Latest / Baba ji Vijay Vats / 22 May 25 - मुक्ति के मार्ग में जो भी चीज़ बाधा बनती है वह अशुभ है! स्वर्ग और नर्क क्या है? गीता - अध्याय 9.
Transcript
- 0:04प्रणब बाबा जी नीदरलैंड्स से। मीरा पुश्ते हैं।
- 0:18श्रीमद्भागवत गीता के नौवें अध्याय का इक्कीसवां।
- 0:23श्लोक। व्हेन दे हैव 10 एन्जोएड वास्ट
- 0:33हेमली सेंस प्लेज़र एंड। दी।
- 0:37रिज़ल्ट्स ओएफ देयर फायर्स एक्टिविटीज़ आर एडजस्टेड दे
- 0:45रिटर्न। तो दिस मोर्टल प्लानेट।
- 0:48अगेन दोज़ हू सीक सेंस एंजॉयमेंट। बी एगरिंग टू दी प्रिंसिपल ऑफ दी
- 1:00थ्री वेदस अचीव ओनली रिपीटेड बर्थ एंड डेथ एंड व्हेर दे एन्जॉय थे।
- 1:13हमली प्लेज़र ओएफ देयर ट्वाइस। एक्टिव टेस्ट।
- 1:29नौवें अध्याय का इक्कीसवाँ श्लोक। ते तम बुकतवा स्वर्गलोकं विलास
- 1:41विशालम। क्षीणें पुण्य।
- 1:45मर्तलोकम बिशन्ति एवं त्रैधर्मं अनुप्रपणना गतागतम कामकामा लग्न।
- 2:08विशाल स्वर्गलोक के भोगों को भोगकर।
- 2:13पुण्य क्षीण होने पर। मृत्युलोक में पुनः आ।
- 2:18जाते हैं वे लोग जिन्होंने पुण्यकर्म?
- 2:22किए होते हैं। इस प्रकार।
- 2:27तीनों वेदों में। कहे हुए शय।
- 2:31काम, धर्म का आश्रय। लिए हुए।
- 2:35भोगों? की कामना करने वाले मनुष्य आवागमन
- 2:39को। प्राप्त होते हैं।
- 2:53संसार कर्म और भोग की शाला है, जो जैसा कर्म करेगा वैसा ही फल।
- 3:07पायेगा? कृष्ण?
- 3:10भगवान गीता में से। कहते हैं पाप करोगे दुख, मिलेगा
- 3:18पुण्य। करोगे सुख मिलेगा।
- 3:26भगवान कृष्ण कहते हैं। कि जो लोग।
- 3:33ध्यान से समझने जैसी बात। यहाँ पर सुख।
- 3:44नहीं पा सकते ध्यान। दीजिएगा।
- 3:49बात। जो लोग यहाँ पर परिपूर्ण सुख नहीं
- 3:55पा। सकते वो?
- 3:58तीनों वेदों में लिखे। हुए।
- 4:00सहकाम कर्मों का अनुपादन। करके स्वर्ग।
- 4:07लोक के भोगों को भोगना चाहते। हैं।
- 4:15बाप कहते हैं स्वर्ग है। और कृष्ण भगवान कहते हैं।
- 4:27के स्वर्ग लोगों का। भोग करता है गुनाह।
- 4:34इस मृत लोक। में आ जाते हैं।
- 4:39ये क्या है आइए। इसे समझने की जेस्टक।
- 4:55शर्क क्या है? सुख नर्क क्या है दुख?
- 5:09स्वर्ग में दुख। नहीं है नर्क में।
- 5:12सुख। जहाँ दुख है वहाँ?
- 5:19सुख नहीं है जहाँ। सुख है वहाँ दुख।
- 5:23है और भगवान। कृष्ण कहते हैं कि।
- 5:30आदमी कर्म करने में। प्रताप है कर मन्य वाद्य का रस
- 5:35है। लेकिन एक।
- 5:41बात का ध्यान रखना। किसी भी श्लोक।
- 5:45को व्याख्यायित करने से। पहले सत्य को।
- 5:52विचार में जरूर ले लेना। कर्म ने।
- 6:00अधिकार से कर्म करना। मनुष्य तेरा अधिकार।
- 6:07और कर्म। का फल एक बार बीता है।
- 6:18फिर अक्सर लोग कह। देते हैं।
- 6:23गीता के। शलोकों को ना समझते हुए उन शलोकों
- 6:28का। हवाला देकर स्वर्ग और नर्क को।
- 6:38होने का दावा। कर देते है स्वर्ग का अर्थ।
- 6:45क्या है जिसमें सुख है? और नरक का।
- 6:52अर्थ है जिसमें दुख है। दीज़ वर थे सिम्बोलिक
- 6:59रेप्रेसेंटेशन्स। ये सिर्फ प्रतीकात्मक चिन्ह।
- 7:08नरक और सर्क दीज़। आर ओनली थे स्टेटस?
- 7:14ऑफ माइंड ज़रा सूचिया। आपने एक कर्म कर।
- 7:19दिया उसका। प्रणाम आपको दुख मिला?
- 7:30अब क्या? उस कर्म का प्रणाम।
- 7:33आपको नरक में जाकर। फिर से भुगतना पड़ेगा।
- 7:38अगर ऐसा है तो ईश्वर। वाकया भी न्यायकारी ना रहा।
- 7:46अगर एक। कर्म का फल दो बार भोगना।
- 7:49पड़ता है। तो भी वो अन्यायकारी।
- 7:51होंगे। और अगर एक।
- 7:56कर्म का फल भोगना। नहीं पड़ता तो भी।
- 7:59वह अन्यायकारी हो के। एक कर्म का फल।
- 8:05एक बार भोगना पड़ता है और जब वो उस फल को भोग।
- 8:12लेता है। मुक्त हो जाता है मनुष्य।
- 8:19जो भी कर्म करता है। उसके अधिकार में है और जैसा भी
- 8:27प्रकृति। के नियम।
- 8:29उसे फल देते हैं। और उसे चखना।
- 8:33पड़ता है और कर्म। और भोग की यह शाला यहाँ पर
- 8:44व्यक्ति आता है कर्म करता है। भोग भोगता है।
- 9:00पाप कर्म का फल दुख। और पुण्य कर्म का फल।
- 9:04सुख। वो आपने जहाँ फूंक लिया।
- 9:14एक राजा राज़ कर। रहा है।
- 9:21तुम कहोगे इसने कोई अच्छे कदम? है एक व्यक्ति हॉस्पिटल।
- 9:27में पड़ा करार रहा। है।
- 9:33सैकड़ों आधियाँ व्याधियाँ उसके साथ चिवड़ी हुई।
- 9:41दुख और दर्द से पीड़ा से। ग्रस्त है वह व्यक्ति पल।
- 9:47पल बेचैनी में गुजार। रहा है।
- 9:56आप कहो कि ये इसके। बुरे कर्म का परिणाम।
- 10:00है। कोई।
- 10:02अत्यंत बुरे दिये होंगे जो इसके इतने गंभीर बिमारी।
- 10:06ला इलाज। बीमार होंगे।
- 10:15पाप कर्म का फल। दुख होता है अगर आज ये हॉस्पिटल्स
- 10:25बढ़ गए हैं। तो आप सही ढंग से सोचेंगे, सही
- 10:31ढंग से सोचते नहीं। सोचेंगे तो?
- 10:35पायेंगे के हॉस्पिटल का बढ़ना डॉक्टर्स का बढ़ना पाप गर्म का
- 10:42बढ़ना पाप बढ़े तो बिमारी। आई?
- 10:49बिमारी आई तो डिमॅंड बढ़ी। डिमॅंड बढ़ी तो हॉस्पिटल।
- 10:56खोली? शुरुआत कहाँ से हुई?
- 11:00पाप पाप। कर्म दुख लेके आता।
- 11:06है। पाप।
- 11:08कर्म रोग लेके आता। है कष्ट पीढ़ा तकलीफ।
- 11:11लेके आता है। और वो आपको भोगना पड़ता है बिना
- 11:18भोंगे आप बचने। ये सारा शिष्ट।
- 11:24और सृजना एक। है।
- 11:31वह भुगतवा। लेता है उसकी कर्म।
- 11:34व्यवस्था आपसे कर्मों का भुगतान करवा लेती है।
- 11:43पुण्य। करोगे सुख मिला इसलिए?
- 11:52शांत कहते हैं। कि पाप मत कर।
- 11:58अगर करना ही है। तो बोल न कर।
- 12:04पाप मत कर क्योंकि पाप करने का परिणाम।
- 12:14ऐसा दुर्दांत। होगा।
- 12:17कि उसे सहने में। आप बहुत दुखी हो गए।
- 12:25आपसे सहना जा सकेगा। लेकिन पुण्य गर्मों।
- 12:29का प्राण। आप मज़े से सहन कर लोगे।
- 12:33पुण्य कितना भी कर। लो कितनी भी मात्रा।
- 12:39में कर लो कर्मभोग। की फिलॉसफी के ऊपर।
- 12:45आधारित। ये श्लोक।
- 12:51और फिर इससे आगे। कृष्ण कहते हैं।
- 12:54कि यहाँ के। भोगों से संतुष्टि नहीं होती
- 12:57मालूम। की यहाँ के भोग अल्प पड़ जाते हैं
- 13:02यहाँ के भोग। कम पड़ जाते हैं।
- 13:08तो फिर तीन वेदों में लिखे। हुए शैकाम कर्मों को।
- 13:15हवन यज्ञ दान। पुण्य करना शुरू कर।
- 13:18देता है व्यक्ति। क्यों?
- 13:22लोभवश लोभवश व्यक्ति। के यहाँ के सुख।
- 13:30तो मैंने भोग किया। किसी किसी के पास।
- 13:38पर्याप्त भोगों की सामग्री उपलब्ध होती है।
- 13:44यहाँ के भोग सारे भोग। सब देख लिया।
- 13:52तो फिर वेद तीनों वेद। अथर्व वेद को छोड़ दिया गया।
- 14:00यजुर वेद सामवेद रग, वेद। अथर्व वेद को छोड़।
- 14:07दिया गया। ये तीन वेद।
- 14:11सैकाम कर्म करने के। ऊपर आपको बल।
- 14:15देते हैं धर्म अर्थ। काम मोक्ष।
- 14:27तो इन वेदों में जो चीजें। लिखी हैं।
- 14:30जो उपाय लिखे हैं। अवन करो, यम करो, मनुष्य वो करता।
- 14:35है क्यों करता है? कि यहाँ किसो।
- 14:46फिर स्वर्ग के। सुख भोगो, स्वर्ग के सुख और
- 14:59स्वर्ग क्या है स्वर्ग? है खुशी का वो?
- 15:06क्षण? खुशी का वो मरहला।
- 15:12जहाँ कोई आपके आनंद। का और छोर रहता नहीं।
- 15:18उससे ज्यादा आनंद आप बर्दाश्त। नहीं कर सकते।
- 15:26भगवान कृष्ण के शब्दों। का जो भी अर्थ करेगा में भटक
- 15:32जाएगा। क्यों भगवान कृष्ण के शब्दों के।
- 15:38अर्थ बड़े गहरे में छिपे पड़े और गहरे तक तुम जाते हो।
- 15:49इसीलिए ही। गीता की 300।
- 15:52टिकाने हो जाती है और कोई कारण नहीं अपने मनपसंद की चीज़ पहलू हर
- 16:06एक। व्यक्ति उसमें से खोज।
- 16:08लेता है। और उसी।
- 16:11का विस्तार करना शुरू। कर।
- 16:12देता है उसकी व्याख्या करनी शुरू कर देता है।
- 16:20गीता अद्भुत। क्रम ऐसे शानदार शब्द।
- 16:27हैं इसमें। लेकिन इसके भीतर जाए।
- 16:37हो अब शर्क। की बात भगवान कृष्ण?
- 16:43मेरे पास रोज़ ऐसे। प्रश्न आप कहते हो?
- 16:47बाबा? जापना भगवान।
- 16:54कृष्ण कहते हैं कि यज्ञों में। सबसे श्रेष्ठ यज्ञ जापजज्ञ हूँ अब
- 17:01इसकी व्याख्या भगवान। कृष्ण ने।
- 17:08जप यज्ञ का अर्थ का कहा ये पता है आपको?
- 17:15नहीं पता। जब आप अरे।
- 17:19बुटीकियों को कहते हैं। भगवान कृष्ण।
- 17:25जप और रेपुटेशन। भगवान कृष्ण जप कहते हैं।
- 17:36वेलिन हो जाने को। मस्त।
- 17:39हो जा डूब जा, खो जा। मिट?
- 17:44जा मिल जा। तुम पुन रूक्ति।
- 17:50को कहते हो बस। कृष्ण के।
- 17:54शब्दों की यही दुविधा। है कृष्ण के शब्द।
- 17:59एक जगह काम नहीं। पढ़ते?
- 18:02मूर्खों के काम भी। पड़ते हैं।
- 18:05समझदारों के काम भी। पड़ते हैं।
- 18:20कृष्ण भगवान कहते हैं कि पुण्य। कर्मों का प्रभाव।
- 18:26तो तुम्हें स्वर्गलोक नहीं लेके जाएगा, लेकिन।
- 18:35तीनों वेदों में सह काम कर्मों। के जरिए किए गए।
- 18:40कर्मों का पल्प में। सरख के सुख दे।
- 18:42देगा वो कौन से? सह काम कर्म तीन वेद कौन से हैं?
- 18:56अथर्ववेद को छोड़ दीजिए यजव वेद और।
- 19:00ऋग्वेद और तीनो में सहकाम कर्मों की व्याख्या।
- 19:12और इनके द्वारा व्याख्यात कर्मों को।
- 19:14करने से व्यक्ति स्वर्ग। में जाता है लगता है।
- 19:23जैसे स्वर्ग एक भौगोलिक। स्थान।
- 19:29अगर स्वर्ग एक भौगोलिक। स्थान है।
- 19:37तो फिर वहाँ। किस चीज़?
- 19:38का भोग भुगता है। क्योंकि जो।
- 19:45कर्म आपने यहाँ कर दिया। अच्छा है बुरा।
- 19:52उसका फल आपने भोग। लिया।
- 19:57यजन किया, दान किया, ब्राह्मणों को भोजन करवाया, भूखों को आन।
- 20:02दिया। भिक्षकों को भिक्षा दी, यजन किया
- 20:13तुमने वातावरण शुद्ध। हुआ उसका फर्ज मिल गया।
- 20:22तुमने जीस दिन। किया लकड़ियां जलाई हवन सामग्री
- 20:28ग्रैत कपूर ये सारी। चीजें इतर।
- 20:35अग्नि में डाल दें। उससे जो वाष्प।
- 20:40पैदा हुआ। धुआं पैदा हुआ उसे।
- 20:43आपका बहुतो में निषद। होगा।
- 20:46फल मिल तो गया यजण से और क्या फल मिलता है?
- 20:57कभी समझा आपने? हवन से यजन से।
- 21:01क्या फर्क मिलता है? वातावरण शुद्ध हो जाता।
- 21:06है जैसे हम स्प्रे सिड़क देते हैं, खुशबू हो जाते।
- 21:13हैं। सुगंधी फैल जाते हैं।
- 21:18वैसे ही हवन पुराने। जन्म में प्राणी।
- 21:29वक्त में। हवन करके वातावरण को शुद्ध।
- 21:35करने का। नियन्त्र इसलिए बहुत से।
- 21:44शुभ कामों में। हवन का प्रयोग किया।
- 21:46जाता था। किसी के घर बच्चा।
- 21:50हुआ है कीटाणुओं को। खराब कीटाणुओं को नष्ट।
- 21:59करना है। हवन कराएं।
- 22:05शादी करना अग्नि के विरुद्ध। फेरेलिंग हवन एक।
- 22:20जगह पे काम। नहीं आता।
- 22:23कितने संस्कार हैं? अग्नि को उसमें प्रमुख रखा।
- 22:29गया और अंतिम संस्कार तो होता। ही है अग्नि से।
- 22:44हवन यज्ञ। भगवान कृष्ण कहते हैं।
- 22:49कि ये। तीनों वेदों में सहकाम।
- 22:51कर्म लेकिन प्रश्नकर्ता से। मैं ये बात।
- 22:58पूछता हूँ कि भगवान? कृष्ण स्वर्ग की बात।
- 23:06करते हैं सहकाम कर्मों की बात। करता हूँ।
- 23:12तीनों वेदों में जो। लिखा यजुर्वेद, सामवेद, हरिपवेद,
- 23:18सहकाम कर्मों के द्वारा। भू कर्म कर और शर्क को।
- 23:26के सुख को पर। और फिर जब वो।
- 23:31भूल लेगा तो वापस आ जाएगा कहाँ वापस आ?
- 23:37जाएगा। थोड़ा सा इस गुत्थी को सुलझाने की
- 23:45चेष्टा करें। जितना धन आपने।
- 23:52एकत्रित किया है पुण्य का। जब वो हम खर्च करते।
- 23:57जाते हैं, भोगते जाते। हैं 1 दिन।
- 24:02खत्म हो जाता है। हमने जो भी कर्म।
- 24:06किए पुण्य कर्म किए। वेदों द्वारा विहित।
- 24:11कर्मों को पुण्य कर्म बताया भगवान कृष्ण ने।
- 24:16और। पुण्य कर्म का फल।
- 24:17सुख होता है। और एक बात और समझा।
- 24:25अगर। कृष्ण की।
- 24:26ही बात पूछने चले। तो कृष्ण ये भी कहते हैं कि सुख?
- 24:32बांधता है दुख बांधता। है सुख और दुख से पार।
- 24:42हो जाना मुक्ति। कृष्ण ये भी कहते हैं।
- 24:47कि अच्छे कर्म, सोने की बढ़िया। बुरे कर्म लोहे की।
- 24:52बढ़िया लेकिन दोनों हैं। बढ़िया, तो तुम वेद विहित कर्म
- 24:59कर। लो तीनों वेदों में लिखे हुए।
- 25:03वेदों के अनुसार। पुण्य कर्म कर लो हवन।
- 25:06कर लो यज्ञ कर लो दान कर। लो पुण्य कर लो, ब्राह्मणों को
- 25:12भोजन करवा दो दान दक्षिणा दे दो तो कृष्ण कहते हैं यह पुण्य कर्म।
- 25:24सह काम कोई इच्छा है आपकी काम सहित।
- 25:29है तो आप कर्म करते हो और काम सहित कर्म।
- 25:35किया तो उसका फल। आपकी इच्छा पूरी करने में होगा।
- 25:40स्वर का अर्थ यहाँ सुख। है।
- 25:48जब आपके वो किए हुए। पुण्य कर्मों का संचय।
- 25:55क्षीण। होता है धीरे धीरे भोगने के कारण।
- 25:58पुण्य भीग क्षीण होते हैं भोगने से।
- 26:01पाप। भीग?
- 26:02क्षीण होते हैं भोगने। से।
- 26:05इसीलिए तो व्यक्ति एक। दिन सभी पुराने पाप और पुण्य
- 26:10कर्मों से मुक्त हो। जाता है।
- 26:13कैसे होता? है।
- 26:13निर झिरा कैसे होती है। भोग का भोग।
- 26:18बिना छुटकारा। और इसलिए भगवान कृष्ण कहते हैं ये
- 26:23पुण्य भी बंधन है क्यों? क्योंकि भोग कर ये भी जानें
- 26:28पड़ेंगे तो फिर जिसने। तुम्हें ठहरा।
- 26:32लिया तुम्हारे रास्ते का। पत्थर न हो।
- 26:43जिसने तुम्हें रोक। लिया यात्रा से।
- 26:47जिसने तुम्हें अपने गंतव्य। मुक्ति की ओर ना जाने दिया उसने
- 26:56तुमने रोक लिया। और जो आपको मुक्ति के मार्ग?
- 27:02में जाने से रोके। उसको शुभ मानोगे या अशुभ मानोगे?
- 27:12जो आपको बाँध ले आप कहीं जाना। चाहते हो स्वतंत्र बाजार में सैर
- 27:16करना चाहते हो? किसी देश विदेश।
- 27:19की सैर करना चाहते हो ये नीदरलैंड्स से मेरे पास कई बार
- 27:23आज। अगर आपको कोई रोक।
- 27:25ले वहाँ से हवाई। जहाज के ऊपर चलने ना तो आप कैसा?
- 27:31महसूस करो, बुरा महसूस करो और अगर।
- 27:39सुख का? पुण्य आपको रोक ले।
- 27:44फिर कैसे महसूस करो? मार्ग मुक्ति का?
- 27:52व्यक्ति मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर है।
- 27:56निरंतर जो भी चीज़। उस मार्ग में बाधा।
- 28:02बनती है। और सुख है या दुख है और जो बाधा
- 28:10है? वो अच्छे नहीं श्री कृष्ण कहते
- 28:16हैं पुण्य कर्म सोने की। पापकर्म, लोहे की बेटी?
- 28:25लेकिन बांध तीन दोनों। हैं ये?
- 28:34शलोक। मुक्तिदायक।
- 28:37शलोक। यह शलोक प्रसंग वश बहाव।
- 28:46के भीतर बोला गया। शब्द है।
- 28:51कृष्ण का कोई? मतलब नहीं था स्वर्ग और नक्श।
- 28:56कृष्ण का? कोई मतलब नहीं था।
- 28:58पाप और पुण्य बल्कि कृष्ण तो चाहते थे अर्जुन।
- 29:03पाप और पुण्य से। पार हो जाते।
- 29:05यही तो सोच। रहा था अर्जुन।
- 29:09इसी दुविधा में तो। फंसा होता तनस्यात्मा विनिश्चति।
- 29:15इसी ऊहा बुह में तो फंसना था जिसकी गोदी में बैठ के।
- 29:21एक एक भुरखी खाके। में बड़ा हुआ।
- 29:25जिसकी शस्त्र विद्या। सीखकर मैं आज श्रेष्ठ।
- 29:29धनुर्धर हुआ क्या उसी को? उन सिखाए हुए वणों।
- 29:36के कला से। घायल कर दूँ।
- 29:43जिसकी गोदी में। बैठ के मैंने भोजन किया।
- 29:51एक एक भुरकी खलाई। जिसने पिता मन।
- 29:59क्या? उसको अपने हास्य मार्ग।
- 30:02डरा अर्जुन, कहता है भगवान ये पाप ही नहीं है।
- 30:15ये घोर बात। है, तुम कहते हो?
- 30:20मैं गाढ़ी उठाऊं। मैं इसकी तरफ देखना भी नहीं
- 30:28चाहता। जो मेरे ही हाथों।
- 30:33से। मेरे ही पितामह का अंत।
- 30:38करवा दे मेरे ही गुरु का अंत। करवा।
- 30:43दो। जीवन छीन ले।
- 30:47वह मेरे लिए शुभ। कैसे हो सकता?
- 30:49है। बस कृष्ण।
- 30:52इसी दुविधा के अंदर। सारी गीता कोई?
- 30:56मतलब नहीं है स्वर। का कोई मतलब?
- 30:59नहीं उन्हें नरक। का?
- 31:02ये सिर्फ एक प्रवाह के भीतर बहती हुई धारा के अंग।
- 31:10कृष्ण को क्या मतलब? योग का क्या?
- 31:16मसला? भक्ति का क्या?
- 31:20मसला? हठ योग का क्या मतलब?
- 31:28सहज योग का? क्या मतलब?
- 31:31जो भी कृष्ण बोलते हैं। बहाव में गंगा वह रखी, कोई पत्ता
- 31:40घर गया वो भी साथ बहेगा। कोई तिनका करेगा।
- 31:44वो भी साथ बहेगा। कोई बड़ा सा लकड़ी का टुकड़ा कर
- 31:50गया। वो भी साथ रहेगा।
- 31:52सब बहा चला जाता। है और प्रश्न उठाता है और क्योंकि
- 32:01उसके गंतव्य तक लेके। जाना है।
- 32:06इसलिए उसके प्रत्येक। प्रश्न का जवाब सैटीक।
- 32:11उसी भाषा में देना। ही उचित है।
- 32:15अन्यथा वो कृष्ण? कहीं नहीं कहते नहीं।
- 32:25कृष्ण अर्जुन से। कहीं नहीं कहते।
- 32:31कि अर्जुन तेरी ये शंका तेरा ये सवाल।
- 32:37गलत है इतना वर्ष कहते हैं। कि तू?
- 32:45जो सोच रहा है वो गलत है। क्योंकि तेरी दृष्टि गलत।
- 32:51है। तू सोचता है तेरे।
- 32:55मारने से ये मर। जायेंगे वस्तु?
- 33:00स्थिति ये है कि। तेरे मारने से ये मरेंगे।
- 33:04क्योंकि जो। तू इन्हें देख।
- 33:06रहा है अपनी। इन जक्षों से वो जी हैं कृष्ण जी
- 33:13ही समझाने की चेष्टा करते हैं। आखिर तक?
- 33:19रास्ते में जो गंगा। वही?
- 33:23वो मात्र बही अगर। प्रथम दृष्टया अर्जुन समझ जाते इस
- 33:29बात को। तो सारी गीता बोलने की।
- 33:32जरूरत नहीं थी। कोई आवश्यकता नहीं थी।
- 33:37मंतव्य पूरा हुआ। लक्ष्य पूरा हुआ।
- 33:47अगर अर्जुन। धनुष को पहले उठा लेता।
- 33:50अगर अर्जुन। पहले बोल देता नष्ट।
- 33:53मोहा। समृत्तर लग्था मुझे याद आ गया।
- 34:07मेरा मोहन नष्ट होके। मेरा भ्रह्म नष्ट।
- 34:10होगा ये ल्यूज़न नष्ट? होगा।
- 34:18मुझे स्मृति आ गई। कुछ भूल गया था मैं भगवान।
- 34:23क्षमंक स्मृति लफ्था नष्टो। मोहा मेरा मुँह नष्टो।
- 34:34मेरे बीच का पुल टूट गया। ये झूठा।
- 34:38था। थिस इल्लुसिओन।
- 34:42वास्फर्ज़, यह भ्रम था। झूठा था।
- 34:48सत्यनीत। मैं इसे सत्य मान रहा था।
- 34:53यही मेरी गलती थी। अब मुझे हुक्म दे मैं कब स्वर्ग
- 35:07लोक की बात। शब्दों की बात है।
- 35:18अगर मैं। कहता हूँ स्वर्गलोक नहीं।
- 35:20है तो किसी कारण। से कहता हूँ क्योंकि।
- 35:30स्वर्गलोक में जो सुख। भोगना।
- 35:32होता है वो सुख? व्यक्ति यही भोग लेता।
- 35:36है। विशाल से विशाल सुख।
- 35:39तुम यहीं भोग। लेते हो तुमने?
- 35:44अभी वो मुकाम देखा। इसलिए तुम अभी कल्पना।
- 35:50भी नहीं कर सकते। यू कांट।
- 35:51इमेजिन ना तुम अभी कल्पना नहीं कर सकते।
- 35:56क्यों? क्योंकि तुमने वो मुकाम देखा ना
- 36:01वो मरहला तुमने छुआ। नहीं जहाँ स्वर्गों का स्वर्ग
- 36:06विराजमान और वो कहीं दूर नहीं है। वो सच खंड?
- 36:16जो लाखों आसन जो लाखों सड़कों को। शर्मसार?
- 36:20करते वो स्वर्ग जो लाखों सड़कों को शर्मसार।
- 36:29करते और तुम्हारे भीतर। और थोड़ा सा और करी बाजम वो
- 36:42स्वर्गों का स्वर्ग। तुम भोगों की बात।
- 36:47करते हो? यहाँ कम भोगते हैं।
- 36:52स्वर्ग में ज्यादा। भोग के तुम्हारे ही भीतर एक।
- 36:55ऐसा मुकाम काश तुमने देख लिया होता और मेरा सारा प्रयास तुम्हें
- 37:05उस तल पर ले जाने। का है जहाँ स्वर्गों का।
- 37:10महत स्वर्ग वहाँ विराजमान। वो सच खंठ जहाँ की।
- 37:21शोभा? जहाँ का आनंद सरोर मस्ती जहाँ की
- 37:29हवाएं। जहाँ की।
- 37:32शीतलता सुगंध तुम जब छू लेते हो। तो तुम्हें सुधबूत नहीं।
- 37:46रहती। यू कांट।
- 37:48एक्सप्रेस दी एक्सटसी। इतना भीषण।
- 37:54आनंद है वहाँ। इतना जबरदस्त आनंद है वहाँ।
- 38:04तो हरे बड़े से बड़े स्वर्ग। वहाँ शर्मशाल हो जाते।
- 38:15हैं। स्वर्ग को मानेकश यही।
- 38:19तो तू रहा है दो कारणों से स्वर्ग को मानेकश और नरक को मानेकश जब।
- 38:29नर्क यहीं हम देखते हैं पी जी आइज़।
- 38:32में एम्स में। हॉस्पिटल्स में।
- 38:36और गर्व में जब तुम्हारे दर्द हो जाता।
- 38:38है और डॉक्टर कह देता है कि ट्रेस हो गया इट्स कैंसर ऑफ दी फॉर्थ।
- 38:44क्लास। एंड यू कैनट एस्केप देम।
- 38:49एंड आई कैनट एस्केप। देम।
- 38:52इसे मैं बचा। नहीं सकता इसे तुम बचा नहीं सकते
- 38:55जाओ घर ले जाओ सेवा। करो क्या होता?
- 39:00है तुम्हारे हाथ में। नरक फीके पड़ जाते।
- 39:04हैं तुम इतने कष्ट में। जीसको यह तकलीफ हुई।
- 39:19जो इस। आग।
- 39:19में से गुजरा उसे पूछो नर्क दो होते।
- 39:24हैं या एक यह। संसार में ही नर्क।
- 39:28है या इससे भी बड़ा कुंबी पाग नर्क कहीं और।
- 39:36ये जो कैंसर के। फौड़ित में हो जाती।
- 39:38हैं उनके भीतर और होता क्या है ये कुम्भ भी बाकी।
- 39:43तो है ज़रा इनको चीरा लगा दे दो मवाद।
- 39:49नहीं करे। कहने के ढंग है।
- 40:00स्वर्ग। और नरक सुख और दुख स्वर्ग सुख का
- 40:06जात नरक दुख का जात अलग अलग बना। दिया।
- 40:13लेकिन स्वर्ग और नर्क दोनों तुम भौंकते हो स्वर्ग भी तुम भौंकते
- 40:20हो नर्क भी तुम भौंक जाओ। लेकिन एक परम स्वर्ग।
- 40:27की बात करते हैं। उसे तुम समझने पर उसे तुम्हारे।
- 40:32व्याख्याकार भी समझने। वो तुम्हारे भीतर।
- 40:42है और जब। संत अपने भीतर प्रवेश करता।
- 40:48है। और उस तल पर पहुंचता।
- 40:53है और तुम्हें क्या मालूम? कि उसके साथ गुजरता।
- 40:59है। बीतती क्या है उसके हृदय के?
- 41:06ऊपर करुणा की अपार धारा बहती और हाश।
- 41:17उसके ऊपर उठ जाता। है और संत।
- 41:25ऐसा आनंद से ग्रस्त। होता है।
- 41:29ये मीरा का नाच ऐसे। ही नहीं निकला।
- 41:31करता। ये नानक की वाणी से।
- 41:37प्रभु के गीत ऐसे। ही नहीं निकला करता।
- 41:42ये कबीर के मुखड़े। से सुरती के शब्द।
- 41:45ऐसे ही नहीं निकला। ये हँसते हँसते।
- 41:52सलीब ले लेते हैं। इस ऐसे ही नहीं लेते हैं कुछ
- 41:57देखा? व्हिच इस बियॉन्ड मोर्टन व्हिच इस
- 42:06ए मोर्टन जो अमृत है। जो मृतन है और मंसूर के हाथ पांव
- 42:16काट लिए जाते हैं। और ज़रा भी उसे दुख नहीं होता है
- 42:27दर्द। होता है, दुख नहीं।
- 42:31मुस्कुराता है हस्त है और कहता है।
- 42:38कि ये तो मेरा हाथ जीसको तुमने काट दिया।
- 42:44ये तो मेरा पांव था। जब मैं तो हूँ मैं तो ऐन्यूअल हक
- 42:52मैं तो वो हूँ। जो काटा जा नहीं।
- 42:55सकता। और आखिर में उसकी जेब काट ली।
- 43:00जाती है। फिर वो बोल भी नहीं सकता लेकिन।
- 43:05उसकी आँखों में खुशी की चमक। वैसी ही दिखाई।
- 43:09पड़ती है। उसकी आँखें बोलती हैं कि मुझे तो
- 43:17तुम फिर भी नहीं मार पाए नैनम सिदंती शास्त्र मुझे तो तुम फिर।
- 43:25भी नहीं मार। पाए।
- 43:28बोल नहीं सकता। इन्स्ट्रुमेंट छीन लिया
- 43:35व्यख्यायित। करने का वर्णन करने का
- 43:37इन्स्ट्रुमेंट छीन लिया। लेकिन मुझे कहाँ मार।
- 43:41पाए। मैं तो बराबर हूँ।
- 43:53उस पर हम स्वर्ग की बात कहते हैं। तुम्हारे इन भौगोलिक।
- 43:59क्षेत्रों के स्वर्ग। की बात।
- 44:01कृष्ण जैसा व्यक्ति। करें ये शोभा देता।
- 44:07है। शार्गिक सुखों की बात करें ये
- 44:14शोभा। दता है और स्वर्ग।
- 44:18के सुखों के लिए तुम। यहाँ वेद।
- 44:21विहित कर्म करके हवन। जजग करके उन सुखों को कमाओ।
- 44:28ये तो एक कमाई हो गई। ये तो एक जोड़ ना हो गया।
- 44:36और पतंजलि कहते हैं, अप्रिग्रह। महावीर कहते हैं, अप्रिग्रह।
- 44:45बुद्ध कहते हैं, अप्रिग्रह जोड़ों।
- 44:48मत। फिर काहे करने?
- 44:53वेद विहित कर्म काहे? करने जिसके मन में सुख की लालसा
- 45:00अभी शेष रह गई। वह व्यक्ति वेद विहित काम करेगा,
- 45:13वेदों में बताए गए कर्म वो करेगा। तीनों वेदों में सह।
- 45:17काम कर्मों के अनुसार वो कर्म करेगा और।
- 45:22सुख को प्राप्त होगा। लेकिन वो ध्यान रखना।
- 45:27वो भौगोलिक। स्वर्ग का सुख नहीं।
- 45:32तुम देख रही हो कभी किसी भूखे व्यक्ति को रोटी खिला के दिखाना
- 45:41जैसे जैसे। उसका पेट तृप्त होगा।
- 45:46वैसे वैसे तुम्हें। सुकून आएगा।
- 45:49हालांकि तुमने खाया कुछ नहीं तुमने दिया।
- 45:55सचमुच भूखा हो कई दिनों से। और।
- 46:01तुम उसे भोजन कराओ। जैसे जैसे उसके पेट।
- 46:06में वो भोजन जाएगा। बुर्के जाएंगे तपती।
- 46:11आएगी और वो ठंडक तुम्हें छूबेगी। ये चमत्कार है पेट।
- 46:22उसका भर रहा है। तृप्ति तुम्हें मिल।
- 46:26रही है शीतलता तुम्हें मिल रही है।
- 46:32पहले जमाने में लोग गर्मियों के बिस्तर ठंडे पानी का प्याऊ लगाते
- 46:38थे। प्यासा आदमी।
- 46:44दूर से आता गांव से आता पता। था शहर में प्याऊ मिल जाए और
- 46:51वहाँ। कोरे घड़ों के अंदर रखा शीतल पर।
- 46:55और पानी पिलाने वाला। पानी पिलाता, तब।
- 46:59तो हो जाता। संतुष्ट हो जाता।
- 47:03प्यास मिट जाती और। जिसने।
- 47:09ये कर्म करवाया ये पुण्य का काम खुलवाया।
- 47:16ठंडक उसके हृदय में पड़ती। ये सारा अस्तित्व एक शरीर।
- 47:25है। यहाँ अगर एक अंग को आराम मिलता
- 47:31है। तो उसका सुकून सारे शरीर को
- 47:36महसूस। होता है।
- 47:41उस अंध को मिला हुआ सुख। हमारे न्यूरोन्स महसूस करते।
- 47:48हैं और उसको बिखेर देते हैं। सारे शरीर और।
- 47:53अगर कोई अंगुली कट। जाए।
- 47:57चोट फिट लग जाए वह जो दर्द होता है।
- 48:02वह दर्द भी सारे शरीर। को भुगतना पड़ता है।
- 48:07चोट लगी ऊँगली को। सारी रात जागता है।
- 48:12पूरा शरीर। आदमी को जागना पड़ता है क्यों?
- 48:17क्योंकि ये सारा ढांचा एक। इसी तरह अभी।
- 48:21तुमने देखा जब देख लोगे? तो पाओ ईशा वश में सर्बम जत किंच।
- 48:30जगत याम जगत इस। जगत के कण कण में ईश्वर।
- 48:34है। फिर एक कण से दूसरा।
- 48:42कण अछूता कैसे रह सकता है? दर्द ऊँगली को हुआ।
- 48:51नींद तो में नहीं आई। सारा शरीर बेचैन रहा क्या?
- 48:57हुआ। क्योंकि ये सारा।
- 49:01शरीर एक है। एक ढांचा।
- 49:04है। ऐसे ही सारा।
- 49:06यूनिवर्स एक ढांचा। है।
- 49:12जो पिंडेसो ब्रम्हंडे। पुराने।
- 49:18ग्रंथों में ये शब्द? लिखा।
- 49:22आज भी लिखा है जैसे पिंड सारा इकट्ठा।
- 49:28है। वैसे ही ब्राह्मण।
- 49:31सारा इकट्ठा है। पिंड एक शरीर।
- 49:34की तरह है। ब्रह्मंड भी एक शरीर की तरह है।
- 49:42भगवान कृष्ण। कहते हैं ती तम।
- 49:45भुक्तवा स्वर्ग लोकं विशालम विशाल स्वर्ग लोक का भोग करते हैं।
- 49:55क्षीणय पुण्य पुण्य क्षीण। होने पर।
- 50:00मृत्यलोकम विष्णुति मृत्यलोक में फिर आ जाते।
- 50:05हैं। शब्दों में कही कही।
- 50:10बातें। मैंने पहले भी कहा शक्ति को
- 50:15शब्दों में। उतारना।
- 50:18मुश्किल नहीं असंभव है। डिफिकल्ट नहीं इम्पॉसिबल तो।
- 50:27कृष्ण कैसे इससे जुदा हो? पाएंगे?
- 50:30कृष्ण भी उन्हीं शब्दों का इस्तेमाल।
- 50:32करते हैं। कृष्ण भी उन्हीं लिपियों को।
- 50:36प्रयोग करने में अवद्ध। है कृष्ण कोई विलक्षण।
- 50:40नहीं है। कृष्ण उन्हीं शब्दों का इस्तेमाल
- 50:44करेंगे। जो तुम्हारी भाषा में उपलब्ध।
- 50:47है। क्षीण्य पुण्य पुण्य।
- 50:50रुक्म भिक्षिति जब पुण्य क्षीण हो जाते।
- 50:54हैं तो फिर मृत। लोक में फिर आ जाते हैं।
- 51:01एवं त्रयी धर्म अनु परपन्ना। तीन वेदों में सहकाम कर्मों।
- 51:12के अनुसार जो कर्म करते हैं क्या हवन, यज्ञ, दान?
- 51:18भूखों को भोजन गउओं। को दान कर दो।
- 51:27किसी के बच्चे दूध पी। रहे हैं।
- 51:30पहले जमाने में। ऐसा ही कुछ होता।
- 51:33था। कृष्ण खुद गौ पालक और कृष्ण के गौ
- 51:39पालक। होने के कारण हिंदुस्तान।
- 51:41के ऊपर ऐसा प्रखर। प्रभाव पड़ा।
- 51:45कि हमने गौ। की पूजा करनी।
- 51:48क्यों कृष्ण से। पहले गऊ की।
- 51:51पूजा नहीं होती। जब तक कृष्ण नहीं थे तब तक गऊ की
- 51:58पूजा नहीं होती। भगवान राम।
- 52:00के काल में। गऊ की पूजा नहीं होती थी।
- 52:06गौ। का इतना भोर बाला?
- 52:07नहीं था पशु थे दूध। के लिए पशु थे।
- 52:13पूजा नहीं होती थी। पूजा हुई।
- 52:16कृष्ण के काल में आकर क्यों? क्योंकि कृष्ण।
- 52:21ने गौ पालक कहलाए। गौओं को चराया नहलाया खिलाया
- 52:29पिलाया। गौओं की देखरेख की।
- 52:36गौओं को संगीत सुनाया, मुरलिया सुनाई कृष्ण?
- 52:42के गौ पालक। होने के कारण।
- 52:48क्योंकि कृष्ण गौओं को चराने वाले गवाले गौओं को चरा के लेके आते।
- 53:02नन्द के घर। गऊएं बहुत थीं।
- 53:08दोस्त पीते। मखन खाते दहीन खाते।
- 53:15इसलिए गऊओं के। सांनिध्य में रहने के।
- 53:18कारण? कृष्ण को गो पालक।
- 53:21का नाम दिया गया। और।
- 53:245000 साल से पुरानी गौओं की पूजा नहीं थी, गौएं पहले।
- 53:33थी लेकिन वो जरूरत के साधन के रूप में थी।
- 53:39पूजा रूप में नहीं थी वेदों। में शब्द आते हैं।
- 53:45कहें इंद्र। मेरे गौओं की रक्षा कर।
- 53:51क्योंकि गौएं माताओं के समान। पोषण देती हैं।
- 53:59आवश्यक जैसे धरती। आन देती है।
- 54:04वैसे ही गौयें। शक्तिशाली दूध देती।
- 54:10तो कृष्ण के जमाने। में गौ की।
- 54:13पूजा शुरू हुई उससे पहले गौ की। पूजा नहीं थी, गऊ थी।
- 54:17गऊ की पूजा नहीं थी। एवं त्रयी धर्मं।
- 54:25अनूप प्रपण। गतागतम काम काम लगनते सहकाम कर्म
- 54:36करके स्वर्गलोक का अधिकारी हो जाए।
- 54:43फिर कहूंगा। शब्दों में की गयी।
- 54:45बात शब्दों के हूबहू अर्थ। जो भी।
- 54:49लेगा, वे दूध में पड़ेगा, वह सत्य अर्थ को जान नहीं पाएगा।
- 54:59स्वर्गलोक। कहीं कोई भौगोलिक क्षेत्र।
- 55:04है नरक लोक। भी कहीं कोई भौगोलिक।
- 55:09क्षेत्र नहीं। यहाँ बहुत से लोग मैं आपको।
- 55:13दखला देता हूँ जो नफरत की भाषा। ही बोलते हैं।
- 55:18नफरत की भाषा ही। बहलाते हैं।
- 55:21नफरत की भाषा ही। व्याख्या करते हैं।
- 55:28वो कुम्भ पाक नरकों से कम। थोड़ी उनके दिमागों के भीतर।
- 55:35पाक भरा होता है। और पाक से घृणा।
- 55:40और नफरत की। बदबू ही तू आया।
- 55:43करती प्रेम। की सौगात, बारिश होगी ऐसे लोगों
- 55:49के पास। से कभी कामना ही मत करना प्रेम की
- 55:57बारिश तो ऐसे व्यक्ति। के पास होगी।
- 56:00जिसकी भेद बुद्धि मिट गयी। संत के पास ही आपको भेद हीनता की?
- 56:10सुगंध में लगी। संत का भेद।
- 56:15मट गया। और सही तो।
- 56:17जिसका भेद मट गया। वेद की दीवारें ढह।
- 56:20गईं वह संत हो। गया जीसको पता चल गया।
- 56:28कि ये शरीर एक। है।
- 56:32ये यूनिवर्स अस्तित्व एक। है।
- 56:37यहाँ दूसरा कोई जी। इसलिए।
- 56:41बाबा नानक ने कहा, निरवैव? किस्से वर करो निरवपु।
- 56:53किस्से डरु। और।
- 56:59ईशा उपनशीय ने कहा। एक ही है ईशा।
- 57:09वस्त्र। मिदम सर्वम् यत्न किंच।
- 57:11जगत। ए आत्मा ब्रह्मस्व मैं ही हूँ सब
- 57:20जगह में ये अहंकार में बोले गए शब्द में ये बड़े।
- 57:28प्रेम से बोले। गए शब्द हैं।
- 57:31ये अस्तित्व? में एक होकर बोले गए उदगार किए।
- 57:35हुए फूटे हुए शब्द हैं दूसरा। कोई नहीं, सही मतलब तो इसका है
- 57:47दूसरा कोई। सिर्फ़ मैं ही हूँ।
- 57:54दूसरा कोई और ध्यान रखना। ये शब्द बोलने।
- 58:00में नहीं आएगा। ये शब्द।
- 58:02आचरण में भी आएगा। वह व्यक्ति।
- 58:09सभी से प्रेम करेगा। प्रेम की बारिश करेगा, प्रेम ही
- 58:18बांटेगा, करुणा ही बिखेरेगा। जिसने ये जान लिया।
- 58:31के सब मैं ही हूँ, सब का दर्द, उसका दर्द हो।
- 58:38जाता है। सब का।
- 58:41कष्ट उसका कष्ट हो जाता है। दूसरा कोई है?
- 58:50और ये बात बौद्धिक स्तर पे उसे मालूम नहीं।
- 58:53पड़ती। यह बात उसको।
- 58:57अस्तित्व के स्तर पर। पड़ती है जैसे।
- 59:01तुम्हारी अंगुली में चूड़। लग जाए तो क्या तुम मानते?
- 59:05हो? कि मेरा ये सारा शरीर एक है।
- 59:11तो हमें महसूस। होता है।
- 59:14कि मेरा ये सारा शरीर एक। है।
- 59:18तो पांव के। अंगूठे के चोट लगी।
- 59:21और रात भर नींद मुझे एक था। तो रात भर सारा।
- 59:29शरीर सो नहीं सो। मेरा सारा शरीर एक है।
- 59:34एक संयंत्र की भांति। है, जिसका एक पुर्जा।
- 59:39जख्मी हो गया। नींद सारे शरीर को नहीं आई।
- 59:46ऐसे ही। जीसको पता चल गया।
- 59:49अहम् ब्रह्मस्म। तो ये शब्द सिर्फ बौद्धिक सतर्क
- 59:54तक। ही नहीं रहेंगे अहम् ब्रह्मस्म का
- 59:58उदगार करने वाला व्यक्ति शीतलता और प्रेम।
- 1:00:02की बारिश से परिपूर्ण। होगा।
- 1:00:05उसका ह्रदय, ऐसे अंतरंग आनंद। से।
- 1:00:13भरा होगा। कि जिसका वर्णन।
- 1:00:16किया नहीं है उसको। सब में अपना ही रूप देखेगा।
- 1:00:23ऐसन। सबको।
- 1:00:27मैं ही मानेगा जाने। का सब में रमय्या प्रभु।
- 1:00:34एक को सब में रमय्या प्रभु एको नानकपेकपेक।
- 1:00:47नानक देख देख कर सबके भीतर परमात्मा।
- 1:00:52के उस स्वरूप को। शरण में पड़ता हूँ नानक पेक, पेक
- 1:00:59शरणई नानक कहते हैं कि मैं सब की शरण में हूँ।
- 1:01:06जब से देखा है कि सब में सब। में बसर यह रबी।
- 1:01:12एक को। एक।
- 1:01:14रब सब के भीतर। है।
- 1:01:18तब से जीसको देखता हूँ। इस तरफ देख लिया जान तसद्दुक कर
- 1:01:25दे, मैं तो मोहताज नहीं कावे या। बेखाहने का ये कहवा है जब मैं
- 1:01:34खाना हूँ या बुध खाना है। इसका मोहताज नहीं था।
- 1:01:43भेद बुद्धि गिर गई सब। दीवारें गिर गई।
- 1:01:46सब भेद ढह गए एक रह गया। जिसका एक।
- 1:01:53रह जाता है। उसके लिए स्वर्ग।
- 1:01:57नरक यह कल्पनाएं हो जाती। है।
- 1:02:01ओह, दूर दूर। जहाँ तक फैला है वहाँ?
- 1:02:07तक खुद ही खुद। होता है अगर दूसरी।
- 1:02:12भाषा में बोलें। तो जिधर देखता है, उधर तू ही तू
- 1:02:18है। हर जर्रे।
- 1:02:23में तू ही तो रूबरू है ऐसा जब नजर आने लगे अस्तित्व के तल पर, तुम
- 1:02:34तो अभी बौद्धिक तल पर। ये बातें।
- 1:02:37सुन रहे हो? मैं बोलता हूँ तुम सुन और तुम।
- 1:02:43बौद्ध कतल पर उसको। महसूस कर रहे हो?
- 1:02:47लेकिन ये बौद्ध कतल की बातें हैं। ये हार्दिक।
- 1:02:51कतल की भी बातें। नहीं है।
- 1:02:55हृदय भी सर्वत्र विराजमान। नहीं।
- 1:02:58बुद्धि भी विराजमान नहीं। है।
- 1:03:01सर्वत्र सर्वत्र विराजमान कौन है? सर्वत्र विराजमान है तुम्हारा
- 1:03:08अस्तित्व तुम्हारा वो आंतरिक स्वरू जो वास्तव में तुम।
- 1:03:19वह सर्वत्र विराज में यह। कोई भेद नहीं, कोई नर्क नहीं, कोई
- 1:03:28स्वर्ग नहीं, कृष्ण के ये शब्द। बहुत।
- 1:03:33से शब्द मिलेंगे ऐसे। जो कि धारा में बहती हुई गंगा की
- 1:03:42धारा में कोई तनका बह गया, कोई पत्ता बह गया, कोई लकड़ी का
- 1:03:50टुकड़ा बह गया। कोई कागज़ बह गया कोई कष्ट ही।
- 1:03:59सब बहते हुए मिलेंगे। लेकिन कृष्ण के शब्दों।
- 1:04:07का अर्थ शब्दों। से मत ले लेना।
- 1:04:13कृष्ण के शब्दों का अर्थ कृष्ण, जीस तल।
- 1:04:16से बोल रहे हैं उस तल पर जानकर जाकर ही।
- 1:04:23जाना जा सकता है। अनयंत्र कहीं भी नहीं जाना जा
- 1:04:28सकता। अगर तुम कृष्ण के शब्दों की।
- 1:04:32व्याख्या करना चाहते हो? तो सबसे पहले एक।
- 1:04:37काम कर लेना। जहाँ से कृष्ण।
- 1:04:42बोल रहे हैं। वहाँ पहुँच जाना है।
- 1:04:47फिर तुम पाओगे। सब सहज हो गया।
- 1:04:52सब सरल हो गया और सब बदल गया। जो तुमने बौद्धिक।
- 1:04:58तल पर सोचा था। जो तुमने हार्दिक।
- 1:05:03तल पर महसूस किया था। वो अस्तित्व गत तल पर है।
- 1:05:12बौद्धिक तल से नीचे। हार्दिक तल, भावनात्मक तल और।
- 1:05:20उससे भी नीचे अस्तित्व। का?
- 1:05:26वहाँ उतरना होगा। उतनी गहराई तक अगर।
- 1:05:31जाने की इच्छा नहीं या। क्षमता नहीं तो फिर।
- 1:05:38तुम कृष्ण के शब्दों। को।
- 1:05:41व्याख्यात करने की कष्टम। यह आने वाली मानवता के ऊपर एक
- 1:05:51उपकार होगा। कृष्ण के शब्दों को।
- 1:05:55विकृत है। तुम्हारी व्याख्यान इसको विकृत कर
- 1:06:04रही हूँ। अन्यथा कृष्ण ने 300 टिकाएँ नहीं
- 1:06:10बोली थी कृष्ण के कहने। का अर्थ एक ही था, दूसरा यहाँ तो
- 1:06:20सैकड़ों टिकाएँ हो चुकी। हैं।
- 1:06:23सैकड़ों। टिकाएँ हो रही हैं प्रत्येक।
- 1:06:27व्यक्ति अपनी खोपड़ी के हिसाब से और।
- 1:06:29प्रत्येक की खोपड़ी अलग। अलग है।
- 1:06:33अपनी खोपड़ी के हिसाब से। गीता का अर्थ?
- 1:06:36कर देता है। स्वर्ग और नरक का।
- 1:06:52स्टेट ऑफ मंथ मानसिक दुख और सुख शारीरिक।
- 1:07:01सुख और सुख। यह है स्वर्ग और नरक।
- 1:07:06इससे अन्यथा स्वर्ग और रनर। का कोई भौगोलिक स्थान।
- 1:07:10नहीं है, धन्यवाद।