Latest / Baba ji Vijay Vats / 8/2/26 - जो करता है परमात्मा "भले" के लिए करता है : 'मैं' सिर्फ एक दावा है! ईश्वर पर छोड़कर तो देखो
Transcript
- 0:19दो प्रश्न रह गए थे कल लाउजे कहते हैं जो कुछ करता है, परमात्मा
- 0:31करता है बिलकुल 100% सही बात है। जिसने क्रिएशन किया, वही चलाता
- 0:46है। तुम्हारा तो सिर्फ दाबा है और
- 1:00दाबा 1 दिन खत्म हो जाता है। बाबा कभी किसी का रहा आगे कहते
- 1:20हैं लव से और भले के लिए करता है बाबा यह बात समझ नहीं आती।
- 1:42तुम कभी ईश्वर पे छोड़ के देखो इतना ग्रंथ बोल दिया थ्रोटिकल
- 1:53वैसे तुम समझ न पाओगे। तुम्हें प्रैक्टिकल राह अपनाना
- 2:09होगा एक बार उस सत्ता को छोड़ के देखो कुछ महीनों के लिए।
- 2:28छुट्टी ले लो। और दुकान बंद कर दो, आराम से बैठ
- 2:38जाओ अपने एक कमरे में। एक न 1 दिन तुम्हें सत्य पता चल
- 2:47जाएगा जो करता है वही करता है और आपके भले के लिए करता है आपके भले
- 2:59के लिए करता है यह बात। अहंकार को बिलकुल नहीं रचती।
- 3:08अहंकार ही व्यक्ति कहता है कि मैं अपना भला स्वयं करूँ, जबकि उसे
- 3:15भले की परिभाषा ही नहीं जाता, भले की परिभाषा होती क्या है?
- 3:25यह भी उसे ज्ञात नहीं है जो कुछ करता, परमात्मा करता और घरे के
- 3:39लिए करता। फिर तुम्हारा वही सवाल है यह चोरी
- 3:48जटाका या बलात्कार? क्या ये भले के लिए है?
- 4:01हाँ ये भले के लिए है इतना बेबाक जवाब शायद आपको किसने?
- 4:10बिलकुल, भले के लिए तुम कहानियों की तरफ़ मत जाओ, तुम नियमों की
- 4:19तरफ़ मत जाओ, तुम इतिहास को खंगाल।
- 4:2940,00,000 लोग कृष्ण ने इन सफायर करके अर्जुन के हाथों में बात की
- 4:37क्या? कृष्ण ने बला चाहा या बुरा चाहा
- 4:50और मर्यादा पुरुषों तुम रावण मारीश ताड़िका खरदुषण इनके वध
- 4:59किया। क्या यह वध नहीं था?
- 5:07फिर इसको तो आप भले के लिए नहीं मानते, आप की परभाषाएं पर्सन टू
- 5:19पर्सन वैरी करते हैं। आपकी परिभाषाएं।
- 5:27बदलती रहती। हैं, लेकिन आपके भीतर एक ऐसा तत्व
- 5:36मौजूद है परिभाषाओं के बदलते वह नहीं बदलता।
- 5:46वह नॉन चेन्जबल है। इसके ऊपर मैं ज़्यादा नहीं
- 5:54बोलेंगे, बस इतना सा कहूंगा है प्रयोग कर प्रैक्टिकल में उतरु।
- 6:09मगजखपाई करने का कोई अर्थ नहीं होता यार की मर्ज़ी के आगे यार का
- 6:21तम भर के देख अर्जे उल्फत कर चुका है।
- 6:29यह भी उलफत करके देख ऐसे तुम्हारी खोपड़ी मानने वाली है तुम्हें
- 6:42अपने आप को प्रैक्टिकल में। अग्रसर करना होगा।
- 6:55अपने भीतर उतरना होगा। मग्ज खपाई से शब्दों की
- 7:02शास्त्रार्थ से कभी किसी को कुछ नहीं मिला है जीवन की बातों को।
- 7:10शास्त्रार्थ में मत उलझाले चूक जाओगे जीवन बहस का विषय नहीं है,
- 7:19जीवन जानने का विषय है, जीवन जीने का विषय है इसको मुर्दा शास्त्रों
- 7:26में खंगालना मत शुरू कर देना। संत से बड़ा वैज्ञानिक कोई।
- 7:37नहीं होता। न हुआ न होगा, क्योंकि संत
- 7:46प्रैक्टिकल करता है। संत से बड़ा समझदार कोई नहीं होता
- 7:57क्योंकि संत समझ से बाहर निकल जाता है, समझ का अवलोकन करता है।
- 8:06अच्छी तरह से उसे चीजें नजर आती है।
- 8:11जाहित। शराब पीने थे।
- 8:13मस्जिद में बैठकर या वो जगह बताओ जहाँ खुदा का कारण हो या तो
- 8:27मस्जिद में बैठ के शराब पीने थे। या वो जगह बता दे जहाँ खुदा का घर
- 8:36है और मिया मोल भी इसके ऊपर बहस करने लगेंगे, लेकिन ज़ाहिर है ठीक
- 8:53कहता है। एक तरफ तुम कहते हो कि वह इधर रहे
- 9:02इधर रहे में मौजूद रहे। एक तरफ तुम कहते हो कि मस्जिद में
- 9:11बैठकर शराब मत दे, इसका मतलब मस्जिद में परमात्मा नहीं।
- 9:22सिर्फ मैखाने में ही फरमात्मा। है।
- 9:28अहाते में ही फरमात्मा है। क्या मस्जिद में ज्यादा फरमात्मा
- 9:35होना चाहिए? वहाँ खुमारी ज्यादा है?
- 9:39मस्तिष्क में मंदिर में कुमारी ज्यादा है।
- 9:42धर्म स्थलम से कुमारी ज्यादा है, जो कुछ करता है यह नहीं छोड़ है,
- 9:56ईश्वर करता है और बल के लिए करता है।
- 10:06लव से ने बात क्यों कही? मैंने एक वचन बोला था, संत जब जान
- 10:14लेता है कि मैं नहीं हूँ और मेरा यहाँ कुछ नहीं हुआ।
- 10:21वह ही है और उसका ही सब कुछ है। तुम्हारा यहाँ कुछ नहीं है और
- 10:30किसी ने यहाँ कुछ बनाया हो तो बता दे।
- 10:41कभी किसी ने कुछ नहीं बनाया। तुम मात्र भार के ढोने वाले हो,
- 10:51इधर का भार उठा के उधर कर देते हो जीसको कमाने।
- 10:59वाला कहते हैं बनाने वाला तो फिर जब तुमने बनाया ही नहीं, तुम
- 11:11मालिकाना हक क्यों मांग रहे हो? क्या कमाने भर से मालिकाना हक मिल
- 11:19जाता है? और फिर परमात्मा ने सबसे बड़ा
- 11:25शीशा तुम्हारे सामने मृत्यु के रूप में, अंतिम वेला में तुम्हारे
- 11:31सामने में आईना दिखा देता है कि देख।
- 11:35जो कमाया किसका था फिर अगर तेरा था तो क्यों छोड़ चला सारी उम्र
- 11:50तुने शरीर को मैं कहा सारी उम्र तुने शरीर को मेरा कहा।
- 11:57अपने कमाए धणधार ने पुत्रपुत्रार्थ इत्र पुरुष मेरा
- 12:05कहा जिसके साथ तुम चिपट जाते हो उसके साथ तुम्हारी कलिंगिंगनेस
- 12:13होने के कारण लगता है कि यह मैं हूँ।
- 12:23जिसमें मैं का भाग होता है उसी में मेरा का भाग होता है।
- 12:31मैं के भाव के बिना मेरा का भाव उत्पन्न होता है शरीर मैं हूँ
- 12:41विचार में हूँ। में शरीर के कार्य तंत्र में और
- 12:50जब तुम्हारे शरीर का एक अंग निकाल के बाहर फेंक दिया जाता है,
- 12:56डॉक्टर के द्वारा तुम उतने के उतने रहते हो।
- 13:01तुम्हारा पित्ता निकाल दिया जाता है ज्यादा पथरियों के कारण लेकिन
- 13:06तुम में ज़रा भी फर्क नहीं होता। कितने लोगों ने पीते निकलवाया,
- 13:13ज़रा भी फर्क आया क्या वो शरीर का नहीं था, क्या वो तुम नहीं थे?
- 13:22अगर वो तुम थे तो फिर कुछ गढ़ना चाहिए था।
- 13:26गड्ढा क्यों नहीं? क्योंकि वो तुम थे नहीं जो कुछ
- 13:38करता है, ईश्वर करता है, लाव से कहते हैं और बल पे भी करता है भला
- 13:44क्या? यह प्रश्न आज तक अधूरा रहता है।
- 13:53इसलिए मैंने बोलना शुभ समझा। प्रत्येक वो प्रश्न जो अधूरा रह
- 14:00जाएगा और मेरे सामने आ जाएगा। मैं उसकी गुत्थियों को सुलझाने की
- 14:07चेष्टा करूँगा। भला क्या है?
- 14:18सत्य को जान लेने से भला कुछ नहीं हो सकता।
- 14:22ज्यादा सत्य का पता चल जाए। तो इससे ज्यादा भला उपकार कुछ भी
- 14:38नहीं हो सकता तो लव से कहता है अगर तुम्हारे से कुछ छीन जाए।
- 14:51तो परमात्मा ने अच्छा किया बलो भयो, हरी भी सरो सर से डली बलो एक
- 14:59चिपकाहट का थोड़ा सा अंश खत्म हो गया, तुम तो छोड़ते नहीं छोड़ने
- 15:06की बात छोड़ो? तुम तो बढ़ाते ही चले जाते हो।
- 15:10मेरे को से कहते हैं कि तुम जिसे मैं मानते थे अगर उसमें से थोड़ा
- 15:25सा अंश हानि के रूप में टूट गया, तुमने कुछ गँवा दिया।
- 15:32तो लव से कहते हैं बड़ा भला हुआ भलो भयो, हरि भी सरो सर से ठडी
- 15:42भला इतने से तो क्लिंगकनेस छूटी इस भाग से इस पोषण से तो
- 15:51क्लिंगकनेस छूटी। अब पीता निकाल दिया, पीते से तो
- 15:55तुम्हारी क्लीन ने सूती ना, लेकिन ज़िन्दगी तो हमारे पांव भी काट
- 16:04दिए जाते हैं। मेरे सामने लोगों के पांव कट गए
- 16:07लेकिन मैंने उनसे पूछा कुछ फर्क पड़ा?
- 16:11तुम्हारे होने में कुछ फर्क पड़ा कितना?
- 16:13मैं अपने आप को उतना का उतना ही महसूस कर रहा हूँ वाले के लिए
- 16:22करते हैं सब से भला क्या है आखिर भले की व्हाटस दी डेफिनिशन ऑफ ए
- 16:30बला। कैसे तुम्हें पता चल जाए कि तुम
- 16:39नहीं हो तुम्हारा कुछ नहीं ये भला दी अल्टीमेट ट्रुथ लाइफ अगर
- 16:55तुम्हें किसी भी आघात से। किसी भी घटना से पता चल जाए कि
- 17:04मैं नहीं, मेरा नहीं, इससे भला कुछ हो नहीं सकता।
- 17:10ये मैं ही तुम्हारे सर के ऊपर बोझ की तरह रखा रहता है।
- 17:19काश यह मैं का भार हट जाए तो तुम अपने आप को इतना निर्भार पाओगे
- 17:27जितना कभी पाई जो कुछ करता है, ईश्वर करता है।
- 17:34क्योंकि सब कुछ उसने बनाया छोड़ो ईश्वर को तुम अपने पर आओ तुमने
- 17:44कुछ बनाया किसी ने बनाया होगा वह प्रकृति ने बनाया।
- 17:52वह प्रकृति स्वयं से उत्पादित हो गई या परमात्मा ने उसका उत्पादन
- 17:58किया, इन बातों को छोड़ो तुम बताओ तुमने कुछ बनाया, हैव यू क्रिएटेड
- 18:05समथिंग नो? तो फिर जोत ने करेट नहीं दिया तो
- 18:15परमात्मा आखिर में तुम्हें आइना दिखा देता है कि ये देख ले क्या
- 18:22जो तुने कमाया वो तुम्हारा था, तू पागलपन करता ही चला गया?
- 18:31तू दौड़ता ही चला गया, तू कभी ठहरा ही है और अब देख अब परम
- 18:41ठहराव में तू जाने लगा है तो परमात्मा में आईना दिखा देता है।
- 18:51अब तेरे संग खुशी चला है, नहीं चला क्यों?
- 19:01क्योंकि तुने बनाया खुशी तुने मात्र कमाया।
- 19:11इसलिए जो भी कोई शिक्षक, जो भी कोई फॉर्मूला जो भी कोई विधि
- 19:20तुम्हें यह सत्य बता दे कि तुम नहीं हो, वही सच्ची विधि है।
- 19:27छोड़ो विज्ञान भैरव की 112 विद्या।
- 19:33जो विधि तुम्हें बता दे कि तुम्हारे यहाँ कुछ नहीं तुम ही
- 19:41नहीं हो वही सच्ची विधि किताबों में क्या लिखा?
- 19:49शास्त्रों में क्या लिखा? इनकी फिक्र करनी छोड़ दो।
- 19:55जीवन की बात जीवन से सीखो, शास्त्रों से जीवन में सिखाएगा।
- 20:11सूचनाओं की बात शास्त्रों से सीखो विषयों की बात सब्जेक्ट से सीखो
- 20:25सूचनाएं किताबों से। यह सूचनाएं देने वाले सर लोगों से
- 20:37लो आचारों से लो लेकिन सत्य सत्य जीवन से सीखो सत्य अनुभूति का।
- 20:58अनुभव है अनुभूति के भीतर उतर जाना और वह शास्त्र में अनुभूति
- 21:11जीवन की बात अपने आप से सीखो तुम जीवन हो।
- 21:21मुर्दा होने के बाद क्या ख़ाक सीख पाओगे?
- 21:25इससे पहले की मुर्दा हो जाओ, जीते जी सत्य को जानो क्योंकि मुर्दा
- 21:32होने के बाद तो जीवन ही समाप्त हो जाएगा।
- 21:35फिर जानोगे किसको? जो भी कोई कुछ तुम्हें सत्य से
- 21:47परिचित करवा दे और लव से कहते हैं सत्य क्या है?
- 21:53सत्य है मेन। सत्य है कि मेरा कुछ नहीं क्यों
- 22:01मैंने कुछ बनाया, यह ईमानदारी की बात है बेईमान लोग कहते हैं, मेरा
- 22:09बेईमान लोग कहते हैं, मैं। लेकिन उनके लिए मृत्यु एक आईना ले
- 22:19के आया करती है। सदा सदा आई है, सदा आती रहेंगी
- 22:30मृत्यु में आखिरी पल में दिखा देती है।
- 22:32तुम्हारा है क्या बुद्धीकथक शक्ति को समझ नहीं सकता।
- 22:54सीता जब ब्याह के आई थी, श्री राम ने धनुष को तोड़ दिया था।
- 23:04अगर कोई उससे कहता कि तुम्हारी और लात महलों की बजाय।
- 23:14झोपड़ियों में पलेगी कच्ची भूमि पर तो क्या वह मान पाते?
- 23:28तुम्हारी बुद्धि से सोचोगे तुम कहोगे बिल्कुल नहीं एक राजा की
- 23:34राज़ दुलारी। वन मन धरती मारी मारी
- 23:54सीत जब महलों में आई, अयोध्या में है वनवास का रायतिलक का वक्त हुआ
- 24:02तो राज़ के बदले। आ चिक बदले माता मुझको हो गया
- 24:18हुक्म फकीर का। राज़ के बदले माता मुझको हो गया
- 24:36हुकुम फकीर का। खड़ा मन तेजर मैं माता तेरे हूँ
- 24:51का माँ अखरे का राज़ के बदले कभी। कुशल लेने सोचा था।
- 25:03उसका बेटा सबसे बड़ा बेटा सिर्फ वो ही दावेदार है सिंघाशीन और 1
- 25:14दिन इस तरह फकीरी के विश्व में उसके सामने खड़ा हो के कहेगा
- 25:18माता। हमें पिताजी ने हुक्म दिया है
- 25:27वर्ण का मन का और वो भी 14 वर्ष के लिए कभी सोचा था क्वेश्चन था
- 25:38और क्वेश्चन था बेहोश हो जाती। जो सोचा ना हो वो आघात की तरह या
- 25:46कदम से सिर के ऊपर गिर पड़े। हथौड़े की तरह तो कुशल अगर पड़ती
- 25:54है। लाख विनत करती है।
- 26:04कुछ बुद्धि अपना अंतिम प्रयास करती है, लेकिन हार जाती है।
- 26:13बुद्धि का सोचना उस सत्य से बिल्कुल परे होता है।
- 26:20बुद्धि तर्क के हिसाब से सोचते वेधना अपने हिसाब से चलती है।
- 26:35कभी कौशल्या ने सोचा कि यह पल भी मैं अपनी आँखों से देखुंगी।
- 26:48के सीता राजकुमार राजकुमारी ये दोनों वन में निकल जाएंगे।
- 27:04और बड़ा प्रयास करते है बुद्धि अंतिम दम तक प्रयास।
- 27:11करते है ना जा ना जा ना जा ना जा। ना जरे, ना जरे, ना जा कैसे ये
- 27:33मनवा दी धरेगा, कैसे ये मनवा? धरेगा तुम बिन किसको प्यार करेगा,
- 27:56महलों के पालने? झोने वाले महलों के पालने झोने
- 28:09वाले कांटों की राहों पे ना जा। ना जा ना जा ना जा रे ना जा रे ना
- 28:28जा। बुद्धि सोचते है।
- 28:42क्या बुद्धि सोच सकती है सीता के मैं राजा की पुत्री हूँ राजा के
- 28:51घर जा रही? हूँ।
- 28:52मेरा पति राजा है, मेरे ससुर राजा है और नामी गरामे राजा है।
- 29:01रघु, पूर्व भूषण सूर्यवंशी और कभी सोचा था तो कुछ नहीं, कभी सोचा था
- 29:16सीता के इन महलों में? संगेमरमर के ऊपर मेरे बच्चे
- 29:24खेलेंगे और वो खेले कच्ची जमीन पर और देखिए पिता पुत्र से मिलने के
- 29:40लिए बेचैन पुत्र पिता से मिलने। के लिए भेजा।
- 29:46है वेधना तेरे लेखक से क समझ न आया।
- 30:06से हैं बुद्ध न तेरे लेखक से। समझ न आते हैं पुत्र पिता से पिता
- 30:35पुत्र से मिल। नहीं।
- 30:40पाते हैं। पुत्र पिता से पिता पुत्र से मिल
- 30:58न पाते हैं। हो वेधना तेरे लेखक से समझना।
- 31:24राजा है, रथ हैं, हाथी घोड़े हैं और कितनी दूर है वाल्मीकि का श्रम
- 31:33बहुत दूर है और राजा के लिए क्या मुश्किल है जब चाहे अपने बच्चों
- 31:40को देख सकता है। ए अज़ल तुझसे यह कैसी नदानी हुई ए
- 31:59अज़ल तुझसे यह कैसी निदानी हुई? फूल को थोड़ा के गुलशन भर गंभीर
- 32:06आने वाले हैं। पर बात कर कुछ भी तो नहीं, लेकिन
- 32:20विधना ने मत ही फिर अगर दोष लगाया जनता ने तो ठीक लेकिन न्याय क्या
- 32:36कहता है? और श्री राम अगर न्याय करना नहीं
- 32:46जानते तो और कौन जानता है न्याय बनता था।
- 32:51राजा का सीता भी तो प्रजा थी। धोबी को बुलाते हैं, धोबिन को
- 32:58बुलाते हैं, सीता को बुलाते हैं और खुद आप खड़े होते हैं और उनकी
- 33:07सभा के भीतर बड़े ही समझदार लोग थे, उनको एक जज के रूप में बिठा
- 33:17देते हैं। क्या हम अपना अपना पक्ष रखेंगे?
- 33:20आप वो फैसला करो, आजकल ऐसा होता नहीं है चलो लेकिन हम बात करते
- 33:29हैं श्रीराम की जो मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाये।
- 33:40लेकिन व्यंजन दे मख्य न्याय व्यवस्था को बनाने वाले धर्म
- 33:52संस्थापना अर्थात धर्म की स्थापना करने वाला मर्यादा को संस्थापित
- 34:00करने वाला स्वयं। मर्यादा से चूका जा रहा है।
- 34:06मलिंगा कोई मर्यादा है? मेरे ही घर का कोई भक्त है या
- 34:15बाहर का कोई भक्त है दोष लगा दे। और मैं उसे दंड दे दूँ बिना
- 34:28खंगाले सबूत विदाउट एनी प्रूफ यह मर्यादा है क्या?
- 34:35मर्यादा का निरकृष्ट उपहास है। लेकिन मति हर ले गई, तुम कहते हो,
- 34:46हम करते हैं राम जैसा समझदार व्यक्ति धरती पर मिलेगा।
- 34:52कभी जब राम जैसा समाचार। मर्यादित व्यक्ति चूक सकता है।
- 35:04तो तय मैं की तो औकाद ही क्या है? बिलकुल सीधा मसला था, तुमने दोष
- 35:14लगाया ठीक आ जाओ, खुद भी खड़े होते हैं, सीता भी खड़ी होती है,
- 35:20न्यायकारी बैठा दिए जाते हैं। अब सभी न्याय करो दोनों पक्षों की
- 35:25बातों को सुन। दो भी बोलता दो, बिन बोलती राम
- 35:30बोलते सीता राम कहती हाँ, बिल्कुल इसने जो दोष लगाया ठीक लगाया,
- 35:39लेकिन मैंने सीता की है। मैंने परीक्षा ले ली थी।
- 35:45और अग्नि परीक्षा लेने के बाद ही मैं इससे अयोध्या में प्रवेश किया
- 35:50है। अब राजा की बात को इतनी समझदार
- 35:56व्यक्ति की बात को कोई काट पाता है।
- 35:59योग यह शक्ति भी है। राम झूठ नहीं बोलते।
- 36:04राम जैसे व्यक्ति झूठ नहीं बोलते क्योंकि वो जानते हैं झूठ बोलने
- 36:16का प्रण 1000 आत्महत्याओं के बराबर होता है।
- 36:22एक झूठ बोलने का प्रण। जैसे आपने 1000 बार आत्महत्या कर
- 36:30ली, जितना पाप उसे लगेगा। एक बार झूठ बोलने से उतना पाप रखा
- 36:38है। सीता मन्नत मानती है, जब बाग में
- 36:43जाकर फूल तोड़ती है और राम भी फूल तोड़ते हैं।
- 36:47निगाहें मिलती है तो सीता मेहनत मांगती है हे गौरी मुझे वर के रूप
- 36:54में श्री राम ही देव ये ही धनुष को तोड़ें और माँ गौरी कहती हैं।
- 37:06कल्याण, मस्त बाबा एवं मस्त ऐसा ही होगा।
- 37:20क्या वह सोच सकती है उससे कोई कहे यह तुम्हारा परम प्रियथम ही तुझको
- 37:27देश निकाला दे देगा। बिना किसी किशोर के तो वह मान
- 37:32लेते खोपड़ी तो कभी नहीं मानते और तुम खोपड़ी से ही सोचने की चेष्टा
- 37:39करते हो। सत्य सत्य खोपड़ी से कभी मिलता
- 37:43नहीं। क्या नहीं था राम के पास?
- 37:50राम जानते थे सीता निर्दोष, लेकिन हुआ क्या?
- 38:00हुआ एक राम ये भी? जानते हैं नाते।
- 38:09लेखक से समझ न आते हैं। प्राण प्रिया से प्रिया प्राण से
- 38:34बिछड़े जाते हैं प्राण। प्रिया से प्रिया प्राण से पिछड़े
- 38:51जाते हैं। हो हो वेदनाते।
- 39:03लेख किसी के समझ न आते हैं ज़रा। सोचो सीता कभी सोच सकती थी नहीं,
- 39:20तुम ऐसे ही सोचते हो? इट इस एपल सोच सकती थी सीता के
- 39:33मेरे होने वाले बच्चे संगेमरमर के ऊपर न पल कर के चीज़ पर पलेंगे और
- 39:42कभी सो सकते थे। लव कुश के हम राजा के पुत्र,
- 39:52जिन्हें सोने की पलंगियो में झूलना था, झूलों में झूलना था और
- 40:01कच्ची रेतों के ऊपर। लोट पोट हो रहे है।
- 40:10आराम के बाद सब साधन थे, ज्यादा दूर का सफर भी न होता।
- 40:20जब चाहे बालुमकी आश्रम में जाकर अपने बच्चों को मुक्कू अन्यार्थ
- 40:24थे, शत्रुगण गए थे। खैर, ये वाक्य लंबा हो जाएगा।
- 40:38जब लवणा सुर को मारने के लिए शत्रुगण गए तो रास्ते में
- 40:43वाल्मीकि आश्रम में रुके और उस वक्त सीता के दो पुत्र हुए थे और
- 40:49शत्रुगण को खबर थी और शत्रुगण ने जाकर राम को बताया था भाई।
- 40:57दो पुत्र हुए। क्या राम की तबियत अपने बच्चों को
- 41:12देखने की नहीं रही? होगी।
- 41:17क्या उसके पास संसाधनों की कमी थी?
- 41:19राजा थे। खबर सुनाती हैं।
- 41:23शत्रुघ्न के भाभी के दो बेटे हुए हैं, राम का हृदय मचल नहीं गया
- 41:32होगा। क्या राम के भीतर एक तूफान सा
- 41:49नहीं उठ गया होगा? क्या राम के भीतर ये आवाज ना उठी
- 41:59होगी कि तुम अन्याय कर रहे हो जाओ और जाकर?
- 42:05अपनी धर्म, पत्नी और बच्चों को लेके आओ पता चला क्या उनके भीतर
- 42:20यह मांग नहीं उठी थी कि हम भी राजशाही गद्दियों पर बैठे हैं, हम
- 42:28भी अपने पिता के मुखड़े को देखें। और जब युद्ध हुआ असम्मेद यज्ञ का
- 42:35घोड़ा छोड़ा गया तो राम कितने लाचार हैं?
- 42:40सीता के जिंदा जी सीता की स्वर्ण मूर्ति बढ़ाते हैं पास में।
- 42:49दिल दहल न गया होगा। अश्वमेध का घोड़ा लव कुश ने पकड़
- 42:56लिया और लव कुश बड़े बलवान थे। सभी को मुहर्तित कर दिया
- 43:06उन्होंने। सेना को मुर्शीत करती है।
- 43:10मार्ग हनुमान जैसे महाबली को मुर्शीत करती है क्योंकि वो चाहते
- 43:18थे कि देखें तो हमारे न्यायकारी पिता हैं।
- 43:25के। वह मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम
- 43:32हमारे पिताजी हैं तो लक्ष्मण आये हम कहते हैं राम को भेजो राम
- 43:45लक्ष्मण कहने लगे ऐसे मत हुआ। राम मेरे बड़े भ्राता हैं, उनको
- 43:58सम्मान से बोलो, लव कुछ कहते हैं, सम्मान से ही बोल रहे हैं पुत्र
- 44:09पिता का। जो लहजा होता है बोलने का वह
- 44:17जितना सरल हो जाए, उसमें किसी प्रकार का कोई आप फंड न बचे।
- 44:28अलंकार न बचे सीधा सीधा। गुस्तगुण हो तो ज्यादा अच्छा है
- 44:35आप से फिर तुम हो गए तुम से तुम वह हो गए राम को राम कह के
- 44:44बुलवाते हैं। लव कुश कहते हैं कि राम को भजो
- 44:49राम को। आखिर को राम को आना पड़ता है
- 45:05क्या? राम के हृदय में आग नहीं लगी
- 45:08होगी? वर्षों की तपस्या वर्षों की चाहत
- 45:16राम की। राम तो न पूरी कर पाए, लेकिन उस
- 45:23वेदना ने पूरा कर दिया। अच्छा वेद यज्ञ का घोड़ा छोड़ा था
- 45:30और यज्ञ का घोड़ा पकड़ लिया आलम को उसने।
- 45:36सभी योद्धा मूर्छित हो गए तो राम को जाना ही पड़ना था।
- 45:40सीता के जीते जीते सीता को नहीं बैठाया।
- 45:46यह वेदना नहीं तो और क्या? है।
- 45:57लेख किसी के समझ न आते हैं वेदनाते।
- 46:15लेखक किसी समझ न आते हैं राम सिया से।
- 46:33राम से मिलने हैं पाते हैं वेदना? वेदना आते रे लेख किसी के समझ न
- 46:58आते। राम सिया से सिया राम से कोई कसूर
- 47:06नहीं। यह है विध्नम इसे मैं कहता हूँ,
- 47:13जो करता है परमात्मा करता है और अच्छे के लिए करता है।
- 47:27जितनी मार्मिक गाथा श्रीराम की और सीता राजा की पुत्री, राजा की
- 47:42बहू, नो राजा की घरवाली। कार्तिक मास की ठंडी रात में एक
- 47:54साड़ी देकर उसको बेच दिया जाते जाओ वनवास।
- 48:01प्राण प्रिया से प्रिया प्राण। ण से बिछड़े जात हैं प्राण प्रिया
- 48:23से प्रिया प्राण से बिछड़े। बस या बुद्धि शोषण।
- 48:49ज्यादा समयदार बनने की चेष्टा न करे।
- 48:53सहस क्षणों पर लख होवे जो बात बुद्धि सोचती नहीं वह बात विद्वान
- 49:03नहीं सोंची होती। ऑल इस रिप्लाय।
- 49:09ऑल इस वेल डेस्टाइन्ड लेकिन पहले अगर उसका वर्णन कर दिया जाए तो वह
- 49:25असंभव लगता है। राम की गाथा यही कुछ बताती।
- 49:37जो होता है उसकी इच्छा से होता है, तुम उसकी सृजना में नेगलिजबल
- 49:46हो, इतनी सी क्वांटिटी है तुम्हे? क्या सोचा था?
- 50:06ए अज़ल ए अज़ल ए दोस्त से ये कैसी नादानी हुई ए अज़ल ए दोस्त ये
- 50:14तुमसे कैसी नादानी हुई फूल वह थोड़ा जो गुलशन भर में भी रानी
- 50:20हुई। फिर राम राम महाबली, उनकी आगे लव
- 50:50कुश की हैसियत कुश। लेकिन वाल्मीकि रोक देती है।
- 51:02वाल्मीकि कहते हैं पुत्र रुक जाओ, इनके चरणों में झुको, ये तुम्हारे
- 51:14पिता श्री हैं राम। लव कुश के हाथों के शस्त्र फेंक
- 51:32गए। उन्होंने पिता की मौत से उस
- 51:42धनुषधारी राम के हाथ के भी धनुष गिर गए।
- 51:48पितृ बहू जज्ञा दोनों बच्चों को हृदय से लगाया।
- 51:56दोनों के हाथों के शस्त्र गिर गए और वह।
- 52:03ऐसा लगे सर युगु युगों से बिछड़े हो भाई।
- 52:10वेदना तेरे लेखक से। समझ न आते हैं बाल पिता से पिता
- 52:35बाल से लिप के। निपटे जाते हैं बाल पिता से पिता
- 52:52बाल से लिपटे जाते हैं। हो वेदना तेरे लेख किसी समझ न आते
- 53:14हैं। बुद्धि गणितज्ञ है और विदना मालिक
- 53:31है गणितज्ञ और मालिक में देर इज़ लॉट ऑफ डिफरेंस।
- 53:41दोनों में बहुत विशाल अंतर है। गणित कुछ और कहता है विद ना कुछ
- 53:48और चाहती जो हो नहीं सकता। बुद्धि के हिसाब से वो हो जाता
- 53:57है। और बुद्धि के हिसाब से जो होगा वह
- 54:05नहीं होता। कबीर के तो तो है, अनहोनी होवे
- 54:18नहीं जो होनी सो होय। अनहोनी होवे नहीं जो होने सो होवे
- 54:29कपड़ा फिर इस लीला को देख कर क्यों रोये?
- 54:35बिल्कुल इसके उलट भी तो खाये। अनहोनी हो कर रहे होनहार मत जाये,
- 54:46अनहोनी होए नहीं होनहार मत जाये ऐसे दीनानाथ को किस विथ कहूँ,
- 54:53बकाए कुछ नहीं पता। तुम कभी आँखें खोल के देखना,
- 55:04बुद्धि की बंद पड़ी हुई लाखों लाखों साल पुरानी गुफा के द्वार
- 55:10खोलना और सोचना कि यहाँ तुम्हारा कुछ है जो तुमने बनाया हो।
- 55:19पाओगे नहीं फिर मैं कैसे। अकड़ किस बात की प्यार?
- 55:28अकड़ किस बात की प्यार? यहीं तो खाक होना है सजन रे झूठ
- 55:45मत वह यहीं रोना और धोना। नहाती।
- 55:55है न घोड़ा है यहाँ सब कुछ ही खोना है सजन रे झूठ मत सब।
- 56:09कुछ खोदोगे तुम अपने आपको खोदोगे। जिसने अंत देख लिया वही स्याना और
- 56:21सब है स्याने एक मत मूर्ख अपनों अपने स्याने कौन स्याने वो जिसने
- 56:27जान लिया मैंने हूँ। मेरा कुछ नहीं हूँ, मैं यहाँ हूँ
- 56:37बहस्य आना है बाकी कबीर कहते हैं सब मो रख जो कहते हैं मैं हूँ और
- 56:45मैं ही हूँ। मैं हूँ तो ममकिन हूँ उसे बड़ा
- 56:50मूर्ख और पागल व्यक्ति या धरती पे कोई नहीं ना होगा ना भूतो ना
- 56:55भविष्य के इससे पहले के नेपोलियन वो लिखते हैं इम्पॉसिबल वर्ड इस।
- 57:07ओनली फाउंड इन होलिशस डिक्शनर और वाटरलू का जंगार्ग उसको दे से
- 57:19निकाला दे दिया क्या? सड़ सड़ के बर्फ़।
- 57:25उसके शब्द तो तुम आज भी उठा लेते हो लेकिन उसकी जिंदगी का आखिरी
- 57:31हसर तुम नहीं देखते। चाणक्य की बातों को तुम आज हुई।
- 57:44मानकर उसका पीछा करते हो लेकिन चाणक्य का हजर किसने देखा?
- 57:50शुभबंधु ने सारी झोपड़ी जला दी, रात को सोए पड़े वह ना मरा ना
- 58:03जिया, आधा जल गया छह महीने तक। तड़पता रखा और शुबन्धु चढ़ाने के
- 58:15लिए आता मुख में चार बुर्कियाँ डाल देता और चला जाता।
- 58:20ये असर हुआ उसका जो चणक नीती आज आप किए हो खतरनाक है।
- 58:28चाणक्य का पीछा कभी मत करना सत्य का पीछा सदा ही करना
- 58:46पूछा है कि ने कहा जो कुछ करता है पर महात्मा करता है।
- 58:55मैंने बड़े विराट अंदाज में तुम्हें समझाया।
- 58:59तुम्हारे यहाँ कुछ नहीं जो तुमने बनाया हो फिर वही तो करता है
- 59:03सूर्य चाँद तारे उसने बनाए तो वही तो गुमारा है जो उसने बनाया उसे
- 59:11घुमाएगा वही ना तो तुम्हारे ऊपर लगा हुआ पदार्थ किसने बनाया?
- 59:20इस शब्द को फिर सुन सभी कुछ परमात्मा ने बनाया और जो उसने
- 59:25बनाया उसको गतिमान, वही करता है ये सूरज, ये चाँद, ये तारण
- 59:32नक्षत्र या ग्रह या आसमान। ये फूल, ये बगीचे या बाहर, ये
- 59:44फिजाएं, ये कजायें सब उसी की बनाई हुई है और फिर चलाता कौन?
- 59:55क्या वह बना के भूल जाता है लावारिश छोड़ देता है।
- 59:59नहीं, वह बनाता है और वह चलाता है।
- 1:00:13तुमने यह कैसे मान लिया कि यह पदार्थ भी मैंने बनाया और यह
- 1:00:19पदार्थ को चलाऊंगा कि मैं सूर्य, चाँद, तारे।
- 1:00:26आसमान पेड़ पौधे कभी नहीं कहते क्या हम चलते हैं खुद से और
- 1:00:32इसीलिए यह मान है प्रकृति के करीब जाकर देखो कितनी शांति है क्यों
- 1:00:39उनमें मैं का भाव नहीं और बंदे के पास भटके देखो।
- 1:00:45लासानी तरंग को से भरा पड़ा यह लासानी तरंगे मेह का उत्पाद है।
- 1:00:52यह विजाति के अद्रोह पर है, मेह का उत्पाद है और इसमें से सडान
- 1:01:02आती है। जब यह सारी सर्जनों का उत्पादन
- 1:01:14सर्जन हारे ने किया और ग्रह नक्षत्र सूर्य, चाँद, तारे,
- 1:01:25ब्रम्हंड, आकाशगंगा। यह मिल्की में और सारे जिसने बनाई
- 1:01:32वो ही तो चला रहा है। वो तुम्हारे का ख्याल है, वो बना
- 1:01:38के लावारिस करके छोड़ देता है यही तो तुम अटक जाते हो।
- 1:01:45नहीं नहीं, वो बना के संभालना है बराबर, लेकिन तुम बराबर में उसके
- 1:01:51बराबर में युद्ध करने के लिए पैरलल बैठ जाते हो तुम कहते हो कि
- 1:01:56हम जैसा करेंगे वैसा करेंगे। वह कहता है।
- 1:02:02बिदनाते लेख किसी समझ न आते हैं। भधाई लाख बुरा चाहे भी तो क्या
- 1:02:20होता है तुम्हारे चने से कुछ नहीं होता होता है वही तो मंजर है, खुद
- 1:02:26होता है वह खुद बनाता है और वह खुद चलाता है तुम तो सो जाते हो।
- 1:02:39कौन धड़कता है दिल को? तुम तो भूख सूती के निद्रा के
- 1:02:46भीतर सोए होते हो। कौन पल पल में धड़काता है?
- 1:02:51हृदय को 72 बार 72 बार और कौन इस फेफड़ों को स्वास्थ दिलाता है?
- 1:03:00किसने दी है जिंदा रहने के लिए ऑक्सीजन और किसने दिया है जिंदा
- 1:03:06रहने के लिए भोजन कौन है, वो क्या खुद से तो कुछ कर जाओगे?
- 1:03:19लेकिन तुम्हारी बुद्धि बड़ी समता है, इसलिए बाबा ने पहला शब्द कह
- 1:03:25दिया शेर से शरण अपना लाखों वे तय करने चले ना तुम्हारी बुद्धि की
- 1:03:30सोचें व्यर्थ हैं, गलत हैं, व्यर्थ हैं, गलत हैं।
- 1:03:42न तुमने कुछ बनाया, न तुम कुछ चलाने के जिम्मेदार जैसा चलता है
- 1:03:48उसे चलने दो वह चलाता है जैसे सूर्य चांदना तुम तो सोच भी नहीं
- 1:03:57सकते कि सूरज को इस आग को जिसका बाहर का टेम्परेचर 5000 डिग्री
- 1:04:06सेल्सियस है और भीतर का टेम्परेचर 1,00,00,000 डिग्री सेल्सियस है।
- 1:04:121,00,00,000 डिग्री वह कौन होगा जिसने अपने हाथों से इसे
- 1:04:18एस्टब्लिश किया होगा? कौन है वो अपने आप भी इसके लिए
- 1:04:24पीसो क्या? फिर तो क्या धरती पे गिर भी सकता
- 1:04:31है? अरे तू तो कप रहा है?
- 1:04:43कौन है वो जलता हुआ आग का गोला? बृहस्पति के अंदर 1300 जमीनें समझ
- 1:05:01सकते हैं 13,00,000 प्रचुरियां समा सकते हैं।
- 1:05:08कितना भरा होगा तुम यहाँ कहते हो, मैं हूँ तो मुमकिन है पृथ्वी का
- 1:05:25एक क्विंटल भार भी तुमने उठा चुका है।
- 1:05:28पृथ्वी का भार 5.97 इंटू 10 अबव 2410 के आगे 24 जीरो लगा।
- 1:05:40दो 5.97। 10241000 लिख दो आ गया गिनती में
- 1:05:49नहीं आता, इतने किलो की पृथ्वी है और पृथ्वी का इतना भार होने के
- 1:05:58कारण ही हम पृथ्वी पर ठीक से चल पड़ते हैं।
- 1:06:02चंद्रमा के हम चल नहीं सकेंगे। चंद्रमा पे जमीन थोड़ी है 5.97
- 1:06:14इनटू 10 अबोव टू फॉर 24 जीरो लगा दो।
- 1:06:215.97 के आगे इतने किलोग्राम की है धरती और इतनी धरतियां एक
- 1:06:3113,00,000 धरतियां सूरज में समा सकती हैं और सूरज?
- 1:06:39इतना ही नहीं आग का गोला 1,00,00,000 डिग्री सेल्सियस,
- 1:06:44भीतर का तापमान और बाहर का सफर का तापमान 5000 डिग्री सेल्सियस
- 1:06:54तुम्हारी बुद्धि सोच पाएगी। लेकिन यह है सब कुछ देखकर लाउसे
- 1:07:09नहीं कहते बाहर का नजारा देखकर लाउसे नहीं कहते लाउसे कहते हैं
- 1:07:16अपने भीतर का नजारा। वहाँ जाकर देखते हैं यह विराट
- 1:07:27ब्रम्हंड इतना विशाल और बिलकुल मौन मूक अपनी क्षेत्र।
- 1:07:37में बंधा हुआ चल रहा है। प्रभु जी ने ऐसी काय नात्मा दी,
- 1:07:49प्रभु? जी ने ऐसी काय नात्मा दी?
- 1:07:551 दिन के पीछे एक रात बांधी साथ साथ बांधी प्रभु जी।
- 1:08:05ने ऐसी खाये नात बांधी। 1 दिन के पीछे एक रात बांधी।
- 1:08:15साथ ही साथ यह देखकर अपने भीतर उतर कर देख के मैं कहता आँख देख
- 1:08:24के यह बातें तो 5.97 इंटू 10 अब अप टु फोर।
- 1:08:33यह बातें तो वैज्ञानिक ने बताई कागज की लेखी हैं ये तो लेकिन
- 1:08:41भीतर जाकर देखते हैं लओजे तो देखते हैं।
- 1:08:48जो कुछ करता है परमात्मा करता जिसने बनाया वही तो करता इतनी
- 1:08:52वृहद सृष्टि तुम जिसका एक आकण भी कभी निर्मित नहीं कर सकोगे
- 1:09:01तुम्हारा सिर्फ दावा है क्या? और दावा पल भर में उड़ जाता।
- 1:09:10और कितना रहम करीम है वो कि तुम्हारे सामने शीशा रखता है
- 1:09:16मृत्यु के रूप में, लेकिन तुम सब छोड़ जाते हो यह।
- 1:09:27और कमाने में सारी ज़िन्दगी व्यर्थ कर देते हो, फिर सारे लोग
- 1:09:34दौड़ रहे हैं। तुम कहते हो हम भी दौड़ो।
- 1:09:37सारे लोग दौड़ रहे हैं तो कुछ न कुछ तो होगा सभी लोग तुम जैसे ही
- 1:09:41मूर्ख हैं कोई किस्से कहे। सभी मूर्ख हैं सब में सयानी, एक
- 1:09:52मत मूर्ख अपनी तुम्हारी सब की मतियाँ अलग अलग है, देखो मैं एक
- 1:10:00चीज़ डाल देता हूँ और सब की मतिया अलग अलग है।
- 1:10:07लेकिन सभी सयानों की मति एक मत सब है।
- 1:10:11सयाने एक मत और अच्छे के लिए करता है और अच्छे के लिए करता है ताकि
- 1:10:21तुम्हें पता चल जाए कि तुम हो नहीं।
- 1:10:26भला इतनी वृहद संरचना जो मैंने बोली या कुछ भी नहीं?
- 1:10:29बोली इट इस नग नगली से बात न गन्नी आएगी, फिर भी आपको ऐसा
- 1:10:37लगेगा क्यों माशाल्लाह इतना? ये तो कुछ भी नहीं।
- 1:10:51प्रभु जी तोरी अनहद माया जी, प्रभु जी तोरो भेद न पायो जी।
- 1:11:14जो कुछ करता है, परमात्मा करता है और भले के लिए करता है तुम्हारा
- 1:11:18भला कब होगा इसको अच्छी तरह से समझ लो।
- 1:11:23जो कुछ करता है, वह परमात्मा करता है।
- 1:11:26यह तो तुम्हें समझ आ ही जाएगा क्योंकि तुमने बनाया यहाँ कुछ भी
- 1:11:30नहीं। लेकिन भले के लिए करता ये तुम्हें
- 1:11:35समझ नहीं आएगा, भले के लिए ऐसा करता है कि तुम अभी अपना बुरा कर
- 1:11:40रहे हो, इसलिए दुखी हो बुरा कर रहे हो बुरा क्या कर रहे हो कि
- 1:11:47मैं हूँ और मैं हूँ और मेरा है। और मैं हूँ और मैं हूँ तो मुमकिन
- 1:11:56है इससे बुरा तुम सोच नहीं सकते की नजरों में इससे बुरा और कुछ
- 1:12:03तुम सोच सकते हैं बुरे से बुरी बात है यह सोचना।
- 1:12:10और गलत से गलत बातें हैं। सोचें तुम सब कुछ कर सकते हो और
- 1:12:19मैं हूँ ये दोनों फेक हैं, है नहीं यही इलूशन है, यही भ्रम है
- 1:12:28व्यक्ति का। यही टूट जाए तो क्या बात
- 1:12:41सच्ची फकीरी द मज़ा ओह चक्खे सच्ची फकीरी द मज़ा ओह चक्खे
- 1:12:48जेड़ा बेकर्ज़ होवे बेफर्ज होवे बेमर्ज होवे ते बेगर्ज़ होवे।
- 1:12:58वह फकीरी का मज़ा उठाता है। तुम फकीर कह देते हो अपने आप को,
- 1:13:05लेकिन बेगर्ज कहाँ हो? हर 5 साल बाद तुम्हें ठूठा उठाना
- 1:13:12पड़ता है। वोटरों के पास जाना पड़ता है।
- 1:13:14और तुम लाख हो पाए कर दो किसी तरह वोटरों के पास नहीं यहाँ पड़े एक
- 1:13:18को ही खरीद ले चल, ज्ञानचंद को ही खरीद ले राजीवचंद को ही खरीद ले
- 1:13:30बस खत्म हो जाए बात और जो तुम्हारे वृद्ध बोले।
- 1:13:34उसको मार दे नहीं नहीं इतने से बात थोड़ी तुमसे बड़ा मूर्ख कौन
- 1:13:42है इस धरती पे कोई भी है कबीर से बड़ा सिया ना कोई।
- 1:13:52और तुमसे बड़ा मोरू को भले के लिए करता है ये बात अटक न
- 1:14:09जाए आज आए हैं इस बात पे तो आज ये बात पूरी तरह से।
- 1:14:17साफ हो ही जानी चाहिए कि भला है क्या भला?
- 1:14:25उस दिन होगा तुम्हारा जीस दिन तुम्हें सत्य पता चल जाएगा उस दिन
- 1:14:29तुम्हारा भला होगा और सत्य का तो नो होता है सर।
- 1:14:39यह सत्य पहले तुम अपने आप को जानोगे, मैं शरीर नहीं हूँ भावना
- 1:14:51ही नहीं हूँ विचार नहीं हूँ। कलपुर्जे बाहर भीतर के मैं नहीं
- 1:15:01हूँ यह बुध जान लेते हैं, नहीं तुम्हें भी जानना होगा, लेकिन
- 1:15:11उससे आगे भी जानना होगा। बुद्ध कहते हैं कि मैं यह ढांचा
- 1:15:20नहीं है उस डांचे से परे कुछ और, लेकिन कृष्ण कहते हैं, तुम उस
- 1:15:30ढांचे से परे कुछ और फिर रहे। उस दृष्टता से परे कुछ और भी नहीं
- 1:15:38दृष्टता से भी पार हो तुम दृष्टता के भी दृष्टता हो तुम ओब्सर्वर के
- 1:15:45भी ओब्सर्वर हो तुम। कृष्ण कहते हैं, चलिए तुम्हारी
- 1:15:52छोटी सी खोपड़ी में समझ नहीं आएगा गागर में सागर समायेगा नहीं,
- 1:15:57इसलिए तुम ऐसा करो कि अपनी खोपड़ी को ही जैसे उस बच्चे ने प्याली को
- 1:16:02समुद्र में ही फेंक दिया था कि प्याली में तो समुद्र नहीं आता?
- 1:16:07चलो, समुद्र में तो प्याली समा सकती है ना?
- 1:16:13और हक्के बक्के रह गए। जीस बात को मेरी सदस्य की तय न कर
- 1:16:19सकी। इस छोटे से बच्चे की हकीकत न
- 1:16:22करती। वह तो नहीं तो मैं समझ सकता तुम
- 1:16:34तो उसमें समझ सकते हो ना तो इन्सर्ट यूरसेल्फ़ कंप्लीट्ली
- 1:16:44इन्सर्ट यूरसेल्फ़ कंप्लीट्ली। जिसे तुम सत्य कहते हो उसमें फिर
- 1:16:55भेद खुलेगा। जब पहले वेद का अंतर दा पूहा खोल
- 1:17:00के अपने अंदर दा सुखवासी हाँ उस मंदिर का।
- 1:17:04जितनी चढ़ती है, ना लेती है, ना पसीना आता है, ना ठंडी हवाएं ना
- 1:17:15चढ़ती है, ना उतरती है। दिमाग की हालत बदलती नहीं, तुम
- 1:17:21सिथरमती हो जाते हो अकंप। कपते नहीं हो, शेक नहीं होते अकम
- 1:17:32पर खड़े रह जाते हो कंपाइ मानने को वह तत्व तुम हो तो कृष्ण कहते
- 1:17:41हैं वह तत्व तो मेरा विरा क्यों? अर्जुन पहले तुम्हे मैंने अपना
- 1:17:47आपवा दिखाया कि तुम कौन हो अब आ तू देख के मैं कौन हूँ मेरा विराट
- 1:17:55विराट देख फिर स्वरूप दिखाती हैं अपना।
- 1:18:02पहले तुने देखा अपना आपा अब तू देख मेरा स्वरूप, मेरा विराट
- 1:18:10स्वरूप वही सत्य है जीसको ये पता चल जाए तुम्हारा कुछ है ना?
- 1:18:28तुम भी नहीं हो ये बात बड़ी बोनी किसी गुरु भाग्य के क्षण में
- 1:18:38तुम्हारे भीतर विभीषाग्रति में ये बात बैठ गई कि मैं हूँ।
- 1:18:44तो मैं हूँ तो मेरा भी कुछ है लेकिन उलटे चल पड़ते हैं।
- 1:18:51लाल से कहते हैं न तो तुम हो और जब तुम ही नहीं हो तो तुम्हारा भी
- 1:18:56कुछ है। यह क्या है?
- 1:19:06यह है जिसे भला कहते हैं तुम्हारा भला हो जाएगा हम किसी गरीब भिकारी
- 1:19:23को उसकी। भूख मिटा देते हो।
- 1:19:27कहते हैं तुम्हारा बाला भला शब्द की डेफिनिशन क्या है भला?
- 1:19:41शब्द की डेफिनिशन है कि तुम्हें पता चल जाए, तुम हो भी के नहीं हो
- 1:19:46तो तुम पाओगे, तुम नहीं। यही मैं कब से बोल रहा हूँ कि तुम
- 1:19:56नहीं हो भाई मेरी बातों पे यकीन मत करना लेकिन ठहर भी मत जाना
- 1:20:08यात्रा करना। क्योंकि मेरी बातों पर यकीन किया
- 1:20:12तो वह बन जाएगा। शास्त्र और शास्त्र मुर्दा होता
- 1:20:16है। मैंने देखा तो मेरा अज्ञान खोया
- 1:20:23है, लेकिन मेरे ज्ञानी होने से तुम ज्ञानी नहीं हो पाओगे।
- 1:20:29मेरे शब्दों को तुम अपने न्यूरॉन्स में फीड कर सकते हो,
- 1:20:36ज्ञानी होने का भ्रम पाल सकते हो, लेकिन ज्ञानी हो के तो मैंने देखा
- 1:20:44जो देखा वैसा बोला, लेकिन तुम मानना मत।
- 1:20:48बिल्कुल ही मत मानो क्योंकि तुम माने की गाय सारे द्वार दरवाजे
- 1:20:55तुमने बंद कर दिए। तुम्हारी मान्यताएँ सभी द्वारों
- 1:20:58को बंद कर देती हैं और भीतर अज्ञान पड़ा सड़ता रहता है,
- 1:21:04दुर्गन्धित हो जाता है। तुम मान मत लेना हाँ, मैंने देखा
- 1:21:10है बिलकुल देखा है, मैं कहता हूँ तुम इसे शास्त्र मत बना लेना,
- 1:21:21मैंने देखा कि मैं आनंदित भी हूँ। तुमने माना तो तुम मान के क्षण भर
- 1:21:28के लिए आनंदित हो सकते हो। ये ठीक है जब मैं बोलता हूँ तो
- 1:21:36मेरी वाणी अनाथ नाथ का उदगम स्रोत जहाँ है उस अमृत कुंड में से
- 1:21:45निवृत बढ़ के आते है। तो मेरी वाणी को सुनोगे तो बूंद
- 1:21:52बूंद जरेगा वो अमृत तुम्हारे भीतर और जैसे जैसे वो बूंद बूंद जरेगा
- 1:21:59और अमृत कभी कम नहीं होता, आनंद कमी कभी कम नहीं होता।
- 1:22:04आनंद जुड़ता ही जाएगा और तुम तुम्हारा आनंद घना होता चला
- 1:22:11जाएगा। सुनने का यह प्रभाव है लेकिन
- 1:22:17सुनकर गुण भी लेना एक वक्त तुम्हारा कुमारू उतर जाएगा मेरा
- 1:22:23बोला हुआ। जीतने घंटे काम आए ठीक उसके बाद
- 1:22:27तुम बैठ जाना स्वयं खोजना अपने भीतर कि तुम हो कौन और 1 दिन तुम
- 1:22:34भी उसे समुद्र तक पहुँच जाना जो अमृत से भरा पड़ा है जो रहस्य से
- 1:22:40भरा पड़ा। जो आनंद से भरा पड़ा और तब तुम
- 1:22:43धन्य हो जाओगे तब तुम्हारा भला हो जाएगा और फिर भला होने के बाद तुम
- 1:22:57पीना। और पीने के बाद तुम बांटना औरों
- 1:23:06का भी भला हो सकता है। लोग तुम्हें गालियां निकालेंगे।
- 1:23:13निकाल? भला करने वाले भला करने वाले भलाई
- 1:23:31किए जा। भला बुराइ के बाद ले भलाई किए भला
- 1:23:47करने वाले भलाई किए। जा बुराइ के बदले भलाई दिए भला
- 1:24:07करने वाले। जब तुम्हारा भला हो जाए, तुम जान
- 1:24:13लो कि तुम हो नहीं और तुम्हारा कुछ है, नहीं तो उसे बांटना शुरू
- 1:24:18कर देना ताकि और जो गुण हुए रोग हैं, जो प्यासे और सभी प्यासे हैं
- 1:24:26या बस प्यास बुझानी कैसे है? यह सलीका नहीं आता मैं यह
- 1:24:36तुम्हारे नकली गुरु बटका देते हैं राधे राधे करते रहो पांच नाम करते
- 1:24:41रहो यह बटका देते हैं तो तुम्हारा कसूर भी नहीं है कसूर इन दुष्टों
- 1:24:47का है। भला हूँ नहीं जब तुम्हारा हो जाए
- 1:24:54भला तो एक काम करना उसको अमृत को पी लेना मैं 35 वर्ष तक का मृत भी
- 1:25:01बाबा कहते कुछ भला, मैंने कहा बाबा पी लेने दो, कहते औरों को भी
- 1:25:09पीला। और ज़रा सी दे दे सा की और ज़रा
- 1:25:18सी और और ज़रा सी दे दे सा की और ज़रा सी और।
- 1:25:29कैसे रहूं चुप के, मैंने भी ही क्या है?
- 1:25:35होश अभी तक है बाकी और ज़रा सी दे दे साखी और ज़रा सी आह।
- 1:25:48तो फिर बांटना शुरू करते रहो ताकि दूसरों का भी भला हो जाए।
- 1:25:56ईश्वर जो करता है, वही करता है और भले के लिए करता है।
- 1:26:00भला क्या है तुम्हें पता चल जाए कि तुम हो ना और तुम्हारे यहाँ
- 1:26:05कुछ नहीं है। और ज़रा नजर खोल के देखना तुमने
- 1:26:10कुछ बनाया है जहाँ जो तुम्हें तुम जीसको कह सको कि ये मेरा है, ये
- 1:26:15मैं हूँ नहीं तुमने कुछ नहीं बनाया।
- 1:26:19आखिर में यही पांव है। तो फिर महज इसलिए मैं कहता हूँ,
- 1:26:25महज तुम्हारा दावा है। ये क्या है?
- 1:26:31मेरे इस सरूर का पता है तुमको राज़ क्या है मेरे इस सरूर का?
- 1:26:43इस सरूर में ज़रा सा रंग है गुरु गुरु का।
- 1:26:49अहम ब्रह्मास्त्र तत्व वशीषित के अनलहक।
- 1:27:03पता है तुमको राज़ क्या है मेरे इस सुरूर का के इस सुरूर में ज़रा
- 1:27:13सा रंग है गुरूर का जो मैंने पी तो क्यों न?
- 1:27:19स। जो मैंने पी तो क्यों नशा उतर गया
- 1:27:26हज़ूर का जो मैंने पी तो क्यों नशा उतर गया हज़ूर का और ज़रा सी
- 1:27:36दे दे साखी और ज़रा सी। ओह।
- 1:27:40कैसे रहूं चुप के मैंने भी ही क्या है और ज़रा सीधे साखी और
- 1:27:50ज़रा सीधे साखी, और ज़रा। तो फिर जब तुम्हें पता चल जाए कि
- 1:27:58तुम्हारा भला हो जाए। तो उस भले को दूसरों के भले के
- 1:28:05लिए बाँट देना गालियां मिलेंगी, लोग थूक कर जाएंगे, लोग दंडित
- 1:28:13करेंगे, लोग अपमान करेंगे, कोई बात नहीं।
- 1:28:17तुम तो जानते ही ना जिसका अपमान है, वह मैं नहीं हूँ, जिसके ऊपर
- 1:28:24थूक गया कोई, वह तो पंचभौतिक तत्वों का बना हुआ है।
- 1:28:33कोई गाली निकाल गया तो तुम तो जानते हो ना?
- 1:28:36तुम तो मूर्ख नहीं हो ना, तुम तो स्याने हो गए ना तो उसे थूक जाने
- 1:28:42दो, उसे गाली निकाल देना यहीं से उठती है बात नॉन रिएक्टिवनेस की
- 1:28:49विथाउट एनी एफर्ट स्वयं से आता है नॉन रिएक्टिवनेस।
- 1:28:57पता लगता है जिसके ऊपर थूक गया वो मैं हूँ ही नहीं जीसको गाली निकाल
- 1:29:02गया वो मैं हूँ ही नहीं जीसको भला बुरा बोल गया वो मैं हूँ ही नहीं।
- 1:29:16मुद्दतों की शाम जो बात छुपी हुई थी पर्दे में उस बात को आम कर
- 1:29:25देना मुद्दतों की प्यास आज। एक जाम बन गई मुद्दतों की प्यास
- 1:29:36आज एक जाम बन गई कि ये खुशी की। शान शाम इंतकाम बन गई।
- 1:29:46जो बात। हम में तुम में थी जो बात हम में
- 1:29:52तुम में थी। वो बात आम बन गई और ज़रा सी दे
- 1:29:59जैसा थी और ज़रा सी। जो बात कभी तुम में और सत्य में।
- 1:30:07छुपी हुई थी वो राज़ खोल दो, उस बात को आम कर दो जो बात हम में
- 1:30:16तुम्हें। थी वो बात।
- 1:30:18आम हो गई उसको आम कर दो, तुम्हारा भी भला हो गया।
- 1:30:27दूसरे का भी भला हो जाए। भला करने वाले भलाई किए जा बुराइ
- 1:30:44के बाद। ले भलाई दिया जा भला करने वाले।
- 1:31:06धन्यवाद।