Latest / Baba ji Vijay Vats / 12 Mar 26 - क्या आप अपने मन के गुलाम हैं? Enlightenment प्रबुद्धता का असली अर्थ और आत्म-ज्ञान का मार्ग
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- 0:08बलराम बाबा जी शाद्रपण एक प्रबुद्ध व्यक्ति पर काम इंसान।
- 0:31में मुख्यतः क्या फर्क होता है? पहली बात तो पुत्र जो प्रबुद्ध
- 0:44व्यक्ति होता है वो किसी वक्त आप जैसा ही।
- 0:51इंसान महज इंसान आप किस तरह वह अज्ञानित हो?
- 1:04आप किस तरह? सोचता था आप किस तरह उसके
- 1:11स्वतंत्र कोई योजना ही बनाता था? काम धाम करता था।
- 1:25आपकी ही तरह उसके मन में भी वासनाएँ आती थी लेकिन प्रबुद्ध जब
- 1:35हो जाता है उसका एक लक्षण जैसे तुम्हारे पास कोई गाड़ी थी, उस
- 1:48गाड़ी को तुम ड्राइव करो। उस गाड़ी का सारा संचालन तुम्हारे
- 1:57हाथों में क्योंकि तुम ड्राइवर हो उसका कलच, गैर ब्रेक, रेस
- 2:11स्टेरिंग किधर मरना है? यहाँ तक कि बेक घर सब कुछ उसके
- 2:21हाथ में होता है और वह जैसी चाहता है गाड़ी वैसी चलती है जिधर
- 2:32मुड़ना चाहता है। गाड़ी उधर मुड़ती है, ठहरना चाहता
- 2:37है, ठहर जाती है, गाड़ी चलना चाहता है, चल देती है, गाड़ी तेज
- 2:46ही चलना चाहता है तो गाड़ी तेज चल जाती है, धीमे चलना चाहता है तो
- 2:51गाड़ी धीमे चलती है। बेक होना चाहता है तो गाड़ी बेक
- 2:57होती है यानी प्रबुद्ध व्यक्ति की गाड़ी के सब कलपुर्जे उसके अधीन
- 3:07होता है। वह उन।
- 3:10कुल परजो से काम लेता है। उन कल परजो को अपने हाथों से
- 3:17नचाता है और प्रबुद्ध होने से पहले जो व्यक्ति वो ही व्यक्ति जब
- 3:33उसके पास वासनाय आती है। तो विवासनम को कमांड नहीं कर
- 3:38सकता। मैं उसके पास मन होता है लेकिन मन
- 3:45उसके अधीन नहीं होता। उसके पास इन्द्रियां होती हैं,
- 3:51इन्द्रियां उसके वश में नहीं होती, शोर शराबे करते हैं।
- 4:00जैसे ही वह व्यक्ति प्रबुद्ध हो जाता है, उसकी इंद्रियाँ उसके वश
- 4:06में हो जाती है। उसका मन उसके वश में हो जाता है।
- 4:11उसका रोमा रवा उसके वश में हो जाता है।
- 4:14फिर वो जैसा चाहता है। वैसे ही इन्द्रियों से काम लेता
- 4:19है उससे पहले जैसे अब तुम मन तुम्हारी भी है, मन मेरे भी है।
- 4:38प्रबुद्ध व्यक्ति का भी मन होता है, लेकिन तुम्हारा मन आपके से
- 4:44बाहर सोचेगा। तुम चाहोगे वह बंद हो जाए, नहीं
- 4:49बंद होगा, लेकिन प्रबुद्ध व्यक्ति जब चाहेगा तो मन बंद हो जाए,
- 4:57सोचना बंद कर दे। वह तुरंत बंद हो जाएगा।
- 5:02मन एक इन्स्ट्रुमेंट है, उसके लिए मन, एक उपकरण मन एक पुर्जा है
- 5:10उसके लिए जैसी चाहे जब चाहे प्रयोग करें, लेकिन मन तुम्हारे
- 5:17लिए एक समस्या है। तुम्हारे लिए का प्रजा नहीं
- 5:20तुम्हारे लिए एक उपकरण अप्रेंटिस नहीं तुम्हारे लिए एक समस्या है
- 5:30प्रबुद्ध व्यक्ति के लिए संत के लिए समस्या नहीं।
- 5:35संत के लिए समस्याओं का समाधान करता है वही मन इसलिए गुरबानी में
- 5:42कहा क्या मन तू ज्योत स्वरूप है अपना मूल पछाव हाथ पांव से काम कर
- 5:49चितरंजन ना? अगर मन तुम्हारा वश में है तो मन
- 5:59के वश में इन्द्रियां होती हैं, इन्द्रियों का राजा है मन मन को
- 6:04इन्द्र कहते है, अगर मन तुम्हारे वश में है तो तुम मन को हुक्म
- 6:14दोगे। और मान इंद्रों से वही काम ले
- 6:16लेगा जो तुमने हुक्म किया था मन को अभी तो तुम्हारा मन तुम्हारे
- 6:23आभे से बाहर है। मेरे पास रोज़ लोग आ जाते हैं या
- 6:27मैसेजस आ जाते हैं बाबा ये मन बड़ा शोर मचाता है, बड़ा तंग करता
- 6:33है। सारी सारी रात नींद नहीं आती,
- 6:37छोटी छोटी बात के ऊपर उलझ जाता है क्रोज़ आता है काम आता है लोप मो
- 6:42अहंकार आता है मधु, मत्सर, भय आता है क्या करें?
- 6:51बस इसका कारण मन है पुत्र और मन तब तुम्हारे वश में होगा जब तुम
- 6:59प्रबुद्ध हो जाओगे यह प्रबुद्धता क्या होती है अपने आप को जान लेना
- 7:07कि मैं मन नहीं हूँ? अपने आप को जान लेना कि मैं शरीर
- 7:11नहीं हूँ, अपने आप को जान लेना कि यह गाड़ी मैं नहीं हूँ, यह
- 7:16स्टेरिंग, यह कलच यह ब्रेक यह रेस यह गया, यह बेक गया।
- 7:26यह सारा स्टेरिंग सारा सामान या मशीन थी।
- 7:29मैं नहीं तो नो दाये अपने आपको जान यह है प्रभुदत और जब तुम्हें
- 7:39पता चल जाता है कि जब मैं नहीं हूँ तो तुम तुरंत उसके मालिक हो
- 7:44जाते हो अभी तुम्हें पता नहीं। अभी तुम इन्हें मैं मानते हो तुम
- 7:50ये नहीं कहते कि यह मन मेरा है, तुम कहते हो, मैं मन हूँ, तुम यह
- 7:58नहीं कहते, यह शरीर मेरा है, तुम कहते हो शरीर मैं हूँ।
- 8:05तुम ये नहीं कहते ये विचार मेरा है, तुम कहते हो विचार मैं हूँ
- 8:10तुम कहते हो, ये भावना ही मैं हूँ तुमने कुचल क्यों दी मेरी भावना
- 8:16इसलिए तुम दुखी हो। मनुष्य की मूलभूत समस्या यही है।
- 8:24और तुम इन्हीं समस्याओं से परेशान रहते हो, तब तक यह परेशानी बनी
- 8:30रहेंगी। जब तक तुम इनको अपने से अलग नहीं
- 8:34जानोगे, जब तक तुम ये नहीं जान लेते कि मैं अलग हूँ और ये अलग
- 8:43है। और ऐसा होने के बाद ही तुम
- 8:47प्रबुद्ध हो जाओगे फिर मन तुम्हारे लिए यंत्र की तरह काम
- 8:53करेगा। अब यंत्र तुम्हें नचाता है।
- 8:57इंद्रिया तुम्हें नचाती हैं। मन तुम्हारा तुम्हें नचाता है।
- 9:01फिर तुम मन को नचाओगे। इंद्रियों को तुम निचओगे अब मानक
- 9:06तुम्हारा मालिक है। इंद्रियां तुम्हारी मालिक है, फिर
- 9:09तुम इंद्रियों के माल कहोगे। तुम मन के माल कहोगे तुम जिधर
- 9:13चाहोगे उधर स्टेरिंग घूमाओगे जीस सड़क पे चाहोगे उस सड़क पे गाड़ी
- 9:18निकल जाएगी। जितनी रेस से चाहोगे उतनी रेस से
- 9:23घड़ी चलेगी। तुम्हारे लिए एक यंत्र हो जाएगा।
- 9:30अभी यह यंत्र नहीं है। अभी तो तुम ही हो अभी तो यह यंत्र
- 9:36यह गाड़ी तुम ही हो। इसमें तुम खाना देते हो, पेट्रोल
- 9:41देते हो ये तुमसे अलग नहीं हुई प्रबुद्धता बस सरल शब्दों में
- 9:49मैंने समझा दिया प्रबुद्धता ये होती है जब जो अलग है वास्तव में
- 9:57वह अलग दिख जाए। कि यह अलग है और यह कोई सपना नहीं
- 10:03या कोई कल्पना नहीं, यह कोई सोचना नहीं है मानना नहीं है, ये जानना
- 10:11है नग्न आँखों से एक असत्य को जानना है।
- 10:18के वास्तव में तुम हो कौन और तुम पाओगे वास्तव में तुम शरीर नहीं
- 10:23हो इंद्रियन तुम नहीं हो जीस संत तुमने ये पा लिया जीस संत तुमने
- 10:33ये जान लिया ये शरीर से पार हूँ मैं।
- 10:38मैं इनकी सब प्रकार की गतिविधियों का संचालक भी हूँ और दृष्टा भी
- 10:44हूँ। उस दिन तुम अलग हो गए फिर ये
- 10:49मंत्र में तड़ पायेगा नहीं फिर ये मंत्र में हुक्म नहीं करेगा।
- 10:54फिर ये इंद्रियां तुम्हें तंग नहीं करेंगे।
- 10:57तुम्हारा इशारा और ये खामूश हो के बैठ जाएंगे अभी तुम गुलाम हो इसके
- 11:05और यह कोई छोटी मोटी क्रांति नहीं है।
- 11:08दुनिया की सबसे बड़ी से बड़ी क्रांति यही दुनिया को बदलने से
- 11:13बेहतर अपने आप को बदल लो। वही व्यक्ति सुखी हो जाता है
- 11:19दुनिया को बदलोगे तो दुनिया तो नहीं बदली जाएगी तुम अपने आप को
- 11:26बदल सकते हो अपने आप को कैसे बदल सकते हो अपना तन बदल कर अपना गेयर
- 11:35बदल कर? अभी तुम ये समझते हो, जो है मैं
- 11:40बोल रहा हूँ तुम गलती में हो यह यंत्र बोल रहा है, यह जो मैं बोल
- 11:47रहा हूँ मैंने हाथ उठाया, यह मैं नहीं हूँ जो हाथ उठाया।
- 11:54ये मैंने ऊँगली को आदेश दिया कि तुम उठो उठे, मैंने गले को आदेश
- 12:01दिया कि तुम गाओ, इसने गाया मैंने आदेश दिया लबों को कि तुम कुछ
- 12:07बोलो जीवा को। जो आदेश दिया वही उन्होंने बोला
- 12:13ये मेरे गुलाम है, लेकिन तुम्हारे गुलाम है।
- 12:20बस जब तुम इस दशा में पहुँच गए तो फिर ये मन जैसे तुम सोचोगे।
- 12:29जैसे तुम हुक्म करोगे, आज्ञा करोगे?
- 12:31वैसे ये काम करेगा तुम्हारी नींद नहीं रातों की हराम हो गई तुम
- 12:38बेचैनी में रात नहीं गुजारोगे करवटें बदल बदल के तुम मज़े
- 12:44सिलेक्ट होगे और सो जाओगे। तुम किसी चीज़ के बारे में विचार
- 12:52कर सकते हो। अगर चाहते हो तो लेकिन वो विचार
- 12:54समस्याओं से नहीं आएँगे। वो विचार तुम्हारी इच्छाओं से
- 12:59आएँगे। तुम कुछ सोचना चाहते हो तो उसके
- 13:03बारे में सोचोगे। लेकिन यह सोच तुम्हारे कहने से
- 13:07आएगी स्वत नहीं आएगी। ये इंद्रियाँ तुम्हारे वर्ष में
- 13:12काम करेंगी, उसे ही प्रबुद्ध व्यक्ति कहते हैं।
- 13:16वह बुद्धत्व को उपलब्ध हुआ। वह प्रबुद्ध हुआ, मेरे ख्याल में।
- 13:24मैंने तुम्हें बहुत ही सरल, स्पष्ट पूरे का पूरा उत्तर दे
- 13:32दिया है। इसमें सब उतरा गया है।
- 13:38ये ब्रेन भी तुम्हारा इन्स्ट्रुमेंट है, इससे भी तो काम
- 13:40लेते हो ये आँखें भी तुम्हारा इन्स्ट्रुमेंट है।
- 13:44जब तुम देखना चाहते हो तो देखते हो ये कान भी तुम्हारे
- 13:48इन्स्ट्रुमेंट है जब तुम चाहते हो इनसे सुनते हो जब नहीं चाहते नहीं
- 13:52सुनते हो यह जुबान भी तुम्हारे इन्स्ट्रुमेंट है जब तुम चाहते हो
- 13:57ये बोलती है नहीं चाहते चुप रहती है।
- 14:01अभी तो तुम्हारी बिना चाहे यह बोलती चली जाती है, फिर तुम इनकी
- 14:08गुरमी से आजाद हो जाते हो, फिर तुम होते हो लबरेट फिर तुम होते
- 14:14हो मुक्त अभी तो तुम इंद्रियों के गुलाम हो, अभी तो तुम मन के ओणम
- 14:18हो। अभी तो मन 2400 घंटे तुम्हें नई
- 14:22नई फरमाइशें करता है। चलो मूवी देखने चलो फलां दोस्त को
- 14:26मिलने चलो फलां फलां चीज़ खा लें। चलो कचौड़ी खा के आए भल्ला पकौड़ा
- 14:35खा के आए चाउ में चूगा खा के आए। अभी तो मन तुम्हें अपना गुलाम बना
- 14:43के रखता है और जो व्यक्ति गुलाम है वह प्रभुद्ध नहीं हुआ।
- 14:49जीस व्यक्ति का यह इंद्रीया गुलाम है।
- 14:53वह प्रभुद्ध हो गया। इतना छोटा सा फर्क लगेगा तुम्हें
- 14:57लेकिन। बहुत विशाल अंतर है, बहुत विशाल
- 15:03अंतर है, बस यही तुम्हारा लक्ष्य है जीस दिन तुम उस्तल पर पहुँच
- 15:11गए। कि तुम्हारे इंद्रियों ने
- 15:14तुम्हारे मान ने तुम्हारा कहना मानना शुरू कर दिया।
- 15:19ये तुम्हारे गुलाम हो गए। तुम इनके मालिक हो जाओगे, आज ये
- 15:24तुम्हें नचा रहे हैं। फिर कल को तुम इन्हें नचाओगे जैसा
- 15:29तुम सोचोगे जैसा तुम चाहोगे। वैसा ये तुम्हारे काम करेंगे, ये
- 15:34तुम्हारे साधन हैं, तुम इनके साधन नहीं हो आए तो तुम इनके साधन बने
- 15:41हुए हो। तुम इनकी इच्छाओं को पूरा करते
- 15:44हो, फिर ये तुम्हारी इच्छाओं को पूरा करेंगे।
- 15:48तुम जहाँ चाहोगे जाना वहाँ तुम्हें लेके जाएंगे तुम्हारे
- 15:52पांव तुम जो बोलना चाहोगे वहाँ तुम्हारी जीवा बोलेंगे तुम जो
- 15:57गाना चाहोगे वहाँ तुम्हारा कंठ गायेगा और पुत्र जब ऐसी स्टेज आती
- 16:04है, स्मृति आते है। तो व्यक्ति बड़ा आनंदमग्न रहता
- 16:08है। हर वक्त जैसे खुमार पिए पिए हर
- 16:12वक्त का खुमार यही बाबा नानक ने कहा था जिन्हें नशे जहान दे उतर
- 16:21जान प्रभात। नाम खम्हारी नान का चढ़ी रहे थे।
- 16:26नाप यह नाम की खम्हारी है इंद्रियों का तुम्हारे वर्ष में
- 16:32हो जाना, मन का तुम्हारा वर्ष में हो जाना, यह नाम की खमारियाँ और
- 16:37यह शराब ठेके से नहीं मिलती यह शराब परमात्मा के ठेके से मिलती
- 16:42है। और परमात्मा का ठेका तुम्हारे
- 16:44भीतर भीतर उतरो, उस ठेके से जाम ले लो और उस जाम को गटक जाओ,
- 16:55सुरूर चढ़ेगा, मस्त हो जाओगे। फिर बहको के नहीं फिर मदहोशी के
- 17:05आलम में लुत्फ उठाओगे तुम वक्त का अब तो तुम परिस्थितियों से दुखी
- 17:14हो फिर यही मन होगा यही इन्द्र है।
- 17:21लेखन तुम्हें सताएंगे। ये तो मेरा मन तुम्हें नहीं
- 17:25कहेगा। ए मेरे दिल कहीं।
- 17:30ओह रे चल। गम की।
- 17:33दुनिया से दिल। भर गया।
- 17:38ढूंढ ले और कोई घर में आये ए मेरे दिल।
- 17:45कहीं और चल चल जहाँ गम के मारे न हो।
- 17:56चली जहाँ गम के मारे ना। झूठी आशा के।
- 18:05तारे ना हों झूठी आशा के तारे। ना हों।
- 18:14उन बहारों से। क्या फायदा जिनमें दिल की।
- 18:21गली लूट गई। जख्म फिर से हरा।
- 18:28हो गया है। मेरे दिल कहीं।
- 18:34और चल आगम की दुनिया। यहाँ से दिल भर गया ढूंढ ले और
- 18:43कोई घर में आ फिर तो जहाँ तुम हो वहाँ स्वर्ग है जहाँ तुम हो वहाँ
- 18:52सच कांड। जहाँ तुम हो वहाँ सत्य लोग है,
- 18:57फिर तुम्हें इंतजार नहीं करना पड़ेगा कि तुम मरोगे, तुम्हारा
- 19:01गुरु तुम्हारी ऊँगली पकड़ेगा, सच खंड लेके जागा ये तो बकवास ये तो
- 19:08धंधेबाजों की बातें व्यापारियों की बातें ये धंधेबाज है।
- 19:16कहीं सचखंठ नहीं जाना है। सभी गुरु जे बोल के गए हैं वह
- 19:25सचखंठ तुम्हारे भीतर है। कहीं जंगल जाने की जरूरत नहीं।
- 19:33कहीं भाग कर उस स्थान को ढूंढने की जरूरत नहीं जहाँ गम के मारे न
- 19:39हो जहाँ तुम्हें दुख दर्द मिले ऐसी जगह ढूंढने का प्रयास मृत
- 19:46करना वह जगह तुम्हारी भीतरी है। काहे मन हो जनजा काहे?
- 20:12बन धुंधन जा आए। सरब व्यापी सब जगह।
- 20:25सरब व्यापी सदा। अलेफा सदा मेरे लिप्त है, वह
- 20:34लिप्त नहीं होता कभी किसी से। सर व बया की सदा अलेफा तो है।
- 20:47संग समा काहे काहे बन खोजन? जा है का है।
- 21:13जब तुम प्रबुद्धता की स्थिति में आ गए, यह मन तुम्हारे हिसाब से
- 21:19डांस करेगा यह इन्द्रियां तुम्हारे कहने पे नाचेंगे,
- 21:23तुम्हारे इशारे पे नाचेंगे। फिर असली सुख आता है जिसे सच्चा
- 21:32सुख कहते हैं। जिसे आनंद का रस भी कहते हैं,
- 21:38जिसे संत लोग परमात्मा का रस भी कहते हैं तब आएगा।
- 21:45जब तुम्हारा आदि भक्त तुम्हारे मन के ऊपर और तुम्हारी इन्द्रियों के
- 21:52ऊपर हो जाएगा धन्यवाद।