Latest / Baba ji Vijay Vats / 28 Jan 26 - कर्ता भाव का त्याग कैसे करें? पर्युषण पर्व के पीछे का रहस्य? मुनि का अर्थ और अहंकार त्याग!
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- 0:07बाबा जैन धर्म में पर्युषण पर्व का क्या महत्त्व है?
- 0:21यह क्यों मनाया जाता है? पूर्ण विस्तृत ढंग से बताने की
- 0:32कृपा करें। दिगंबर जैन संप्रदाय में अद्भुत
- 0:47परंपरा है ये। वर्ष भर में एक वार मनाई जाती है।
- 1:0110 दिन की यह पर्व होती है। इसमें क्या होता है अशविन कृष्ण
- 1:15प्रतिपदा से ये शुरू होती है सनातन धर्म में।
- 1:25नवरात्र अशविन सुपर प्रतिपदा से शुरू होते हैं और प्रदूषण पर्व
- 1:32जेयन में अशविन कृष्ण प्रतिपदा से शुरू हो के 10 दिन तक चलता है
- 1:43ग्यारहवें दिन। इसका समापन हो जाता।
- 1:54दिगंबर जैन धर्म में ये अनूठी परंपरा है विश्व में किसी भी
- 2:07संप्रदाय में ऐसी अनूठी। परंपरा नहीं वर्ष भर में हम कितने
- 2:20ही अच्छे बुरे जाने अनजाने अच्छे और बुरे कर्म करते रहते हैं।
- 2:33उसी के लिए यह प्रदूषण पर्व बनाया गया था।
- 2:42प्रदूषण पर्व का मुख्य उद्देश्य है क्षमा वीरस्य घोषणा।
- 2:54वीरों का आभूषण क्षमा है। इस प्रदूषण पर्व के दौरान वो सभी
- 3:06से क्षमा प्रार्थना करते हैं, ऐसा नहीं।
- 3:14के बड़ों से क्षमा प्रार्थना करते नहीं।
- 3:20वह अपने छोटों से भी क्षमा प्रार्थना करते हैं।
- 3:24जाने अनजाने दुर्वचन कह दिया हो, आपके मन को ठेस पहुंचा।
- 3:36मन में मेरे प्रति क्रुद्ध भाव आया हो, डीरशा जगी हो, गलत भाव
- 3:47आया हो, कह ना सकें। तो मुझे क्षमा कर देना, दोनों कर
- 4:00जोड़कर पांव को छू कर वो बड़ों और छोटों से क्षमा प्रार्थना करते।
- 4:11अद्भुत परंपरा इसीलिए मैंने कही। कि सिर्फ मनुष्यों से ही नहीं
- 4:18तमाम जीवजंतुओं से इस वर्ष भर के दौरान कोई कीड़ा पांव के तले आ
- 4:27गया होगा। जब जले भिक्षा मांगने या घर के
- 4:33कोई कामकार। घर में रसोई पका रहे हैं, कोई
- 4:39छोटी चैटी मर गई, कोई मच्छर मर गया, कोई मक्खी मर गई, कोई
- 4:46बैक्टीरिया का हनन हो गया किसी को मन।
- 4:52इसकी ठेस पहुंची। वचन चुभ गए।
- 4:59हृदय में तीर के समान और कर्म से कुछ दुष्कर्म हो गया है।
- 5:12कुछ ऐसा हो गया हो जिससे आपको आघात लगा हो।
- 5:21हे परम्प प्रभु मुझे उस पाप। दंड मत देना मुझे क्षमा कर, मैं
- 5:39आपकी शरण में आई कीड़ों मकोड़ों। जीव व जानवरों छोटे बड़ों जीवों
- 5:50के प्रति यहाँ तक के पेड़ पौधों के प्रति क्षमा भाव पैदा करते
- 6:02किसी वृक्ष को काट दिया हो। किसी वृक्ष का फल तोड़ लिया हो,
- 6:12दर्द तो होता है, जीवन है, वृक्ष के भीतर भी और जड़ और चेतन के सभी
- 6:23रूपों से। वो क्षमा प्रार्थना किया करते
- 6:27हैं, इसकी बुनियाद में क्या था? इसकी बुनियाद में था कि मैंने
- 6:40किया तो नहीं। हो गया और हो गया ये मैं मानता
- 6:50हूँ प्रस्तुतिवश्व हो गया किसी कारण से हो गया।
- 7:04रंग ढंग ही कुछ वातावरण में ऐसे थे।
- 7:10मनुष्य में घृणा और बैमनस्य और क्रोध की लतते थीं।
- 7:19तो भुगत तो मैंने पहले ही लिया, लेकिन आज आपसे शाम को क्षमा
- 7:28प्रार्थना करता हूँ, ये मुझे आप क्षमा।
- 7:38मैं भलीभाँति जानता हूँ कि जो कर्म मैंने किया, प्रकृति तो अपने
- 7:45न्यायकारिक व्यवस्था के कारण मुझे दंडित करेगी ही करेगी, उससे तो
- 7:53मैं कभी बच ना सकूँ। लेकिन कृपया आप मुझे क्षमा कर
- 8:00दीजिए। इसकी बुनियाद में क्या था?
- 8:08इसकी बुनियाद में था कर्तापन को समाप्त कर देना मैंने नहीं किया।
- 8:19मैं इस कर्म का करता नहीं था, हो गया परिस्थिति वश हो गया।
- 8:28सभी धर्म यही कहते हैं कि करने वाला वह ईश्वर।
- 8:39प्रस्तुति वर्ष हो जाता है करवा देती हैं प्रस्तुति मैंने नहीं
- 8:50किया कर्ता भाव का। आमूलचूल विनाश करने के लिए यह
- 9:02पर्युषण पर्व था अपने अहम को मिटा देने का।
- 9:14अद्भुत विलक्षण प्रयोग था। दिगम्बर जैन संप्रदाय मैंने किया
- 9:25तो नहीं हुआ है, ये मुझे पता है जानता हूँ।
- 9:37क्षमा वीरस्यभूषण वीरों का आभूषण क्षमा है, चाहे बड़े हो, चाहे
- 9:49छोटे हो, चाहे छोटे कीट बतंगे हो। चाहे चींटी कीड़े हो, कोई चला
- 9:58होगा, कितना वजन पूरा होगा, आँखें कमजोर हो गया देखा नहीं होगा,
- 10:06पांव पर गया होगा और वह जी मृत्यु को प्राप्त हुआ।
- 10:16उस प्राणी से क्षमा मांगन क्यों चला गया, पांव तले आ गया, मुझे तो
- 10:27पता भी न था बहुत से ऐसे कर्म हुए होंगे।
- 10:34रसोई पकाते वक्त बहुत से कीट पथन की चीटियां हमसे मर जाती हैं।
- 10:45झाड़ू पोछा या बम लगाते हैं। बहुत से जीवों की हत्या हो जाती
- 10:52है। कोई मच्छर मर जाता है, कोई मक्खी
- 10:56मर जाती है, अनासुरति मर जाती है, सभी जीवों के प्रति दया भाव।
- 11:11महावीर का एक अद्भुत वचन है जियो और जीने तो आप भी जियो।
- 11:26और दूसरों को भी जीवंतों का ये विलक्षण उदाहरण है पर्युषण पर
- 11:36क्योंकि जैसे ही तुम कर्म करते हो फल तो तुम्हें कैसे ही तुम्हारे
- 11:43भीतर के कंप्यूटर में फीड हो जाता है वह प्रकृति।
- 11:49नियमानुसार तुम्हें भुगताएगी वक्त आने पर इससे कोई बच नहीं सकता।
- 11:57यह आएगी ही आएगी कुछ चीजों का परिणाम आप ततक्षण भोग लेते हैं।
- 12:10कैसे आपने आग में किर डाल अग्नि भड़क उठी गलती से आपका हाथ उस
- 12:22भड़कती हुई आग के भीतर? आहुति देखते वक्त उस आग से जल
- 12:29गया, पीड़ा हुई, गलती से हुआ, जानबूझ के हुआ लेकिन आपने कष्ट?
- 12:48जला दिया अग्नि ने, स्वभाव था उसका आपने कभी देखा जब हम दूसरों
- 12:55के घर फूंकते हैं तो जीस दिया सलाई से घर फूंकते हैं।
- 13:05घर बाजू में जलता है, दिया सलाई पहले जल जाती है, यह भावना कि
- 13:17दूसरा जले। याद रखना, उससे पहले तुम जल चूके
- 13:25होते हो। मैंने बहुत से व्यक्ति देखे हैं
- 13:34कि हम दूसरों को जलाने के लिए ऐसा करते हैं।
- 13:39उन्हें मालूम। प्रकृति के नियम कभी बदलते नहीं।
- 13:45किसी के लिए यह अपवाद नहीं है। जैसे ही तुम दूसरों को जलाओगे,
- 13:56पहले खुद जलोगे। और उस जलन का तुम्हें पता ही नहीं
- 14:01चलेगा तभी तो तुम जला पाओगे। जीस दिन पता चल गया आंखें खुल गई
- 14:08तो तुम दूसरों को जलाना बंद कर दोगे, दूसरों को जलाना।
- 14:17तुम्हारा ध्येय होता है, लेकिन दियासलाई झोंपड़ी को जलाने से
- 14:25पहले खुद को जला लेती है, बेलाशक ऐसे ही आप भी जब क्रोध से भरते
- 14:33हो। तो उस क्रोध का परिणाम आप तो
- 14:39भुगते ही हो, सामने वाला व्यक्ति अज्ञानी है तो भुगतेगा।
- 14:48ज्ञानी है तो वो नहीं भुगतेगा। आपकी मंशा पूर्ण नहीं होगी।
- 14:56महात्मा बुद्ध किसी बात का उत्तर जल्दी जल्दी नहीं दिया करते थे और
- 15:05बोलते थे जो उन्हें ध्यान है वही तो बोलना है पुरुष बोलने से।
- 15:16चोट पहुंचेगी, बहुत से दिलों को ठेस पहुंचेगी, बहुत सी मान्यताओं
- 15:28को आग लगेंगी। यद्यपि उसने वो आग।
- 15:34आपके बंधनों को तोड़ने के लिए लगाए ये जो रस्सियों के बंधन आपके
- 15:41ईर्द गिर्द आपके मन मस्तिष्क को बांधे हुए हैं यह बंधन टूट जाएं,
- 15:51जल जाएं। इस नियत से उसने ये आग जलाई।
- 16:01खुद नहीं जलेगा क्योंकि उसकी मंशा जल के जलाने की नहीं है।
- 16:13उसकी मंशा अनुभव लेकर आपको बताने की जैसा उसे अनुभव हुआ वैसा उसने
- 16:23बोल दिया। आपकी धारणाएं जलीं, आपकी धारणाओं
- 16:28की रस्सियों की गांठ खुली। मुक्त हो गए।
- 16:33आप चाहते तो मुक्त हो जाते, लेकिन आपने उसका उपयोग नहीं किया।
- 16:41रस्सियाँ जल गईं, सब बंधन टूट गए, लेकिन आपने फिर बना लिया दूसरी
- 16:47रस्सियों से अपने आप को बांध लिया।
- 16:51कोशिश करते हैं गुरूजन वो अपने अनुभव को बताते हैं सिर्फ मात्रा
- 17:02लेकिन जो प्रतिकर्म करते वह जल के असमझो।
- 17:11और जिसने उसका रिएक्शन दे दिया, वह समझलो के जल गया, उसके बंधन जल
- 17:23गए। उसे इस वक्त का उपयोग कर लेना
- 17:28चाहिए था। अब बंधन जल गए।
- 17:32बोलने वाला अपने अनुभव से बोल रहा है।
- 17:36यद्यपि उसका कोई इसमें लोग नें लोभ अवस्था से आपके बंधन देखे
- 17:46नहीं जाते आपकी। गलत मान्यताओं उन्हें भी कष्ट
- 17:53देती हैं। इसीलिए वो आपके बंधनों को जलाने
- 17:57की चेष्टा में रत रहते हैं। आपके बंधन जल जाएं, कट जाएं ये
- 18:06उनकी आंतरिक इच्छा रहती है। और अगर आपके पंधन सही में जल गए
- 18:12कट गए तो आप मुक्त हो गए। जो हाथ बंधे हुए थे वो खुल गए।
- 18:19आप स्वतंत्र हो गए। इन धारणाओं से रोशन तो संत के यही
- 18:27होते हैं। आप समझते कैसे हो ये आपकी अपनी
- 18:32व्याख्याएं प्रदूषण पर्व में क्षमा मांगी जाती है।
- 18:4510 दिन की यह प्रक्रिया। अलग अलग भागों में बांटी गई थी।
- 18:54पहले दिन शुरू होता है उत्तम क्षमा से क्षमा प्रार्थना पहले ही
- 19:02दिन कर लेते है। 10 दिन बैठेंगे।
- 19:07के मैल जो चढ़ गया। वर्ष भर में इस हीरे रूप की आत्मा
- 19:12पर इसे धोएंगे कोशिश करेंगे। वर्षभर के बाद ये 11 दिन अद्भुत
- 19:23क्रांति गठित हो सकती है। अगर कोई मन से करे तो उत्तम क्षमा
- 19:31मैंने समझा दिया छोटे मोटे जीव, बड़े छोटे मित्र, दोस्त, प्यारे
- 19:43बच्चे, बुजुर्ग। सभी से क्षमा प्रार्थना की जाती
- 19:49है, जो छोटे बड़े जीव गलती से उनका शिकार हो गए, उनसे क्षमा
- 19:56प्रार्थना की जाती है। पेड़ पौधों से जड़ चेतन से सभी से
- 20:01क्षमा मांगी जाती है। कर्ता भाव को समाप्त करने का ये
- 20:09विलक्षण प्रयास था। मैंने नहीं किया, हो गया और अगर
- 20:18हो गया तो भी मैं जिम्मेवार। क्योंकि हुआ मेरे कारण मेरा पांव
- 20:27रखा गया। ये 607080 किलो का वजन छोटे से
- 20:33कीड़े पर पड़ा होगा तो वो मर गया होगा।
- 20:39रसोई घर में स्लैब को साफ करते वक्त हाथ में ज्यादा गर्ष कर दिया
- 20:47होगा तो चींटियाँ वगैरह जीव हनन हो गए।
- 20:57दोनों हाथों को जोड़कर पूर्ण क्षमा से भरे हुए हृदय से उनसे
- 21:06क्षमा मांगी जाती है। यह जीव आपसे वरम्ब्र शीष जगाकर
- 21:15प्रार्थना है। कि आप हमें हमारे सभी कर्मों को
- 21:20जो जाने में हुए अनजाने में हुए ये क्षमा क्षमा मांगने का अद्भुत
- 21:32तरीका और दूसरा। कर्ता भाव समाप्त करने का अनूठा
- 21:40प्रयास विलक्षण ढंग पहले दिन सत्य उत्तम।
- 21:56क्षमा दूसरे दिन उत्तम मर्दब तीसरे दिन उत्तम आर्य जब चौथे दिन
- 22:07उत्तम सत्य भी बोला हो बोला ही हुआ।
- 22:16उससे भी आपको चोट लग सकती है। हृदय दुख होगा, ये वनों का तीर
- 22:26हृदय को जख्मी कर गया होगा, उसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ।
- 22:33उत्तम शौच। मन की सफाई तन की सफाई तो हम रोज़
- 22:40करते हैं मन की सफाई इन दस्तनों में करनी होती है उत्तम संयम असैम
- 22:49भी कभी हमने किया हुंकार। ये धारा जाता है उत्तम तप
- 23:00क्रम्बल्स रोज़ एक उत्तम त्याग त्याग भी नहीं किया होगा पिग्रह
- 23:12किया होगा वस्तियों का? विचारों का इधर उधर से शास्त्रों
- 23:19के शब्द जोड़ लिए होंगे। अपनी प्रतिभा को लोगों के सामने
- 23:26प्रकट करने के लिए क्षमा कर देना उसके गलती हो गई।
- 23:36उत्तम त्याग, उत्तम अकिंच अकिंच मात्र हूँ, मेरी कोई सत्ता नहीं
- 23:49इतने विशाल विराट। ब्रमण्ड में जहाँ मेरी ज़रा भी
- 23:56होगा तो मैंने अपने आप को बड़ा समझ लिया होगा।
- 24:02उसके लिए मुझे क्षमा प्रकृति से भी क्षमा मांगी जाती है।
- 24:11जड़ और चेतन दोनों हिस्सों से क्षमा मांगी जाती है और उत्तम
- 24:17ब्रह्मचारी ब्रह्मचर्य बड़ा प्यारा करता है।
- 24:23ब्रह्मचर्य का मतलब सिर्फ अपनी शक्ति को।
- 24:29दुरूपयोग करना नहीं है। ब्रह्मचर्य का अर्थ है ब्रह्म
- 24:34जैसा आचार्य भ्रम भेद नहीं करता ब्रह्म सूरज उगाता है सभी के लिए
- 24:45उसके लिए कोई गरीब नहीं, कोई बीमार नहीं।
- 24:49कोई कोड ही नहीं, कोई सवस्थ नहीं, कोई पहलवान नहीं, कोई दुर्बल
- 24:54नहीं, कोई बच्चा नहीं, कोई पेड़ पौधा नहीं तो ईश्वर ब्रह्म के
- 25:01समान आचरण ब्रह्मचरण ब्रह्मचर्य भेद नहीं रखता।
- 25:10वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, अवकाश सभी के प्रयोग करने के लिए उसने
- 25:22निर्माण किया और ये तत्व किसी के साथ भेद नहीं करते।
- 25:28आग में हाथ डालें, चाहे कोढ़ी डाले चाहे सवस्थ राजा डाले, जलेगा
- 25:39भेद दृष्टि खत्म प्रकृति भेदरहित। क्रिया करती है, बेदरहित फल देती
- 25:51है। कौन था सामने वाला जिसने ये कर्म
- 25:56किया ये गावण है क्या कर्म किया यह उजागर है उसने उस।
- 26:07कर्म का फल देना, ब्रह्मचर्य ब्रह्म जैसा आचरण कोई भेद की
- 26:17दीवार खड़ी की हो तो क्षमा करती कोई प्रयास किया हो।
- 26:27कि ये बंट जाए, ये टूट जाए, ये विखंडित हो जाए?
- 26:35ये दुर्भावना है तो ऐसा किया होगा, अवश्य ही किया होगा।
- 26:44क्योंकि वर्ष भर में पूर्ण होश में नहीं था, पूर्ण शौच में नहीं
- 26:55था अश्वच में था पूर्ण सत्य में नहीं था पूर्ण ब्रह्मचर्य में
- 27:00नहीं था। पूर्ण अहिंसा में नहीं था सभी हो
- 27:09गए हो गए हुए और मैं उसका उत्तरदायी हूँ, लेकिन मैंने किए
- 27:17नहीं तुम मुझे क्षमा करते। बाकी तो मैं जानूं मेरी प्रकृति
- 27:27जान, वो तो मुझे दंड देगी ही देगी।
- 27:33उसका स्वभाव है हम देखते हैं। तीली पहले जलती है।
- 27:40किसी की झोपड़ी जलाने से पहले क्रोधित होने से पहले जिसके प्रति
- 27:48तुम क्रोधित होते हो, अपने खून को पहले जला लेते हो, अपने आप को
- 27:55दंडित पहले कर लेते हो। दूसरा दंडित होगा नहीं होगा, ये
- 28:01उस पर निर्भर है। बुध को आप कालीन निकालते हैं,
- 28:08महावीर के कानों में कीलें ठोंक दी जाती हैं, महावीर को अपशब्द
- 28:14कहे जाते हैं। बुद्ध के ऊपर लोग सूख जाते हैं
- 28:22लेकिन बुद्ध असपृश्य बने रहते हैं।
- 28:28बुद्ध कोई प्रतिक्रिया नहीं करते हैं।
- 28:35तो बुद्ध जब प्रतिक्रिया ही नहीं करते, बुद्ध दुखी कैसे होंगे और
- 28:42आप मन मसोस के रह जाते हो, आपने जलाने का प्रयास किया?
- 28:49बुद्ध जले नहीं, बुद्ध के मन पे वही खुशी बनी।
- 28:55बुद्ध के मन के भीतर की शांति अडिग रही, अविचल रही, उसकी शांति
- 29:03भंग नहीं हुई। आपके कुछ भी करने मात्र से आपने
- 29:10प्रयास किया। और सिर्फ गाली निकालने से क्रोधित
- 29:15होने से अपशब्द कहने से ही हिंसा नहीं होती।
- 29:22अगर आप पड़ोसी को दुनिया को दिखाने के लिए।
- 29:31हम रोज़ जलाते हैं, दुनिया को पता भी नहीं चलता।
- 29:41हमें पता भी नहीं चलता कि हमने अपने इस कर्म से दूसरों का मन
- 29:46दिखा दिया। सुंदर नए वस्त्र पहनते हैं।
- 29:57एक स्त्री मुझे मिली बहुत वर्ष पहले की बात किसी दुकान पर 3 घंटे
- 30:05बैठी रही एक साड़ी 3 घंटे बाद जब वो बाहर आई।
- 30:15तो कुदरती उसके साथ मैंने वार्ता ओके उसने बताया कि मैं साड़ी
- 30:27खरीदने यहाँ आई थी 3 घंटे तक मैंने कहा 3 घंटे में।
- 30:36हाँ, ये देख इतनी सुंदर है कि पड़ोसन जल भुन जाएगी।
- 30:47अब मंतव्य देखिए, पैसा जाए भाड़ में दूसरा बढ़ते की तरह जल भुन
- 30:55जाए। ये हमारी काम है तो उससे पहले हम
- 31:01खुद जल बन जाते हैं। पड़ोसी ने दो मंजिला डाल दिया।
- 31:08हम तीन मंजिला डाल देते हैं, अगर जरूरत के हिसाब से डालें।
- 31:15तो कोई बुरा न था और अगर दूसरों को जलाने के लिए डालें तो ये पाप
- 31:22है। सुंदर वस्त्र डाल कर हम शादी
- 31:31विवाह में समारोह में जाते हैं। उसका लुत्फ लेने के लिए कम दूसरों
- 31:39को आग लगाने के लिए ज्यादा प्रयोग करते हैं।
- 31:44ये पाप है जिसका तुम्हें पता है तुम दूसरों को गाली निकालते हो,
- 31:52थूक देते हो, दुर्व्यवहार। तुम जल जाते हो, भले जल जाओ,
- 32:01लेकिन दूसरा जलना चाहिए, लेकिन आगे से अगर कोई बुद्ध, कोई महावीर
- 32:08आपको मिल गया, कोई ईसा आपको मिल गया।
- 32:12तो आपके सभी सपने धरे रह जाते हैं, दूसरा जलता नहीं और जलाने की
- 32:21आपकी इच्छा प्रबंध फिर आपको खीज चढ़ती है और खीज इतनी बढ़ जाती है
- 32:30कि आप इकट्ठ कर। और उस इकट्ठे ने ईसा को सूली पर
- 32:37चढ़ा दिया दुष्परिणाम था 2000 वर्षों से एसायियत इस प्रायश्चित
- 32:46की आग में जल रही है एक महा। ईश्वर का पुत्र शांति दूत हमारा
- 32:56कुछ नहीं बिगाड़ा, ईश्वर से मांगता था, हमसे तो मांगा भी
- 33:02नहीं, प्रिय पुत्र खुद को कहता था।
- 33:10हमारा क्या लेता था? हमने उस निर्दोष को इतनी बुरी तरह
- 33:18से मारा कि शर्मसार हो गया। सारा ऐसायत कम्यून सारी यूनिट थी।
- 33:29पापग्रस्त बोध से जलने लगी आज तक जल रही है पड़ोसी के पास छोटी कार
- 33:39पुरानी हम नहीं लेकर आते हैं नई रॉयस।
- 33:48चमचमाती मंतव्य ऐसा नहीं कि उस पुरानी कार पर आप कहीं जा नहीं
- 33:59सकते। बली चंगी अवस्था में पड़ी पड़ोसी
- 34:03को जलाना सामने। देखने वाले व्यक्ति में आग लगा।
- 34:12आपको पता भी नहीं चलता ये पाप ये अति सूक्ष्म पाप जो आप भोगते हो
- 34:26या भोग लोगे, आप ही को भोगना पड़ेगा।
- 34:34आपकी जगह भोगने को कोई अन्य नहीं बहुत से ढंगों से चेहरा विकराल
- 34:44है। दूसरे को झाँकने का मन नहीं करता।
- 34:51चेहरे पर अनेकों प्रकार के हम मेकअप जड़ लेते।
- 34:58सुंदर लगे जले दूसरा दूसरा जले। इसके ऊपर इतना हुस्न और मैं कुरु
- 35:14एकनव्य वाहि थी स्त्री पहली सुहागरात के बाद सुबह पति देव।
- 35:26एक स्त्री को देखते हैं और उसको चांटा चढ़ते हैं।
- 35:33इतनी ज़ोर से चांटा चढ़ते हैं। कहते हैं अरे चोर तू हमारे घर से
- 35:41चोरी करके ले जा रही है। माता पास में खड़ी थी।
- 35:50माता ने पूछा तुमने इसे मारा क्यों?
- 35:53इतनी ज़ोर से कहता माता देख इसके हाथ में कंगन जो मैंने मुँह दखाई
- 36:01में रात्रि को डाला इसको। वही कंगन चुराके ले के जा रही थी
- 36:10तो माता एक तरफ़ ले गयी पुत्र ये तेरी धर्मपत्नी है, सुबह सुबह
- 36:17मुँह धो कर आ रही है। जलाते हो, भ्रम पालते हो, भ्रम
- 36:28दिखाते हो, ये तुम्हारे मेकअप पेस्ट पाउडर दूसरे को जलाने का
- 36:36काम करते हैं, इसलिए तुम दिखावा करते हो।
- 36:41फलां वर्ल्ड का नंबर एक अमीर दूसरे जलेंगे जो नीचे भागेंगे तुम
- 36:51और तेज भागोगे वो और तेज भागोगे भागते भागते बिछ जाओगे 1 दिन जमीन
- 36:59पर। माटी होजा दूसरे को जलाने का
- 37:11प्रयास मात्र है। सुख को भोगने के लिए, दो दो वक्त
- 37:19की रोटी तनखाने के लिए वस्त्र। और विश्राम के लिए एक छत की ही तो
- 37:26आवश्यकता होती है। ये कोई घर नहीं ये तो सराई हैं,
- 37:40छोड़ना पड़ेगा मूड़ता अवश्य। आपने इसको परमानेंट ठिकाना मान
- 37:46लिया, तो कसूर किसका कसूर? आपका आपने गलत माना।
- 38:04जाने अनजाने देखा देखी रीती रिवाजों के कारण पड़ोसी ने लड़की
- 38:15की शादी में 20,00,000 खर्च किया। तुम 50,00,000 खर्च हो।
- 38:23इसलिए नहीं कि तुम्हारी बेटी को 50,00,000 की जरूरत है या जो
- 38:31तुमने संबंध जोड़ा उनको ₹50,00,000 देना पड़ोसी जले।
- 38:41दूसरा जले देख के जले ये तुम्हारे भीतर की आकांक्षा है, ऐसे तुम्हें
- 38:47पता भी नहीं चलेगा। इसलिए जैन धर्म में पर्युषण पर्व
- 38:53में जो सबसे ऊंचे स्थान पे बैठा होता है, उन्हें कहते हैं, मुन्य।
- 39:01मुनि का शब्दिक अर्थ तो कुछ भी हो, उसका रहस्यत्मक अर्थ है जो मन
- 39:07के भावों से पार चला बस कुछ नहीं दिखाना उसने आपको जलाने के लिए एक
- 39:17सफेद धोती। और कोई हेयरस्टाइल नहीं, बाल सब
- 39:28मुंडवा दिए। ये घुंघराले प्यारे प्यारे बाल जो
- 39:31लगते थे सब मुंडवा दिए। आपको जलाना नहीं है इन सुंदर
- 39:40सुंदर बालों को दिखाकर यहाँ तो आप नकली बाल चिपका लेते हो?
- 39:48गंज मलंग होती है, खोपड़ी आप हेयर ट्रांसप्लांटेशन के पास से।
- 40:00छिद्र करते हो, दुख भोगते हो 1020 50 साल की उम्र है, है की नहीं
- 40:06है, पता नहीं होता लेकिन हम हेयर ट्रांसप्लांट टकराते हैं।
- 40:15पाप। अपने बालों को घुंघराला कराते हो
- 40:23सुन्दर लगती है, भगवान कृष्ण के बाद घुंघराले निश्चित ही घुंघराले
- 40:30बाल सुंदर लगते हैं कोई। लेकिन ईश्वर प्रदत्त हूँ तो बात
- 40:38और दूसरों को जलाने के लिए बनवाए जाएं।
- 40:42रेडीमेड आर्टिफीसियल तो गलत पाप है तो जैन मुनि रुंडमुंड हो जाता
- 40:52है। हाथ, फेरों, चाँद जैसी खोपड़ी
- 41:01उससे जलोगे नहीं कोई जुल्फ बिखरेगी नहीं, गालों पे आके हमने
- 41:11ऐसा मुकाम। सफा चट कर दिया मैदान कोई जुल्फ
- 41:23बिखरेगी नहीं, गालों पे हक हमने ऐसा मुकाम।
- 41:33जरोगे नहीं मुनि और मन के सभी भावों से परे हो गया सब त्याग
- 41:40दिया देखावा। इतना ही पैर छूड़ो वो आपके घर
- 41:47मांगने जाएगा। भिखारी बनकर याचक उसके कही हुई
- 41:55बातों पर आप हमल करोगे लेकिन भिक्षा मांगने के लिए वो आपके घर
- 42:00पर भिक्षुक बनकर जाएगा। झोली फैलाएगा सारा अहंकार टूट गया
- 42:07मांगना। बहुत बुरी बड़ा है, लेकिन मांगते
- 42:14हैं ये लोग मांगने से अहंकार नष्ट होता है।
- 42:27दानी अहंकार पाल सकता है कि मैंने फलादान किया।
- 42:32त्यागी अंकार पाल सकता है कि मैंने फलां त्याग किया, भरे पूरे
- 42:37परिवार को लात मार के आ गए। पूरे संघासन को लात मार के आ गया।
- 42:45लेकिन याचिका किसी चीज़ पर गुमा करेगा।
- 42:53याचिक के पास गुमा करने के लिए एक झोली मात्र के सिवा और कुछ नहीं
- 43:00झोली पसारेगा आपके दर पर आकर और आपने जौ डाल दी।
- 43:09रजा समझ के चला जाएगा गला तुम्हारा कल्याण
- 43:26आदिगुरु शंकराचार्य एक घर से मांगते थे, मांगते थे पर एक घर से
- 43:31मांगते थे, भूख रोज़ लगती थी। दिन नफे भूख लगती थी पर मांगते थे
- 43:38एक वक्त और एक घर से मांगते थे। पहले तो लोगों को पता नहीं था
- 43:48लेकिन धीरे धीरे ये खबर उड़ी उसने फैलाई भी नहीं।
- 43:55उसने कोई प्रतिनिधि नियुक्त नहीं किया कि मेरी इस बात को फैला दो
- 44:00कि मैं एक वक्त मांगता हूँ। लोगों को पता ना होने के कारण लोग
- 44:07उन्हें टाल भी देते, उपेक्षित भी कर देते।
- 44:12लेकिन जैसे ही पता चला कि जय शंकराचार्य गुरु एक ही घर में
- 44:18रोज़ मांगते हैं और एक ही बार खाते हैं और उसी एक बार एक ही घर
- 44:24में अगर इंकार हो जाए तो वो सारे दिन भूखा रहेगा।
- 44:29अनजाने में पाप हो गया तुम्हारे पास?
- 44:35प्रायश्चित किया। लोग प्रभु था तो सब कुछ, लेकिन
- 44:42पता ना था हम आपको मुट्ठी भर चावल ना दे सके।
- 44:51यद्यपि आपके चरणों में लोटपोट होते हैं, तल्लीन तो न थे।
- 45:00आपको देखकर तल्लीनता का दिखावा किया, पता चला तो प्रयास होगा।
- 45:10कभी कभी वापस भी 1 दिन ऐसे घर में चल गए जो किसी विधवा ब्राह्मणी का
- 45:20घर था। घर में कोई कमाने वाला नहीं था।
- 45:25शंकराचार्य ने अलख जगायी। और जब देखा उस ब्राह्मणी ने विधवा
- 45:38ब्राह्मणी ने तो डरी कप मेरे पास तो कुछ भी नहीं है और शंकराचार्य
- 45:47द्वार पे खड़े। और एक घर पे जाते हैं।
- 45:50उसे मालूम उसने सब कुछ उथल पुथल कर दिया।
- 45:58कहीं कुछ खाने को चीज़ ना मिले, कोई वस्त्र ना मिला, सारा मकान
- 46:05खाली था। अचानक उसकी दृष्टि एक आले के भीतर
- 46:15पड़ी एक आंवला के कच्चे फल पर पड़ी हरे फल उसने वो झट से उठाया
- 46:24जा के चरणों में लोटपोट। और वो भिक्षा पात्र में एक आंवला
- 46:31डाला, क्षमा प्रार्थना करने लगी के प्रभु आप अंतर्यामी हैं देक्ष
- 46:47मन तो ये था। कि सारा घर आपको भेट कर दो लेकिन
- 46:53था कुछ ने ढूंढा प्रयास किया। एक ये आंवला मेरी निगाह पड़ गई।
- 47:01बस यही कुछ था, मुझे मालूम भी ना था इसी को आप।
- 47:103600 प्रकार के पकवान समझकर स्वीकार कर लेना, प्रभु मेरी
- 47:15धृश्यता को क्षमा करना, मेरी लाचारी, बेबसी पर रहम कर।
- 47:27मैं विधवा हूँ, सिर पर कोई कमाने वाला नहीं बच्चा छोड़ता है
- 47:38शंकराचार्य अनंत शक्तियां के सिद्धियों के स्वामी तरस खाकर
- 47:49महालक्ष्मी को बुलाया। वाहन किया लक्ष्मी आग्रह परिणाम
- 47:58किया, पूछने लगी आदेश इस देवी के घर सोने की बारिश कब?
- 48:09तीन प्रहर तक इस देवी के घर में सोने की बारिश होती रही।
- 48:19अच्छी ने तीन प्रहर तक सोने की बारिश की।
- 48:23सारा घर बार सोने के सिक्कों से भरकर।
- 48:28श्रद्धा के लिए निहाल ओके न जाने के स्वरूप में नारायण मिल जाए
- 48:43पतन? के स्वरूप में नारायण दर्शन कोढ़ी
- 48:53के रूप में सुवर के रूप में पांवले कुत्ते के रूप में किस रूप
- 49:01में नारायण में ले जाएं? क्योंकि कण कण?
- 49:06खुशी से सराबोर है कण कण खुशी से ग्रसित है, उसके सिवा और कुछ भी
- 49:17नहीं और अंतिम दिन होती थी उत्तम। वाणी उत्तम ज्ञान आकृति ये,
- 49:39ग्यारहवें का यह प्रयूषण पर विलक्षण पर।
- 49:50सब मैल धुलजाते बिना सावन और बिना पन निंदा से बिल्कुल उड़ते ये भाव
- 50:06कबीर ने कहा निंदक नीरे राखी है आनंद कुटीर।
- 50:12बिन साबुन बिनवार के शकल में धुलजा इससे बिल्कुल उलट निन्दा से
- 50:21उलट क्षम प्रस्तुति नहीं निन्दा से उलटक्षम।
- 50:32क्षमा मांगलो चरणों के लिए, नींद के चरणों में क्या आपने मुझे
- 50:42जगाया? मैं खुद की तस्वीर न देख सकता था।
- 50:48मेरे पास कोई आइना ना था। तुम ही आयना बने, तुमने मेरी
- 50:54गलतियों को पापों को दिखाया, तुम्हारा लाख लाख धन्यवाद जी
- 51:02तिनमार्ण मुखिया शेख फरीद कहते हैं।
- 51:09जय तिन मारण मुखिया तिन ना मारे जो तुझे मुक्की मारता है घुसा
- 51:17मारता है उनको तुम बड़ा दंड मत देना।
- 51:25जी तनवार न मुखिया तिन नवारे कुम अपनडे कर जाइए पैर तिन के इचो
- 51:39उनके घर जाना और उनके चरणों में। लोट पोट होजाना उन शरणों को चूम
- 51:48ले तुम मुझे जगाने आए थे, मैं समझ नहीं पाया तुम्हारा धन्यवाद करता
- 51:57हूँ कि तुम मेरे लिए एक आईना बनकर आए, तुमने मेरी तस्वीर मुझे दिखा
- 52:03दी। जो मैं कभी देख नहीं सकता क्योंकि
- 52:07मेरे पास आईना नहीं, आईना सीधा दूसरा बनेगा और निंदा से बढ़िया
- 52:13कोई आईना होता निंतक ही तुम्हें दिखायेगा कि तुम कौन हो?
- 52:23निंदा की ही तुम्हें बताएगा कि तुम्हारी सूरत सुंदरता से भरी या
- 52:30गले सड़ तुम कैसे हो या निंदा की ही तो बताएगा तो कबीर कहते हैं कि
- 52:39उनको तो तुम पास ही भला लेना। आंगन कुटी छवा अपनी कुटिया में
- 52:46अपने आंगन में आसन बिछा के बिठा लेना, उनकी सेवा सु सु करना और
- 52:55पूछना कि ज़रा और बताओ मेरे भीतर क्या क्या दुर्गुण हैं?
- 53:05अब पनडे कर जाइए, पैर चना दे चुन उनके घर चले जाकर उनके पांवों को
- 53:13चूम लेना। बड़ी मेहनत की तुमने इतनी दूर
- 53:17अपने घर से चलकर मेरे घर तक आए। जैन धर्म का ये प्रदूषण पर्व
- 53:27विश्व भर में इसका कोई मुकाबला ऐसा पर्व पर्व कहते है उत्सव से
- 53:41बड़ा उत्सव कोई नहीं। कुंभ के मेले में हम शरीर धो के आ
- 53:50जाते हैं लेकिन यहाँ तो मन भी धोना होता है।
- 53:56कुंभ से ज्यादा मूल्य रखता है ये पथ।
- 54:04यद्यपि मंत्र तो यही था। वहाँ पर भी हर हर गंगे आपने डुबकी
- 54:13लगाई और मन में ये विचार आया शुरू से ही दोहराया जाता था।
- 54:19कि डुबकी लगा वे सारे पाप आपके धुल जाएंगे, नष्ट हो जाएं, समझाया
- 54:26गया था और जैसे ही आप डुबकी लगाते हो, मान लेते हो कि सारे पाप वो
- 54:32धुल गए थे, व्यर्थ का बोझा था आपके दीमक पर जो हो गया हो तो हो।
- 54:39वापस ईश्वर और ईश्वर की बनाई सृष्टि उसको आपका पुरस्कार या दंड
- 54:50अवश्य दे, लेकिन कम से कम इस कर्ता के भाव को तो छोड़ दो कि
- 54:57मैंने किया। जो हो गया हो गया अब कर्ता के भाव
- 55:02से तो निवृत्त हो जाओ। अब इतने हल्के हो जाओ कि मैंने जो
- 55:07किया वो किया ही नहीं, वो हुआ। सभी धर्मों में ये जो पर्व मनाए
- 55:20जाते हैं, इनके गहरे अर्थों में यही छुपा मिलेगा।
- 55:25आपको सिख धर्म में लंगर लगाने की बांटो।
- 55:45बराबर का पड़ोसी भूखा है तुम उसको जलाओ मत दिखाके के मेरे पास इतना
- 55:53कुछ है, जलेगा बेचार अज्ञानी। भी हो सकता है दिखाना इस दृष्टि
- 56:08से मत दिखा के वो जले आज आप मेकअप कराके जाते हैं।
- 56:25दुनिया को जलाने के लिए नए वस्त्र डाल के जाते हो सुंदर सुंदर फैशन
- 56:32बदलते हो इसके मूल में क्या है? जड़ में क्या है?
- 56:36दूसरे को जलाना दूसरे को दुखी करना।
- 56:40और जैसे ही तुम्हें ये सोचा के दूसरे को दुखी करना है, ध्यान
- 56:44रखना, प्रकृति तुम्हें पहले ही दुखी कर देती।
- 56:50आज जो तुम आके चिल्लाते हो, संतो के क्षण में बाबा दुखी हूँ, बहुत
- 56:56दुखी हूँ अवश्य ही आपने। बेहोशी के क्षणों में ये दुख पाला
- 57:05होगा अर्जित किया होगा। तुम्हारा ही अर्जित किया हुआ दुख
- 57:09है, आज वापिस लौट रहा है। ये गेंद तुमने ही दीवार के साथ
- 57:15पटकी होगी जो वापस तुम्हारे पास आ रही है।
- 57:20अब रो मत, अब, चिल्लाओ मत बाखुशी भोगलो और इतना ही अगर आप इससे पाठ
- 57:32सीखलों के आगे से दोहराना मत इस कृति को क्योंकि इसने दुख दिया।
- 57:42आखिर के जन्म ब्रह्मचर्य पर्युषण पर्व के आखिर में ब्रह्मचर्य
- 57:53ब्रह्मचर्य का अर्थ है सब कुछ कर दो।
- 57:58सत्य भी, अंसा भी, कष्ट भी, अपिग्रह भी, सोच, संतोष, तप,
- 58:07अध्याय सब कुछ कर लिया और अंत में हम कैसे हो गए।
- 58:16ब्रह्म जैसे हो गए जैसे ब्रह्म सभी के लिए समान होता है, उसकी
- 58:27उत्पत्ति का सामान सभी के वास्ते होता है।
- 58:31हम छीन लें, हम बांट लें आपस में। कुछ व्यक्ति मिल के ये दोष लगेगा।
- 58:42ये पाप है, महा बाप है पुरूषण पर्व का कुल इतना ही महत्त्व था
- 58:52और आखिर में ज्ञान। ब्रह्मचर्य से आगे ज्ञान जीस,
- 58:59कर्म से तुम्हें दुख मिलता है उसकी पुनरावृत्ति मत करना, फिर
- 59:07फिर से उसे दोहराना मत क्योंकि तुम्हें एक बार दिख गया।
- 59:12के इसके कर्म के करने से मैं जला तुमने एक बार आग में हाथ दे दिया
- 59:19जल गया क्या तुम बार बार जानबूझकर आग में हाथ देते हो नहीं देते तुम
- 59:26समझ जाते हो की आग में हाथ देने से जल जाता है हाथ।
- 59:34आगे से इतना सा सबक ले लो के इस कर्म को फिर दोहराना मत बस इतना
- 59:45ही काफी है जितना कर लिया उसका कर्ता भाव अर्पित कर दो।
- 59:52गुरु बनाने का कुल मात्र एक आंतरिक उद्देश्य यह भी था
- 1:00:00सर्वधर्माण प्रतिज्ञमा में कम शरण व्रत गुरु की शरण में चले जाओ हम
- 1:00:07तवांग सर्व पाप्य भ्योह मोक्ष स्वामी महासूच।
- 1:00:11मैं तुम्हें सभी प्रकार के पापों के बोझ से मुक्त कर दूंगा और
- 1:00:16तुम्हारा कल्याण कर दूंगा ही अर्जुन आंतरिक रहस्यता आपके
- 1:00:23कर्तार्पन के भाव को समाप्त करना। और जैसे ही करतापन का भाव समाप्त
- 1:00:31होता है तुम्हारी सारी जिम्मेदारियां खत्म तुम भोगता भी
- 1:00:36तो नहीं रहते? कर्म को भी होते हुए देखते हो
- 1:00:42अपने से अलख? भोगते हुए भी अपने से अलग देखते
- 1:00:48हो। मन और शरीर को अलग देखते हो?
- 1:00:53कर्ता भाव जैसे ही खत्म हुआ वैसे ही शरीर जो करेगा।
- 1:01:00सुख होगा, दुख होगा, कष्ट होगा, पीड़ा होगी, रोगी होगा, सब
- 1:01:07देखोगे, दूर खड़े एक दर्शक की भांति एकदृष्टता की जैसे कर्ता
- 1:01:17में कर्ता भाव नष्ट होते हुए। आपने उन क्रियाएं को होते होते
- 1:01:23देखा तो किया तो नहीं? सर्कमस्टैंसेस के कारण ऐसा हो
- 1:01:34गया। परिदृश्य ऐसे बने पर स्थितियां
- 1:01:38ऐसी बनी। के मुझसे हो गया।
- 1:01:44ऐसे ही जब उसका फल आएगा तो आप देखोगे दूर सड़क के ऊपर आती जाती
- 1:01:52ट्रैफिक की समान के जे दुख आया मुझ पर नहीं आया।
- 1:01:57मैं देख रहा हूँ। यही था इसका अंतरिम लक्ष्य कर्ता
- 1:02:10भाव से मुक्ति सांसारिक रिश्तों से अलग भी एक रिश्ता होना चाहिए।
- 1:02:22साक्षी सांसारिक रिश्ते में आप कर्म करते हो लेकिन इनसे अलग भी
- 1:02:32एक रिश्ता होना चाहिए। कर्म करते हुए भी तुम साक्षी हो
- 1:02:38होते। हुए देखो और भौंकते हुए भी देखो।
- 1:02:44इसका कुल मंत्र यही था तुझसे कुछ और तालुक भी जरूरी है मेरा तुझसे
- 1:02:55कुछ और तालुक भी जरूरी है मेरा। ये मोहब्बत तो किसी वक्त भी मर
- 1:03:02सकती है तुमसे कुछ और ताल्लुक भी जरूरी है मेरा ये मोहब्बत तो किसी
- 1:03:12वक्त भी मर सकती है ये करतापन। का भाव का नष्ट हो जाना जरूरी है।
- 1:03:24ये मोहब्बत तो किसी वक्त भी मर सकती है।
- 1:03:32ये प्यार का लम्हा जैसे हम कर्ता भाव में बदल लेते हैं, ये तो कभी
- 1:03:37भी खिसक। दूसरा रिश्ता भी बनाओ।
- 1:03:42कर्मों से जुदा होने का मैं करता नहीं हूँ करता भाग पुरूषण पर्व का
- 1:03:51इतना ही महत्त्व था। धन्यवाद।