Latest / Baba ji Vijay Vats / 14 Jan 25 - मृत्यु का भय सिर्फ एक भय है, यह सत्य नहीं है! अगर मैं सहस्रार में चला गया तो क्या होगा?
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- 0:00पूछते हैं, मैं जब ध्यान में गहरा जाता हूँ तो सहसरार में पहुँच
- 0:08जाता हूँ और मुझे बहुत डर लगता है, विशेषकर इस बात से के कहीं
- 0:17मैं। सहस्रार से निकलना चाहूंगा बाहर
- 0:23क्योंकि सहस्रार से जो व्यक्ति निकल जाता है वह वापस नहीं आता,
- 0:32खासतौर से। जब मैं भांग खा लेता हूँ
- 0:50मर जाने का डर बहुत गहरा है, मैंने अनेकों बार बोला है।
- 1:03और ये भीतर भरा पड़ा है और जब तुम भांग खा लोगे तो भांग क्या
- 1:13करेंगे? कथार्शिस्ट करेंगे।
- 1:20ये जो आता है डर ये भांग के कैथोरेसिस के कारण होता है।
- 1:28तुम जो भी खाते हो, अक्रॉस स्टाइबा वगैरह।
- 1:33जो भी इसकी नस्ल खाते हो, यह कैथोरेसिस करती है।
- 1:41और कैथोड से जो भीतर पड़ा होता है, वो ही बाहर आता है।
- 1:47चेतन में तो मैंने आपसे पहले भी कहा 70% तक मृत्यु का गया होता है
- 1:53तुम्हारे। लेकिन जैसे ही तुमने काम वासना,
- 1:59क्रोध, वासना, लोभमोग के पीछे नहीं लगना है, वैसे ही तुम्हे
- 2:05मृत्यु के पीछे नहीं लगना है और मन तो बड़ा चालाक है, मन तो रोज़
- 2:12इतना ही प्रश्न पड़ता है। अब मैंने कोई बात बोल दी।
- 2:17तो इसको भय का कारण बना लिया और मैंने तुम्हें क्या कहा गौरख
- 2:24तुम्हें क्या कहते हैं? कबीर क्या कहते हैं अगर तुमने
- 2:32प्रेम की गली में कदम रख लिया है? जेतों प्रेम मिलन की चा शीश
- 2:51तलीधर। घर मेरे आं से सतलीधर घर मेरे आं
- 3:10प्रेम मिलन की चाह। शी स तली धर घर मैं रहा हूँ, पता
- 3:22है कबीर को अच्छा बल्ब होता है। जानते हैं गोरख कि मृत्यु सबसे
- 3:32बड़ी बाधा है। रोड़ा अटकाएगा जगह जगह पे आएगा
- 3:38बहाने बनाएगा अबोर नहीं तो मेरा ही बहाना बना दिया, आशुतोष जी
- 3:46निकल गए तो मैं भी 1000 से निकल जाऊंगा काला जी का बड़ा है 1000
- 3:51से निकल। लेकिन मन बड़ा चालक है, असली बात
- 3:58है, मृत्यु से डरना और मन मरना नहीं चाहता, बस बुनियादी बात तो
- 4:04ये है बहाने तुम कुछ भी बना लो। मरोगे तो 1 दिन सदा तो किसी ने
- 4:23रहना होता नहीं, पर जब 1 दिन मरोगे तो शुभ होगा।
- 4:33अगर ध्यान करते करते मर जाओ। भोग करते करते मर जाओ, ये अशोभ है
- 4:46और ध्यान करते करते मर जाओ ये अशोभ है क्योंकि अंत मति सौगति।
- 4:56अंत में ध्यान से मरोगे, तो ध्यान से ही शुरुआत होगी और अंत में अगर
- 5:04तुम पदार्थों के मोह में मरोगे तो पदार्थों से ही शुरुआत होगी।
- 5:09संचय से ही शुरुआत होगी। बहुत से प्रश्न ऐसे आए हैं लोग डर
- 5:23जाते हैं क्या करें? अब तो जाने का भी दिल नहीं करता,
- 5:27ससुराल में क्यों? क्योंकि मौत दिखाई पड़ती है?
- 5:36तो मैं समझा दूँ, यह भ्रम है और मन ऐसे भ्रमों को ढूंढ़ता रहता है
- 5:45मन तो बहाने ढूंढ़ना फिरता ही है आपको एक बहाना और मिल गया।
- 5:54पहले मेरी वीडियो को अच्छी तरह सुनो, मैंने कहा कहा क्या है,
- 6:02क्या तुम में इतना संकल्प आया कि तुम अपने शरीर से बाहर हो सको?
- 6:121000 से निकलने के लिए परम संकल्प की आवश्यकता होती है।
- 6:19ऐसे कोई 1000 से निकल भी नहीं सकता।
- 6:23आशुतोष का तो मुकाबला नहीं कर सकता।
- 6:26वह संत थे, उसमें संकल्प शक्ति थी, बस इस।
- 6:31ज्ञान का आभाव था उसके भीतर इस सूचना का आभाव था।
- 6:36अगर सच में शब्द ठीक प्रयोग करूँ तो इस सूचना का आभाव था कि अगर
- 6:44देही को साथ निखट गए कारण शरीर के साथ।
- 6:51सहस्त्रार के द्वारा तो वापस नहीं आ पाओगे, यह पता नहीं था, लेकिन
- 6:59वह प्रबुद्ध थे, अपने आप को जान लिया था, उन्होंने कोई मामूली
- 7:07व्यक्ति नहीं थे वो। मैं अगर कुछ बोलता हूँ तो आशुतोष
- 7:16के बारे में नहीं बोलता। कहाँ कह के गए कि मैं वापस आऊंगा?
- 7:25ये इंतजार किए जाते हैं व्यर्थ में।
- 7:29अड़सठ साल कि उम्र ठीक उम्र होती है, यही उम्र है इंडिया में एवरेज
- 7:41तो शरीर छोड़ गये गलती से दो 4 साल और जी लेते हैं।
- 7:52लेकिन उनके भीतर संकल्प था उन्होंने अपना अफवा जान लिया था।
- 7:58वो संकल्पवान थे इसलिए उस संकल्प के साथ उन्होंने शरीर को छोड़
- 8:06दिया। क्या तुम आशुतोष से स्वयं को
- 8:13बढ़ाते हो? उतनी चेतना की जागृति तुम्हारे
- 8:19में हो गई? बा मुश्किल अगर तुम आए हो
- 8:24विशुद्धि तक वो भी मैं घसीट के लिए आया हूँ तो आए हो?
- 8:32खुद के प्यार से तो वहाँ तक भी नहीं आया।
- 8:41देखिये पहले सत्य को ठीक तरह से समझना आवश्यक होता है।
- 8:51फिर समझने के बाद किंतु परंतु उठाना चाहिए।
- 9:01ये बिल्कुल ठीक है कि जो विशुद्धि के ऊपर आ गया।
- 9:09वह अपनी चेतना को कारण शरीर को साथ लेके देही को साथ लेके जा
- 9:15सकता है। सह शराब के द्वारा और आशुतोष इस
- 9:24मकान पे आ गए थे। लेकिन तुम उस मुकाम पे नहीं हो
- 9:30तुमने खुद को देख लिया है क्या पर वो घटना तुम्हारे साथ घट जाएगी ये
- 9:40तुम सोच भी कैसे सकते हो? परम संकल्प की आवश्यकता होती है
- 9:48शरीर से बाहर निकलना कोई खला जी का बड़ा यहाँ नाभि चक्कर से
- 9:55निकलने के लिए संकल्प की आवश्यकता पड़ती है।
- 10:00तुम 1000 से निकलने की बातें की। सहस्रास से परम संकल्पवान व्यक्ति
- 10:07निकल सकता है। सहस्रास से सिर्फ संत निकल सकता
- 10:15है जो संकल्प से भरा पड़ा है ना खोपरे को तोड़ेगा और निकल जायेगा।
- 10:26लेकिन कहीं भूल हो गई नहीं पता चला हो जाती है भूल लेकिन तुम
- 10:36क्यों डरते हो? तुम तो अभी विशुद्धि के ऊपर
- 10:42पहुंचे हो और विभूति स्वयं के प्रयास से नहीं पहुंचे।
- 10:49वहाँ तक किसी तरह से मैं मूलाधार से खेच कूच के लाया हूँ।
- 10:55विशुद्धि तक। और अगर तुम ऐसे ही कूड़ों कबाड़ों
- 11:00में मेरे बात को समझ लेना मैं कहाँ से बोल रहा हूँ अगर ऐसे ही
- 11:06तुम कूड़ों कबाड़ों में पड़े रहे तो फिर वापस चले जाओगे।
- 11:13मला धर्म। फिर हमारी पंजाबी में कहावत है ओह
- 11:25माँ, मर गी जड़ी दहीन अल टुक जिंदिस फिर जे माँ मर जाय।
- 11:35जिसने तुम्हें खेंच खोज के इस युद्ध के ऊपर ले आया और माँ नहीं
- 11:41आएगी जल्दी जल्दी नहीं आएगा। कितने आए अब तक बताओ बा मुश्किल
- 11:52आपको प्रत्यक्ष में एक दो धारण मिलेंगे।
- 11:56या शंकर मिलेंगे या रामकृष्णा पर्व वहाँ से मिलेंगे?
- 12:03वो विशुद्ध पहले आते हैं। विवेकानंद को, नरेंद्रनाथ को,
- 12:11कितने पहले आपको? हजारों साल नरगिस अपनी बेनूरी
- 12:22पिरोती है, बड़ी मुश्किल से होता है।
- 12:27चमन में लीलावर पैदा हम तो गुजरते हुए दिए।
- 12:37फफक कर कभी भी आँखें मूँद लेंगे लेकिन तुम्हारा क्या होगा?
- 12:47तुम अगर ऐसे ही प्रश्न उठाते रहे और प्रश्न क्यों उठते हैं?
- 12:54तुम उस बेसिक डर को तो समाप्त ही नहीं करते, वो ही प्रश्न वो ही
- 13:01प्रश्न घूम घूम के तुम ज़रा सिफर कर देते हो अरे मर ही जाओगे ना
- 13:08भाई, इससे ज्यादा तो कुछ नहीं होगा।
- 13:13वैसे भी तो मर ही जाओगे ना या तो ये कह दो कि मैं ध्यान नहीं
- 13:19करूँगा तो फिर कभी नहीं मरूंगा, फिर तो ठीक तुम्हारी बात के बाबा
- 13:26ध्यान करने से मर जाऊंगा। और अगर ध्यान नहीं करूँगा तो फिर
- 13:32मैं कभी नहीं मरूंगा। मरोगे तो 10 साल आगे, 10 साल पीछे
- 13:36क्या मरना तो 1 दिन सभी को होता है, लेकिन क्यों नहीं?
- 13:43तुम्हारे खाने में उतरती मेरी बात क्यों नहीं उतरती गुरु गौरखनाथ की
- 13:50बात? क्यों कबीर तुम्हारा मुँह ताकते
- 13:54रह जाते हैं? तुम्हारी हरकतों को देखकर क्यों
- 14:03नानक मुँह बाए खड़े रह जाते हैं? जो मैंने सिखाया वो तो किया नहीं।
- 14:13नानक कहते हैं, शिष्य वरम सीखो, सीखने का अर्थ क्या है?
- 14:25नानक कहते हैं शिष्य वरम। और शिष्य बनने का पहला कदम है कि
- 14:32ये जान लो कि मैं अभी कुछ नहीं जानता हूँ तो ही शिष्य बन पाओगे
- 14:39फिर समझा दूँ हम पंजाब में हैं, नानक की भूमि है।
- 14:46नानक कहते हैं, शिष्य शिष्यकार्थ क्या होता है?
- 14:55जैसा गुरु कहे वैसा मान लो। यह शिष्यत्व ना हुआ, शिष्यत्व है।
- 15:06कि तुम अपने भीतर पूरी तरह से अंतरंग भीतर तक यह विचार ले जाओ,
- 15:13यह मान्यता ले जाओ कि मैं कुछ नहीं जानता आई नो नृत्य मैं
- 15:23मूर्ख। और तुम तो अपने आप को समझदार
- 15:29समझते हो, इसलिए पहले शब्दों में ही बाबा कह जाते हैं जब तक अपने
- 15:38आप को मूर्ख नहीं समझोगे और वह भी मूर्ख हो सिंचाई को एक्सेप्ट करने
- 15:44में। गुरेज़ क्यों करते हो?
- 15:47तुम हो भी मूर्ख और स्वीकार करने में हर्ज क्या है?
- 15:56बाबा कहते हैं सह से सेन। हजारों लाखों स्याने पे हो
- 16:09तुम्हारी चतुराईयां कहाँ चलते हैं चतुराई तो बहुत करते हो, लेकिन बच
- 16:18कहाँ पाते हो? अरे तुम्हारा डर के कहीं मर ना
- 16:22जाऊं क्या तुम इसके कारण बच? जाओगे नारायण जब अंत में।
- 16:37आप। पकड़ेंगे कहाँ उनसे भी ज्यों कह
- 16:48दियो हमको फुर्सत न। तुम इतने साला को जब नारायण आखिर
- 17:03में आके कान पकड़ ले गए उनसे भी कह देना हमें फुर्सत नहीं है रोज़
- 17:15वही सवाल रोज़ वही सवाल। वो ही बकवास वो ही गंदगी का फोड़ा
- 17:24मेरे सामने कोट देते हो। डर लगता है बाबा डर लगता है कितनी
- 17:34बार समझाऊ तुम्हे? डर तुमने दबाया है, एक तुम्हारी
- 17:40ही गलती है इल्ल्यूशन के कारण तुमने डर को दबाया है, अब ये
- 17:48निकलेगा बाहर तुम निकल जाने तो खाली हो जाओगे, शुक्र मनाओ फिर
- 17:55तुम इससे डरते हो। तुम सयाने बनने की चेष्टा करते हो
- 18:01और बाबा कहते हैं तुम्हारी लाख सयाने पे भी तुम्हारे साथ काम
- 18:04नहीं आएँगे। वह जब आएगा मौत के रूप में।
- 18:14तुम्हें ले ही जाएगा, तुम उससे ताकतवर नहीं, उसके सामने तुम्हारी
- 18:22हैसियत क्या है? उस विराट क्या है?
- 18:28अगर तुम्हें कहा जाए कि तुम कर्ण मात्र हो तो यह भी मूडता है।
- 18:33तुम कण भी तो नहीं हो तुम नेगलिजबल हो, तुम हो ही नहीं और
- 18:42हैरानी की बात है अपने आपको बचा के रखना चाहते हो और फिर अच्छी
- 18:50तरह से जानते हो। यह कोई नहीं रहा, यह कोई नहीं
- 18:59रहेगा, लेकिन फिर उम्मीद करते हो कहीं किसी कोने में अंतर तक बैठा
- 19:07हुआ ये बात भाव कि नहीं, मैं तो नहीं मरूंगा।
- 19:14और दुनिया मर जाएगी, मैं सदा जीवित रहूंगा।
- 19:19यह भ्रम कहीं न कहीं तुम्हारे गहरे में तुम्हारे मन के किसी
- 19:23कोने में छुपा पड़ा रह जाता है। मैंने तुम्हें बहुत बार कहा है
- 19:38अगर ऐसे ही तुम उलझे रहोगे कभी काम में उलझ गए कभी क्रोध में उलझ
- 19:45गए कभी मोह लोह अहंकार में उलझ गए, कभी भैय में उलझ गए ये भय भी
- 19:51तो उलझन है। कभी मद में उलझ गए।
- 19:55नशे में कभी मत सर में उलझ गए है तो जो उलझन है और उलझन तो उलझन ही
- 20:09होती है। देखिये, तुम्हारे रास्ते का जो
- 20:13बाधा है वह पत्थर हो या बड़ा सा हीरो हो, क्या फर्क पड़ता है
- 20:18उससे? रास्ते की दीवार चाहे पत्थर से
- 20:25बनी हो, चाहे हीरे से बनी हो, तुम तो नहीं न जा सकोगे।
- 20:31तुम तो रुक गए ना अगर मैं सहसराज में चला गया तो क्या हो जाएगा
- 20:47प्रला आ जाएगा, आसमान घर जाएगा। ग्रह, तारे, नक्षत्र आपस में टकरा
- 20:55जाएंगे, विस्फोट हो जाएगा कल हो जाएगा, कुछ नहीं होगा तुम्हारे
- 21:07जाने से और ध्यान रखना किसी के जाने से भी कुछ नहीं होता।
- 21:12जो कहते हैं मैं हूँ तो मुमकिन है।
- 21:15और भाई चला जाएगा और तुम देखोगे उनके जाने से कोई फर्क नहीं
- 21:20पड़ता। किसी के जाने से कोई फर्क नहीं
- 21:23पड़ता। नेपोलियन कहता था इम्पॉसिबल वर्ड
- 21:26इस नॉट फाउंड इन मैं डिक्शनरी मेरे शब्द कोष में असंभव नाम का
- 21:32कोई शब्द नहीं। लेकिन मृत्यु असंभव बन गई कि नहीं
- 21:36बन गई। मृत्यु को रोकना असंभव हुआ कि
- 21:38नहीं हुआ, मर गया वो सयानप मत करो, ये रास्ते बलिदान के रास्ते
- 21:51हैं, इसको प्रेम कहते हैं। कितनी बार समझाते हैं कबीर प्रेम
- 22:01बलिदान का दूसरा नाम है जे तो प्रेम मिलन की चाह, शीश तलीधर घर
- 22:09मृदान ये तुम्हें जीने का पैगाम देते हैं।
- 22:16मृत्यु ही तो सीखा रहे हैं तुम्हें और चाब तुम्हारा है कमर
- 22:24की बात तुम्हारा चाब है उस रस को पीने का और उस रस को पीने की जो
- 22:32बताते हैं जुगत। उससे तुम डरते हो तो भाई मत चलो
- 22:42कौन कहता है रुक जाओ, संसार में कुछ कर लो, कोई पैसा जैसा कमा लो,
- 22:51कोई काम काज कर लो। किसने कहा तुमसे कि तुम परमात्मा
- 22:59की तरफ चलो कोई पढ़ाई वढ़ाई कर लो ये सर लोग आजकल बहुत अक्टिव हैं,
- 23:07कोई आई ए एस पीसी एस वगैरह बन जाओ।
- 23:16इन मूर्खों के पास चले जाओ कौन रोकता है तुम्हे?
- 23:22ये लोगों को कितने मीठे मीठे सपने दिखाते हैं।
- 23:26हालांकि जो नहीं बनता वो भी टूट जाता है और जब बन जाता है।
- 23:33उन विचारों को भी नहीं होता आज नहीं कल वो अभी टूट जाएंगे क्या?
- 23:41क्योंकि जो पाया उसमें वो ना मिलेगा जो तुमने सोचा था।
- 23:50तू ना मिला एक तू ना मिला सारी दुनिया मिले भी तो क्या है?
- 24:13मेरा दिल ना खिला मेरा दिल ना खिला सारी बगिया।
- 24:28खिले भी तो क्या है? नहीं मिलेगा वो ये लोग तुम्हे रस
- 24:38की झलक दिखाएंगे आई ए एस बन जाओ बन जाओ कौन रोकता है सीएम बन जाओ।
- 24:47मिनिस्टर बन जाओ एम एलए एमपी बन जाओ पीएम बन जाओ, कुछ भी बन जाओ
- 24:55लेकिन ध्यान रखना कुछ भी बन जाओ, हाथ खाली रहेगा, हाथ में भिक्षा
- 25:01पत्र सदा रहेगा। मांगते रहोगे किसको?
- 25:06उसको जो शुरू से मांग रहे है लोग जीसको पिए बिना तृप्ति नहीं आती
- 25:17जीसको बिना पिए चैन नहीं आता जीसको बिना पिए।
- 25:27रातों को तुम्हें तारे गिरने पड़ते हैं, रात आँखों में गुजर
- 25:36जाती है, चाँद भी अब नजर। नहीं।
- 25:47आता? अब सितारे भी कम निकलते हैं।
- 26:02यही कुछ होगा। सितारे भी कम निकलेंगे क्योंकि
- 26:07तुम गिनोगे चाँद भी नजर नहीं आएगा।
- 26:12अमावस्या में कहाँ चाँद नजर आता है बाहर भी कुछ पाने को नहीं है।
- 26:26बाहर के लोग भी तुम्हें पाने के सपने दिखाते हैं, बनावटी कागज की
- 26:32डिग्रीज़ भी तुम्हें देते हैं, कुर्सियों के ऊपर भी तुम्हें
- 26:39बैठाते हैं। पावर नाम का डंडा भी तुम्हारे हाथ
- 26:44में पकड़ाते हैं। ये तो लेकिन क्या तुम तृप्त हो
- 26:54पाता? भिक्षा पात्र सदा तुम्हारे हाथ
- 26:59में मौजूद रहता है और अगर तृप्ति ना हुई।
- 27:05तो फिर सारा जगत मिल जाएगा तो अभी कुछ नहीं मिला।
- 27:12अगर तू ना मिला तो सारी दुनिया भी मिल जाए तो कुछ न मिला।
- 27:23अगर तुम अब तक यह बात समझे नहीं तो फिर प्यास जगी।
- 27:30फिर मेरी बातों को सुनकर जब किसी की शब्दावली को सुनकर तुम्हारे
- 27:38भीतर एक छोटी सी करण उठी होगी। जिसे चंचलता कहता है, तुम्हारे मन
- 27:45का आवेग थोड़ी तरह थोड़ी देर के लिए उठा होगा और उसी आवेग में तुम
- 27:54यहाँ मेरे पास पहुँच गया होगा। क्योंकि लक्षण तुम्हारे बताते हैं
- 28:05प्यास जगीन मैंने अपना फर्ज पूरा कर दिया है अब तुम यहाँ आकर भी
- 28:17डरोगे। तो, डर से मैं तुम्हें मुक्त नहीं
- 28:21कर सकता और डर से मैं जितना मुक्त कर सकता था मैं भयंकर रूप से
- 28:28तुम्हें मुक्त कर दिया ऐसे ऐसे खतरनाक शब्द मैंने बोले कि डर
- 28:35तुम्हारे वितरण न रहे है। लेकिन फिर भी तुम डरते हो तो फिर
- 28:41ये तो कलिंग में ऐसा है। तुम्हारी जीवन के साथ ज़िन्दगी के
- 28:48साथ तुम चुमड़े रहना चाहते हो, फिर ये तो तुम्हें छोड़ना पड़ेगा।
- 28:54ये मेरा काम नहीं है। छिपटे हो तुम उखड़ना भी तुम्हें
- 29:02पड़ेगा क्लीनिंगनेस को हटाना भी तुम्हें ही पड़ेगा।
- 29:06ये काम मेरा नहीं है, मैं तुम्हें ढंग बता सकता हूँ वो बता दिया के
- 29:15इन चपकाहटों को तोड़। ज़िन्दगी से इतना मोह अच्छा नहीं
- 29:20होता क्योंकि ज़िन्दगी तुम हो नहीं जिसे तुम माने हो, वो
- 29:28ज़िन्दगी तुम नहीं हो जीवन तो तुम हो लेकिन वो परम स्रोत।
- 29:36वो जीवन हो, तुम यह नकली नकली नहीं हो, जो आज है और कल नहीं
- 29:42रहेगा जिसे आज तुम बोलता हुआ श्वास लेता खाता पीता काम करता
- 29:50देख रहे हो, तुम उसको जीवन समझे हो?
- 29:58जो जीवन नहीं है तो ज़िन्दगी बेकार हो गयी, इसको जाग के देखना
- 30:07होगा। मैंने कितनी बार कहा यह बोलता है,
- 30:12देखो कौन बोलता है। तुम विचारों को भलीभाँति देखते हो
- 30:19और तुम्हें इतना पता लगता है कि डर का विचार तुम्हें आता है तो
- 30:24तुम्हें इतना ख्यालात नहीं आता के डर तुम नहीं हो।
- 30:30जब तुम्हें डर दिखता है सिनेमा के अंदर स्क्रीन के ऊपर जैसे फ़िल्म
- 30:36दिखती है, वैसे तुम्हें डर दिखता है अपने मनस पटल पर फिर डर तुम
- 30:43कहाँ हो? जो चीज़ें तुम्हें दिखाई पड़ती है
- 30:47वह तुम हो नहीं। सीधा सा फॉर्मूला है, ज्यादा
- 30:54सोचने की आवश्यकता नहीं, तुम्हें डर दिखाई पड़ता है, तो तुम क्यों
- 30:59कब से हो ना तुम डर हो और ना तुम डर से तुम।
- 31:09काँपते हो, फिर तुम्हारी नींदें क्यों हरे?
- 31:15फिर तुम भाग के बाहर क्यों आ जाते हो?
- 31:21और देखिये ये मृत्यु को तो स्वीकार तो तुम्हें ही करना
- 31:28पड़ेगा। क्योंकि संत कभी इतना अहिंसक,
- 31:34हिंसक नहीं होता कि तुम्हें अपने हाथ से मार दे, संत तुम्हें कह
- 31:43सकता है कि तुम मरोगे, क्षुद्र जीवन को मारोगे?
- 31:50तो विराट जीवन में उतरोगे ये लूजन को मारोगे तो सत्य में उतरोगे
- 31:58भ्रम को तोड़ोगे तो असली में पहुंचोगे फिर भी अगर तुम नहीं
- 32:04तोड़ो तो ये गुरु की कमीनी है। गुरु ने अपना काम कर दिया।
- 32:15तुमने पूछा कि 1000 से कहीं मैं निकल ना जाऊ नहीं, इतनी तुम्हारी
- 32:22औकात कहाँ है अगर तुम 1000 से निकल गए ना?
- 32:29मैं तुम्हें वापस ले आऊंगा, तुम फिक्र मत करो क्योंकि मैं बखूबी
- 32:38जानता हूँ, इतनी संकल्प शक्ति तुममें होती तो तुम सभी विकारों
- 32:44को रोक लेते हो। बात क्या करते हो?
- 32:50क्यों मूर्ख बनते हो और क्यों मज़े बनाते हो?
- 32:56अगर इतने ही संकल्प की शक्ति तुम्हें होती तो तुम इन उठते हुए
- 33:03विकारों को रोक न लेते हो। तुम जानते हो कि सहसरार में से
- 33:09निकलने के लिए कितनी विराट शक्ति और संकल्प की आवश्यकता होती है।
- 33:14विराट की बात करता हूँ मैं विराट, संकल्प और तुम्हारा संकल्प भी
- 33:20इतना नहीं कि तुम क्रोध को रोक सको, तुम्हारा संकल्प तो इतना
- 33:25नहीं? कि तुम भय को रोक सको, काम को रोक
- 33:31सको, तुम्हें तो क्षुद्र चीजें भी प्रताड़ित कर जाती हैं?
- 33:39तुम्हें तो साधारण वासनाएं भी हिला जाती हैं।
- 33:45तुम बात करते हो, संकल्प नहीं, इतने संकल्प हुआ तुम नहीं, मैं
- 33:55अच्छी तरह से जानता हूँ, तुम्हें दिल के बहलाने को गाली अच्छा है।
- 34:01हमने देखी है जन्नत की हकीकत लेकिन।
- 34:07मैं अच्छी तरह से देख लेता हूँ जो दीक्षा लेने आता है व्यक्ति वह
- 34:12कितना संकल्पवान है क्योंकि ज़ोर वहाँ मेरा लगता है कहाँ किस तल से
- 34:21उठा के तुम्हें? विशुद्धि तक लेके आना पड़ता है वह
- 34:26मैं ही जानता हूँ तुम नहीं जान सकते और विशुद्धि पर भी तुम अपने
- 34:34प्रयास से नहीं आये। यहाँ तक भी तुम्हें जैसे तैसे
- 34:39करके घसीट के लाना पड़ा। और कोई बड़ी बात नहीं है।
- 34:44अगर तुम ऐसे ही डरते रहे तो काम क्रोध अगर नहीं तुम्हें डगाएगा तो
- 34:50वह डगा देगा। ये भय भी एक विकार है।
- 34:57पता नहीं क्यों मैं कभी कभी सोचा करता हूँ।
- 35:03विकारों को कहने वाले हुए भय को क्यों नहीं विकार में शामिल किया,
- 35:08जबकि सबसे बड़ा विकार ही भय मृत्यु का भय इससे बड़ा विकार कोई
- 35:17है ही नहीं और इससे बड़ा झूठ कोई नहीं।
- 35:21तो मुझे कई बार हैरान की होती है। पथ प्रदर्शकों के ऊपर
- 35:27मार्गदर्शकों के ऊपर संतों के ऊपर विद्युत जनों के ऊपर के भय को
- 35:33विकार के अंदर क्यों नहीं डाला गया, जबकि सबसे बड़ा भय।
- 35:38ये विकार है। तुम इस विकार को जीत नहीं सके तो
- 35:53इसका मतलब साफ है कि तुम्हारा संकल्प अति अति क्षण है।
- 36:02मुझे मूर्ख बनाने की चेष्टा न करो।
- 36:08ये तुम्हारी मूर्खताएँ मेरे आगे तो नहीं चलेंगे क्योंकि मैं अच्छी
- 36:15तरह से जानता हूँ, संकल्पवान व्यक्ति।
- 36:24अगर चाहे तो समुद्र में आते हुए तूफानों को रोक देता है, तुम एक
- 36:33मृत्यु के भय के तूफान को रोक ले सकते हो जो कि नकली है असली भी
- 36:38नहीं। मृत्यु आई भी नहीं, नकली है, बस
- 36:43वह है सिर्फ विचार आए मृत्यु तो नहीं आई ना, कैसे बनोगे तुम?
- 36:52ईशा ईशा एक कुश्ती पे जा रहे हैं। रात होने को है सूरज ढल गया है
- 37:08आधे रास्ते आगे मझधार में जिसे कहते हैं और बहुत से लोग उसमें 50
- 37:15लोग बैठे हैं। बड़ी सी कसती है तूफान आ गया और
- 37:25ईसा मस्त बैठे। जो मस्ती के आशिक हैं वो बैठेंगे
- 37:37भी तो मस्ती में बैठेंगे। ओह, गाएंगे तो भी मस्ती में
- 37:42गाएंगे, अब बोलेंगे तो फिर मस्ती में बोलेंगे ओह मस्ती के आशिक हैं
- 37:49मस्ती उनका इश्क हैं तूफान आ गया भयंकर तूफानों का।
- 38:01गड़गड़ाहट हुई। चारों तरफ शोर शराबा मच गया।
- 38:05नाव हिलने लगी। थोड़ी थोड़ी हिली, फिर बहुत
- 38:08ज्यादा डरने लगी और इतनी डरने लगी कि समुद्र की लहरें उठ उठ के नाव
- 38:16के भीतर गिरने लगीं और एक बार भी तो ऐसा लगा।
- 38:23एक तूफान की ये लहर है, किश्ती को पानी से भर देंगे, और मजेदार में,
- 38:30हम है बस बचने का कोई रास्ता नहीं है आज प्रभु से प्रार्थना कर लो।
- 38:39अंतिम वेला आ गया, थोड़ी थोड़ी हल्की हल्की काली माँ छा रही,
- 38:48सूरज ढल चुका है, सभी ने देखा चिल्ला रहे हैं, रो रहे हैं।
- 38:57उछलकूद कर रहे हैं, अपने अपने भगवानों से प्रार्थना कर रहे हैं।
- 39:04बड़ा शोर शराबा है लेकिन इस शोर शराबे के भीतर एक व्यक्ति बड़ा
- 39:09शांत मुद्रा में बैठा है। उसके मुखमंडल पर आबोहवा कुछ।
- 39:17ताजा नजर आती है। कुछ मस्तानी से सुगंध उसके भीतर
- 39:24से प्रकट हुई लगती है। ऐसा लगता है कि बाहर के कोलाहल से
- 39:30यह अभी अछूता है। इसे पता नहीं के बाहर तूफान आ गया
- 39:41है। इतना मस्त और इतना अलगाव से बढ़ा
- 39:48है, चीखों पुकार हो रही है, रवा धोई हो रही है, प्रार्थनाएँ हो
- 39:55रही हैं। लेकिन इस आदमी को ज़रा भी फर्क
- 39:57नहीं पड़ता। ईशा मस्त हुए बैठे है।
- 40:04आँखें बंद और मस्ती के भाव में उस मस्ती के शोर और को पीते हुए तो
- 40:13एक व्यक्ति ने देखा। उसने बाकियों को चेताया कि ये
- 40:17क्या है या कोई पागल लगता है? जो समझदार थे वो उठ गए, उन्हें डर
- 40:26लगाओ, ध्यान रखना डर समझदारों को लगता है।
- 40:35आशिकों को कभी डर नहीं लगता। मस्तों को कभी डर नहीं लगता डर
- 40:42लगता है समझदारों को जो समझदार थे वो जाग गए, उन्हें डर लगा और जो
- 40:52आशिक थे वो नहीं डरे। वो मस्ती से बैठे रहे, आँखें बंद
- 40:58किए उस सुरूर को पीते रहे, किसी आदमी ने हिलाया ज़रा जगा तो दे,
- 41:10मरेगा तो हम भी और ये भी? लेकिन जागता जागता तो मर जाए।
- 41:17चलो इतना ही उपकार कर दो, किसी ने सोचा उसको जोड़ा उठ जा भाई, देख
- 41:26बाहर क्या है? तूफान चल रहा है ऊंची ऊंची लहरें।
- 41:32इतनी ऊंची ऊंची लहरें और नाव तो भरने को है बस अब डूबी तब डूबी
- 41:42बेड़ा पार होने को है, तुम भी आखरी परिदृश्य देख लो।
- 41:52आँखें खोली ऐसा मशीन देखा तूफान था, बड़े वे का तूफान था, शोर
- 42:04शराबा कुछ गना था। आगे से भी तेज हो गया था तूफान।
- 42:12फिर आँखें बंद कर ली। उस आदमी ने फिर चखाया पागल हुए हो
- 42:19क्या सुना नहीं तुमने कहता है इससे कह दो, शांत हो जाएगा।
- 42:26तूफान से कह दो, शांत हो जाएगा फिर तब वह हँसे, सभी हँसे।
- 42:41इससे मृत्यु के वेला में हँसी आई आनी नहीं चाहिए थी, लेकिन इसके
- 42:48पागलपन की कहानी पे। हँसी आई ये क्या कह रहा है कहने
- 42:55से कभी तूफान रुकते हैं। उन्होंने फिर हिलाया थोड़ा से लोग
- 43:04चलो मरने तो चले हैं, थोड़ा मज़ा ले ले, उन्होंने फिर हिलाया।
- 43:13कि भाई हमने तो कह दिया नहीं रुकता ये हम तो प्रार्थना भी किये
- 43:17हैं। भगवान से अपने अपने भगवानों को
- 43:19सबने याद कर लिया और सभी धर्म के लोग बैठे थे।
- 43:24उसमें ऐसा कहने लगे कि तुम कह दो। रुक जाएगा तो वह व्यक्ति बोले सभी
- 43:39क्या हमसे तो नहीं रुका, तुम ही कह दो ना रुक जाए अच्छा सभी की
- 43:45जान बच जाएगी। नहीं तो हम स्वीकार कर चूके हैं
- 43:49कि बस गए। अब आखिरी वेला है, अब नहीं मिल
- 43:53पाएंगे अपने घर वालों से अपने प्रेमी सज्जनों को अब नहीं मिल
- 43:59पाएंगे रात होने चली है कहीं गर्त में, अंधेरे में डूब जाएंगे
- 44:06समुद्र गहरा है। तुम ही कह दो, हमारी बात तूफान
- 44:18नहीं मानता और तूफान भी कभी किसी की बातें मना करता है।
- 44:26ईसा उठे ईसा उठे। उन्होंने हाथ सामने किया, बोले
- 44:39रुक जा रुक जा, बहुत हो गया, रुक जा और तूफान रुक गया।
- 44:56संकल्पवान व्यक्ति तूफानों को रोकने की क्षमता रखता है और एक
- 45:03बार कहा था सिर्फ तुमसे न काम रुकता है, न क्रोध रुकता है, न
- 45:11लोभ, न मोह, न अहंकार। न ही ये भय रुकता है ये तुम्हारे
- 45:17जी का जंजाल बन गया तुम खाक संकल्प जीसको मृत्यु का भय डगा
- 45:31दे। कोई भी वासना डगा दे वो पंथ पे चल
- 45:38पड़ेगा, ये पंथ उसके लिए नहीं है। मैंने पहले दिन ही कहा था।
- 45:50अगर शीश को हाथ पे रखने की जरूरत ना हो तो घर बैठे रहना बस कोई काम
- 45:59धाम कर ले, ना व्यापार कर ले ना कोई नौकरी पेशा कर ले कोई छोटी
- 46:04मोटी नौकरी ढूंढ लेना। इन पंगों में मत पड़ना ये
- 46:13ज़िन्दगी के साथ खिलवाड़ करने के रास्ते है तुम ढूंढ़ते हो इसमें
- 46:21मस्ती, मस्ती तो आएगी लेकिन ज़िन्दगी।
- 46:28से खिलवाड़ पहले करना पड़ेगा क्योंकि जिसे तुम ज़िन्दगी कहते
- 46:34हो वो ज़िन्दगी का धोखा है, वो ज़िन्दगी है नहीं तुम्हारी मानी
- 46:41हुई ज़िन्दगी तुम्हारी जानी हुई ज़िन्दगी तो तुमने अब तक जानी ही
- 46:46नहीं। तुम जो जीवन हो वो तो तुमने अपने
- 46:54जीवन को कभी देखा ही नहीं, तुमने तो सिर्फ माना हुआ जीवन उसको जीवन
- 47:02समझ लिया और उसी के मरने का भय है।
- 47:06हमारे भीतर अब कितनी बार बोलू भाई?
- 47:112000 से ऊपर की वीडियो मैं बोल चुका हूँ और हर एक वीडियो में यही
- 47:18बात होती है एक ही बात होती है। और कमाल की बात है तुम्हारे गले
- 47:29से नीचे उतरती तुम आत्महत्या तो कर सकते हो अहंकार की हत्या नहीं
- 47:42कर सकते पर मैं तुमसे कहता हूँ आत्महत्या करना बड़ा आसान है।
- 47:49बच्चों का खेल क्या मुश्किल? मुश्किल तो है अपने को मार देना,
- 48:01अपने भ्रम को खत्म करना उस पर नग्गी, तलवार फेर देना, उसका शीक
- 48:08काट लेना। जैसे रामकृष्णा परमहंस ने सदा से
- 48:14माननी हुई अपनी माँ काली का सिर काट दी थी वो वीर कहलाए तुम कायर
- 48:21कहलाओ नकली है, रोज़ बोलता हूँ, शस्त्र बोलते है, संत बोलते है।
- 48:28सारे बोलते हैं। कबीर कहते हैं सभी संतों की बातें
- 48:35यक् सा होती हैं, मूर्ख अपनों, अपने सभी सयाने, एक मत सभी सयाने
- 48:52एक बात कहते हैं। जिसे तुम ज़िन्दगी समझते हो वो
- 48:56ज़िन्दगी है ना वो नकली ज़िन्दगी है पृष्ठ के फूल ना तुमने माने
- 49:02हुए है असली फूल नहीं है यहाँ से सुगंध नहीं उठेगी और उठती भी नहीं
- 49:08है रोज़ लोग मुझसे कहते हैं आके बाबा दुखी।
- 49:14मैंने कहा नकली फूलों से कभी सुगंध आती है तुम जीस जीवन को
- 49:22पकड़े हो, जीवन करके उससे कभी सुगंध मचती नहीं आएगी, क्योंकि वह
- 49:29असली जीवन है नहीं, वह असली फल नहीं है।
- 49:33वह धरती की छाती को फाड़ के नहीं आया और तुम उसको जीवन समझे बैठो,
- 49:42मान लिया है तुमने काश तुमने जाना होता और जानने की प्रक्रिया अगर
- 49:51तुम्हें। कोई समझाता है तो यह भय की वादा
- 49:55बीच में फंस जाती है। यह तुम्हें आगे नहीं चलने देता।
- 50:01कितनी कितनी उदाहरण है तुम्हें रोज़ देता हूँ रोज़ कहते हैं गोरख
- 50:07मरो हे जोगी मरो। मरो मरण है मिठा ऐसी मरणी मरो जीस
- 50:17मरणी मर गोर खदृठा अपना वो असली फूल देखो जो तुम्हारे वेदर खिला
- 50:25प्लास्टिक के फूलों में मत उलझो इनको मार दो।
- 50:31तुम खाक संकल्प बांधो इन माने हुए नकली फूलों को तुम असली फूल समझे
- 50:44बैठो। और तुम इन भ्रमों को भी नहीं तोड़
- 50:50पाते तो तुम पहुंचोगे कैसे? तो रास्ता बड़ा दुष्कर अज्ञात
- 50:58राही हैं। साथ।
- 51:04ही ना कोई मंजिल दिया है ना कोई महफिल चला मुझे लेके।
- 51:22है दिल अकेले कहाँ साथी ना कोई मंजिल दिया है ना कोई।
- 51:42महफिल चला मुझे लेके है दिल अकेले कहाँ।
- 51:59अज्ञात रहे। अंधेरी रात आसमान पे बादल रात भी
- 52:09अमावस्या की रात तारा भी तो नहीं दिखता, चाँद भी तो गायब है।
- 52:20घने बादल छाये हैं। काले मेग हाथ को हाथ नहीं दिख
- 52:28रहा, तुम कहाँ खड़े हो इसकी कोई खबर नहीं और तुम्हारे साथ भी कोई
- 52:37नहीं। तुम अकेले हो और इन अज्ञात राहों
- 52:43पे तुम्हें चलना है तो सोचिए कितना साहस चाहिए और साहस तुममें
- 52:54इतना भी नहीं। कि तुम विचारों को साक्षी रूप से
- 52:59देख लो, विचार मृत्यु नहीं है, मृत्यु के विचार हैं विचार मृत्यु
- 53:11नहीं है, समझे न बात को मृत्यु के विचार हैं।
- 53:18और तुम इन नकली विचारों से डरते हो, कंपनी रख जाते हो, वैसे तो
- 53:25संसार सारा कायर कायरों की भाषा में उलझा उलझा कोई वृक्षों को।
- 53:36मान रहा है। वृक्षों से डर रहा है, लोग झंडों
- 53:40की पूजा करते हैं, लोग खेत्रबाल की पूजा करते हैं।
- 53:47कभी देखा नहीं, कभी सोचा नहीं ये पेड़ है, तुम इससे कोई डरते हो।
- 53:58कितना संकल्प होगा तुम में? तुम उनकी पूजा करते हो, जो है ही
- 54:04नहीं, तुम उनके चिराग लगाते हो जो तुमने देखे हैं?
- 54:13ये लाल नाम वाला ये पीर, ये खीर देखी है तुमने और फिर बोल तो मैं
- 54:23हूँ टाँगे तुम्हारी कबती है, ये बड़े मज़े की बात है।
- 54:31मैं बोला करता था मेरे साथ खड़ा हुआ आदमी कंपा करता था, मैंने कहा
- 54:34तुम को कब रहेगा? बोलता तो मैं हूँ कहता वो तो ठीक
- 54:40है बाबा लेकिन तुम्हें तो वो कुछ कह नहीं पायेगा, मेरे गोटना जरूर
- 54:44मार देगा ऐसे ऐसे विचार हैं तुम्हारे डर के।
- 54:52जिनमें संदेह ही संदेह भरा पड़ा है संकल्प है और जहाँ संदेह है
- 54:58वहाँ संकल्प नहीं। इसलिए कृष्ण ने कहा, स्वयं से
- 55:01आत्मा बनिश्चित नहीं है, जिसके भीतर संदेह होता है।
- 55:09वह मर ही जाता है, उसका विनाश हो ही जाता है और संदेह तुम्हारे
- 55:17भीतर से जाता नहीं है, रोज़ तुम संदेह उठाते हो शब्द नए नए कर
- 55:23लेते हो, डायमेंशन नए नए खड़े कर लेते हो।
- 55:28उनके भीतर छिपी मौत में साफ देखता हूँ तो मैं ना जाने क्यों नजर
- 55:34नहीं आती हो। हद हो गई भला अगर किसी का तुम
- 55:43चिराग न चलाओगे। वो तुमको घोड़ना कैसे मार देगा
- 55:49भाई? उसके बाप का कुछ देना है हमें कोई
- 55:55कमिटमेंट कर के आएगा उसकी क्या औकात तुम्हें दिया जलाने को वो
- 56:03मजबूर कर दे? लेकिन तुम डरते हो, तुम परछाइयों
- 56:10से डर जाते हो, तुम ऐसे कायर हो, थपेड़ों से डर जाते हो।
- 56:16दो इत्ते लगी हो, कहीं उससे डर जाती हो में जा रहा हूँ से डर
- 56:22जाते हो। तुम्हारी कायरता की कोई सीमा नहीं
- 56:30और कोई कितना ही तुम्हें विश्वास दिला दे, लेकिन तुम्हारी कायरता
- 56:36है के वो टूटने का नाम नहीं लेते। सब डर के फरमान है किसी तरह से
- 56:55पेश करो, कोई चेहरा बना के आ जाओ, कोई मेकअप करके आ जाओ, कोई पोशाक
- 57:05डाल के आ जाओ। लेकिन मैं अच्छी तरह से जान
- 57:09लूँगा, मैं धरती के बीच की खबर रखता हूँ, मैं आसमान के ऊपर की
- 57:18खबर रखता हूँ, मैं चारों देशो की खबर रखता हूँ मुझसे तुम कुछ नहीं
- 57:24छुपा सकता है। ज़रा सोचो तो मेरी ही सृष्टि में
- 57:33मुझसे कुछ छुपा रह सकता है सोचो मेरी ही सृजना में कुछ ऐसा हो
- 57:44सकता है जो मुझसे ही छुपा? हो और मैंने ही तुम्हें सोमवार कह
- 57:50दिया मत डरो मत डरो, तुम्हारा डर गलत है, ये सब भ्रम है, ये सत्य
- 58:03नहीं है। ये फूल रिस्ट्रिक्ट के हैं के
- 58:09धरती का गर्भ फाड़ के आए हुए फूल हैं डरो मत, ये परछाइयां लेकिन
- 58:20तुम कहाँ छोड़ते हो? तुम इस डर को छोड़ते ही न?
- 58:31दिल है के मान्यता नहीं दिल है। के मानता नहीं वे करारी क्यों हो
- 58:53रही है यह जानता ही नहीं। दिल है।
- 59:06कि मानता नहीं ये बेकरारी क्यों हो रही है, ये जानता ही नहीं बस
- 59:18यही तुम्हारा हाल है। तुम नहीं मानोगे?
- 59:24और जलते रहोगे भीतर से और तुम बुलाते रहोगे पुकारना रहोगे संतों
- 59:32को हम दुखी दुखी रहोगे। ये बेकरारी है, किस लिए है?
- 59:42ये जानता ही दिन दिल है के मानता। संतों की बात को ये दिल मानता
- 59:51कितने ही बोले जां बस बोले जां कोई फर्क नहीं पड़ता।
- 1:00:00तुम्हारी बेकरारी क्यों है, क्यों रात भर नींद नहीं आती तो दिन भर
- 1:00:13बेचैनी रहती है, यह जानता ही नहीं है।
- 1:00:21बेकरारी है किस लिए उसका कारण तुमने कभी नहीं जाना है।
- 1:00:26ये भय है जो तुम्हें ये बेकरार है, मृत्यु का भय और भय है सिर्फ
- 1:00:32भय, विचार है, भावना है, सत्य नहीं है।
- 1:00:38जब सत्य में वो आ जाएगी तो क्या हाल होगा जनाब अभी तो सिर्फ वैसे
- 1:00:48ही कहाँ पे हो एक तो मैं आखरी बात बता दूँ प्रबल प्रबल संकल्प।
- 1:00:58ईसा जैसा क्योंकि बच्चों का खेल नहीं है से इस रात से निकल जाना,
- 1:01:06आशुतोष निकल गया तो वह कोई बच्चा नहीं था।
- 1:01:11वह जानता था स्वयं को बस इस सूचना का अभाव था उसके भीतर।
- 1:01:18कि अगर यहाँ से निकला तो वापस नहीं आ पाऊंगा।
- 1:01:23कारण को साथ ले गया। देही को साथ ले गया वापस आने को
- 1:01:27क्योंकि जब भी निकलेगा कोई देही। सहस्रास है तो कारण साथ जाएगा जब
- 1:01:39भी निकलेगा देही न भी चक्कर से तो कारण साथ नहीं जाएगा।
- 1:01:47कारण सिर्फ जाता है जब देही मात्र सहस्रास से निकलता है।
- 1:01:53क्योंकि वो अंतिम यात्रा होती है और जब ये देह ही गल जाएगा तो
- 1:01:58मैंने आपको बताया है फिर देह तो होगा नहीं, फिर यात्रा इसके कारण
- 1:02:04शरीर की सहस्रार से होगा। उससे पहले।
- 1:02:13मैंने तुम्हें कहा बाहर एस्ट्रल ट्रैवलिंग करनी हो, बाहर जाना हो,
- 1:02:18घूमना फिरना हो, सोक हो घूमो, फिरो बड़े रास्ते हैं, परमात्मा
- 1:02:23की सृष्टि बड़े प्यारे हैं, तुम्हारे लिए ही बनाई है, इसे
- 1:02:31देखो नेहरू। और इतनी संकल्प तुम्हारे में है
- 1:02:36भी नहीं कि तुम इस सृष्टि को देखने के लिए भी सहस्राज से निकल
- 1:02:43जाओ या गलती कभी सोच के भी मत करना ऐसा सोचना मत।
- 1:02:49तुम निकल नहीं सकते। इतना नहीं है संकल्प तुम्हारे हाँ
- 1:02:53व्यक्ति में इतना संकल्प नहीं होता, बिल्कुल बेफिक्र हो जाओ तुम
- 1:03:01जो व्यक्ति अपनी रोज़मर्रा के काम, क्रोध लो मो अहंकार।
- 1:03:08इन छोटी छोटी कमजोरियों को नहीं जीत सकता।
- 1:03:12उसके भीतर कितना संकल्प होगा? तुम समझी सकते हो जो ईसा मात्र कह
- 1:03:19देता है कि रुक जा तूफान रुक जाता है और तुम इतना भी नहीं कह सकते
- 1:03:26हो। काम के तूफान को नहीं कह सकते।
- 1:03:29रुक जाओ नहीं कह सकता है और काम क्रोध लोह मोह अंकार तुम्हें अपने
- 1:03:42परिवेश में घर लेता है। इसलिए तुम गुलाम तुम गुलामों की
- 1:03:48तरह ज़िन्दगी जीते हो तुम कभी इंद्र नहीं बने तुम इंद्रियों के
- 1:03:52मालिक कभी हुए नहीं सदा इंद्रियों ने तुम्हें बट्टिकाया है, वह खाया
- 1:03:57है इंद्रियों ने अपने पीछे लगाया है।
- 1:04:01तुम्हें धोखा दिया है इंद्रियों ने।
- 1:04:03क्यों? संकल्प की कमी के कारण दृढ़
- 1:04:08संकल्प है ही नहीं? तुम्हारे पिता फिर फिर वो ही
- 1:04:13प्रश्न जो कल उठा था, वो ही आज फिर तुम कहते हो बाबा तुम रोज़ वो
- 1:04:20ही बात बोल देते हो? अरे भाई तुम प्रश्न रोज़ वो ही कर
- 1:04:24देते हो, भीतर तो वो ही कुनीन होती है, मैं अच्छी तरह से जानता
- 1:04:32हूँ, बाहर क्या लगाते हो ये तुमने देखना है?
- 1:04:44ऐसी मोडताएं बंद करो ये मेरी जिम्मेवारी है जब उस तन पे तुम
- 1:04:53आओगे तो योग्य होंगे 1000 से निकलने के और जल्दी जल्दी कोई
- 1:05:00व्यक्ति योग्य नहीं होता। तुम इतने काबिल नहीं हो, अभी के
- 1:05:051000 से तुम निकल पाओ, तुम कितनी ही कोशिश कर लो कोशिश करके वे
- 1:05:11नहीं निकल पाओगे। पहले खुद को जानना होता है, खुद
- 1:05:16के जानने से संकल्प घना हो जाता है, प्रबल हो जाता है।
- 1:05:21फिर उस संकल्प के साथ जाया जा सकता है।
- 1:05:25फिर चाहे नाभि चक्र के द्वारा जाओ, चाहे 1000 से जाओ, यह
- 1:05:30तुम्हारी मर्जी हो लेकिन अभी जो काम हो ही नहीं सकता उसको भी
- 1:05:36तुम्हारा मृत्यु का भय डराता है। यह कोई प्रश्न नहीं था, लेकिन
- 1:05:46मैंने तो उठा लिया कि ये सब का प्रश्न है।
- 1:05:52कहीं न कहीं मन के किसी भीतरी कोने में यह प्रश्न पड़ा होगा और
- 1:05:57जब तुम ध्यान में गहरे उतरते होगे।
- 1:06:00तो यह प्रश्न आड़े आता होगा कि कहीं ऐसा न हो, सहस्रार में से
- 1:06:05निकल जाऊं और फिर वापस न आ पाऊ तुम अगर निकल भी जाओगे सहस्रार से
- 1:06:11तो कारण तो नहीं जाएगा, समझे कारण संकल्प है।
- 1:06:18वह चेतना की बूंद है, पर मैं तुम्हें कहता हूँ अकेला देही निकल
- 1:06:25नहीं सकता, अकेले देही के लिए मार्ग क्या है, ना भी चक्कर कितनी
- 1:06:32बार समझाया तुम समझे हो। अकेले देही को अगर छोड़नी हो यह
- 1:06:39काया तो नाभि के द्वारा ही छोड़नी पड़ेगी उसे और अकेले कार्य शरीर
- 1:06:47को छोड़ना हो। अगर यह काया तो सबसे बढ़िया चक्कर
- 1:06:52उसके लिए छोड़ तो किसी भी चक्कर से सकता है।
- 1:06:59लेकिन उसके लिए विशेष द्वार है, गलती मत खाओ, मैंने ठीक से
- 1:07:07तुम्हें समझा दिया है, तुम नहीं निकल पाओगे, चाहते हुए भी नहीं
- 1:07:11निकल पाओगे। कितना ही ज़ोर लगा दो।
- 1:07:17तुम इतने संकल्पवान नहीं हो, ये हो तो नहीं सकता, लेकिन मैं
- 1:07:24तुम्हें कहता हूँ अगर अकेला दे ही निकल भी जाए इट इस इम्पॉसिबल
- 1:07:30लेकिन मैं तुम्हें कहता हूँ कि तुम मान लो।
- 1:07:33अलजेब्रा की तरह सुपोजिश तो भी देहि वापस आ जाएगा, क्योंकि कारण
- 1:07:44नहीं जाएगा। साथ में कारण संकल्प है।
- 1:07:51वह संकल्प के साथ ले जाया जाता है।
- 1:07:56यहीं गलती खा गया आशुतोष उसने करण को सात घसीट लिया और उसी मार्ग से
- 1:08:04निकल गए जिसे उसके गुरु ने बताया था।
- 1:08:07जो भी गुरु था। के कारण शरीर को लेकर सहस्रार से
- 1:08:14निकाला जाता है। वह कारण को देही के साथ ले के
- 1:08:17निकल गया। बोले गया अब बात समझ में आ गई,
- 1:08:25तुम नहीं निकल सकोगे। यह नियमों के विरुद्ध है।
- 1:08:29यह प्रकृति के ईश्वर के नियमों के बिल्कुल वृथ है।
- 1:08:32तुम जा ही नहीं सकते इसलिए ध्यान करो मज़े से इल्ल्यूज़न तो मरेगा
- 1:08:39ही, इसको तो मरना ही पड़ेगा और कोई रास्ता नहीं, लेकिन तुम नहीं
- 1:08:44मरोगे, ये मैं गैरैन्टी देता हूँ। मैं ना मरूँ मरा संसारा, कबीर ने
- 1:08:52कहा था मैं ना मरूँ मरा संसारा, संसार मरेगा संसार।
- 1:09:01यानी जो झूठा है, जो फेक है, जो इल्यूशन है, जो भ्रम है, जो
- 1:09:07ऐडेंटिटी है। सिर्फ वो मरेगा और भ्रम को मरना
- 1:09:12भी चाहिए ओघे मिला जेलाब न हारा मुझे वो तत्व मिल गया जो कभी मरता
- 1:09:20नैनम चिदं तिशास्त्रण नैनम दाहती पाबका नै चैनम।
- 1:09:28नशा शेते मारुता। श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारि हे
- 1:09:44नाथ नारायण? हैंण वसु देव श्री कृष्ण गोविंद
- 1:09:56हरे मुरारी हे नाथ नारायण। पा सो दे व पितुमात स्वामी सखा
- 1:10:16हमारे पितुमात स्वामी सखा। हमारे ए नौ त नारायण वासुदेव श्री
- 1:10:36कृष्ण गोबिंद हरे मोरा रे। नारायण वासुदेव।