Latest / Baba ji Vijay Vats / 11 May 25 - भोग से योग से ध्यान! जीवन में शांति और आनंद की खोज कैसे करें? वैराग्य कैसे लाता है आनंद?
Transcript
- 0:02संसार में हम क्यों आए हैं और हमारा उद्देश्य क्या है?
- 0:13बहुत से धर्म अपनी अपनी व्याख्याएं किया करते हैं।
- 0:23हम संसार में क्यों आए हैं? संसार भोगने के लिए ईश्वर ने अगर
- 0:33संसार बनाया है तो वो मूर्ख रहे है।
- 0:39वो पगला नहीं गया है। हम सब का निर्माता, संसार के कण
- 0:50कण का निर्माता वही है। उसने संसार बिना प्रयोजन के नहीं
- 1:04बनाया होगा। साइंस में एक शब्द आता है मेडिकल
- 1:14में के। कोई भी चीज़ व्यर्थ नहीं बनाई है।
- 1:24हमें चाहे उसके लाभ का पता हो, न हो, उसके फंक्शन का पता हो न हो,
- 1:34ये बात जुदा है। हमारे शरीर में एक अपेंडिक्स हुआ
- 1:41करते हैं। डॉक्टर्स कहते हैं कि गाल ब्लैडर
- 1:48के बिना काम चल सकता है। अगर ये ना होगा तो भी आदमी वजह से
- 1:56जीए। लेकिन उसे लगाया क्यों?
- 2:02अपेंडिक्स उसने लगाई। क्यों डॉक्टर काट के फेंक दिया
- 2:08करता है जब उसका दर्द बढ़ जाया करता है, असहनीय दर्द हुआ करता है
- 2:13उसका? गाल ब्लैडर में जब ज्यादा पथरी हो
- 2:18जाया करती है, जब कोई डिफेक्ट हुआ करता है, डॉक्टर्स उनको निकाल
- 2:21दिया करते है। चीप फुड के द्वारा अपेंडिक्स के
- 2:25साथ भी ऐसा ही होता है। तो कई डॉक्टर मुझसे पूछ लेते है
- 2:30कि इसका कारण क्या है? मैंने कहा देखिये।
- 2:33इसका कारण चाहे आपको आज पता हो न हो, लेकिन निश्चित रूप से जब आप
- 2:39इसको निकाल दिया करते हो तो कुछ न कुछ कमी आपके शरीर में हो जाया
- 2:44करती है। आपको पता चले न चले कारण अवश्य
- 2:51हुआ करता है। कारण के बिना कार्य हुआ ही नहीं
- 2:55करता, सो उसने गाल ब्लैडर बनाया, उसका भी कोई उद्देश्य है?
- 3:03उसने अपेंडिक्स से लगाई, उसका भी कोई उद्देश्य है?
- 3:07हालांकि आपको पता नहीं चला। बहुत सी बातें आपको आज से 200 साल
- 3:12पहले नहीं पता था जब आप हवन यज्ञ किया करते थे, इंद्र देवता से
- 3:20प्रार्थना किया करते थे, सूखा पड़ जाया करता था, आकाल पड़ जाया करता
- 3:25था और आप हवन करके इंद्र देवता को मनाया करते थे।
- 3:30वो भी वक्त था जब तूफान आ जाया करता था, 200 300 किलोमीटर की
- 3:36हवाएं चरा करती थी, आपके सब साजो सामान उड़ा के ले जाया करती थी,
- 3:40तो आप हाथ जोड़े इंद्रदेवता से प्रार्थना किया करते थे, जबकि
- 3:44इंद्रदेवता नम की कोई चीज़ नहीं है।
- 3:51वो है लेकिन पौराणिक उसकी बात में फिर बाद में किसी वक्त करूँगा।
- 3:56पौराणिक घटना के बारे में अब इसको छोड़ दीजिए।
- 4:06ईश्वर ने आपके शरीर का ही नहीं, इस सृष्टि का कोई भी तत्व बिना
- 4:16किसी कारण के नहीं बनाया है, तो अगर उसने कोई भी तत्व बिना कारण
- 4:22के नहीं बनाया है तो इतना विशाल तुम।
- 4:27श्रेष्ठ संसार बिना कारण के क्यों बनाया होगा?
- 4:34नहीं, इसका कोई कारण है चाहे लाख शंकराचार्य आपको समझाते रहे
- 4:43शंकराचार्य ने कहा। ब्रह्म सत्यम जगत मृथ्य तो आपने
- 4:49जगत मृथ्य का अर्थ उल्टा ले लिया, जगत को छोड़ दिया अब जगत को छोड़े
- 4:56जा रहे हैं में जा रहे हैं गोफाओं में जा रहे हैं इसलिए क्योंकि
- 5:01हमारा लक्ष्य क्या है परमात्मा को पाना?
- 5:07मैं ये नहीं कहता कि आपका लक्ष्य परमात्मा को पाना नहीं है।
- 5:12इस बात को ध्यान से समझ लेना, लेकिन थोड़ा समझिए।
- 5:17ठहरिए रुकिए। कच्ची फल को मत तोड़ी।
- 5:26पहला शब्द लिख लीजिये कच्ची कली को मत तोड़ी कच्ची कली अभी अपने
- 5:39भीतर सुगंध को इकट्ठे करेगी। फिर जब उसका मुख खुलेगा जब वो बंद
- 5:47कली अपने मुख को बंद करके बैठेगी तो वो सुगंध को इकट्ठी कर रही
- 5:53होगी और फिर ऐसा वक्त आएगा जब वो सुगंध भूत हो के सारी उसके प्राण।
- 6:01भर जाएंगे सुगंध से फिर वो अपना मुँह खोलेगी, फूल बन जाएगी और
- 6:05आपको सुगंध बांटेगी। आप उस उपवन में जाओगे तो उन फूलों
- 6:10के सुगंध को जब आपकी नसा पुट में भीतर प्रवेश करेंगे, आपको बड़ा
- 6:14आनंद आएगा, लक्ष्य जताएंगे तोड़ने के लिए फूल नहीं बने हैं ध्यान से
- 6:20रखना। फूल फूल बनेगा, सुगंध बांटेगा ये
- 6:28परोजन है उसका फूल का परोजन तोड़ने के लिए नहीं फूल का परोजन
- 6:33अपनी चरम अवस्था में सुगंध को बांटना है।
- 6:39खेलेगा नाचेगा हवाओं में सभी दिशाओं में फैलाएगा, सूर्य के
- 6:46दर्शन करेगा जितनी भी उसकी ज़िन्दगी है वो जियेगा और फिर एक
- 6:52मुर्छा जाएगा ये सारी क्रियाएं। प्रॉपर्ली घटित होंगी, अपने आप
- 7:05घटित होंगे, वैसे ही फल हैं, फल लगेगा, पहले फूल बनेगा, उसका फल
- 7:15बनेगा फिर उसमें। तत्व मिलने शुरू होंगे, फिर वो
- 7:20खट्टा हो जाएगा। आम देखा नहीं आप छोटी छोटी
- 7:23अम्बियां होती हैं, वो खट्टी होती है, हम उनको तोड़ लेते हैं, उनका
- 7:26अचार डाल लेते हैं, लेकिन वो अचार डालने के लिए तो पैदा ही नहीं
- 7:31हुए। खट।
- 7:35हर चीज़ को हम तोड़ लिया करते हैं नहीं, वो इसलिए पैदा नहीं हुई
- 7:39उनको पकने दो इसलिए कच्चे फल को मत तोड़ो, फल को पकने दो, पकने दो
- 7:52और पूरा भरने दो। आम को पकने दो और तोड़ो मत, पक भी
- 8:01जाए तो तोड़ो मत, पक जाए पूरा तो आपको तोड़ने की आवश्यकता नहीं
- 8:13होगी। वो टूट के नीचे गिर जाएगा और जब
- 8:17आप उसको खाओगे तो ऐसा मज़ा खाने में आपको कभी नहीं आया होगा जैसा
- 8:23उस स्वच्छ से पके हुए फल को खाने में आएगा।
- 8:33कली और फूल तोड़ने के लिए नहीं बने हैं, अपने जीवन जीने के लिए
- 8:37बने हैं। उनके वृक्ष से टूटने के बाद आप
- 8:42उनको कोई प्रयोग कर लें। ये आपकी बुद्धि मज़ा है, लेकिन
- 8:48अगर आप कच्चे फल को तोड़ोगे। देखिए गेहूं पक जाया करते हैं
- 8:53बैसाखी के वक्त हमारे पंजाब में हमने देखा है कि गेहूं जब पक जाया
- 8:58करती है तो रंग बदल लिया करती है। उसको पकाना नहीं पड़ता।
- 9:03उसका रंग बिल्कुल सोने जैसा हो जाया करता है।
- 9:08बिल्कुल सर्न। आभा से युक्त हो जाया करती है।
- 9:12कणक गेहूं फिर वो पक जाया करती है।
- 9:18फिर किसान समझ जाया करता है कि अब फल पक गया है।
- 9:25एक ऋषि हुआ है कर्नाड। उसने जो भी कुछ कभी खाया।
- 9:32वो पक्का हुआ खाया कनक जब पक के उसका रंग बदल जाया करता है, जब तक
- 9:39नहीं पकती तब तक वो हरियाली में रहती है और जब वो पक जाया करती है
- 9:45तो वो बता दिया करती है। ये इशारा हुआ करता है।
- 9:49कि मैं खाने योग्य हो गयी हूँ बस मेरा लक्ष्य पूर्ण हुआ, फिर हम
- 9:57किसान लोग उनको थोड़ा करते हैं और उनको तोड़ के हम अपने जीवन को
- 10:02जीने के योग्य बना लिया करते हैं। ये है सही प्रोसेसर।
- 10:08ओफ नेचर सो कली। फूल बन के नाचेगी अपना जीवन जिएगी
- 10:17उसको जीने दो। सुगंध बांटेगी।
- 10:22निश्चित रूप से बांटेगी। आपको कुछ देखी जाएगी।
- 10:26कलि फूल बन के आपको सुगंध बांट के जाएगी और अपना जीवन जीने को वो
- 10:32स्वतंत्र है उसे जीने दो अपना जीवन जीके वो अपने आप से मुरझा के
- 10:38घर जाके फिर अगर आप उसको कोई काम में ले सकते हो तो ले लो मृत
- 10:44व्यक्ति के शरीर का। कोई आप उपयोग कर सकते हो तो कर
- 10:50लीजिए। बड़े मज़े से बहुत से लोग अपना
- 10:55शरीर अपनी आँखें दान कर दिया करते हैं कि मृत्यु उपरांत शरीर मेरा
- 11:02दान कर दिया जाए। मेरी आँखें दान करती जाएं।
- 11:05इसे अंगदान कहते हैं। हम अचार बनाने के लिए पैदा नहीं
- 11:14होता। हाँ आप अचार बनाने के लिए प्रयोग
- 11:18कर लिया करते हो, ये बात अलग है लेकिन वो पैदा इसलिए नहीं हुआ
- 11:22करता। आप भी किसी लिए पैदा हुए हो इस
- 11:28संसार में ये एक नेचुरल व्यवस्था चल रही है।
- 11:36कॉन्सेंट्रेशन लगातार बढ़ रहा है आपकी।
- 11:43चेतना का विकास हो रहा है अवलिशन ऑफ कॉन्शसनेस।
- 12:03चेतना का विकास चेतना का लगातार विकास हो रहा है।
- 12:14जैसे पेड़, पेड़ पर लगे फूल, फूल से लगा फल।
- 12:22और फल पहले खट्टा फिर धीरे धीरे पक के मीठा और पके हुए आम को जवाब
- 12:30देखोगे तो उसकी दूर से सुगंधी आपको आकर्षित कर लेंगे।
- 12:39लेकिन आप ऐसा नहीं किया करते हैं, न ही संसार की वस्तुओं के साथ, न
- 12:46ही मनुष्यत्व के साथ आप ऐसा करते हैं, इसीलिए ही मार खाई चले जाते
- 12:52हो। आपको पता ही नहीं कि हम यहाँ आए
- 12:56किस लिए? मेरे पास बहुत से लोग आ जाते हैं
- 13:01और पूछते हैं कि हम यहाँ क्यों आये हैं?
- 13:05मैंने कहा आप बताइए आप यहाँ क्यों आये?
- 13:08आप आये हैं बताओ क्यों आये हैं? कहते परमात्मा को पाने के लिए मैं
- 13:12कहा बिल्कुल ठीक है, पर मुझसे क्या पूछने है?
- 13:17रटे रटाए तोते पंडितों ने समझा दिया, धार्मिक गुरुओं ने समझा
- 13:27दिया, संतो ने समझा दिया प्रवचन कर्ताओं ने समझा दिया कुछ किताबें
- 13:32पढ़ लीं तो हमारा उद्देश्य क्या है?
- 13:36संसार से मुक्त होना, संसार से मुक्त होना लक्ष्य तो है लेकिन
- 13:46संसार से मुक्त दो तरीकों से हुआ जा सकता है संसार से मुक्त।
- 13:56उस तरह से भी हुआ जा सकता है जैसे आपने कली को तोड़ लिया, खट्टे आम
- 14:05को तोड़ लिया और संसार से मुक्त उस तरह से भी हुआ जा सकता है।
- 14:11जैसे कलि फूल बन गई, फूल बनके सुगंधी बांटी और सुगंधी बनके
- 14:16मर्चा गई, मर गई और गिर गई और फल लगा पहले फूल लगा फल खट्टा था, फल
- 14:29मीठा हुआ। आम पक के उसकी रस उसके बाहर की
- 14:37छाल से गिरने लगी, टपकने लगी। आप देखना पक्का हुआ फल पक्का हुआ
- 14:43आम उसकी खुशबू ही अलग होगी जब आप उसके पास जाओगे।
- 14:48तो उसकी स्मेल दूर से ही आपको खेंच लेगी।
- 14:52उसका आनंद ही कुछ और होता है, बस वो ही आनंद के लिए आप पैदा हुए
- 14:58हो, लेकिन आज क्या हो रहा है? आज हो रही है इमिटेशन ब्रह्म।
- 15:08फैलाया जा रहा है, क्योंकि ये भ्रम फैलाएगा कौन?
- 15:14वो ही जो खुद भ्रमित होगा। मुझे कहने में तनक भी संदेह नहीं
- 15:21है कि भ्रमित लोग ही ऐसे जाल गुनाह करते हैं।
- 15:25उनका लक्ष्य चाहे कुछ भी हो। मुझे भी पता है उनका लक्ष्य क्या
- 15:32है और जोक कर रहे हैं। उन्हें भी पता है कि वो क्यों कर
- 15:38रहे हैं? खैर इन बातों को जाने दें।
- 15:45कच्ची कलियों को तोड़ लिया करते हो, कच्चे फलों को तोड़ लिया करते
- 15:50हो, संसार में आने का लक्ष्य परमात्मा परमानंद को उपलब्ध होना
- 15:59तो है लेकिन प्राप्त करना नहीं। आप समझ लीजिए।
- 16:06दो शब्द में बड़ा भेद है आनंद प्राप्त करना आपका लक्ष्य नहीं है
- 16:12आनंद को उपलब्ध होना आपका लक्ष्य है, इसकी थोड़ी सी व्याख्या सुन
- 16:18लीजिये। आनंद को प्राप्त करना बिल्कुल
- 16:22वैसे ही है। जैसे आपने कच्चा आम तोड़ लिया,
- 16:28खट्टी अम्बी तोड़ ली काम तो वो भी आये अचार डालने के कुछ लोगों को
- 16:36खट्टा खाना बहुत पसंद होता है। मैंने देखे हैं कच्ची अमिया लोग
- 16:40खाते हुए। मैं पूछता हूँ अरे दांत खट्टे हो
- 16:45जाते, तुम कैसे खा लेते हो? उसको कहते हमें बड़ा आनंद आता है,
- 16:48बड़ा मज़ा आता है उसको खाने में ठीक है, उन्हें स्वादिष्ट लगती
- 16:54होगी और दूसरा आनंद को। प्राप्त करना और आनंद को उपलब्ध
- 17:08होना दूसरा शब्द मैंने प्रयोग किया आनंद को उपलब्ध होना
- 17:16तुम्हारा लक्ष्य है आनंद को उपलब्ध।
- 17:22तुम खुद से ना कर पाओगे आनंद को उपलब्ध तुम खुद से ना कर पाओगे
- 17:31आनंद में तुम बेलीन हो सकते हो आनंद में तुम।
- 17:40लीन हो सकते हो, आनंद को पाना नहीं है, आनंद में स्थापित हो
- 17:49जाना है। आनंद में पानी के आपके भ्रम भी हो
- 17:54सकते है। जैसे आपने अम्बे को तोड़ लिया, वो
- 17:57खट्टी। आप भ्रम पैदा कर लोगे की हमने आम
- 18:01खाया, बिलकुल आम खाया, इसमें कोई शक नहीं लेकिन खट्टा आम खाया बिना
- 18:06पका हुआ फल खाया बिना पका हुआ आम खाया सुदृष्ट लगता होगा बिलकुल
- 18:11लगता होगा कुछो को लेकिन सही आम अपनी चरम सीमा पे पहुंचा नहीं था।
- 18:19अपने चरम लक्ष्य को प्राप्त नहीं हुआ था।
- 18:21इसलिए मैंने कहा एक आनंद को उपलब्ध होना एक आनंद को प्राप्त
- 18:26करना, आप आनंद को प्राप्त किए जाते हो, प्राप्त करने की कोशिश
- 18:31किए जाते हो और आनंद को उपलब्ध नहीं हो पाते।
- 18:35इन दोनों बातों को गोर से आप फिर से समझ लेना।
- 18:38आप आनंद को प्राप्त करने की कोशिश में लगे रहते हो।
- 18:43आनंद को उपलब्ध नहीं हो पाते यह हमारा लक्ष्य क्या है?
- 18:46आनंद को उपलब्ध हो जाना बातें थोड़ी सी गहरी हैं।
- 18:56ध्यान से सुनेंगे तो समझ में आ जाएंगे।
- 19:01इसको पाने का रास्ता क्या है? पूरे पक्कों वैरज्ञ वैरज्ञ शब्द
- 19:11पूरा प्यारा है। वैराग्य आपने पैदा नहीं करना है।
- 19:22जो लोग संसार से दुखी हो के कंधाओं में चले जाया करते हैं,
- 19:28एकांत की तलाश किया करते हैं, आनंद की खोज किया करते हैं।
- 19:36वो जरूरी नहीं है कि आनंद की खोज में जा रहे हैं।
- 19:44अब तो घबरा के ये कहते हो के मर जाएंगे, अब तो घबरा के ये कहते हो
- 19:51के मर जाएंगे। कर भर के भी चैन ना पाया तो किधर
- 19:56जाएंगे? लेकिन फिर वो वापस आ जाया करते
- 20:04है। आनंद की तलाश में जाए तो करते है
- 20:09लेकिन उसका कारण क्या है? उसका कारण है संसार से दुखी होकर
- 20:16शांति की तलाश में निकल जाना और शांति की तलाश।
- 20:20आनंद की तलाश नहीं है। इस बात को आपको और से समझ लें।
- 20:23बातों में बहुत भरमाया गया है आपको यही बरीक बातें आपको उलझाई
- 20:28चली जाती है सदा से आप इन बातों के अंदरूल झेल रहे हो।
- 20:34शांति की तलाश आनंद की तलाश आनंद। की परछाई की तरह शांति खुदबखुद आ
- 20:48जाया करती है। आपको शांति को पैदा करने की तो
- 20:52आवश्यकता ही नहीं है इसलिए शांति की तलाश में कभी मत निकलना वो
- 20:56मूर्खता होगी, वो तो वही खट्टे पर होंगे जो आप।
- 21:04बिना पके हुए फल को तोड़ के खा लोगे, उसमें उतना मज़ा नहीं होगा
- 21:12और वो उस फल का भी चर्म लक्षण था और आपको भी उसमें आनंद नहीं आएगा
- 21:18खाने में। आज हम खींचे चले जाते हैं लोगों
- 21:26को मैंने अपनी एनलाइटमेंट के बाद मिक्सर बस खोया खोया सा आप में बस
- 21:46जिसे कह देते हैं। रहा करता था, क्योंकि किसको फिकर
- 21:52पड़ी है जब आपको रसाधार आनंद की घेरे रहती है चारों तरफ रबक दर पल
- 22:01और घड़ी तो आपको। किसी की फिक्र नहीं रहती।
- 22:12आप उस आनंद को पीने में तनमय रहते हो।
- 22:16आपने कभी देखा जब आप भोजन करते हो?
- 22:22तो भोजन को बड़े आनंद से जब करते हो आपका ध्यान किसी तरफ नहीं
- 22:26रहता, सिर्फ भोजन को खाने में रहता है।
- 22:28अगर वो बहुत स्वादिष्ट हो तो अगर भोजन खाने में स्वादिष्ट नहीं
- 22:34होता तो आप उतने तन में नहीं हो पाते इतने तन में उस भोजन के।
- 22:42अति स्वादिष्ट होने के वक्त आप वतन में होते हो आनंद का अनुभव
- 22:47करते हो लक्ष्य है। शांति को पाना नहीं, आनंद को
- 23:00उपलब्ध हो जाना, आनंद को पाना भी नहीं आनंद को उपलब्ध हो जाना
- 23:06क्योंकि आनंद को पानी शब्द में फिर उलझन पड़ेगी।
- 23:10फिर जैसे आप शांति की तलाश कर रहे हो और कोई शांति ना अपनी शांति
- 23:14भंग करवालिया करता है, किसी के पास जाके ऐसे ही तुम आनंद विकल को
- 23:19खोने को हो वो आनंद तुम्हें एक बार तो लगेगा मिल गया संभव के
- 23:26क्षणों में भी तुम्हें लगता है। राजगंज में बैठते हो तब भी आपको
- 23:30लगता है किसी मनचाही मनोवांछित वस्तु को प्राप्त कर लेते हो तब
- 23:36भी आपको लगता है मनोवांछित आप। संघाषण पर बैठ जाएगा तो तब भी
- 23:43आपको लगता है जब आपकी मन की इच्छाएं पूर्ण हो जाया करती हैं
- 23:48तब भी आपको लगता है कि आनंद मिल गया?
- 23:52लेकिन मेला नहीं करता, मेला करता है क्षणिक उसको मैं कहता हूँ।
- 23:59आनंद को पा लेना ध्यान से मेरी इस जो मैं डेफिनिशन कर रहा हूँ, उसको
- 24:11ध्यान से समझ लेना आप आनंद को पा लेते हो, आनंद को उपलब्ध नहीं
- 24:17होते। आनंद को पा लेना और आनंद को
- 24:22उपलब्ध हो जाना ये दोनों बिल्कुल अलग अलग खाते हैं और शांति को
- 24:28पाने की दुष्ट है। कभी मत करना।
- 24:32शांति तो खुद से पैदा हो गई। शांति कोई पॉज़िटिव चीज़ नहीं है।
- 24:36शांति नेगेटिव चीज़ है शांति। ठोस वस्तुओं से पैदा हुई परछाई
- 24:43है, आनंद ठोस है, आनंद के ठोस तो का परछाई है, शांति है वो खुद से
- 24:51आ जाएगी, उसकी फिक्र भी न करना, बिल्कुल ही फिक्र मत करना।
- 24:59हम कच्चे फलों को तोड़ लिया करते हैं और संतुष्ट हो जाया करते हैं
- 25:06क्योंकि उनमें भी थोड़ा थोड़ा रस आया करता है।
- 25:11इसीलिए ही तो हम अट्रैक्ट हो जाया करते हैं।
- 25:15और उस दिशा में चल बढ़िया करते हैं।
- 25:21अभ्यास और वैराग्य जो वैराग्य अभ्यास से पैदा होता हो।
- 25:36वो नकली है और जो वैराग्य भोग से पैदा होता हो वो असली है।
- 25:46चौंकिए मत मैं कहता हूँ जो वैराग्य अभ्यास से पैदा होता है
- 25:54वो नकली है। जो वेरा के भोग से पैदा होता है
- 25:58वो असली हर कदम पे उन्हें मुड़ के देखा।
- 26:13उनकी महफिल से हम उठ तो आये। हर कदम पे उन्हें मुड़ के देखा।
- 26:22उनकी महफिल से हम उठ तो आए अभ्यास से जो वैराग्य पैदा होगा।
- 26:31वैराग्य बड़ी कीमती चीज़ है। सिर्फ एक मात्र सूत्र है आपको
- 26:40आनंद को उपलब्ध होने का एक मात्र सूत्र बोल रहा हूँ।
- 26:47वैराग्य तक पहुँच के आप आगे आनंद को उपलब्ध हो सकते हो।
- 26:59और आपके सारे धर्म आपको वैराग्य अभ्यास से पैदा करना सीखा रहे
- 27:06हैं, यहीं चूक हो रहे हैं। मन शांत होता है।
- 27:16शांत ही नहीं होता, मन का वजूद ही खत्म होता है, लेकिन उस शांति को
- 27:26आप पैदा नहीं किए होते हैं। वो आनंद की अमानत होती है वो।
- 27:32आनंद का पैगाम हुआ करता है कि यह व्यक्ति शांति को उपलब्ध हो क्या
- 27:40बैराक्य से आती है असली शांति क्योंकि बैराक्य से आता है असली
- 27:47आनंद। अभ्यास से कभी भी आनंद को पैदा
- 27:54करने की चेष्टा में संलग्न मत हो जाना सूख जाओगे वो नकली होगा फिर
- 28:01से फिर वापस आएगा उनकी महफिल से हम उठ तो आये हर कदम पे उन्हें
- 28:08मुड़ के देखा। फिर फिर आपको दूसरी राहें तलाश ली
- 28:13होंगी क्योंकि वो निकलेगा नकली, वो आपको तृप्ति ना दे पाएगा और वो
- 28:19वैराग्य ही क्या जो आपको तृप्ति ना दे पाए?
- 28:26आप अभ्यास से वैराग्य करने की कोशिश में संलग्न हों।
- 28:30सारे धर्म अभ्यास से वैराग्य तक पहुंचने की प्रयास में जुटे हुए
- 28:41हो और अभ्यास से जो वैराग्य होगा, मैं कहता हूँ कि वो नकली है।
- 28:49तो भोग से जो बैरा के पैदा होगा, वो असली है, तो आपके मन में ये
- 28:54प्रश्न उठेगा कि भोग से तो फिर बैरा के कभी पैदा ही नहीं होगा?
- 29:01नहीं आप चुक जाते हो? देखिये आपको भूख लगी है।
- 29:08आप कैसे कह सकते हो कि आपको भूख लगी है?
- 29:11अगर हम खाना खाते ही रहेंगे तो हमारी भूख मटेगी नहीं, आपको भूख
- 29:22लगी है, आप भोजन कर रहे हो, आपको पता है भोजन करने को भोग कहते है।
- 29:27हम जब भगवान को भोग लगाते हैं वो भोजन होता है, ना, भोजन का भोग
- 29:34लगाते हैं, 56 प्रकार के भोजनों का भोग लगवाते हैं।
- 29:38भगवान को भोग का अर्थ खाना भोग ना।
- 29:47भूख लगी है तो खा लिया और खाने से एक वक्त ऐसा आ जाया करता है कि
- 29:58आपका पेट भर जाया करता है और पेट भरने के बाद भी अगर आपको कोई कहा
- 30:05के नो थोड़ा और खा लो। आप चलो थोड़ा खा लेते हैं फिर और
- 30:10खा लेते हैं लेकिन एक घड़ी तो ऐसी आ ही जाया करती है कि आप उस
- 30:16व्यक्ति से कहते हो कि आप मेरे प्रेमी जन हो या मेरे दुश्मन हो।
- 30:21मारोगे मुझे। अरे पेट फटा जा रहा है, भूख निवृत
- 30:27हो गयी है शुधा शांत हो गयी है अब क्यों खिलाये जाते हो वो मुझे तो
- 30:32वो कहेगा कि तुम तुम्हें भूख लगी थी तो तुम क्या कहोगे?
- 30:38वो तो मिट गयी अब क्यों खिलाये जाते हो?
- 30:44देखिये ये दुष्टांत है इसको सत्य की भांति मत ले लेना क्योंकि सत्य
- 30:50शब्दों में कहना कठिन है इसलिए दुष्टांत देने पड़ते है।
- 30:53हम जैसे लोगों को ये हमारी मजबूरी है।
- 31:03भोग से जो बैराक के पैदा होता है तो ये आपने भोग लगाया और एक वक्त
- 31:09ऐसा आएगा कि नाक मुड़ जायेगा आपका आप थाली छोड़ के उठ जाओगे, आप
- 31:14थाली को पटक सकोगे। पटक दी थाली आपने इतना भोजन कर
- 31:18लिया पटक नहीं अब और भोजन नहीं करने को।
- 31:23वो वैराग्य पैदा होगा, उससे वैराग्य पैदा हुआ और फिर उसके बाद
- 31:36होगा अभ्यास। अभ्यास से वैराग्य नहीं वैदा करना
- 31:43है वैराग्य से अभ्यास में यहाँ है बिलकुल ठीक कहा मनुष्य ने अभ्यास
- 31:53और वैराग्य के बिना बात नहीं बने। लेकिन आप अभ्यास से वैराग्य करने
- 32:00चले आओ आएगा, वैराग्य से अभ्यास मिलेगा।
- 32:06वैराग्य से अभ्यास करने के उपरांत आप अभ्यास से वैराग्य करने में
- 32:13उलझे हुए हो यही आप चूक जाते हो। मुझे कहते हैं कि फिर अगर भोग में
- 32:22हो ले गए तो भोग तो अपरिशीम है, वो तो कभी मिटेंगे नहीं, नहीं
- 32:30मिटेंगे, क्यों नहीं मिटेंगे मिटते हैं?
- 32:34भोग जीस चीज़ के लिए उसको भोगने के बाद मिटते हैं कब तक अतृप्त रह
- 32:42पाओगे। तृप्ति पूर्ण होती है, अतृप्ति
- 32:51टूटती है, सुधा शांत होती है। आप तृप्त होते हैं, आप सच्चे
- 32:57वैराग्य को उपलब्ध होते हो। बुध उपलब्ध नहीं हो गए, बुध ऐसे
- 33:05ही उपलब्ध नहीं हो गए। आपको पता ही नहीं कि बुध नहीं।
- 33:13भागने से पहले क्या किया? बुद्ध भागे ये तो आपने देखा आपको,
- 33:22लेकिन बुद्ध क्यों भागे? सब कुछ होते हुए भी क्यों भागे?
- 33:28जिन चीजों के लिए आप लालायित हो। रात रात भर जागते हो, आपकी नींदें
- 33:34कुर्बान कर देते हो, जिन चीजों के लिए उनको छोड़ के भागे।
- 33:41आपके लिए वो चीजें साध्य हैं लेकिन उसके पास वो चीजें हैं।
- 33:48और उनको छोड़ के भाग रहा है। इसका अर्थ क्या है?
- 33:53के उन वो भोगों से उन्हें नहीं मिल सका है।
- 34:00जीस चीज़ की उन्हें तलाश है लेकिन उन्होंने भोंका।
- 34:09आपको तो जो कह दिया जाता है कि राजा ने एक स्त्री को भोंगा,
- 34:13बुद्ध ने यशोधरा को भोंगा, आपको क्या पता उसने इतना परम अवस्था
- 34:22में भोंगा कि भोग से भागने को दिल किया।
- 34:28के भागो खाने की थाली, पटक के फेंक दी के भागो और वो चोर की तरह
- 34:36अपना माल धन जिसे आप गिनते हो उसको छोड़ के भागे के भागो यहाँ
- 34:46से। ये धन नहीं है, उनको त्याग दिया,
- 34:53त्याग आया, आप त्याग पैदा करते हो।
- 34:58मजबूरी में दीक्षा दे दिए, समर्पण करवा लिया, करवा लिया समर्पण।
- 35:07आपको पता है अगर सचमुच समर्पण हो जाए तो उसके आगे आपको कुछ नहीं
- 35:13करना होता। सर्वधर्मान पर तजमा में कम शरण
- 35:19ब्रज। अगर भगवान के समर्पण हो जाए तो
- 35:36फिर आपको कुछ नहीं करना होता। अग्र समर्पण हो जाए।
- 35:43लेकिन आप तो समर्पण करते हैं। बस यही बात है आप नकली खिलौनों को
- 35:50असली माल समझ बैठते हो, समर्पण होने जैसी चीज़ है, करने जैसी
- 35:56चीज़ नहीं। आप तो प्यार भी करते हैं।
- 35:58देखिए कमाल की बात। विवाह के विकृत रूप में आप दो
- 36:05आत्माओं को बांध दिया करते और कहते को प्रेम करो, ऐसे प्रेम
- 36:09पूरा करता है, प्रेम तो उपज है, भीतर की प्रेम आता है, प्रेम पैदा
- 36:17नहीं किया जाता। और आपका समाज आपका संविधान प्रेम
- 36:24को पैदा करने के लिए बनाया जाता है।
- 36:27आप कहते हो की प्रेम पैदा करो विवाह के पश्चात कहते हो, विवाह
- 36:35से पहले प्रेम हो और आपस में। बंध जाने का मन हो फिर वो बंधन भी
- 36:42बड़ा प्यारा होगा लेकिन आप पहले बंधन डाल दिया करते हो, साथ फेरो
- 36:49में बांध लिया करते हो, फिर कहते हो प्रेम करो, खाद प्रेम पैदा
- 36:52होगा कभी हुआ है सहानुभूतियाँ पैदा हुआ करते हैं सिर्फ।
- 36:58प्रेम और सहानुभूति को आप अर्थ गलत लगा लिया करते हो।
- 37:02इकट्ठे रहते रहते रहते एक दूसरे के सुख दुख एक हो जाया करते है।
- 37:07वो सुख दुख एक नहीं हो जाया करते उसको आप सहानुभूतियाँ कहना चाहिए
- 37:15आपको? आप सहानुभूतियाँ पैदा करते हो,
- 37:18प्रेम नहीं पैदा किया करते, इकट्ठे रहने से प्रेम पैदा हुआ
- 37:24करते है। आप देखते हो आपके परम मित्र
- 37:29इकट्ठे रहते रहते। आपको लग जाता है कि इसके बिना रह
- 37:32ना पाएंगे, लेकिन तड़क से ही टूट जाती है।
- 37:35लाई वे कदराना ले आरी चुटकी तड़क करके फिर आप उसको वे कदर कहते हो,
- 37:41वो उससे कहेगा कि तुमने मेरी कदर नहीं डाली, वो उससे कहेगा कि
- 37:46तुमने मेरी कदर नहीं डाली, यही सब कुछ फेसबुक के आप ऊपर चले जाओ,
- 37:51सभी के यही कॉमेंट्स मिलेंगे सभी कहेंगे मैं ठीक।
- 37:55मैंने धोखा खाया, विश्वास किया तो धोखा खाया।
- 37:58अरे भाई विश्वास ही क्यों किया? प्रेम से विश्वास पैदा हुआ करता
- 38:03है। आप विश्वास से पैदा करना चाहते
- 38:08हो? प्रेम कभी नहीं होगा।
- 38:11प्रेम गहरा विश्वास पैदा। कर दिया करता है।
- 38:15प्रेम विश्वास कोई करने वाली चीज़ है, प्रेम कोई करने वाली चीज़ है,
- 38:21प्रेम होने वाली चीज़ है, प्रेम इतनी विशाल विराट घटना है, जो
- 38:27पैदा हुआ करती है, वह तुम्हारे हाथ की कठपुतली नहीं है।
- 38:30तुम्हारे हाथ की बनाई हुई कोई चीज़ नहीं है, प्रेम पैदा हुआ
- 38:34करता है। प्रेम किया नहीं जा सकता, प्रेम
- 38:37हुआ करता है और जिनो जिन्होंने प्रेम किया उन्होंने प्रभु पाया
- 38:50जिन प्रेम किया तिन प्रभु पायो। वो सच्चे प्रेम की बात किया करते
- 38:55हैं, प्रेम पैदा हुआ और शब्दों की सिर्फ हेरफेर है, उलट पुलट है,
- 39:05प्रेम करने जैसी कोई चीज़ नहीं, प्रेम पैदा होने जैसी चीज़ है।
- 39:11आपने कभी प्रेम पैदा हुआ हो तो आपको पता होगा प्रेम बड़ी
- 39:19स्वादिष्ट है, लेकिन प्रेम में स्वाद चक के ही पता लगा करता है
- 39:26और प्रेम आप नकली पैदा कर लिया करते हो।
- 39:32प्रेम नकली पैदा कर लिया करते हो। सहानुभूतियों को आप प्रेम कहा
- 39:36करते हो, सहानुभूति कभी प्रेम नहीं हुआ करते, प्रेम से
- 39:41सहानुभूति पैदा हुआ करती है, प्रेम से विश्वास पैदा हुआ करते
- 39:46हो और वो न टूटने वाले विश्वास पैदा हुआ करते हैं।
- 39:52भगत का प्रेम भगवान पे हो जाए तो शुभ करना पड़े तो अशुभ लोग अपने
- 40:00ईष्ट बदल लिया करते हैं। एक व्यक्ति हनुमान जी की पूजा
- 40:05किया करते थे। दो वर्ष बाद मेरे को मिले।
- 40:09मैंने कहा ये क्या जब बम बम भोले कहते हाँ मैंने इष्ठ बदल लिया है
- 40:15इष्ठ भी बदल लिया करते और फिर कल को शंकर जी से भी जब कुछ नहीं
- 40:22मिलेगा जब आपकी वासनाओं को पूरी करने में कोई गुरु, कोई इष्ठ, कोई
- 40:27भी देवता। असमर्थ हो जाया करता है तो आप
- 40:32उसको बदल लिया करते हो। आपके बस से तो आप घर वाले और घर
- 40:38वाले भी बदल लिया करते हो। आपका क्या है?
- 40:44ये आपकी मन की व्यवस्थाएँ हैं। सिर्फ।
- 40:47ये असलियतें नहीं है, सो मैंने कहा, वैरक्या और अभ्यास भगवान
- 40:58कृष्ण ने भी कहा है। अभ्यास और वैरग्य से उस परम आनंद
- 41:03की उपलब्धि होती है। लेकिन वैराग्य पैदा हो जाए,
- 41:14वैराग्य पैदा करना ना पड़े अभ्यास के द्वारा फिर उससे बाद जब
- 41:22वैराग्य पैदा हो जाया करता है। तो उसके बाद की घटना है।
- 41:27आनंद को उपलब्ध मैंने कहा कि संसार ईश्वर ने पागलपन के कारण
- 41:35नहीं बनाया है। कई व्यक्ति मुझसे कह देते हैं कि
- 41:40ये तो आपकी परीक्षा करने के लिए बनाया है कि देखो।
- 41:43आप भगवान में उलझते हो की संसार में उलझते हो, मैंने कहा पागल हुए
- 41:49हो अरे परीक्षा तो वहाँ हुआ करती है जहाँ दोनों चीजें बराबर खड़ा
- 41:55हुआ करती है मज़ा तो तब है संसार तो तुम्हे दिखाई देता है भगवान भी
- 42:00तुम्हारे सामने आके खड़ा हो जाएगा फिर तुम देखो किधर भागते हो?
- 42:04भगवान तो अदृश्य है, संसार दृश्य है तो तुम संसार में ही उलझोगे
- 42:10भगवान का तो पता ही नहीं आंधी दुनिया आज मानती ही नहीं क्योंकि
- 42:13देखा नहीं सो आपकी परीक्षा क्या खाक लेगा वो?
- 42:22खुद उतरे बराबर मैदान में, संसार के बराबर मैदान में उतरे तो
- 42:27देखिये आप गुधर जाते हो, फिर आप संसार को लात मार दोगे।
- 42:31निश्चित पक्का बराबर मैं खड़ा हूँ।
- 42:38जैसे कबीर ने कहा गुरु गोबिंद दोनों खड़े हैं।
- 42:43काके लागुफा बलिहारी गुरु आपणि जिनको गिनती हो मिला दोनों बराबर
- 42:53पैरलल खड़े गुरु की जन्म बखली क्या आपके बिना।
- 43:01गोबिंद मिल नहीं सकते थे। इसलिए गुरु के चरणों में से सुना
- 43:06दिया कि धनव प्रभु मैं कृत कृत भयो, अब मैं अब कृत कृत हो गया
- 43:13हूँ। आपकी कृपा के कारणों में गोबिंद
- 43:19आज मेरे सामने खड़े। और इतनी महाशक्ति विराट शक्ति
- 43:27आपका इम्तिहान ले और आप इम्तिहान में पास हो जाओ, ये मुमकिन है भी
- 43:36कतई मुमकिन नहीं हो सकता। ईश्वर आपकी परीक्षा लेने पे अगर आ
- 43:42जाएं और आप उन परीक्षाओं को पास कर जाओ, ये संभव है मूर्खों क्यों
- 43:52इन पागलपन में उलझे हुए हो? ईश्वर परीक्षा लिया करते हैं।
- 43:58धैर्य की परीक्षा लिया करते हैं। ईश्वर जैसी महाविरात शक्ति आपकी
- 44:06परीक्षा लेह और आप उस परीक्षा में सफल हो जाओ कमाल की बात है।
- 44:15अगर ईश्वर आपकी परीक्षा ले और आप सफल हो जाओ तो समझना ईश्वर ने
- 44:20आपकी परीक्षा नहीं ली। कोई बहुत ही निर्बल व्यक्ति आपसे
- 44:24भी कमजोर होगा। जो आपकी परीक्षा ले रहा है उसकी
- 44:28विराटता पे संदेह कर लेना तत क्षण।
- 44:32अगर आपकी ईश्वर की ली हुई परीक्षा को आप पास कर लो तो फिर किसी
- 44:40निर्बल व्यक्ति ने आपकी धैर्य की परीक्षा ली है।
- 44:43ईश्वर ने आपकी धैर्य की परीक्षा नहीं ली है, वो कभी भी परीक्षा
- 44:47नहीं लिया करता, आप अपने बच्चों की परीक्षा लिया करते हो क्या?
- 44:53बच्चा जन्मता है। 1 दिन का होता है आप उसकी परीक्षा
- 44:56दोगे कि देखें ये भाग के दिखाता है कि नहीं दिखाता है कैसे भाग के
- 45:00दिखाएगा वो बेचारा अभी तो पैदा हुआ है, उसने प्रथम सांस ही ली
- 45:05है, अभी भाग के कैसे दिखा देगा आप फेल ही होने वाले हो।
- 45:10नहीं, ऐसा कभी नहीं होता है। इतनी विराट शक्ति आपका इम्तिहान
- 45:14ले और आप उन इम्तिहानों को पास पास कर जाए।
- 45:19ये बुद्धों की बातें हैं बुद्धिमानों की बातें नहीं है,
- 45:24छोड़ दीजिए, इनको अपने दिमाग से निष्कासित कर दीजिए इन चीजों को।
- 45:31ये पागल लोगों ने आपके मन के भीतर घुसेड़ दी?
- 45:35इनको निकालो बाहर ऐसा कभी नहीं होता है कि ईश्वर उपेक्षा लेता है
- 45:41नहीं, ईश्वर तो भोग की सामग्री उपलब्ध करता है, इसलिए नहीं कि
- 45:47देखो आप निकल पाते हो कि नहीं, नहीं।
- 45:49इसीलिए कि आप इनको भोग के पक जाओ जैसे बीज जितना बनता है, वृक्ष
- 45:58बनता है और फिर नीचे से सींच सींच के रस को बड़ा हो के।
- 46:05फल पैदा कर लिया करते हैं और उसके फल घर जाया करते हैं।
- 46:08बिलकुल इसी तरह ईश्वर ने संसार को अपनाया है, आपको भोगने के लिए
- 46:13बनाया है। आप संसार को भोगें परिपक्व रूप से
- 46:18भोगें आधा आधे मन से आधा अधूरा मत भोगें।
- 46:24अधूरा भोगोगे तो नहीं पहुँच पाओगे?
- 46:28फिर मुझसे लोग कहते हैं तो फिर तो इस हिसाब से तो बहुत कम लोग पहुँच
- 46:33पाएंगे तो मैंने कहा अब कौन सा ज्यादा पहुँच सकते हैं।
- 46:37अब ज्यादा पहुंचते हैं ज्यादा पहुंचने का दिखावा हो जाए ये बात
- 46:43अलग। ज्यादा व्यक्ति पहुँच जाए।
- 46:47ये बात रख अब मुझसे क्यों बुलवाते हो।
- 46:53तुम ये बातें ज्यादा व्यक्ति पहुँच नहीं पाएंगे।
- 46:59तो पहले कौन सा ज्यादा पहुँच पाते हैं?
- 47:04ओह, बाबा जी ने कोई मूर्खतावश ये बातें थोड़ा कही है कि कोटिन में
- 47:09कोई एक जलत है कोटिन जल एक पहुँचता है, पहले भी तो ऐसा ही
- 47:14होता था क्यों? क्योंकि तुम कच्चे संसार को?
- 47:19बिना भोगई चले आते थे परमात्मा को पानी और फिर वही हर कदम पे उन्हें
- 47:25मुड़ के देखा उनकी महफिल से हम या तो रहती है आपको स्त्री या तो
- 47:32रहता आपको धन या तो रहता है क्या? क्या छोड़ के आए?
- 47:37क्या क्या भोग सकता था और नहीं भोग बोलो होता है कि नहीं कभी
- 47:44छोड़ के हो पाए कि चलो भलो भयो, हरी भी करो।
- 47:51कबीर भूल गए थे राम राम करना। उनके गुरु ने उनको यही नाम दिया
- 48:00था। रामानंद जी राम राम राम भ्रम करते
- 48:06रहो। पहले तो नाम ही नहीं दे रहे थे
- 48:12लेकिन जब तालाब पे नहाने आये तो पांव उनके ऊपर पड़ा तो वो।
- 48:16उनके मुख से निकला राम राम जोखो राम राम उन्होंने कहा ठीक प्रभु
- 48:23ऐसे तो उन्होंने इनाम दिया और फिर भूल गए 1 दिन राम राम करना।
- 48:31तो फिर क्या बोलते हैं? माला गिर गई।
- 48:38माला गिर गई। गिरनी नहीं पड़ी आप तो गिराते हो
- 48:45अल्लाह माई सांप कुंजिया कर चलियो सर आप तो फेंकते हो चाबियों को
- 48:57फिंक जाएं। ये प्रेम में होता है, फेंक दी
- 49:03जाएं। ये अभ्यास में होता है।
- 49:12सो राम राम जब रहे थे मालागढ़ गई। तो फिर वो दो दोहे बोलते हैं,
- 49:19पहला बोलते हैं कि माला जपु न कर जपु अब तो न तो माला से गिनती
- 49:26करता हूँ, कितने राम राम हो गए न हाथों के जो पोर होते हैं जो तीन
- 49:31पोर होते हैं न हमरी उँगलियों में।
- 49:35माला जपू न कर जपू। मुख से कहूँ न राम अब मैं ना तो
- 49:41माला से राम राम जबता हूँ ना मुख से राम राम जबता हूँ और ना ही कर
- 49:48से राम राम जपता हूँ माला जपु न कर जपु मुख से कहूँ न राम।
- 49:55मेरे हर मुझ को भजें, अब तो मेरे हरि मुझ को भजते हैं, हम पा में
- 50:05विश्राम हम पर अवस्था में चरम अवस्था में उसके अनंत का पान कर
- 50:11रहे हैं विश्राम अवस्था में। उसके आनंद को पी रहे हैं माला जपु
- 50:16न कर जपु मुख से कहु न राम मेरे हर मुझको भजे हम विश्राम हम
- 50:24विश्राम पालिया करते हैं तुम अभी हरि के पीछे पीछे दौड़ते हो।
- 50:32छल कपट का, हृदय में प्रवेश लिए, हरि के पीछे पीछे भरते हो और कबीर
- 50:39क्या कहते हैं? कबीरा मन निर्मल भयो, ज्यों गंगा
- 50:47को नीर। तब तो गंगा पवित्र हुआ हुआ करती
- 50:51थी। जब कबीर ने ये शब्द कहे, आज तो
- 50:54राम तेरी गंगा मैली हो गई। पापियों के पाप धोते धोते कबीर
- 51:00क्या कहते हैं? कबीरा मन निर्मल भयो, जू गंगा को
- 51:06नीर। 5656 हरी फिरे कहत कबीर कबीर अब
- 51:12तो पीछे पीछे हरी फिरते हैं, कहते हैं कबीर सुनो मेरी बात और तुम
- 51:18हरी के पीछे भाग जाओ, देखिए कितना फर्क पड़ गया बात को अभ्यास और
- 51:23वैराग में उतना ही फर्क है। अभ्यास के द्वारा आया हुआ वैराज्य
- 51:28और भोग के द्वारा आया हुआ वैराज्य अनुभव के द्वारा आया हुआ वैराज्य
- 51:35इन दोनों में बहुत फर्क है वो ही फर्क इसमें है।
- 51:45कबीरा मान निर्मल भयो जो गंगा को नीर 5656 हजपुरी कहत कबीर कबीर तो
- 51:56गिर गयी बाला। राम राम करना भूल गए।
- 52:09कब गिरती है माला हाथ से जब आप परम आनंद को हो जाया करते हो तो
- 52:15माला बेकार हो जाया करती है, तृप्त हो हुआ करते हो तो भोजन की
- 52:21थाली बेकार हो जाया करती है। आप उसको छोड़ के उठ जाया करते हो
- 52:27जब आनंद को उपलब्ध हो जाया करते हो, ध्यान से समझ लेना अभी तो आप
- 52:34आनंद को पाने में प्रयासरत हो, शांति को पाने में प्रयास हो,
- 52:39लेकिन जब शांति को उपलब्ध हो जाओगे, आनंद को उपलब्ध हो जाओगे।
- 52:43फिर आप प्रणाम कर दोगे, थाली को उठ जाओगे, फिर थाली लाख निमंत्रण
- 52:51भेजे के स्वादिष्ट भोजन है। छतीसों प्रकार के मेरा आनंदपान
- 52:58करो तो आप प्रणाम कर लोगे के पास धन्यवाद।
- 53:03मैं तृप्त हुआ मैं आनंदित हुआ मैं अहो भाग से भर मैं उस परम में
- 53:10विलीन हो गया, मैं पा गया मेरा लक्ष्य था लोग पूछ लेते हैं कि
- 53:24व्यक्ति का लक्ष्य क्या है? लक्ष्य तो आनंद को उपलब्ध होना ही
- 53:30है, लक्ष्य तो आनंद को पाना ही है, लेकिन आप बातें कैसे हो ये
- 53:38समझा रहा था आपको बात आप कच्चे फल तोड़ लिया करते हो, कभी नहीं
- 53:43पकेंगे ना तो इसमें फल भी अधूरा रह जाता है पकने से और आप भी
- 53:49अधूरे रह जाते हैं और चखने से आप उसका असली स्वाद न चख पाओगे।
- 53:56अगर फल को पूरा पकने ना दे पाओगे फिर से समझिए।
- 54:04अगर फल को पूरा ना पकने दे पाओगे तो उसका सही सही स्वाद चखने से
- 54:11वंचित रह जाओगे। आम जो आपने खट्टा खट्टा तोड़ लिया
- 54:17टहनी से उसका असली स्वाद क्या हो सकता था, उसकी मिठास क्या हो सकती
- 54:23थी? इससे आप भी अनभिज्ञ रह जाओगे और
- 54:28वो खट्टी अम्बी जी से तोड़ ली वो भी अनभिज्ञ रह जाएगी कि मेरा चरम
- 54:34क्या था? मेरा चरम मिष्ठान से भरा हुआ रसा
- 54:40स्वादंत आम भी इस रस को। पीलिया करता है।
- 54:45पहले आम पीलिया करता है और आम तृप्त हो जाया करता है।
- 54:49उस मिष्ठान के रस को पी के और अपना स्थान छोड़कर घर जाया करता
- 54:55है। नीचे ऐसे ही आपकी उपासनाएँ घर
- 55:00जाया करती हैं नीचे जब आपके। पक जाया करती है।
- 55:05तृप्ति आपकी तृप्ति पकी भोगने के बाद गिरी, आपका फल नीचे गिरा वो
- 55:20है सही प्रोसेसर। वो है असली वैरग्य वो है वो
- 55:25वैरग्य जो बुद्ध में जन्मा और जो आज पैदा किये जा रहे हैं।
- 55:31आज शान्ति पैदा की जा रही है, ये तो अपना नहीं तो और क्या है आप
- 55:37अनुभव में आप जैसे? स्वप्न में आप अमीर हो जाया करते
- 55:46हो रहते तो कंगार हो, लेकिन स्वप्न में राजा बन जाया करते हो,
- 55:50ऐसे ही आप जागृत अवस्था में थोप लिया करते हो?
- 55:56देखो मैं उड़ी जा रही हूँ। मैं उड़ा जा रहा उस परम के पास उस
- 56:06परम शक्ति के पास और शांति के पास उस आनंद के सागर के पास और उसके
- 56:15चरणों में लूट गया लौट गई। और उससे मैंने एनर्जी ग्रहण की और
- 56:21फिर तृप्त होके वापस आ गए। ये तोपनाएँ हैं, चला लो ये
- 56:31अपनोटिज्म है इसको सेल्फ अपनोटिज्म कहते हैं।
- 56:39सहनिर्मित हिप्नोटिस आप खुद को ही मोहित कर लिया करते हो जैसे आपने
- 56:46देखा जो अति सुंदर स्त्री हुआ करती है, वो अपने आपको शीशे में
- 56:51निहारती रहती है और अपने मुखड़े को देख देख के।
- 56:55स्वच्छ सम्मेलन में डूब जाया करती है, वो होता है ऑटो हिपनोटिज्म
- 57:00सेल्फी हिपनोटिज्म। ऐसे ही आप शांति, मानसिक भावनाओं
- 57:08को कल्पनाओं को पैदा कर करके कोई दूर नहीं बैठा है।
- 57:14विराट। कोई बाबा दूर नहीं बैठा है जिसे
- 57:17चिमट जाओगे जाके और वो आपको शक्ति देगा, आनंद देगा, शांति देगा और
- 57:23वापस फिर आप धरा पे आ जाओगे बुनढल पर आ जाओगे।
- 57:30मैं किसी को ऐसा करने से रोकन पर नहीं हूँ।
- 57:35ऐसा करने से रोकना मेरा उद्देश्य भी नहीं करते जाइए, लेकिन एक बात
- 57:42अवश्य बता सकता हूँ कि आपको अंततः मुझे छोड़ना होगा।
- 57:49आज नहीं अगले जनम में अगले में नहीं अगले जनम में कभी तो
- 57:54छोड़ोगे। क्योंकि इससे मिलने वाला नहीं है।
- 58:01शांति मिलती है लेकिन ये मनोवैज्ञानिक शांति है।
- 58:08ये हिप्नोटिज्म से आई हुई शांति है।
- 58:11ये आत्मसमोह से आई हुई शांति है। इसको तो कोई भी जादूगर पैदा कर
- 58:16सकता है। जादूगर यानी हेपनोटिज्म करने वाला
- 58:19व्यक्ति। लेकिन याद रखिए हेपनोटिज्म करने
- 58:23वाला व्यक्ति खुद भी आनंद को उपलब्ध हुआ नहीं होता है।
- 58:29वो भी आप ही की अवस्था में हुआ करता है, बस थोड़ी सी तकनीक जानता
- 58:33है। ये मनोवैज्ञानिक कोई प्रभु को
- 58:35उपलब्ध थोड़ा ही हो जाया करते हैं।
- 58:39ये डॉक्टर्स हुआ करते हैं। ये आनंद को उपलब्ध थोड़ा ही हो
- 58:44जाया करते हैं। ये आपका इलाज करते हैं
- 58:48मनोवैज्ञानिक का। बस ये मनोवैज्ञानिक इलाज ही तो है
- 58:53जो आप थोप दिया करते हो, आप कुछ भी थोप सकते हो आप स्वसम्मोहन के
- 58:59लिए कुछ भी थोप सकते हो। आपकी इच्छा प्रभु ने आपको आजाद
- 59:03बनाया है, आपकी आजादी वो छिनने को नहीं है।
- 59:06आप जिधर चाहे जा सकते हो। लेकिन मैंने अपने मूल प्रसंग से
- 59:12फिर आपको शुरू करूँ के ईश्वर ने ये संसार बनाया है भोगने के लिए
- 59:17और आप कच्ची गलियों को तोड़ के अपने वैराग्य सिखाने जा रहे हो।
- 59:23नहीं आएगा वैराग्य। नहीं आएगा वैरग्य मर जाओगे वैरग्य
- 59:34को साधते साधते वैरग्य नहीं आएगा नहीं आएगा नहीं आएगा वैरग गाता है
- 59:44बुद्ध के फोगों से। बुध भी अगर न भोगते तो वैराग्य न
- 59:53आता। उन्होंने वैराग्य को साधा नहीं।
- 59:58अभ्यास के द्वारा उन्होंने शांति को साधा नहीं अभ्यास के द्वारा।
- 1:00:03उन्होंने वैराग्य से आनंद में प्रवेश किया, उनको आनंद उपलब्ध
- 1:00:07हुआ और साथ ही शांति मिल गया। महावीर ने वैराग्य को साधन महावीर
- 1:00:21को वैराग्य हो गया। बड़े शांत स्वभाव के निर्बलि
- 1:00:27चित्त के व्यक्तित्व अपने पिता से पूछा पिता जी मेरा मन नहीं लगता
- 1:00:33है संसार में मैं चला जाऊं, पिता बोले खबरदार।
- 1:00:43ऐसी बातें फिर से मत करना जब तक मैं जिंदा हूँ।
- 1:00:50चुप रह गई पिता मरे पिता के शरीर को अग्नि देकर आ ही रहे थे वापस।
- 1:01:02बड़े भाई से पूछने लगे, भैया पिताजी ने कहा था कि मेरे जीते जी
- 1:01:15गृह त्याग का कभी भी। मन में मत लेके आना विचार मेरे मर
- 1:01:24जाने के बाद अब पिताजी विदा हो गए हैं।
- 1:01:29क्या मैं चला जाऊं? गृह त्याग करके भाई कहने के
- 1:01:34खबरदार मेरे जीते जी ये बात मेरे से मत करना।
- 1:01:42यहाँ क्या कमी है तुम्हे तुम जैसा चाहे करो, महावीर चुप हो गए,
- 1:01:50वर्धमान था उनका नाम महावीर तो उनका एक उपाधि दी गई उन्हें।
- 1:01:59वर्धमान चुप हो गए और वर्धमान जैसे रहने लगे तो भाई ने सोचा कि
- 1:02:05क्यों इसको तंग करना है? ये रुके से रोके से रुकेगा नहीं।
- 1:02:12उसको समझ में आ गया कि इसके भीतर से अच्छा बेहराक पैदा हो गया है।
- 1:02:16वर्धमान के पास गए और कहने लगे आप छोटे भईया जा सकते हैं क्योंकि अब
- 1:02:24तो आपका होना ना होना यहाँ भी बराबर है।
- 1:02:27हुए के ना हुए बराबर है फिर आप कहीं जा सकते हैं मेरी तरफ से सब
- 1:02:32बाधाएं खत्म, आप चाहें यहाँ रह सकते हैं।
- 1:02:37चाहे तू जा सकता है और महावीर ने उसी दिन गृह त्याग कर दी, सच्चा
- 1:02:43वह रह के पैदा हो गया। आपको पता है 24 के 24 तीर्थंकर
- 1:02:48जैन धर्म के सभी राजा हुए हैं। राजा का अर्थ जिसके पास।
- 1:02:53प्रचुर मात्रा में भोग हैं और भोग के उन्होंने पाया के स्वोग में
- 1:03:04कुछ नहीं। वैराग्य आना चाहिए, वैराग्य के
- 1:03:10बिना बात तो नहीं बनेगी लेकिन अभ्यास से नहीं आना चाहिए।
- 1:03:14वैराग्यन बहु से आना चाहिए नहीं है इसमें कुछ लाख फकीर कहता है कि
- 1:03:23काजू बादाम में कुछ नहीं हमने त्याग दिया है।
- 1:03:25लेकिन मिला हो तभी त्यागोगे ना खाओगे।
- 1:03:28तभी त्यागोगे ना जब खाने को मिले नहीं तो त्यागे हुए हैं और लेडी
- 1:03:32ही त्यागे हुए हैं। जब खाने को ही नहीं तो आप लाख
- 1:03:37अपने मन को समझाओ कि कुछ नहीं पड़ा है, लेकिन कुछ तो पड़ा है।
- 1:03:43जो अभी भोग के अनुभव नहीं किया वह तो पड़ा है।
- 1:03:56वैराग्य आए शुभ वैराग्य पैदा किया जाए, अशुभ शांति आए, आनंद की चाय
- 1:04:09की तरह शुभ। शांति पैदा की जाए।
- 1:04:13अशोक शांति पैदा करने की चेष्टा मत करना, शांति को आने देना, आनंद
- 1:04:24की इच्छा है वो आएगी, निश्चित आएगी।
- 1:04:30फल गिरेगा, निश्चित गिरेगा, नीचे गिरेगा लेकिन उसको गिरने का
- 1:04:36इंतजार करता वो कब पके, कब गिरे इसका इंतजार करना, जल्दबाजी मत
- 1:04:43करना, धैर्य रखना और प्रतीक्षा करना।
- 1:04:49धैर्य और प्रतीक्षा ये सूत्र हैं धैर्य को मत खोना और प्रतीक्षित
- 1:04:57रहना कि जब भी गिरेगा हमें स्वीकृत है।
- 1:05:03आज गिरे दर्शनों के बाद घिरे। सो, आपने पूछा कि हम यहाँ क्यों
- 1:05:18आए हैं अनिश्चित ही आप यहाँ आए हो किसी और क्षेत्र को छोड़ के और
- 1:05:29जहाँ से आए हो। वहाँ से आपके माँ बाप आपको निहार
- 1:05:35रहे हैं आप तो यहाँ आके फंस ही गए आप तो यहाँ आके बड़ी प्रति लगाई
- 1:05:42आपने नहीं यहाँ भोगो। और वैराग्य आएगा और वापस पर तो
- 1:05:56माता पिता आपका इंतजार कर रहे हैं, आपका आपको बाहों में लेने को
- 1:06:03आतुर बैठे हैं। आप भी आंदोलित हो वहाँ पहुंचने के
- 1:06:11लिए यद्यपि आपको मालूम नहीं है कि आप काहे को आंदोलित हो।
- 1:06:17आप काहे को अशांत हो? आप काहे को दुखी हो मालूम नहीं
- 1:06:22है, लेकिन वो जानते हैं जिनको आप छोड़ के उनका घर छोड़ के यहाँ आए
- 1:06:29थे, सुबह निकले थे शाम खेल के आ जाओगे बहुत खेल लिए अब वापस मुड़ो
- 1:06:38अपने घर को वो भी इंतजार कर रहे हैं सो आप भी नहीं रहे हो, चैन
- 1:06:44आपको भी नहीं मिल रहा है। शांति आपको भी नहीं मिल रही है।
- 1:06:49आनंद में आप भी नहीं डूबे जा रहे हो और तुम्हारे माता पिता भी
- 1:06:54तुम्हें इंतजार की निगाहों से देखे जा रहे हैं।
- 1:06:58आपको आलिंगन में लेने को आतुर बैठे हैं आप चलो यहाँ से आप अपने
- 1:07:04मुकाम तक चलो। आज मिलने की खुशी में सिर्फ मैं
- 1:07:20जागा नहीं। आपका पिता आपकी माता कुछ भी कह लो
- 1:07:36आपको निहारे जा रहा है कि कब मेरा बच्चा वापस आएगा।
- 1:07:44लापता की तलाश गुमशुदा की तलाश आप रोज़ देख रहे हो क्या?
- 1:07:50अखबारों में निकलती है जिसका बच्चा चला जाया करता है दिनभर राह
- 1:07:55दो तरफ़ कैसी होती है? आप जिन्हें माँ बाप बनने का हुक्म
- 1:08:01ही नहीं दिया करते हो उनको वह तरफ़ पैदा।
- 1:08:04होगी। कैसे उनको पता कैसे चलेगा के वो
- 1:08:07रात की तड़प बुआ क्या करती है आप उनको माँ बाप बनने का मौका ही
- 1:08:15नहीं देते, समर्पण नहीं करवा लिया करते हो।
- 1:08:20जबकि वो आए हैं खुद माता पिता बनने के लिए।
- 1:08:25ईश्वर ने उनमें कोई कमी नहीं छोड़ी है, लेकिन आप जबरदस्ती
- 1:08:31छलावे दिखा के उनसे समर्पण करा लिया करते हो।
- 1:08:37आज मिलने की खुशी में सिर्फ मैं जागा नहीं, सिर्फ परमात्मा ही
- 1:08:44नहीं जागा आपके मिलने की खुशी में कि मेरा बच्चा आज लौट के आ रहा
- 1:08:49है। आज मिलने की खुशी में सिर्फ मैं
- 1:08:53जागा नहीं। तेरी आँखों से भी लगता है कि तू
- 1:08:56सोया न था तेरी आँखों से भी लगता है कि तू सोया न था, देख रहा तुझे
- 1:09:05बराबर देख रहा था कि तू भी सो कहाँ पा रहा था?
- 1:09:10चैन तुझे भी न आ रहा था। सुकून तुझे भी न मिल रहा था आनंद
- 1:09:16तू भी न पा रहा था फटके फटके। तू भी चला जा रहा था तुझे तेरी
- 1:09:21मंजिल का खबर ही न दी कि मैंने कहाँ पहुंचना है आज मिलने की खुशी
- 1:09:28में सिर्फ मैं जागा नहीं। तेरी आँखों से भी लगता है कि तू
- 1:09:35सोया ना था, प्रश्न बहुत उठेंगे स्वाभाविक मैंने बात ही कुछ छटपटी
- 1:09:47करती है लेकिन जरूरी था। विचार आंदोलित होंगे, प्रश्न भी
- 1:09:56उठेंगे। आपके प्रश्न आमंत्रित हैं क्योंकि
- 1:10:02मैं भी नहीं चाहता कि आपके प्रश्नों का उत्तर दिए बिना मैं
- 1:10:07चला जाऊं अपने जीवन के। अंतिम प्रहर में मेरी भी इच्छा है
- 1:10:17कि जैसे मैंने जाना जो मैंने जाना वो आपको बदला जाऊं क्योंकि आप ही
- 1:10:26मेरे भाई बहन हो आप ही। मेरे परम पिता की प्रिय संतान हो,
- 1:10:36आप मेरे भाई बहन हो, मैं अपना अनुभव आपको सुना जाऊं आपको जगा
- 1:10:45जाऊं क्या? आप हैं कौन?
- 1:10:49ताकि आपकी उस राह पे चल सको और उस अमृत का पान कर सको, सानंद का पान
- 1:10:55कर सको जो मैंने पिया है। आपके प्रश्न आमंत्रित हैं,
- 1:11:01निश्चित ही आपके विचार अंदोलित होंगे और मैं भी चाहता हूँ कि
- 1:11:07आपको बता के जाऊं। आप भी पूछना अगर चाह रहे हो तो आप
- 1:11:15आमंत्रित हैं। मेरी तरफ से कोई बंदिश नहीं आज
- 1:11:25मिलने की खुशी में सिर्फ मैं जागा नहीं।
- 1:11:31तेरी आँखों से भी लगता है कि तू सोया ना था।
- 1:11:38धन्यवाद।