता गया और अचानक 3 जनवरी
- 6:36का दिन 1719 सुबह का वेला। तभी तो उनकी खराब रहने लगी थी।
- 6:58रीड की हड्डी में दर्द और सारे शरीर में दर्द भीषण दर्द था।
- 7:13सांस लेने में तकलीफ और उन्होंने चारपाई पकड़ ली।
- 7:23वो उठ ना सकते थे। अगर प्यास लगती तो पानी का ग्लास
- 7:32वो खुद न पी सकते। टाइम ट्रैवेल की बात भी इसमें आ
- 7:38रही है। ध्यान से समझना तुम मुझे पूछ लेते
- 7:43हो बाबा? आप किसी चीज़ को इतनी सटीकता से
- 7:47चलचित्र की तरह कैसे वर्णित कर देते हो?
- 7:52यह टाइम ट्रैवेल का ही वरदान है। टाइम ट्रैवेल से उस स्थिति के उस
- 8:03क्षण में पहुँच जाना जब ये घटना घटी थी, तो आप सटीक क्षेत्र
- 8:09क्षेत्रण कर पाओगे, जो उस वक्त था 1700।
- 8:20उनका दर्द बहुत बढ़ गया। पीठ का दर्द ऐसा कि सहन नहीं जाता
- 8:28सब दवाइयां सब डॉक्टर बल आये लेकिन बेकस बढ़ता ही क्या?
- 8:41अब तो चारपाई से उगना भी दूभर हो गया था और दूसरा लक्षण शिथिलता
- 8:49बुध को जब मिला सिर हो गए थे बौद्ध वृक्ष के नीचे छह वर्ष से
- 8:54बैठे। महावीर स्थिर हो गए थे।
- 8:58एक स्थान पर खड़े रहते हैं। नानक स्थिर हो गए थे।
- 9:06रात रात भड़काते चारपाई पर परमात्मा का गुणगान करते।
- 9:16उसकी शलाघा में आंसू झरते उसकी याद में दिल मचल मचल जाता।
- 9:30हृदय की पुकार उठती, कब आओगे परमात्मा, मेरी प्रिया परमात्मा,
- 9:37तुम कब आओगे यह पुकार उठने लगी सारी सारी रात गाते पपिया गाता।
- 9:48इधर नानक गाते माँ कहती सो जा बैठे सो बह हो गई भोर की वेला हम
- 9:56तो जाग भी गए सो के तू अभी अभी सोया ही नहीं तो नानक कहते माँ।
- 10:07मेरी दौड़ लगी है, मेरी होड़ लगी है इस बपीहे से यह अपनी प्रिय
- 10:14तमाम को उकार रहा है, यह नहीं हटता तो मैं कैसे हट जाऊं?
- 10:26इसलिए यह गाता है तू सो जा माँ मुझे गाने दे जब ये हटेगा उसके
- 10:40बाद मैं हटूंगा अन्यथा गाता ही जाऊंगा।
- 10:50स्थिरता और वह नदिया का तट जहाँ नानक बैठे उसके शिष्य के साथ।
- 11:09स्थिरता परम स्थिरता का भाव उनके चेहरे पर लावण्या की तरह चल रहा
- 11:14था। कोई मनोवेग न था कोई ऐसा न लगता
- 11:22था कि थोड़ी भी हवा उन्हें प्रभावित कर रही हो।
- 11:28बिलकुल शाम, अति शाम और गहरे में उतर गए।
- 11:35कहानी है को नदी में उतर गए। 3 दिन तक वापस ना आए।
- 11:41मर्दाना ने सोचा कि बाबा डूब गया। गांव वालों को खबर दी, गांव वालों
- 11:53ने चप्पा चप्पा कंगाल लिया, नानक का कोई निशान नहीं अचानक तीसरे
- 12:01दिन प्रकट हुए नानक कहानी है। इनके भीतरी तथ्य ज्यादा गहरे हैं।
- 12:09रहस्यत्मक हैं 3 दिन तक नहीं लौटे हैं।
- 12:20अक्सर जब प्रथम मुलाकात होती है उसकी।
- 12:28तो बहुत दिन लग जाते हैं। उससे मिलने के बाद अपनी पूर्व
- 12:35स्थिति में आने के लिए पता ही नहीं चलता।
- 12:39ये क्या हुआ ये क्या हो रहा है? कुछ ऐसे होते हैं अनुभव मैंने
- 12:52आपको बताया कि मैं जब जल रहा कभी मुझे ऐसा लगता कि मैं इस विराट
- 13:01सागर में जल रहा हूँ बूंद की तरह। और कभी मुझे ऐसा लगता कि इस बूंद
- 13:09में विराट संसार निकल रहा है? ये दो धुरे थे, लेकिन मैं समझ
- 13:15नहीं पाया ये क्या हो रहा है। कभी लगता तुम इस विराट संसार को
- 13:22चीर के जा रही हो। जैसे एक मूंद समुद्र को छीर के जा
- 13:26रही है और कभी मुझे लगता कि मुझ में सारा विराट, ये ट्रक, ये
- 13:33बसें, ये चलने वाले आदमी, ये स्कूटर या मोटरसाइकिल, ये कारें
- 13:40सब मेरे में से गुजर रहे हैं। पंछी आसमान में नहीं, मुझमें उड़
- 13:44रही यह दूध, मेरी ऐसे रहस्यत्मक अनुभव आपको होंगे बीमार पड़े।
- 14:04और कुछ देर के लिए श्वास आना बंद हो गया।
- 14:11अस्थमा से पीड़ित थे, दर्द तथा शरीर में परमात्मा आखरी जन्म में।
- 14:22बहुत से बड़े बड़े भोग भुगतवा लेता है।
- 14:26इसलिए करीब करीब संतों का भी आखिरी जन्म दर्द और दुखद
- 14:31स्थितियों से भरा रहता है। क्यों ये वो पाथर हैं जो बहुत
- 14:38भारी हैं? और भारी कर्म श्रद्धा ही नीचे बैठ
- 14:41जाते हैं और वो बाद में भुगताए जाते हैं क्योंकि उनकी टर्न ही
- 14:46बाद में आती है। जो हल्के कर्म थे, कश्ती थी, कागज
- 14:51की कोई दिन का था, कोई हल्का कर्म था।
- 14:58वह बहुत जल्दी भोग लेता है आदमी लेकिन जो बहुत भारी कर्म रह जाते
- 15:03हैं वो जाके बड़े विशाल पुत्र की तरह जैसे कोई सुमेरु का टकरा
- 15:11समुद्र में घर जाए और बहुत गहरे अंतराल में बैठ जाए।
- 15:17जब भुगतान का वेला आएगा तो उसको भुगतने के लिए बड़ा वक्त रखेगा।
- 15:28जब सब भुगत लिया जाता है तो वह भीषण पत्थर फिर उसकी टर्न आती है।
- 15:37ऐसा ही होता है। रामकृष्णा भी कितने दुखद और दर्द
- 15:41की स्थितियों से गुजरे। जेतु कृष्णमूर्ति, महर्षि रमन और
- 15:47सभी इतनी दुखद परिस्थितियों में से गुजरे।
- 16:00राम अंतिम वेला में समाधि ले गए, जल में समा गए और जल में समा जाना
- 16:10स्वच्छ नहीं आती। आपको कितना कष्टकारी क्षण होता
- 16:15है? जब सांस भी नहीं ले पाते और आपके
- 16:23पूरे रोए रोए से उठती है आवाज़ उमंग मुझे सांस लेने दो, मुझे
- 16:30प्राण वायु चाहिए। कृष्ण विश से बुझे हुए तीर उसके
- 16:41शरीर से आर पार निकल गया ज़रा नाम के व्याग्रह ने।
- 16:51वो चलाया था तो व्याख्याकर्ताओं ने कहा, यह भगवान राम का अगला
- 17:00जन्म पिछले जन्म में यह बाली था, यह गलत है, सिर्फ व्याख्या के लिए
- 17:07कहानी बनाएगी कि तुम समझ जाओ। लेकिन तुमने समझा नहीं तुमने
- 17:12विकृत कर लिया भुगतना पड़ता है वो चाहे अवतार ही तो न हो, आदमी ही
- 17:22अवतार बना करता है, आदमी में ही अवतरित हुआ करता है वो।
- 17:36और अवतरित हुआ। कृष्ण में कृष्ण बहुत पहले से
- 17:41पिछले जन्म से ही आत्मज्ञान को उपलब्ध हो चूके थे और उन।
- 17:49ऊंचाइयों को छू चूके थे। इस जन्म में आके रास रचा के प्रेम
- 17:55की वो लीला में मग्न प्रेम की लीला में सदा ही रहस्य गहरा होता
- 18:00है। इसलिए सभी संतों ने कहा प्रेम
- 18:04बांटों ईश्वरी का, बुद्ध ने प्रेम का प्रचार किया।
- 18:15संत ज्ञानेश्वर ने प्रेम का प्रचार किया।
- 18:19कौन है संत जिसने नफरत फैलाई, किसी ने नफरत नहीं फैलाई।
- 18:27नफरत फैलाने, कोशिश ही काफी संत तो प्रेम फैलाया करता है, संत से
- 18:37उम्मीद भी मत रखना। संत प्रेम की प्रतिमूर्ति होती
- 18:44है। और उसमें से जो नरझर होता है वो
- 18:47प्रेम ही तो होता है। एकदम से रात को श्वास अनबन हो
- 19:03गया, उन्हें लगा कि बस आखिरी वेला आ गया।
- 19:13मन रुक गया मन स्वांसों से ही चलता है, इस संबंध को गहरे से देख
- 19:20लेना। स्वास्थ्य चलेगा तो मन चलेगा,
- 19:25श्वास ठहरेगा तो मन भी ठहर जाएगा। इसलिए प्राणायाम का इतना अत्यधिक
- 19:31महत्त्व विषयों ने वर्णित किया कि स्वासों पर नियंत्रण करना तो
- 19:39स्वासों पर नियंत्रण करने से आपके मन के ऊपर नियंत्रण हो जाएगा और
- 19:45मन से नियंत्रण होने पर आपकी इन्द्रियों पर भी।
- 19:49नियंत्रण हो जाएगा। यू विल कंट्रोल युअर
- 19:55एस्ट्रूमेंट्स और इनको नियंत्रण करने से तुम इंद्र हो जाओगे
- 20:01इंद्रियों पे जिसने नियंत्रण पर लिया वह इंद्र हो गया और जो इंद्र
- 20:06हो गया। वह स्वर्ग में शुभ हो गई।
- 20:11एक काव्यात्मक भारतीय थी सिम्बोलिक रेप्रेसेंटेशन्स थे।
- 20:19प्रतीकात्मक चिन्ह थे जो वर्णित किए गए काव्यात्मक शैली में।
- 20:25लेकिन आपने सतयात्मक चीज़ समझ ली और चिप लगा इससे इतना शुद्र नहीं
- 20:38होता भगवान जितना आप समझे हो। छोटा सा लड्डू गोपाल फिरते हो ये
- 20:49छोटे छोटे देवी देवता तुम बनाए फिरते हो साकार मूर्तियां ये ये
- 20:59नहीं कहता के भगवान छोटा। ये तुम्हारे अंतर्मन का प्रतीक
- 21:05है। रिफ्लेक्शन ऑफ़ युअर इन्नर माइंड
- 21:10जी छोटे छोटे बना ली ना कोई भगवान जी ने तुम कहते हो लड्डू गोपाल।
- 21:20जो बदलते रहते हैं, ध्यान रखना ये तुम्हारे अंतश का द्योतक हैं के
- 21:28भगवान बस इतना सही है भगवान ये बराट संसार तुमने देखा नहीं तुम
- 21:37वास्तव में अंधे हो जो अंधा है। वो आँखों से नहीं देखता और जो
- 21:44वास्तव में आता है वो मन से नहीं देखता, बुद्धि से नहीं देखता,
- 21:48उसकी बुद्धि पंगु हो जाती है, इसलिए तुम ऐसे ऐसे प्रयास करोगे
- 21:57ऐसी ऐसी रचनाएं गढ़ोगे। जो बेहद अमूड़तापूर्ण होगी वो
- 22:09उठना सकते थे। हिला सकते थे ज्यादा रीढ़ की
- 22:16हड्डी में बढ़ा दर्द क्या करें? लेकिन उनका मन जागरूक था।
- 22:26उनकी आत्मा जागरूक थी, विटरनेस थी, इसलिए मैं एक शब्द कहा करता
- 22:31हूँ कि तुम दौड़े दौड़े कभी न पा सकोगे ठहरे ठहरे तुम तृतीय
- 22:39क्षणों। संपूर्ण ठहराव जीस दिन आ जाएगा।
- 22:45वही क्षण तुम्हारी केवल की अवस्था हो जाएगी।
- 22:53तुम निवृत्त हो जाओगे, तुम निर्वाण में धकेल दिए जाओगे।
- 23:00जीस घड़ी तुम ठहर गए और बिमारी एक बेहद सुंदर साधन है।
- 23:09ऐसी बिमारी जिसमें तुम हिल भी ना सको तुम इस आफत को प्रयोग में ले
- 23:19लो। तुम्हे लकवा मार जाए, तुम्हे कुछ
- 23:24हो जाए ऐसा तो तुम इसको एक अवसर की तरह ले लो।
- 23:35बड़ा शुभ अवसर है। तुम कहोगे परमात्मा ने ये क्या
- 23:38किया? मेरे ही किसी कर्म का परिणाम है
- 23:41होगा, लेकिन तुम अब इसका उपयोग कर लो।
- 23:47क्या करें मुझे छोटा सा प्रयोग अगर कुछ ऐसी स्थिति किसी को हो
- 23:53जाती है, कोई बड़ी बिमारी? दर्द, दर्द और दर्द तो उस दर्द को
- 24:05अपने से अलग देखो और सत्य में पाओगे कि वह अलग है।
- 24:14इन क्षणों में ऐसा प्रयोग करना लगता तो मुश्किल है।
- 24:19लेकिन अगर सदी जाये तो फिर हीरे जोहरा तुम्हारी झोली में होंगे और
- 24:28फिर तुम डगरों के भीतर ढोलते न फिरोगे संसार से मुक्त हो जाओगे,
- 24:34क्षण भर लगेगा। इन कष्टकारी तूफानों का लाभ उठाना
- 24:43मनुष्य की साझेदारी का परिणाम तुम इनका लाभ उठा लो और कैसे उठाओ
- 24:50मैंने तुम्हे समझा दिया बड़े सरल तरीके से जब ऐसी भीषण भी बताया
- 24:55जाए। तुम मत पुकारना हनुमान को तुम मत
- 24:59पुकारना शंकर को तुम मत पुकारना किसी देवी देवता को मत मन्नत
- 25:06मांगना जो कि तुम करते हो सदा तुम ठहर जाना, ठहर जाना।
- 25:14और दो तत्वों को देखने की चेष्टा करना।
- 25:17एक ओब्सर्वर, एक ओब्सर्वर एक जो देखता है उस दर्द को।
- 25:27एक जो दर्द हो रहा है उसको तुम पाओगे, तुम दर्द को भलि भांति देख
- 25:32सकते हो कहीं दूर दूर और जैसे जैसे तुम देखने वाले निष्णात होते
- 25:40गए वह दर्द बड़ी दूर लगने लगेगा बहुत दूर।
- 25:47दूर बहुत दूर कहीं दर्द हो रहा है सफायर पे और तुम केंद्र में बैठे
- 25:58हो और उस दर्द को बखूबी निहार रहे हो।
- 26:05ऐसी मंजिल आएगी, ऐसा मुकाम आएगा यह एक से दो का होना पहले एक से
- 26:15दो ही होते पहले तुम एक थे बस तुम थे दर्द भी तुम थे।
- 26:22और जिसे दर्द हो रहा है वो भी तुम थे, लेकिन अब तुमने दूरी बना ली।
- 26:28अब दर्द दूर हो गया और दर्द को देखने वाले तुम दूर हो गए।
- 26:34फासला हो गया। पहले एक से दो आने पड़ते हैं।
- 26:40पहले तुम एक थे अकेले तुम दर्द से ग्रसित अब तुम दो हो गए एक दर्द
- 26:46और एक तुम दर्दो को देखने वाला दो हो गए तुम्हें स्पष्ट दिखेगा मैं
- 26:55अलग हूँ, यह अलग है, यह पहला प्रयास।
- 27:00फर्स्ट स्टेप फिर धीरे धीरे धीरे धीरे दर्द हो जाएगा, दर्द हो
- 27:12जाएगा और खोते खोते तुम फिर एक रह जाओगे।
- 27:22थोड़े से शब्दों का व्याख्यान इतनी जल्दी घटेगा नहीं ये तुम्हें
- 27:28ये बड़ा लंबा चौड़ा इम्तिहान कि मैंने गाथा कह दी इतनी जल्दी होगी
- 27:38नहीं ये। बड़ा वक्त लगेगा पहले दो बनाव
- 27:45शरीर अलग जिसमें दर्द हो रहा है और तुम अलग उस दर्द को देखने वाले
- 27:52हो, फिर धीरे धीरे दर्द खो जाएगा, तुम्हारा तादाद में न रहा।
- 28:00तो दर्द भी न रहा, क्योंकि तुम तो सदा ही ऑब्जर्वर हो, तुम तो सदा
- 28:07ही दृष्टा देखने वाले हो, दर्द को साक्षियों दर्द कहाँ गया अब पता न
- 28:15चलेगा। जैसे किसी ने ऐन एस थीसिया का
- 28:20इन्जेक्शन दे दिया हो, ऐसा हो जाएगा पहले एक से दो, फिर दो से
- 28:32एक जिसे कहते हैं पहले एक से दो बाइफरकेट।
- 28:38फिर दो से एक बड़ा उल्टा मसला है। दो से एक सिर्फ तुम बचोगे दर्द
- 28:54नहीं होगा। ओब्सर्वर बचेगा और फिर आगे की
- 29:00यात्रा रहस्य की दुष्टता से पार जिसे शून्य कहते हैं।
- 29:10मुझे लोग कह सकते हैं बाबा तुम शून्य बात के कभी नहीं भूले।
- 29:17एक एक में तुम आ जाओगे जब तुमने स्वयं को जाना तुम हो कौन तो तुम
- 29:26एक में आ गए, तुम्हें तुम्हारा असली ठिकाना पता चला तुम हो कौन
- 29:34तुम एक हो। वाइफरकेट मल्टीडाइमेंशनल हो गए इस
- 29:39सम्मान की साथ तादाद में करते करते अनेक दिशाओं में।
- 29:50तुम्हारी लिप्तता हो गई। अनेक दिशाओं में तुमने अपनी शक्ति
- 29:54को इन्वेस्ट कर दिया तुम जगह जगह उलझे यह का बहुवाद और फिर तुम
- 30:04वापस मुड़े अपने घर को, जैसे साँझ लौट के कोई थका मांदा हारा।
- 30:11यात्री दिनभर का परीक्षण अपने स्वयं के घर लौटता है।
- 30:16ऐसे तुम लौटते हो और अपने असली मुकाम में आ जाते हो, वो है एक एक
- 30:23होना तुम्हारा असली मुकाम। बहुवाद से एकवाद, अद्वैतवाद अब
- 30:36अद्वैतवाद से आगे शून्यवाद नागार्जुन का इसे बहुत समझाया
- 30:43नहीं गया। यह समझ में आया नहीं आएगा भी यहाँ
- 30:49तक समझ में आता है, लेकिन वो भी बहुत कम।
- 30:55बुध तक बात समझ में आती अप दीपो भवा।
- 31:03तुम वो शुद्ध तत्व हो, शांति से भरे भरे भीगे हुए, उस आनंद स्वरूप
- 31:16सुख में कि तुम झूमते रहते हो। और उस सुख का मज़ा तो मूर्तिवत हो
- 31:27जाते हो, शिलावत हो जाते हो जैसे बुद्ध की मूर्ति देखना उसमें
- 31:32प्राण न हो। ऐसे ही जीवंत बुद्ध भी थे लेकिन
- 31:38यहाँ बात रूकती नहीं। इससे आगे अध्यात्म का असली अध्याय
- 31:44शुरू होता है। वह शून्यवार नागार्जु ने इसे
- 31:49छेड़ा, इसका राग छेड़ा। नागार्जुन ने नागार्जु से पहले
- 31:55छेड़ा इसे कृष्ण ने। और इससे पहले छेड़ा अष्टावक्र
- 32:08रहस्य वाद ये रहस्य क्या है अद्वैत वाद से बिल्कुल आगे?
- 32:16जहाँ कोई नहीं जानता क्योंकि उस स्थान पे पहुँच के भी तुम्हें कुछ
- 32:27खलेगा हल्का सा जैसे कांटा जो लगा वो तो तुमने निकाल दिया।
- 32:34ध्यान से समझना मेरी बात को, लेकिन उसका घाव जो बन गया वह
- 32:42तुम्हें अभी भी शक पैदा करता है कि कोई है जो छूभ रहा है यद्यपि
- 32:48कोई है नहीं, जो छूभ रहा है वो कांटा तुमने निकाल दिया।
- 32:54लेकिन घाव तो काटे का रह गया ना जो काँटा तुम्हारी मांस पीशु में
- 33:02घुसा, वह तो अपना दर्द और अपना जख्म पीछे छोड़ गया ना उसका एहसास
- 33:13होगा। तुम्हें अपने आपा जानने के बाद भी
- 33:19वो होगा रहस्य अब है तो कुछ है नहीं, फिर भी तुम्हें इंतजार
- 33:27होगा। सुख होगा, साधन होंगे, सब होगा।
- 33:37उस संधि जगह पर स्थान पर संघी स्थान जंचरपान उस संघी स्थान पर
- 33:54तुम्हें कुछ अभी गहरे का। खींचेगा तुम खींचोगे और जान लोगे
- 34:01मैं कौन हूँ? लेकिन यहाँ बात रुकती नहीं, मैं
- 34:07क्यों बोलता हूँ? यद्यपि यह बोलने का अभी वक्त नहीं
- 34:12था लेकिन वक्त नहीं था तो क्या मैं बोलूं भी ना?
- 34:16हैं। अभी करीब 20 लोग ऐसे पहुंचे जिनको
- 34:23इंतजार है जिनके भीतर एक रड़क बाकी रह गई, काँटा निकल गया लेकिन
- 34:30घाव छोड़ गया, काँटा कभी चुभा था। और घाव कभी बना था, कांटा निकाल
- 34:39दिया गया, घाव नहीं भर सके। अब घाव भरना होगा, वो घाव तुम्हें
- 34:46तड़पायेगा और तुम्हें पता नहीं चलेगा कि अब आत्मा कहाँ भटक रही
- 34:53है। अब कमी क्या है?
- 34:55कमी तो तुम्हें तब भी लगती थी जब कांटा चोहा था, दर्द हो रहा था इस
- 35:02दर्द को कैसे में निजात पर और तुमने वो दर्द की दवा तुमने
- 35:09फोर्सब से उस कांटे को खींच ली? अब काँटा भी नहीं लेकिन फिर कुछ
- 35:17तो है जो अब अपना प्रभाव छोड़ गया, वो ऐसा देखिए।
- 35:24उदाहरण है, उदाहरणों से चिपटा मत करो।
- 35:35ओह, खा तुम्हें चिढ़ पाएगा और तुम्हें समझ ही नहीं आएगा, लेकिन
- 35:42तुम्हें गुरु बताएगा रहस्यवादी गुरु बताएगा पुद्धना बता सकें
- 35:49क्या? कबीर बता सकेंगे कृष्ण बता सकेंगे
- 35:57ओशोना बता सकेंगे। कोई नहीं है।
- 36:12फिर भी है मुझको कोई नहीं है फिर भी है मुझको, न जाने किसका।
- 36:32इंतज़ार हो कोई नहीं है फिर भी है मुझको।
- 36:51ना जाने किसका इंतजार, ना जाने किसका इंतजार, किसका इंतजार?
- 37:05है। अब तुम्हे अभी भी थोड़ी सी।
- 37:09यद्यपि कोई काँटा चूबा नहीं अज्ञान मिट गया लेकिन सफर अभी
- 37:16बाकी है। तुम ज्ञानी हुए दीपक की लो जली
- 37:21तुम्हारी अब तुम दूसरों के दीपकों के लोहों को प्रज्वलित कर सकते
- 37:26हो। तुम योग्य हो इसका।
- 37:31लेकिन एक और है यात्रा अभी जो तुम नहीं करोगे, जो यात्रा सिर्फ
- 37:42ईश्वर करेगा वो तुम्हारी यात्रा तो खत्म हुई तुमने स्वयं को जाना।
- 37:48सेल्फ रिमेम्बरिंग हुई नो दाय सेल्फ हुआ ओएमआई हुआ ओह आर यू हुआ
- 37:54सब हुआ लेकिन फिर भी तुम शांत न हुए परिपूर्ण रूप से यद्यपि बहुत
- 38:02शांत हुए लेकिन इस शांति में लावण्य का वो रस आनंद न था।
- 38:10तुम बुद्ध के चेहरे पर शांति तो बड़ी पाओगे, मूर्ति वथ आनंद का
- 38:16अभू भाव न पाओगे शांति एक नेगेटिव प्रोसेसर ऑफ नॉइस, नॉइस लेस नेस।
- 38:26इस कॉल्ड शांति पीस कोई नॉइज़लेसनेस तक पहुंचना कम नहीं
- 38:36है। बहुत बड़ी उपलब्धि है, लेकिन
- 38:42अंतरिम भी नहीं, अंतिम भी नहीं। अंतिम कुछ और है, अंतरिम कुछ और
- 38:49है, इस रहस्य को सुनेंगे बुद्ध इस रहस्य को सुनेंगे पूछो तुम्हारे
- 38:59काम का तो सिर्फ सूचनाएं है जो पहुंचे।
- 39:06आत्म तत्व तक जिन्होंने जाना मैं हूँ, कौन उनके लिए ये थोड़े से
- 39:12शब्द जो मैं आज बोल रहा हूँ और तुम हैरानी मत करना जब संत रहस्य
- 39:22की बात करता। तो ओशो उसे सुनते बुद्ध उसे
- 39:28सुनते, क्योंकि बुद्ध रैश में नहीं पहुंचे।
- 39:36बुद्ध अभी पहुंचे नहीं। ओशो अभी पहुंचे नहीं, उनको सुनना
- 39:41ही पड़ेगा। वो ही खटक रहा है कांटे का जख्म
- 39:52तुम्हें चस चस तो थोड़ी सी हो रही है, उसको भी मिटाना होगा कैसे?
- 40:01रहस्य में उत्तर के और तुम क्या करो रहस्य के लिए तुम कुछ न करो।
- 40:06मैंने कहा आत्म बोध के बाद यात्रा परमात्म बोध की होती है।
- 40:11फिर वो यात्रा करता है परमात्मा आत्म ज्ञान से परमात्मा ज्ञान तक।
- 40:22आत्मबोध से आत्मसागर तक बूंद तक तुम पहुंचे तुमने जाना मैं सागर
- 40:36से बिछड़ा हुआ एक बूंद। डाली से टूटा हुआ एक फूल हूँ ये
- 40:48तो तुमने जाना लेकिन वो बूंद अभी समुद्र में समाई।
- 40:59वह रहस्य और वो यात्रा ना बुद्ध को करनी पड़ेगी ना उसों को
- 41:06उन्होंने जो करने योग्यता को कर लिया इसलिए एक शब्दाता सर्वज्ञ
- 41:13यानी जो जानना चाहिए था वो जान लिया।
- 41:18सर्व क्या जो गाय हो सकता था सर्व कुछ वह जान लिया गया बस इससे आगे
- 41:27जानने को कुछ नहीं। तुम तो अभी मानने पर ठहरे हो।
- 41:34बुद्धि कतर तो मानने तक ही सीमित है लेकिन ये महान पुरुष मानने से
- 41:41जानने में उतर गए, लेकिन जानना ही काफी नहीं है।
- 41:47जानने से आगे होना तीसरा कदम है। मान ना बुद्धि, समझ, बुद्धि और
- 41:58वहाँ की यात्रा जानने तक जान ना बुद्धि नहीं जान ना तुम्हारा
- 42:05अस्तित्व है और जानने से तीसरा तल है होना जब तुम हो जाते हो।
- 42:13जब तुम्हारा विस्तार अनंत में फैल जाता है, बूंद समुद्र हो जाती है
- 42:20होना यह तीसरा तल है, यह बड़ा शब्दों से पार पड़ेगा।
- 42:26समझ तो तुम बुद्धि के निर्वाण भी नहीं सके आज तक।
- 42:31न्यूरॉन बुद्धि को समा लेती है आपकी सूचनाओं को लेकिन वो बने
- 42:37कैसे नहीं? आपको पता उनका मटेरियल बनाया
- 42:41किसने? तुम्हें नहीं पता उनका मटेरियल
- 42:44किस तरह से तरतीब किया गया, डिज़ैन किया गया आपको नहीं पता?
- 42:52तुम मानने से जानने की ओर तुम बेहतर यात्रा की ये भावनाएँ
- 42:58रास्ते में आईं, बुद्धि से उतरोगे तुम हृदय में हृदय में भावनाएँ
- 43:03तुम्हें घेरेंगे। करुणा से तुम तड़प हो गए दया का
- 43:12पड़ाव आएगा तुम्हें सारी दुनिया पर करुणा आएगी।
- 43:15ये क्यों भटक रहे हैं लोग? और तुम चले उस अध्याय की तरफ जो
- 43:24भरा पड़ा खुशी के समुद्र से। लेकिन आनंद का समुद्र अभी आया
- 43:28नहीं। जो शब्द है न्यूटन नहीं एट दी एंड
- 43:35ऑफ हिज़ लाइफ, न्यूटन सेट आई हैव कलेक्टेड ओनली ए फ़्यू फेवरिट्स
- 43:40ऑन दी, सीशोर व्हील दी ओशन्स ऑफ नॉलेज।
- 43:44स्टिल रिमैन उन एक्सप्लोडेड अभी वो उन एक्सप्लोडेड हैं, वो क्या
- 43:50है? वो तीसरा तल है, वो होने का तल
- 43:53है। मान में से जानना जानने में तुमने
- 43:58स्वय को जानो और सत्य जाना, वहाँ तुम मुक्त हुए।
- 44:04लेकिन जानने से बाद भी एक तल बाकी रह जाता है।
- 44:10जो जो यात्रा तुम नहीं करते, जो यात्रा करता है भगवान वो होने की
- 44:20तरफ यात्रा तुम होते हो, बूंद समुद्र हो जाए।
- 44:26उसके लिए ये यात्रा परमात्मा खुद करता है।
- 44:30तुम्हे कुछ नहीं करना पड़ता इसलिए कुछ ना करे।
- 44:33ओशो कुछ ना करे बुद्ध तो ये यात्रा अवशेष जो रही वो परमात्मा
- 44:41ही रही 1 दिन और देर अवेर। परमात्मा तक पहुँच जाएंगे।
- 44:50बिना कुछ किये अब यह यात्रा उस वृहद की हो गई जब बूंद समायेगी
- 44:59अखंड स्रोत में जब उसका फैलाव सीमित बिंदु तक न होगा।
- 45:05जब उसका पिस्तार ब्रह्मंड के अंतिम छोर से ब्रह्मंड के प्रथम
- 45:13छोर तक होगा, चारों दिशाओं में वह ही होगा।
- 45:18जीत्र देखता हूँ उधर तू ही तू है हर झर्रे में तू ही तो रोब।
- 45:23है। प्रश्न पूछा बस टाइम ट्रैवल टाइम
- 45:38ट्रैवल क्या है? टाइम ट्रैवल के लिए आपको बाहर से
- 45:44सारी ऊर्जा इकट्ठी करके वही बात पर दोहरा रहा हूँ।
- 45:49बाहर की चेतना का संपर्क आपने जहाँ जहाँ इन्वेस्ट कर लिया वहाँ
- 45:53से उस एनर्जी शक्ति चेतना को खेच लो, वहाँ से निर्लिप्त हो जाओ, आप
- 46:02जिसे ऋषि कहते हैं, मोह से टूट जाओ।
- 46:07के बंधन से तुम ग्रसित हो ये मेरा पुत्र, ये मेरी पुत्री, ये मेरा
- 46:13परिवार, ये मेरा मित्र, ये मेरा गुरु, ये मेरा शिष्य, ये मेरा
- 46:21कोलीग ये सहपाठी। यह चाचा ताया, मामा, गोपा बहन,
- 46:29भाई सब तुम्हारे रिश्ते ना थे इनमें मोह तुम्हारा तुम्हें पता
- 46:36भी नहीं अटका हुआ है, थोड़ा थोड़ा और तुम्हें एहसास भी नहीं होता।
- 46:43तुमने ऐसे ही अपनी थोड़ी थोड़ी ऊर्जा और चेतना इन्वेस्ट कर रखी
- 46:50है। सारी चेतना शक्ति को एकत्रित करके
- 46:59तुम उतरो अपने भीतर। बुद्धि से नीचे हृदय में आ गया वह
- 47:07भावनाओं घृणा नफरत प्रेम, दुआएँ बददुआएँ, बहुत कुछ मिलेगा तुम्हें
- 47:18इच्छा वेश। प्रेम, दया, करूणा ये सब तुम्हें
- 47:27वही मिलेगा, इससे भी पार निकल जाओ उससे आगे एक संदिग्ध क्षेत्र आएगा
- 47:37मुझसे कल कहा किसी ने? ये जंक्चर प्वाइंट बाबा समझ नहीं
- 47:41आता है। इसकी थोड़ी सी हिंदी बना दिया था
- 47:44संधि क्षेत्र जहाँ मिलते हैं दो छोर जहाँ खत्म होता है हृदय का
- 47:55क्षेत्र और शुरू होता है। स्वयं का क्षेत्र स्वयं तक
- 48:02पहुंचने के लिए ये रास्ता है। यहाँ से शुरू होती है एलओसी लाइन
- 48:10ऑफ कंट्रोल। यह संधि क्षेत्र कहते हैं।
- 48:15उसे मैं जंक्चर पॉइंट कह रहा हूँ। वहाँ तक तुम आ जाओ, उससे थोड़ा
- 48:24नीचे जाओगे, संकल्प बहुत उठेगा, भीतर से ऊर्जा और चेतन का मिला
- 48:31झुला रूप उसमें ऊर्जा भी घणीभूत होगी।
- 48:37और चेतना भी होगी क्योंकि ऊर्जा बिना चेतना के काम नहीं करते जब
- 48:46तुम मर जाते हो, ऊर्जा तो समारोह में होती है।
- 48:50ऊर्जा तो प्रत्येक शरीर के कण कण में है, लेकिन चेतना गई।
- 48:56चेतना की लिप्तता टूट गई इसलिए तुम मृत्युवत हो गए, वो जीती,
- 49:03जागती मृत जो चल रही थी, वह चुप हो गई, वह मूर्ति हो गई, ऐसा हुआ
- 49:15फिर तुम। जंक्चर पाय से नीचे एक क्षेत्र आय
- 49:22का वो सारा क्षेत्र उसी का है सबका राजा वही है वहाँ से क्षेत्र
- 49:32शुरू हो गया या ये कहो। कि दट इस दी सर्फियर ऑफ युअर
- 49:36सेंटर, वो तुम्हारे केंद्र का सर्फियर है जाने की वृत है वृत
- 49:48गोलाकार व्रत। सेंटर से गोलाकार वृत तुम आ गए
- 49:56सेंटर अभी बहुत दूर है वृत्त से थोड़ा सा तुम सपेर से नीचे उतरोगे
- 50:05वहाँ शुरू होता है बहुत कुछ क्या। ईश्वर की आवाज तुम्हें सुनाई
- 50:10पड़ेगी ये करो वो करो, ये न करो वो न करो तुमने अक्सर ये आवाज
- 50:16सुनी होगी अपने जीवन के अपराध के क्षणों से पहले तुम्हारी आत्मा
- 50:22बोली होगी मत करो ये तुमने नहीं बात मानी होगी तो उसके ऊपर धूल जम
- 50:27गई। धीरे धीरे उसकी आवाज़ तुम्हें
- 50:29सुन्नी बंद हो गई, तुम्हारे कान खोले लेकिन उसकी आवाज बंद जैसे
- 50:35हीरे पर आपने कीचड़ चढ़ा दिया हो। ऐसा हुआ वहाँ परमात्मा के आदेश
- 50:42सुनाई पड़ेंगे। तुम्हें एक तो ये भी होगा।
- 50:47जहाँ बाबा कहते हैं जीब फरमाए तिब्बती बप्पा जीस ए लिखे तिसरना
- 50:55जो लिख रहा है उसके सिर की ये कार्ड नहीं यह जैसे वो वृहद
- 51:03फुरमाता है वैसे वैसे। ये यंत्र लिखता चला जाता है।
- 51:09बाबा बहुत समझदार है, ज़रा देखो तुम्हारी हैसियत क्या है?
- 51:17औकात क्या है तुम्हारी जिसके लिए सब कुछ संभव है करना।
- 51:25उसके लिए मृत्यु को रोकना असंभव हो जाता है।
- 51:30और इतने चाँद तारे इतने आवारा घूमते हुए ये पृथ्वी से बड़े बड़े
- 51:38एस्टर किसने बनाए? बस?
- 51:43तुम्हारे पास रटा रटाया एक जवाब है।
- 51:48या तो कहोगे खुद बन गए या कहोगे परमात्मा ने बनाई तुम रटा रटाया
- 51:56जवाब जैसे तुम अपने तक जाने में तुमसे पूछा तुम कौन तुम कहोगे?
- 52:05क्या सच में तुम आत्मा जान के बोल रहे हो या बेहोशी में बोल रहे हो?
- 52:14बेहोशी में बोल रहे हो? माँ के सब बेहोशी में बोलता
- 52:18परमात्मा नहीं है। तुम बेहोशी में जाते मंदिरों
- 52:22मस्ज़िदों में गुरुद्वारों में माथा टेकते बेहोशी में टेकते हो,
- 52:27अभी होश कहाँ गया? जीस दिन होश आ गया।
- 52:31उस दिन घर में ही मक्का है। उस दिन घर में ही गुरुद्वारा है,
- 52:37घर में ही मंदिर है। बात उसकी है बात आँखें खुलने की
- 52:44हैं, अभी बंद आँखें हैं बेहूशी के क्षणों में तुम सत्य और असत्य की
- 52:52पहचान नहीं कर पाती, अंधे को लाख चेष्टा करो।
- 53:00कि सफेद रंग होता कैसे है? वो कहेगा नहीं मैं जानता हूँ सफेद
- 53:06रंग कैसा होता है। उसे लाख समझाओ, लेकिन उसने तो
- 53:11अंधकार देखा। उसने तो अंधकार की।
- 53:17ज्योति रहित अवस्था दिखी। वह क्या जाने शुभ रंग ज्योति का
- 53:26वह नहीं जानता, लेकिन फिर भी कहेगा मैं जानता हूँ ऐसे ही तुमन
- 53:31देवो। तुम्हें नहीं पता यह किसने बनाया?
- 53:39प्रकृति स्वयं बनी या कोई सयाभम है जिसने जीस परमात्मा ने जिसे
- 53:47कतार कहते बाबा उसने बनाया तुम इसी ऊहापोह में।
- 53:53दर्शनशास्त्र में जखाई मारते मारते विदा हो जाते हो।
- 53:57अगले जन्म में फिर यही मग्जखबाई वो नहीं मिलता जिसके मिलने से सब
- 54:04वास में इच्छाएं, प्रश्न गिर जाते हैं।
- 54:09उनका हल मिल जाता है। और जब तक वो न मिलेगा तब तक तुम
- 54:16ऐसे ही भटकते रहोगे जितनी चेतना की उचाई तुमने छूटी उतनी चेतना की
- 54:24उचाई तुमसे कोई छीन नहीं सकता ये जो लोग कहते हैं कि पिछले जन्म के
- 54:30कर्म कोई वैर। कोई नौकर, कोई दास, कोई गरीब, कोई
- 54:40अन्य पशु, कोई गधा बनके चुका रहा है।
- 54:47पशु आपस में बातें करते हैं। कहानियों बनाने में ये दक्ष हैं,
- 54:53ऐसी कहानियों आपको हज़ारों मिल जाएंगी।
- 54:56पिछले जन्म में किसी ने पाप किया था तो इस जन्म में ये घोड़े खा
- 55:03रहा है। गदा पन का ऐसा कभी नहीं होता।
- 55:07जिसने दसवीं कक्षा पास कर ली, वह कभी प्रथम क्लास में नहीं बैठेगा,
- 55:14उसे प्रकृति ही नहीं बैठने देगी। उसे टीचर ही कहेगा तुम पढ़ तो गए
- 55:18निकलो, बाहर प्रकृति ही नहीं बैठने देगी उसे इसलिए इन बूढ़ों
- 55:25के पीछे न लगो। जिसमें जितनी चेतना आ गई,
- 55:31परमात्मा मूर्ख नहीं है। इतनी सृजना को बनाने वाला जिसने
- 55:35तुम्हें मानव शरीर दे दिया, मानव शरीर तो मिला कि तुम मानव शरीर की
- 55:41चेतना की ऊंचाइयों को पकड़ गए? और तुम, उसके बाद मानव शरीर के
- 55:48बाद तुम किसी और यूनी में न जा सकोगे।
- 55:53हालांकि पिछले जन्म बताने वाले बड़े से ज्ञानी परमात्मा तुम्हें
- 55:58बहुत मिल जाएंगे। बहुत से धर्मों में आज इनका
- 56:03बोलबाला है, लेकिन झूठ है सब। जिसने देखा वो चुप हो गया, वो
- 56:10जानता है थोड़ी सी हवा मैं थोड़ी सी हवा तुम तक पहुंचा दूँ जैसे आग
- 56:18गर्म हो, प्रेशर कुकर के भीतर और थोड़ी सी भाप।
- 56:26निकल जाए और वो तुम्हें कुछ अंदेशा दे जाए।
- 56:31ऐसे ही तुम्हें बता दूँ जिसने एमए कर ली, पीएचडी कर ली, वो प्रथम
- 56:37कक्षा में क्यों जाएगा? नहीं जाएगा वो?
- 56:43ये व्यक्त की बातें हैं तुम्हें बहकाने के लिए, तुम्हें ललचाने के
- 56:47लिए, तुम्हें लोभ में फंसाने के लिए, लेकिन एक बात याद रखना
- 56:53तुम्हें लोभ में फंसा के ये खुद ही फंसते हैं तुम तो फिर भी बच
- 56:59जाते हो, कबीर ने कहा धोखा खा लेना।
- 57:06धोखा देना और ये दुनिया को धोखा दे रहे हैं।
- 57:13ये परमात्मा के दरबार में कभी बख्शे नहीं जाएंगे।
- 57:17तुम बख्श दिए जाओगे, जो धोखा खा गए।
- 57:22श्रोता वक्श दिया जाएगा, श्रावक वक्श दिया जाएगा क्योंकि उसने
- 57:27धोखा खाया, संत नहीं बख्शा जाएगा क्यों?
- 57:32क्योंकि उसने धोखा दिया अगर कोई झूठा बनकर कृष्ण का नकाब उड़कर।
- 57:41कृष्ण की लीला खेलने लगे। जैसे हम रामलीला खेलते थे, आराम
- 57:45थोड़ी बन जाते थे, लीला खेलते थे और फिर अपना मेकअप किया पोंछ
- 57:52डालते थे और घर में आराम से सो जाते थे।
- 57:58इस तरह का ईमानदार व्यक्ति ही उन तलों को छू पाता है।
- 58:03ईमानदारी के बिना और सत्य के बिना यह मुश्किल है।
- 58:09तो जंक्चर प्वाइंट संधि क्षेत्र वहाँ पहुँचकर टाइम ट्रैवेल क्या
- 58:17है? वहाँ तुम थोड़ा सा सोचो हल्का सा
- 58:22आपने सुना होगा स्वर्ग की व्यवस्था में कल्पवृक्ष का उदाहरण
- 58:28उसके नीचे बैठो सोचो मुझे पकवान चाहिए कौन सा चाहिए?
- 58:35कौन सी थाली में खाओगे? जनम तुम कहोगे, सोने की थाली में
- 58:40तुरंत हाजर हो जाएगा, बोलो क्या चाहिए?
- 58:43हलुआ चाहिए, रोटी चाहिए। मिस्सी चाहिए, पालक चाहिए।
- 58:48क्या चाहिए सब मिल जाएगा। इसी वक्त बस वह संधि क्षेत्र।
- 58:54वह जंक्चरपॉइंट ऐसा ही कल्पविक्षण है, जो सोचोगे वही मिलेगा, वहाँ
- 59:01जाकर मिलेगा। आज इस शब्द को भ्रमण के नाम से
- 59:06व्याख्यायित करने वाले लोभी, लालची।
- 59:17बहुत बैठे हैं उसका कारण महंगाई हो, बेरोजगारी हो या उनका खुद का
- 59:25आलस निठल्ला बन हो, वो काम नहीं करना चाहते जिनको चार बातों से
- 59:31खाना मिल जाए। और दुनिया अच्छी आछी बैठे दे जाए,
- 59:37उनको क्या जरूरत है काम करने की? हमारी हरियाणा में एक कहावत है
- 59:44कहता रे मूड क्यों मुंडा रखा, मुड़िया कहता मुड़िया कहता रे
- 59:50सुन। मूंड मडाए तीन गुण सिरकी मट जाए
- 59:56खाज खाज नहीं मूंड मडाए तीन गुण सिरकी मट जाए, खाज खाने को अच्छा
- 1:00:06मिला और लोग कहें महाराज। बुझे भी जाते हैं लड्डू गोपाल की
- 1:00:14तरह उसने क्या किया पता नहीं कहाँ कूड़े कबाड़े में पड़ा था, किसी
- 1:00:22ने बेचा होगा सक्रैप वो डाल लिया गया और लड्डू गोपाल जी बन गए।
- 1:00:28रंग रोगन कर दिया गया और लड्डू को पाल जी पूजने लगे।
- 1:00:33यही तुम्हारी व्यवस्था है उस पॉइंट पे जाके उस क्षेत्र में
- 1:00:37जाके छोटे छोटे इशारे करूँगा या तो वीडियो सारी सुननी शुरू कर दो
- 1:00:45या फिर मुझे ऐसा है कि ये सुनते ही नहीं।
- 1:00:49बेकार हो जाता है। बोला हुआ यद्यपि मुझे पता है बहुत
- 1:00:53से लोग प्रचुर मात्रा में लोग मेजोरिटी ऑफ थिस लिस्टनर ऑडिएंस
- 1:01:03वो दो दो बार भी सुनती है। चार चार बार भी सुनती है।
- 1:01:07लेकिन बहुत से लोग हैं जो स्किप कर देते हैं।
- 1:01:12कभी मेरी किसी बात से इनका थोपा हुआ भ्रम टूटा होगा।
- 1:01:19इन्होंने कहा ये तो संत है ही नहीं तो इन्होंने मुझे छोड़ दिया
- 1:01:25दूसरे के साथ। वहाँ छिपकर घर जाके पता नहीं, वह
- 1:01:31जानता भी है कि नहीं, लेकिन मुझे जरूर उसके पकड़ देंगे।
- 1:01:37पक्का मैं कहता हूँ भाई तुम मेरे चैनल को ही इसके पकड़ दो, ऐसी कोई
- 1:01:43व्यवस्था पूछ लो यूट्यूब वाले को। कि भाई इसका चैनल आए ही ना हमें
- 1:01:50दर्शन ही ना हो इस मफलर दारी है इतनी गर्म और देखो दिमाग ही खराब
- 1:01:58पापा ये गर्म मफलर है। है ना मस्ती हँसा पायो मानसरोवर।
- 1:02:27हमसफा, मानसरोवर ताल तलैया। क्यों दो ले मन मस्त हुआ?
- 1:02:49हाँ फिर क्यों बोले मन मस्त हुआ हाँ फिर क्यों वो?
- 1:03:02जिसने पा लिया हो चुका हो गया। क्यों बोले?
- 1:03:07हीरा पायो गांठ गठियायो बार बार। हवा को क्यों खोल मन मस्त हाँ फिर
- 1:03:27क्यों बोल मन मस्त हाँ फिर क्यों बोल?
- 1:03:39जरूरत क्या है? और अलेक्जैन कोप की छोटी सी कहानी
- 1:03:46पूरी करके मैं इस संवाद पे आऊंगा, ये तो तुम समझ ही गए होगे।
- 1:03:54सारी शक्ति को एकत्र करके अपने ब्रेन से नीचे ले जाओ, भावनाओं से
- 1:04:00दूर और फिर अपने उस पॉइंट पे चले जाओ जहाँ तुम्हें आत्म बहुत हो
- 1:04:06जाए उससे आगे परमात्मा की यात्रा फिर तुम वो होता है शून्यवाद।
- 1:04:12जहाँ तुम अद्वैत भी न रहा हो क्योंकि अद्वैत में भी थोड़ी सी
- 1:04:18झाईं पड़ती है कि वह दो नहीं है, बस थोड़ी सी झाईं दो नहीं है।
- 1:04:24कहने की जरूरत क्या हुई संख्या को बीच में लेकर क्यों आए?
- 1:04:30दो नहीं है। थोड़ा सा शक पैदा होता है जहाँ दो
- 1:04:38नहीं है, अद्वैत भी खत्म होता है। इससे आगे एक प्वाइंट है जिसे
- 1:04:45रहस्य कहते हैं कृष्ण। वो आता है नागार्जुन का शून्य
- 1:04:50वाद। नागार्जुन वहाँ पहुँच के शून्य
- 1:04:55वाद मुकृति जियो अद्वैत भी नहीं बचता बहू वाद तो बचता ही नहीं।
- 1:05:04एकत्ववाद भी नहीं बजता, अद्वैतवाद भी नहीं बजता और रह जाता है
- 1:05:11शून्यवाद शून्य, अब शून्य का कोई अस्तित्व होता ही नहीं।
- 1:05:19शून्यवाद नागार्जुन का कुल मिला के थीम रूप में रस रूप में यह है
- 1:05:28खुद के ज्ञान से बाद जो घटना परमात्मा की यात्रा में तब्दील
- 1:05:34होती है और वो जहाँ पहुंचता है वो है शून्यवाद।
- 1:05:38तुम नहीं रहते मैंने कल जिसका जिक्र किया कि आखिर में जाके पता
- 1:05:43चलता और बड़ा क्रांतिकारी हो। बहुत से लोग रोए।
- 1:05:49बाबा ये दिन भी दिखाना था वो सोने वाले।
- 1:05:59और ईश्वर करें तुम बहुत दिन देख लो इस शून्य बाद में इतने झरने
- 1:06:07बहते हैं रसीले तुम्हारे सब ब्रेन्ड फैल हो जाते हैं
- 1:06:13बिस्कियों के। शराबों के सब फेल हो जाते हैं।
- 1:06:22इतनी मस्ती, इतनी झमाझम बारिश तुम नहला देते हो, अपने आप को प्राणों
- 1:06:30के भीतर से रोवा रोवा तुम्हारा नहा जाता है।
- 1:06:35उस क्षण में बाबा नानक कहते हैं कि गंगा स्नान करके मैं क्या
- 1:06:40करूँ? तीर्थ नामा जयति स्वभाव है मैं उस
- 1:06:49तीर्थ में नहा लिया। जब उसकी इच्छा हुई उसकी इच्छा के
- 1:06:58बिना अपने भीतर के तीर्थ में ये स्नान होता है और मैं वो तीर्थ
- 1:07:03नहा लिया। मैं क्यों तीर्थों पे बाहर के
- 1:07:06तीर्थों पे क्यों भड़कूं? ताल तलैया क्यों ढोल लें मन मस्त
- 1:07:13हुआ फिर क्यों बोलें नहा लिया उसमें तो फिर तीर तुम्हें क्या जग
- 1:07:24मरू हजपे क्या जग मरू जाके? मैं शुद्ध बुध हो गया, सारा मैल
- 1:07:32उतर गया, निर्मल हो गया और जब निर्मल हो जाता है व्यक्ति तो
- 1:07:37कबीर कहते हैं कबीरा मन निर्मल भयो, जू गंगा को नीर।
- 1:07:44पाछे पाछे हरि फरण। कहत कबीर कबीर अब तक तुम परमात्मा
- 1:07:49को बुलाते थे वह गुरु ओह गॉड अल्लाह के अखबार हेरान अपनी अपनी
- 1:08:00भाषाओं में। अब अल्लाह राम कहते हैं, भाईगुरु
- 1:08:05कहते हैं, अरे कबीर बात तो सुन कबीर कितना फर्क पड़ गया?
- 1:08:13कैसे फर्क पड़ा कबीरा मन निर्मल भय निर्मल होने का यह पर्व न?
- 1:08:21जो गंगा को नीर, कोई मैल न बचा 5656 हरी फिर कहत कबीर कबीर इस
- 1:08:29शून्य बात को तुम समझे आइए हम थोड़ा लौटते हैं अलेक्जैंडर की
- 1:08:34तरफ जनवरी का महीना तीन तारीख। अचानक तबियत बिगड़ी, दर्द घना हो
- 1:08:44गया। किसी एनल जैसिक से उस वक्त जो भी
- 1:08:49मइया थे, दर्द नहीं घटने का नाम नहीं ले रहा था और बढ़क तड़पे और
- 1:08:58जनवरी से लेके। मई के आखिर तक 30 मई की सुबह उनकी
- 1:09:06तबियत बहुत खराब थी। उनके ऐंठ बुधबजाए उनके होंठों से
- 1:09:21स्वर निकला। धीमा धीमा।
- 1:09:24एम डाइंग एम डाइंगसर ओफेहंडर गुड सिम्पटम्स सैकड़ों प्रकार की शुभ
- 1:09:40शकुनों के साथ, मैं मर रहा हूँ। सैकड़ों प्रकार की शुभ शकुन क्या
- 1:09:48होता है? शकुन जिसे हम कहते हैं कौआ बोल के
- 1:09:52आ शकुन बिल्ली काट गई। रस्ता शकुन कुत्ता रोया।
- 1:10:03इस भीतरी शकुन अलग होते हैं। बाहरी शकुन अलग होते हैं।
- 1:10:08भीतरी शकुन क्या होते हैं? इन्होंने कहा शुभ शकुन आई ऍम
- 1:10:13डाइंग आई ऍम डाइंग सर ऑफ ए 100 गुड सिम्पटम्स।
- 1:10:20सैकड़ों अच्छे शुभ संकुओ के को दर्शन कर के मर रहा है, क्या है
- 1:10:27वो शुभ? सुखुम इतने दर्द में भी आनंद
- 1:10:31उतरा, घोर आनंद उतरा। और अनजाने में कहीं कहीं गई वो
- 1:10:39कविता 12 साल की उम्र में साक्षात हो गई।
- 1:10:46वही शब्द आज बोले इतने सुंदर शकुन हो रहे हैं और आनंद से बढ़िया शुभ
- 1:10:52शकुन और क्या हो सकता है चारों तरफ?
- 1:10:56घुंघरू बज रहे हैं। आनंद के बाबा कहते हैं कहते राग
- 1:11:04परी श्यों कैयण कहते वाबण आर्य कितने गाने वाले हैं?
- 1:11:18कितने नृत्य करने वाले, कितने संगीत, वाद्य यंत्र बजाने वाले,
- 1:11:27कितनी आवाज़ें मिठासों से भरी हैं रस्यपूर्ण आवाज़ ये मुग्ध कर देती
- 1:11:33है। ये शुभ सकुन है चारों तरफ आनंद का
- 1:11:41फैलाव, रसीली हवाएं खिलते हुए गुलशन और उन गुलशनों को महकाइत
- 1:11:50करते हुए भगवा ऐसे मंत्र मुग्ध हो खड़े।
- 1:11:56के अलेक्जैंडर पोप कहते हैं, एम डाइंग सर विथ ए हन्डर ऑफ़ गुड
- 1:12:06सिम्पटम्स सैकड़ों शगनों के साथ, मैं मर रहा मैं मर रहा।
- 1:12:17जिसे मैं समझा मैंने वह मर रहा है।
- 1:12:24वह एनलाइटनमेंट का दिन था। 30 मई सुबह सुबह ऐसी प्रभात वेला
- 1:12:33निकली। दे गॉट अनलाइजेंट फिर वो रुकेगी
- 1:12:40और भोग भी बहुत लिया तिक्षण भीषण में दर्द कराहते रहे, कर्मठ न बदल
- 1:12:49सकते थे। यह रीढ़ की हड्डी की बिमारी ही
- 1:12:53ऐसी होती। थोड़ा करवट बदलोगी घूम जायेगा
- 1:12:58सारा संसार सर्वाइकल, जिसे कहते हो तुम और भीतर के उस देही को।
- 1:13:123-5 घंटे का वक्त लगता है। अपना सारा सामान जो इधर उधर बिखरा
- 1:13:18पड़ा है इकट्ठा करने को जैसे हम घर छोड़ते हैं, सब कुछ ए गली कोने
- 1:13:27आले सब खंगाल देते हैं। इसमें कुछ रहते नहीं गया।
- 1:13:31सब दुब के सब देख लेते हैं कोई छत पे न कुछ पड़ा हो, कोई सीढ़ियों
- 1:13:40में न हो, कुछ इधर न हो, कुछ उधर न हो सब कंगाल लेते हैं, बस अब हम
- 1:13:46कुछ दिनों के लिए नहीं जा रहे। हम श्रद्धा के लिए जा रहे हैं।
- 1:13:52तो उसे इकट्ठा करने की कवायद में 3-5 घंटे लग जाते हैं।
- 1:13:59बाहर से तुम्हें लगेगा हंसा उड़ गया, लेकिन हंसा अभी है बेहतर
- 1:14:07किसी को तीन घंटा लगता है। किसी को पांच घंटा लगता है बस ये
- 1:14:11ड्यूरेशैन है कम से कम और ज्यादा से ज्यादा इतनी देर में वो अपना
- 1:14:17सारा कुछ समृतियाँ वासनयें सब इकट्ठा कर लेता है जो जो उसे लगता
- 1:14:25है प्रकृति भुगतवाएगी मुझे। और वो जान गया कि मुझे अब भुगतना
- 1:14:31पड़ेगा। सारा सामान सब स्मृतियों को साथ
- 1:14:36लेके अपना वो सुपर सेंसिटिव कंप्यूटर लेके चल पड़ता है वो
- 1:14:41देही और संग संग चलती है वो चेतना की बोध।
- 1:14:47जिसे मैंने कहा जिसे मिलना है अंतिम समुद्र में, बौद्ध सामान्य
- 1:14:54समुद्र में और वो सब इकठ्ठा होकर निकल जाते हैं।
- 1:14:58सहस्त्रस ऐसे ही निकल गए अलेक्जैंडर पोप।
- 1:15:06उस दिन उनकी वो 12 वर्ष की उम्र में लिखी हुई कविता सारा संसार
- 1:15:13सारा अस्तित्व बगा रहा था लेट मी लिव उनसीन अननोन एंड अनलीमेंटेड
- 1:15:20लेट मी डार स्टिल फ्रॉम दी वर्ल्ड एंड नॉट ए स्टोन टिल व्हेर आई
- 1:15:25लाइ। पता न लगे मैं कहाँ हूँ?
- 1:15:29उन्होंने कहा मुझे दफन करना ऐसा ऐसा दफन करना, ये किसी को पता न
- 1:15:37लगे मैं यहाँ दफन, ये थी उनकी अंतिम वसीयत।
- 1:15:48सेंटर पोप ने कहा, उसके अंतिम शब्द देर इस ए नथिंग दट इस
- 1:15:54मेरिटोरियस बट वर्चू एंड फ्रेन्ड्शिप ऐसा कुछ भी मूल्यवान
- 1:16:01नहीं है जो मैं ले के चला हूँ। लेकिन मित्रता और करुणा वर्चू एंड
- 1:16:13फ्रेन्ड्शिप इन्हें लेकर जा रहा हूँ।
- 1:16:15संघ ये वो उदघोष था जैसे कोई जाता हुआ संत अपने अंत से।
- 1:16:29एक ऐसा संदेश जिसमें भरा पड़ा अस्तित्व के प्रति आशीर्वाद हो,
- 1:16:36वह बिखेर के चला हो। उसके अंतिम शब्द इस बात का प्रमाण
- 1:16:41देते हैं देर इज़ नथिंग। दट।
- 1:16:45इस मेरी टॉरियस बट वर्चू एंड फ्रेन्ड्शिप यही साथ लेके जा रहा
- 1:16:54हूँ और कुछ भी यहाँ मूल्यवान है ही नहीं।
- 1:16:58क्या ले जाऊं और वो चला गया? छोटी सी उम्र में कोई बहुत ज्यादा
- 1:17:11उम्र होती है। शायद मुझे लगता है 56 साल की उम्र
- 1:17:19रही होगी। ऐसा शानदार व्यक्तित्व हो।
- 1:17:26जीस से घड़ी एनलाइटन हुआ, उसी वक्त प्राण छोड़ने को आतुर।
- 1:17:36ऐसे एक उदाहरण मैंने आपको दे दिया और भी उदाहरण दूंगा अगर आप कहो के
- 1:17:41तो। वो जान गए थे उस रहस्य को कि
- 1:17:51प्रकृति और परमात्मा के दो हैं। कहते थे प्रकृति परमात्मा की
- 1:18:00अभिव्यक्ति है। जैसे दर्पण और तुम अलग अलग होते
- 1:18:05हो और दर्पण तुम्हें अभिव्यक्त करता है।
- 1:18:10तुम्हारी रूह रूह दिखाता है तुम कैसे हो प्रकृति परमात्मा का।
- 1:18:21अभी व्यक्त रूप है दो दो हैं, एक नहीं है, लेकिन आखिर में ये दोनों
- 1:18:31मिल जाते हैं। अभी व्यक्ति होती है संसार में ये
- 1:18:35जो दिख रहा है ये संसार है। ये उसका अभिव्यक्त रूप है जो
- 1:18:43दिखता है और परमात्मा इस प्रकृति का वो रूप है जो दिखता नहीं है,
- 1:18:51जो अभिव्यक्त नहीं होता जो छुपा हुआ है दट।
- 1:18:54इस कार्ड सीक्रेट बस यही फर्क है सीक्रेट में।
- 1:18:59और अभिव्यक्ति में यही फर्क है। संसार में और परमात्मा में शांति
- 1:19:08से मरे प्रसिद्धि से नहीं मरे, यही उन्होंने अभिव्यक्त किया था।
- 1:19:1512 वर्ष की उम्र में ऐसे होते हैं।
- 1:19:19सच्चे संग श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारी हिनाथ नारायण।
- 1:19:41ण वासुदेव, श्री कृष्ण गोविंद, हरे मुरारी हे नाथ नारा।
- 1:20:16हेनाथ नारायण वासुदेव श्री कृष्ण गोविंद हरे मरा री हेनाथ नारायण।
- 1:20:35वासुदेव वा श्री कृष्ण गोविंद हारे मुरा हरी हे नाथ नारायण
- 1:20:49वासुदेव वा। हेतुमात स्वामी सखा हमारे हेनाथ
- 1:20:58नारा एन वासुदेव श्री कृष्ण गोबिंद हरे मुरारी हे नाथ?
- 1:21:10नारा या न वासु देव हो। धन्यवाद।