Latest / Baba ji Vijay Vats / 10 Jan 26 - दीक्षा कब मिलेगी? रिश्तों का सच!! गुरु नानक का सूत्र: "जोर न जुगती छूटै संसार"
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- 0:16अच्युतम् केशवम् कृष्ण दामोदरम अच्युतम् केशवम्।
- 0:34कृष्णदामादरम रामनारायणम जानकी बलभम् अचकुं केशवं कृष्णदामोदरम।
- 0:53रामनारायणम जानकी बलवान कौन कहते हैं भगवान आते नहीं?
- 1:12कौन कहते हैं भगवान? आते न कौन कहते हैं भगवान आते
- 1:28नहीं। कौन कहते हैं भगवान?
- 1:36आते नहीं कौन कहते हैं भगवान आते नहीं तुम सुदामा की माफिक?
- 1:52बुलाते न तुम सुदामा की माफिक बुलाते नहीं अछू तुम केशवं कृष्ण
- 2:08दामोदरम। रामनारायणम जान के बलभम अच्युतं
- 2:21केशवम कृष्ण दामोदरम रामनारायणम। जान के फल हम कौन कहते हैं, भगवान
- 2:39खाते नहीं कौन कहते? भगवान खाते नहीं कौन कहते हैं,
- 2:58भगवान खाते नहीं। कौन कहते हैं भगवान खाते नहीं,
- 3:11तुम सबरी की माफी खिलाते नहीं? तुम।
- 3:21शबरी की माफ खिलाते न तुम शबरी की माफ खिलाते न आज तुम के शिवम्
- 3:34कृष्ण दामोदरम राम। नारायणम जानकी बल्लभम होन कहते।
- 3:58कौन कहते हैं के भगवान? सोते न?
- 4:11कौन कहते हैं भगवान? सोते नहीं कौन कहते हैं भगवान
- 4:19सोते नहीं, तुम यशोदा की माफिक सुलाते नहीं।
- 4:31माँ से जशोदा की मावक सुलाते अच्युतं केशवम कृष्ण दामोदरम
- 4:47जानकी वल्लभम। नारायण कौन कहते हैं भगवान नचते
- 5:02नहीं? कौन कहते हैं भगवान नचते ने
- 5:11गोपियों की तरह तरह तरह गोपियों की तरह तुम न।
- 5:25जाते न गोपियों की तरह तुम न जाते, न चुतुम केशवम कृष्ण
- 5:35दामोदरम राम नारायणम जानकी वल्लभम।
- 5:50धन्यवाद शांता कुमारी। बाबा आपने कहा कि अब हम दीक्षा और
- 6:11नहीं देते। हमारे परिवार के तीन मेंबर
- 6:18दीक्षित दो रह गए हैं। कृपा करके आज्ञा दी ज कुमारी
- 6:34शांता बेंगलुरु से ध्यान रखो। मैं जब शरीर में।
- 6:51होता हूँ। तो कुछ लिमिटेड लोगों को पढ़ा
- 6:56सकते हैं जीतने लोगों को आप ले के आओगे समय तो वही 4 घंटे का होता
- 7:09है। जब भी कभी मिलता है 4 घंटे का
- 7:15वक्त मिलता है। अगर आप इसी तरह फलावर्स की संख्या
- 7:22बढ़ाते रहे तो उसमें नुकसान आपका है जो तीन मेंबर्स।
- 7:32दीक्षित हो गए हैं। उनसे ही सांत्वना रखो।
- 7:42जैसे जैसे आप अपने मेंबर्स की संख्या बढ़ाओगे याद रखना तुम मुझे
- 7:50आज ही उगाना देते हो के बाबा आप समय नहीं देते?
- 7:56मैं क्या करूँ? उस मदहोशी के समुद्र में बैठा मैं
- 8:084 घंटे के लिए वा मुश्किल निकल पाता हूँ वो भी कभी कभी और उन चार
- 8:17घंटो को अगर तुम ज्यादा संख्या में लोगों को दीक्षित कराओगे तो
- 8:26समय आपका ही घटेगा। फिर आप उड़ाना देना बंद करो।
- 8:38समय आपका कटेगा। प्रश्न करने की क्षमता आपकी चाहे
- 8:48जो भी हो, लेकिन मेरे पास उत्तर देने का वक्त कम है, मैं उतना ही
- 8:56बोल सकता हूँ। जितना बोल सकता हूँ इसलिए मैं
- 9:05शुरू से कह रहा हूँ कि मेरे यहाँ ऐसा व्यक्ति ना आये जीसको
- 9:16परमात्मा में भरोसा नहीं है। और मेरे से ज्यादा बखूबी तुम्हारे
- 9:28अंतर को कौन जान सकता है जो व्यक्ति अपने अचेतन में उतर के
- 9:40सामूहिक अचेतन में जाकर। आपके अचेतन में दिख सकता है उससे
- 9:47ज्यादा बेहतर तरीके से कौन जानता है।
- 9:54मैंने राजनीतिक चैनल मैं जानता था, राजनीतिकों ने वायदे पूरे न
- 10:08करके आपकी। तमंच ग्रंथि को इतना विकृत कर
- 10:13दिया है कि आपके सामने साक्षात भगवान भी आके खड़ा हो जाए कि मैं
- 10:19ऐसा करूँगा तो आप नहीं मानोगे क्योंकि इन तोथे?
- 10:29भोंके कल्पनाशील लोगों ने विकृमियों से युक्त अपनी वासनाओं
- 10:41को पूरा करने के लिए। सत्ताएँ हत्याएं थीं और बहुत से
- 10:50लोग सत्यएं हत्या के लिए तैयार बैठे और आप वोट डालते हो अपने
- 11:02कष्ट तकलीफ मैनेजमेंट बेहतर हो आपकी जिंदगानी।
- 11:10बेहतर तरीके से चल रहा है, लेकिन यह समझेगा कौन जब सभी लूटने लगे
- 11:22हैं। जब सभी में वासना भरी पड़ी।
- 11:27तो ऐसे में सिर्फ एक ही व्यक्ति आपकी मैनेजमेंट को कर सकता है।
- 11:34ईमानदारी से कौन संत अगर मैंने बीड़ा उठाया था?
- 11:52आपने कितना सोच दिया? 10,000 से कम लोगों ने
- 11:58₹25,00,00,000 लेने में रुचि दिखाई।
- 12:02बाकी क्या हुआ? क्या वो लेना नहीं चाहते थे?
- 12:05नहीं ऐसा तो नहीं है। फिर क्या चीज़ आड़े आई, श्रद्धा,
- 12:14विश्वास, रूपेना या व्यायाम बिनाना।
- 12:26इन मानसिक विकृति वाले रुखों ने अपनी वासनाओं की पूर्ति करने हेतु
- 12:36गदियाँ मांगी और आपने उन्हें गदियाँ दे दी।
- 12:44क्योंकि इससे पहले झूठ किसी ने बोला नहीं था।
- 12:52इससे पहले वो आए थे जिन्होंने देश को आज़ाद कराने में योगदान किया
- 12:59था। जेने काटी थी तशद्दते सही थी,
- 13:03लाठियां सही थी, अपेक्षाएं सही थी उन लोगों को आजादी की कीमत का पता
- 13:15था। बना, जिनको आजादी की कीमत का फल
- 13:22कि कैसे जेलों की कोठरियों में बंद हो गए।
- 13:28गैरों के तशरदाद से है जलियांवाला कांड में जनरल डायर की गोलियों से
- 13:37प्रभावित? सीने छलनी हो गए और अपराध क्या
- 13:45था? कुछ भी तो नहीं।
- 13:49अपराध यह था कि उन्होंने सार्वजनिक बैठक बुलाई थी।
- 13:57किसलिए? गुलामी की बेड़िया तोड़ने के लिए
- 14:01क्या ये अपराध है? नहीं तो फिर जनरल डायल अचानक धड़ा
- 14:11तड़ तड़ तड़ तोपों के मुँह में खोल दिए।
- 14:19यही फितरत होती है तानाशाह तानाशाह अपने भीतर जाके राज़
- 14:30करना, राज़ करने का आनंद उसने चखा नहीं होता।
- 14:39इसलिए वह चेष्टा करता है। हर संभव कि शायद आज नहीं हुआ तो
- 14:46कल हो जाए। कल नहीं हुआ तो परसों नर्सों हो
- 14:51जाए। फिर वह हर संभावित कोशिश करेगा कि
- 14:58मैं गद्दी पे बना रहा हूँ। फिर वह गद्दी पर बने रहने के लिए
- 15:08अपराध करेगा। अब तो उसका गद्दी से हिलना।
- 15:15मुश्किल ही नहीं ना मुमकिन हुआ जाता है क्यों?
- 15:21क्योंकि अगर यह गद्दी किसी और के हाथ में आ गई है तो मेरी सारी
- 15:29परतें खुल जाएँगी जो मैंने इतनी मुशक से।
- 15:36दसों कुटे संभालकर, कहीं मीडिया लगा के, कहीं आवाजों को दबा के,
- 15:44कहीं पैगासिस, कहीं अपना जाल बिशाके, कहीं ऊंचे ऊंचे चलाने
- 15:51वाले मड़ियों को खरीद कर। जो मैंने इन सच्चाइयों को दबाने
- 15:56की चेष्टा की थी, वो तो उगड़ जाएंगे और उगड़ जाएंगे तो यह
- 16:01लोकतंत्र है और संविधान की कसम खाकर ही मैं इस पदवी तक पहुंचा,
- 16:09फिर मेरा क्या होगा? एक सत्य को समझ लीजिए।
- 16:19जब्त व्यक्ति अपने उस आंत्रिक तल जिसे अमरत्व कहते हैं।
- 16:27वहाँ तक नहीं पहुँचता। तब तक उसके भीतर मृत्यु का व्यय
- 16:31सता ही बना रहता है जो अपने अंतर के उस स्थल को जिसे अमरत्व कहते
- 16:38हैं, छू लिया, वह मृत्यु से नहीं डरता, लेकिन।
- 16:45ऐसा व्यक्ति जो भोकने के लिए अपनी लाल सांव को भोकने के लिए निकला
- 16:50था और ये बेहतरीन रास्ता है कि लोगों को झूठ।
- 16:55बोलो। जितना झूठ बोल सको और किसी तरह।
- 17:04फिर सारी संस्थाओं कब्जे में ले लो और पैसे टके से बाप बड़ा ना
- 17:15भईया, सबसे बड़ा रुपैया सब खरीद लिया जायेगा ज़रा।
- 17:23गद्दी नशीं हो जाऊं और सब खरीद लेता है फिर देख कर देखता है।
- 17:34वायदे पूरे नहीं होते क्योंकि बिना सोचे समझे वायदे किए गए थे।
- 17:41और आजादी की कीमत भी तो नहीं? जानते फिर उन।
- 17:46लोगों को बदनाम करना शुरू कर देता है।
- 17:50जिन्होंने आजादी दिलाने में योगदान दिया था वो गाँधी हो, वो
- 17:55जवाहरलाल हो, लाल बहादुर शास्त्री हो।
- 18:02यह सारा विज्ञान है। मैंने आपको समझाया यह मनोविज्ञान
- 18:06है, साइकोलॉजी है। अब असली दुविधा गद्दी छोड़ने की
- 18:20बिल्कुल नहीं है। अब असली दुविधा इसे अपनी परछाई से
- 18:26डर लगने लगा है। यह किसी को गद्दी सौंप ही नहीं
- 18:32सकता। अगर गद्दी सौंपेगा तो अपने ही
- 18:38जैसे अपराधी को सौंपेगा। और वह है अमित शाह।
- 18:45वह इसका हमराज है, उसने बराबर में उतनी ही पाप किए हैं।
- 18:53इसके अलावा वो गद्दी किसी को नहीं सौंपेगा।
- 18:58आज मैं आपके आगे राज़ बोल रहा हूँ।
- 19:05बेसिक काज़ है रूट काज़ किसने पाप घनी की?
- 19:18और इसकी धर्मपत्नी भी कहती है। इसे घूमने फिरने का बड़ा शौक है
- 19:27तो ब्यूरोक्रेसी संभाल लेगी। अप्पन में तो इतनी समझ भी नहीं
- 19:34पढ़ा लिखा भी ने? तो अपूर्ण तो सिर्फ इतना ही जानता
- 19:39है कि फाइल को सामने ले आओ। ऐसे कर दो बस फाइल बढ़ी गई या कोई
- 19:49गूगल की नई प्रणाली खोजी गई है पता है?
- 19:56ब्यूरोक्रेसी काम करते हैं। अपनी इच्छा यहीं पूरी हो सकती है
- 20:05तो गुजरात में पूरी नहीं हुई तो हिंदुस्तान में पूरी होगी और
- 20:15हिंदुस्तान में पूरी नहीं होगी। तो चलो फिर चीन चलो फिर अमेरिका
- 20:20चलो फिर अपस्टीन बहुत से तरीके हैं, लेकिन एक बात बता दूँ वासनय
- 20:34अपूर्व से हैं वासनय कभी। पूरे नहीं होता।
- 20:41अंत में संतो ने के निचोड़ आपको कब का दे दिया वासनाएँ भोगने से
- 20:48धधकती हैं। वासनाए भोगने से और भी ज्यादा
- 20:56प्रगाढ़ रूप से सर उठाते है। सर दे झोंकों से।
- 21:17भड़कते हैं बदन में शोले सज। झोंकों।
- 21:29से भड़कते हैं बदन। में शोले जान ले लेगी यह हर साल।
- 21:52जान ले ले कि ये बरसात करी बाजा दूर रहकर ना।
- 22:12करो बात करिवा जा याद रहे जाएगी ये रात।
- 22:31करी बाजा वासना। को पूरा करना चाहता है।
- 22:43ओह वासनाय अपूरित दुसपोर। मनुष्य का सभाग है कि वो अज्ञात
- 22:59में जाने से डरता है और मैंने कहा कि मैं 25,00,00,000 दूंगा बखूबी
- 23:09जानता था और मैंने पूरी तरह से कहा।
- 23:15पूरी तरह, लेकिन मैं आपके भीतर का वह शक बखूबी जानता हूँ क्योंकि
- 23:27आपके भीतर गया हूँ। आप अज्ञात में जाने से डरते हो,
- 23:35यही डर आपको अज्ञात के पास पहुंचने से रोकता है।
- 23:43इस शब्द को आप सर्कल में न लो, मनुष्य अज्ञात जो उसने पहले कभी
- 23:54जाना। जब एक बार ज्ञात रहनी होगी तो मन
- 23:59कहेगा ओके मैंने देख परख लिया है ठीक है बंदा ये लेकिन जो मुझे
- 24:08सुनते थे उन्हें विश्वास। उन्होंने ततक्षण धीरे धीरे और
- 24:18कितने बंधो ने किया यही 510 अगर वो और से सूख चूके है तो क्या
- 24:29₹25,00,00,000 की जरूरत पांच 10,000 लोगों को ही है?
- 24:34नहीं सारी दुनिया को जरूरत है चाहे 25,000 करोड़ दे दो उर से
- 24:42अडानी, अंबानी जैसे लोग ये क्या ढूंढ रहे है कहाँ ढूंढ रहे है ये
- 24:58आनंद को ढूंढ रहे है चैन को ढूंढ और धन में ढूंढ रहे है पदवी में
- 25:04ढूंढ रहे है यही मुसीबत है चेन मिलेगा अज्ञात में जाने से अज्ञात
- 25:15में मैं उसे जाना नहीं चाहता। इसलिए तुम जन्मे जन्मे से लटके
- 25:20रहना चाहते हो? चैन मिलता है अज्ञात में उतरने से
- 25:30और तुम्हारा स्वभाव है अज्ञात में ना जाना अपरिचित।
- 25:37से मेलजोल न करना। पता नहीं कैसा हो कैसा न हो धोखा
- 25:41दे सर अपरिचित में ना जाने की तुम्हारी इच्छा से मैं वाकिफ हूँ
- 25:49अच्छी तरह से इसलिए मैं जानता था। यह जीतने लोगों ने मुझे मिस कॉल
- 26:02कर दी। फॉर्म भर दिए।
- 26:11यह मुझे सुन रहे थे। कि वो लोग थे जो मुझे जानते थे या
- 26:16लोग वो वसा गए। अगर सोचा जाए सोचा जाए तो मैं
- 26:24आपसे कुछ ले तो रहा नहीं था, मांगा तो मैंने ज़िन्दगी में किसी
- 26:29से। जब से चैनल शुरू हुआ शुरू से
- 26:35मांगा मैंने यद्यपि आपने दिया वो श्रद्धानुसार दिया।
- 26:41उसमें मेरा कोई रोल नहीं है, लेकिन आप ये भी तो नहीं जानते कि
- 26:52मैंने कुछ मांगा नहीं? कुछ भी तो नहीं जानते और ये
- 27:00हिंदुस्तान बहुत बड़ा है। कहाँ दीक्षा का पटन कहाँ?
- 27:10वो छोर जो नेपाल से मिलता हूँ। कहाँ ये छोर जो पाकिस्तान से
- 27:17मिलता कहाँ वो छोर जब बांग्लादेश से मिलता कहाँ वो छोर जो चाइना से
- 27:24मिलता? बहुत दूर दूर तक ये श्रिंक लाइन
- 27:28फैली हुई है और सभी तो मुझे कोई जानते नहीं।
- 27:33मैंने इतनी प्रसिद्धि कभी चाही ही नहीं बटोरूँगा क्या मैंने श्रेय
- 27:40लेने की चेष्टा कभी की ही नहीं? अपने उस रस में विभोर हुआ आनंद
- 27:50विभोर हुआ। मैं आनंद की पूलक वर्षा करा और
- 28:02अचानक से जब मेरा ग्रंथ पूरा हुआ तो आपने मुझे रोक लिया, रोको यह
- 28:13जो आप बोले जा रहे हो? इसका बेस है पेट का भरम और
- 28:19ततक्षण। मुझे ख्याल आया ओह बात तो ठीक है,
- 28:27लेकिन क्या किया जाए ततक्षण याद आया?
- 28:35कि चले हो लेकिन बहुत सा बाकी है। वरदान बहुत सा बाकी है जो बंटा
- 28:42नहीं अनबटा रह गया तो मन में यह एक सोच थी कि जाते जाते जो भी
- 28:51मिला। उस स्थान पर जो भी मिला उनको बांट
- 29:04जाऊंगा, क्योंकि सभी मेरे ही तो है।
- 29:10यह दुनिया एक सराय की तरह है। और हम सभी परिवार के लोग किसी न
- 29:20किसी कारण से इस सराय में इकट्ठे हो गए और गड़बड़ी ये है की हम
- 29:29सराय में इकट्ठे तो हुए लेकिन सराय में इकट्ठे हुए हुए हमने
- 29:35मुँह पाल लिए। हम एक दूसरे को अपना समझ बैठे,
- 29:41जबकि हे सत्यने हमारी अपनी अपनी मंजल है।
- 29:46घर से तो हम चले थे, खुशी की तलाश में गमराह में खड़े थे, वो ही साथ
- 29:53हो लिया। कोई कहीं से आरा, कोई कहीं से आरा
- 30:00एक ही सराय में ढहर गया, एक ही होटल में ढहर गए एक धर्मशाला में
- 30:09ढहर गया। और एक ही धर्मशाला में ठहर के गए
- 30:16हमने एक दूसरे को अपनी जी जान मानना शुरू कर दिया।
- 30:21इसी को मौ कहते हैं। क्या तुम जानते हो तुम्हारे घर
- 30:26में कौन कौन रहता है? क्या तुम जानते हो नहीं जानता?
- 30:35बहुत से लोग ये भी नहीं जानते कि उनके घर में उनका ही दुश्मन ने
- 30:39जन्म ले लिया है। उनके घर में उनकी ही पूर्व जन्म
- 30:45की माँ है जो उनकी धर्मपत्नी बन के आई।
- 30:51तुम्हारा समाज बाहर बाहर की परतों को देखता है, लेकिन भीतर की परतों
- 30:56को तो वही देख सकता है जो तीसरा नेत्र खोले हैं।
- 31:03कौन कहाँ से आएगा? वहीं वहीं तो घूमते फिरते रहते
- 31:06हैं। जब तक कि तुम अपना आपना जान लो
- 31:16वास्तव में तुम कौन हो तब तक यह भ्रांति मठती।
- 31:28और मैं तुम्हें अपना आपा जताने के लिए ही सबसे पहले अध्यात्म की
- 31:35चर्चा की मेरा ग्रंथ सम्पूर्ण हुआ।
- 31:38यद्यपि तथापि मैं बोले जा रहा हूँ क्यों और क्या कहूँ?
- 31:51कोई आस नहीं कुश करना कहीं जाना जहाँ जाना था वहाँ चला गया।
- 32:06फिर अब क्या करू? एक वक्त ऐसा भी आता है लेकिन आता
- 32:12है बेरो के जीवन में अगर आपके भीतर भी यह आग लग गई है, जो की
- 32:26असली है तो कुमारी शांत ने कहा। दो व्यक्तियों को मेरे परिवार के
- 32:37दो व्यक्तियों को और दीक्षा दिलानी है।
- 32:41तो सुना तुमने कुमारी शांता यह दो व्यक्ति कौन है तुम जानते हो
- 32:49नहीं। सबके ऊपर मुखोटे चढ़े हुए हैं।
- 32:54यह सेकंड एक मुखोटा है नय नक्श मुखोटा है भीतर दे ही कौन सा है
- 33:05ये तुम्हें पता है। और तुम उन देहियों की फिक्र करते
- 33:12हो जो शायद तुम्हारे पिछले जीवन में, तुम्हारे दुश्मन इस जीवन में
- 33:23तुम्हारे घर वाले हो गए। यह अध्यात्म की छोटी सी बात मैंने
- 33:32आपको बताया रिश्ते नाते प्यार वफा।
- 33:44बातें हैं, बातों का कहें। कस्स में आते प्यार आकाश, बातें
- 33:59हैं बातों का। कोई किसी का नहीं है जो नाते हैं
- 34:15नातों का क्या कसमे वादे प्यार। तुम्हें पता ही नहीं कौन है, मैं
- 34:30तुम्हें कहता हूँ तुम अपना भला कर लो, काफी है अगर प्रत्येक व्यक्ति
- 34:38इस तरह सोचने लग जाए कि अपना भला कर लो।
- 34:44तो अब तक तुम कब के पहुँच गए हो? ये मोह ही है वस्तुओं का मोह,
- 34:51इच्छाओं का मोह, रिश्तेदारों का मुँह तुम कब तक इकट्ठा कर कर के
- 35:01यहाँ लाते रहो? मैं यहाँ थोड़ी दूर तक साथ चलूँगा
- 35:13और कुछ ही देर में बोलबोले के समान फट जाऊंगा।
- 35:22फिर तुम किसके पास रहोगे? बेहतर यही होगा तुम इन लम्हों का
- 35:31आनंद उठा लो तुम उठा लो जो दीक्षित है वो उठा ले, जो रह गए
- 35:38उनका फिक्र न करें। मैं देख रहा हूँ लगातार भीड़ को
- 35:44तुम बढ़ाये जा रहे हो और फिर तुम अपना ही सिर के ऊपर भार बुढ़ा के
- 35:52कहते हो कि चला नहीं जाता भार घना हो गया है तो ये भार तुमने ही तो
- 35:59रखा है। जय भीड़ इकट्ठी किसने की, तुम्हीं
- 36:04ने तो की अपने रिश्ते, अपने नाते अपना प्यार अपना मो तुम्हें काऊ
- 36:20से भी ली चलो। मैं अकेला ही चला था, जानबे मंजिल
- 36:29मगर लोग साथ आते गए और कार वहाँ बनता गया।
- 36:39ऐसे करमा बना है अभी तुम और बढ़ाने चले हो यह नहीं चलेगा ऐसा
- 36:49अध्यात्म में ऐसा चला भी नहीं करता कहाँ चला गुरुकुल में?
- 36:58गुरु गुलों में 25 से ज्यादा व्यक्ति रखे ही नहीं जाते और एक
- 37:04टीचर एक गुरु 25 से ज्यादा लोगों के बच्चों को पढ़ा ही नहीं सकता,
- 37:11यह लिमिट है। कितने व्यक्तियों को रोज़ मुझे
- 37:24अंत से हृदय में दुख लेके ब्लॉक करना पड़ता है?
- 37:30यह नौबत क्यों आती आए तो थे तुम? उस आनंद की तलाश मांगना शुरू कर
- 37:45दिया तुमने वैभव धन पद भी मैं पेपर में पास हो जाऊं।
- 37:56मुझे डिग्री मिल जाए। तुम्हारा ये रास्ता गलत है तुमने
- 38:09पहुंचना है अपने पास अपने पास और अपने पास पहुंचना।
- 38:23कोई यात्रा नहीं मांगता। इसलिए उपनिषदों में कहा गया कि
- 38:31तुम पास से पास हो, वह पास से पास हो और वह दूर से दूर है, हो तो
- 38:39तुम जितना चाहे दूर करो। वासनाओं को बढ़ाते जाओ, इच्छाओं
- 38:46को बढ़ाते जाओ, मोहों को बढ़ाते जाओ, दूर से दूर होता चला जाएगा
- 38:56इनको घटाते जाओ। तो वह पास से पाशन शुरू हो जाएगा
- 39:00और 1 दिन ऐसा भी आएगा कि तुम परमात्मा ही हो जाओ तो इकट्ठे
- 39:12करने की चिष्ट न करो कोई व्यक्ति मेरे पास तभी।
- 39:19दीक्षित होने के लिए व्यक्ति ले के आए जब उसने कोई झलक देख ली।
- 39:28सतौरी की झलक देखने के बाद कोई हरजन क्योंकि सतौरी की झलक में
- 39:35तुम्हें विश्वास हो जाता है कि वह है।
- 39:38और इतना विश्वास काफी है तुम सभी मुझे सुनते हो, तुम्हें मालूम
- 39:45नहीं तुम्हें किसी न किसी तल पर सतौरी की झलक मिली है जो तुम ठहरे
- 39:49हुए हो अन्यथा कब के भाग जाती है? इतना बोला हूँ मैं 6 साल होने के
- 40:00करीब आए। इन छह सालों के गर्मियों कभी ना
- 40:10कभी कोई ऐसी फलक लगी होगी कि तुमने उस सटोरी का मरहला छू लिया।
- 40:21वह सतुरी का मरहला छूना तो मैं यहाँ से जाने नहीं देता और मैंने
- 40:29पिछले प्रवचन में बोला कि किसी को किसी जगह भी वह जड़ मिल सकती है,
- 40:35वह उससे चिपट जाएगा। लेकिन मेरी बात को ध्यान से सुन
- 40:45लो, मैं तुम्हारे बंधन तो उठने आया हूँ बढ़ाने जहाँ से तुम्हें
- 40:54की झलक में गई छिपक मत जाना, उससे नहीं तुम्हारे जी का जिंजाल बन
- 40:59जाएगा क्योंकि यह। सारा ढांचा 1 दिन स्केट होगा।
- 41:07बिखरेगा फिर तुम रोओगे चलाओगे? हमारा क्या होगा?
- 41:19यही मुड़ता है तुम्हारी। रोना चिल्लाना मत वह अज्ञात
- 41:34जिसमें तुम समाने चले हो। उसने तुम्हारी जिम्मेदारी उठ ली
- 41:43है। क्योंकि वह तो जानता है तुम तो
- 41:50नहीं जानते तुम्हारी आँखों पर तो पर्दा है, लेकिन उसकी आँखों पर
- 41:57कोई पर्दा नहीं। वह जानता है कि तुम परमात्मा ही
- 42:02हो। तुम्हारी आँखों पर अभी जीना पड़ता
- 42:07है तो उसने मुझे माध्यम बनाकर आँख को चुन लिया है और वह अज्ञात
- 42:21जिसने इस सर्जना की। सृष्टि की रचना की, उसके लिए आपको
- 42:31पहुंचाना कोई मुश्किल ही नहीं है। क्या मुश्किल है वो जीना सफर दा
- 42:36जो आपकी आँखों पे उठा दे ये तुम्हारी आँखों पर जो पलके हैं।
- 42:43ये जीना सा पर्दा ही तो होता है और तुम उसे थोड़ा सा उठा लेते हो।
- 42:50बस बात हो गया यह है जीना सा पर्दा तुम्हारे चित के ऊपर पड़ा।
- 43:04और परमात्मा ने इसकी जिम्मेदारी ली।
- 43:09मुझे मध्यस्थ बनाया, लेकिन ध्यान रखना, ये मध्यस्थ 1 दिन चला
- 43:13जाएगा, फिर तुम रहोगे। और वह रहेगा जो सदा रहा है, है और
- 43:25रहेगा, फिर तुम अज्ञान में जीओगे और वह ज्ञान में वह आपको
- 43:35संभालेगा। 1 दिन ऐसा आएगा जब तुम्हारी आँखों
- 43:40की पलकों को खोल देगा सब है तुम्हारे पास बस मात्र ये पलकें
- 43:51तुमने बंद कर रखी है, ये पलकें उठाना ही तो है।
- 43:57इता सा काम इसलिए बोले शाह ने कहा राबदा की प कोतरो फूटना ते एक
- 44:06दर्ला आँखे ही तो खोलनी और कोई ज्यादा मशक्कत नहीं करना।
- 44:17और मैंने बहुत बार तुम्हें कहा, जो व्यक्ति तुम्हें तरकीबें बताएं
- 44:26यह कर लो, वह कर लो, तुरंत सावधान हो जाना की यह जानता नहीं है।
- 44:34के मात्र आँखें ही तो पलकें ही तो उठानी कोई भी तरक्की बताएं।
- 44:47वह व्यापारी है, लोफी है। लालची।
- 44:55लोभी गुरु तुमसे कुछ अपेक्षा रखता है और चेला तो लोभी होता ही है।
- 45:05चेला और गुरु दोनों समतल खड़े हैं एक ही तल।
- 45:11लोग ही गुरु लालची चेला दोनों नरक में ठेला ठेला दोनों ही दुख भोग
- 45:18रहे हैं। ऐसा नहीं है कि गुरु सुखी है,
- 45:23गुरु तुमसे अलग तब होता है जब गुरु सुखी हो जाए।
- 45:29फिर तुममें। और गुरु में फर्क होगा।
- 45:33गुरु सुखी हो गया, तुम अभी दुखी हो अगर तुम अभी दुखी हो और गुरु
- 45:39भी अभी दुखी है उसके उसके भी पलकें अभी उठी हैं।
- 45:45फिर वह लालची होगा, वह व्यापारी होगा।
- 45:50वह तुम्हें अलग अलग रूप से बरवाने की चेष्टा करेगा।
- 45:57लेकिन ये समझ लेना कि कोई ना कोई निहित स्वार्थ इसका है जो ये समझा
- 46:04रहा है अन्यथा बात तो कुछ भी नहीं।
- 46:09परबदा की कोण ओद्रपुटना के दुर्लन बहुत से रोग विशेषज्ञ दो रोग मुझे
- 46:22सुनते सुनते सुनते सुनते ही पहुँच गए।
- 46:27यह क्या था? इतनी दूर बैठा हजारों मील दूर
- 46:29बैठा मेरी आवाज उनके अंत स्थल में ऐसी उतरी कि उन्होंने पलकें खोलनी
- 46:40खोदी क्योंकि पलकें तुम्हारे पास हैं।
- 46:46आँखें भी तुम्हारे पास हैं, पलकें उठानी ही तो हैं आँखों से दिखना
- 46:54शुरू हो जाएगा ये पलकें ही तो तुम्हें देखने नहीं देतीं जबन में
- 47:05बैठा हुआ व्यक्ति। फिर लैंड में बैठा हुआ व्यक्ति
- 47:09नार में बैठा हुआ व्यक्ति मात्र मुझे सुनकर भाषा नहीं जानता,
- 47:15आवाज़ को सुनकर आँखें खोल लेता है और ये क्या प्रबुद्ध हो जाता है
- 47:25इतनी सी बात है। इन लालची गुरु नृत्य में उलझा
- 47:30रखा। आज अध्यात्म भी राजनीतिज्ञों की
- 47:39तरह झूठा हो गया है और यह बड़ी अफसोस की बात है।
- 47:49राजनीतिज्ञों में पे तो सदा से रहम आता रहा लेकिन अब तो
- 47:58आध्यात्मिक गुरुओं पर भी रहम आना शुरू हो गया।
- 48:08नहीं, यही नहीं बोलता बाबा नानक बड़े सुंदर शब्दों में बोलते हैं,
- 48:16ऐसी कौन सी चीज़ है? ऐसा कौन सा सत्य है जो इन 38
- 48:23पौडियों में समझाया नहीं? विश्व का कोई भी ऐसा सत्य नहीं है
- 48:32जो एक छोटी सी किताब में समझा ही नहीं गया।
- 48:35बाबा नान कितनी सरलता व्याख्या करते हैं।
- 48:40इसलिए जब मैंने देखा कि आप पद्य से समझ नहीं सकोगे, दोनों का अर्थ
- 48:46गलत कर लोगे। बाबा के गीत गायन में अर्थ अर्थ
- 48:53गलत कर लोगे तो मैंने गद्य में बोलना शुरू कर दिया क्योंकि गद्य
- 48:59को बदला नहीं जा सकता। वह बहुत मुश्किल है।
- 49:03वह न करीब करीब असंभव है। इस शब्द को गुर से समझेना गुर
- 49:14वाणी पढ़ने वालो, सुबह 4:00 बजे लाउड स्पीकर लगा के पढ़ने से
- 49:19अच्छा ये है। कि तुम अपने भीतर उतरो, इसका एक
- 49:25शब्द और तुम पलकों को खोल लोगे तो अब मैं वो एक शब्द बोलता हूँ।
- 49:38जो जपजी साहब में तुम्हें मिलेगा इसको कोर से सुनना ज़ोर न जोगती
- 49:49छोटा संसार असली बुद्ध पुरुष की यही निशानी होती है।
- 49:59किसी भी युक्ति में कोई ज्योर नहीं जो आपके बंधनों को तोड़ दे।
- 50:06एक उनकी पद्य की भाषा है, इसलिए तुम इसे तोड़ मरोड़ सकते हो लेकिन
- 50:12मेरी भाषाओं को नहीं तोड़ सकते तुम।
- 50:15यह सरलतम गद्य की भाषा है। कैसे पलटोगे तुम इसे?
- 50:23इसलिए मैंने इस झंझट को भी समाप्त कर दिया।
- 50:28जब मस्त होता हूँ तो गुण बना लेता हूँ।
- 50:34लेकिन जब मैंने समझाना होता है आपको तो मैं गद्दी का सहारा लेता
- 50:38हूँ। कविता का कविताओं के अर्थ तो
- 50:43तुमने तोड़ मरोड़ लिए लेकिन गद्दी के शब्द।
- 50:51भाषा के शब्द सीधे सीधे सरल तुम्हारे हृदय में उतर जाएंगे।
- 50:58तुम उनको बदल नहीं पाओगे। ज़ोर न जुगति किसी भी युवती में।
- 51:07कोई ज़ोर नहीं छोटा संसार आपके बंधनों को तोड़ने के लिए यानी कुछ
- 51:14न करो। ज़ोर।
- 51:22न युवती झूठा संसार। तुम रोज़ कहते हो, हमने मुक्त
- 51:28होना है हमने संसार से छूटना बाबा इसका तरीका बता दो और बाबा कहते
- 51:35हैं कोई तरीका है ही नहीं। किसी युक्ति में इतना ज़ोर है ही
- 51:42नहीं। क्यों?
- 51:50क्योंकि पलकें हैं और आँखों के ऊपर पलकें हैं और तुम्हारे
- 51:57नियंत्रण में कोई दूसरा तुम्हारी आँखों को नहीं खोल सकता पलकों।
- 52:07तुम नहीं खोल सकते हो और ज़रा भी मशक्कत नहीं लगती।
- 52:14पलकों को खोलने में क्या मशक्कत लगती है बताओ मुझे ज़ोर न झुगती
- 52:22छोटा संसार। संसार के बंधनों से मुक्त होने
- 52:29में किसी प्रकार के कोई युक्ति की आवश्यकता नहीं पड़ती, बिलकुल सीधा
- 52:39सीधा शब्द। अष्टावक्र की ता है।
- 52:49गौरव की तरह मरो हे जोगी मरो मरो मरण हे मिठ ऐसी मरणी मरो ये
- 53:05संवरणी मरगोर कटे था तुम अपने उस गोर्ख को देख लो सब है तुम्हारे
- 53:13पास कुछ बाहर से ले के आना ही नहीं।
- 53:23क्या करना है ये जो जीना सा पर्दा आँखों पे पड़ गया है इन पलकों को
- 53:37उठा लो और तुम्हें सत्य दिख जाएगा क्या है?
- 53:46कोई मशक्कत करने की आवश्यकता नहीं है।
- 53:50जो तुम्हें मशक्कत करना सिखाए वह झूठ बोल रहा है।
- 53:58बात तो दो अल्फाज़ में समाप्त हो जाती है।
- 54:04मैंने मेरे पहले प्रवचन में यही कहा था, जब दयानंद ने मुझसे पूछा
- 54:11बाबा लक डाउन है भीतर बैठ के भी क्या करें?
- 54:17हम मिस्त्री लोग हैं, हमारे हाथ नचीले बैठते हैं।
- 54:22हमें बताओ हम क्या करें? अब चलो बाहर तो जाया नहीं जा
- 54:27सकता। करोना है, बता दो, हम क्या करें
- 54:33जो अपने भीतर का स्वाद ले सके। मैंने उसे बता दिया और मैंने ये
- 54:40भी कह दिया। कि काश तुम इसको ठीक से समझो तो
- 54:46मुझे अगली वीडियो बोलने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
- 54:51मैं चाहता था जल्दी जल्दी ये राड खत्म हो जाए।
- 54:56क्यों चाहता था क्योंकि मुझे उस रस को पीने में आनंद हुआ।
- 55:04और बाबा की आदेश की हिमाकत करना मुझे आता नहीं।
- 55:12उसकी कृपा से ही मैंने इस रस को चखा।
- 55:18बाबा का आदेश है कि तुम बोलो गोर अंधरा है नहीं कहा किसी और को
- 55:25कहता हूँ और कोई नहीं मैं चौंका ऐसा है, फिर तो तुम्हें ही उठना
- 55:39होगा। मैंने खुद से कहा और मैंने कोशिश
- 55:45की कि बस एक दो वीडियो में समाप्त कर दूंगा।
- 55:51कितनी बात है पर ही तो उठानी है, लेकिन मुझे क्या पता?
- 55:59यह पूरा ग्रंथ बोलने के बाद भी आप पलके नहीं उठाओगे।
- 56:06पलकों की गलियों में चेहरे बहारों के हँसते हुए।
- 56:17पलकों की गलियों। में चेहरे बहारों के हस्ते हुए।
- 56:26हैं मेरे। खावों के क्या क्या नगर इनमें
- 56:32बस्ते हुए हैं? पलकों की गलियों में चेहरे।
- 56:41बहारों के हस्ते हुए हैं मेरे ख्वाबों के क्या क्या नगर इनमें
- 56:52बस्ते हुए हैं? ये उठे सुबह होड़ले ये झुके शाम
- 57:07चले ये उठे सुबह आचले। ये झुके शाम ढले मेरा जीना मेरा
- 57:25मरना इन पलकों की तले। मेरा जीना मेरा मरना इन पलकों के
- 57:42तल तेरी आँखों। के।
- 57:50शिवा दुनिया में रखा क्या है? ये उठे सोभो चल ये झुके शाम ढल।
- 58:08यह उठे सोह चल यह, झुके शाम धल मेरा जीना मेरा मरना ही नहीं,
- 58:25पलकों के तल। तेरी।
- 58:31आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है?
- 58:42ये उठे सुबह चले, सुबह हो गई, उठा लो।
- 58:49ये झुके शाम ढल गई शाम सुबह आई इन पलकों को उठा लो मेरा जीना मेरा
- 59:04मरना। इन पलकों की तल है क्या है पलकों
- 59:09के तले आँखें इन आँखों से पर्दा जीना सा उठा दो ये पलकें हैं।
- 59:26अविश्वास का समाप्त होना लाजिम हो जाएगा, विश्वास बहाल हो जाएगा,
- 59:39विश्वास करने जैसी चीज़ नहीं है अविश्वास देखने जैसी चीज़।
- 59:49इन पलकों को उठाओ, कहीं कुछ करना नहीं है, दर्शन करना है और दर्शन
- 1:00:04करने से सब बंधन समाप्त हो जाते हैं।
- 1:00:07उतर गए हो मेरे मन का संसार उतर गए हो मेरे।
- 1:00:27मन का संसा जब तेरा दर सन बायो ठाकुर।
- 1:00:43तुम सरनाई आयो ठाकुर, उतर गयो मेरे मन का संसार।
- 1:01:04ये संशय ही तुम्हारा तुम्हें देखने नहीं देता ये पलकें संशय
- 1:01:11हैं, इनको उठा लो इनके नीचे तुम पाओगी आँखें हैं।
- 1:01:22और तुम्हें सत्य नजर आ जाएगा इतनी सी बात रब दा कीपड़ो ज़रा आँखों
- 1:01:32को उठाओ तो पलकों को उठाओ तो आँखें हैं तुम्हारे पास आँखें सभी
- 1:01:40के पास होती हैं। और संशय समाप्त होता है।
- 1:01:54अभी तुम संशय में हो। कृष्ण कहते हैं संशयात्मा
- 1:01:59विनिश्चित है अगर ये संशय बरकरार रहेगा अगर ये पलकें झुकी झुकी
- 1:02:05रहेंगी और हर शाम को ये पलकें झुक जाती हैं।
- 1:02:13तुम निद्रा में समा जाती और हर सुबह को ये पल के उठ जाती है जीवन
- 1:02:20को रोशनाई में ले आओ, सुबह हो गई है बहुत सोलिए।
- 1:02:30उठी जाग मुसा फिर भोर भाई अब रहने कहाँ जो सोवत।
- 1:02:46कहाँ रहना है अब? सुबह हो गई।
- 1:02:51सूरज जाग गया, तुम भी जगरा उठा इन पलकों को और भीतर पाओगे की आँखें
- 1:03:02हैं और आँखें हैं। तो आँखों से सत्य दिख जाएगा और
- 1:03:09सत्य दिख जाएगा तो दर्शन हो जाएगा और दर्शन हो जाएगा तो संशय समाप्त
- 1:03:17हो। जाएगा उतर गए हो?
- 1:03:23मेरे मन का संसार जब तेरा दर सन पायो ठाकुर।
- 1:03:40तुम। शरणई जब दर्शन होगा फिर तुम शरण
- 1:03:48में जाओगे, शरण पहले नहीं जा जाता।
- 1:03:51पहले तो तुम्हें पता ही नहीं है। पहले तो तुम्हें पता ही नहीं है
- 1:03:57कि वो है भी कि नहीं? और तुम बिना देखे वह गुरु वह गुरु
- 1:04:05सत्यनाम सत्यनाम कर रहे हो। तुमने उसे कभी देखा किसको याद कर
- 1:04:13रहे हो मुझे समझाना? यह स्मरण तुम किसको कर रहे हो?
- 1:04:19क्या तुम उसे जानते हो? क्या तुम्हारी कोई मुलाकात हुई है
- 1:04:27उससे? जाने अनजानी तुम उसे जानते हो भाई
- 1:04:31कौन कैसा है उसका स्वार्थ? नहीं जानते फिर जपोगे किसको सुमरण
- 1:04:42किसका सवर्ण किसका करोगे, किसको याद करोगे?
- 1:04:49प्रेमिका तो प्रेमी को याद कर लेते देखा है उसे उसकी आँखों में
- 1:04:54झाँका है वो नूर दिखा है। लेकिन तुम किसको याद करते हो तुम
- 1:05:03संवरण किसका करते हो? क्या वो वह गुरु सतना तुमने देखा
- 1:05:09है तुमने देखा है अल्लाह तुमने देखा राम?
- 1:05:16तुमने देखी राधा फिर किसका सुमन करोगे तुम दर्शन करो, शमन ना करो।
- 1:05:31दर्शन करने से जो दिखेगा। तो तुम्हारा संसय दूर हो जाएगा।
- 1:05:40यह ऐसे ही प्रक्रिया ज़ोर न जुगती छूट संसार किसी युक्ति में कोई
- 1:05:48ज़ोर न है तुम्हारी 112 विधियों बेकार हो जाती हैं विज्ञान भैरव
- 1:05:54तंत्र की मुर्ख हैं वो लोग। फिलॉसफर है ना?
- 1:06:02क्या करें, दार्शनिक हैं, बुद्धि ही है, उनके पास दर्शन है नहीं
- 1:06:12अक्षरों की मग्ज़ जखाई है। और इसी से वो परमात्मा को बता
- 1:06:18देना चाहते हैं, असंभव है। नहीं बता पाएंगे यह दार्शनिक
- 1:06:28शब्दों में उलझा हुआ खिलाड़ी शब्दों का खिलाड़ी है, वह कबड्डी
- 1:06:33बहुत है उसमें। लेकिन दर्शन नहीं है आँखें ज़रा
- 1:06:38भी नहीं आँखों पर पड़ता है जीना सा।
- 1:06:44ये उठे सुबह चले। ये झुके शाम ढले मेरा जीना मेरा
- 1:07:02मरना इन पलकों के तले। बस तुम्हारा जीना और तुम्हारा
- 1:07:10मरना इन पलकों के तले है। पलकों के तले क्या है, पलकों के
- 1:07:17तले आँख है और आँख तुम्हें दिखाती है।
- 1:07:26और दिखाती है दर्शन से तुम्हारा ब्रह्मा गायब होता है।
- 1:07:30शंख आत्मा बनिश्चित वो शंख से खत्म हो जाता है होता कैसे दर्शन
- 1:07:35से उत्तर गयो मेरे मन का संशय, जब्त हैं दर्शन पायो।
- 1:07:42दर्शन से ब्रह्ममुक्त हुआ जा सकता है।
- 1:07:45दर्शन के बिना ब्रह्ममुक्त नहीं हुआ जा सकता।
- 1:07:50फिर उसकी याद आती है वो सुबह दर्शन के बिना तुम याद करोगे कि
- 1:07:59किसे? अब तक एक मुलाकात भी तो नहीं हुई
- 1:08:04तुम्हारी जाने अनजाने तुम उसको जानते कहाँ हो दिन ब दिन तुम
- 1:08:11तसबियाँ घुमाए जाते हो अल्लाह के तुम माला फेरे जाते हो, राम के
- 1:08:18तुम माला फेरे जाते हो राधा के। क्या तुमने वो कभी देखा है?
- 1:08:26फिर किसको याद करोगे? अज्ञात को तो याद नहीं कर पाओगे
- 1:08:33उसका तो नुहार उसका चेहरा, उसका रंग, रूप आकार तुम्हें पता ही
- 1:08:39नहीं। उसका गुण तत्व उसका स्वाद तुमने
- 1:08:42चखा ही नहीं फिर तुम याद किसको करते हो उसका स्पर्श तुमने नहीं
- 1:08:49किया उसको सुना तुमने नहीं देखा तुमने नहीं स्वाद तुमने नहीं चखा?
- 1:09:00सुगंध तुम्हें मालूम नहीं उसकी फिर तुम स्मरण कैसे कर पाओगे,
- 1:09:05पांच ही तो इंद्रियाँ हैं तुम्हारे पास।
- 1:09:08पांचों इंद्रियों से तुमने परमात्मा का अनुभव किया ही नहीं,
- 1:09:14तो फिर उसको याद कैसे कर पाओगे? तो गुरु नानक कहते हैं, मेरे आका
- 1:09:28कहते हैं ज़ोर न जोगती छोटा संसार यह व्यापारी है, जो आपको पांच नाम
- 1:09:41देता है। तोड़ दो इन जंजीरों को पहले से ही
- 1:09:48जंजीरें बहुत हैं। तुम्हारे वेतर अंधेपन की जंजीरें
- 1:09:53हैं तुमने पलकों को बंद कर रखा है नीचे गिरा रखा है।
- 1:10:00आँखों को देखने नहीं देतीं ये पलकें एक थोड़ी सी बात आँखों को
- 1:10:13पलकों को उठा लो, आँखें खुल जाएंगी और फिर तुम जीसको देखोगे,
- 1:10:21समन उसका हुआ करता। उसको याद करना शुभ है अज्ञात जिसे
- 1:10:38तुम जानते ही नहीं उसको याद करने का ढंग ही नहीं।
- 1:10:42तुम्हे पता कैसा है वो उसका स्वाद कैसा है?
- 1:10:51उसका स्वाद जानना तू जीवंत गुरु के पास चले जाओ, देखो कैसे एक
- 1:10:59व्यक्ति 13 बरस से लगातार उसका स्वाद पी रहा है और वो ज़रा भी
- 1:11:04नहीं हिलता, ज़रा भी नहीं डुलता ज़रा भी नहीं बाहर जाता।
- 1:11:08उसका मन ही खत्म हो गया। ऐसा उलझावो पायो जी।
- 1:11:14मैंने राम रत्न धन। पायो जी मैंने।
- 1:11:27राम रतन धन पायो। बाहर के कंकड़ पत्थर मत बिना, उस
- 1:11:39रतन को पालो जो किसी युवती से नहीं मिलता।
- 1:11:47जो मिलता है इन पलकों को उठाओ ज़ोर न जुगति छुट्टा संसार तुम
- 1:11:57कोई भी जुगति मत आजमाओ न पांच न न राधे राधे न कोई भी जा तुमने
- 1:12:03दर्शन करना है। दर्शन करने से तुम शशय मुक्त हो
- 1:12:08जाओगे और शशय मुक्त होकर ही तुम्हें दिखेगा दर्शन करके तुम
- 1:12:16देख पाओगे। तुम जिसका स्मरण कर रहे थे वो
- 1:12:18कौन? ये उल्ट बांसी।
- 1:12:23अभी तुम उसका स्वर्ण करते हो जीसको जानते ही नहीं, जिसका स्वाद
- 1:12:28ही नहीं तुमने कभी चखा वो कैसा है?
- 1:12:30बड़ा निराला स्वाद है, बड़ा प्यारा स्वाद है उसका, वह
- 1:12:38व्याख्या ही तो होता ही नहीं, दुनिया में कोई ऐसा स्वाद नहीं।
- 1:12:43जो उसका मुकाबला कर सके या उसकी तरफ़ इशारा कर सके।
- 1:12:47मजबूर हैं हम क्योंकि वह इस विराट का सृजन हारा तुम्हारी इन आँखों
- 1:12:59से न दिखेगा। आँखों पैदा करो, देखने वाली आँखों
- 1:13:07पैदा करो तुम्हारी आँखों पर जीना सा पर्दा है, पलकों को इन पलकों
- 1:13:14को उठा लो। इनमें मेरे आने वाले।
- 1:13:20जमाने की तस्वीर है इनमें मेरे आने।
- 1:13:29वाले जमाने की तस्वीर। है।
- 1:13:35वो तस्वीर है जो तुम्हारे आने वाले जमाने की।
- 1:13:41क्या दिखेगा तुम्हें इन पलकों के उठने के बाद इनमें मेरे आने वाले
- 1:13:50जमाने की तस्वीर है पलकों की काजल के चाहत।
- 1:13:59लिखी हुई मेरी तकदीर है इनमें मेरे आने वाले जमाने।
- 1:14:11की तस्वीर है। चाहत के।
- 1:14:16काजल से लिखी हुई मेरी तकदीर है। ये उठे सुबह चले।
- 1:14:32ये झुके। शाम ढले ये उठे सुबह चले ये झुके
- 1:14:45शाम ढले मेरा जीना। मेरा मरणाही ने पलकों के तले तेरी
- 1:15:02आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है?
- 1:15:13तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है श्रीकृष्ण?
- 1:15:29हरे मरा ए नाथ नारायण वह सुदेश। श्री कृष्ण व विंध ह रे मुरारी
- 1:15:57देनाथ नारायण वासु। पितुमात स्वामी सखा पितुमात
- 1:16:16स्वामी सखा हमार हेनाथ नारायण। वासुदेव, श्री कृष्ण गोविंद
- 1:16:35हरिमरारी हे नाथ नारायण वासु।