Latest / Baba ji Vijay Vats / 13 May 26 - अष्ट चिरंजीवी का रहस्य! ब्रह्म मुहूर्त में 'अमृत तत्व' को जानने का प्रयास कैसे करें? V Imp
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- 0:15कपिल शर्मा बाबा जी प्रणब एक श्लोक का रहस्यत्मक अर्थ प्रकृत
- 0:34करने का कष्ट कर। अश्वथमा बलिर्व्यासो हनुमाश
- 0:43विवेचना कृपया परशुरामश्य सप्तयते चिरंजीवन।
- 0:56यह सात नाम है जो इसी श्लोक में आते हैं वस्तु तह आठ नाम गिना
- 1:13जाता है चिरंजीवी आठ है। इस दुविधा को दूर कीजिए।
- 1:27सत्यतान संस्मरणा नृत्यम मार्कण्डयम अर्थ अष्टकम जीवेद
- 1:40वर्ष क्षतम। सो अपि सर्व व्याधी विर्ज्यतः।
- 1:50मैं सुव्यवस्था हूँ तो इन सातों का स्मरण किया था याठों का स्मरण
- 2:00किया था। इस श्लोक में सात अमर हैं।
- 2:14आठवां अमर मार्कंटक जी को बना दिया था।
- 2:23कृपा करके मेरी इस दुविधा का अनवारण की इच्छा है।
- 2:28यह दुविधा बहुत लोगों की है। आइए थोड़ा शांत होके बैठ जाइए,
- 2:46समझिए यह श्लोक कहना क्या चाहता है?
- 2:52प्राणों के शलोक मैंने पहले भी आपको बताया उस जलेबी की तरह है जो
- 3:03बाहर से थोड़ी मुड़ी लगती है, लेकिन उसके भीतर हो रहा होता है।
- 3:17सात मर है की आठम है। आज तक अभी जो व्यक्ति इस प्लेनेट
- 3:33पर विद्यमान है। जो नए हुए उनकी संख्या बढ़कर 2424
- 3:42हो गई। अब समझिए श्लोकास्त क्या है?
- 3:51तुम शब्दों से चिपट जाते हो और मैंने बहुत बार कहा।
- 3:59शब्दों से मत चिपटना, शब्दों से चिपटना, या किसी पदार्थों से
- 4:06चिपटना, तुम्हें अम्रता तक ले जाने में बाधा बनता है।
- 4:16यह शलोक तुम्हें इंगित करता है जैसे ये लोग अमर हो गए, वैसे तुम
- 4:25भी अमर हो जाओ सब तैइतान संस्मरण नित्यम।
- 4:34इन सातों का रोज़ संशमरण करने से मार्कंडयम अर्थ अष्टममम और
- 4:45मार्कंड आठम हो गया और उसके बाद तो न जाने कितना होगा और इसमें
- 4:53प्रथम। एनलाइटन पर्सन ऑफ दिस प्लानेट
- 4:57शिवा का नाम शिव बाय दी फर्स्ट एनलाइटन पर्सन आईएस दी फर्स्ट
- 5:08एनलाइटन पर्सन ऑफ दिस, प्लानेट दे हैप्पी विद्यमान।
- 5:16ये श्लोक कहता है कि सुबह उठकर जब तुम शक्ति और चेतना से भरे हुए
- 5:25हो, आनंद का मदहोशी का आलम। तुम में फूट फूट जा रहा है तब तुम
- 5:37उस अमरतत्व को जानने का प्रयास करना, उस तरफ निकल जाना क्योंकि
- 5:46सुबह सुबह तुम फुल एनर्जेटिक रात भर का विश।
- 5:52श्रम सारी इन्द्रियों का और रिपेर सारे मसल्स की टिश्यूज़ की और
- 6:00नूरन यही वो वेला है जीस वेला को ऋषियों ने भ्रम वेला कहा।
- 6:12और मैं तुमसे बहुत बार कहता हूँ। जब नींद खुल जाए तो ब्रह्म विला
- 6:22और यह प्रत्येक व्यक्ति की अलग होगी।
- 6:26कोई 3:00 बजे बिलकुल। करो, ताजा महसूस करे और कोई 10:00
- 6:32बजे महसूस करेगा। इसमें शरमाने की बात नहीं 10:00
- 6:37बजे तक सोओ मजेस्ट क्योंकि प्रकृति से नाराज होना या प्रकृति
- 6:45के विपरीत चलना। यही वो कारण है जो तुम्हे अपने
- 6:52अंत में जाने नहीं देता। तुम सुबह उठकर शेरों वाली के
- 7:00दर्शन करने निकलते हो तुम सुबह उठकर।
- 7:06उस सड़े। हुए व्यक्ति के दर्शन करने 1:30
- 7:09बजे निकल जाते हो, जिसका शरीर भी पंचभौतिक तत्वों से बना हुआ है,
- 7:15उसमें कोई खासियत नहीं और उसने स्वयं को जाना भी नहीं।
- 7:21बस वह सिर्फ तुम्हें गुमराह कर रहा है।
- 7:30पढ़नी चाहिए उसे जूतियां दे देते हो, तुम उसे सन्नमान यह प्रथा
- 7:41तुम्हारी निराली है और यह प्रथा आई इन शब्दों को पकड़ लेने से।
- 7:48फिर आप बोले ही गए ना सात होते हैं या आठ, अब गिनती में उड़ गए।
- 7:5836,00,000 से ऊपर की संख्या है जो आज तक एनलाइटन पर्सन हुए।
- 8:05कौन होता है एनलाइटन पर्सन? जिसने ये जान लिया कि मैं वह तत्व
- 8:13हूँ जो कभी मरता नहीं नैनम चेदन ती शस्त्राँ नैनम उदाहती पावका
- 8:22नचैनम क्लेदन त्यापू न सुश्यति। अमर हूँ अज़हर हूँ मैं जलता नहीं
- 8:30मैं मरता नहीं, मैं ना मरूँ मरेह सं सारा मोहे मिला जिला बन हारा,
- 8:39कबीर कहता फिर कबीर का नाम क्यों नहीं रहा?
- 8:44नानक का, मेरा का? ओह, सुकन हमारे बिलकुल ताजा ताजा
- 8:51हो के गया फिर जगत थुस्त कहाँ जाएंगे?
- 8:55लाउड से च्वांगत से यह किसी से नहीं में रखा गया।
- 9:05अष्ट अमर नहीं है। जब ये लिखा गया था दोहा तो अष्ट
- 9:11हम उसी याद आ गया होगा। असल में यह श्लोक तुम्हें एंकित
- 9:16करता है। उस अमर तत्व तक जीसको तुम एक बार
- 9:23जीते जी जान लो। तो श्रद्धा के लिए तुम व्याधी
- 9:28मुक्त हो जाओगे, श्रद्धा के लिए तुम रोग मुक्त हो जाओगे, श्रद्धा
- 9:34के लिए तुम समस्याओं से हीन हो जाओगे, एक बार उस तत्व को जान लो।
- 9:43और वह तत्व तुम्हारे ही भीतर हैं। कह रे बनु सा बनो में सिर्फ वनों
- 10:00में नहीं होता होता है वनों में। में भी होता है, लेकिन तुम्हारे
- 10:05घर में भी उतना ही होता है तो ना सात ना आठ जीस वक्त लिखे गए थे और
- 10:17जीस ने ये लिखे थे। उन्होंने स्वयं के अमर तत्व को
- 10:22पहचान लिया। कहाँ जाएंगे यज्ञ बल का?
- 10:29कहाँ जाएगी गार्की कहाँ जाएंगे शंकराचार्य, कहाँ जाएंगे रैदास
- 10:43शिरशस्थ? धरती का वो सतारा जिसे हम भूल
- 10:53जाते हैं, सिर्फ इसलिए कि वह चमार्थ।
- 11:11तुम शरीरों से अमरतत्व को मापने चले हो, इसलिए भेद रहित कभी हो
- 11:20नहीं पाते सर, यह तो चाहे कृष्ण का हो, कबीर का हो।
- 11:28यज्ञबल का हो? गार्गी का वो शरीर तो से बीते
- 11:31जाए। यह सत्य है डेथ हिस्सा अल्टीमेट
- 11:38ट्रुथ ऑफ लाइफ ज़िन्दगी का यह शाश्वत सत्य है।
- 11:46यह पंचवोतक शरीर तो 1 दिन से गैटर होगा, विघंडित होगा और तुमने इस
- 11:58शरीर में रहते हुए अपनी चेतना की यात्रा।
- 12:05मोड़ देनी है उल्टी तरफ बाहर से अंतर्मुखी हो जाना है, अभी तुम
- 12:13बेहर्मुखी हो अभी तुम्हें धन चाहिए अभी तुम्हें भोजन चाहिए अभी
- 12:22तुम्हें। अनेक बहूविद प्रकार के स्वाद चने,
- 12:29लेकिन ऋषित मैं कहते हैं बहर मुखी से अंतर्मुखी हो जा अंतर्मुखी
- 12:41सुबह सुबह होना पड़ा। क्योंकि अंतरमुखी होने के लिए
- 12:50वृहद शक्ति की आवश्यकता होती है। वह शक्ति तुम्हारे पास सुबह सुबह
- 13:04होती है सुबह जगु। भ्रम वेला में तुम्हारी जब वहाँ
- 13:11खुल गई, तो वही अमृत वेला है, वही भ्रम वेला है, वही भ्रम मुहूर्त
- 13:22है, फिर तुम मुहूर्त करो, उस दिशा में मुड़ जाने का।
- 13:29जीस दिशा में तुम आगे पांव बढाओगे और आगे जाकर तुम्हें वह अम्र तत्व
- 13:35मिलेगा तुम उससे लिपट जाना और उसकी गोती में बैठकर खूब रोना।
- 13:47बहुत ही जनम बीत है मेरे माता ए जन्म तुम्हारी लिख है कब जागोगे
- 14:00तुम बहुत सॉरी है। ना सात अमर है ना आठ अमर है।
- 14:15जब यह लिखा गया तो इतने ही अमरों की पहचान थी, लिख दिया लेकिन इसके
- 14:26भीतर एक सिम्बोलिक रीप्रिजेंटेशन। विद्यमान है जिसे हम अब्रीवेशन
- 14:32कहते हैं। सुभा की ब्रह्मवेला में उस अमृता
- 14:40की तरफ अग्रसर हो जाओ उस अमृता की तरफ प्रथम स्टेप उठाओ।
- 14:49जो तुम्हारा गंतव्य शतल है गंतव्य शतल जाने के तुम हो, तुम ही हो
- 15:00तत्व मसीह श्वेत के तुम ही हो श्वेत के तो कोई दूसरा नहीं।
- 15:09तुम राधा में उसे ढूंढने की चेष्टा मत करना, राम और कृष्ण में
- 15:14उसे ढूंढने की चेष्टा मत करना, अपने गुरुओं की आकृति में उसे
- 15:19ढूंढने की चेष्टा मत करना, इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ बहुत सुन लिया
- 15:25छह वर्ष हो गए मुझे सुन। अब तुम जैसी सुविधा है तुम्हारे
- 15:33पास उसी सुविधाओं के साथ अंत में मुड़ना शुरू कर दो।
- 15:46अब नहीं तो फिर कब करोगे मौसम? सुहाना है फिजाओं का रंग रंगी
- 15:59ठंडी हवाएं बह रही हैं ग्रीष्म की ऋतु है।
- 16:06हल्की हल्की मदहोशी है फिजाओं में और चेतना और शक्ति से भरपूर हो।
- 16:15सुबह सुबह सारी रात विश्राम किया है अगर अब तुम पहला कदम ना उठा
- 16:25सके। तो फिर सारे दिन में उम्मीद मत
- 16:29रखना क्योंकि फिर तो तुम खो जाओगे कर्जो में फर्जो में और तुम उस
- 16:42तरफ कदम न उठा सकोगे। बिल जद भी तो?
- 17:06बिल जद भी? मिली है फरी।
- 17:13ना तो तेरे मुख जी किताबें ले बैठा।
- 17:28मैनू तेरा शबाब ले। बैठा अगर एक बार भी तुम्हे उस रस
- 17:39ने घेर लिया, उस शबाब से तुम कभी मुक्त नहीं हो पाओ।
- 17:50यह ऋषि वचन तुम थोड़ा इस महक को नासा कुटों में जाने तो दो फिर
- 18:01देखना तुम कैसे बहर्मुखी से अंतर्मुखी।
- 18:05कैसे नहीं होते? तुम उस वेला का इंतजार करोगे, कब
- 18:13वह वेला आये और कब मैं बहर्मुखी से अंतरमुखी हो जाऊं?
- 18:20दिन भर में भी जब तुम्हें वक्त मिले।
- 18:23समय समय पर बाहर के कामों से तुम टूटकर निर्लिप्त होकर अपने अंत
- 18:32समय उतरना और वह अमरतत्व की तरफ यात्रा शुरू कर देना।
- 18:43धीरे धीरे तुम पाओगे, एक लक्षण आएगा तुम्हारे बेहतर वो लक्षण
- 18:52होगा ठहराव का तुम मालूम पड़ोगे जैसे तुम्हारी वाणी में ठहराव।
- 19:04तुम्हारे चरित्र में ठहराव आ गया, पारदर्शिता का तुम नहीं झूठ बोलना
- 19:18कम कर दिया। तुम्हारे पग सत्य की ओर बढ़े
- 19:26असंतो मा सत्गा मेस तमसो मा जो तर्का मेस यही संत ब्रह्मात्मा से
- 19:37मांग करता है। ऋषि यही मांगता है प्रभु मुझे
- 19:42अंधकार से प्रकाश की तरफ ले जा मुझे असत्य से सत्य की ओर ले जा,
- 19:48यह तो मैंने कुछ नहीं पाया। संसार में पदार्थ के सिवा और कुछ
- 19:54सुविधाओं के सिवा और कुछ और सुविधाओं में रस नहीं।
- 19:59उत्तेजना उत्तेजना में सुख नहीं होता इसलिए हे प्रभु मैं थक गया।
- 20:11इन भोगों से थक गया और 1 दिन तो हमें भोगों से वेरा गिर जाता है।
- 20:20बैराग का मतलब तुम्हारा नाक मुड़ जाता है जैसे तुम बीमार हो और
- 20:30तुम्हें विशेष प्रकार का खाना पसंद है।
- 20:38और तुम्हारा भीतर का मन है, कुछ नहीं खाने का तुम्हारा मन पसंद
- 20:44व्यंजन तुम्हारे सामने परोसा जाता है तुम्हारा नाक मर जाता है, तुम
- 20:51कहते हो नहीं भूख नहीं। उसे ही वैरागी कहते हैं।
- 21:00नाक का मुड़ जाना जीस चीज़ की तरफ तुम मचल मचल जाते थे जीवा उसके
- 21:09स्वाद के लिए लप लपाती थी। भल्ला पकोड़ा।
- 21:16चाउ में चिपका आज वह सामने पड़ा है प्रचुर मात्रा में और तुम्हारा
- 21:27नाक है के मुड़ क्या है। अष्टवकृ से ही वैराग्य कहते हैं,
- 21:39जब संसार से मन मुड़ जाए और उस अमृत तत्व की तरफ तुम गतिमान हो
- 21:50जाओ। पहला कदम तुम उठा लो।
- 21:54वैराग्य के बाद पहला कदम उठे ही जाया करता है क्योंकि यात्रा जैसे
- 22:01ही वैरमुखी से अंतर्मुखी होगी, वह वैराग्य के क्षणों में।
- 22:07तुम एक अद्भुत शांति और ठहराव का एहसास पाओगे तुम्हारी स्वासें ठहर
- 22:15जाएँगी तुम्हारी स्वासें देर तलक को रुकेंगी तुम इतने मचल मचल नहीं
- 22:24जाओगे भुखों के लिए। भोगों से मन व्रत हो गया।
- 22:30भोगों से नाक मुड़ गया। यही कहते हैं अष्टावक्र भोगों से
- 22:40दुख पैदा होता है। शांति नहीं मिलती क्योंकि भोग
- 22:47उत्तेजना देते हैं। उत्तेजना में शांति कहूँ, निर
- 22:54उत्तेजना में शांति का बाधवा होता है और शांति के उस क्षण में तुम
- 23:03अपने भीतर उतरते हो। शांति शांति दोहराने से शांति
- 23:10नहीं होती, नाक मुड़ जाने से उस तरफ जाने से शांति पैदा होती है,
- 23:18ठहराव से शांति पैदा होती रेपेटिशन से शांति नहीं पैदा होती
- 23:26रेपेटिशन में तो तो। तुम और तेजी से दौड़ना शुरू कर
- 23:30देते हो। सात मर नहीं, आठ उम्र नहीं, अमर
- 23:44तो 36,00,000 से भी ज्यादा हो गई, लेकिन इसमें बहुत गहरा तत्व।
- 23:56वो तत्व ही छिपा है। सुबह सुबह जो नित्य इनको स्मरण
- 24:02करता है वह इन जैसा ही हो जाता है।
- 24:14सब तईतान संस्मरण नृत्यम इन सातों का जश्न वह स्मरण करता है याद
- 24:26करता है बस मतलब इशारा है। इस इशारे को पकड़ लो।
- 24:37संस्मरण नित्यम देखिये निरंतर चलना है चरई भैति चरई भैति निरंतर
- 24:48चलना है बहर्मुखता से अंतर्मुख्ता की।
- 24:57यह निरंतरता बनी रहे, ऐसा कोशिश करना है।
- 25:06मार्कंडेय अष्टमन आठ आठ मा। मार्कंडेय भी हुआ।
- 25:16जो लिपट गया शंकर की पिंडी के साथ मैं नहीं मरूंगा जीवित वर्ष खत्म
- 25:31सो आप। वह 100 वर्ष तक जीता है जो सुबह
- 25:36सुबह इनको याद करता है। नित्य सर्व व्याधि बेवर्जेतह और
- 25:45उसको कोई व्याधि भी नहीं होता। दैहिक दैविक भौतिक तापा, रामराज
- 25:51नहीं कायो व्याप उसको कोई व्याधि नहीं होती ना दैहिक, ना दैविक, ना
- 25:59भौतिक। क्या अर्थ होगा इसका?
- 26:06जैसे ही तुम बहर्मुखता को त्याग देते हो, धीरे धीरे और उतना ही
- 26:14अंतर्मुखता में जाना शुरू कर देते हो और ध्यान रखना।
- 26:18सुबह सुबह ये काम आसान होता है जो लोग।
- 26:30रागों में दिलचस्पी रखते हैं वो यह अवश्य जानते होंगे के राग का
- 26:37एक काल होता है। उस काल में वह राग बहुत फलदायी।
- 26:48और बड़ी आसानी से कहा जा सकता है। रात भर अंधेरा रात भर का है।
- 27:10मैं है माँ अँधेरा किसके रोके रुका है सवेरा।
- 27:27किसके रोके रोका? यह राग जोगिया का है।
- 27:42इसको गाने का वक्त सोभा सोभा होता है।
- 27:50जो व्यक्ति राग से थोड़ा राग रखते हैं वो जानते हैं के हर राग का एक
- 28:00अनिश्चित समय होता है जब वह उस समय में गाया जाए।
- 28:08तो बहुत फलदायी होता है। तुम्हारे पूरे प्राण उस राग में
- 28:15निहित हो जाते हैं तो यह जोगी या राग सुबह 4:00 बजे से 7:00 बजे तक
- 28:23का समय है। इसका किसके रोके रोका है सब मेरा?
- 28:287:00 बजे सुबह हो जाएगी रात भर का है महिमा अंधरा।
- 28:39लभ पे शिकवाना ला, अश्क पीले। लब पे शिकवाना ला भी हो कुछ देर
- 29:01जी ले जीस तरह भी हो। कुछ ले रुजीले अब।
- 29:13उखड़ने? को है।
- 29:16हम कडेरा किसके रोके रोका रहे? सवेरा रात भर का है, मैं है माँ
- 29:35अँधेरा। रात जोगिया।
- 29:43इसी तरह उस अमर तत्व की ओर मुड़ने का समय ब्रह्ममूर्त होता है।
- 29:52ब्रह्ममूर्त जब तुम पूरे तरो ताजा हो गए, बस सुबह उठो।
- 30:01जलपान करो चाय पिलो कोई बात नहीं, आराम से बैठ जाओ नथिंग टू डू कुछ
- 30:09न करो भरपूर शक्ति है चेतना जगी हुई है यही वेला है अपने भीतर।
- 30:22पहला कदम उठाने का चुक मत इसे चुक मत जाना।
- 30:31ऋषियों ने यही इंगित किया था। इस वक्त को चूक मत जाना और वह
- 30:42वक्त किसी वक्त से संभव संबंधित नहीं है।
- 30:49कोई 3:40 पर अब नहीं होता है तो कुछ।
- 30:57गणितज्ञ लोगों का गलत मैथेमेटिक्स था, गलत गणना थी, ऐसा कुछ नहीं
- 31:05होता। ध्यान का संबंध तुम्हारी लज्जत
- 31:15से। यह सेवा के तुम लज्जत की ओर मुर
- 31:20जाओ और लज्जत का महा समुद्र तुम स्वयं हो और तुम स्वयं इस शरीर के
- 31:32भीतर बैठे हो। बाहर भटक रहे हो मात्र बाहर से
- 31:40तुम डिग्रीधारी तो हो जाओगे बाहर से तुम सूचनाओं को एकत्रित करने
- 31:47में तो सफल हो जाओगे धन कमालोगे पद्विक कमालोगे मान प्रतिष्ठा
- 31:54कमालोगे। लोगों में आपका नाम हो जाएगा,
- 31:57लेकिन तुम रोखे सूखे विदा हो जाओगे, संसार कुछ हाथ न आया
- 32:06तुम्हें फिर फिर से इस संसार की पाठशाला में भेज दिया जाएगा।
- 32:12इसे ही संसार इस चक्कर कहते हैं। तो उस वक्त उठ जब तेरे साथ शक्ति
- 32:27है रात को तुम जान में नहीं जा सकोगे क्योंकि रात में तुमने दिन
- 32:33भर के क्रियाकलाप करके शक्ति खोदी है।
- 32:41विषय विचारों को भोग लेने के बाद तुम ध्यान में ना उतर सकोगे।
- 32:50तुमने कभी सोचा क्रोध के क्षणों के बाद तुम देखना कभी ध्यान में
- 32:57बैठ के। असंभव जैसा लगेगा।
- 33:01तुम्हें इस क्रोध से मुक्ति मिले। तुम मस्तिष्क का नूरन शांति से
- 33:11भरे तो तुम अपने भीतर की यात्रा का पहला कदम उठाओ, क्रोध में तुम
- 33:18जल उठते हो। क्रोध में तुम्हारे भीतर विषाक्त
- 33:22हार्मोन से जमघन में जाते हैं ज़रा ज़रा उस जहर से परेशान हो
- 33:31जाता है, फिर क्रोध ही रुक जाए, इतना ही काफी है।
- 33:40उस वक्त तुम उम्मीद रखना नेक्स्ट टु इम्पॉसिबल असंभव है कि इस वक्त
- 33:49तुम क्रोध के क्षणों में से गुजरते हुए तुम अपने अंतर की
- 33:54यात्रा को शुरू कर लो, नामुमकिन है।
- 33:57इसलिए संत ने कहा कब जाना है पहला कदम सुबह सुबह जब अभी कोई लहर
- 34:06नहीं उठी जब अभी झील मौन है परम मौन है।
- 34:14जब अभी झील में किसी ने कोई कंकड़ नहीं फेंका, शांत है।
- 34:25कश्मीर की डल झील की तरह अभी किसी ने कोई कंकड़ नहीं फेंका।
- 34:30कोई लहर नहीं उठी। अभी मौका है।
- 34:40हर चीज़ का मौका होता है तो ब्रह्म मुहूर्त में तुम ब्रह्म की
- 34:51तरफ़ जाने का मुहूर्त है वो वह विराट की तरफ़ यात्रा पर निकलने
- 34:59का मुहूर्त है। तुम किसी जन्त्री से पंडित जी से
- 35:03मत पूछने लग जाओ, मैं तुम्हें बता देता हूँ जब मन निस्तरंग है सुबह
- 35:13सुबह सारी रात का जोड़ा हुआ धन शक्ति के रूप में।
- 35:21और चेतना के रूप में तुम्हारे भीतर संग्रहित है और तुमने जर्रा
- 35:25भी नहीं खोया है तो जलपान कर लेना और फिर आराम से व्यर्थ जाना अपने
- 35:38अंतश में उतरने के। लिए कोशिश नहीं करना नथ्थिंग टु
- 35:46डू बस बैठ जा, आराम से बैठ जा, लेट जाओ, बैठ जाओ क्योंकि नींद तो
- 35:56अब आएगी नहीं। नींद तो सो रही है तुम सारी रात
- 36:04तुम बैठ सकते हो दीवार से पीठ लगा लो तकिया रख लो शरीर को कष्ट नहीं
- 36:11देना वह बेगाना है वो तुम नहीं इस वाहन को।
- 36:18संभाल के रखना है। ये बड़ी मुश्किल से मिला है।
- 36:25तुम्हें कर्मी आवे, कपड़ा नजरी मुख्य द्वार या उसकी मेहरबानी से
- 36:31तुम्हें मानस का चोला मिला है, इसको परेशान नहीं।
- 36:38करना है। इसको संभाल के रखना है और ध्यान
- 36:43रखना तुम अति कर देते हो। हर चीज़ की एक्सेस ऑफ़ एवरीथिंग
- 36:48इस बेक तुम या तो इसका ध्यान नहीं करते।
- 36:53तुम बिलकुल उपेक्षित छोड़ देते हो।
- 36:57और उपेसी छोड़कर तुम इसकी प्रवाह ही नहीं कर तुम धन जुटाने में जुट
- 37:03जाते हो, मान सम्मान जुटाने में जुट जाते हो, या तो तुम इतने
- 37:10लापरवाह हो जाते हो या इतनी परवाह करते हो कि तुम इसी को सजाने में
- 37:15लग जाते हो। प्रत्रिपुड़ सजाते हो फिर यहाँ तक
- 37:19के दाढ़ी को भी। पीली रंग लेते हो?
- 37:23माथे को भी पीला कर देते हो। यह मेकअप है तो दोनों ही
- 37:30स्थितियों में तुम चूके, चाहे तुम्हें श्रृंगार किया।
- 37:36चाहे तुमने उपेक्षा की दोनों ही स्थितियों में तुम चूक गए, मैं
- 37:43कहता हूँ मध्य में ठहर जाओ, ना दिखावा करना है ना इसको तंग हाल
- 37:53ही में रखना है इसको जैसा है। बस शुद्ध और स्वच्छ रखो तो सुबह
- 38:02सुबह तुम भरे पड़े हो शक्ति से और चेतना सारी रात भर उस ताजगी को
- 38:09तुमने पिया, उसकी करीबी में तुम बैठकर आनंद को चखें।
- 38:15उसकी शीतलता को तुमने माना, वही वक्त है उसी के पास फिर लौट जाने
- 38:22का वह तुम्हें बुलाता है। हैलो के आजा मेरे मी।
- 38:41आ लौट के आजा मेरे में तुझे मेरे भी बुलाते हैं मेरा सोना पड़ा रे।
- 38:57संगीत मेरा सुना पड़ा रे संगीत तुझे मेरे ही बुलाते हैं हैलो।
- 39:15के आजा। मेरे में रोना कैसा है जीवन का
- 39:28खेला एक पल है मिलना एक पल बिछुड़ना।
- 39:38दुनिया है 2 दिन। का मेला एक पल है।
- 39:46हसना एक पल है रोना कैसा है जीवन का खेल?
- 39:56एक पल है मिलना एक पल भी छोड़ना दुनिया है।
- 40:042 दिन का मिलना ये घड़ी ये घड़ी ना।
- 40:13जाए भी। ये सुबह सुबह का ब्रह्ममुर ये
- 40:19घड़ी बीत न जाए। ये घड़ी न जाए तुझे मेरे गीत
- 40:31बुलाते हैं। मेरा सुनना बड़ा रे संगीत मेरा
- 40:42सुनना बड़ा रे संगीत तुझे मेरे भी बुलाते हैं।
- 40:55आ लौट के। आजा।
- 40:58मेरे में। यह जो अनहद की पुकार है यह तुम्हे
- 41:05नल तरह पुकारी जाती है, आ जाओ आ जाओ।
- 41:12ये घड़ी न जाए एक बात समझना ब्रह्ममूर्त नाम की कोई चीज़ नहीं
- 41:21होती समय के हिसाब से तुम्हारी स्थिति के हिसाब से।
- 41:29तुम्हारी ताजगी के हिसाब से ब्रह्मुत्र होता है व्हेन यू आर
- 41:36फ्रेश एंड फ्री वो हैप रमेश जब तुम्हारी चेतना लबालब भरी है,
- 41:43आनंद। कोई दुख नहीं, कोई तकलीफ नहीं,
- 41:48कोई लहर नहीं उठी अभी सब शांत है, मैं बोल रहा हूँ उस घड़ी को चुने
- 42:02बैठ जाना, आराम से। बाकी अभी दिन निकलेगा अपने काम
- 42:12धाम बाद में कर ले सुबह पहला काम ये करना है और यही तुम्हारा पहला
- 42:19काम है क्योंकि यह है तुम्हे? तुम्हारे लक्ष्य तक पहुंचा देगा।
- 42:25तुम्हारा लक्ष्य तुम स्वयं ही हो। यू अरे यूरसेल्फ़ युअर टारगेट ऑफ़
- 42:33लाइफ यू अरे यूरसेल्फ़ युअर ऐम ऑफ़ लाइफ लोग कहते हैं ज़िन्दगी
- 42:41को कोई लक्षण। उन्हें पता नहीं तुम स्वयं ही
- 42:47लक्ष्य हो, तुम्हारी ज़िन्दगी का तुम्हें तुम तक ही पहुँचना है।
- 42:54बस यही है तुम्हारी ज़िन्दगी का लक्ष्य तुम तुम्हीं को दूर कर
- 42:59बैठे हो। और तुमने तुम्हारे ही करीबाने और
- 43:06करीबाने का इससे बढ़िया मौका और कोई नहीं होगा सारे दिन अन्यथा इस
- 43:12घड़ी को चूक मत जाना जे घड़ी ना जाए गीत तुझे मेरे गीत बनाते हैं।
- 43:21मेरा सुनना पड़ा रे संगीत मेरा सुनना पड़ा रे संगीत तुझे मेरे।
- 43:36मिल बुलाते आलू। लौट क्या कहाँ चला गया बाहर
- 43:48बहर्मुखी हो गया तू लौट ले वापस हो जा विपरीत दिशा में चल।
- 43:56बहरहमुखी से अंतर्मुखी होना लौट के आना होता है।
- 44:01तू तेरे घर को जो छोड़ के गया था बरसों बीत गए बहुत जनम बीत है
- 44:07मेरे मात्र एम् जनम तुम्हारे लेखे इस जनम में तुम मुड़ जाओ लूट जाओ
- 44:14अपने घर की और ये घर तुम्हें बुलाता है यह तुम्हारे बिना सोना
- 44:26पड़ा तुम्हारे सभी साज तुम्हारी विणा तुम्हारे सभी साज संगीत
- 44:36तुम्हारे बिना सोने पड़े। तुम अपने घर में लौट जाओ और लौटने
- 44:42की यही तो घड़ी है। अगर अब चूके तो फिर सारा दिन तो
- 44:47तुम काम धाम में और जाओगे फिर तो तुम शक्ति को निरंतर खोओगे और रात
- 44:54को तुम में इतनी हिम्मत नहीं होगी।
- 45:00तुम शक्ति और चेतना से लबालब भरे नहीं होगे।
- 45:06वह गलत समय में गाया हुआ राग है, वह तुम्हारी अंत चेतना को जगाई।
- 45:19लौट के चल जहाँ से आया था याद कर रिमेम्बर योरसेल्फ, यही वेला है
- 45:29अपने आपको रीमेम्बर करने का। तुम्हें लौटना ही होगा 1 दिन आज
- 45:38नहीं कल चुक गए या गवलक को चुक गए कृष्ण को चुक गए बुध को चुक गए
- 45:51ओशों को लेकिन मुझे मत चोंक जाना। अगर मुझे चूक गए तो फिर पता नहीं
- 45:57कौन आएगा। फिर कहीं ऐसा ना हो कि वह पाखंडी
- 46:04निकले। वह लोभी, लालची निकले।
- 46:08उसको खुद को ही संज्ञान ना हो कि वह है कौन मुश्किल हो जाता?
- 46:17फिर तुम अधूरे अधूरे श्रद्धा विश्वास शुरू पीढ़ो तुलसीदास की
- 46:22तरह कहोगे तुम, लेकिन मार्ग मार्ग कौन दिखाएगा?
- 46:30अगर मार्ग है तुम्हारे पास और श्रद्धा?
- 46:33विश्वास नहीं है तो फिर भी तुम आधे अधूरे अगर किन्ही मस्तों की
- 46:40टोलियों को देख कर तुम में श्रद्धा विश्वास उत्पन्न हुआ तो
- 46:46फिर मार्ग कहाँ से लेके आओगे? जहाँ बुद्ध जैसे व्यक्ति भी होते
- 46:54हैं जो अपने आप का आपवा जानकर ठहर जाते हैं तुम्हें बतलाने के लिए
- 47:02और बुद्ध के ही वंश राहुल भी होते हैं, जो अपने आप को जानने के
- 47:09फ़ौरन बाद। फुर्र हो जाते हैं।
- 47:13उनमें इतनी तुम्हारे कल्याण की भावना नहीं, उनके भीतर तुम्हारे
- 47:21को बदलने की भावना नहीं। उनके भीतर तुम्हारे प्रति करुणा
- 47:31नहीं। बुद्ध तुम्हारे लिए बोले 40 वर्ष
- 47:40बोले, लेकिन राहुल तुम्हारे लिए 1 मिनट में नहीं बोल पाया।
- 47:50फिर अगर कोई अपने आत्म अवलोकन भी कर लिए, लेकिन वह आत्म अवलोकन
- 48:00करने के फौरन बाद चला गया तो फिर तुम क्या करोगे?
- 48:09तो बड़ी मुश्किल से आता है ऐसा संयोग जब तुम्हारे भीतर जगने की
- 48:22अंतकाक्षा भी है मुँह मुक्षा भी है कि मैं जान जाऊं।
- 48:29हू एमआइ और करुणा भी है गुरु के भीतर कि तुम्हें जाता दें कि तुम
- 48:37हो कौन वहाँ संयोग भिड़ता है वहाँ माइनस और माइनस मिलकर प्लस हो
- 48:47जाता है। इसको योग कहते हैं और इसको संयोग
- 48:51कहते हैं। मुद्दों बात हजारों साल हजारों
- 49:03साल नरगिस अपनी बेनौरी पे रोती है।
- 49:09बड़ी मुश्किल से होता है। चमन में जीता भर पैदा यह संयोग
- 49:14रोज़ नहीं बैठता। अगर एक पल भी चूक गए तो फिर अगले
- 49:22पल क्या होगा कोई पता नहीं, कोई जानता नहीं।
- 49:30अगर इस वेला को चूक गया तो फिर तुम तरस हो गए वो मुक्षा को लिए
- 49:41फिरोगे लेकिन तुम्हें राह दिखाने वाला कोई नहीं।
- 49:50फिर उस राजा गंगासिंह की तरह कहोगे, तो मुझे राजा तो कह दोगी
- 49:58माते, लेकिन गंगू कहने वाली मर गई।
- 50:07तुम मुझे गंगो। न कह सकोगे।
- 50:22तरसे है मन अब तो आजा बरसे गगन मेरे बरसे नयन देखो तरसे है मन अब
- 50:39तो आ। शीतल पम लगाये लगन।
- 50:50ओह सजन अब तो। मुखड़ा दिखा सा।
- 50:58बरसे नयन बरसे गगन मेरे बरसे नयन देखो तरसे है मन अब तो आजा शीतल
- 51:14पमंगे लगाए। अगन?
- 51:19ओह सजन अब तो मूकड़ा दिखा जा तुने।
- 51:27भली रे निभाई प्री। बहुत अच्छी प्रीतन भाई तुने लेकिन
- 51:35हम चुक गए। चूक गए, हम अज्ञानी थे, हम बाहर
- 51:43के दर्पों को इकट्ठा करने में फिरते रहे, भूल गए कि यहाँ ही
- 51:47धराशायी हो जाएगा तो। उन्हें भली रह निभाई।
- 51:55प्ले तुझे मेरे गीत बुलाते हैं मेरा सोना पड़ा रे संगीत।
- 52:17मेरा सुना बड़ा रे संगीत तुझे मेरे की बुलाते हैं आ लौट के आ जा
- 52:31मेरे में। लौटा वापस लौटा जीस राह से गया था
- 52:37बाहर उसी राह से लौटा वापस मुड़ के उसी स्थान पर उदगम स्तर पर आजा
- 52:47जहाँ से तू अपने आपको छोड़ा था वो ही है तेरा असली मुकाम।
- 52:56तो सात उम्र हैं, आठ उम्र हैं। मैंने तुम्हें बहुत बार कहा,
- 53:00शब्दों से मत चिपट जाना। संतों ने शबद दिए, तुम्हें इंगित
- 53:07किया, इशारे दिए तुम इशारों को मत पकड़ लेना।
- 53:11इशारों के टॉप को मत खंगालने लग जाना तुम नहीं पाओगे यहाँ चंद्रमा
- 53:18को इशारों के स्ट्रीट लाइन में देखना ऊपर आसमान की तरफ तुम पाओगे
- 53:24शरद पूर्णमा का चंद्रमा। अपनी पूरी दमक के साथ फूल मून
- 53:35शीतलता को बखेर रहा है और तुम आनंद से भाव विभोर हो जाओगे।
- 53:44पहली दफे तुम्हें पता चलेगा इस संसार की।
- 53:48वस्तुस्थिति है। क्या तुम अभी अपने आपको सुद्र
- 53:56समझे और ऋषि कहते हैं कि तुम सुद्र नहीं?
- 54:02ब्राह्मण तुम ब्रह्म हो, तुम विराट हो, तुम विशाल हो, तुम्हारा
- 54:07कोई और छोड़। तुमने अपने आपको चार दीवारियों
- 54:12में कैद कर लिया है और ऐसे ही तुमने अपना परमात्मा भी बना लिया
- 54:19है। तुमने स्वयं के अस्तित्व को अपने
- 54:24शरीर की चारदवारी में कैद कर लिया।
- 54:28तुम संस्कारित हो गए हो प्रत्येक चीज़ को कैद करने का तुमने अपने
- 54:38भगवान को भी चारदवारियों में कैद कर लिया जबकि वह चारदवारियों से
- 54:45बाहर। विराट विशाल ब्रह्म विस्तार में
- 54:53उतर जाओ और वह संभव होगा भ्रम की वेला में छोड़ो गिनतियों को ना
- 55:03सात में है ना आठ में है। तुम अमर होने का शुरू करो महिम
- 55:15तुम अमर होने का पहला कदम उठाओ कौन अमर हुआ ये हिसाब लगाना बंद
- 55:22कर दो, यह है बुद्धि की शरारत। बुद्धि शरारतें रचती रहती हैं कि
- 55:29कहीं ये मुझे छोड़कर अपने अंतःस्थ में ना उतर जाए और तुम्हें देखा
- 55:37सब मिट जाता है, खोपड़ी बच जाती है।
- 55:47हम जब दफन कर देते हैं मुर्दा तो तुम 246 महीने के बाद देखना सब
- 55:57माटी में विलीन हो गया, खोपड़ी मची।
- 56:01अंतिम दम तक यह खोपड़ी अपने आप को बचाने का प्रयास करती ही रहेंगी।
- 56:08हर हाल में यह मरना नहीं चाहती, बस यही है अर्चन तुम्हें तुम्हारे
- 56:15भीतर जाने की और तुम इसे ही मित्र मान बैठे हो?
- 56:23यही दुविधा है। आचार्यों की यही दुविधा है सर
- 56:30लोगों की संसार में इनके काम आते। संस्थान के हाथ मजबूत हो जाएंगे।
- 56:41लेकिन संस्थाएँ यहीं धरी रह जाए और जो कहती थी संस्थाओं के हाथ
- 56:50मजबूत करो वो भी माटी के भीतर रूलते खुलते फिरेंगे।
- 56:55तुम्हारे कदमों के नीचे कौन जाने? आज वह महा सिकंदर जो कहता था यह
- 57:02धरती तो मैं 7 दिन में जीत लूँगा, उसके बाद मैं क्या करूँगा?
- 57:13उसकी खाक आज तुम्हारे कदमों के तले रौंदी जा रही है।
- 57:21और यह वहीं सिकंदर है जो कहता था उसके बाद मैं क्या करूँगा?
- 57:30सिकंदर को बढ़ा रहा है। उसका टीचर बोगोर को बोगोर को बता
- 57:39रहा है। यह फला क्षेत्र जहाँ फला क्षेत्र
- 57:44यहाँ एशिया है या अमेरिका है यूरोप है सब समझा रहा था रोने लगा
- 57:51सिकंदर गुरु ने पूछा रो क्यों रहे हो सिकंदर?
- 58:01कोई दुख रहा है शरीर, कोई सर्व पेट कुछ दुख रहा है क्या?
- 58:08क्या दवाई वगैरह दिला दे? मुख्य तन्ने फिर क्यूँ रो रहे हो?
- 58:15मैं रो रहा हूँ अगर धरती इतनी छोटी है।
- 58:19तो इस धरती को तो मैं 7 दिन में फतह कर लूँगा और आश्चर्य चक से
- 58:28आँखों से देखता हुआ गुरु उसे निहारता रह गया, और उसके बाद मैं
- 58:34क्या करूँगा, गुरुदेव? सात दिनों में ऐसे जीत लूँगा,
- 58:40इतनी छोटी धरती है, मैंने तो कहा बहुत बड़ी होगी, तुम्हे भी ऐसा ही
- 58:47लगता है, अभी मैं एक नंबर हो जाऊंगा लेकिन एक नंबर तो हो
- 58:56जाओगे? एक नंबर होकर भी तुम एक नंबर ना
- 59:03हो पाए, एक नंबर होकर भी तुम एक ना हो पाए।
- 59:09अद्वैत ना हो पाए। अभेद ना हो पाए तो फिर क्या खाके?
- 59:25एक होने की तरफ पहला कदम सुबह सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठाया
- 59:29जाता है। वह ब्रह्म एक है।
- 59:32बाबा नानक समाधि से बाहर आए। उन्होंने कहा, एक अहंकार संत जीस
- 59:41तल पे पहुंचता है। ऋषि जीस स्तर पे पहुंचता है वहाँ
- 59:47उदघोष होता है एको ब्रह्मा द्वितीय नास्त कोई संत एक स्थान
- 59:58पे पहुंचता उदघोष करता अहम ब्रह्मास्म।
- 1:00:03द्वितीय नाश्ते कोई एक मंसूर उस तल पे पहुँच के कहता है अनल हक
- 1:00:20मैं ही खुद खोता हूँ, दूसरा कोई नहीं इन सबके भीतर एक बात तुम्हें
- 1:00:26कॉमन मिलेंगे। सांझी एक है।
- 1:00:30दूसरा कोई नहीं तुम एक उस एक की तरफ प्रस्थान करना शुरू कर दो आज
- 1:00:38और मैं तुमसे इजाजत लूँगा। ये घड़ी न जाए भी।
- 1:00:51ये घड़ी ना जाए बीत तुम्हें मेगी बुलाते हैं।
- 1:01:04मेरा सुनना पड़ा रे संगीत मेरा सुनना पड़ा रे संगीत एक तुम्हें
- 1:01:17मेरे गीत बुलाते हैं।