Latest / Baba ji Vijay Vats / 25 Aug 25 - अचेतन और दशम द्वार की शक्ति! जब आपको सुनते हैं तो रोना क्यों आ जाता है?
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- 0:01प्रणाम बाबा जी अनुपमा जब आप बोलना शुरू करते हैं सतत् क्षण ही
- 0:22मेरी आँखों से। आंसू बहना शुरू हो जाते हैं।
- 0:27झर झर ये क्या है? बाबा क्यों होता है?
- 0:46कुछ गुम गया है तुम्हारा बहुत साल पहले जन्मो जन्मो, पहले कुछ
- 1:02वेलगाम हुआ था। जैसे ही मैं उड़ता हूँ कहीं ना
- 1:17कहीं से उसकी पगार तुम्हे घेर लेती।
- 1:19है। और तुम अपने अंतश में खिसकना शुरू
- 1:26हो जाती। हो?
- 1:34तुम्हें पता भी नहीं होता कि ऐसा क्यों होता है?
- 1:42लेकिन रो लिया करो, इसको रोकना मत।
- 1:54ये आंसू मूतियों से कम नहीं है तुझ से लिपट के जो रो लेते हम
- 2:07आंसू नहीं थे ये मूत से कह। जैसे ही मैंने बोला तुम्हे कुछ
- 2:19याद आया उसकी याद आई जो कभी बिछड़ के आते।
- 2:34जैसे किसी प्रेम या प्रेमिका को अपना पहला पहला प्यार याद आया, वो
- 2:45दिल को थाम लेता। है।
- 2:50पहला प्यार भुलाए नहीं जाता। ये प्यार पहला है कब का गुम हुआ
- 3:01है तुम इसे ढूंढ रहा है? जन्मो जन्म बीत गए, लेकिन वो मिला
- 3:06नहीं। जैसे ही मैं बोलता हूँ तुम्हे
- 3:14तक्षशण ये आवाज़ जानी पहचानी रखती है क्योंकि इन शब्दों के साथ लेबड
- 3:20के जो आता है वो वही है जो तुमने चाहा है, तुम इंतजार कर ही रहे
- 3:29थे। बरसों बीत गए वो ना आया।
- 3:44रुला के गया। सपना तेरा रुला के गया सपना तेरा
- 4:04बैठी हूँ। कब हो सवेरा बैठी हूँ कब हो
- 4:19सवेरा? रुला के गया सपना तेरा ये सपना
- 4:34रुला जाता है। तुम्हें।
- 4:40सदा से तुम इसके इंतजार में हो। जब ये मिलता नहीं तो तुम और काम
- 4:47धाम में लग जाते हो। बीज़ी कर लेते।
- 4:49हो अपने आप को। यद्यपि कोई दूर न था कोई कहाँ गया
- 4:57नहीं था कभी तुमसे दूर हुआ नहीं तुम्हारे संग संग चल रहा है।
- 5:07लेकिन नहीं जाने क्यों तुम ऐसे भूल गया हो।
- 5:15स्मरण हो गया है मेरे बोलते ही हल्की सी खनक।
- 5:23तुम्हारे हृदय को छनकाती है और आंसू आँखों से बहने शुरू हो जाते।
- 5:32हैं, बस उसकी याद आई है। वो इतना मीठा, इतना प्यारा।
- 5:47कौन नहीं चाहेगा उसमें डूब जाना है कौन नहीं चाहेगा उससे दूर जाना
- 5:57जो तुम्हे रोज़ रुलाता। है।
- 6:01संसार। तुम उससे दूर जाना चाहते हो,
- 6:08लेकिन मकड़ी की तरह अपने ही बने जलेबी तुम उलझ करो जब मैं बोलना
- 6:20शुरू करता हूँ। तुम्हारी वर्धा के वीणा के तार
- 6:26जंगकृत होते हैं, जैसे किसी ने हाथ फेर दिया हो और मौन संगीत की
- 6:39स्वर लहरी तुम्हारा रोम रोम कंपनमान कर देती।
- 6:46है। और तुम एक प्रकार का आनंद मिश्रित
- 6:55उल्लास पालित तुम्हारा अंतस कहता है, हाँ, यही चाहत हमने।
- 7:07इसी को हितों पुकार रहा था। इसी के हितों आरजू थे।
- 7:16इसी का हितों इंतजार था। जैसे कृष्ण ने पोंगरी।
- 7:25अपने लबों पे रख लियो और मुरली की धन का संगीत तुम्हें सुनाई पढ़ना
- 7:34शुरू हो गया कि तुम तो खिचोगे ही खिचोगे पशु भी खिचोगे।
- 7:47कृष्ण जब मस्त हो के वृक्ष के ऊपर बैठ के वंशरी बजाते हैं तो वह गाय
- 7:53भी जाते। हैं।
- 7:54पशु पक्षी क्योंकि पशु पशुओं में भी तो चेतना होती।
- 7:59है। थोड़ी कम होती।
- 8:00है। आज नहीं, कल।
- 8:05वो भी मानस के जामे में आ जाएंगे ये पुकार उन्हें भी खींच दी है ये
- 8:13आवाज़ उन्हें भी बुलाती है तो मोर भी नाचेंगे, गाय भी आएंगी।
- 8:24पशु भी आएँगे। पंछी भी आएँगे हवाएं ठहर जाएंगे,
- 8:31सुगंधिया ठहर जाएँगी, हृदय की धड़कन रुक जाएगी।
- 8:44यह रस ही ऐसा है, यह रस भगा नहीं सकता, यह रस तुम्हें रोकता है
- 8:52ठहरा सकता है। इसलिए शांत लाख कहे कि तुम ठहर
- 9:00जाओ, ठहर जाओ, लेकिन तुम ठहर नहीं पाते, क्योंकि ठहरने के लिए जो
- 9:07संगीत चाहिए वो लाएगा कौन कृष्ण बंसरी अपने लबों पर रख कर।
- 9:18मदर ध्वनि के तार छिड़िक। बस।
- 9:27यही कारण है इधर मैंने बोलना शुरू किया और ये शब्द।
- 9:36शब्दों से लिपटा हुआ है। शब्दों से चिपक के आया हुआ वो शहद
- 9:42तो तुम्हें रुला जाता। है।
- 9:49फिर तुम इंतजार करते हो, हाँ इसे ही तो चाहत।
- 9:54था। कितने जन्म बीत गए, क्या हुआ,
- 10:01क्यों रुक गयी, यात्रा कहाँ रुक गए, हम या तो उसकी बहुत आती है,
- 10:16लेकिन याद। जिसकी आती है वो नहीं आता, याद
- 10:24आती है और रुला की चली जाती। है।
- 10:31तुम्हारे पल्ले ये अश्क आते हैं ये भी कोई कम कीमती नहीं है।
- 10:40कहाँ गयो इकतान सुना। के।
- 10:46छुप गयो फिर एक बाण चला। के।
- 10:52मथुरा ढूंढी मैंने गोकुल। ढूंढा।
- 11:00ढूंढी सारी नगरिया इसलिए मैं तुम्हे कहता हूँ शब्दों से ज्यादा
- 11:08अडिकना मत। शब्दों से ज्यादा काम करता है यह
- 11:14रस गायन का। इसलिए बाबा नानक ने गाकर कहा जो
- 11:21कहा कृष्ण ने मुरलिया बजा के। तुम्हारे भीतर तुम्हारे हृदय को
- 11:31आंदोलित किया, मकसद था तुम्हें ठहरा देना।
- 11:37तुम दौड़ रहे जाओ हर पल हरकड़ी तुम्हारा मन कुछ ना कुछ।
- 11:42सोचता है गणित। लगाता रहता।
- 11:50मन का स्वभाव है और इस गणत से तुम ऊब गए हो।
- 11:59गणत बड़ा बोरिंग होता है, बुद्धि बड़ी बोरिंग है।
- 12:06काट छांट के अलावा बुद्धि को कुछ करने नहीं आता।
- 12:11ये हिसाब किताब में दक्ष है। बुद्धि इसीलिए है तो तुम
- 12:18बुद्धिमानो की बात ठीक तरह से समझ पकड़ सकते हो आचारों की बात में।
- 12:25सहजे ही समझा जाएगी क्यों? क्योंकि बिलकुल तुम्हारे ही तल पर
- 12:31खड़े हैं। बिलकुल ही तुम्हारी भाषा बोलते
- 12:37हैं, कहीं दूर देश से आया हुआ संगीत उनके भीतर गूंजता नहीं।
- 12:46ऐसे तुम पाओगे इन बुद्धिमान लोगों के आसपास कतार बड़ी लंबी होती है।
- 12:55रस शून्य होता। है।
- 13:00रस होता ही नहीं। मीरा के भीतर रस भी होता है,
- 13:11पुकार भी होती है। बेरहा भी होते।
- 13:13हैं। इसलिए तुम पाओगे जो जितनी बुद्धि
- 13:23बनने की बात करेगा, उसके उतने ही ज्यादा सुनने वाले होंगे क्योंकि
- 13:31सम तलीय है उसी तल पे वह उसी तल पे।
- 13:39गूंगे की भाषा गूंगे की माँ ही जानते तुम्हारी बुद्धि भी गूंगी
- 13:47तो मैं समझाने वाला भी गूंगा ना इसने गुड़ खाया ना तुमने गुड़।
- 13:53खाया। स्वादिष्ट, अभी पता नहीं।
- 13:57स्वाद तुमने भी चखा एंड हौ यू कैन डिमॅंड फॉर दट जिसका स्वाद का
- 14:10जसका तुम्हे लगा नहीं और जीसको लग जाता है तुम कहते हो मीरा की लाज
- 14:18चली गई मीरा ने शर्मो हाया त्याग। तुम्हें लिखेगा लेकिन शर्मोया
- 14:29रहती नहीं, उस विराट किया कि कैसे शर्म?
- 14:33है। उस विराट में तो डूबना।
- 14:37होता है। उस मस्ती को तो पीना होता है।
- 14:42उस मस्ती में तो विलीन होना होता है, वो एक लय है।
- 14:49और ऐसी लय ये वो नगमा है जो हर सास पे गय नहीं हो जाता।
- 14:59आने वाला युग बुद्धिमानों का युग है।
- 15:03जो युग चला गया वो संतो का युग था, ऋषियों का युग था, बड़े
- 15:12सुरीले थे, बड़े आनंद में झूठ थे। तुम ये मत सोचना तब बिजली नहीं
- 15:23थी, वह कैसे काम चलाते होंगे? तुमसे ज्यादा मज़े में काम चलाते
- 15:33तुम शरीर की परवाह करते हो। और तुम्हें एसी में बैठना अच्छा
- 15:39लगता है, लेकिन संत को शरीर की बर्बाद शरीर धूप में है, शरीर छाव
- 15:52में है, शरीर ठंडी हवाओं को झेल रहा है।
- 15:58लेकिन संत अपने भीतर खोद जाता। है।
- 16:04जहाँ आनंद का खजाना है, उस आनंद के खजाने से लबड़ की जो आवाज बाहर
- 16:14आती है। वो आवाज़ तुम्हें खींच लेती है और
- 16:21तुम ठहर जाते हो। बस सन्तों का यही अहसान तुम पे
- 16:26होता है, जिसकी आवाज को तुम जलते हुए सुनकर ठहर न जाओ।
- 16:35बस वो शर है वो आचार्य। है।
- 16:39वो संत नहीं है जिसकी आवाज तुम्हारे कानों में मिश्रिशी गोल
- 16:49दे तुम्हारे हृदय को कंपायमान कर दे।
- 16:56तुम्हारा रोम रोम जर नाटक खा जाए और तुम्हारा मन दौड़ना बंद कर दे,
- 17:03तुम ठहर जाओ ये लक्षण तो जर जर आंसू गिरेंगे।
- 17:17जैसे ही तुम ठहरे आँखों ने मोती बरसाने शुरू कर दिए है क्योंकि
- 17:26आनंद पीना शुरू और उसका पहला ऐसा की जितना पिए जाओगे।
- 17:35उतना आंसू अश्क बन के बाहर निकलने के इसकी फिक्र मत करना पड़ेगा।
- 17:45रो लेना तुम्हारे अचेतन में बड़ा कूड़ा।
- 17:49भरा हुआ है। और तुम्हें किसी ने कुछ कारण
- 17:58तुम्हें किसी ने प्यार नहीं दिया प्यार से भूखे भूखे तुम संसार में
- 18:09जहाँ भी देखते हो। कृष ही कृष दुख ही दुख मांगते नजर
- 18:20आते हैं। सभी तुमसे मांग रहा है।
- 18:23प्रेमी प्रेमिका से प्रेमिका प्रेमिका से आनंद मांग रहा है।
- 18:31वो जो उस लम्हे में आया था जब आँखें चार हुईं थीं वो ही दो
- 18:39लेकिन उसका तो न तुम्हें पता है न तुम्हारे प्रेमी प्रेमिका को पता
- 18:43है वह तो किन्हीं अज्ञात लम्हों में ऊपर से उतरा था।
- 18:48जब तुम मौन में थे, जब तुम चुप्पी में थे, तुम तो राधे राधे से
- 18:52फुर्सत ही नहीं खाते, तुम तो पांच नमो से फुर्सत ही नहीं खाते।
- 18:59तुम नॉन भी जीनियस में आते नहीं। वह तुम्हारे भीतर उतरता नहीं
- 19:03अन्यथा है तो वो सब जगह। वह सर्व व्यापक है, फिर भी उतरता
- 19:13क्यों नहीं क्योंकि तुम अच्छी तरह से ताला मोज लेते हो, तुम सारे
- 19:23द्वार दरवाजे बंद कर लेते हो? कि कोई सूरज की एक करण तुम्हारे
- 19:28भीतर आए ना तो कैसे प्रवेश करेगा वो आनंद तुम व्यस्त हो, सदा
- 19:35व्यस्त हो कभी दुकान में व्यस्त हो।
- 19:43कभी दुकान पे कमाए गए धर्म में व्यस्त हो और कभी दान कमारू उसकी
- 19:51पूजा में व्यस्त हो तुम्हें खालीपन कभी आया है, खालीपन होता
- 20:00क्या है? ये भी तुम जाना नहीं।
- 20:05धन्य वो क्षण जिन क्षणों में तुम्हारी आँखों से अश्क बरसते।
- 20:12हैं। ये अश्क तुम्हारे अचेतन को खाली
- 20:20करते हैं। जो विजातीय द्रव्य तुम्हारे अचेतन
- 20:28में छिपे पड़े हैं। आंसू बनकर बाहर निकलने गए इन्हें
- 20:32रोकने को बार बार सुनने, बार बार सुनना इसे।
- 20:41और तब तक सुनते ही चले जाना जब तक तुम्हारा अचेतन खाली ना हो फिर
- 20:49हकी आग जली तो ऐसी जली ये आंधी चली तो ऐसी चली कि तुम्हारा सारा
- 20:58अचेतन खाली करके। और यही मेरा प्रयास यही संत का
- 21:05प्रयास होता है कि कैसे तुम्हारा अचेतन खादी हो।
- 21:08जाए। तुम्हारा अचेतन इतना भरा है इतना
- 21:15भरा पड़ा। है।
- 21:18और यही बोझ है तुम पे ये सदा बोलता रहता है कभी देखना जब तुम
- 21:30चुप होते हो तो क्या चुप होते हो गौर से देखना।
- 21:38औंठ सी लिए लेकिन क्या आँठों को सीने से मन ने बोलना बंद कर दिया?
- 21:52नहीं, तुम पाओगे नहीं। किया।
- 21:57मन तो ज्यादा प्रगाढ़ता से बोलना शुरू हो गया तुम कहते हो वो रस
- 22:07मिलता नहीं, अगर तुम्हें नहीं मिलता तो संतों को सुन लिया करो
- 22:18अगर उसकी माँ की चाही। तो संत को सुनना।
- 22:26अगर बुद्धि की शार्पनेस चाहिए तो आचार्यों को और सर को सुनना इच्छा
- 22:34तुम्हें च्वाइस तुम्हें। संसार चुनना तो सारे लोगों को
- 22:42ढूंढ लेना अचारों से पूछ लेना कोई खुजलाह टूटी सिर में तो अचारों से
- 22:53पूछ लेना। एआई से पूछे ना लेकिन याद रखना
- 23:00एआई तो मैं रुला के नहीं जाएगा और रो लेना मन भर के रोना अच्छा है।
- 23:15शुभ। है।
- 23:19अगर तुम उस मुकाम पर पहुंचना चाहती जहाँ ये रस का सागर है तो
- 23:30मुकाम सही है, रस का सही है और देखिए।
- 23:38तीन चीजों की जरूरत। होती है।
- 23:44तुम्हारे भीतर प्याज हो, सबसे पहले बताने वाला सही हो।
- 23:55तुम्हारे भीतर प्यास हो, उस अज्ञात की धन की नहीं, कारोबार की
- 24:06नहीं, सम्मान की नहीं, औरदों की नहीं।
- 24:15सूचनाओं की नहीं उस रस की जो तुमने आज तक जाना है, जो आज तक
- 24:23अज्ञात बना हुआ है। आइस्टीन ने कहा, वह अज्ञात भी
- 24:30नहीं है, अज्ञा भी है। बिलकुल ठीक कहा इस नॉट ओनली
- 24:40अन्नोन बट ऑल्सो अननोन एवर। वह सिर्फ अज्ञात ही नहीं है।
- 24:50कि हमने अब तक खोजा नहीं, फिर खोज लेंगे।
- 24:53कल बट आइंस्टाइन कहते हैं कभी खोज नहीं पाओगे।
- 24:56ही ऑल्सो अननोन एबल कभी जान नहीं सकोगे लेकिन बेचारा आइंस्टाइन
- 25:05भौतिक शास्त्र का था, संत नहीं। संत तुम्हें कहता है वह अननोनबल
- 25:15नहीं है, उसको पिया जा सकता। है।
- 25:27तो बताने वाला हो संत जिसने पिया है।
- 25:34और पिता ही चला गया कि एक बार काफी नाम खुमारी नाम था ऐसी खुमार
- 25:44चढ़ी उस नाम के चढ़ी रहे दिन रात। जिनमें नशे जहाँ दे उतर जान पर
- 25:53बात बाकी दुनिया के सब नशे सुबह सुबह उतर जाते हैं दो 4 घंटे के।
- 26:11लेकिन ये नशा ऐसा एक बार भी लिया तो फिर पीते ही चले।
- 26:19जाओगे? फिर तुम्हें नहीं पता चलेगा ये
- 26:22स्वराइयां भर भर के कहाँ से आ रही हैं।
- 26:26कहाँ से ये जाम आ रहे हैं? कहाँ से छलक जाते हैं ये जाम तुम
- 26:33तो पीते ही चले जाना वो खजाना कभी खाली नहीं होता।
- 26:41बड़े बड़े सम्राटों के खजाने खाली हो जाते हैं।
- 26:44और परम सम्राट का खजाना कभी खाली नहीं होता।
- 26:54रो लेना मैं चाहता हूँ कि तुम रहो मैं चाहता हूँ कि तुम्हारा अचेतन
- 27:05अश्क बनकर चेतन से बाहर निकल जाए। वातावरण।
- 27:10और तुम्हारा अंतस खाली होता है, उस पल का इंतजार है मुझे
- 27:27किसी नजर को तेरा इंतजार आज भी है।
- 27:34सच पूछो तो तुम्हें हर वक्त उसी का इंतजार है।
- 27:40और न जाना कहाँ खो गया। तुम अपने आपको अकेला महसूस करते
- 27:49हो, नीरस महसूस करते हो, बोरिंग महसूस करते हो।
- 27:57कहाँ खो गया, कैसे खो गया? तुम न जाने किस जहाँ न खो गए।
- 28:22तुम न जाने किस जहाँ मैं खो गए, हम भारी महफिल में तनह हो गए।
- 28:41तुम न जाने किस जहाँ में खो गए, आ महफिल में तनहा हो गए।
- 29:01तुम ना जाने। सब है तुम्हारे पास बड़ी महफिल
- 29:06है, जाम है, सुराही है, पीने वाले है, महफिल जमी है, लेकिन वो नहीं
- 29:15जिसका इंतजार। तुम बड़ी कोशिश करते हो महफिल बरी
- 29:24पूरी है संडे साथी सब पास बैठे सब हैं जो संसार में होता है, लेकिन
- 29:35एक चीज़ है जो नहीं है। बस उसी की याद दिलाने संत अति
- 29:52धर्म संस्थापना अर्थाई शंभवामी युग युग इस प्यार के संगीत की याद
- 30:03दिलाने के लिए तुम्हें युग युग में प्रकट होता है।
- 30:08अलग अलग रूप में प्रकट होता है लेकिन होता है ऐसा कोई मुकाम नहीं
- 30:17होता। ऐसा कोई वक्त नहीं होता जब एक भी
- 30:22शांत इससे सरजना में रहे ना। उसकी सृजना बड़ी प्यारी है, एक
- 30:30चला जाता है, दूसरा तैयार हो रहा होता है और जैसे ही हो गया मैं
- 30:41चला जाऊंगा। कोई और आ जाएगा, वे किसी और को
- 30:48कहेगा चलो तुम बोलो, क्योंकि इन भ्रमित लोगों का भ्रम टूटेगा।
- 30:56नहीं कितना ही सुनें जो। लेकिन श्रद्धा विश्वास बाबा ये
- 31:09कैसे होता है? परमात्मा ने सृष्टि कैसे बना दी?
- 31:14अब इसका कोई जवाब? है।
- 31:18जैसे सृष्टि की संग रचना हो गयी, वैसे अंगूठा लगाने से तो मुक्त हो
- 31:22जाओ। इसका भी कोई तर्क होता है?
- 31:28लेकिन मन है कि मानता नहीं। वो जुदा क्या हुआ है?
- 31:43जिंदगी खो गयी। वो जुदा क्या हुआ है?
- 31:54ज़िन्दगी हो गई, शम्मा चलती रही रौशनी।
- 32:06खो गई। बहुत कोशिशों हैं कि।
- 32:14धन कमाया, पदवी कमाई, सूचनाएं कमाई सर बने आचार्य बने।
- 32:27महफिलें जमाईं सब साजो सामग्री गठी की धन के अंबार लगा दी।
- 32:38बहुत कोशिशों की मगर दिल ना। महला दिल नहीं मिलता, कई साजि
- 32:54छेड़े कई गीत गाये। और जब याद आए बहुत ही याद आया घमे
- 33:17ज़िन्दगी के। अंधेरे में हम ने चिरागए मोहब्बत
- 33:33जलाये बजाए। जैसे ही मैं बोलता हूँ तुम्हे याद
- 33:45आता है तार से तार बढ़ जाती है, हाँ यही है यही तो खोया था इसी का
- 33:52तो इंतजार है किसी नजर को तेरा इंतजार आज भी।
- 33:58है। तुम्हें आहटें मिल जाती है उसके
- 34:07और तुम्हारे भीतर का हृदय अच्छा लगता है रोम रोम खड़े हो जाते
- 34:13हैं, पुकार उठती है और उस परम आनंद के संगीत के साथ।
- 34:23तुम रिलैक्सेशन महसूस करते हो उससे रिलैक्सेशन के कारण तुम्हारे
- 34:29अशोक निकलता है, सुकून मिलता है, तुम देखना कभी अचानक तुम्हारे ऊपर
- 34:36बहुत बोझ। हो?
- 34:39और कोई ऐसी खबर मिल जाए कि वो बोझ उतर गया?
- 34:44तुम रिलैक्स हुए वेटलेसनेस में आके भार मुक्त हुए तो तुम पाओगे
- 34:55तुम कहा तुम्हारी आँखों में आंसू। यह रिलैक्सेशन का प्रतीक जैसे ही
- 35:05तुम इन व्याधियों से मुक्त हुए, उस परम संगीत के साथ तुम एक आद्र
- 35:14हुए। आँखें बरसना शुरू कर देंगे।
- 35:22आँखें जानती है कब बरसना है अब तुम पूछती हो बेटा क्या होता है,
- 35:33क्यों होता है उसकी ज़्यादा? जो कभी खोया था आज भी खोया हुआ
- 35:44है, लेकिन उसे खोने खोने में कोई आ गया, कोई कृष्ण आ गया, कोई
- 35:53मुरली की धुन सुना गया। और सुमेरली की धुन ने ऐसा चिढ़ा
- 35:59संगीत के हृदय खिल गया और उस खिलावट में ऐसा खिला संगीत की
- 36:09आँखें भर बस छलक ही नहीं लगीं। तुमने बड़े जुगाड़ बैठाए थे ये
- 36:20कमा लिया वो कमा लिया ये कमा लिया शायद इसकी कमी ना हो, शायद उसकी
- 36:24कमी ना हो। लेकिन सब इकट्ठा कर कर के वो तुम
- 36:30हार गए। और तार उससे न जुड़े।
- 36:38तार जुड़ेगी, तार जुड़ेगी जहाँ बोलने वाला वहाँ पहुँच गया।
- 36:50जहाँ पर वो पावर प्लांट बैठा है जहाँ आनंद का सागर है, वहाँ गोता
- 36:56लगाया और बाहर आया तो तुम्हें अजीब सी स्वगंध आएगी जब वो
- 37:02बोलेंगे, उस गंद को परख लेना तुम ठहर जाओगे ये लक्षण।
- 37:12वह बोलेंगे तुम ठहरोगे तुम सच्चे समय के श्रोता हुए, तुम समय के
- 37:20श्रावित बन गए, यही महावीर ने कहा था।
- 37:27लेकिन बहुत मुश्किल है क्योंकि तुम्हारा मन सारे दिन भागता है।
- 37:35तुम्हें ऐसी आवाज देने वाला कोई चाहिए जिसकी आवाज़ सुनकर तुम्हारा
- 37:41मन ठहर जा, लेकिन तुम तो पहुँच जाते।
- 37:49जहाँ मन और तेजी से घूमना शुरू हो जाता है, तुम तो पहुँच जाते हो
- 37:55डेरों में जहाँ मन चरखड़ी चढ़ा देता है जप और जप थोड़ा तेज जप।
- 38:01हुआ। जप जप खूब जप।
- 38:10इन मूर्खों को पता नहीं है जब तुम्हें व्यस्त करता।
- 38:15है। और वह मिलता है अव्यस्तता में जब
- 38:20तुम्हें बी जी करता है और वह मिलता है नॉन बी जी ने समय जब तुम
- 38:26कोई भी। व्यापार न कर रहे हो बड़ा प्यारा
- 38:29शब्द बनाये किसी ने बिज़नेस का मतलब व्यापार और बिज़नेस का मतलब
- 38:35तुम उलझ गए, कहीं बीज़ी हो गए कहीं और तार न गई।
- 38:48तो संत कहता है जब तुम बिज़नेस से परे हो जाओगे, नॉन बिज़नेस में आ
- 38:53जाओ, तुम व्यस्त नहीं होगे, संसार में जांच से सुन ना परमात्मा है।
- 39:06ये लोग परमात्मा का नाम लेकर तुम्हें भ्रमित करें।
- 39:12ये रास्ते गलत हैं। संभल के चल रहे हैं धोखा का चौक।
- 39:24है। धोखा देने वाले बहुत हैं।
- 39:30जहाँ बड़े गीदड़ बैठे हैं शेर की खट हैं गीदड़ उन्हें पहचान लेना
- 39:41संत तुम्हें पहचान बता जाता। है।
- 39:44संत जब बोलता है। मोती झड़ते हैं आनंद लुठता है,
- 39:51खजाना बरस जाता है और बरबस ही तुम्हारा चलता हुआ मन ठहर जाता है
- 39:57ये निशान रोज़ के रटे रटाए, वही प्रश्न, वही शब्द।
- 40:06तुम बोर हो जाते हो, मन पुनरूक्ति करना चाहता है और ये पुनरूक्ति
- 40:13तुम्हें दे देते हैं तुम्हारी मनभावन चीज़ मन पुनरूक्ति का
- 40:19दूसरा नन और पुनरूक्ति ये तुम्हें दे देते हैं ये दो।
- 40:25ये बांस गाड़ दिया, इस पर चढ़े जाओ उतरे जाओ न कभी खत्म होगा,
- 40:31तुम खत्म हो जाओगे यह हैजाब कभी खत्म नहीं होगा।
- 40:42एक भूत की कहानी और सुनती हैं और सारे काम कर देता था।
- 40:46किसी व्यक्ति ने सिद्ध कर लिया। उसकी एक शर्त थी जीस दिन तुमने
- 40:55मुझे कोई काम नहीं दिया, मैं तुम्हें खा जाऊंगा।
- 41:02उसने सिद्ध तो कर लिया ठीक है कोई बात नहीं।
- 41:09काम दे दूंगा तुम्हे कोई न कोई काम लगाए रखूँगा, तुम फिक्र मत
- 41:13करो लेकिन वो भूत प्रेत कहने लगा। देखो जीस दिन तुमने काम नहीं दिया
- 41:17तो मैं खा जाऊंगा। इसी शर्त पर वह सिद्ध?
- 41:22हो क्या? सब कहते हैं काम कितने का होते
- 41:31हैं? आदमी के सभी काम हो गए।
- 41:37कहते हैं 1 दिन काम ही खत्म हो गए।
- 41:42लेकिन उस प्रेत को तो काम चाहिए ओके तो तुम्हें खा जाऊंगा, बात
- 41:48ठीक है समझना मैं कहाँ से बोल रहा हूँ यह नॉन बिज़नेस तुम्हें खा
- 41:53जाएगी तुम्हारे अहंकार को खा जाएगी नॉन बिज़नेस के लम्हों में
- 42:00उतरता है वो। और तुम जैसे तुम समय के हो की मैं
- 42:06हूँ उसे खा जाता है, निकल जाता है, उसका भोजन है ये अपने गुरु के
- 42:16पास गया। आपने बताया था मैंने सिद्ध तो कर
- 42:19लिया इस शर्त पे लेकिन शर्त टूट रही है।
- 42:22अब कितना काम कहूँ? अब तुम मुझे बता दो तो उसने कान
- 42:29में फूंक मार। दी।
- 42:32सुना है क्या ढेरों में बैठे हैं? बाँस गाड़ रखे ये ना पांच न इसको
- 42:39झपते रहो चढ़ते रहो, बाँस पे उतरते रहो।
- 42:43तुम पहुँच जाओ, ऐसे वो प्रेत शांत हुआ जा के डेरों में बैठ जाओ,
- 42:59पुनः रुक्ति करो, पक्का है, तुम कभी नहीं पूछोगे।
- 43:08नॉनवेज नस के लम्हे जब तक तुम पैदा नहीं कर लेते, तब तक उसकी
- 43:16आहट तुम्हारे भीतर पहुँच ही नहीं पाएगी।
- 43:19तुम बहरे हो तुम अंधे हो तुम्हें दिखता नहीं कुछ।
- 43:29इस भूत को कोई न कोई काम चाहिए तुम्हारे मन को और इनको सूत्र हाथ
- 43:37लग गया तुम्हारे ढेर में बैठे हुए हैं, यह मांगता है काम व्यस्तता।
- 43:49यह भी जानता है अगर व्यस्त न हुए अव्यस्त क्षणों में वह अमृत
- 44:04तुम्हें खा जाएगा इसलिए तो। तुम्हारे गुरु तुम्हारे पथ
- 44:13प्रदर्शक तुम्हें फुर्सत के लम्हों में जाने ही नहीं देते,
- 44:20खाते पीते चलते, ऊखते बैठते, सोते जागते कोई भी काम करते बस राम राम
- 44:28करते। अल्लाह अल्लाह करते रहे मतलब तुम
- 44:41व्यस्त हो बस तुम्हारे मन की खुराक दे देते हैं सूत्रें के हाथ
- 44:49लग गया। तुम्हारे मन का सूत्र है, वह कुछ
- 44:54चाहता है काम करने के लिए ऐसा भूत है, वो ऐसा प्रेत है वो वो कहते
- 45:00हैं खाली नहीं, जीस दिन खाली बैठूंगा उस दिन तुम्हें खाई तो
- 45:06तुमने कर दिया अब या तो। खुद को भेंट कर दो उसके या फिर
- 45:16बांस काट दो डेरों में चले जाओ, चढ़े जाओ, उतर जाओ, सरल काम है
- 45:25इसलिए तो मन को खुशी रखता है। मन इसी को तो ढूंढता था, लेकिन
- 45:38भीतर का मन कुछ और चाहता है भीतर जरूरत कुछ और है।
- 45:45बाहर का मन जरूरत कुछ और है। बाहर का मन ढूंढता है बिज़नेस।
- 45:51और भीतर का अस्तित्व ढूंढता है। नॉन बिज़नेस भीतर का मन भीतर का
- 46:03अस्तित्व ढूंढता। है।
- 46:08दिल ढूंढता है है है फिर वही। दिल।
- 46:15ढूँढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन बैठे रहे।
- 46:3010 बुरे। जाना किए हुए दिल ढूंढता है।
- 46:42फिर वो जो बेहतर का है तुम्हारा अस्तित्व और ढूंढता है।
- 46:47फुर्सत के रात दिन बैठे रहे। तेरी आँखों में आँखें डालें, बैठी
- 46:58रहें तसव उरे जाना किया तेरी आँखों में आँखें डालकर जो सूक्ष
- 47:07जूते चवारे ना बल्ख ना। भूख।
- 47:15तुम किसी गुरु की परवाह क्यों करते हो कि तुम मरोगे, तो वो
- 47:18तुम्हारी ऊँगली पकड़ के सच खंड में ले जाओ, तुम क्यों नहीं जीते
- 47:22जी खोदी उस छज्जू के चवारे पे चढ़ जाते, वह है गगन मंडल।
- 47:29मैं जो तुम्हारी ससरार में दिखू गनमड़न अमृत कुंड है कब तक इंतजार
- 47:37करोगे? इनके पास कुछ नहीं है ये कभी नहीं
- 47:42आएँगे तुम मर मर जाओगे। लेकिन सच खंड तक ये तुम्हे ना
- 47:52पहुंचा पाएंगे क्योंकि सच खंड कहीं बाहर नहीं है सच खंड से जू
- 47:59के चबारे को कहते हैं, वह है दशम द्वार जो सबसे ऊपर है ऊपर के
- 48:05मंजल। वहाँ तुम ही पहुंचोगे कोई गुरु
- 48:12ऊँगली पकड़ के तुम्हें वहाँ पहुंचा ही नहीं सकता ही इस अनेबुल
- 48:16टु डू सो के जुबारे पे तुम पहुंचोगे खुद ध्यान रखना सही गुरु
- 48:25तुम्हें छोड़ देगा। जाओ बेटा कल्याण मस्त बाबा अब
- 48:34छज्जू के चौबारे पे चले जाओ वहाँ मैं भी साथ नहीं जाऊंगा ना तो मरा
- 48:46जाता है किसी के साथ। ना स्वर्ग में जाया जा सकता है
- 48:50किसी के साथ और ना ही मुक्त हुआ जा सकता है किसी के साथ तुम जाओगे
- 48:57अकेले हंसा जात अकेला याद रखना। जहाँ जब तुम जाओगे, उस सच कांड
- 49:08में तुम्हें सब सहारे छोड़ देना पड़ेगा।
- 49:13मेरा विलंब होना पड़ेगा, कोई नाम काम न करेगा, कोई गुरु काम न
- 49:21करेगा। सच्चा गुरु तुम्हें पहले से बता
- 49:25देगा। देखिए एक जंक्चर पॉइंट ऐसा आएगा
- 49:30यू विल हैव टु गो देर अलोन वहाँ तुम्हें अकेले ही जाना होगा वहाँ
- 49:39मैं भी कामना पढूंगा। बता सकता हूँ राहू तुम्हें सफर
- 49:47तुम ही तय करोगे और एक मुकाम ऐसा आता है जब गुरु कहता है आग्या से
- 49:55जू का चवारा यह है गगन मंडल ऐसा चखंड जो तुम्हारी ही भीतर।
- 50:00सहस्राल दशम द्वार जहाँ तू खुद ही पहुंचेगा ना तू ना काम करेगा ना
- 50:13गुरु काम करेगा तुम बिलकुल मलंग होके जाओगे वहाँ बिलकुल फकीर होके
- 50:19जाओगे तुम। तुम्हारे साथ कुछ भी तो नहीं
- 50:23होगा, यही तो विडम्बना है बैठे रहो धोनी के मारे वहाँ तो न पहुँच
- 50:34पाओगे वहाँ पहुंचोगे। किसी कन्हैया की मुरली का स्वर
- 50:40सुनता है, उस राशि में महक होगी। लिबरेशन जब कृष्ण राश रचाती हैं।
- 51:00तो हर गोपी के साथ एक कृष्ण होता है यानी हर गोपी लैबरेटेड होती
- 51:06है। अलग से कृष्ण साथ नहीं जाते,
- 51:09कृष्ण में विलीन हो जाती है, वह जन्म भी अकेले मिलता है, मरना भी
- 51:21अकेले ही होता है। नर्क में भी अकेले ही जाते हैं।
- 51:28स्वर्ग में भी अकेला ही होके जाना पड़ता है अकेले ही चलना होता।
- 51:35है। बाकी सब पीछे छूट जाता।
- 51:40है। घरवार रिश्तेनाथ पति पत्नी संग के
- 51:50साथी, मित्र बंधुओं गुरु भी साथ छोड़ देता है चल अकेला।
- 51:59चल अकेला चल अकेला तेरा मेला पीछे छोटा राही, चल अकेला गम तो बहुत
- 52:16आएगा, डर तो बहुत लगेगा। लेकिन जियरा हार मत जान तेरा कोई
- 52:25साथ न दे तो तू खुद से पीठ जोड़ ले बिछोना धरती को करके।
- 52:38अरे आकाश, ओढ़ ले तेरा कोई साथ ना दे तो तू खुद से पीठ जोड़ ले,
- 52:52गुरु की तरह छोड़ दे सच्चा गुरु, झूठा गुरु।
- 52:57तो तुम्हें दिलासा देगा आऊंगा जब तुम मरोगे, जब तुम्हें पता नहीं
- 53:02होगा, तुम्हें पता मरने के क्षण पे प्रकृति तुम्हें अनास्थीसिया
- 53:06दे देती है, बेहोश कर देती है तुम जानोगे कैसी घृणा?
- 53:10के। प्रकृति ने बड़ा ऑपरेशन करना होता
- 53:14है। और प्रकृति ऑपरेट करती है तो पहले
- 53:19एनएसटी सी तुम्हें दे देती है। बेहोश कर देती है उस बे उसी के
- 53:25आलम में तुम्हें पता कैसे चलेगा कि गुरु आया कोई गुरु नहीं आता।
- 53:30अकेलों का मार्ग है, अकेलों का रास्ता है, अकेले ही जाना होता है
- 53:35ये सफर अकेले का सफर तो घबराना मत, गुरु भी हाथ छोड़ देगा आखिर
- 53:43में इसलिए मैं सदा से कहता हूँ गौतम ने महावीर को छोड़ा नहीं उलझ
- 53:50गया। उलझ गया, गुरु के साथ उलझ गया।
- 53:55उसके चरणों की खाक बन के रहूंगा और गुरु ने बहुत समझाया बाधा तो
- 54:04वाधा ही होती है। पुत्र चाहे धन बाधा बने।
- 54:11चाहे पद यात्रा बाधा बने, चाहे ऊंचे मकाम, बाधा बने चाहे गुरु
- 54:17बाधा बने, बाधा तो बाधा ही होती है तो गुरु को भी छोड़ दे तू
- 54:25किनारे पे आ लगा है। कृष्टी गनारे पे लग गई है अब क्या
- 54:31दिखता है जीस गुरु का आसरा था, वह चला गया सच्चा गुरु ऐसा ही करेगा
- 54:39सच्चा गुरु तुम्हें भरमाएगा नहीं पाखंड नहीं, वह कहेगा झूठ नहीं
- 54:44बोलेंगे सच्चा गुरु। सत्य बोलेंगे वो कहेगा नहीं कोई
- 54:49गुरु संघ नहीं जाता, कोई संघ जा ही नहीं सकता।
- 54:53अकेलों की मंजिल है, अकेलों का सफर है, अकेले ही तय करना होता
- 55:00है, कोई साथ न दे। तो घबरा न जाना बिछो न धरती को
- 55:12करके अरे आकाश ओढ़ ले मत फिकर करना है कौन सा वो इंसान यहाँ पर?
- 55:23जिसने दुख न झेला कौन है भाई? जो गुरु को संघ लेके पहुँच गया
- 55:32कोई नहीं ऐसा ये झूठ उठी बातें हैं झूठ लोगों की बातें हैं,
- 55:40भरवाने वाले लोगों की बातें हैं। ये वेड़िये हैं, नकाब ओट लिया है
- 55:47शेरों का तेरा कोई साथ न दे तो गुरु भी कहेगा अगेरे चलो सच्चा
- 55:58गुरु यही कहेगा झूठा गुरु तुम्हें।
- 56:021000 1000 विश्वास देगा और याद रखने ये विश्वास नहीं, ये विषय है
- 56:09विश्वास नहीं, ये विषय है बिछोना धरती को करके अरे आकाश और तुम
- 56:23अकेला चलने को तैयार हो जाओ। ये तैयारी पहले से रख तो महावीर
- 56:30कहते हैं तू छोड़ दे गुरु के पांव को छोड़ दे पुत्र, ये तुम्हारे
- 56:36लिए बाधा बन जाएगा। पहले परिवार वादा था पहले धन धन्य
- 56:42वादा था। अब गुरु वादा हो गया बात तो
- 56:45चिपकाहट तो बनी ही रही, फिर चिपकने का कारण क्या था?
- 56:50वो धन था या गुरु के चरण से या गुरु आएगा ऊँगली पकने का कुछ भी
- 56:55है। तुम चिपके तो रह गई बेटा और जब तक
- 57:01चिपकाहट है। तब तक लिबरेशन छिपकाहट से ही तो
- 57:08लाइबरेट होना है। छिपकाहट ही बनी रही, पात्र बदल
- 57:18गया, पुत्र की जगह गुरु आ गया। लेकिन चिपकाहट बनी रही अकेले तो न
- 57:27हुए और यह रास्ता यह मंजल अकेलों की है कोई यहाँ दूसरा साथ नहीं
- 57:38जाता। न मरने में साथ जाता, न पहुंचने
- 57:44में साथ जाता अकेलों का रास्ता अकेलों की मंजल अकेले ही तय करनी
- 57:48होती है। सच्चा गुरु तुम्हें यही कहेगा
- 57:51अकेला हो जा बी अलोन। निरा बलम हो जा, किसी का सहारा मत
- 57:59तक जब बेसहारा हो गया। द्रौपदी ने अपने आपको बेसहारा
- 58:08समझा, असहाय समझा जब तक सहारे थे उसके पतियों के सहारे थे।
- 58:14भीष्म का सहारा, द्रोण का सहारा तातिसरी का सहारा सहारे सहारे ना
- 58:20रहे। सबने गर्दनी छुपा ली, नीचे ही कर
- 58:24ली और एक वक्त ऐसा आया, हार गई, असहाय हो गई, निर्बल हो गई।
- 58:35ध्यान रखना ये सिंबल्स है, सिंबल्स को सिंबल की तरह लेकर
- 58:42उनका अर्क निकाल कर पी जाना और द्रोपदी से लाई तुम कहाँ गए
- 58:52महाराज? फिर कृष्ण जाता है, करो मत देरी
- 58:59दुख हर द्वार का अनाथ, शरण नेत्र जब तुम मेरा विलंब हो जाते हो, तब
- 59:06समर्पण घटता है और उस समर्पण की प्रक्रिया में।
- 59:13तुम पहुँचते हो वहाँ जहाँ वो आनंद का सागर है, जिसे सच खंड कहते
- 59:20हैं, वो कहीं दूर है, तुम्हारी ही भीतर है।
- 59:24दशम द्वार में वो दशम द्वार में ही जाना है।
- 59:31छज्जू के च्वारे में जाना है और जो सुख वहाँ पर है ना बल्क, ना
- 59:38बुखारे कितना ही सुंदर है बल्क कितना ही सुंदर है बुखारा लेकिन
- 59:45बाहर की चीजें भीतर के रस का। नहीं कर सकते।
- 59:52तुम्हारी सारी संसार के सुख में निकल गई सम्राट तात स्वर्ग अपवर्ग
- 59:58सुखधरिय तुला एक अंग तो न ता ही सकल मिली जो सुक्ला व सत शंख अगर
- 1:00:07सच्चे का शंख मिल जाए। आज तो तुम झूठे कर ये महज दिल के
- 1:00:13बहलाने को क्या सच्चा सच्चा गुरु तुम्हें तोड़ेगा चिपकाहटों से और
- 1:00:23तुम नाराज भी होगे, तुम्हारी नाराजगी भी झेलेगा।
- 1:00:29उसका उद्देश्य बड़ा साफ है। मैं अपने हृदय को कुपित नहीं करना
- 1:00:35चाहता, वह अपने हृदय को अंदर मल रहना देना चाहता है, मल युक्त
- 1:00:41नहीं करना चाहता, इसलिए सत्य बोलता और सत्य ही कहता।
- 1:00:44है। मैं कहता आंखन देखिये।
- 1:00:48तुम कहते कागज़ पी लेखी कोई है ऐसा इंसान जिसने बिछोड़ों का दर्द
- 1:00:58सहन न किया हो यह बिछोड़ा होगा गुरु के प्यार में इतने डूब जाओगे
- 1:01:07तुम। मासूक का, का मासूक का प्रेम तो
- 1:01:11इतना नहीं था गुरु का प्रेम अथाह होता है वह बांटता है निष्प्रयोजन
- 1:01:20बांटता है उसका अपना कोई स्वास्थ्य नहीं।
- 1:01:23निःस्वार्थ बंटता है और उसके प्रेम का तुम गुलाम हो जाते हो।
- 1:01:27सबसे ज्यादा मुश्किल है गुरु का प्रेम छोड़ देना।
- 1:01:33लेकिन जो पहुंचा उसने इस दुख को भी अपनाया।
- 1:01:39इस दुख को भी अंगीकार किया। गुरु के चरणों को भी छोड़ा।
- 1:01:46कि कौन सब? वो।
- 1:01:47इंसान यहाँ पर जिसने दुख न झेला। कौन है वो?
- 1:01:57ये आखिरी दुख भी झेल ले मत चिपक गुरु के चणों के साथ चल अकेला चल
- 1:02:07अकेला चल अकेला तेरा मेला पीछे छूटा राही चल।
- 1:02:17अकेला सब साजो सामान पीछे छोड़ते अगर छज्जू के चौहरे पे जाना चाहता
- 1:02:25है, सचखंड में जाना चाहता है, उस गगन मंडल में जाना चाहता है, जहाँ
- 1:02:31अमृत का असर सरोवर नहीं कुंडा। है सागर है।
- 1:02:37इच्छुकता नहीं कभी तो आखिरी चबकाहट भी छोड़ दे आखिरी चबकाहट
- 1:02:47होती है गुरू गुरू के दामन की भी आज नारक।
- 1:02:55निराश होजा निराश। इस।
- 1:03:00आशा को भी त्यागते। है।
- 1:03:06कड़वा है, थोड़ा मुश्किल बढ़ेगा। गुरु का प्रेम त्यागना बड़ा
- 1:03:12मुश्किल हो जाता है। गुरु का प्रेम ही ऐसा है।
- 1:03:18आँखों से आश्क बहेंगे जज आंसू आये लेकिन कुछ भी है छज्जु के जुबारे
- 1:03:27पे जाने के लिए सब बलिदान कर देना यही गुरु तुम्हें समझायेगा सच्चा
- 1:03:35झूठा तो तुम्हें बहक आएगा। जिससे तुम बैठ जाओ।
- 1:03:40ऐसे ही शब्द ईजाद करेगा खाली वन शैतान का घर उसे और कोई काम नहीं।
- 1:03:47वह नई नई चीजें खोजेगा और तुम्हें भ्रमित करेगा।
- 1:03:54तुम्हें भ्रमित करना इनकी खुराक। लेकिन सच्चा कुर्सी में भ्रम नहीं
- 1:04:01करेगा क्योंकि उसको किसी खुराक की जरूरत है नहीं वह तृप्त हो गया।
- 1:04:09तुम्हें तृप्त करना चाहता। है।
- 1:04:12वह पहुँच गया उस गंतव्य पे तुम्हें उस गंतव्य पे पहुंचाना
- 1:04:17चाहता है तो याद रख ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जिसने यहाँ संसार का
- 1:04:22दुख न झेला हो बिछोड़े का तो आखिर में गुरु का बिछोड़ा भी सहन कर ले
- 1:04:29छोड़ दे गौतम। नाव किनारे पे आ गई है देख क्या
- 1:04:37रहा है? गुरु तो चला गया जिसके साथ मोह
- 1:04:40था, अब उठ छलांग लगा और किनारा तो सामने है, यहाँ से शुरू हो गया।
- 1:04:51था। जब संत बोलेंगे तुम्हारी आँखें झर
- 1:04:57झर रोएंगे क्योंकि उसकी याद आएगी जहाँ जाना है भूल गए पहले तो गुरु
- 1:05:07की वाणी तुम्हें याद कराए थे, फिर गुरु के संग संग बोले।
- 1:05:15यही मैंने कल कहा था एम् श्रद्धा मत कर श्रद्धा विश्वास हो या
- 1:05:21व्ययाम बिना न क्वेश्चन इसके बिना नहीं पहुंचना होगा और आखिर में
- 1:05:29सुनते सुनते गुरु के संग आखिर एक। ऐसा मरहला आएगा गुरु कहेगा देख बा
- 1:05:36सुन और तो सब हो गया अब आखिर में मेरे पांव भी छोड़ने पड़ेंगे तो
- 1:05:45रोना मत, चिल्लाना मत ये दुखड़ा भी झेल लेना।
- 1:05:51ये बिछोड़ा भी झेल लेना और इसी वक्त पे आकर कबीर भी हतप्रभ रह
- 1:06:00जाते हैं। कबीर कहते हैं सब मिल गया।
- 1:06:10गुरु भी खड़ा है, मालिक भी खड़ा है।
- 1:06:15गुरु गोबिंद दोनों खड़े का अकेला फूफा पर गुरु के चरण पकड़ लेता
- 1:06:24है। अब मैं चला विदा दे दो मुझे बली
- 1:06:29हारी गुरु। पलिहारी गुरु आखनो जनगोबी नज़रों
- 1:06:38मिला मुझे मेरा आखिरी मुकाम दिखा दिया मुझे मेरे आखिरी मुकाम पे
- 1:06:44पहुंचा दिया नॉन क्लिंगिंगनेस के कारण।
- 1:06:49तो गुरु कहता है छोड़ दे इन कामों को ये आखिरी अर्चना हैं तेरे लिए
- 1:06:58जब मैं बोलेंगे तुम्हारी आँखें झर झर कापें बहाय की नींद छलके की
- 1:07:05सावन बादलों की तरह। लेकिन तुम चलते ही चले जाना रोना
- 1:07:11खूब रोना इतना रोना कि ये चेतन खाली हो जाए और फिर तुम हल्के हो
- 1:07:20जाओगे। नॉन बिजनेस के लम्हों में वो
- 1:07:23उतरेगा और उतरेगा, गुरु संग होगा तुम्हारे।
- 1:07:29आखिर तक उसके संग चलना और आखिर में गुरु भी कह देगा देखो बच्चे
- 1:07:37अब तुम छलांग ले लो तो छलांग ले लेना।
- 1:07:44छज्जू का जुबरा सामने है, कहीं दूर है?
- 1:07:50चूक मत जा अगर चूक गए फिर पता नहीं झूठे गुरु बहुत है संसार
- 1:08:01सच्चा कभी कभी आता। है।
- 1:08:04पित्रा न ही साधू न। बिना शय के दुष्कर्म धर्म संस्था
- 1:08:09अपना अर्थाई सभ वामी युग युग युगों के बाद तो आता है इस वेला
- 1:08:19को चूक न जाना पाखंडी गुरुओं के चरणों से लक मच जाना ये चाहते
- 1:08:24हैं। बीड़ों को इकट्ठा करना लेकिन ये
- 1:08:28पार्टीस हैं, ये धर्म नहीं हैं, ये आपको आपके स्वभाव तक नहीं लेकर
- 1:08:33जाएंगे। ये तुम्हें अपना अफवाह नहीं
- 1:08:36दिखाएंगे। ये तुम्हें कहेंगे गुरु से ही चुप
- 1:08:39कर रहा हूँ। निहित स्वार्थ है इनका।
- 1:08:45तुम ऐसा चलना जैसा मार्ग मैंने बताया और आखिर में गुरु से भी
- 1:08:53विदा ले लेना। बलिहारी गुरु आपने जिन गोबिंद
- 1:08:59दियों में लाए और गुरु में मिल जाने जा के बस आ गई मंजर।
- 1:09:08आ गई मच धन्यवाद।