Latest / Baba ji Vijay Vats / 31 Mar 25 - शक्ति और चेतना में क्या फर्क है? बुद्ध - परमात्मा नहीं है और सनातन - परमात्मा है! सही कौन?
Transcript
- 0:02मनोहर लाल बाबा अस्तित्व की परिभाषा क्या है?
- 0:18व्हाटस दी डेफिनिशन ऑफ़ एक्सिस्टेंस ध्यान से समझिएगा।
- 0:33प्रश्न महत्वपूर्ण है। बहुत बार बताया है।
- 0:39लेकिन तोड़ तोड़ के बताया है। चेतना और शक्ति मैंने दो चीजें
- 1:01कही अवसर चेतना का स्वभाव, आनंद शक्ति का स्वभाव सुख।
- 1:22ध्यान से समिति रहना अगर आपने बेसिक ये समझ लिया तो आगे जाकर
- 1:33समझने में कोई मुश्किल दर पेश नहीं आएगा।
- 1:43चेतना आनंद स्वरूप है और चेतना की एक और खासियत है।
- 1:59चेतना को पता होता है कि मैं हूँ खून का आभास, चेतना का पर्याय है
- 2:11जहाँ चेतना होती है वहाँ हूँ। वहाँ मौजूदगी का विद्यमानता का
- 2:23एहसास होता है। थोड़ी बारीक बात है, प्रश्न तो
- 2:27आपने पूछ लिया लेकिन इसको सुनना वीडियो को बड़े एकांत में है।
- 2:34तो आपको बेसिक चीज़ समझाई जाएगी, ईश्वर की इस सृष्टि की बुनियादी
- 2:42संरचना आपको समझाई जाएगी। दो ही चीजें हैं चेतना और शक्ति।
- 2:55चेतना का स्वभाव आनंद है, और चेतना का आभास वैद्यमानता हूँ
- 3:06होना चेतना को अपने होने का पता होता है के हूँ।
- 3:15क्या हूँ? ये छोड़ो, सिर्फ हूँ इसलिए इस्लाम
- 3:21में एक शब्द खोजा गया बड़ा महत्वपूर्ण है।
- 3:30ओह अल्लाह के पीछे शब्द लगाते हैं हूप हूप आप हूक बोलेंगे तो नाभि
- 3:38के ऊपर दबाव पड़ेगा झटका लगेगा स्टॉक होगा बोलिए हूप हूप नाभि के
- 3:47आस पास। जैसे मूलबंद लगता है ऐसे हो जाएगा
- 3:58यह तो हो गई चेतना शक्ति क्या है चेतना में देखने की?
- 4:12गुणवत्ता होती है। चेतना में साक्षित्व की गुणवत्ता
- 4:19होती है। अब हम शक्ति पीला जाए शक्ति की
- 4:26विद्यमानता। शक्ति हलचल पैदा करते हैं, बिना
- 4:38हलचल के शक्ति का पैमाना नहीं जहाँ हलचल है, वहाँ शक्ति है।
- 4:47क्षेत्र में ठहराव होता है। शक्ति में हलचल होती है, बुनियादी
- 4:57डेफिनिशन है, इसको बड़े गौर से समझना ये अध्यात्म का मूल भी है।
- 5:09चेतना में होने का अहसास होता है, शक्ति में नहीं होता, शक्ति में
- 5:18होने का अहसास नहीं होता, सिर्फ चेतना में होता है।
- 5:31गुरुत्वाकर्षण बल फोर्स ऑफ ग्रैविटेशन यह एक शक्ति है लेकिन
- 5:39इसको पता नहीं कि मैं हूँ, इसको ही जड़ता कहते हैं।
- 5:48ये चीजों को खींचती है अपनी तरफ, लेकिन इसे पता नहीं होता।
- 5:55चेतना को पता होता है कि मैं चेतना का स्वभाव शीत है।
- 6:05शक्ति का स्वभाव शीत नहीं है। स्वभाव से यह स्तर नहीं है जहाँ
- 6:14हलचल होती है वहाँ शक्ति होती है, सिर्फ शक्ति, अशांति पैदा करते
- 6:25हैं, जो लोग बल इकट्ठा करने में लगते हैं।
- 6:32बल किसी भी प्रकार का हो, धन का हो, पद्वी का हो, मान सम्मान का
- 6:38हो, वो अशांत होते हैं क्योंकि उन्होंने शक्ति को इकट्ठा किया।
- 6:54और जिन्होंने चेतना को भराया चेतना को इकट्ठा किया, वो शांत
- 7:02होते शिव चेतना के स्वरूप अर्ध नारीश्वर आपने देखा होगा सभा।
- 7:14अर्ध नारीश्वर में चेतना भी है, शक्ति भी है, स्त्री को, नारी को
- 7:20शक्ति का रूप दिया क्या पुरुष को चेतना का रूप दिया क्या?
- 7:33पुरुष और स्त्री यानी शिव और शक्ति दोनों मिलकर बनाती हैं।
- 7:41ये सृष्ट है, सृजन अस्तित्व है बस इतना सा।
- 7:54इसका डेफिनिशन है। दो ही चीजें हैं बाकी।
- 8:08जो तुम समझोगे, वो सब इनकी ब्रांचेस हैं बल को नहीं पता होता
- 8:17कि मैं हूँ फिर फिर इसे समझा दो। शक्ति को नहीं पता होता कि मैं
- 8:26हूँ। चेतना को पता होता है कि मैं हूँ
- 8:33हूँ शक्ति को चेतना की मौजूदगी में पता चलता है कि कुछ है।
- 8:49इसलिए शक्ति शिव के बिना स्वीकार है।
- 8:54शक्ति ही शक्ति हो और चेतना न हो, उसे पता नहीं होगा।
- 9:03जैसे अणु बम्ब शक्ति ही शक्ति है, बम्बस्टिक एनर्जी विनाश करेगी,
- 9:11सिर्फ अकेली शक्ति विनाश करेगी, अकेली चेतना शांति लेके आएगी।
- 9:24इसलिए हमारे रेश्यो ने कहा चेतना का विकास करो।
- 9:35शक्ति आनी जानी चीज़ है। समझना इस बात को चेतना आनी जानी
- 9:43चीज़ नहीं है। जो व्यक्ति इस जन्म में जितना
- 9:49चेतन हो गया, वह अपनी चेतना को खोएगा नहीं, जैसे तुम प्रथम क्लास
- 10:03कक्षा पास कर लेते हो और दूसरी में चले गए।
- 10:08फिर दसवीं में चले गए तो दसवीं में से तुम प्रथम श्रेणी में नहीं
- 10:13आ सकते, यह चेतना का स्वभाव है। जो तुमने जान लिया वो तुम्हारा
- 10:26रूप हो गया। उसको फिर फिर से जानना नहीं पड़ता
- 10:32आते हैं। बहुत सी बातें हैं ध्यान से
- 10:36समझियेगा हर पल तल बदलता हूँ, शक्ति घटती बढ़ती रहती है।
- 10:47सुबह उठते हैं टिश्यूज़ बड़े शक्ति संपन्न होते हैं सांझ घर
- 10:56लौटते हैं, शक्ति ही न होते हैं चुक गई होती है सारे दिन काम करते
- 11:04करते शक्ति। लेकिन चेतना में ऐसा नहीं होता।
- 11:13चेतना न घटती है, बढ़ सकती है और चेतना का बढ़ना ही पर्याय है।
- 11:24तुम्हारी लिबरेशन का चेतना ही बढ़ती बढ़ती पाथर से बड़ी होती
- 11:32होती होती मनुष्य हो जाती है, शक्ति की सम्पूर्णता नहीं।
- 11:41चेतना की सम्पूर्णता परमात्मा हो जाती है।
- 11:47चेतना के बिना शक्ति बेकार है, शिव के बिना शक्ति बेकार है,
- 11:59एनर्जी बेकार है। अगर चेतना न हो, फिर अस्त व्यस्त
- 12:08होगी करें, तुम्हारी गश्त में कुछ भी न होगा और तुम देख न पाओगे
- 12:15क्या हुआ क्या नहीं हुआ? एक चेतना ही ऐसा है तत्व तत्व की
- 12:24संज्ञा दे रहा हूँ। मैं चेतना ही ऐसा तत्व है जो देख
- 12:30सकता है, जो साक्षी है, जो ऑब्जर्वर है।
- 12:39जिसकी मौजूदगी में घटनाएं रिकॉर्ड होती है।
- 12:47इसलिए अगर कोई कहे कि मैं इस संसार के व्यवधान में कुछ ऐसा
- 12:54करूँ जो रिकॉर्ड न हो तो वह मुश्किल है, असंभव है।
- 13:04इस चेतना की शाक्षित्व की गुणवत्ता को देखकर ही परमात्मा को
- 13:14न्याय करी कहा गया था। जो अच्छी तरह से सभी क्रियाएं को
- 13:26भांपता है उससे कुछ छुपाया नहीं जाता।
- 13:33सभी क्रियाएं उसके सामने से गुजरती हैं, जैसे सीसीटीवी के
- 13:40सामने से। और रिकॉर्ड हो जाते हैं।
- 13:45यह आटोमेटिक सिद्धांत है। परमात्मा का बनाया हुआ है।
- 13:53अब एक छोटा सा प्रश्न आया था बीच में ले लें।
- 14:03प्रभु आपने कहा तुम्हारा कुछ नहीं अगर सयपम यानी स्वयंभू प्रकृति है
- 14:20तो भी अगर स्वयंभू। परमात्मा है तो भी इसको थोड़ा
- 14:26समझाने की चेष्टा करोगे? हाँ समझे थोड़ा सा आज फिलॉसोफिकल
- 14:32प्रवचन है इसको गहरे लोग ही सुनें, बड़ा मज़ा आएगा।
- 14:43बहुत से तंतु टूटेंगे। तुम्हारी थोपनाओं के तुम्हारी
- 14:54मान्यताओं के व्यर्थ की मान्यताएँ करेंगे।
- 15:08दो ही सिद्धांत है, एक बुद्ध का सिद्धांत तीसरा सिद्धांत तो
- 15:18सिद्धांत है ही नहीं, वो तो पागलपन है।
- 15:21मार्क्स चारवाक उन्होंने तो कुछ देखा नहीं, कुछ जाना नहीं, कुछ
- 15:29अनुभव नहीं किया। वो तो बिना देखे बिना जाने जो
- 15:34बोला बिना जाने बोला वो सिद्धांत नहीं गणो।
- 15:41चारबाग का सिद्धांत भी सिद्धांत ना गुणों यह मूर्खता है, अंधे
- 15:46होने का प्रमाण है कर्मों के सिद्धांत को चारबाग नहीं जानता वो
- 15:52कह देता है कोई लेन देन नहीं होता।
- 15:56कर्जा उठा लो, घी पे लो। कर्जा देने वाला, कर्जा लेने वाला
- 16:01दोनों नहीं रहेंगे। दोनों मर जाएंगे।
- 16:04भस्मभूत से देहश पुनर आगमनम कुतह एक सिद्धांत यह है।
- 16:21एक सिद्धांत कहता है कि प्रकृति स्वयं पैदा हुई क्योंकि जब वाद
- 16:28ववाद हुए तो संतों में जो जानते थे, उन्होंने कहा कि इस परमात्मा
- 16:37का रचना हर। कोई और है, सर्जनहार कोई और है
- 16:43सर्जना और है। सर्जनहार ने सर्जना को रचा, फिर
- 16:57एक विवाद उठा तो कहते प्रकृति तो दिखती है।
- 17:04और नियमों में चलती है और हमने इसे उगाड़ भी लिया।
- 17:10थोड़ा ज्यादा और कभी इसको पूरा उगाड़ लेंगे।
- 17:14बात उनकी भी ठीक थी अगर प्रकृति सयभम है।
- 17:26और वो लोग मानते है एक प्रकृति सहभव है यू कैन मेक यूर डेस्टिनी
- 17:33ओन डेस्टिनी तुम अपना भाग्य स्वयं मनाते हो, यह एक मत है और था।
- 17:48बुध कहता अब दीपो भव अपनी डेस्टिनी स्वयं बनाओ, अपना पथ
- 17:56स्वयं प्रज्वलित करो, तुम जो करोगे, उसी का फल तुम्हें भोगना
- 18:04होगा। इसलिए कोई परमात्मा नहीं है।
- 18:11उसका तर्क बिल्कुल ठीक था। बुद्ध का तर्क बिल्कुल ठीक है।
- 18:19अतार्क एक तर्क है। बशर्ते के कोई व्यक्ति प्रकृति को
- 18:29बनाने वाले परमेश्वर को देख न ले। अब ये बात अलग से बोलेंगे।
- 18:34मैं तो बहुत ठीक है अपनी जगह। बुद्ध कहते हैं कोई परमात्मा नहीं
- 18:43लार्ज और सफिशिएंट वो चला रहे हैं सारी सृष्टि को और नियमों में ही
- 18:53चलती है सृष्टि और बिल्कुल ठीक भी है, नियम है।
- 19:01सूरज निकलता है, नियम है, सूरज छिबता है, चंद्रमा निकलता है,
- 19:08कलाएं बदलता है, उगता है, छिबता है, ग्रह, तारे, नक्षत्र सब अपनी
- 19:16गति से चलते हैं। जैसा चलते हैं वैसा चलते हैं,
- 19:20उनका नियम है और अगर नियम है तो ज्योतिष शास्त्र बना।
- 19:26आज ये तुम पंचांग देख रहे हो, ये एक तरह से बुद्ध के अन्यायी हैं।
- 19:36क्योंकि बुद्ध कहता है कि नियम लाज आर सफीशियंट नियम सफीशियंट
- 19:45है, नियम ही काम करते हैं, तुम जैसा करोगे वैसा भरोगे ये भी नियम
- 19:54है। तो बुद्ध ने एक बड़ी विराट बात को
- 20:05अलग कर दिया। बुद्ध को दूसरी बातें
- 20:11मूर्तापूर्वक रखती हैं। कोई अपनी ही बनाई हुई सृष्टि में
- 20:17खल डालेगा। क्यों डालेगा?
- 20:25लेकिन हिंदू सनातन उन्होंने कुछ इसके पार देखा था और हमारे सनातन
- 20:33में तो आज भी व्यवस्था है। हमने लोकतंत्र का निर्माण किया,
- 20:39कोई व्यक्ति। अगर हत्यारा है, फांसी की सजा हो
- 20:44सकती है, हो जाती है तो एक सत्ता ऊपर बैठी है।
- 20:49परमात्मा की तरह ही कैन फॉर बी व राष्ट्रपति राष्ट्रपति चाहे तो
- 20:59उसको जीवन दान दे सकता है। यह परमात्मा जैसी व्यवस्था हो गई।
- 21:07न्यायिक प्रणाली ने बुद्धि के अनुसार उसका जीवन छीनने का हुक्म
- 21:14दिया। इसका जीवन छीन लो।
- 21:20लेकिन क्योंकि सनातन के भीतर अचेतन के गहरे तलों में एक ऐसी
- 21:27शक्ति विद्यमान है जो हमारे ऋषियों ने जानी बुद्ध ने नहीं
- 21:33जानी। इसलिए मैं कहता हूँ कि बुद्ध
- 21:37थोड़े इधर रह गए हैं। कबीर उस पार जाते हैं, नानक उस
- 21:45पार जाते हैं और कृष्ण तो वहाँ बैठे ही जाते हैं तो निश्चित ही
- 21:58जब बुद्ध नियमों से आगे गए नहीं। बस नियमों तक ठहर गए।
- 22:04उन्हें पता चल गया मैं कौन हूँ? ओह एमआइ बस वहाँ रुक गए।
- 22:1449 दिन का उपवास भूखा मरण कृषकाय देय हो गई।
- 22:21कृष्ण भण हो गए, गोरे थे, काले हो गए, बहुत होलिया बिगड़ गया और
- 22:29इतने निर्बल हो गए कि प्यास लगी और नदी के किनारे पानी भरने गए।
- 22:37कमंडल में पानी न भर सके। गिर पड़े।
- 22:53नरंजना नदी में उतरे, गिर गए नरंजना नदी को फलगोभी कहते हैं।
- 23:04ये बोध गया जहाँ पर। बुद्ध को ज्ञान हुआ, क्या ज्ञान
- 23:08हुआ? मैं कौन हूँ मैं?
- 23:12मैं कौन हूँ? इसका पता चलते ही भ्रम टूट गया
- 23:17है। जो दुखी होता है, जिसमें दर्द
- 23:21होता है, जो परेशान होता है जो चिंताओं में डूबता है।
- 23:26जो मरता है, जो जन्मता है, वह मैं नहीं हूँ और सभी आपदाओं का हल मिल
- 23:36गया, उसको एनलाइटनमेंट कहते हैं। तो बोधी वृक्ष के नीचे रात्रि को
- 23:54उन्हें व्रत तोड़ा। सुजाता नाम की एक स्त्री खीर लेके
- 23:58आई पकवान लेके आई। एक वर्ष पहले उसने वहाँ पर।
- 24:06मन्नत मानी थी कि मेरे पुत्र प्राप्ति हो जाए।
- 24:10मैं अगले वर्ष यहीं आकर तुझे भोजन करूँगा।
- 24:18तू सुजाता भोजन लेकर आई और बुद्ध भूखे बैठे 49 दिनों से।
- 24:25डकार मर गए, चपड़ गए सब कुछ इंतजार में थे क्योंकि घर गए थे
- 24:33आधा ज्ञान तो तभी हो गया था के भूखे मरने से नहीं होता स्टारबेशन
- 24:39कैनट लीड टु सेलिब्रेशन। आधा ज्ञान नहीं हो गया तो मन में
- 24:48सोचा संकल्प किया कि अब से मैं उपवास नहीं करूँगा, जो भोजन ले के
- 24:56आएगा तो मैं खा लूँगा, अन्यथा मैं मांग के खा लूँगा।
- 25:04तो बुद्ध ने एक सिद्धांत दिया, बुद्ध ने सिद्धांत दिया प्रकृति
- 25:11सयभम है, स्वयंभू है, खुद से पैदा हुई है, इसके बनाने वाला कोई
- 25:19परमात्मा नहीं है। बिल्कुल स्पष्ट संदेश स्पष्ट
- 25:26विचार लार्ज और सफिशिएंट समझ भी आता है।
- 25:39यह है सन्देश बुद्ध का मैं तुम्हें बताता हूँ अगर प्रकृति
- 25:50स्वयं से पैदा हुई और समझना थोड़ी बारीक बात है।
- 25:57अगर प्रकृति स्वयंभू है, स्वयं से पैदा हुई तो प्रकृति का प्रतीक
- 26:03अंश एक एक जर्रा हर चीज़ का वायु का हो, पानी का हो अग्नि का हो
- 26:15आकाश कहो पृथ्वी कौ। जल कहो पंच तत्वों के सभी जर्रे
- 26:23स्वयंभू हैं। खुद से पैदा हुए ठीक समझा गया।
- 26:36तो बुद्ध कहते हैं ये स्वयं से पैदा हुए तुम इसके मालिक नहीं हो,
- 26:48तुम कहते हो ये मेरा शरीर, मेरा धन, मेरा।
- 26:55यह गद्दी मेरी प्रतिष्ठा मेरी यहाँ मैं तुम्हें अर्क बता दूँ,
- 27:04सृष्टि के प्रत्येक ज़रे का मालिक प्रत्येक जर्रा है कोई दूसरा
- 27:10मालिक नहीं इसे फिर समझ लेना। क्योंकि ये अर्क है।
- 27:17सृष्टि के प्रत्येक जर्री का मालिक ज़रा खुद है क्योंकि वो
- 27:23स्वयंभू है, खुद पैदा हुआ है, तुमने पैदा नहीं किया तुम सिर्फ
- 27:31दवा ठोंकते हो। या बंगला मेरा या कार मेरे या
- 27:38जहाज़ मेरा या गद्दी मेरी मान सम्मान मेरा तुम सर्फ़ दावा करते
- 27:45हो है तुम्हारा कुछ नहीं, बुद्ध दूसरे अर्थों में यह कह रहा है,
- 27:51क्या तुम्हारा कुछ नहीं? जो है प्रकृति का है प्रकृति का
- 27:58हर ज़रा उसका मालिक स्वयं है, इसे ही स्वयंभू कहते हैं, मगर तुम ठीक
- 28:06से समझ जाओ तो धन्यवाद ही हो। यहाँ तक अगर तुम ठीक से समझ गए तो
- 28:14मैं आगे चल बुद्ध ने ये जानकर देखकर साक्षात मैं शरीर नहीं हूँ
- 28:25फिर बोला है। बुद्ध ने इंकार किया कि सृष्टी को
- 28:35बनाने वाला कोई सर्जक, सर्जन, हार है नहीं और बुद्ध ने यह सिद्धांत
- 28:46दिया, तुम्हारा सिर्फ फदागा है। अगर प्रकृति को सहभम मानते हो,
- 28:56प्रकृति स्वयं से पैदा हुई, परमात्मा ने पैदा नहीं की, फिर भी
- 29:02प्रकृति का प्रतीक अंश उसका मालिक खुद वह अंश है, पानी का मालिक
- 29:09पानी। पानी की बूंद का मालिक पानी की
- 29:11बूंद हवा का मालिक हवा अग्नि पृथ्वी का प्रत्येक ज़रा अपना
- 29:17मालिक सभी पदार्थों के जर्रे उसके मालिक खोद हैं क्योंकि सहभम है
- 29:26स्वयंभू है। मेरे घर में तुम्हें समझा गया
- 29:29होगा, बड़ा विस्तार कर दिया मैंने आया आगया ये एक फिलॉसोफी दूसरी
- 29:45फिलॉसोफी क्या है? बुद्ध ने जैसा देखा, ईमानदारी से
- 29:49वैसा बोल दिया ये लोग बड़े ईमानदार होते हैं अन्यथा चारवां
- 29:56को और मार्कर्स तो बेईमान होते हैं, निगाहें कहीं पे निशाना कहीं
- 30:03पे। अम्बार्किस का निशाना कुछ और है,
- 30:08दे वांट इक्वल डिस्ट्रीब्यूशन ऑफ़ मैटर।
- 30:16वह बराबर का बंटवारा चाहते हैं सभी पदार्थों का।
- 30:25ये कारण बीच में फंस गया उनके सिद्धांतों में।
- 30:29इसलिए वो कहते हैं परमात्मा नहीं हैं।
- 30:32धर्म अफीम का एक नशा है, वो किसी कारण से बोलते हैं, चारबाग का भी
- 30:42कारण है। चारवाक लुत्फ रहना चाहता है।
- 30:47हालांकि उस मूर्ख को नहीं पता कि लुत्फ या ऐश जिसे तुम कहते हो वो
- 30:53ऐश इन्द्रियां करते हैं। तुम सिर्फ इन्द्रियों को ऐश करते
- 31:01हुए देखते हो? तो तुमने ऐसा काम किया, तुम्हारे
- 31:11सामने कोई दर्द से कराहता हुआ पेशेंट बैठा है तो क्या दर्द
- 31:15तुम्हारे हो रहा है, क्या तुम कहोगे ये दर्द मुझे हो रहा है
- 31:23नहीं? तुमने सिर्फ देखा, इन्द्रियों ने
- 31:26सुख होगा, इन्द्रियों ने ऐश की तो तुमने नहीं की तुमने सिर्फ
- 31:34इन्द्रियों को ऐश करते हुए देखा, यह सत्य है, परम सत्य है इसको
- 31:40थोड़ा गहराई से विचार करके देखा। जो लोग कहते थे हमने बड़ी ऐश की
- 31:46वो गलती में ऐश की इंद्रियों ने तुमने नहीं की तो ये तो एक
- 31:58सिद्धांत था जो बुद्ध ने दिया। एक नास्तिक वाद होते हैं।
- 32:03अंधे मार्कस एक नास्तिक वाद होते हैं।
- 32:09सुजा के जिन्होंने देखा तो मैं कौन हूँ?
- 32:12उसके बाद जो टूटी कड़ियाँ थोप नाओं की उसके बाद यह बात सत्य
- 32:20सामने आया। केमिस्ट्री नहीं प्रश्न गिर गए और
- 32:31दूसरा यह तो एक वाद था, दूसरा भी वाद है, दूसरा वाद बड़ा पुराना
- 32:43है। बुद्ध का वाद 2500 वर्ष पर आना
- 32:47है। बुद्ध कहते हैं, परमात्मा नहीं
- 32:51है, इसलिए आप दीपो भबो तुम अपने जीवन के खुद निर्माता हो, तुम
- 32:59अपना मार्ग प्रदर्शन स्वयं करो। लेकिन एक और भी फिलॉसफी है जो
- 33:08ज्यादा पुरानी है क्योंकि सनातन पच्चीसों वर्ष पुराना नहीं बुद्ध
- 33:15बौद्ध धर्म पच्चीसों वर्ष पुराना है।
- 33:19सनातन तो लाखों वर्ष रहना है। सनातन में तो सभी और इसी आ गए।
- 33:26सभी इनवेंटर आ गए। सभी रिसर्चर्स आ गए, सभी
- 33:30साइंटिस्ट आ गए, जिन्होंने सब देखा खोजा और उन्होंने क्या पाया?
- 33:40उन्होंने पाया कि प्रकृति को बनाने वाला परमात्मा है।
- 33:50बुद्ध ने जिसे देखा वो व्याख्या कर दिया।
- 33:53मैं फिर कहता हूँ कि ये लोग सच्चे बहुत होते हैं।
- 33:58अन्यथा तुम्हें कुछ न समझा पाएंगे।
- 34:02एक तल पूरा कंगाल लिया बुद्ध ने प्रकृति स्वयंभू है इसलिए
- 34:06परमात्मा नहीं हूँ। प्रकृति स्वयं से पैदा हो गई और
- 34:10तुम मानते हो कि एक स्वयंभू सत्ता है जिसे तुम परमात्मा कहते हो।
- 34:17बुद्ध कहते हैं स्वयंभू सत्ता को ही मानना है तो परमात्मा की बजाय
- 34:23अगर प्रकृति को मान लिया जाए तो बिगड़ता क्या है?
- 34:28परमात्मा भी नियमों से चलाता है सृष्टि को।
- 34:33और सृष्टि भी प्रकृति भी नियमों से चलाती है।
- 34:36सृष्टि को फिर फर्क क्या है? दोनों ने ही नियमों से चलाना है।
- 34:44थोड़ी गहरी है आज के प्रवचन, लेकिन वो कल्याणकारी है।
- 34:54कबीर जैसे लोग हमारे ऋषि वो कहते हैं, प्रकृति स्वयं नहीं बनी,
- 35:05प्रकृति को बनाने वाला कोई है? और उसे वो कहते हैं, वो परमात्मा
- 35:15है, अब परमात्मा बिल्कुल वैसा जैसे राष्ट्रपति, बाकी सब वैसा है
- 35:26लेकिन प्रकृति को बनाने वाला एक अन्य शक्ति है।
- 35:31चेतना इसलिए आप यहाँ थोड़ा सा बोल दो क्योंकि बाद में फिर मैं थोड़ा
- 35:39आगे निकल जाऊंगा, ये रह जाएगा बुध जाते हैं चेतना की तरह।
- 35:55बुद्ध सिर्फ ये देखते हैं कि मैं शरीर नहीं, मैं चेतन हूँ, मैं
- 36:04खुशी का खजाना हूँ, मैं आनंद हूँ बुध को एहसास होता है चेतना का।
- 36:17लेकिन दृश्यों को अहसास होता है, पर चेतना का चेतना जब संपूर्ण हो
- 36:24जाती है, बुद्ध की चेतना संपूर्ण नहीं होती है, बुद्ध की चेतना इधर
- 36:32रह जाती है, थोड़ी बिल्कुल। उन सीढ़ियों को पार नहीं करते और
- 36:37छत के ऊपर नहीं। छत तो वो जो छत के ऊपर चढ़ गए या
- 36:48जिन्होंने छत को देख लिया। कबीर जैसे लोग नानक जैसे लोग।
- 36:53कृष्ण तो छत के ऊपर ही बैठे हैं। महावीर जैसे लोग महावीर, बुद्ध इन
- 36:58दोनों को लोग एक समझ लेते हैं, लेकिन जैन धर्म बड़ा अलग है।
- 37:07बुद्धम से राष्ट्र संकल्प का है मानव।
- 37:17पाथ ऑफ़ लिबरेशन इस दी सेम संकल्प लेकिन एक अंदाज में बड़ा फर्क है।
- 37:29वो केवल तक जाते हैं भगवान महावीर।
- 37:35के वरले की तरफ जाते हैं। लोग मुझे पूछ लेते हैं महात्मा
- 37:41महावीर क्यों नहीं कहा गया? महात्मा बुद्धि ही क्यों कहा गया
- 37:49और महावीर को भगवान क्यों कहा गया?
- 37:52आप हश्र का यही मतलब है। छोटे तल पर रह गए चेतना के चेतन
- 38:00हो गए ये पक्का मैं शरीर नहीं हूँ, लेकिन महावीर उस पर चेतना थक
- 38:08गए, सीढ़ियों के ऊपर के छोर तक। कृष्ण के मुकाबले खड़े हैं।
- 38:15विरोधी हैं विरोधी हैं पहुंचने के कारण, क्योंकि महावीर पहुंचते हैं
- 38:26संकल्प से। कृष्ण पहुंचते हैं समर्पण से कल
- 38:36दोनों का एक महावीर का भी और कृष्ण का भी।
- 38:42इसलिए महावीर आने वाली घटनाओं को व्यख्यायित कर सकते हैं, क्योंकि
- 38:46स्थल पर पहुँच गए बुद्ध नहीं कर पाते हैं।
- 38:51बुद्ध ने कभी कोई चमत्कार नहीं दिखाया।
- 38:53महाबीर दिखाते हैं, मखली गोशाल जा रहे हैं, रास्ते में एक छोटा
- 39:02नन्ना पौधा आता है, मखली गोशाल पूजते हैं, प्रभु भगवान।
- 39:12इस पौधे के बारे में क्या विचार? यह पौधा फलेगा फूलेगा, फूल आएँगे,
- 39:20फल आएँगे, यह बड़ा पेड़ बनेगा, अपने अंतिम छोर तक पहुंचेगा।
- 39:29अब ये प्रश्न बुद्ध का जोब नहीं है।
- 39:31बुद्ध कहेंगे छोड़ो, ये प्रश्न पूछने योग्य है, इन्हें बचेगा तो
- 39:37बचेगा, फलेगा तो फलेगा तुमने क्या लेना?
- 39:41नो दाय सर, तुम अपने आप को जानो, बात भी ठीक है।
- 39:49तुम भगवान को ढूंढने का प्रयास कर रहे हो, लेकिन बुद्ध कहते हैं कि
- 39:54तुम्हें शांति की आवश्यकता है और तुम्हारी शांति की जरूरत यहाँ से
- 39:59पूरी हो जाती है तो नो दाय सेल्फ। कि तुम शरीर नहीं हो क्योंकि शरीर
- 40:04ही दुखों का घर है। तुम मन नहीं हो क्योंकि मन ही
- 40:08दुखों का घर है तो उनका मुख्य जो मोटो है वो कहते हैं जीवन दुख है,
- 40:18लेकिन महावीर का ये मोटो नहीं है। ना ही कृष्ण का यह मोटा है बुद्ध
- 40:25का है अकेलों का इसलिए बुद्ध को महात्मा कहा गया है।
- 40:31पूर्ण स्तर को नहीं छू पाए आत्मा के कॉन्शस नस के पूर्ण तल को नहीं
- 40:37छू पाए। थोड़ा इधर रह जाए।
- 40:42और महावीर को कहा, क्या भगवान कृष्ण को भी महात्मा को ही नहीं
- 40:48कहता? कृष्ण को भी भगवान कहा जाता है?
- 40:53राम को भी भगवान कहा जाता है। परशु राम को भी भगवान कहा जाता
- 40:57है। जिन्होंने जान लिया कि सृष्टि को
- 41:03बनाने वाला कोई अन्य है, वह भगवान हो गए हैं, जिन्होंने जान लिया की
- 41:14सृष्टि स्वयंभू या स्वयं से उत्पन्न हुई, वह महात्मा रह गए।
- 41:21बस ये सीधा सीधा फर्क तुम्हें बदला और इसीलिए 6 साल में वह
- 41:30पहुँच जाते हैं। महावीर को आगे जाना है और 12 वर्ष
- 41:34लेते हैं। वह मुक्षा सेम थी।
- 41:40आग भीतर बराबर थी, राजपुत्र थे, दोनों भोग चूके थे, प्रचुर मात्रा
- 41:46में भोग चूके थे। फिर उसको 6 साल क्यों और महावीर
- 41:50को 12 साल क्यों? वो तो थोड़ा इधर से खिसका।
- 42:00वक्त छः वर्ष लगा। महावीर आगे निकल जाते हैं, महावीर
- 42:10बहुत पुराने हैं। महावीर की श्रृंखला बहुत पुरानी
- 42:15है। अगर हम सत्य में देखे महावीर की
- 42:21श्रृंखला तो मन्नू जी महाराज से पांचवीं पीढ़ी जैनियों की शुरू हो
- 42:27जाती है। पार्श्वनाथ।
- 42:36यहाँ से पहली पीढ़ी शुरू हो अब देखिए कितना फर्क है और बुद्ध
- 42:45कहाँ जाके आगे जन्म लेते हैं तो महावीर को 12 वर्ष लगते हैं भगवान
- 42:54होने के लिए। और बुद्ध को छह वर्ष लगते हैं।
- 43:01मुझे लोग कह देते हैं बाबा हम इतनी देर हो गई 3535 साल से।
- 43:10हम नाम ले रहे हैं पांच नाम चार नाम सहस्त्र नाम एक नाम राधे राधे
- 43:17राम राम 35 वर्ष हो गए। मैंने कहा तुम 35,000 साल हुए
- 43:22जबते रहो तो भी नहीं पहुंचेगा क्योंकि रास्ता गलत है।
- 43:29और जब रास्ता गलत हो जाता है, तुम पूर्व में चलने की तरफ की बजाय
- 43:34पश्चिम में चलना शुरू हो जाता है तुम कभी नहीं पहुंचोगे।
- 43:40इसलिए प्रथम में रास्ते चुनने में देरी लगा देना लेकिन रास्ता गलत
- 43:45मत चुन लेना। रास्ता चुनने में वक्त जितना
- 43:53चाहे, लगा देना कोई हरजा नहीं है। भटकने से अच्छा है रास्ता ठीक
- 44:02चुनना, बेड़ चाल मत करना। तुम भी चली हो नाम लेने तो चलो,
- 44:07हम भी चले भीतर आग जली नहीं, संसार बंधन लगने नहीं लगा।
- 44:16संसार में आग दिखाई नहीं पड़ी। संसार में तो मिठास दिखाई पड़ता
- 44:21है। लेकिन बुद्ध को तो संसार में
- 44:24मिठास दिखाई नहीं पड़ता। बुद्ध तो संसार को आग दिखाई पड़ता
- 44:30है, महावीर को संसार आग दिखाई पड़ता है, वो तो पिता से कहते हैं
- 44:37पिता जी मैं चला जाऊं पिता कहते हैं खबरदार।
- 44:42मेरे जीते जी ये बात मत करना, चुप हो जाते हैं।
- 44:51पिता निधन हो जाता है, पिता का संस्कार करके वापस आ रहे होते
- 44:56हैं। उनके पिता का नाम सिद्धार्थ था।
- 45:02सिद्धार्थ की मृत्यु हो गई और अंतिम संस्कार कर के सभी वापस आ
- 45:11रहे हैं। पिता ने कहा था मेरे जीते जी भण
- 45:17जाने की बात मत करना है। अब संस्कार हो गया।
- 45:22रास्ते में अभी घर नहीं पहुंचे आग देखिए ज्वाला उनके बड़े भाई नंदी
- 45:32वर्धन उन्हें महावीर कहते हैं, पिताजी?
- 45:40से मैंने प्रार्थना की थी घर छोड़ने की, मुझे कहने लगे मेरे
- 45:47जीते जी यह बात न करना मेरे मरने की बात करते ना अब तो पिताजी
- 45:53स्वर्गवास हो गए हैं। क्या मैं जाऊं?
- 45:57यहीं से आग देखिए कितनी? और तुम प्रश्न करते हो अब मैं
- 46:06तुम्हें क्या कहूँ, तुम कैसे कैसे प्रश्न करते हो?
- 46:20मैं ऐसे ही नहीं तुम्हें प्रताड़ित करता आग देखिए पिता का
- 46:28अंतिम संस्कार करके आया हुआ इसके भीतर क्या चलता होगा?
- 46:34इंतजार एक एक पल इंतजार। और नंदी वर्धन से कहते हैं
- 46:46वर्तमान इनका नाम था सिद्धार्थ इनके पिता का नाम था भैया क्या
- 46:54मैं से राजा हूँ? पिता जी तो गए।
- 47:01नंदी वर्धन बड़े क्रोध में आए ये कोई बेला है बात करने का इतना
- 47:08बोझा मेरे दिमाग में कैसे सुलझाऊंगा कैसे चलाऊंगा राजकाज की
- 47:13व्यवस्था तुम छोटे हो। तुम्हें राजकाज के कामों में मेरा
- 47:19हाथ बंटाना चाहिए। ऊपर से ऐसा प्रश्न और वो भी ऐसे
- 47:23वक्त में है। तुम होश में तो हो खबरदार, मेरे
- 47:32जीते जी ये बात मत करना। और महावीर चुप हो गए।
- 47:421 दिन नंदी वर्धन ने कहा, अब तुम जा सकते हो क्योंकि तुम्हारा होना
- 47:47न होना कोई फर्क नहीं पड़ता है। तुम यहाँ होते हो लेकिन तुम यहाँ
- 47:51नहीं होते। तुम्हारी चेतना कहीं और होती है,
- 47:57माटी यहाँ होती है तुम जाओ जहाँ जाना है, महावीर निकल पड़े।
- 48:08इसे कहते हैं अहिंसा किसी का मन नहीं दुखना।
- 48:17और 12 वर्ष में पहुंचते हैं। 29 वर्ष की उम्र में बुध ने घर
- 48:25छोड़ा है। 30 वर्ष की उम्र में महावीर ने घर
- 48:29छोड़ा बराबर बराबर सब जने बराबर। वो 6 साल में पहुंचे।
- 48:3812 साल में पहुंचे महावीर ये इतना वक्त क्यों रखा है?
- 48:45छह वर्ष करीब करीब दुगना वक्त क्योंकि उतना ही आगे जाना था
- 48:51जितना बुद्धि चले। टु नो दाय सेल्फ।
- 48:57उसके बाद उस विराट को जानने में छः वर्ष हो रहा है।
- 49:08भगवान कृष्ण। गीता के सोलवें अध्याय के तेईसवें
- 49:15और चौबीसवें श्लोक में एक बात कहते हैं महावीर ने किसी शास्त्र
- 49:22का सहारा नहीं लिया। ध्यान रखना।
- 49:24महावीर ने कोई विरोध नहीं बनाया। फिर भी पहुंचे कैवरली की उस
- 49:31अवस्था को पहुंचे और भगवान कृष्ण क्या कहता है?
- 49:37भगवान कृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति शास्त्र विरुद्ध काम करता
- 49:43है तब करता है उसे सिद्धि और मुक्ति तो छोड़ो।
- 49:50उसे सुख तक भी नसीब नहीं होता। मेरे एक एक शब्द को ध्यान से सुन
- 49:59तो बड़ी कृपा हो के तो शास्त्र विरुद्ध काम हैं, कौन से दीजिये
- 50:07सुनिए? मूर्ति पूजा करना पित्तर पूजा
- 50:15करना, भूत पूजा करना, श्राद्ध निकालना।
- 50:27पिंट, भरवाना, धाम पूजा करना, गोवर्धन की परिक्रमा करना,
- 50:38तीर्थों के चक्कर लगाना। और तप करण शस्त्र के अनुसार
- 50:58शस्त्र की विधि के अनुसार पूजा न करना।
- 51:08अब देखिए तुम पितरों को भी बनाते हो, तुम दामों पर भी जाते हो, तुम
- 51:19तीर्थों पर भी जाते हो तुम पिंड दान भी करवातें हो, तुम इस
- 51:24श्राद्ध भी निकालते हो। और क्या कहा भगवान कृष्ण ने कि जो
- 51:34शास्त्र व्रत पूजा करता है, वह सिद्धि मुक्ति तो सुन।
- 51:46सामान्य सूखता कभी नहीं पा सकता। तुम अपने आप को कृष्ण का बक्से
- 51:55समझती हो। चलो हम आगे चले।
- 52:04महावीर थोड़ा आगे निकल गए, 12 वर्ष लगे।
- 52:12मैं क्यों कहता हूँ कि कृष्ण के विरोधी छोर पे खड़े हैं, लेकिन
- 52:20समान तल है? वो ही छत है।
- 52:25छोर विरोधी वो पूर्व खड़े हैं तो ये पश्चिम खड़े हैं, वो उत्तर
- 52:31खड़े हैं तो दक्षिण खड़े हैं लेकिन पहुँच गए हैं।
- 52:34वहीं केवल की अवस्था में जैसे केवल की अवस्था में कृष्ण है आज।
- 52:42सारा संसार रूढ़िवादी मान्यताओं से भर गाय से दुखी है।
- 52:48तुम पूछते हो बाबा हम दुखी कम हैं।
- 52:52यही शास्त्र व्रत काम करके श्राद्ध करते हो, पिंडदान करते
- 52:58हो। ऐसे ऐसे तप करते हो जिनका कोई
- 53:08उपादे नहीं एक पांव पे खड़े हुए है देखो तप है क्या सर के बल खड़े
- 53:16हो जाना ये तप है क्या? प्रेत पूजा जिन्ह पूजा बुध पूजा
- 53:26तीर्थ स्नान धाम के ऊपर जाते हो। ये क्या है भगवान कृष्ण की भगत
- 53:38गीता के स्वर्ग में? अध्याय का?
- 53:40तेईसवां और चौबीसवां श्लोक की उलंघना है।
- 53:45वैसे तुम कृष्ण के भक्त हो। मुख्य बात दोनों में, बुद्ध में
- 53:56और महावीर में जो मिले थे वो मिलेंगे।
- 54:01आग। बंधन की तकलीफ और मुक्त होने की
- 54:11आग, ये जाना हो तो किसी धाम चले जाओ कोई गंगा स्नान कर लो कोई
- 54:19यमुना कर लो, कोई संगम कर लो। आग जली नहीं तो कहीं चले जाओ
- 54:27तुम्हारे सामने परमात्मा भी आकर खड़ा हो जाए तुम कहोगे नहीं हम
- 54:31पहचानते नहीं सबसे प्रथम आग होनी चाहिए।
- 54:39छुट कार्य की आग। तंग आ गए हो, संसार से संसार दुख
- 54:44लगने लगा है। इसके भोग फीके हो गए।
- 54:48ये दुख देने लगे, फिर बैरा के पैदा हो गए, फिर मुक्ति हो गई और
- 54:58ऐसा ही महावीर में हुआ। ऐसा ही बुद्ध में हुआ तो दूसरा
- 55:05वाद क्या है? प्रथम तो बुद्ध का दूसरा वाद क्या
- 55:08है? सयभम परमात्मा है, प्रकृति ने
- 55:15प्रकृति को बनाया, परमात्मा ने एक और फोर्स।
- 55:19एक और शक्ति उसने बनाया। ये दूसरा बात है जो कि सनातन का
- 55:27बात है। सनातन कहता है सृष्टि स्वयं
- 55:31उत्पन्न नहीं हुई, सृष्टि सयभम नहीं है, परमात्मा सयभम है।
- 55:39एकवंकार, सतनाम करतापुर, खंडरपो निर्वय, अकाल मूरत, अजोने शपम,
- 55:54गुरुप्रसाद खुद से पैदा हुआ परमात्मा परमात्मा ने इस सृष्टि
- 56:02को अपनाया। अब तर्क तो हम जैसा चाहें कर रहे
- 56:06हैं। तर्क खत्म नहीं होते तो बुद्ध ने
- 56:09यहाँ विराम लगा दिया क्योंकि तुम्हारे तर्क खत्म नहीं होते।
- 56:13इसलिए फिर किसी ने कुछ नहीं बनाया।
- 56:16सिर्फ नियम काफी हैं। और बुद्ध चुपचाप अपना काम करके उठ
- 56:22गए, जान लिया मैं शरीर नहीं हूँ, मन नहीं हूँ, इंद्रिय नहीं हूँ।
- 56:29एक मायने में यहाँ काम खत्म भी हो जाता है।
- 56:33इतना सा तो जान लो भाई। सब शंकाएं खत्म हो जाएंगी।
- 56:41दुख किसे होता है, दर्द किसे होता है, शोक किसे होता है, कौन जलता
- 56:48है? चिंताओं की आग में यह पता चल जाए
- 56:51तो तुम शुक्र हो गए। आनंदित नहीं हुए।
- 56:57सुख ही हो गए तो बुध कहते कि संसार दुख है और इस दुख से सुख को
- 57:09कैसे तब्दील किया जाए? और कहते जान लो, अपने आप को अप
- 57:14दीपो भवा अपने दीपक अपने मार्गदर्शक खुद बन जाओ ये ठग हैं
- 57:23ये प्रवचन देने वाले शिविर लगाने वाले इनकी कोई निहित लालसा है
- 57:30इनका निहित। कोई लोभ है, इनके पीछे मत रखो अप
- 57:36दीपो बाबा अपने गुरु स्वयं ही बन जाओ और महावीर तो अपने गुरु स्वयं
- 57:41ही बन गए जो बुद्ध आपको सिखाके गए और जो महावीर भी आपको सिखाके गए।
- 57:52महावीर ने भी कोई गुरु नहीं बनाया।
- 58:00पुत्र ने गुरु तो बनाया है, महावीर ने गुरु धारण किसी को
- 58:05दीक्षा नहीं और वो पहुंचे उस चर्म स्थिति में पहुंचे यह दूसरा बात
- 58:17है श पम। खुद से पैदा हुआ।
- 58:23वो करता पुरख वो ही करता है। वह एक है एकोंकार सत नाम उसका नाम
- 58:31सच है। एकोंकार सत नाम करता पुरख वही
- 58:39करता है। निर्भय किसी से वैर निर्पू किसी
- 58:49से डरता नहीं, अकाल मूरत अजुन किसी यौनी विशेष को नहीं है।
- 59:00मरता नहीं शेपम बाबा नानक ने कहा, वह खुद से पैदा हुआ, परमात्मा और
- 59:15सृष्टि को उसने पैदा किया। सृष्टि उसके हुक्म में ही चलती है
- 59:24और तुम सृष्टि के अधीन चलते हो। अब यहाँ थोड़ा सा एक प्रश्न थोड़ा
- 59:32सा ले लें। वैसे तो वक्त बहुत हो गया है, फिर
- 59:36बोल दूंगा। दूसरा वाद कहता है कि परमात्मक
- 59:43उससे पैदा हुआ और परमात्मा ने सृष्टि की संरचना की।
- 59:47ये दो ही बात है एक बुध वाद इसलिए बुध वाद और सनातन।
- 59:57कभी बराबर नहीं बैठ सके। सनातनियों ने बुद्ध को देड़ दिया
- 1:00:07क्योंकि विचार नहीं मिलता है। मार्ग तो सनातन का।
- 1:00:15हिंदू का और महावीर का भी निर्मल था।
- 1:00:21जैनियों का संकल्प और सनातन का समर्पण है, लेकिन जाते उसी स्तर
- 1:00:29पर हैं। दोनों संकल्प से भी समर्प।
- 1:00:36तो ये दो बात हैं एक तक पहुंचे बुध वो कहते हैं प्रकृति ही सेयपं
- 1:00:43है, एक तक पहुंचे सनातन वो कहते हैं प्रकृति नहीं, परमात्मा ही
- 1:00:49सेयपं है। परमात्मा खुद बना है, उसने बनाई
- 1:00:55प्रकृति बुद्ध कहते हैं परमात्मा ने नहीं बनाई प्रकृति, फिर अगर
- 1:01:01परमात्मा ने प्रकृति बनाई तो बताओ परमात्मा को किसने बनाया तो ये
- 1:01:05तूर पकड़ जाएगा। विवाद और कभी खत्म नहीं होगा
- 1:01:10अंतहीन। शास्त्रार्थ लेकिन कबीर कहते हैं
- 1:01:17ये मैंने देखा है और जो देखा जाता है वो विवाद का विषय नहीं होता।
- 1:01:27कबीर कहते हैं, मैंने देखा है मैं कहता हूँ आँखों देख।
- 1:01:31तुम कहते कागज़ की लेखी बुद्ध कहते मैंने नहीं देखा परमाता कोई
- 1:01:39है ही नहीं और सतवादी कबीर कहते हैं मैंने देखा।
- 1:01:49मैंने पहले भी कहा यह लोग झूठ नहीं बोलते, यह सच्चे हैं, दोनों
- 1:01:55सच्चे हैं। बुद्ध जहाँ तक गए वो बोले और कबीर
- 1:02:03नानक जहाँ तक गए, कृष्ण जहाँ तक गए वो बोले।
- 1:02:08वैसे तो चारबाक भी ईमानदार हैं। चारबाक कहते हैं, बस कोई लेन देन
- 1:02:16का हिसाब नहीं होता क्योंकि वो वहाँ तक ही गए हैं, अपनी बुद्धि
- 1:02:22को ही प्रकाशित करते हैं और मार्कस भी।
- 1:02:26प्रत्येक व्यक्ति अपनी ही बुद्धि को।
- 1:02:29प्रकाशित करता है। व्याख्यात करता है, मार्क्स कहता
- 1:02:33है कोई परमात्मा नहीं है, अफीम का नशा है तेरा ये तो होने पर है, आज
- 1:02:42आचार्य बैठे हैं एलिटेन वेटन नहीं होता।
- 1:02:47मैं कहता हूँ ये सत्य है जिसने देखा नहीं एनलाइटनमेंट का सुख वह
- 1:02:54बुद्धि खोपड़ी से विचारों को वो चाहे विचार शब्द गीता के हों,
- 1:03:01उपनिशिद के हों नहीं नहीं, ऐसी बात नहीं है उपनिशिद के हों।
- 1:03:09या अष्टावक्र गीता क्या या दुर्गा सत्य से कहा खोपड़ी से उसकी अर्थ
- 1:03:15निकाल लेगा और खोपड़ी से 1000 अर्थ निकल जाते हैं एक बात क्या
- 1:03:19है? खोपड़ी अर्थ निकालने में माहिर
- 1:03:24है। वह कैपबिलिटी ज्यादा होनी चाहिए,
- 1:03:29डिक्शनरी होती हैं, इनके पास कॉम्पिटिशन लड़े होते हैं,
- 1:03:35कॉम्पिटिशन जीते होते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उन्होंने
- 1:03:39आनंद की वह गहन गहराइयों को छू लिया।
- 1:03:43होता नहीं रहे मूड के मूड। ये मूड हैं मूड ही रहेंगे।
- 1:03:49मूड ही थे, आज का पर्वच नहीं समाप्त होता है।
- 1:03:58दो वादों का मैंने जिक्र किया। शबनम के मोती फूलों पे बिखरे
- 1:04:12दोनों की आस फले हैं। निले गगन के तले धरती का प्यार
- 1:04:29पले ए निले गगन के तले। धरती का प्यार पल बल खाती बेलें,
- 1:04:52मस्ती में खेलें थपेड़ों से मिल के गले।
- 1:05:04नीले गगन के तले धरती का प्यार पड़े।
- 1:05:14नदिया का पानी। दरिया से मिल के।
- 1:05:19सागर की ओर चले नीले गगन के तले। धरती का प्यार पले।
- 1:05:54नीले गगन के तले धरती का प्यार पाले, नीले गगन के तले धरती का
- 1:06:11प्यार पाले। श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे
- 1:06:28नाथ नारायण। श्री कृष्ण।
- 1:06:40गोविन्द हरे मुरारी हिनाथ नारायण। यन वासुदेव पितुमात, स्वामी सखा
- 1:07:06हमारे। वितुमात स्वामी सखा हमारे हमारे,
- 1:07:20हमारे हमारे। हेतुमात स्वामी सगा हमारे हे नाथ
- 1:07:38नारा यन वासुदेव हे नाथ नारा। यन वासुदेव, श्री कृष्ण गोविंद
- 1:07:54हरे मुरारी ए नाथ नारायण वासुदेव, श्री कृष्ण गोविंद।
- 1:08:05अरे मरहरी हे नाथ नारायण वासुदेव? धन्यवाद।