Latest / Baba ji Vijay Vats / 6 Apr 25 - आज मैं जो बोलना चाहता था वो मैंने इस वीडियो में बोल दिया! मन कैसे ठहरेगा!? सारों का सार।
Transcript
- 0:00जसवंत सिंह मैं एक मार्कस्वादी हूँ बाबा 1 दिन मैं अपने शहर में
- 0:15बाजार में जा रहा था किसी दुकान पर।
- 0:22दुकानदार ने आपके वीडियो बड़े ऊंचे स्वर में लगा रखे थे।
- 0:31आप की आवाज से प्रभावित मैं उस दुकान में गया क्योंकि आपने
- 0:40मार्कर्स का नाम लिया था। मैंने वो पूरी वीडियो सुनी है,
- 0:55मार्कर्स कहता है, मैं ऐसे ईश्वर को क्यों मानूं?
- 1:03जब मुझे खाने को रोटी नहीं देता, आपने कहा वो मूड है, मूर्ख है।
- 1:13मुझे बड़ा गुस्सा आया पे उसके बाद मैंने आपका साहित्य पढ़ा, वीडियो
- 1:23सुनी कुछ कुछ समझ में आया, कुछ समझ से बाहर रह गया।
- 1:35थोड़ा और विस्तार करना कष्ट करेंगे।
- 1:40रायपुर से जसवंत सिंह। रहदास की जूतियां बनाने की, कबीर
- 2:02की चदरगिया बनाने की अगर अवस्थाओं को देख लोगे।
- 2:14तो तुम्हें ट्रंप का चेहरा अच्छा नहीं लगेगा और दोनों में और देखा
- 2:28कोई मुकाबला नहीं एक अमेरिका के प्रेसिडेंट है।
- 2:35एक छोटा सा जूतियां बनाने वाला, कंबल बनाने मंगाया शाद्र बनाने
- 2:43वाला अपूर्व शांति मिलेंगे। तुम्हे रायतास को देखकर कबीर को
- 3:01देखकर नानक और मीरा को देखकर वो शांति तुम्हें ट्रंप को देखने में
- 3:11नहीं मिलेंगे, ज़रा घोस से देखेगा।
- 3:18देखने के लिए भी आंख की जरूरत होती है।
- 3:24इसलिए हमने संत पुरुषों के आसपास सिर के ऊपर शीतल चंद्रमा की फोटो
- 3:31लगा दी। इतने शीतल?
- 3:36जितना चंद्रमा का प्रकाश दिखता भी है, ठंडा भी है।
- 3:50लेकिन ट्रंप के में तुम बस ये चीज़ नहीं पाओगे।
- 4:00चमड़े की जूतियां बनाता रहता जितना मस्त है, आनंदित है, उसका
- 4:12कहीं कोई मुकाबला नहीं, सारी दुनिया मुकाबले में मारती।
- 4:25कॉम्पिटिशन प्राण घातक है। कॉम्पिटिशन का मतलब है कि जो तुम
- 4:35हो पर महात्मा ने पूर्ण नहीं बनाए हो, अधूरे बनाए हो और तुमने पूर्ण
- 4:43होना है। फिर तुम पूर्ण होने की राह भी
- 4:50निकल पड़ता है और पूर्ण होते होते तुम दिशाएं पे जीते जाते हो,
- 4:59व्यापारी बन बैठते हो, कारोबारी बन बैठते हो, कारखाना लगा देते
- 5:06हो। राजनीति में प्रवेश करते हो, ओह
- 5:11दे बना लेते हो नाम बदलने जैसा है सिर्फ और नाम बदलने से कभी कुछ
- 5:24होता नहीं। मैं ऐसा मजाक किया करता हूँ की
- 5:32अगर नाम बदलने से कहीं कुछ परिवर्तन हो जाता तो जिससे शहर
- 5:38में मैं जन्मा हूँ पला बड़ा हुआ। उस शहर का नाम है गीदड़ बहा।
- 5:48गीदड़ बहा पर बहुत से लोगों ने कोशिश की कि इसका नाम बदल दिया
- 5:58जाए। रूप नगर रख दिया जाए, सुंदर नगर
- 6:03रख दिया जाए जो कुछ और रख दिया जाए।
- 6:12लेकिन गीदर का जी नाम जचता हूँ जैसे गीदर का में रहने वाले।
- 6:23कोई गुनाह करके आया। बड़े भोले लोग हैं यहाँ तुम कभी
- 6:33आइएगा तो खरीदारी कीजिएगा। कितने भोले हैं कपड़े की दुकान पे
- 6:42जाओ भैया क्या अभाव लगाया वो कहेंगे ₹200 मीटर तो आप कहोगे मैं
- 6:53तो डेढ़ 100 दूंगा, वो कह के तुम्हारी मर्जी है।
- 6:59तुम्हारी उम्र जी है डेढ़ 100 दे देना।
- 7:04इतने बोले लोग एक व्यक्ति को दुकानदार को तो यहाँ के लोगों ने
- 7:15ठग कहना शुरू कर दिया था ना मैं बोलेंगे बेइज्जती हो जाती है।
- 7:28तो की वो 100 के 400 मांगता कितना घटेगा?
- 7:32घटने वाले को शर्म नहीं? लगती वो।
- 7:39खुद ही शर्म चार हो जाता है। अरे 400 मँगा 200 कहते भी शर्म
- 7:46आती है और यहाँ के ऐसे ही बोले तो।
- 7:50कहीं पे ले जाओ नाम बदलने से कभी कुछ नहीं होता अगर नाम बदलने से
- 8:06वो धार हो जाता तो गजड वाह का नाम बदल के शेर बहा भर दो फिर कौन सा
- 8:14शेर पैदा हो गया? आदमी ही पैदा होंगे भाई सत्य को
- 8:27उसकी वास्तविकता में जानना महत्वपूर्ण भी है और मीठा भी है।
- 8:44मैं कैलाश पे खड़ा था। बाबा के पास बाबा?
- 8:53मुझे कहते हैं ये देखो नीचे एक व्यक्ति ईंटे धो रहा है सर पर
- 9:02बठ्ठल है छः सात बारी बारी ईंटें हैं।
- 9:07और वो भी जा रहा चौथी मजल पे जा रहा है और फिर उन्होंने किसी राजा
- 9:18का चित्र दिखाया, ये देखो वह हुक्म कर रहा है।
- 9:28मैंने कहा हाँ बाबा। वह हुक्म कर रहा है, यह हुक्म मान
- 9:36रहा है। बस यही समझाना था मैंने जो ईंटें
- 9:47ढो रहा था। उसके आसपास चंद्रमा का शव हो रहा
- 9:53था। ठंडक और जो भूकंप कर रहा था
- 10:00तनुशाह उसके आसपास लाल रंग का हो रहा क्रोध।
- 10:10क्रोध भी और कष्ट दुःख बहुत से लोगों का सवाल होता है और बहुत से
- 10:27नहीं। अक्सर लोगों का सवाल होता है हम
- 10:30दुखी। मैं देखता हूँ उनके और की तरफ
- 10:35दुखी होते हैं। मैंने कहा बाबा ये तो ठीक हो रहा
- 10:50है लेकिन ओरा बड़ा क्षण है ये राजा है।
- 11:01और औरा दुख दाई है गहरा लाल लाखा कहते आप ऐसे करो।
- 11:15अब इसको जो मजदूर है। हो रहा है इसके पिछले जन्म की मैं
- 11:20रील चलाता हूँ, वो देखो बाबा ने रील चला दी।
- 11:34मैं देखने लगा उसके पिछले जन्मो में गया देखा।
- 11:42वह एक शहंशाह था, हुकुम चला रहा था, हर तरफ़ दरबान दास दासीन हीरे
- 11:51मोती योरात लटक रहे थे, ऐसी शानदार उसकी पुशाक।
- 12:06पोशाक जैसे हीरो से जटिल सोने का मुकुट, हाथ में झंडा, वो भी सोने
- 12:16का। मैंने कहा ये तो राजा है, कहते
- 12:22हम। किसी दिन ये है जो बट्ठल ढो रहा
- 12:28है यह राजा था और इसका उरा देखो बहुत खराब है, दुखी है और इसका
- 12:40उरा देखो क्या बात है शी चलता है। चांदनी है, मधुरता है, लावण्या
- 12:48है, प्रेम है, बाबा बोले यह व्यक्ति 1 दिन राजा हुआ करता था,
- 13:04तुम भी राजा थे, 1 दिन मैंने कहा बाबा।
- 13:14और आज ईंटेड हो रहा है मैं किंग कर्तव्य भी मूड सा बाबा की आँखों
- 13:22की तरफ देखता रहा। बाबा बोले।
- 13:31जीस दिन तुम अमीरी से थक जाओगे उस दिन फकीरी में ठहर जाओगे, बस यही
- 13:43हुआ तुम्हारे साथ, यही हुआ इसके साथ।
- 13:48हुए। कबीर और है दास के चेहरे पे जो
- 13:57शांति तुम पाओगे तृप्ति तुम पाओगे जैसी भी खाई रूखी, सूखी खाई के
- 14:04ठंडा पानी पी देख पराई झोपड़ी मत ललचावे अच्छी।
- 14:13सोने के सिंघासनों पर बैठे हुए लोगों को सुखी मत समझ लेना।
- 14:25जो शरीर तुम्हारा हो रहा है वो शरीर तुम नहीं हो, अगर ये जान जाओ
- 14:33तो बड़ा मृत बरसता है। वह ठंडी सी, कोमल आवाज बाबा के
- 14:46बड़ी मधुर लग रही थी। ऐसा ही तुम सोचते हो तुम चाहते हो
- 14:58ऐसा ही बन जाना। लेकिन कबीर ऐसे थे कभी रैदास।
- 15:05ऐसे थे कभी लेकिन शांति नहीं मिली है और मूल्य तो शांति का होता है।
- 15:21मूल्य तो तृप्ति का होता है तो फिर जब अशांत होता है व्यक्ति
- 15:30दुखी होता है। तो खोजता है यहाँ तो सुख नहीं है,
- 15:37सोने के सिंहासन हीरे जवाहरात मुकुट यहाँ सुख नहीं है, आनंद
- 15:44नहीं है, दुख है तकलीफ है भटकन है।
- 15:52फिर वो खोजता है खोजता खोजता जिसे तुम अधोपतन कहते हो वह उर्दम गमन
- 16:03होता है तुम कहते हो राजा से मजदूर बन गया।
- 16:12यह कोई तरक्की तो ना होय? बाबा कहते हैं यही तरक्की है ये
- 16:22सिंहासन पे बैठा व्यक्ति दौड़ रहा है और दौड़ने से चेतना बढ़ती
- 16:29नहीं। तुम दुखी हो जाते हो तुम्हारा
- 16:36अंतर चाहता है ठहरना, लेकिन बाहर से तुम दौड़ते हो क्यों बाहर
- 16:42कॉम्पिटिशन मार्केट शो कह रहे हैं ठीक कह रहे हैं मूड है।
- 16:55और जो व्यक्ति जीस तल पर होता है वहीं से बोलना होता है।
- 17:00मारकिस को पूछा जाए फिर खाने को रोटी किसने दी?
- 17:12तो उसके पास कोई सटीक विवरण नहीं होगा।
- 17:17कितनी छोटी छोटी बातों पे लोग उस वृहद सर्जना कार की अवहेलना कर
- 17:27देते हैं उसके होने से इंकार कर देते हैं।
- 17:32तभी मैं कहता हूँ अगर ये संत ना होते जल मृता संसार अगर ये कुछ
- 17:41एका दुक्का रोग स्टैंप लगाने वाले इनकी वासनाएं मट गई अनकक्षाएं मट
- 17:50गई। ठहराव आ गया।
- 17:56ये स्टेम्प लगाने वाले न मिलते कि वह है और मैंने देखा है तो तुम जल
- 18:06मरता है, दुनिया आज खड़ी है। तो संतों के कारण खड़ी है और जब
- 18:19जब जिसने भी संतों की अपेक्षा की ध्यान रखना, वह दुखी ही हुआ।
- 18:29सिर्फ दुखी हुआ। वह व्यक्ति राजा था और जब तुम
- 18:46राजा होते हो, राज़ को भोगते हो, सुख सुविधाएं भोगते हो।
- 18:54जो चाहते हो मिल जाता है तब तुम्हारे विद्रिक जिज्ञासा जगती
- 19:05सच्ची क्योंकि यह तो भोग लेगा लेकिन सुख नहीं मिला, तृप्ति नहीं
- 19:14है जैसे तुम खाना, खालो और तृप्ति ना।
- 19:21तुम कहो के बस भूख ही मिटती है तृप्ति और ध्यान रखना तुम्हारी
- 19:30तरफ भूख ही मिटती है। जीस दिन तृप्ति आ जाएगी?
- 19:39उस दिन तुम स्वाद का खाना छोड़ दोगे, स्वाद मत लो।
- 19:56तुम खाने के लिए नहीं जीओगे तुम जीने के लिए खाओगे, बस मेरा ये
- 20:02सूत्र समझे लेना तुम खाने के लिए नहीं जीओगे तुम जीने के लिए
- 20:10खाओगे। तो फिर जब भीतर संस्कार इकट्ठे
- 20:21होते नहीं मिला, इससे तो कुछ तो अगले जन्म में और फिर और फिर और
- 20:30मैं तुम्हें एक बात नहीं समझा दूंगा, आज जिसे तुम कहते हो,
- 20:36पहला। गरीबी भौंकेंगे दुख होगा फिर धीरे
- 20:40धीरे अमीर हो जाएंगे गलत है सबसे बाद में गरीबी आती है।
- 20:49तुम अमीरी पहले भौंक चूके होते हम ये सिर्फ बुद्ध का स्वाद नहीं।
- 20:57महावीर का सवाल नहीं, ये तुम्हारा भी सवाल है, तुम्हें पता नहीं बस
- 21:09अमीरी का भी दंश होता है, अपना गरीबी का भी दंश होता है अपना और
- 21:17अमीरी का भी दुख होता है अपना और। गरीबी का भी सुख होता है अपना
- 21:29अमीरी का भी सुख होता है अपना लेकिन अमीरी के सुख से गरीबी का
- 21:37सुख आनंददायक अमीरी का सुख सुविधाओं तक रह जाता है।
- 21:45हुकम करो, आ जाएगी चीज़ गरीबी का सुख आत्मा को तृप्त कर देता है,
- 21:55इसलिए जीतने बड़े संत हुए। अगर तुम देखोगे अपने पिछले दिनों
- 22:01में जाते हुए उनको। या उनका फ़िशला जन्म तुम देख सकते
- 22:05हो तो पाओगे रैदास कबीर राजा कबीर, कबीर राजा और ऐसे राजा जो
- 22:15तुमने सोचा नहीं चक्रवर्ती सम्राट जो आज गरीब है मार्तस कहता है।
- 22:23तुम गरीब क्यों हो? क्योंकि अमीरों ने तुम्हारा काट
- 22:26लिया, इस विषय पर मैं भी बोला करता हूँ।
- 22:34भ्रम मिटना चाहिए कि अमीरी में कुछ है।
- 22:44भ्रम बैठना चाहिए कि गरीबी में कुछ नहीं मिटेगा।
- 22:51कैसे भोग क्या मुझे रील दिखाई बाबा ने, पर मैं समझ गया हूँ बाबा
- 23:03मैं समझ। मार्कर्स कहते हैं, परमात्मा को
- 23:12मैं तब मानु अगर मुझे खाने को रोटी दे, अब ये मूडों जैसी बात
- 23:19क्यों पूछा है आपने मूड क्यों का? और इसीलिए कहा भाई वह जानता है
- 23:28उसने सृष्टि में अद्वितीय रोग पैदा किया।
- 23:34तुम भी देख लो। एक क्रॉस के लोगों को रुचि
- 23:41पूछोगे, कोई कहेगा नमकीन कोई कहेगा?
- 23:44मीठा कोई केगा तीखा, कोई केगा खट्टा एक क्लास में बैठे हुए
- 23:52विद्यार्थियों की रुचियाँ नहीं मिलती।
- 24:02तो भगवान ने क्या किया? राव मटेरियल दे दिया तुम्हें?
- 24:07ये लो भाई कच्चा सामान तुम्हारे पास राव मटेरियल पड़ा है ये धरती
- 24:13है कि सूरज है हवाएं है, ये बीज है, ये पानी है।
- 24:19बनियादी चीजे दे दी अब तुम चाहो तो मुंगी उगाओ तुम चाहो तो उढ़
- 24:27दोगा तुम्हें अच्छा लगता गेहूं उगाओ तुम्हें अच्छा लगता चावलों
- 24:33का क्यों अच्छा लगता वो गालों? तो मार्कर्स को मैं मूड ना करूँ
- 24:47तो और क्या कहूँ? जब उसने राग मटेरियल दे दिया, मैं
- 24:57किसी घर में किसी को बैठा के जाऊं भाई सारा सामान पड़ा है जो अच्छा
- 25:01लगे जैसे अच्छा लगे ये गैस सिलिंडर पड़ा है, गैस है, चुरला
- 25:07है। दिखने का सारा सुनाओ जो अच्छा लगे
- 25:10पका के खा लेना ठीक तो क्या गलत किया?
- 25:16क्या मैंने उसे कुछ नहीं दिया? दिया तो मार्क्स क्या कहते हैं?
- 25:25मैं चाउमीन चुग को खाता हूँ तो चाउमीन चुग ऊपर से ही करा दो, ये
- 25:31तो बड़ी बेहोदी बात होती है, मैं तो नहीं खाता चाउमीन चुग फिर क्या
- 25:35करोगे और कोई चावल पसंद है? कोई गेहूं को पसंद करता, कोई
- 25:46मूंगी की दाल, कोई मसरे की, कोई उरद की, कोई मोठ की, कोई चने की
- 25:56और तुम ऊपर से फेंक दो, जाओ मुंछो परमात्मा तुमसे ज्यादा समझदार है।
- 26:05से से क्षण पर रखा हुआ है। इतना चल रहा है ना अरे भाई राग
- 26:16मटेरियल दे दिया अगर ऑक्सीजन 10 मिनट के लिए खेंच ले।
- 26:23क्या होगा तुम्हारा पानी ना दे, क्या करोगे घी पीओगे उसकी बनाई
- 26:38साइंटिस्ट कोई खोज कर देता है आइन्स्टीन हो या होकिंस हो।
- 26:48खोज की बनाया कुछ साइंटिस्ट छाती खुलाके मेरे पास है, मैं कहता हूँ
- 27:00स्वाद की बात तो था सेब पक जाए। और नीचे ना करे, ऊपर आसमान में ही
- 27:12चला जाए। फिर तो तुम्हारी उपलब्धि हुई
- 27:17बेसिक उपलब्धियों को बेसिक उसकी कृतियों को तुम बदल नहीं सकते।
- 27:25काहे के संस्थान तुम्हारा पिता है, वो जिसने बनाया, समझदारों का
- 27:38समझदार है, वो वह जानता है। मैंने प्रत्येक व्यक्ति अद्वितीय
- 27:50बनाया है। तुम 10 लोग बैठे हो, डाइनिंग टेबल
- 27:55पे किसी को नमक ज्यादा, किसी को मिर्ची ज्यादा, किसी को मिर्ची
- 28:03बिल्कुल नहीं, तुम चाय पीते हो, कोई एक चम्मच, कोई दो चम्मच।
- 28:11कोई तीन चम्मच कोई बिना चम्मच के अद्विति है।
- 28:20संसार इसलिए सुंदर है और जीस दिन तुम यकसा बनाने की चेष्टा में लग
- 28:30जाओगे। उस दिन ये संसार नर्क हो जाएगा।
- 28:36गुलाबी, गुलाबी गुलाब तुम एक सब्जी सारी उम्र खाके दखाओ उब
- 28:46जाओगे तुम कहोगे ये भी क्या जीना आत्महत्या कर लो?
- 28:56वह सर्जन हारा तुमसे ज्यादा समझदार है और सच पूछो तो समझदार
- 29:02ही वो है, तुम लाख समझदार बने रहो, मूड ही रहोगे।
- 29:10इसलिए मैंने मूड को मूड ही कह दिया।
- 29:14मेरी बात में कहीं कोई फर्क हो तो बता देना सब दे दिया।
- 29:26उसने पानी दे दिया, ऑक्सीजन दे दी, वायु दे दी बीज देती है, धरती
- 29:35दे दी सब तो दे दिया। और उसे पता है रुचियाँ अलग अलग
- 29:41हैं। जीसको जो अच्छा लगेगा, खा लेगा
- 29:46जीसको रोटी अच्छी नहीं लगती, वो चावल खा लेगा, चावल अच्छा नहीं
- 29:53लगता, पका के खा लेगा, दड़िया खा लेगा, खिचड़ी खा लेगा।
- 30:01दूध पीना दूध पी लेगा दही पीना दही पी लेगा भाई वो तो तुम्हारी
- 30:09इच्छा है रहा मटेरियल किसने दिया इसमें उसकी कृपा ही है।
- 30:20अगर वह सिर्फ चाव में चुंगा ही रख देता ये करना पड़ेगा तो क्या
- 30:25करते? तुम जी नहीं पाते जी, ठीक किया
- 30:36उसने। देखो भाई जो अच्छा लगता है वो उगा
- 30:38लो व्यवस्थाएँ सब हैं तो कौन कहता है फिर मार्क्स जो खाता है वो
- 30:49किसने लिया रहा? मटेरियल किसने दिया?
- 30:57तुमने पूछा बाबा उसने उसको मुड़ क्यों कहा?
- 31:01आंधी दुनिया उसने पागल कर दी, पागल ही तो कर दी, यह भी कोई
- 31:06उपलब्धि है? अरे समझदार तो नहीं बनाई?
- 31:15पागल करना भी कोई उपलब्धि होती है, कोई क्वालिफिकेशन होती है।
- 31:22तुम तो उसको भी संसार का भारत रत्न दे लोगे, ये लो।
- 31:31ऐसा नहीं होता है। मैं चाहता तब अगर कोई व्यक्ति
- 31:39संसार को पागल न बनाएं, संसार को बुद्धिमान बना है, समझदार बना है
- 31:46और समझदार कौन? सत्य को सत्य की तरह जो जान लेता
- 31:50है। वह समझदार सत्य को उसकी
- 31:57वास्तविकता में जान लेना ही समझदारी है और सच्चा समझदार वो।
- 32:16जो खुशहाल हो जाता है, जो तृप्त हो जाता है।
- 32:22जिसने अपने जीवन को तृप्ति की तरफ अग्रसर किया अन्यथा जीने को तो
- 32:31लोग। जी ही लेते हैं, किसी तरह वो जीना
- 32:38नहीं होता, दिनों को धक्के देना होता और तुम्हें जीने से नफरत हो
- 32:46जाती है। गुजरे हैं।
- 32:52आज इश्क में हम उस मुकाम से। गुजरे हैं।
- 33:09आज देश में हम उस मुकाम से नफरत सी।
- 33:27हो गई है। मोहब्बत के नाम से गुजरे हैं आज।
- 33:51तुम ऐसा जीवन जीते हो, मोहब्बत से नफरत हो जाती है तो फिर ठीक से
- 34:02जीया नहीं तुमने। नफरत होनी चाहिए थी नफरत से, घृणा
- 34:14से, ईर्ष्या से द्वेष लड़ाई झगड़े से और नफरत हो गई माँ बाप से
- 34:25कितना विकृत कर लिया तुमने अपने आप को?
- 34:32और तुमने सोचा भी कभी नहीं और तुम ढूंढ़ते हो मार्कर्स जैसे लोग तो
- 34:41इन्हें मूड ना कहूँ और क्या कहूं मुझे बता दो भारत रत्न दे देता
- 34:47हूँ। मिन्नत को सहमत कर लूँगा के भाई
- 34:58इसको पार्थ रथ दे दो मुझे पूछ लेते हैं अक्सर बाबा आप कहते हो
- 35:17एम् अनार? तो क्या एम् अनार कहने वालों का
- 35:26तृष्कार करें? नहीं?
- 35:33अब ठीक से सुने नहीं मेरी बात? फिक्स समझे नहीं मेरी बात अनार
- 35:42कहने वालों को तृष्कृत मत करो, पुरस्कृत करो क्यों?
- 35:48क्योंकि आज जो मेरे पास पीएचडी करने आएँगे आपके पास अनार वालों
- 35:56ने सिखाया न होता। तो पीएचडी नहीं करते, पहले दिन
- 36:06नहीं कह देते एम् अनार नहीं होता एम् सबका होता है तो बच्चे का
- 36:10दिमाग चक्कर आ जाएगा। स्टेप ब्य स्टेप समझाया जाएगा
- 36:17बच्चे को और 1 दिन बच्चा लिखी हुई इबारत को पूरा पढ़ लेगा।
- 36:21पोलि वंडली बोल लेगा इसलिए मैं इन सब का धन्यवाद करता हूँ।
- 36:32ये बोलते हैं राधे राधे करते रहो। उनको कहता हूँ कि तुम गलत हो
- 36:41लेकिन मुझे पता है वो ठीक भी है। ए अनार भी होता है लेकिन ए सबका
- 36:49होता है जो ए से शुरू होता है। तो इनको भी मैं प्रणाम करता हूँ,
- 36:57आचार्यों को भी मैं प्रणाम करता हूँ।
- 37:04बात तुम इससे बात ही करनी ही पड़ती है, लेकिन इसका मतलब विषय
- 37:12नहीं है। कि मैं सीढ़ियों का तिरस्कार कर
- 37:16रहा हूँ, नहीं, सभी सीढ़ियों की मेरे मन में उतना ही आदर है
- 37:23क्योंकि सभी सीढ़ियों ने छत तक पहुंचाया।
- 37:31कोई प्राइमरी पढ़ाता है, कोई नर्सरी, कोई आगे।
- 37:37हायर सेकेंडरी कोई कॉलेज रिसर्चर डॉक्टर मेरी नजर में सभी पूजनीय।
- 37:58मेरी नजर में सभी सीढ़ियों पूजनीय हैं क्योंकि पहली सीढ़ी ना होती
- 38:04तो तुम आखिरी छत पे भी ना जा सकते हो।
- 38:10मेरी सिस्टर ये होती है की तुम्हें समझाऊं।
- 38:17ए अनार का तो होता है लेकिन ए सिर्फ अनार का नहीं होता।
- 38:30अगर तुम ये बात समझ जाओ तो तुम अपनी चेतना की तरक्की करनी शुरू
- 38:36कर दोगे। मैंने पूछा है कि चेतना की तरक्की
- 38:44कैसे हो? इन गुरुओं के पीछे रखोगे तो ये
- 38:54तुम्हें दौड़ना सीखा दो। और चेतना की तरक्की होती है।
- 39:05ठहरनेस इसलिए अगर मैं गाहे बगाहे इनको अपशब्द कहता हूँ तो क्षमा
- 39:14मांग लेता हूँ, मुझे ये भी पता है।
- 39:21जो ठीक पढ़ा रहे हैं बिल्कुल ठीक पढ़ा रहे हैं और मुझे ये भी पता
- 39:27है कि पूर्ण ठीक नहीं पढ़ा रहे हैं।
- 39:33इसलिए कभी कभी बोलना पड़ता है, लेकिन आप शब्दों को पकड़ लेते हो।
- 39:38मेरे। और कभी कभी इन्हें स्वीकार भी
- 39:42करना पड़ता है। दोनों ही बातें पहली पोढ़ी पर तुम
- 39:49चढ़े पहली पोढ़ी को भी धन्यवाद देना होगा, लेकिन ध्यान रखना पहली
- 39:56पोढ़ी को तुम छोड़ें तो दूसरी पे चढ़ें।
- 40:01फिर दूसरी, तीसरी, चौथी सभी पोडियों पे चढ़ी सभी का धन्यवाद
- 40:05करना होगा, फिर छत पे गए तो धन्यवाद सभी का करना होगा।
- 40:15पोढ़ी पोढ़ी चढ़कर ही मंदिर आता है।
- 40:23लेकिन किसी भी पोड़ी का अवेलना नहीं करता मैं मैं बसिता से कहता
- 40:29हूँ जीस पोड़ी पर तुम पहली पोड़ी पे तुम बैठ गए हो चढ़ गए हो।
- 40:38तो इसको छोड़ न सीखो, फिर दूसरी तीसरी सभी को छोड़ न सीखो, फिर एक
- 40:47ऐसी छत आ जाएगी जीसको तुम छोड़ ही नहीं सकते इट इस इम्पॉसिबल?
- 41:04तो ए अनार जो कहता है मेरे कहने से उसको गाली मत निकाल लेना,
- 41:09क्योंकि मैं आगे के पड़ाव जानता हूँ, तुम आगे के पड़ाव जानते हो
- 41:16कभी अगर निंदा करें, पाथर पूजे हर मिले।
- 41:22तो मैं पूज हूँ, पहाड़ तो उनकी निंदा से ही, क्योंकि वो जानती है
- 41:26कि पाथर के पूजने से भी हरी मिलता है और पाथर को पूजने से भी हरी
- 41:36मिलता है। अगर 100% तो तुम्हारी आस्था उसमें
- 41:42इन्सर्ट हो जाए। तुम तलीन हो जाओ तो पात्र में भी
- 41:45मिल जाएगा। धन्ना भगत को मिला मूर्ति में भी
- 41:53इन्सर्ट हो जाओ 112 क्रियाएं शिव भगवान ने बनाई सार क्या था?
- 42:01कोई भी क्रिया पकड़ लो। यू विल हैव टू इन्सर्ट, यू हैव टू
- 42:06टोटली इनवॉल्व यू विल हैव टू डिज़र्ब योरसेल्फ बस ये है सार
- 42:16तुम्हें अपने आपको गलाना होगा विलीन करना होगा।
- 42:20कैसे क्षमा के भीतर परवान और राख हो जाता है।
- 42:27बुद्धि से काम लोगे तो बुद्धि कहेगा यह तो मूर्खता है, अच्छा
- 42:35भला जीता? क्षमा में घुस गया, मर गया
- 42:43क्योंकि तुम मृत्यु को गलत कहते हो, तुमने मान लिया की मृत्यु
- 42:49व्रत है इसलिए तुम परवाने को कभी दादना दोगे, तुम कहोगे नहीं नहीं।
- 43:00ठीक नहीं है ये, लेकिन जो कहते हैं और कबीर जानते हैं, पाथर के
- 43:08पूजन से हरी मिल जाता है। जाप से भी हरी मिल जाता है।
- 43:19अगर जबते जबते हाथ से तस्वीर गिर जाए, तुम इतने मत हो सो जाओ, खो
- 43:28जाओ, अपने उस स्थल में छलांग लगा लो, राम राम करते हुए रमन हो जाओ,
- 43:34अपने में लीन हो जाओ, रमन हो जाओ और राम जाओ।
- 43:46कबीर के हाथ से तसबी छूट जाती है और कबीर कहते हैं बालो भयो, हरी
- 43:55भी सरो बहुत अच्छा हुआ, सर से डली बला, ये तो बला थी।
- 44:06जैसे थे तैसे भाई हम जैसे थे वैसे हो गए अब कछु कहाँ ना जाए अब
- 44:15बोलने को बाकी क्या है तो सभी ठीक है भाई।
- 44:22मेरे कहने से किसी से पंखा मत लेना क्योंकि मैं मैंने जो मुकाम
- 44:29देखे हैं मेरा बोलना और ढंग से है।
- 44:33तुम्हारा बोलना और ढंग से हो तो कबीर ने दोनों मुकाम देखे।
- 44:42बड़ी भाँति कभी ये जानते हैं कि पाथर से भी मिलता है और कभी ये भी
- 44:53जानते हैं कि माल से भी मिलता है। और कबीर ये भी जानते हैं कि अंत
- 45:04में माला हो, पाथर हो उसमें अगर तुम विलीन नहीं होगे तो फिर नहीं
- 45:12मिलेगा पाथर पाथर न रहे, चेतना हो जाए।
- 45:22माला गिर जाए, हाथ से और माला जपने वाला खो जाए तो मिल जाएगा
- 45:31छोटा सा फॉर्मूला अध्यात्म का, हम इसे समझते नहीं।
- 45:38कृष्ण कहते हैं तू समर्पण हो जा छोड़ दे सब कुछ मैं तुम्हें सभी
- 45:44पापों से मुक्त कर दूंगा। वो क्या कहते हैं कि छोड़ बहुत हो
- 45:49लिया, कितना ढो लिया और कितना ढो गया?
- 45:58इन रूटियों को इन पाखंडों को इन धर्मों को सर्वधर्माण प्रतिच्छ
- 46:05धर्म क्या है? मान्यता है सभी धर्म की अपनी अपनी
- 46:09मान्यता है। कृष्ण कहते है, इन मान्यताओं को
- 46:13छोड़ दे भाई। और तुम मेरी शर्ट में आ जा यानी
- 46:18खाक हो जा, तू विलेन हो जा, तू डिसोलवे हो जा, एक सर का फ़ोन
- 46:28आया, मेरे पास बाबा आपको ठीक से प्यारा तो बड़े लगते हो।
- 46:34ठीक से समझ नहीं आती, मैंने कहा वो समझती है, समझ में तो तुम्हारी
- 46:40सब्जेक्ट आते हैं, विषय वह विषय से परे हैं।
- 46:49वह ब्यूंड सब्जेक्ट है, इसलिए। बुद्धि से परे है, पर ये सर लोग
- 46:59ही बड़ा काम करते हैं। भोगने का तुम्हें विधि बता देते
- 47:07हैं। तुम आयश हो जाते हो, बड़े अफसर बन
- 47:11जाते हैं। लेकिन मैं सर लोगों से पूछता हूँ
- 47:18और ये शायद जवाब नहीं दे पाते। मैंने पूछा एक सर से सब ठीक तुमने
- 47:27बड़े बड़े औदे दिला दिए डिग्रीज़ चला दी।
- 47:32लेकिन क्या तुम कबीर की कबीरी दिला पाए?
- 47:38क्या तुम रैयदास की फकीरी दिला पाए?
- 47:44क्या तुम रैयदास का संतोष दिला पाए?
- 47:54चुप हो गया बाबा ये बात तो समझे में नहीं थी।
- 48:04हम तो सोच रहे थे कि पीएम बनने से आई ए एस बनने से सब मिल जाता है।
- 48:19बस वो नहीं मिलता, सिर्फ सुविधाएं मिलती है, पदार्थ मिलते है,
- 48:30तुम्हारी इच्छाएं पूरी होती है। तुम्हारी जरूरत पूरी नहीं होती।
- 48:38तुम्हारी इच्छा जो है वो जरूरत नहीं है तुम्हारी समझ ले ना बात
- 48:49तुम्हारी इच्छा कुछ और है। कॉम्पिटिशन पास कर दो।
- 48:57इस कॉम्पिटिशन ने दुनिया को मार दिया।
- 49:02मेरे पास लोग आ जाते हैं। बाबा मुक्ति का कोई रास्ता बता
- 49:06दो। मैं कहता हूँ तुम्हें बांदा किसने
- 49:12ये बता दो वो एक दम से चौंक पड़ते है।
- 49:20बांदा किसने हाँ, दिखाओ कोई ज़िन्दगी जिसने बांदा हो कोई लोहे
- 49:30की, कोई सोने की कोई तो होगी। मुझे तो कुछ नजर नहीं आता, मुझे
- 49:37तो ठीक ठाक नजर आते हैं पांडा किसने भाई मुक्ति के नाम पर
- 49:48व्यापार चलते हैं और ध्यान रखना जिसने जान दिया।
- 49:59कि मुक्त, तुम्हें हो वह व्यापार नहीं करेगा, प्रचार शुरू करेगा,
- 50:09अपने अनुभव व्यक्त शुरू करेगा पर उन अनुभवों को व्यक्त करना।
- 50:15व्यापार नहीं बनाएगा उसे रश आएगा बताने में पर इतना मुआवजा का कम
- 50:25होता है। सुना था ज़िन्दगी है 4 दिन की
- 50:48सुना था ज़िन्दगी है 4 दिन की बहुत होती है हज़ारों 4 दिन भी।
- 50:57तुम 4 दिन की बात करते हो। शायद।
- 51:00फिराक गुरखपुर के 4 दिन तो बहुत होते।
- 51:15हैं बहुत होते हैं यारों, 4 दिन भी।
- 51:24एक पल ही बहुत। है वो।
- 51:28एक पल तुम्हें बदल जाता। है वह एक पल कब आएगा?
- 51:41उसकी तरफ उन्मुख हो जाओ। ज़ंजीर।
- 51:45है सिर्फ तुम्हारे मस्तिष्क। में हैं और तुम नहीं थोपी जन्मो।
- 51:51जन्मो से जिसे तुम। संस्कार कहते हो जन्मो।
- 51:55जन्मो से इकट्ठी की हुई। ये मान्यताएँ।
- 51:59ये तुम्हारी। ज़ंजीरियां बन गई हैं आज।
- 52:04अन्यथा मैंने तो कोई कंजीरों। से लिपटा हुआ व्यक्ति देखा।
- 52:10नहीं। जो कहते हैं हम मुक्ति चाहते हैं
- 52:17तो पहले ये दिखाओ भाई। बांदा किसने?
- 52:25नहीं तुम। 15 मुक्ति करवाना आज एक व्यवसाय
- 52:35हो गया है और सुंदर व्यवसाय है। मैं तो अक्सर कहता हूँ, बेरोजगारी
- 52:40है तो बाबा हो जाओ, यह राजनीतिक हो।
- 52:45जाओ। दान लेके इधर से उधर।
- 52:50चलिए वाशिंग मशीन में धुल जाओ गए। कभी नाम बदलने से बदलाव आता है
- 53:06क्या? मैंने कहा गीदड़ वाह का नाम।
- 53:11मैंने कहा शेर वाह पर दो क्या फर्क पड़ता है, हमें शर्म आती है
- 53:22तुम्हें भी। हँसी आती होगी मैं।
- 53:23जानता हूँ। कहाँ चले हैं गीदड़?
- 53:28वाह? लेकिन अब क्या?
- 53:33करो, मजबूरी है ये बंदिशें। दिमाग लो की।
- 53:40ये है नहीं, लेकिन मुक्ति। चाहिए।
- 53:47तो अष्टावकर कहते हैं, भाई। मुक्ति मुक्ति कुछ नहीं वस्तु ठोर
- 53:53के ठोर ये। तुमने ही जन्म जन्म से।
- 53:58संस्कार बनाए। उनको तोड़ दो।
- 54:06या किसी संत की? सांनिध्य में बैठ जाओ, टूट जाएंगे
- 54:12धीरे धीरे उसके सत्संग सुनो, वह तुम्हारी मान्यताओं को तोड़ देगा
- 54:24और तुम मुक्त हो बस इतना ही बताना है।
- 54:33मुक्त होना नहीं है मुक्त तुम हो ये जानना।
- 54:38है। आज नहीं समझाई, सो सो जनम बाद
- 54:46समझ। लेना बात यही होगी।
- 54:54फिर तुम बोंदाल जाते हो। बाबा?
- 54:59बहुत से लोग मुझे कहते। हैं।
- 55:00बाबा अपने भीतर कैसे जाए? मुझे बड़ी हँसी आती है अपने भीतर
- 55:08कैसे जाएं? अरे, रोज़।
- 55:11बताता हूँ अपने भीतर तुम। रोज़ जाते हो?
- 55:15नींद में कहाँ होते हो तुम बस वही फ़ार्मूला आजमा लो।
- 55:20जगह जगह। अपने भीतर पहुँच जाओगे।
- 55:28लेकिन तुम इकट्ठा कर लेते। हो सब कुछ, सर।
- 55:33लोगों की तरह। मैंने एक सर से पूछा, सब मिल गया।
- 55:38तुम सब जानते हो मुझे पता है और ये भी पता है तुम से ज्यादा
- 55:43आर्टिफीसियल इन्टेलिजेन्स जानता है हाँ वो तो है।
- 55:50चलो, लेकिन तुमने जो सीखा। उससे तुम्हें वो मिल गया।
- 56:07जिससे तुम ठहर गए। तृप्ति हुई।
- 56:12आनंद आया, रस आया। जीने का मज़ा आया सच बताना बाबा।
- 56:24झूठ तो नहीं बोला जाता? आया तो?
- 56:28बहुत सुविधाओं। का सुख था।
- 56:32तुम गलती खाकर तुम कपास को दही समझ बैठे रंग दोनों का एक था।
- 56:46और कपास को दही समझ के। खा लिया, वह तुम्हें न्यूट्रीशन
- 56:49नहीं देगा। ये तो कही न कही फंस ही जाएगा,
- 57:00फिर क्या करे? बाबा कॉम्पटीशन का ज़माना है।
- 57:06तो मैं तो तुम्हे यही कहता हूँ कॉम्पटीशन।
- 57:08बंद करता हूँ। तुम कहते हो तरक्की कैसे?
- 57:17होगी फिर प्रोग्रेस। इतना सुंदर संसार मैंने कहा।
- 57:25मटेरियल तो यही रहेगा जब। चाहे बना लेना जब कोई पागल हो जाए
- 57:31तो मटेरियल रखा है रोटी। बनाये चावल बनाये।
- 57:36चाउ का बनाये। ये बड़ी बड़ी सी इमारतें।
- 57:41धराशाई हो जाती हैं। छोटा सा भूकंप।
- 57:48इसे तुम तरक्की कहते। हो क्या भूकंपरोधी भी बना लोगे?
- 57:56लेकिन क्या? बना के वो पाया।
- 58:00जो रैगा से पाया माटी का उथुरा। कैसा नच?
- 58:17कैसा न तू है डरे वो फिरत है। माटी का।
- 58:30पुथुरा। कैसे नचत वो?
- 58:35जानते हैं माटी का पुत्र है और इसे मैं समझे बैठा है।
- 58:43जिसने यह जान। लिया वह जूतियां बनाएगा और उसके
- 58:50आसपास आनंद देखना कैसा होगा? उसकी तरंगें तुम्हें दूर।
- 59:01जाके खींच लेंगे। जब तुम उसके परिवेश में।
- 59:07दाखिल हो जाओगे घुंघरू? बाजे उठेंगे मीरा।
- 59:11के पांव की झनकार की तरह। तुम रैदास को जूतियां बनाते?
- 59:19दिखाओ। रैदास किसने, आनंद?
- 59:24से जूतियां बनाती हैं, वो नहीं देखाओ उसका पैमाना नहीं तुम्हारे
- 59:30पास। है तुम देखते हो शांत बड़ा है,
- 59:34भागता नहीं। बस ठीक है इसकी?
- 59:46तरंगेतों में खींच थी बड़ा। नाम हो गया रहता उसका।
- 59:54राजा ने कहा अपूर्ण भी मिलाते कहते बड़ा।
- 59:59करने वाला संत चले गए, प्रणाम दिया, अरे दास बोले आओ राजा।
- 1:00:14महाराजा, क्या हुक्म हैं? हम तो आपकी जनता है।
- 1:00:22मुझे ही बुला लिया होता। राजा कहते हैं, जब किसी से कुछ।
- 1:00:29मांगना होता। है तो उसके घर पर जाना होता है।
- 1:00:38मैं तुम्हारे दर्द से कुछ मांगने। आया हूँ बोलो राजा मुझे।
- 1:00:47वो दे दो। जिसे।
- 1:00:49पीकर तुम हो गए? मैं तो न हुआ कोई सच्चा राजा
- 1:00:54होगा। ने कहा, लो।
- 1:01:01लो अंजलि बांधो राजा ने अंजलि बांधी।
- 1:01:12तो ये कुंडी। जिसमें चमड़ा भगोके।
- 1:01:18निकाला। जाता है।
- 1:01:20फिर? उसको छँगा जाता है, छिला जाता है,
- 1:01:23बदबू आती है उसमें उसमें। से अंजलि भर के।
- 1:01:33जब पिलाने लगा तो राजा ने दिखा रहे हैं।
- 1:01:38आँखें आंधी खुली थीं आंधी। भन थीं।
- 1:01:45तो उसने नीचे से अंजलि खोल। दी पानी।
- 1:01:50उसकी पुशाक पे घर गया। भीतर तो नहीं गया।
- 1:01:58रदास। ऐसे लेकिन मन ही मन में।
- 1:02:05तुम भी ऐसा ही हो। मेरे पास आ जाती हो।
- 1:02:11ऐसे प्रश्न। करते हो जिनका।
- 1:02:13कोई जवाब नहीं होता। राजा चला गया धोबी।
- 1:02:26की बेटी ने वह पोशाक। धोई।
- 1:02:30और देखा दाग लगा था। अवश्य ही कोई राजा ने सुंदर चीज़
- 1:02:35खाई होगी। राजा बहुत सुंदर पकवान खाता है,
- 1:02:39अपूर्ण को तो मिलता नहीं। चलो इसी को जूझ।
- 1:02:44लेते हैं उसने उस। पुशाप को जूसा।
- 1:02:49दाग। वह भ्रमकानी हो गई।
- 1:02:53कहानी। है।
- 1:02:55ऐसा ही होता है। शांत अगर अपनी कुंडी में।
- 1:03:03से। तुम्हें चमड़े से भीगा हुआ।
- 1:03:08पानी भी पिलाते हैं। वह अमर से समझ लेना।
- 1:03:17मीन मेघ मत करना इसलिए श्रद्धा यानी अंधविश्वास इम्तहा विश्वास
- 1:03:32का इम्तहा हो जाना। उसे श्रद्धा कहते।
- 1:03:41वह पहुँच जाते हैं समझदार। नहीं पहुंचते राजा समझदार था
- 1:03:54धोबी। की बेटी ने वो जूस?
- 1:03:55लिया। ब्रह्मा क्या नहीं हो गया?
- 1:04:03ब्रह्मकन का अर्थ उस आनंद। को पादे ना?
- 1:04:10इसमें राशी ही रस। है आनंद के फूल खेलते हैं वहाँ।
- 1:04:21मस्ती ही मस्ती है खुशी। ही खुश है लेकिन तुम चुक ही जाते
- 1:04:33हो कितनी? सुनता है रायदास को चुक गए ना?
- 1:04:38मीरा रायदास को पी गई। कबीर को तुम।
- 1:04:45चुक कर नानक को तुम चुक गए सब को? तुम चुक जाते हो बुद्ध?
- 1:04:56को तुम चुक गए? कृष्ण को तुम चूक गए।
- 1:05:06जब तुम बुद्धि से मीन। मेघ निकालना शुरू कर देते हो तो
- 1:05:09तुम अंधविश्वास की नहीं रहते। अंधविश्वास की मेरी।
- 1:05:17डेफिनिशन कुछ अलग से है। ध्यान रखना।
- 1:05:27मैं श्रद्धा को अंधविश्वास। करता हूँ।
- 1:05:33जब तुम बिलकुल डूब। ही जाओ, बस पाथर भगवान है, यह
- 1:05:42अंधविश्वास है। लेकिन मैं ऐसी श्रद्धा कहता हूँ
- 1:05:48मूर्ति में कम मिलेगा तुम कहो। ज्ञांत विश्वास।
- 1:05:53ऐसी शर्ता कहता हूँ बेशर्ते के वो है तुम्हें फना कर दे, तुम उसमें
- 1:06:00फना हो जाओ? अपनी मर्जी से फना हो?
- 1:06:05जाओ। तब वह श्रद्धा बन जाती।
- 1:06:11है और तुलसीदास ने कहा श्रद्धा विश्वास रोगिणो या व्याम बिनाना
- 1:06:18नहीं मिलता इसके बिना। वक्त बड़ा बीत जाता है।
- 1:06:31क्या करें अभी तो मेरी पी हुई उतरी पीने।
- 1:06:38और वक्त है। एक घंटा हो गया।
- 1:06:47सो आज के पाठ में मैं तो ये। कहूंगा ये अनार से ले के पीएचडी
- 1:06:51तक। बहुत से पड़ाव आएँगे।
- 1:06:56तिरस्कार मत करना। कभी कोई शंकर।
- 1:07:05कि ज्योति जला देगा, धूप जला। देगा।
- 1:07:07तुम्हारे ऑफिस में तुमसे मत कहना क्यों जगाया?
- 1:07:11उसकी आस्था है और यही आस्था अगर प्रगाढ़ हो गई तो यह व्यक्ति आ
- 1:07:17जाएगा। बात आस्था का है।
- 1:07:22श्रद्धा का है। पहली सीढ़ी से लेकर अंतिम।
- 1:07:30धक्का जब तक बड़ी सीढ़ी आएँगे किसी का नाराद्र मत करना, किसी को
- 1:07:39दुष्कार मत स्वीकार करते चले जाना ये स्वीकार भाव।
- 1:07:48आपको वहाँ पहुंचा देगा जो। आपकी जरूरत है।
- 1:07:53जहाँ मस्ती। के फूल खिलते हैं जहाँ।
- 1:07:57आनंद की रस धार। बहती है।
- 1:08:03जहाँ फिजाओं में महक है। जहाँ हवाओं में शीतलता है।
- 1:08:12चारों तरफ आनंद ही आनंद। है दुख का निशान।
- 1:08:21लेकिन तुम्हारी बुद्धिमान ने क्या।
- 1:08:23कमाया दुख कमाया। बोही मार्कर्स आज देखो, पुतिन।
- 1:08:31पैदा हो गया। और लोगों ने केनी मूर्खों।
- 1:08:39ने तुम्हे सीखा दिया कि बल इकट्ठा करो।
- 1:08:48तुम इसके साथ होली है? और ये तो मूड है, तुम भी मूड हो।
- 1:08:58गए। अगर पीछे ही लगना है।
- 1:09:11तो कृष्ण जैसे व्यक्ति के पीछे रुको, अनुकरणीय।
- 1:09:15हैं। हिटलर?
- 1:09:18अनुकरणीय नहीं। पुतिन?
- 1:09:26किम जोंग जोंग। अनुकरणी।
- 1:09:32अनुकरण करना है। तो बुद्ध खबर महावीर कृष्ण।
- 1:09:38कबीर नानक। मेरा।
- 1:09:42अनुकरण करना। ये तुम्हें श्रद्धा सिखाएंगे
- 1:09:51जिसे। अंधविश्वास कहते हैं ये लोग।
- 1:09:55और अंधविश्वास एक महीने में। बड़ा सुंदर है।
- 1:10:00क्योंकि अंधविश्वास में तुम्हारा मय।
- 1:10:02समाप्त हो जाता है और मय को समाप्त ही करना है।
- 1:10:07कैसे तुम विलेन हो जाओ। कैसे तुम?
- 1:10:11हवा में वाष्प। बन के उठ जाओ।
- 1:10:15और जो शेष रह जाए? वो आनंद है, तो कॉम्पिटिशन
- 1:10:28तुम्हारी। दुनिया को देखने में खूबसूरत।
- 1:10:30बना सकता है। तुम्हें डिग्री दे सकता है।
- 1:10:35मान सम्मान देगा तन। के अम्बार लगवा देगा।
- 1:10:41संभालीस दिन। नहीं संभलेगा।
- 1:10:44लेकिन। वह नहीं देगा।
- 1:10:47जिसकी तुम्हें वास्तव में जरूरत है अगर अगर वो ना मिला।
- 1:10:52जिसकी तुम्हें वास्तव में जरूरत है, तो फिर समझना।
- 1:10:57जिंदगी बेकार। चली गई फिर अगले जनम में फिर।
- 1:11:03यह पाठशाला खत्म नहीं होती। जब तक तुम आखिरी शब्द नहीं सीख
- 1:11:08लेते। और आखिरी शब्द क्या है?
- 1:11:17आखिरी शब्द है तुम्हें सत्य। का पता चल।
- 1:11:24जाए। सत्य।
- 1:11:27का उसके वास्तविक रूप में। पता चल जाए अगर पतंजलि का महावीर
- 1:11:32का बुद्ध का प्रथम शब्द किसी ने जान लिया होता, सच में सत्य।
- 1:11:40तो फिर दुख आपके आसपास। भटकता नहीं था।
- 1:11:44सत्य बड़ा मजेदार है। बड़ा मीठा है रसधार है, सत्य को
- 1:11:58पीने से वह। मिल जाता है।
- 1:12:04रोवा रोवा। तुम्हारा रोम।
- 1:12:07रोम तृप्त हो जाता है। अभी तो तुम्हारा पेट भी तृप्त
- 1:12:10नहीं होता। इस मुक्ति को व्यापार मत।
- 1:12:24बनने देना ये जानना की। क्या मैं बंधा?
- 1:12:31हुआ हूँ। और तुम पाओगे तुम।
- 1:12:36कभी बंधे नहीं। बंधना एक भ्रम था यही।
- 1:12:42सूत्र मैंने दिया। सब सत्य है।
- 1:12:46यहाँ कुछ भी ब्रह्म सत्यम। जगत।
- 1:12:54सत्यम ब्रह्ममित्य। जो भ्रम हो गया है तुम्हें गाड़ी
- 1:13:06के ऊपर बैठे वृक्ष। दौड़ते नजर आते है चाँद तारे।
- 1:13:12सामने का छोटा स्टेशन। स्टेशन पर खड़े हुए लोग।
- 1:13:18ये चंद्रमा, ये सूरज। भागते हुए नजर आते हैं।
- 1:13:23ये भ्रम है पता कब चलेगा जब गाड़ी ठहर जाएगी तो पता चलेगा ना तो मैं
- 1:13:30भाग रहा था ना चाँद। तारे ना?
- 1:13:34पृथ्वी। कोई भी तो नहीं।
- 1:13:36भाग रहा था। वस्तु ठोर की ठोर?
- 1:13:39सब यही था। मन पर।
- 1:13:44सवार मत होना ये उस। गाड़ी की तरह है।
- 1:13:51जो तुम्हें भ्रम। दिखायेगा।
- 1:13:54गाड़ी दौड़ती है गाड़ी का। स्वभाव है।
- 1:13:59लेकिन गाड़ी के ठहरने के। क्षण में अच्छी तरह से देखना
- 1:14:03वृक्ष ठहरे हुए हैं। ये जान तारे आसमान।
- 1:14:09ये स्टेशन ठहरे हुए हैं कुछ नहीं भागता ना धरती भागती है ना तुम
- 1:14:13भागते हो तुम भी बैठे हो गाड़ी भागती है और इससे।
- 1:14:22पहले के गाड़ी पर चल। पड़े कभी कभी दो लम्हे आती हैं।
- 1:14:27जब मन ठहर। जाता है गाड़ी की तरह।
- 1:14:29किसी स्टेशन पे उससे यही सीख ले लेना गाड़ी।
- 1:14:37भाग रही थी तो सब। भागता, वह दिख रहा था, मैं भी
- 1:14:40ठहरा था। लेकिन भाग कुछ।
- 1:14:44भी नहीं रहा था। तो सिर्फ गाड़ी।
- 1:14:47भाग रही थी जब पता चलेगा जब। गाड़ी रुक जाएगी।
- 1:14:56तुम्हें पता चलेगा, मैं। बंधन में नहीं हूँ जब तुम्हारा मन
- 1:15:00रोक जायेगा, पूर्णतया रुक जायेगा देखे मैंने शब्द।
- 1:15:05पूरन तेयास शुरू से इस्तेमाल कर रहा हूँ।
- 1:15:12तो पता चलेगा कोई नहीं। दौड़ रहा है तो मन दौड़ रहा था
- 1:15:19मन। दो भी मन लालची।
- 1:15:21मन चंचल मन चोर। मन के मते न चलिये पलक, पलक, मन
- 1:15:27और। मन के ऊपर सवार मत हो।
- 1:15:32जाना आज का यही संदेश है जिसने मन की सवारी की।
- 1:15:40उसके लिए जगत सत्य हो जायेगा, जगत मथ्य हो जायेगा।
- 1:15:46लेकिन जगत सत्य है, ब्रह्मदु सत्य है।
- 1:15:53तो मिथ्या क्या? वह जो तुमने।
- 1:15:56दौड़ते हुए पेड़। देखे दौड़ती हुई।
- 1:16:00धरती आसमान तारे। देखे?
- 1:16:04दौड़ती वे? स्टेशन देखे उसके।
- 1:16:05ऊपर खड़े लोग देखे सब दौड़। रहा था लेकिन क्या?
- 1:16:10दौड़ रहा था बताओ मुझे? नहीं दौड़ रहा था कौन दौड़।
- 1:16:16रहा था, गाड़ी दौड़ रही थी, वाहन दौड़ रहा था।
- 1:16:20मन तुम्हारा वाहन है। जीस दिन यह ठहर गया।
- 1:16:27पूरा। इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ।
- 1:16:34ठहर जाओ और ठहरना होगा। वर्तमान में बहुत की।
- 1:16:40स्मृतियों को छोड़ो। अतीत जानी भविष्य अभी आया नहीं,
- 1:16:46कल्पनाओं को छोड़ो आज में ठहर जाओ अभी ठहर जाओ, वर्तमान में ठहर
- 1:16:51जाओ। तुम्हारा मन ठहर जाएगा धीरे।
- 1:16:56धीरे मन ठहरा तो सब ठहरा। और फिर तुम्हें पता चलेगा तुम
- 1:17:04अपने आप पे हंसोगे। तुम कहोगे मैं भी।
- 1:17:13कितना पागल था कांबली, सड़ी फकीर दी हस्या ताड़ी मार चंगा ए बी ले
- 1:17:22गया। दो पार।
- 1:17:27फकीर की कम्पली सड़ गई थी। हँसा ऐसे ही तुम भी।
- 1:17:32हंसोगे कितना पाल? लेते है कबीर की तस।
- 1:17:36बिगड़ जाती है। हँसा।
- 1:17:42अच्छा। सर से टली बला।
- 1:17:48बला टली कहि फकीर कहता है ये बिकांधों के ऊपर भार था कम्बली।
- 1:17:56ऐसा क्षण आएगा कब अब तुम्हारा मानव पूर्ण रोपण?
- 1:18:01ठहर जाएगा। बस ये सार है।
- 1:18:06वैसे रोज़ की वीडियो सार। होती लेकिन।
- 1:18:10ये सारों का भी सार। आज।
- 1:18:14मैंने वो सब बोल दिया। संक्षिप्त में।
- 1:18:18जो बोलना चाहिए था। अंत में पाओगे तुम बंधे नहीं हो।
- 1:18:32फिर तुम ताड़ी मार कर हसोगे फिर तुम।
- 1:18:36अपने पे हसोगे। अभी तक तो दूसरों पे हसते हो।
- 1:18:43ये कॉमेडियन दूसरों पे हंसते। हैं और जीस दिन ये खुद पे
- 1:18:48हँसेंगे। उस दिन सही समझदार होंगे उससे
- 1:18:52पहले मूर्ख। समझदार व्यक्ति।
- 1:19:00अपने पे जश्न हँसे। तुम लोगों पे हँसते हो अब समझदार।
- 1:19:07मत समझ लेना। तुम मूर्ख हो।
- 1:19:11जीस दिन तुम अपनों पे हँसोगे। अपने अपने और ताली मार के हँसोगे
- 1:19:17हसिया ताड़ी मार चंघाई भी ले गया। मोर डाउट तो पार?
- 1:19:23कमली सली फकीर थी, तुम्हारा घर जल गया।
- 1:19:30जिससे तुम घर समते थे। बेफिक्र हुए इसे बचाने की कवायद
- 1:19:36खत्म हुई। सारी उम्र तुम यही तो करते थे
- 1:19:39सारी जिंदगानियों में। इस घर को बचाने में लग रहे।
- 1:19:45सजाने में लग रहे। और ये जल गया परमात्मा।
- 1:19:50का धन्यवाद करना क्योंकि परमात्मा।
- 1:19:53की कृपा के बिना। यह इज्जत है कर्मी आवे।
- 1:19:57कपड़ा नदरी। मोख द्वार।
- 1:19:59उसकी कृपा होती है तो तुम्हारा घर जलता है, तुम्हारे बंधन टूटते
- 1:20:05नहीं, बंधन है नहीं ये पता चलता है, बंधन थे नहीं।
- 1:20:14कोई दूसरा नहीं फिर तुम। पाओगे?
- 1:20:18एक। ही है एक ही था।
- 1:20:22बाबा? नानक का एक ओंकार एको आह द्वितीय।
- 1:20:28नास्ति? एको ब्रह्म द्वितीय।
- 1:20:32नास्ति, ये पता चलेगा तुम्हें? और।
- 1:20:39पता चलेगा। सूचनाओं की तरह नहीं, दर्शन की
- 1:20:43तरह अनुभव की तरह और वो अनुभव तो मैं उस मैं।
- 1:20:52खुद ही मदहोश हो जाता। हूँ।
- 1:20:55क्या बताऊँ? वहाँ का जिक्र करते करते।
- 1:21:01वहाँ पर ही चला जाता। हूँ सारी दुनिया कमा लोगे, बना
- 1:21:10लोगे? एक तू?
- 1:21:17ना मिला एक तू, ना मिला सारी दुनिया।
- 1:21:34मिले भी तो क्या है मेरा? दिल ना?
- 1:21:41खिला। मेरा दिल।
- 1:21:48ना खिला सारी। भगिया।
- 1:21:53खिले भी तो क्या है? एक तू?
- 1:21:59ना? मिला।
- 1:22:07ये चमकते हुए चेहरे ये होठों पे लगी हुई।
- 1:22:14लाली। गानों पे लगा हुआ फिश ऑर्डर देख
- 1:22:18कर ये समझ लेना के सुंदर है। भीतर कुछ और है।
- 1:22:24इसीलिए तो छुपाया। छोटी सी कहानी कह दो।
- 1:22:36गाँधी के आश्रम में भण वफा पे। बैठे थे।
- 1:22:40प्रसंग चला। सीता हरण हुई, सारे जेवरात मिले।
- 1:22:52राम ने पूछा, भैया लक्ष्मण? देखो, तू।
- 1:22:59ज़रा यह गले की चेन। यह तेरी भाभी की है।
- 1:23:15यह कर्ण फूल, यह माथे की सजावट का सामान, ये जेवरात तेरी भाभी के
- 1:23:27हैं। उसने उठाया पांव।
- 1:23:35की व्हाई जीव? कित्ता?
- 1:23:40भैया, क्षमा करना मैंने कभी। माता के चरणों से।
- 1:23:54ऊपर नहीं देखा। लेकिन तुम तो फंसी हो मैं चरणों
- 1:24:03में सुबह। उठता झुकता प्रणाम करता मुझे यही
- 1:24:10नजर। आती।
- 1:24:11मैं इनको पहचानना हूँ, बखूबी यह माँ की है।
- 1:24:20लेकिन लक्ष्मण ने अजूबा। सा स्वराल किया भईया जैसे मैं
- 1:24:29उर्मल। का हार बचा।
- 1:24:30लूँगा क्या तुम सीता? का हार नहीं सुन।
- 1:24:34सकते तुम तो उसके पति हो। भईया, मैं तो उर मिल का हर।
- 1:24:51पहचान लूँगा क्या तुम। माँ सीता का हार नहीं।
- 1:24:56पहचान सकते तो राम ने जो। जवाब दिया बड़ा।
- 1:25:00प्यारा था। अभी इस फ़िल्म को सुनना।
- 1:25:12चाहिए। राम कहते भैया सीता की।
- 1:25:22खूबसूरती। है।
- 1:25:23लावण्या। शरीर से आती हुई आसानी।
- 1:25:30तरंग है जितनी मीठी थी उतना मीठा। उसका जेवरात नहीं।
- 1:25:41था। जेवरात मुझे कभी दिखे।
- 1:25:47पहनी उसने अवश्य पहने पहने तो गिराया।
- 1:25:54लेकिन मेरी नजर। कभी वहाँ गई।
- 1:26:00जब अपूर्व संत के सामने। होगा।
- 1:26:06तो गहनू का सुंदरी। किसे दिखाई पड़ता है?
- 1:26:13अपूर्व सुंदरी की मूर्ति थी। वो या ऐसा समझो सीता के भीतर का
- 1:26:22लवण्या उठती हुई आसानी तरंकी लबालब।
- 1:26:31वो तृप्ति का एक रंग? है तुम्हें?
- 1:26:40सहसा ही अपनी तरफ कैंच। लेती हूँ फिर?
- 1:26:43गहनों की तरफ क्या जाता? किसका है?
- 1:26:50तकदीर की। में।
- 1:26:53कोई बोलूं डालि से भी छुड़ा हुआ होलों तकदीर की।
- 1:27:12मैं कोई भी बोलूं डाली से भी छोड़ा हुआ बोलूं साथ।
- 1:27:25तेरा? नहीं।
- 1:27:31713 नहीं। सॉन्ग दुनिया चले भी तो क्या है?
- 1:27:43एक तू ना? तू ना तू ना मिला।
- 1:27:52सारी दुनिया मिलेंगे तो क्या है? याद रखें, जब मिल गई तो सारे
- 1:28:05खजाने बेकार। लगेंगे।
- 1:28:13कुछ भी अच्छा नहीं लगेगा। तृप्ति के बाद।
- 1:28:18बस तुम वहाँ पहुँच गए। जहाँ पानी को कुछ बाकी नहीं रहता,
- 1:28:24खोने को कुछ नहीं रहता, सब तुम हो सब तुम्हारा है।
- 1:28:35राधे राधे। श्याम मिला दे गोविंदा गोपाल हरे
- 1:28:48राधे राधे श्याम मिला दे। गोविंदा गोपाल हरे मेरी नैय्या
- 1:29:01पार लगा दे, मेरी नैय्या पार लगा दे।
- 1:29:11गोविंदा गोपाल हर। राधे राधे।
- 1:29:19श्याम मिला दे गोविंदा गोपाल हर। धन्यवाद।