Latest / Baba ji Vijay Vats / 19 Feb 26 - असली तप क्या है? गुरु मान्यो ग्रंथ का सही अर्थ? शास्त्र और गुरु की भूमिका!! Must Watch
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- 0:15कह रहा हूँ ग्वालियर से पूछते हैं बाबा तप और तपस्चर्या क्या चीज़
- 0:30है? क्या शास्त्रों में परमात्मा होता
- 0:37है? क्या गुरु पूजनीय होता है?
- 0:52देवदारी गुरु को गुरु मानना चाहिए या नहीं, कृपया इन दुविधाओं में
- 1:03से हमें निकालें, कृपया करें, कष्ट करें।
- 1:13तप क्या है? इंद्रियों को सताना तप नहीं।
- 1:25इंद्रियों को वश में करना तप है इंद्रियों को सतना तप नहीं है
- 1:35इंद्रियों को वश में करके, मानव को वश में करके, इंद्रियों को वश
- 1:41में करके इंद्र हो जाना। और इंद्रियों को अपने इशारों पर
- 1:51नचाना, यह तप तपचर्या तप? कोई एक पांव पे खड़े हो जाना,
- 2:05उलटे बल खड़े हो जाना, सर्कस करना सपने तब है अपने इंद्रियों को
- 2:23अपने अधीन करके। उनसे यथायोग काम लेना।
- 2:34आज तुम इंद्रियों के गुलाम और तब का अर्थ है वह विधि।
- 2:45जीस विधि से इन्द्रियां तुम्हारी गुलाम पहुंचा है, आज मन तुम्हें
- 2:54परेशान करता है। कल यही मन तुम्हें आनंद के गीत
- 3:03बरसाने लगे। तुम्हारे आनंद का साधन बन जाए।
- 3:15यह तब होगा जब इन्द्रियां और मन तुम्हारे वश में हो।
- 3:25आज तुम इन्द्रियों के वश में हो। मन के वश में हूँ जैसी इन्द्रियां
- 3:31कहती है, जैसा मन कहता, वैसे तुम नाचते हो।
- 3:39कल जब तप सध जाएगा, तप चर्या सध जाएगी।
- 3:46तो तुम इंद्रियों को जैसे चाहोगे, वैसे उनसे काम ले सकोगे।
- 3:57जब इन्द्रियां तुम्हारे वश में होती आपने देखा जब किसी को
- 4:05पक्षाघात हो जाता है। पैरालायसिस हो जाता है तब उसका
- 4:12अंग उसके आदेश के बावजूद काम नहीं करता है।
- 4:17फर्ज गुरु यह हाथ से ठहर गया, पैरालायसिस हो गया।
- 4:22फिर यह मेरे कहने से काम नहीं करेगा।
- 4:26फिर यह मेरे वश में न रहा हो। इसको अपने वश में करके अपने
- 4:35आदेशानुसार इससे काम लेना तप है। तुम्हारी इन्द्रियों को तुम्हारे
- 4:43मन को पक्षाघात हो गया है। तुम पैरालायसिस से पीड़ित हो और
- 4:54तुम काम नहीं, ये करते हो, उलटे सीधे काम करके कहम तप कर रहे हैं।
- 5:03तप पस्चर्या करें। ये तक नहीं तब तो परिणाम के रूप
- 5:14में आएगा जब यह शरीर का अंग तुम्हारे आदेश से काम करेगा।
- 5:27आज मन अपने आप भटकता है, चलता है क्योंकि मन बाबरा हो गया है
- 5:36पक्षाघात हो गया है पैरालायसिस से ग्रस्त है, पगला गया है मन।
- 5:46तुम चाहते हो मौन हो जाना, लेकिन मन है के सुन्दर सुन्दर नाम देते
- 5:55हैं तो मैं भटकाता मन कहता नहीं है तो भगवान करना।
- 6:09मन तुम्हारे अधीन आ रहा जब तुम्हारे मन अधीन हो जाता है,
- 6:19इन्द्रियां अधीन हो जाती हैं तो तुम इन्द्रजद्ध हो जाते हो।
- 6:26मेघनाथ ने रावण के पुत्र ने इन्द्रियों को लिया था।
- 6:31इसलिए उनका नाम रखा इंद्रजीत। उनका नाम नहीं था।
- 6:37उनका नाम था मेघनाद। मेघनाद से इंद्रजीत बन गया
- 6:45इंद्राजीत उसकी उपाधि थी जैसे महावीर की उपाधि थी महावीर।
- 6:51नाम था वर्धमान तप और तपष्चर्य शरीर विशेष के किसी अंग को डराना
- 7:10थकाना। उसको त्रस्त करना, उसको व्यथित
- 7:21करना, यह तप नहीं उसको अपनी इच्छा के अनुसार उससे काम लेना।
- 7:35आज तुम्हारा मन भटकता है, तुम्हारी इन्द्रियाँ भटकती हैं
- 7:51यह भटकन तुम्हें कहीं पहुंचने नहीं देती, माला तो कर में फिर
- 8:01है। जीव फिर मोह माला तो कर में फिर
- 8:12जीव फिर मुख मा मनीराम चहुदिश फिर मनचाहरों और फिरता है।
- 8:24यह तो स्मरण नाम तुम तो इसी को स्मरण करते हो।
- 8:34तप पुरुष तपस्या शरीर की इन्द्रिय को मन को दबाना नहीं।
- 8:48वरन इन्हें सवस्थ करके आज ये रोगग्रस्त है, पैरालायसिस है
- 8:55इन्हें सवस्थ करके इनसे काम लेना जीस काम के लिए ये बने।
- 9:06आइकुम पगला के हो सारी मानव जाति पगला के अंधी दौड़ शुरू है और यह
- 9:24दौड़ बिल्कुल कोलू के बैल की तरह है।
- 9:27सारे दिन कोलू का वेल चलता है। सांझ जब उसके आँख की पट्टी खेलती
- 9:35है, वह पाता है कि मैं वहीं का हूँ, यह कोई तपस्य है?
- 9:46यह तो गोल गोल घूमता है। सारा दिन पूछा क्या शास्त्र में
- 9:59परमात्मा होता है? परमात्मा तो नहीं होता जैसे अनु
- 10:13बम बनाने का फॉर्मूला किताबों में होता है, लेकिन किताबें?
- 10:20अनु बाम नहीं हो अनु बाम को बनाने का फॉर्मूलेशन होता है।
- 10:32तुम उस किताब को खोल कर। ढूंढ सकते हो?
- 10:38आइटम कैसे बनाये जाए, कौन कौन सी सामग्री व्यक्त होगी, क्या क्या
- 10:45कैसे कैसे करना है? किताबों में परमात्मा नहीं होता,
- 10:57लेकिन किताबें पूछी नहीं होती। तब तक जब तक के तुम्हें मंजिल
- 11:11नहीं मिल जाती, शास्त्र पूजनीय है।
- 11:18जब तक तुम्हें परमात्मा नहीं मिल जाता, उसके बाद बेकार हो जाते
- 11:21हैं। देखो तुम पांच मुँह से छठी में हो
- 11:24गए। तो पांचवीं की किताब में कमर के
- 11:28लिए रद्द हो गई। ना तुम जरूरतमंद को दे सकते हो या
- 11:35बिच देते हो, किसी किताब में परमात्मा नहीं है, ना बाइबल में
- 11:47है, ना कुरान में है, ना गीता में है ना किसी में।
- 11:53ना गुरु ग्रैंड सर थिस ऑल आर जीपीएस ये सब मैप है।
- 12:06परमात्मा तक पहुँचने के रास्ते इनमें दर्शन और तुम्हारा पागलपन
- 12:24क्या है? तुम इनको सिर पर रख लेते हो सिर
- 12:32पर रखने के योग्य हैं। सादर सनामान देने के युग है, सिर
- 12:42पर रखने के युग है, सिर पर ढोने के युग नहीं।
- 12:48अगर तुम दिन भर रहो तो सिर पर ढोते रहो।
- 12:53गुरु ग्रन सह तो यह पागलपन होगा रात को सोते सोते भी ग्रन साहब को
- 13:00सिर के ऊपर तुम बांध के सो जाओ। यह पागलपन है सम्मान देने के लिए
- 13:08ठीक है। इसमें वो चीज़ें तर्ज हैं।
- 13:14जो अभिव्यक्ति में आती ना वो गहरे सूत्र लिखे हैं।
- 13:20इसमें और एक एक सूत्र बहुमर्य है। है तो किताब।
- 13:32लेकिन ऑटोमिक फार्मूला लिखा है तो वह किताब संग्रहित करने योग्य हो
- 13:38जाती है। है तो किताब लेकिन वही किताब
- 13:45पूजनीय हो जाती है क्योंकि इसमें अपने भीतर जाकर।
- 13:49उस आनंद को खोजने के ढंग लिखे हुए हैं, लेकिन एक बात तो मैं स्पष्ट
- 14:00करता हूँ, ये किताबें परमात्मा नहीं हैं, किताबे मैप्स हैं।
- 14:09नक्शे हैं जैसे फौजियों के पास रख नक्शे होते हैं।
- 14:17शत्रु के कौन सी सीमा में प्रवेश करने का कौन सा नक्शा वो गुप्त
- 14:24होते हैं? किताबों में परमात्मा के नक्शे
- 14:34हैं, किताबें इसीलिए पूजनीय हैं और जब तुम गहरे आनंद के रस में
- 14:43पहुँच जाओगे तो तुम्हारे लिए किताबें बेकार हो जाएँगी, लेकिन
- 14:48ध्यान रखना। पाँचवीं की किताबें उस बच्चे के
- 14:53लिए बेकार हो जाएँगी जिसने पाँचवीं को पास कर दिया है, जो
- 14:58छठी में हो गया है। अभी तुम्हारे लिए गुरु ग्रम साहब
- 15:05बेकार नहीं हुआ। अभी गीता, अष्टवकर, गीता, वेद,
- 15:11पुराण, कुरान बेकार नहीं हुए, लेकिन कृष्ण के लिए बेकार हो गए।
- 15:25कृष्ण उस स्तर पर पहुँच गए। अब वह बिना किताब देखे आपको बता
- 15:31सकता है क्योंकि रोज़ हजारों बार उस रास्ते पे आता जाता है वो
- 15:37रस्ते उससे अनजान ना रहे वो रस्ते, उसके रोज़ की पहचान हो गए।
- 15:49तीसरा पूछो जो जीवंत गुरु है क्या उसको मानना चाहिए कि नहीं मानना
- 15:56चाहिए? माने ना मानने का सवाल ही नहीं।
- 16:07एक किताब में गुलाब के फूल की फोटो खींची।
- 16:15एक किताब में मोतिया, चमेली, गेंदा के फूल छपे।
- 16:27ध्यान से सुनना मेरी बातों को इन बातों में सारी दुनिया उलझी खड़ी
- 16:33है तो क्या उस किताब में छपी हुई फूल की आकृति।
- 16:45वो गुलाब है, वो गेंदा है, चमेली है वो मोतिया क्या उस फूल में
- 16:53सुगंध आती है? नहीं आती?
- 17:04बस उसी तरह गुरु है। गुरु उस किताब में बैठे हुए फूल
- 17:16की तरह है। गुरु एक ढांचा है, इसी तरह किताब
- 17:29है और उस किताब में फूल छपा है। इसी तरह गुरु जैसे किताब या छपा
- 17:43हुआ फूल उसमें सुगंध नहीं होती, वैसे ही इस शरीर रूपी ढांचे में
- 17:50आनंद नहीं होता। और तुम्हें तलाश है आनंद, यह तो
- 18:03पांच तत्वों का बना हुआ है और पाँचों तत्वों में रस नहीं पदार्थ
- 18:12है। लेकिन फिर भी गुरु पूजनीय है।
- 18:20क्यों? क्योंकि पांच तत्व है मिलकर गुरु
- 18:26के बैठने का स्थान बना देते है। यह पांच तत्वों का संग्रहीत ढांचा
- 18:36गुरु के बैठने का स्थान गुरु इसके भीतर बैठा है।
- 18:42इसलिए गुरु गोविन्द सिंह ने जो कहा वो ठीक कहा, लेकिन तुम समझ
- 18:46नहीं पाए। गुरु गोबिंद सिंह ने कहा कि इस
- 18:52ढांचे को परमात्मा मत मान लेना, वैसे ही जैसे किताब में छपे हुए
- 18:58फूल को फूल मत मान लेना, वह फूल की आकृति तो है।
- 19:06लेकिन उसमें सुगंध नहीं है और तुम तलाश में हो।
- 19:09सुगंध की भला तुमने फूल किया, कृते से क्या करना है?
- 19:18फूल सुगंध के कारण प्रशंसनीय है। अगर सुगंध न हो फूल में तो त्याग
- 19:28है तुम क्या संग हो गए कनेर के फूल को कभी सोंधते हो तुम बाग
- 19:39बगीचों में क्यों जाते हो? फूलों को देखने के लिए नहीं।
- 19:48तुम बाद बगीचों में फूलों की महक लेने जाते हैं।
- 20:01इसलिए गुरु गोबिंद सिंह ने कहा गुरु मान्य ग्रंथ यह पंचभूतक
- 20:08शरीर। यह इसके भीतर गुरु विद्यमान है
- 20:18इसलिए यह पूजनीय हो जाता है। और जब गुरु इसके भीतर से निकल
- 20:27गया। तो आप समाधि दे दो कि जला दो।
- 20:34फिर ये ढांचा रह गया, लेकिन यह ढांचा भी पूजनी है इसलिए हमने
- 20:41तत्वों को भी सम्मान दिया। हमने पानी को कहा गंगा मैया।
- 20:48जल देवता अग्नि को कहा अग्नि देवता धरती को कहा धरती माता,
- 21:00वायु, कवह, वायु देवता पांचों तत्वों को हमने।
- 21:09सम्मान दिया और नमन किया। यह भी इत्याज्य नहीं है क्योंकि
- 21:20इनसे ही तो यह ढाँचा बनेगा अगर इनमें से एक भी नहीं है।
- 21:27तो वह ढांचा परमात्मा को अवस्थित होने में रोल अदा नहीं करेगा।
- 21:37ज़रा सोचो इस शरीर के ऊपर धरती का तत्व न लगाओ तो क्या मैं तुम्हें
- 21:44देख पाऊंगा? अगर ये शरीर के भीतर जालो देवता
- 21:54कांड सुनाओ तो क्या यह शरीर ज्यादा दिन जीवित रहेगा?
- 22:00डिहाइड्रेशन में जाएगा। क्या इस श्री के भीतर अग्नियां
- 22:06हो? अग्नि मान देओ जठ रागिनी जीरो हो
- 22:10तो कितनी देर तक जियोगे तुम और वायु ना लोगे तो करोना जैसा हाल।
- 22:22पंच तत्वों की महिमा यही है सिर्फ कि पंच तत्व मिलकर एक ढांचा तैयार
- 22:32कर देते है। उस परमात्मा को आसीन होने के लिए
- 22:38इस ढांचे में परमात्मा आसीन है। इसकी पूजा मत करना, लेकिन फिर भी
- 22:50अगर हम गंध बेचने वाले के पास बैठ जाएं।
- 22:58तो सिर्फ मात्र उसके पास बैठने से ही हमारे वस्त्रों में गंध लिपट
- 23:06जाए और हम जहाँ भी जाएंगे, चाहे हमने इत्र लगाया कि नहीं लगाया।
- 23:14लोग कहेंगे क्या लगाया? खुशबू आ रही है इसलिए यहाँ से तुम
- 23:21चले जाते हो। बहुत दिनों तक तुम्हें सुवास का
- 23:26एहसास होता है क्यों? क्योंकि तुम ऐसे महोर में से आए
- 23:32हो जहाँ सुगंध बरसती है। किसी बगीचे में से निकल के एक दम
- 23:39से बाहर जाओगे तो तुम्हारे कपड़ों में से सुगाना है।
- 23:48गुरु गोविंद सिंह ने जो कहा उसके व्याख्याकार सही नहीं है।
- 23:58गुरु जय ने कहा। यह ढांचा देहदारी यह गुरु नहीं,
- 24:07यह तो पांच तत्वों का अपना होगा, लेकिन फिर भी क्या इसके बिना गुरु
- 24:14आसीन हो सकेगा? हो तो सकेगा लेकिन तुम्हें दिखाई
- 24:19ही नहीं पड़ेगा। प्रगटीकरण नहीं होगा गुरु का गुरु
- 24:29तो सब जगह मौजूद है ईशा वाश्य में दम सरवण यत किंचे जगत या जगत।
- 24:38लेकिन बात प्रगटीकरण की है मौजूद तो कण कण में है जिधर देखता हूँ
- 24:48उधर तू ही तो है, हर झर्रे में तू ही तो है।
- 25:01हर जगह तेरा ही मकान कौन सी ऐसी जगह या तू नहीं है सब जगह है?
- 25:24लेकिन फिर इस खंडहर की जरूरत क्या है?
- 25:30प्रगटीकरण के लिए परमात्मा का प्रगटीकरण यह ढांचा ही कर पाएगा।
- 25:39कितने यंत्र काम करते हैं तुम्हें पता है?
- 25:42कितने यंत्र इकट्ठे होकर प्रयास करते हैं?
- 25:48तब तुम्हें यह आवाज़ सुनाई पड़ती है।
- 25:54कम से कम 23 यंत्र इकट्ठे काम करते हैं, तो आवाज़ तुम थक आती
- 25:59है। यह यंत्र भी कीमती है क्योंकि
- 26:09इसके बिना प्रकृति करण नहीं होता था।
- 26:13ब्रह्मात्मक प्रस्तुति नहीं दी जा सकती थी।
- 26:19इसलिए यह ढांचा पूजनी है। लेकिन गुरु गोबिंद सिंह ने और
- 26:25हिसाब से कहा तुम मातृ से चपट मत जाना, जैसे महावीर से छिपकाहट हो
- 26:33गई थी गौतम को। और गौतम उलझ गया, पहुँच नहीं सका।
- 26:39मैं रोज़ कहता हूँ मेरी इस मीठी वाणी को सुनकर इस धेह से नेह मत
- 26:49लगा लेना यह मेरे बैठने का स्थान। मैं तो तुम्हारे भीतर भी उतना ही
- 27:00हूँ। बस इस शरीर से प्रकटीकरण हो गया
- 27:07तुम्हारे शरीर से प्रकटीकरण होना बाकी 1 दिन हो जायेगा।
- 27:14तुम चिंता मत करो। तो देहधारी गुरु को गुरु मानना
- 27:24चाहिए नहीं मानना चाहिए ये कोई स्वाद नहीं है देहेधारी गुरु देह
- 27:33अलग और गुरु अलग, ये समझो तुम नहीं ये जानना।
- 27:40मानना या न मानना इसका कोई सवाल मैं नहीं रखता।
- 27:47जानना है कि देह के भीतर जो बैठा गुरु असली वो ही है और देह भी
- 27:54पूजनीय है क्योंकि देह के बिना उस असली गुरु का प्रगटीकरण नहीं
- 27:59होगा। जैसे किताब के बिना गुरु ग्रंथ
- 28:04साहब के बिना वो मैप कैसे पता चलेगा कि परमात्मा तक पहुंचने के
- 28:11कौन सा तरीका है? वह सफेद कागजों पर मंडे हुए काले
- 28:18अक्षर ही तो बता पाएगा। जो जितना भी तुम्हारा सहायक हो
- 28:27जाए उसका उतना ही उपकार समझ लेना। किताबें भी सहायक हैं।
- 28:37यह पंचभोतक तत्व भी सहायक है हर समझ।
- 28:43सी। कोई जितना साथ निभाते उतना ही
- 29:00उपकार समझ को। जितना साथ निभा दे जन्म मरण का
- 29:19मेल है सपना। ये सपना विसरा, जन्म मरण का मेल
- 29:38है सपना। ये सपना बिसरा दे कोई न संगमरे दे
- 29:58मनरे। तू काहे न दी र ध र ये निरमो ही
- 30:15मोह न जाने। जिनका मोह करे मन रे तो काहे ना
- 30:32देर धरे उतना ही उपकार समझ कोई। जितना साथ निभाते बस इसका इतना ही
- 30:45उपकार कि यह परमात्मा के प्रवृत्ति करण के काम आया बैठे तो
- 30:53तुम्हें भी उतना ही। लेकिन तुम्हारा यंत्र इसे प्रकट
- 30:58नहीं कर पा रहा है। सभी जगह है मानस दे में
- 31:09सर्वश्रेष्ठ कृति है, मानस दे परमात्मा के प्रगटीकरण की।
- 31:15और कोई भी शरीर परमात्मा के प्रगटीकरण करने में सहायक नहीं
- 31:20होता इसलिए मानव जामा सबसे सुंदर माना गया।
- 31:31सबका उतना उतना अहसन, सब को प्रणाम।
- 31:37क्योंकि उस माह रस तक जाने में सबका सहयोग है।
- 31:42जीवा का भी उतना ही सहयोग है। पांच तत्वों का भी उतना ही सहयोग
- 31:48है। मुझे प्रकट करने में जीस जीस ने
- 31:57जितना सहयोग दिया उसको नमन कर इसलिए गंगा नमन कर नहीं योग्य हो
- 32:05गयी उगता हुआ सूरज का प्रकाश आंगन।
- 32:12नमन करने योग्य हो गए। यह चलती हुई हवाएं पृथायें नमन
- 32:20करने योग्य हो गई। यह सुगंध फूल अर्पण किया हमने
- 32:27इसका हमने कारण कभी नहीं समझा। क्यों फूल अर्पण करते हम?
- 32:33मतलब यही है हे प्रभु इस फूल के भीतर जो सुगंध है वो सुगंध मेरे
- 32:45इस फूल के भीतर भी खिला दे। यह एक जांचना है।
- 32:53जो फूल मैंने अर्पण किया उसके भीतर की जो सुगंध है वो इस फूल के
- 33:00भीतर भी खेला दे। यह एक प्रार्थना हर एक का अपना
- 33:21अपना संयोग होता है वायु का, जल का, अगण का।
- 33:31माटी का इस माटी को नमन कर, क्योंकि इस माटी के कारण ये
- 33:40संरचना हुई अगर एक भी तत्व कम हो गया।
- 33:47तो यह ढांचा ना बन पायेगा और ढांचा ना बन पायेगा तो परमात्मा
- 33:52की प्रकृति करण की राह असंभव हो जाएगी।
- 34:00यह पूजनीय क्यों हुआ? उसका तुम्हें विस्तार से आज मैंने
- 34:06बताया तत्व पदार्थ पूजनीय क्यों हुआ?
- 34:14किताबें पूजनीय क्यों हो गई? यह फूल पूजनीय क्यों हो गए?
- 34:22क्योंकि ये सब? प्रकृति करण के साधना में
- 34:26इन्होंने सहयोग किया और आखिर में सब के सहयोग से हम वहाँ पहुँच
- 34:36जाते हैं जहाँ महारस बरसता है। सबका धन्यवाद करो जितना जिसने
- 34:48सहयोग किया कोई न संग मरे, ये सिर्फ साधना है।
- 34:59यह तुम्हारा सहयोग करता है। आखिरी सब बड़ा काम कर उतना ही
- 35:10उपकार समझ कोई जितना। साथ ही सबको नमस्कार कर, जिससे यह
- 35:26ढांचा दिया हुआ जनम मरण का। खेल है सब न ये सब न हाँ, बिसरा
- 35:47बस इसको इसका कृत्रज्ञ हो जा, इनको धन्यवाद दे दे।
- 35:54एक शब्द आखिरी बड़ा कामकाज मरना तो तुम्हें ही पड़ेगा कोई न संग
- 36:04मर मरो है जोगी मरो मरो मरण है एकठा।
- 36:13मरो हे जो की मरो मरना तो तुम्हारे अहंकार को ही पड़ेगा।
- 36:21मरो मरना है मीठा ऐसी मरने मरो जैसे मरने मर गोरा घटित था।
- 36:30मरना तो तुम्हें ही पड़ेगा अगर अपने भीतर के गौरख को देखना चाहते
- 36:34हो तुम्हारे भीतर का जो तुम हो तुम्हारा नाम जो रख दिया वो इस
- 36:44डाचे का नाम है लेकिन वस्तुता तो तुम अपनी।
- 36:48इस ढांचे के भीतर विद्यमान यह आखिरी शब्द अमूल्य है।
- 37:03सबका सहयोग ले ले। सभी पदार्थों को नमन कर दे।
- 37:09धन्यवाद दे दे कि तुमने सहयोग किया कोई दो पल चला कोई 10 पग चला
- 37:19सबको धन्यवाद दे दे और विदा हो जाओ।
- 37:26लेकिन विदा तो तुम्हें ही होना पड़ेगा।
- 37:38इनका कर्तज्ञ हो पदार्थों का भी कर्तज्ञ हो लेकिन मरना तो नहीं
- 37:47पड़ेगा। तुम यानी अहंकार इल्ल्यूजन।
- 37:54भ्रम इस भ्रम को तो और इस भ्रम के टूटे बिना तुम्हें तुम्हारे अंत
- 38:06के बैठे हुए गौरख का दर्शन नहीं होगा?
- 38:16इतना कुछ अगर तुमसे हो जाए तो यही तप और तपचर्या है मानना जानना कुछ
- 38:27भी नहीं है होना है तुम प्रभु हो। न तुमने प्रभु मानना है न तुम्हे
- 38:39जानना है तुमने होना है तुमने राष्ट्र रूप होना है।
- 38:52अपने अंतः के स्वभाव में गोता लगाना है।
- 38:56और फिर वही हो जाना बूंद ने समुद्र को जानना नहीं होता बूंद
- 39:03ने समुद्र को मरना भी नहीं होता, बूंद ने समुद्र हो जाना होता है
- 39:13और किस तरह समुद्र हो जाती है। उस दिन कृत्य कृत्य हो जाती है।
- 39:21उस दिन आखिरी मुकाम आ जाता है। देवता फूल बरसाते हैं, समग्र सजना
- 39:32नाचती है। यह नृत्य करता है सारा अस्तित्व
- 39:42तुम क्या नाचे? सारा अस्तित्व नाचा ध्यान रखना जब
- 39:48तुम किसी पशु को काटते हो तो उसका दर्द सिर्फ पशु को नहीं होता।
- 39:55तुम भी उसके ही एक अनन्य अंश हो, तुम्हें भी होता है, तुम्हें पता
- 40:00नहीं चलता। इसी तरह जब कोई यह लाइटेड होता है
- 40:06तो आनंद सिर्फ उसे ही नहीं आता। उन फिजाओं में आनंद बिखर जाता है।
- 40:14सारा अस्तित्व नाचता है उस घड़ी इसलिए अगर किसी ने कहा कि तुम जीव
- 40:26हत्या मत करना, तो इसका गहरा कारण यह था कि तुम भीतर से एक।
- 40:34जोड़ाव हो ये भीतर से सब गुसा हुआ है आपस में जैसे शरीर की भांति
- 40:43इसके पैर को चोट पहुंचाओगे तो भी दर्द होगा।
- 40:49इसके हाथ को चोट पहुंचाओगे तो भी दर्द होगा।
- 40:54क्योंकि सब घुसा हुआ है। एक ढांचा है, ऐसे ही अस्तित्व एक
- 40:59ढांचा है। यह यूनिवर्स एक ढांचा है।
- 41:04ब्राह्मण एक ढांचा है और तुम उसके अन्यन्य अंश हो।
- 41:13जी था। असली कारण प्रत्येक व्यक्ति ने
- 41:18अपने अपने ढंग से व्याख्यायित किया।
- 41:21ये बात अलग है, लेकिन असली मतलब ये था कि तुम किस तरह?
- 41:32जीव हत्या करनी बंद कर दो जीव हत्या जब तुम करते हो तो समग्र
- 41:47अस्तित्व को दुख होता है। इसलिए आज सारी जनता दुखी।
- 41:56क्यों तुम अस्तिक हो या नास्तिक हो?
- 42:00ये खोपड़ी की मान्यता है। इससे अस्तित्व का कोई फर्क नहीं
- 42:05पड़ता, लेकिन जब तुम किसी को चोट पहुंचाते हो और दर्द से कराहता है
- 42:14तो वह चीख। सारा अस्तित्व सुनता है और सारा
- 42:19अस्तित्व शोक मनाता है, दुःखी होता है, इसलिए जीव जंतु से पेड़
- 42:27पौधों से प्यार करना है। इसीलिए भी करना के पेड़ पौधों को
- 42:35काट दोगे तो वातावरण दूषित हो जाएगा।
- 42:40और इसीलिए भी करना के जीव जन्तुओं में भी चेतना होती है और पेड़
- 42:44पौधों में भी चेतना होती है। सभी कारणों से तुम्हें पेड़ नहीं
- 42:54काटना चाहिए। सभी कारणों से तुम्हें किसी जीव
- 42:57को नहीं मारना चाहिए क्योंकि वो दुख की लहरें जो छोड़ देंगे वो
- 43:04अस्तित्व पिएगा। हमारे शरीर का कोई भी अंग दुखता
- 43:09है। रात तो हमारी हराम होती ही है
- 43:23आखिर में कहा कोई न संगम रे अकेले ही मरना होगा, कोई गुरु साथ नहीं
- 43:35जायेगा। और ये गुरु जब मरेंगे तो इनके साथ
- 43:40भी कोई नहीं जायेगा। इनके साथ इनके फैलाए हुए झूठ
- 43:45जाएंगे। इन्होंने लोगों को जो गुमराह किया
- 43:53वो पाप जाएगा। बिना उस रस को पहचानी जो रस की
- 44:02व्याख्या की वह पाप जायेगा दूसरे को गुमराह करने का, क्योंकि दूसरे
- 44:08पिता परमात्मा है। तुम महज पत्थरों को नहीं बोल रहे
- 44:14हो, ध्यान रखना। तुम गीता की व्याख्या कर रहे हो
- 44:18ना? आचार्य जी तो इन पांच तत्व के
- 44:25पुतलों के भीतर वो महासम्राट बैठा है, उसको गुमराह करने की चेष्टा
- 44:33मत करो, थोड़ी देर के लिए धन की। वासनाओं के कारण तुम्हारी सब
- 44:43वैक्षिक तुम्हारी बुद्धि की खोज है तुम उसकी व्याख्या करते हो।
- 44:54जो किसी गहरे तल पर विद्यमान है और उस गहरे तल पर जाकर चखना होता
- 45:01है उसका रस और फिर वह कैसा है उसका स्वाद यह बाहर आकर बताना
- 45:08होता है। एक्सप्रेन करना होता है उसको तुम
- 45:11बिना खोजे। मैं बापुरा बूढ़ एंड डरा गए, वो
- 45:16किनारे बैठ जेने खोजा धन पाईया गहरे पानी बैठ तुम गहरे पानी में
- 45:24तो उतरे नहीं, सिर्फ वही हीरे मोती मान के निकाल के लेके आया।
- 45:33जो समुद्र की गहरी तलहटियों में पहुँच गए।
- 45:40तुम व्याख्या करता हो? गहरे तलों पर नहीं पहुंचे इसलिए
- 45:45हीरे मोती लाल नहीं लेकर आए। तो फिर तुमने क्या किया?
- 45:50तुम डरे मौत से डरे? क्योंकि भीतर जाना समुद्र के
- 45:56जोखिम भरा काम है। बड़ा साहस चाहिए वो तो तुम कर ना
- 46:00सके मैं वह पूरा बूढ़ा डरा मैं बूढ़ा था, कमजोर था शरीर से नहीं
- 46:09मन से मन साहसी नहीं था। तुम गद्दियों को ठुकरा सकते हो
- 46:19जीबेशणा को नहीं छोड़ सकते, यह बड़ी मुश्किल है और काश तुम
- 46:25जीवेशणा को छोड़ तुम वही पल। तुम्हारे लिए खूबसूरती का फल जब
- 46:34तुम जीवेशनों को छोड़ पाओगे तो तुम गहरी तलहटी में डूब जाओगे,
- 46:40वहाँ से मिलेंगे हीरे मोती ज्वार लाल तो तुम बाहर लेके आओगे फिर
- 46:48उसका व्याख्यान तुम करोगे नहीं। उसका रस जो पिया उसका व्याख्यान
- 46:54करोगे फिर बोला भी कहा जाता है वो जब गहरे तल पर जाकर तुम उसका
- 47:13रसभान कर लेते हो। फिर वह बोलने में आता नहीं, लेकिन
- 47:23कोशिश करते हो कि चलो पूरा ना बोल सकूँ, हल्की सी महक बिखेर सकूँ बस
- 47:33सारे संतों की यही। कोशिश होती है कि महक तो नहीं
- 47:38नहीं दे सकूंगा लेकिन कोशिश करके देख लूँ।
- 47:42शायद उस सुगंधी का प्रमाण इन तक पहुँच जाए।
- 47:47तुम अलफजों की व्याख्या करते हो, रस की व्याख्या नहीं करते।
- 47:55तुम शब्दों की व्याख्या करते हो तुमने रस पिया नहीं रखा करोगे
- 48:00क्या खाक और जो अपने अंत में वह पूरा बूढ़न डरा गयो किनारे बैठ जो
- 48:15किनारे पे बैठे रहते हैं वो खोपड़ी पे बैठे बैठे।
- 48:22व्याख्या करते रहते हैं। शब्दों की जो गहरे उतर गए वह
- 48:28व्याख्या करे के रस की और गहरे में उतरने वाला कौन है?
- 48:33कबीर कहते हैं, वह वह जो संत हो गया है।
- 48:39संत होकर ही उस परम रस की व्याख्या करने के योग्य हुआ जा
- 48:44सकता है। वही व्यक्ति योग्य होता है जो परम
- 48:50मौन होने के योग्य हो गया। अभी तो तुम शब्दों में खोये हुए
- 48:55हो। अभी तो शब्द तुम्हें मुहैया करते
- 48:59हैं। अभी तो हर समस्याओं का निराकरण
- 49:02है। तुम्हारे पास ये तुम्हारे अहंकार
- 49:08को पोषण देते हैं, आई नो एवरीथिंग।
- 49:16यह तुम्हारे अहंकार को पोषण देने वाला शब्द है, जबकि तुम मुर्ख हो,
- 49:25तुम कुछ भी नहीं जानते हो एक साथ है सब साथ है सब साथ है ऐसा बजाई
- 49:33तुमने सब साथ लिया। लेकिन एक को नहीं सता और जो उस एक
- 49:41को नहीं सता उस भीतर के परम रस को नहीं पीता।
- 49:48फिर उसने बाहर के पदार्थ का रस पिया तो क्या पिया?
- 49:52फिर कुछ भी नहीं पिया उसने फिर वो रीता रह गया, खाली रह गया।
- 49:58किताबों से मार्ग ले लो, जीवत गुरु से मार्ग ले लो, किताबें जड़
- 50:09हैं, बोल नहीं पाएंगी, जीवत गुरु गईमान हो सकता है।
- 50:15गुफाएं बना सकता है और फिर भी तुम ब्रह्म में रह सकते हो कि हाँ,
- 50:20यही सच्चा सतगुरु है तो फिर तुम स्वतंत्र भी हो, तुम भटक भी सकते
- 50:28हो, यही परमात्मा की कृपा है तुमपे।
- 50:33इससे बड़ी कृपा क्या हो? मुझे लोग कह देते हैं कि परमात्मा
- 50:38बड़ा ध्यान है। कृपालु है न्यायकारी क्या खाक
- 50:43न्यायकारी, यह व्रतकार, यह हिंसा, यह चोरी, यह बेईमानी, यह ठगी, यह
- 50:51झूठ कफर तूफान? यह तो परमात्मा के नहीं होने का
- 50:59सबूत है। मैंने कहा तुम इसे इस तरह मान
- 51:06सकते हो जवाहर लाल। मेरे शहर में आये थे, बोल रहे थे
- 51:17गेस्ट हाउस में थोड़े से लोग थे, लेकिन मैं इतना समझदार भी नहीं था
- 51:29और नासमझ भी नहीं था। उस वक्त का याद की बात मुझे आज भी
- 51:34याद है। जवाहरलाल बोले कि कोई व्यक्ति
- 51:42मुझे स्टेज के ऊपर भाषण देते हुए कोई व्यक्ति मेरे पास आने की
- 51:47चेष्टा की है। सुरक्षा गार्डों ने उसे रोक लिया।
- 51:54मैंने कहा इसे आने दो भय वृद्ध व्यक्ति आते है तो जवाहरलाल कहते
- 52:08हैं उन्होंने मेरा कर्नल पकड़ लिया।
- 52:11यह बात मैंने खुद जवाहरलाल के मुख से सुनी।
- 52:21मेरा कॉलर पकड़ के कहने लगे, तुम कहते थे आजादी मिल जाएगी, ये हो
- 52:27जाएगा वो हो जाएगा, मुझे क्या मिला?
- 52:35बताओ? जवाहर लाल कहते हैं, अंग्रेजों के
- 52:46सिपाही के गले में हाथ डालने की नौबत अंग्रेजों के जमाने में
- 52:53तुम्हें नहीं थी। आज प्राइम मिनिस्टर ऑफ इंडिया के
- 52:59गले में हाथ डाल रहे हो? तुम इससे ज़्यादा मैं तुम्हें दे
- 53:06भी कह सकता हूँ परमात्मा तुम चोरी करो छपोरी करो, कतल करो।
- 53:14गुनाह करो, गाली निकालो, उसको गाली निकालो, इससे ज्यादा
- 53:19स्वतंत्रता तुम्हें देविका सकता है।
- 53:27इससे ज्यादा स्वतंत्रता वो नहीं दे सकता।
- 53:29तुम तो थोड़ी सी बात से नाराज हो जाते हो।
- 53:32उठा लो उसको जेल में पटक दो दो अक्षत तुम्हारे विपरीत बोले कहाँ
- 53:37से? खाते हो तुम उसका जिगरा देखो उसकी
- 53:46छाती कितनी इंच की होगी? जीसको तुम रोज़ गाली निकालते हो?
- 53:50आंधी दुनिया नहीं, पूरी दुनिया नास्तिक है, लेकिन वो तुम्हें
- 53:55तसलीम करता है। उसकी छाती कितनी होगी, उसकी
- 54:06सहिंसक्ति कितनी होगी ज़रा सोच वह तुम्हें पाप करने की आज़ादी भी
- 54:17देता है। वह इसीलिए परमात्मा कहलाता है।
- 54:27अंग्रेजों के एक सिपाही के गले में तुम हाथ नहीं डाल सकते थे।
- 54:33जवाहरलाल बोले कि आज प्राइम मिनिस्टर ऑफ इंडिया के गले में
- 54:36तुम हाथ डाले हो, इससे ज्यादा मैं तुम्हें क्या दे सकता हूँ?
- 54:42और वह बूढ़ा जवाहरलाल के वाम सुनने लगा आँखों में आंसू का है
- 54:50उस दिन का ये बात तो ठीक है परमात्मा तुम्हें इससे बड़ी।
- 55:00आजादी क्या दे सकता है? यहाँ तो तुम प्राइम मिनिस्टर के
- 55:04दो शब्द बोल दो प्रतिक्षण जेल में पाओगे, अपने आपको ईडी होगी, घर
- 55:09में सीबीआइ होगी, आईटी विभागों का पता है सब ने मर जाना है।
- 55:19न कोई राह है, न कोई रहेगा न कोई राह जो गहरे उतर जाओगे तुम तल पर
- 55:35अब तो तुम बोलते हो चबर चबर। लेकिन वहाँ जाकर बिल्कुल उल्टी
- 55:44बात घटती है, उल्टी घटना घटती है, तुम बोलना चाहो तो बिना बोल पाओ
- 55:50के वह इतना रसीला है इतना मदहोशी से भरा हुआ है।
- 56:00तुम चाहो के बोलो लेकिन तुम बोलना, ओके।
- 56:19मानसरोवर अनसाफयो मानसरो। ताल तलैया क्यों डोल, ताल तलैया
- 56:46क्यों डोल मन मस्त हुआ फिर क्यों बोला?
- 56:57मन मस्त हुआ फिर क्यों बोले क्यों बोले अभी तो तुम्हारा मन बोलता
- 57:12चला जाता है तुम्हारी इच्छा के विपरीत।
- 57:16यही है तप यह मन तुम्हारे कहने से बोले और जो तुम चाहो वो बोले
- 57:23अन्टिशन्ट कुछ न बोले यह है तप तुमने अपने इंद्रियों को और
- 57:31इंद्रियों के मन। राजा मन को साध लिया, वो तुम्हारी
- 57:36गिरफ्त में आ गए, वो तुम्हारी चाकरी करने लगे, वो तुम्हारे नौकर
- 57:40हो गए, सेवक हो गए, गुलाम हो गए, लेकिन फिर तुम तुम्हारा मन,
- 57:49तुम्हारा गुलाम हो जाता है। तुम्हारी इंद्रियाँ तुम्हारे वश
- 57:55में रहती हैं, वो तो बात नहीं करती हैं, तुम्हारे इशारे पर उठती
- 58:02हैं, तुम जैसी आज्ञा देते हो वैसा काम करती हैं।
- 58:11जब कहते हो कि तुम सो जाओ, इंद्रियाँ सो जाती हैं, जब तुम
- 58:18उन्हें जगाते हो, जग जाती हैं, पीने के बाद कहाँ भूला जाता है?
- 58:30मस्ती की इस कगार पे आ जाओ जहाँ तुम्हारा मन अब तो बोलता चला जाता
- 58:38है, फिर बोलने की इच्छा ही न हो फिर हो के कौन कौन ये कौन आ गया?
- 58:48सोए हुए थे। चैन से ओढ़े हुए कफन यहाँ भी
- 58:55सताने आ गए थे। किसने पता बता दिया सोए हुए थे
- 59:06चैन से ओढ़े हुए कफन। यहाँ भी सताने आ गए किसने पता बता
- 59:15दिया नमस्त हुआ फिर क्यों बोला? हीरपयो गांठ गठियायो हीरपयो गांठ
- 59:49गठियायो। बार बार बाको क्यों खोले?
- 1:00:03बार बार बाको क्यों खोले मन मस्त हुआ।
- 1:00:13फिर क्यों बोलें? मन मस्त हुआ है, फिर क्यों बोल
- 1:00:29धन्यवाद?