Latest / Baba ji Vijay Vats / 13 Jan 25 - मृत्यु हमें न केवल सुलाती है, बल्कि जगाती भी है! How did Socrates get Enlightened?
Transcript
- 0:12बाबा जी प्रणब विशेष मनी उज्जैन से पुजते हैं भगवान महावीर का।
- 0:32संथारा शरीर को छोड़ देना क्या आत्महत्या की श्रेणी में नहीं घना
- 0:40जाएगा? क्या हम उसे ऐसा नहीं कह सकते?
- 0:49वर्धमान महावीर ने आत्महत्या की। यह प्रश्न मैं जैनी हूँ, दिमाग
- 1:00में खूनता ही रहता है और मुझे मेरे मार्गदर्शक।
- 1:09सही से जवाब नहीं दिए पाए हैं। आप करवा के चाहिए बड़ा सुंदर और
- 1:23महत्वपूर्ण प्रश्न है, मैं आपको तीन उदाहरण देता हूँ।
- 1:34एक सोकरतेस एथन्स का वो महाज्ञानी व्यक्ति सुक्रात दूसरा।
- 1:53महात्मा बुद्ध ला लो या भगवान महावीर लगा लो और तीसरा आप
- 2:04जिन्होंने प्रश्न पूछा। सिर्फ समझाने के लिए कह रहा हूँ
- 2:19आपका अंहकार चोट न खा जाए और अगर खा भी जाएगा तो मुझे कोई फर्क
- 2:26नहीं पड़ता। मैंने अपनी बात समझानी है।
- 2:31समझा ही दूंगा विशेष होनी जीके तीन लोगों के बारे में आपको
- 2:48ज़िन्दगी के जीने का ढंग सही समझाया जाएगा अगर आपने मेरी बात
- 2:54को। पूर्ण सुना और ध्यान से सुना
- 2:59कोलाहलहीन वातावरण में सुना और एकांत में प्रेम से सुना भागते
- 3:09भागते मेरे प्रवचन को मत सुना करो।
- 3:14उससे अच्छा तो मत सुना करो, क्योंकि शब्दों की गड़बड़ अगर उलझ
- 3:21गई, आपके नौरंग में तो बड़ा तंग करेगी, जैसे आपको ये बात तंग कर
- 3:27रही है। अब हम शुरू करें सोक्रिटीज के ऊपर
- 3:47मुकदमा दर्ज हुआ, मृत्यु दंड मिला।
- 3:55इसको जहर का प्याला पिला दिया जाए।
- 4:01सबसे विषैला सर्प वो जहर इसको दे दिया जाए, बस यही इसकी सजा है।
- 4:13वैसे मारना किसी प्राणी की सजा नहीं होती।
- 4:20क्योंकि आप उसे मार तो सकते हैं ना सुधरण किसी व्यक्ति की सजा हो
- 4:29सकती है और बड़े मज़े की बात है कि हमने अपनी जेलों के नाम सुधार
- 4:37ग्रह रखे हुए हैं। जहाँ व्यक्ति सुधर जाए है सबसे
- 4:52पहली उदाहरण मैंने सोक्रतीज़ के ऊपर सर्कमस्टैंस आया मृत्युदंड का
- 5:03है। आपकी ऊपर से आता है विपन्नता का
- 5:10निर्धनता का कोई महत रोग आपके हो गया, कोई कहीं दर्द उठा रातों की
- 5:23नींद हराम हो गई। खा नहीं सकते सो नहीं सकते, चल
- 5:34नहीं सकते हैं। आपके ऊपर प्रस्तुतियां मनोन
- 5:48अनुकूल नहीं हैं प्रस्तुतियां शुक्र रात के भी मन अनुकूल नहीं
- 5:56हैं। ये दो व्यक्ति मृत्यु नहीं चाहते।
- 6:02आप भी मृत्यु नहीं चाहते और सुक्रांत भी मृत्यु नहीं चाहता,
- 6:11लेकिन वक्त वक्त ऐसा होता है। वक्त बड़ों बड़ों को धोल जटा देता
- 6:20है। परमात्मा की सुपरहित शस्त्र को
- 6:25प्रणाम करना चाहिए क्यों? क्योंकि उसका एक जर्रा भी तुम
- 6:32निर्मित नहीं कर सकता है, तुम गालियाँ निकाल सकते हो?
- 6:41उत्सर्जन हर एक शिकायत कर सकते हो, शिकवा कर सकते हो, लेकिन इस
- 6:53समग्र सृजना का एक रेत का कण भी। एक पानी की बूँद भी बना नहीं सकते
- 7:06तो तुम बिना अपनी औकात देखे उस सृजन हारे पे आरोप लगा देते हो,
- 7:16गालियाँ निकालते हो? गलतियाँ निकालते हो, तुम ज्यादा
- 7:24से अने समझती हो, अपने आपको अपना ही बिगाड़ते हो।
- 7:35ईश्वर का कुछ बिगाड़ा नहीं जा सकता।
- 7:39उसने जो बना दिया, बना दिया, सटीक बना दिया, अपने ढंग से बना दिया
- 7:49और तीसरा महात्मा बुद्ध या महावीर।
- 7:58ये तीन उदाहरण मैंने आपके समक्ष रखे तो हम आप से शुरू करें।
- 8:06आम इंसान संसार में रहने वाला है, उसे जीना नहीं आता है।
- 8:19अगर उसके ऊपर विपन्नता आ जाती है, घबरा जाता है, कर्ज हो जाता है,
- 8:26सर पे घबरा जाता है, बीमार हो जाता है।
- 8:34हॉस्पिटल्स के चक्कर लगाता है, वह सर्कमस्टैंसेस से लड़ता है।
- 8:46इसको आप इन शब्दों को आप। अपनी डायरी में नोट कर लेना आप
- 8:55सर्कमस्टैंसेस से लड़ते हो, जो सर्कमस्टैंसेस आपने पैदा नहीं
- 9:02किया, जो पैदा हो गया। दूसरा स्कीम से लड़ना पहला, यह
- 9:20सांसारिक व्यक्ति का काम है संकट को स्वीकार कर लेना।
- 9:31यह दूसरे व्यक्ति का काम दूसरा व्यक्ति है, सुख्रात सोक्रोटिस और
- 9:41संकट को जानबूझ के पैदा करना है उसे हम कहते हैं संत वह जानबूझकर
- 9:49पैदा करता है। हमारी पंजाबी में कहावत है आ बला
- 10:00दोपहर तक जा आ बैल मुझे मार ये तीन तरह के व्यक्ति पहले आप जिन
- 10:13पर संकट वेला आती है। और आप उससे लड़ने लग जाते हो कैसे
- 10:22इनको दूर करें? दूसरा जो संकट आए उसे स्वीकार कर
- 10:30लेता है और रास्ता भी तो कोई नहीं है और सुकरात है।
- 10:36और तीसरा संकट कोई नहीं मज़ा है जिंदगी को जिए चले जाते हैं,
- 10:47राजमहल हैं जवानी भरफूर सवस्थ शरीर सुंदर काया।
- 10:56राजकाज के मालिक होने वाले राजा सब है।
- 11:05एक इशारा और सब मौजूद हो जाता है। उसके इशारे से नाचती हैं हमाएं।
- 11:17उसके इशारे से आग धड़कती है, उसके इशारे से गुरस्तां खेलते हैं उसके
- 11:31सितारे से। उसके इशारे से फिजाएं महक दें।
- 11:38वह राजकुमार बुध कोई तकलीफ नहीं, कुछ स्वीकार नहीं करना पड़ता सब
- 11:48चंगा है। लेकिन जानबूझ के पैदा करता है और
- 11:57अब इसके विस्तार में चले ये मानवता के जीने का विरक्षण ढांक
- 12:06है। तो शायद आपने जीवन में कभी सीखा
- 12:10नहीं हो तो चले, आज सीख लो, विपन्नता है, सम्पन्नता है, आप
- 12:33घबरा जाते हो, सम्पन्नता भी अगर ज्यादा आए तो आपकी रीढ़ की हड्डी
- 12:39सीधी हो जाती है। फिर आपकी चाल देखते ही बनती है।
- 12:48थोड़ी सी लाटरी चल रही है। आपका चलने का ढंग बदल जाता है
- 12:58मेरे पैरों में। घुंघरू बना दे के फिर मेरी चाल
- 13:06देख ले जो कल तक झुके झुके से चलते थे।
- 13:17आज कमर सीधी है। 90 डिग्री के ऊपर बाहर का वातावरण
- 13:28बदला सर्कमस्टैंस बदला तो आपकी चाल भी वैसे ही बदल जाती है।
- 13:39कभी मरे मरे से चलते हो, कभी मस्तानी चाल चलते हो।
- 13:49ये आपका ढंग है जीने कहा मतलब तुम अपनी इच्छा से नहीं चलते,
- 13:54परिस्थितियां तुम्हें चलाती हैं, सर्कमस्टैंसेस तुम्हें चलाती हैं
- 14:02और तुम सर्कमस्टैंसेस के अधीन हो। बुरा वक्त आये तुम घबरा जाते हो,
- 14:16अच्छा वक्त आये तुम्हारी छाती 56 इंच की हो जाती है, ऐसा मत कर।
- 14:32थोड़ी सी संपन्नता में ऐसा सीधा कर जाती है, फिर आपकी चाल देखते
- 14:47बनती है। और तुम वो रुक जाओ क्यों?
- 14:57क्योंकि ये धूप और छाव के खेल हैं।
- 15:06व्यक्ति मान करें, अपने स्वयं अर्जन का मान करें।
- 15:11जो तुमने स्वय अर्जित किया, जो दूसरों को दी हुई, दूसरों ने कृपा
- 15:20करके तुम्हें कोई पदवी दे दी, उसका काहे मन होता है?
- 15:26वह तो दूसरों की अमानत भर होती है?
- 15:31लेकिन फिर भी तुम्हारी चाल बिगड़ जाती है।
- 15:39यह पहले व्यक्ति के लक्षण है और यह नीचस्थ लक्षण है।
- 15:44निवनतम संसार का प्रत्येक प्राण प्रत्येक मैं इसलिए कहता हूँ कि
- 15:55बाकी दूसरे या तीसरे नंबर के तो कोई कोई वरला एक आध ही मिलेगा
- 16:00आपको। इसलिए अगर मैं कह दूँ प्रत्येक
- 16:05प्रणी तो कुछ गलत नहीं है। ऐसे ही ज़िन्दगी जीता है वो तुम
- 16:19दूसरा प्रण संकट बेला आ गया। वह शुक्रांत कोई कसूर नहीं किया।
- 16:35संत कसूर करते हुए कहाँ हैं? संतों का कसूर तुम बना देते हो?
- 16:45बस टांगने का बहाना चाहिए तो हमारे पंजाबी में कहा होता है
- 16:55स्त्री कहने लगी आत्म से, मैं तेरे नहीं बस्ती।
- 17:00तो आदमी ने कहा क्यों ऐसी क्या गलत थी?
- 17:06अब कोई बहाना होती चाहिए जेल में डालने का?
- 17:14तो स्त्री कहने लगी तू जब खाता है ना तो दाढ़ी हलते।
- 17:19मैं तो भाई जब बोलता हूँ तो अभी तो बहाना चाहिए, बस ऐसे ही बहाने
- 17:27होते हैं इन लोगों के थोड़ा सा आपने पंप क्या भरा?
- 17:42कि चाल बदल जाती है, हाल बदल जाता है।
- 17:50दूसरे तरह के लोग बड़े प्यारे लोग हैं।
- 17:56उनके ऊपर विपत्ति आ गई, बुद्ध की तरह विपत्ति नहीं आई।
- 18:00बुधु तो मज़े में आपके ऊपर विपत्ति है लेकिन आप घबरा जाते हो
- 18:07सर्कमस्टैंसेस और फिर घबरा तो कोई भी चाहता है अब सबक सीखना इन
- 18:18बातों से। तो ये ऐसी कहानियों कभी कभी कोई
- 18:22पूछता है, कभी कभी कोई इस मान झील में कंकड़ी फेंकता है और कभी कभी
- 18:30ये लहरें उठती हैं और ऐसी शानदार लहरें रोज़ नहीं उठती तो इन्हें
- 18:38समाहित कर लेना। जीवन का ढंग सीखना तो सभी चाहते
- 18:44हैं जीना तो इसी तरह सभी चाहते हैं, लेकिन जी कहाँ पाते हैं?
- 18:52सुख्रात एनलाइटन नहीं। अभी उन्हें ज्ञान नहीं हुआ है।
- 19:01अभी नहीं जाना कि मैं कौन हूँ, अभी आपकी ही तरह हैं तो ऐसा समझ
- 19:08लो कि जैसे आपको ऐसा हो जाए तो आप क्या करेंगे?
- 19:14रो रो के बुरा हाल हो जाएगा। घबरा जाओगे?
- 19:21यहाँ किसी को हार्ट टैग आ जाता है तो वह बाहर निकल के कहता है मैं
- 19:26चालू आजा भाई मिल ले गले, मैं तो चालू ऐसा बुरा हाल तुम्हारा हो
- 19:35जाता है। अरे भाई हार्ट अटैक हुआ, 7080 साल
- 19:42इसने साथ में बया। उसका दिन बाद कोई नहीं, धन्यवाद
- 19:46तो तुम करना ही नहीं जानते, दूसरों की लाशों को ओड़ियां बनाने
- 19:53वाले लोग धन्यवाद की कदर क्या जाने?
- 19:58और जो धन्यवाद करना सीखा गया, जिसके हृदय से धन्यवाद निकला,
- 20:04सिर्फ जुबान से नहीं, जुबान से तो बेशकर नवीन निकले, हृदय से
- 20:11धन्यवाद निकले। तुम तो उस परमात्मा को भी।
- 20:15धन्यवाद नहीं कर पाते, शुक्राणा नहीं करते उसका बस मंदिरों,
- 20:21मस्जिदों, गुरुद्वारों चर्चा में जाके माथा टेक लेते हो, वो भी लोग
- 20:29देखाबा झुकते कहूं? रीढ़ की हड्डी ही तो झुकती है।
- 20:35नमाज़ में तुम कहाँ झुकते हो, तुम उस वृहद का जिसने सारी सृजना रची,
- 20:48उसको धन्यवाद नहीं करते। वर्ण कुछ ऐसे कुछ ऐसे नफरमान लोग
- 20:56हैं। जो परमात्मा की होत को भी इंकार
- 21:01कर देते हैं, क्योंकि अगर उसकी होत को माना तो ईश्वर के हिसाब से
- 21:12ही चलना होगा। और ईश्वर के हिसाब से चलना नहीं
- 21:16चाहते और ईश्वर कोई ऐसी चीज़ तो है नहीं कि जो इन्द्रियों से देखी
- 21:23जा सके, इन्द्रियां भी तो उसी ने दी हैं तुम्हें और वह बेहतर जानता
- 21:28है कि इन आँखों से तुम्हें क्या दिखाई पड़ेगा इस।
- 21:33इन आँखों से तुम्हें वह निर्माता दिखाई नहीं पड़ेगा जिसने ये आँखें
- 21:39बनाईं, देखिए कितनी गजब की बात मूर्ति कभी मूर्तिकार को नहीं देख
- 21:43सकते, चित्र में ये क्षमता नहीं डालता मूर्तिकार।
- 21:51कि चित्र देख ले मूर्तिकार को इसलिए मूर्ति कभी नहीं कह पाएगी
- 22:00चित्र कभी नहीं कह पाएगा मुझको बनाने वाला चित्रकार कोई है
- 22:06क्योंकि वो देख नहीं पाते। ये तो अगर कुछ गिनती चुनती के लोग
- 22:14न होते हैं, तो तुम उस अदृश्य शक्ति का धन्यवाद भी न करते हैं,
- 22:25लेकिन तुम्हारा लोभ है जीस, संसार में तुम भोगते हो, खाते पीते हो?
- 22:32संसारिक यात्रा पूरी करते हो। लोग तुम्हें ये है कि उसमें सुख
- 22:37नहीं मिलता और सुख मिलता है तो थोड़ा थोड़ा जैसे हवा का एक झोंका
- 22:47आया फिर गुम हो गया। फिर कभी आया फिर गुम हो गया अखंड
- 22:54धारा नहीं बहती उस सुगंधी तो तुम्हारा लोभ हो जाता है कि कैसे
- 23:02इस अखंड धारा को मैं प्राप्त कर लूँ।
- 23:05प्यारी पड़ी है। ये ठंडी हवाएं लहरा के आती हैं,
- 23:18मदमस्त कर जाती हैं, अपनी सुगंधी चारों तरफ बिखेर जाती हैं।
- 23:31तुम इनका गुणगान करने के बजाय मूर्ख व्यक्ति अपना गुणगान करवाता
- 23:39है, हिरण्य के शुभ की तरह, मैं ही हूँ भगवान प्रहलाद तुम मेरे पुत्र
- 23:45हो तुम नारायण नारायण मत करो। तुम हिरण न कशप हिरण न कशप करो,
- 24:07मनुष्य इतना मूर्ख है, शुक्र करो धन्यवाद करो उन लोगों का।
- 24:20वैसे वो धन्यवाद आपसे मांगते हैं क्योंकि वो इतने खुश नसीब हो गए
- 24:26हैं। इसलिए हमने भगवान का नाम रखा
- 24:29भाग्यवान जो भाग्यवान हो गया फिट फूड वह इतना भाग्यवान हो गया।
- 24:40उसका बीज इतना खिल गया कि कलि ही नहीं फूल बन गया, खुशबुओं को
- 24:48लहराता गया, दूसरों के नशा पुटों को सुगंध मान करता रहा वह
- 24:55भाग्यवान है। कुछ लोग उस तल्प पे पहुंचे,
- 25:03उन्होंने तुम्हें सिर्फ सूचना दी कि मूर्ख मत बनो, मूर्ख बनो के तो
- 25:13दुखी रहो, ओके? संसार में उलझेउल्झे चलोगे फिर
- 25:21सुख की कामना मत करो जो अखंड धारा उस सुख की बहती है, बस ये खबर
- 25:28देने वाले कोई एक आध लोग कभी कभी बीच में आ जाते हैं वो तुम्हें
- 25:32अजूबे से लगते हैं। और फिर तुम्हें लगता है ये किस
- 25:45लोक से आए हैं, लोग कहाँ से बोलते हैं?
- 25:50ये भाषा कौन से प्रयोग करते हैं? क्योंकि तुम तो किसी और के इंतजार
- 25:58में बैठे हो। तुम इंतजार में बैठे हो उल्लू
- 26:05वाहिनी लक्ष्मी और ज़रा सी दरवाजे पे आहट होती है।
- 26:18तो तुम दरवाजे के ऊपर पलट के देखते हो कि उल्लू वाहनी आ गए?
- 26:24ज़रा सी आहट होती है तो दिल। सोचता है कहीं ये वो तो नहीं कहीं
- 26:49ये वो तो नहीं? कहीं ये वो तो नहीं कहीं ये वो तो
- 27:02नहीं कहीं ये वो तो नहीं? ये कहीं उल्लू वाहनी तो नहीं आती
- 27:14है? क्योंकि जिसकी अभेक्षा तुम्हारे
- 27:19प्राणों में है, उसका ही तुम इंतज़ार करते हो वो जो सर्वदा
- 27:28सर्वदा के लिए तुम्हें। दुखों से मुक्त कर जाता है,
- 27:32पीड़ाओं से मुक्त कर जाता है उसकी तलाश तो तुम्हें अभी पता ही नहीं
- 27:37कि वो कुछ ऐसा होता है। अभी कुछ मुट्ठी भर लोग नहीं कुछ
- 27:43गिनती भर लोग तुम्हें सूचना दे देते हैं।
- 27:48अब तुम उसे पाबिल समझते हो? और तुम उनके जीवन के जीने का ढंग
- 27:54देखते नहीं क्यों ये एक स्थान पे बैठे हैं?
- 28:00दसों सालों से क्या लकवा मार गया है, क्यों नहीं?
- 28:12ये स्वादिष्ट चीजों का सेवन करता है।
- 28:18क्यों नहीं ये भाते? ये पिक्चर हाउस क्यों नहीं जाते?
- 28:22ये मेलों में क्यों नहीं जाते? जश्न मनाने क्यों नहीं जाते?
- 28:29ये क्यों नहीं जाते कोई फॉर्मैलटी करने?
- 28:32क्या कारण है? ये लोग तुम्हारी शब्द से परे
- 28:40बजाते हैं। तुम कारण कभी नहीं रचता है।
- 28:57इन गिनती भर लोगों को वह मिल गया है जिसके मिलने से सब दुखड़े दूर
- 29:03हो जाते हैं। व्यख्याएं शांत हो जाती हैं,
- 29:08दर्दो की नववृत्ति होती है। और चौबीसों घंटे श्रद्धा दिवाली
- 29:14साज़ की आठों पहर आनंद उस मस्ती के सरोवर में डूबे रहते हैं।
- 29:23क्या हुआ इन्हें तुम नहीं समझ पाओगे।
- 29:31लेकिन अगर ये मुट्ठी भर लोग न होते हैं तो मार्क्सस जैसे लोग
- 29:35आपकी ज़िन्दगी को आगे नहीं बढ़ने देते, बस वो पदार्थ ही सीमित करके
- 29:41छोड़ देते हैं, इसलिए मैं मार्क्सस को आध्यात्मिकता का घोर
- 29:47शत्रु करता हूँ। मार्कस कहता है धर्म अफीम का नशा
- 29:52है, मैं कहता हूँ मार्कस अध्यात्म का सबसे बड़ा शत्रु है, जिसने
- 30:01अध्यात्म के बीच में सुमेरु पर्वत खड़ा कर दिया।
- 30:07बुद्धि की इतनी दलीलें ये परिवार जैसे लोगों को, लेकिन इनको टोके
- 30:17भी तो कौन टोके, वही टोकेगा जिसमें उन उच्च आकाशों में झूमते
- 30:30हुए उन कलशों को। देख लिया उन कलशों पे जो सवार हो
- 30:37गए वो ही इनको टोक पायेगा उन्हें वो धरती के कीड़े लगेंगे।
- 30:47ये रेंगते हुए लोग मार्कर्स जैसे हैं।
- 30:51कोई शांति न है, कोई शीतल हवा का झोंका नहीं।
- 30:58इनके भीतर इनका मन सजा बोलता है, कभी चैन नहीं।
- 31:06इन्हें कभी करार न सारे दिन दौड़ता है, भागता है।
- 31:11तंग करता है और फिर ऐसे ही लोग विश्वास में आकर आत्महत्या कर
- 31:18लेते हैं। किशोर किसका है?
- 31:29किशोर इनका स्वयं का है। मन तुम्हारी शक्ति से चलता है
- 31:34ध्यान रखना। मैंने बहुत बार कहा और कमाल की
- 31:38बात है तुम कहते हो कि मन हमें तंग करता है, बना तुम्हारा गलाम
- 31:45तुमसे खाना ले के तुम्हें तंग करे।
- 31:50यह कहाँ का तर्क है? सीधी सी बात है, उसे खाना देना
- 31:55बंद कर दो, शक्ति देना बंद करो, मन क्यों तंग करेगा तुम्हें जो
- 32:08चलता तुम्हारी ताक से है जो चलता तुम्हारी एनर्जी से है।
- 32:18तुम्हारे पास उपाय है, लेकिन तुम करते नहीं।
- 32:21तुम इंद्र हो, रोज़ शिकायत करते हो कि हमारी इन्द्रियां हमें तंग
- 32:26करते हैं, बिल्कुल तंग करेंगे जब तुम उन्हें शक्ति देना शुरू
- 32:33रखोगे। तो भला इनका क्या कसूर है?
- 32:39फिर तुम निकल जाओगे सिद्ध से फिर ये चैन से बैठ जायेंगे।
- 32:45इन्द्रियाँ इन्द्रियाँ सभी वही होती हैं, मुर्दे को तलाश लेना,
- 32:51मुर्दे में कोई इन्द्रियाँ कम नहीं होती इन्द्रियाँ सभी वही
- 32:54होती हैं। बस तुम चले जाते हो अपना घर छोड़
- 32:58के तो ये गिनती भर लोग अगर न होते तो मार्कस जैसे दुख अपरवृत्ति के
- 33:16लोग दुख ही बखेरते रहते। लेकिन उस परमात्मा का शुक्र है तो
- 33:25उसने बुद्ध जैसे लोग भी पैदा किये और बुद्ध जैसे लोग पैदा किये तो
- 33:31एक राज़ महल का राजकुमार भूखा रह के।
- 33:38वह तत्व को छीन लेता है, प्रकृति के हाथों से और गली गली जाके
- 33:44बांटता है और अगर बुध न होते तो मारकस का कोई तोड़ नहीं था तो
- 33:56शुक्र करो। इस धरा पे मार्कस का असर क्यों
- 34:00नहीं हुआ? क्योंकि बुद्ध पहले आ चूके थे
- 34:04सिर्फ उन धाराओं पे मार्कस का असर हुआ जहाँ बुद्ध का पैगाम नहीं
- 34:11पहुंचा था। यह तो अनेकों बुद्धों के
- 34:17धर्मस्थली है। यह तो गर्व है गर्भ गृह है
- 34:22बुद्धों का। यहाँ मार्क्स का प्रवेश असंभव है।
- 34:28मुश्किल ही नहीं यहाँ मार्क्स नहीं आ सकता।
- 34:38दूसरी तरह का व्यक्ति है, जिसके ऊपर सर्कमस्टैंसेस तो तुम्हारी
- 34:44तरह आता है, वैसी ही विपन्नता है, वैसी ही करहकलिश है, वैसी ही देह
- 34:53है उसकी वैसे ही उसके फोड़ा होता है।
- 34:56वैसे ही दर्द होता है वैसे ही भूख प्यास लगती है, वैसे ही कमियों से
- 35:02जूझता है वह और सुकरात सुकरात की घर वाली बड़ी निम्न स्तर की औरत।
- 35:18लेकिन सुक्राथ इन सभी सर्कमस्टैंसेस में ऐसा गुज़र करते
- 35:24हैं शानदार कि देखने वाले की आँखें ठहर जाती हैं।
- 35:32इसके घर वाले इतना परेशान करते हैं।
- 35:35यह छोड़ क्यों नहीं देता? लेकिन नहीं छोड़ता।
- 35:39ये बहुत पुरानी घटना की बात है। 2500 वर्ष जब चाहे छोड़ सकता है
- 35:43व्यक्ति आज कोई न्यायालय नहीं है। आज कोई संविधान नहीं है और एथेंस
- 35:50में कोई परंपरा भी नहीं है। ऐसी।
- 35:53कि सुखरात को उसकी घरवाले तंग करे और घरवाले को छोड़ न सके।
- 35:57अगर छोड़ न सके तो खुद तो जा सकता है।
- 36:01घरवाले से दूर चला जाए, लेकिन बीच में ही बैठा रहता है।
- 36:10क्या हुआ? इसके भीतर कोई शॉकर आ गया।
- 36:18शोक प्रूफ कितने भी शोक बाहर से लग जाए सर्कमस्टैंसेस के वो गरीबी
- 36:25के हों और बिमारी के हों। और दर्दो के हूँ, घबराहट के हूँ
- 36:33और लोगों के कॉमेंट्स के हूँ चले उसके ऊपर के इस मुकदमे पेशियां भी
- 36:44हुईं और ऊपर से उसकी गड़बड़ी उसको बड़ा थम करती।
- 36:51उबलता पानी ला के उसके ऊपर फेंक देते बिना कारणों के उसको तंगे ही
- 37:01करते रहते? खाना देना है, नमक नहीं डाला?
- 37:09बेवजह की परेशानी वक़्त तो देखो कैसे परीक्षा लेता है किसी की
- 37:17सुक्रात इसलिए सुक्रात को महान कहते हैं तुम साधारण त्याग।
- 37:28ऐसी तुम्हारे पास औरतें घर वाली होती हैं, जो तुम्हें इतना तंग तो
- 37:32नहीं करती। वैसे तो औरतों को सदा ही शिकायत
- 37:39रहती है, शिकायत आदमियों को भी यही रहती है, वो तो चलती ही रहती
- 37:44है, तुम चाहे कोई जाल बिठा लो। बाहर की व्यवस्थाएँ बदलेंगी।
- 37:53शादी के बंधन के बजाय लिव इन में तुम रहने लग जाओगे लेकिन बात सुनो
- 38:02बंधन का कारण बाहर नहीं। यही तो चुप है औरत तुम्हें बांध
- 38:12ले तुम इतने किच्चे हो आदमी तुम्हें बांध ले तुम इतने किच्चे
- 38:19हो नहीं बंधन का कारण तुम्हारे भीतर है।
- 38:25और उसे सुखरात कहते हैं। अज्ञान बस तुम जानते हो जीस दिन
- 38:33जान दिया मैं कौन उस दिन ये बंधन बंधन नहीं है आचार्य जैसे लोग अब
- 38:40आपको समझाते रहेंगे और वो खुद पागल है।
- 38:44खुद मूर्ख हैं। कोई आईएस करके समझदार हो गया, यह
- 38:48गारंटी है। क्या तुम्हें जीने का ढंग सिखाते
- 38:55हैं ये लोग, लेकिन जीने का ढंग मैं कहता हूँ ये एक आध लोग अगर न
- 39:02होते। या तो मार्कर्स जैसे लोग आपका
- 39:06जीना हराम कर देते हैं या फिर ये आचार्य जैसे लोग आपको गलत मल्त
- 39:15राय दे के गलत मल्त व्याख्याएं करते, आपका जीना दूभर कर देते,
- 39:19जिंदगी सुखी न होते ये बात समझो। मैंने देखा है एक व्यक्ति मेरे
- 39:30पास आ गया। सभी गुरुओं के पास जाई चैन नहीं
- 39:37मिला बाबा आपकी बातें सुनकर टूट गए भ्रम।
- 39:42मैंने कहा आचार्य के पास फिर गयी थी तो उसने नखरा बनाते हुए कहा
- 39:51उसकी तो बात ही मत करो घोर संसारिक व्यक्ति आध्यात्मिकता के
- 40:03प्रवचनों में संलग्न उसे ज़रा भी शर्म नहीं आती।
- 40:10कि मैं कैसा समाज छोड़ के जाऊंगा। बेरडा समाज जब तुम आर्कस की तरह
- 40:15बजाओ, एक तरफ तो है या बुद्ध की तरह हो जाओ एक तरफ तो है, ये
- 40:25आचार्य बेरडे हैं। ना इधर के ना उधर के बस आप समझ गए
- 40:37ज्यादा फिर इज्जत नहीं अच्छी भी नहीं होती।
- 40:50दूसरे तरह के लोग हैं। सर्कमस्टैंस किसके बुरे नहीं
- 40:57होते? गरीबी आती है लेकिन अमीरी भी आती
- 41:03है, बुद्ध जैसे लोग उसको भी छोड़ कर भाग जाते हैं।
- 41:08ये क्या साबित करता है? किस बात की सूचना है?
- 41:10ये सुख तो गरीबी में भी नहीं, विपन्नता में भी नहीं और
- 41:17सम्पन्नता में भी कहाँ सुख है? बुद्ध तो सम्पन्न है।
- 41:25महावीर तो संपन्न है, राजपुत्र नहीं राजा है क्यों छोड़ देते हैं
- 41:35क्योंकि खुशहाली का राज़ है कितना ही ये सखाते जाएं?
- 41:45इनकी व्याख्याओं से पता चलता है इनकी मूर्खता का कितना ही ये अलग
- 41:53हो के गीता का प्रवचन कर रहे हैं। लेकिन हवाओं के झोंके मेरे तक
- 42:01पहुंचते ही रहते हैं। मुझे पता चलता ही रहेगा कौन से
- 42:10मेरे श्लोक की व्याख्या कैसे की गई है।
- 42:16मैंने पहले भी कहा था मेरी ही सृष्टि में अगर मुझे पता ना चले।
- 42:22तो फिर किसको पता चलेगा तो मूर्ख मत बनो और मूर्ख मत बनाओ ये ज्ञान
- 42:33यही धरा रह जाएगा, कोई कदर नहीं करेगा।
- 42:37देखिए इस बिरड़े ज्ञान को तो कोई कदर नहीं करेगा।
- 42:45या मार्कस हो जाओ आंधी दुनिया मार्कस के पीछे हो गयी या बुद्ध
- 42:50हो जाओ आंधी दुनिया बुद्ध के पीछे हुई हो गयी, लेकिन ध्यान रखना तुम
- 42:58फंसली कीड़े हो। एक फसल पे आए और फिर चले जाओगे,
- 43:06कुछ नहीं दे के जाओगे, अपना वक्त बर्बाद करोगे।
- 43:10इससे अच्छा होता ऐसा वक्त कोई घर में बैठ के अपने आत्मसंस्थान में
- 43:19खोज में गुजारते। तो कुछ भला हो जाता है।
- 43:24दूसरे तरह के लोग सुक्रात सुक्रात के ऊपर आए सर्कमस्टैंस मृत्युदंड
- 43:32मेला पहला व्यक्ति घबरा जाएगा। सिफारिश में डालेगा, भागने की
- 43:39कोशिश करेगा, जेलों को तोड़ने की कोशिश करेगा, वह उससे लड़ने की
- 43:46कोशिश करेगा, बचने की कोशिश करेगा और यह यह कोशिश तुम जैसे लोगों की
- 43:51है। तुम चाहते हो कैसे बचें?
- 43:57क्या है इसका उपाय? लेकिन सुख्रात बचने की चेष्टा
- 44:02नहीं करता। ये दूसरे तरह का व्यक्ति है जिसके
- 44:10ऊपर विपत्तियाँ तो आईं, सच में आईं।
- 44:16राज्य दंड भी इसको मिला। मृत्यु दंड भी इसको मिला तो जहर
- 44:22पीला दिया जाए। इसको और इतना प्यारा व्यक्ति है
- 44:29जब जहर का प्यारा देने लगा। तो जहलाद के हाथ कंप रहे थे।
- 44:44कांपते हुए हाथों से उसने सुक्रात के हाथ में जहर का प्याला पिलाया।
- 44:50सुक्रात बोला। तुम क्यों तुम क्यों कप रहे हो?
- 45:02बोला जहाँ बना ऐसे प्यारे व्यक्ति को मृत्यु देने का फरमान मुझे ही
- 45:11हुआ, लेकिन मैं क्या करू? मैं लाचार हूँ, मैंने बच्चे पालने
- 45:17हैं और मेरे पास कोई और तरीका भी है।
- 45:27कल को इतिहास लिखा जाएगा तो उसमें मेरा भी जिक्र होगा।
- 45:35जहर देने वाले का और आपका भी जिक्र होगा।
- 45:40जहर पीने वाले का कितनी खुशी खुशी जहर का प्याला पकड़ा और हाथ में
- 45:45कंपनी आया और जहर देने वाले के हाथ शरीर कांप रहा है पूरा।
- 45:53और जहर का प्याला सुकरात को बुला के वह उसके पांव में लोट पोट
- 45:59क्षमा करती मैं हुक्म बजा रहा हूँ सिर्फ और मजबूर।
- 46:10सर्कमस्टैंस उस व्यक्ति के ऊपर भी है सर्कमस्टैंस सोक्रेट से है और
- 46:17मैंने कहा, सुख्रात अभी पहुंचा नहीं है।
- 46:22सुख्रात को ज्ञान नहीं हुआ लेकिन ज्ञान से पहले कमिंग इवेंट्स
- 46:26कास्ट देयर शैडोज बिफोर? आने वाली घटनाएं अपनी परछाईयों को
- 46:31पहले घरा देते हैं, बस आ ही जाएगा ज्ञान यह आने की इच्छाएं हैं, आने
- 46:42का अनुभव है। यह हवाएं हैं ठंडी जो बता देती
- 46:47हैं कि कहीं बारिश हो रही है। कहीं मौसम ने करवट ली है, कोई
- 46:56मौसम बदला है, पांव में गिर पड़ा। मुझे एक क्षमा करता हूँ, मैं
- 47:06मजबूर हूँ। मैंने बच्चे पालने हैं, मेरे पास
- 47:10कोई ऑप्शन भी नहीं है, गैर पढ़ा लिखा हूँ, कोई हुनर मेरे में है
- 47:18सुखरात कहते हैं तू घबरा मत, तू बिल्कुल निश्चिंत हो जा, तेरे ऊपर
- 47:26कोई आरोप नहीं। मैं तुम्हें जाने से पहले आरोप
- 47:32मुक्त करता हूँ क्योंकि तू सिर्फ भूकंप बजा रहा है और भूकंप बजाने
- 47:40वाला अपराधी नहीं हुआ करता अब थोड़ी सी पंक्ति ले ले यहाँ।
- 47:49हुक्म में अंदर सब को बाहर हुक्म न कोई, न न को हुक्म मैं जय बुजे
- 47:56तह मैं कहे न कोई हुक्म बजाने वाला, कभी अपराध नहीं होता, हुक्म
- 48:02मानने वाला कभी अपराधी नहीं होता, हुक्म देने वाला अपराधी होता है।
- 48:06तो नान्य कहते हैं, हुक्मी उसको मान लो क्योंकि वैसे भी हुक्म के
- 48:13अंदर ही दुनिया चल रही है। अज्ञानी जानते नहीं ज्ञानी जान
- 48:18जानते हैं, जिनके पास आँखें हैं वह आंख खोल के देख लेते हैं, कौन
- 48:22हुक्म चला रहा है? जो अंधे हैं वो देख ही नहीं पाते।
- 48:27बोलेंगे क्या हुक्म है अंदर सबको एक सत्य है।
- 48:35नानक कहते हैं, यह सत्य है, सब कुछ उसके हुक्म में हो रहा है,
- 48:41लेकिन तुम्हें मानने को बाध्य नहीं करते।
- 48:43नानक। क्योंकि मानने से कोई परिवर्तन
- 48:48नहीं होगा। मेरे खाने से तुम्हारा पेट कहाँ
- 48:50भरेगा? मेरे जल पीने से तुम्हारी प्यास
- 48:54कहाँ बुझेगी? हुक में अंतर सबको बाहर हुक में न
- 49:03कोई। अगर आप मुझे कहा है, कल एक मेरे
- 49:08पास प्रश्न आया बाबा जैसे आपने विपत्ति काल में नमो अरिहंता नाम
- 49:17नमो सिद्धा नाम जैन में और बौद्ध में?
- 49:22बुद्धम श्रम गच्छा ऐसे कोई शक धर्म में है?
- 49:27हाँ बिलकुल है दुख पर हर सुख कर ले जाए एक तो यह विपत्ति काल में
- 49:40इसका स्मरण करो। स्मरण ही करना है।
- 49:44स्मरण ही करना है तो इसको याद करो।
- 49:48दुख पर हर सुख कार्यालय जाए और दूसरा हुकम है।
- 49:55अंतर सब को तेरी मर्ज़ी है बाहर हुकम है न कोय।
- 50:00नानक। हुक्म में जो बुझे तो हम में कहे
- 50:04न कोई फिर दुखी नहीं उतरते। अगर तुम हुक्म ही बजा रहे हो तो
- 50:13हुक्म बजाने वाला कभी दुखी नहीं होता, लेकिन यहाँ तो व्यवस्था ही
- 50:17ऐसी है जीसको जहर दे रहा है, वो इतना बूढ़ा है।
- 50:21जस्ट इनोसेंट लाइक ए चाइल्ड बड़ा प्यारा व्यक्ति है हाथ कंप गए
- 50:31उसके शांत चेहरे की तरफ देख कर हाथ थे कि आगे नहीं बढ़ रहे।
- 50:42लेकिन कर्तव्य था कि मजबूरी बन के आड़े आ गया।
- 50:46कर्तव्य ने कहा जहर दो, तुम्हारे बालकों की ज़िन्दगी का सवाल है,
- 50:56तुम मुझे एक क्षमा कर देना है। ये अपराध मैं खुद से नहीं कर रहा,
- 51:11दूसरे तरह के व्यक्ति हैं। सुख्रात ने बुजहर का बेला मौके
- 51:17लगा लिया। कहानी कहने को कुछ और होती है।
- 51:29आँखों के दर्शन से अगर कोई चीज़ देख ली जाए तो वो बात कुछ और होती
- 51:35है। आसपास उसके शिष्य खड़े हुए।
- 51:46फफफक कर रोने लगे हैं। आँखों में आंसुओं की धार वे देय
- 51:52हृदय से देख नहीं पाए सुदृश हुआ निर्दोष है, कोई दोष होता?
- 52:02तो मन को ठहरा लेते कहीं अब दोष भी कोई तो बाहर चले गए प्लेटों
- 52:10बाहर चले गए नहीं, आत्मा सहर सकी इन दुःख दाई क्षणों को।
- 52:23सब बाहर चले गए। सुक्रात के बड़े प्यारे प्यारे
- 52:27फिश हुए अरस्तों भी उनमें से ही एक था।
- 52:41वो इस दृश्य को न देख सके। कोई भी सेंसिटिव व्यक्ति होते हुए
- 52:51जुल्म को देख तो नहीं सकता, बस मजबूरी वश देखना पड़ जाता है।
- 53:02दूसरी तरह का व्यक्ति है जहर का प्याला मुँह को लगा लिया सारा गटक
- 53:10गटक फिर गया प्याला नीचे रख दिया और वो जाते हुए अपने शिष्यों से
- 53:19बोल रहा है। तुम बाहर जा रहे हो यही तो क्षण
- 53:23है अमूल्य मृत्यु के क्षण को मैं लैब कमेंट्री की तरह बताऊँगा।
- 53:30आपको क्या हो रहा है और तुम यह भागने के वेला नहीं है जागोगे तो
- 53:39पा जाओगे? उठ जाग मसा फिर भोर भय अब रहन
- 53:57कहाँ जो सोवत है? उठ जाग मसा फिर भोर भय अब रहन
- 54:12कहाँ जो सोवत है जो जागत है, सो पावत है?
- 54:25जो सोवत है सो खोवत है, उठ जाग मसा फिर बोर भाई जागोगे तो पा
- 54:41जाओ। सोओगे तो खो दोगे, बाबा मत
- 54:46सुखरात्र ने कहा रुकिए, यही वेला है, मैं जीवित टिप्पणी करूँगा
- 54:57अपनी मृत्यु के ऊपर और तुम देखते रहना।
- 55:01तुम सुनते रहना भागो मत यही तो बेला है सुबह हो गई मुसाफिर तू जा
- 55:10मत तू ठहर जा थोड़ी ही सी तो देर की बात है नो।
- 55:21प्लेटों एंड एरस्टोटल वर दी स्टूडेंट्स ऑफ सोकरैटिस कहता जाओ
- 55:32मत वहाँ है यही वेला है रुकने की। और तुम जब वेला होती है रुकने की
- 55:41तो भाग जाते हैं, वही वेला जागने की होती है।
- 55:52औरस्तु ने कहा रोते हुए प्रभु। आँखें इस दृश्य को निहार नहीं
- 56:04पातीं। प्लेट ने कहा हरदी हृदय विदीर्ण
- 56:09हुआ जाता है। कैसे रुके हैं?
- 56:15फिर भी शक्ति के लिए रुक जाओ सोकरेटीज ने कहा।
- 56:21रुक जाओ टु नो व्हाट इस दी ट्रुथ पर मैं तुम्हें वरन करूँगा और अगर
- 56:28तुम अब चुक गए तो फिर कब आओगे फिर मैं चला जाऊंगा आई विल हॅव टु लीव
- 56:36थिस बॉडी? फिर तुम आना या न आना उसका कोई
- 56:43फायदा नहीं है। मैं शरीर को छोड़ दूंगा, रुकें
- 56:53किसकी तरह आँखों में सब्र भर के दिल को सब्र दे के।
- 57:00तिल आशा तिलक के रुख जाओ गुरुदेव कहते हैं रुख जाओ सोक्लटी ने जहर
- 57:13पिया लेट गया मृत्यु की। कहानी प्रारंभ होगी तो ध्यान
- 57:25रखना, मैं आपको मृत्यु के साथ ही प्रोसेसर यहाँ वर्णित करूँगा
- 57:29थोड़े से सौदों में मृत्यु शुरू होती है।
- 57:33पांव से सबसे पहले पांव सुन्न होते हैं।
- 57:39तुम घबराना मत, अगर पान सुन्न हो जाए तो मृत्यु आ रही है, आ रही है
- 57:43लेकिन शरीर को आ रही है। बहुत से लोग घबरा जाते हैं।
- 57:49अभी मैंने कहा कल के सहसरार से। नहीं निकल सकता है तो तथाकश
- 58:02बहादुर लोग कांपने लगा है और प्रभु कभी ऐसा तो नहीं की मैं
- 58:07निकल जाऊंगा, भाई निकल गया तो क्या धरती धोती हो जाएगा?
- 58:13निकलोगे ही 1 दिन। आज नहीं कल तुम ना निकलोगे धक्के
- 58:17से मृत्यु वो निकलवाले के डरते यह डर के मरे जमाने ने मारे जवान
- 58:27कैसे कैसे जमीं खा गई आसमान? कैसे कैसे जमाने में मार जमा कैसे
- 58:48कर जमीं खा गई। आसमान कैसे कैसे ये डर कब भै
- 59:08मृत्यु नहीं मृत्यु का डर भै। इतने ना जाने कितने कितने जुबानो
- 59:17का हड़प लिया मृत्यु अभी आती नहीं, तुम डर के मरे मर जाते हो
- 59:28तो अगर मर भी गए तो क्या हो जाएगा?
- 59:33अगर ना मरे तो मृत्यु से 1 दिन मार ही जाएगी दैट इस।
- 59:38वह तो आएगी बिना बताए आएँगे तुम्हें कोई वह सूचना नहीं देंगे
- 59:49तो टिके बैठे रहो तो सुखरात कहते हैं मेरे पास।
- 59:57शून्य हो रहे हैं। ऐसा दिखता है।
- 1:00:02इनमें जीवन शेष बचा नहीं। जहर ने अपना काम करना शुरू कर
- 1:00:08दिया। काम ठंडे हो गए हैं।
- 1:00:13और पांव हिलना बंद हो गए। पांव ने आज्ञा माननी बंद कर दी।
- 1:00:20यहाँ इंद्रियाँ अपनी गुलामी छोड़ देती हैं, यहाँ इंद्रियाँ आपका
- 1:00:25कहानी मानता। यह कनेक्शन ब्रेन के साथ टूट जाता
- 1:00:31है। पांव शून्य हो गए, अब ऊपर ऊपर
- 1:00:44शून्य होता आ रहा है। पांव से थोड़ा ऊपर गिट्टो से
- 1:00:48थोड़ा ऊपर। धीरे धीरे सब जैसे इनमें जीवन
- 1:00:56नहीं बचा जैसे ये जड़ हुए चले जा रहे हैं।
- 1:01:08अपने जीवन की लाइव कमेंट्री इस धरती पर प्रथम बार और शायद आखिरी
- 1:01:12बार पहली बार बोली सुकृति सिंह। शायद कभी इसके बाद कोई बोल भी न
- 1:01:20पाए ऐसा नजारा तुम भी सुनना बाग मचाना तो ऊपर उपरार ही है यह।
- 1:01:35अनकॉन्शियसनेस अब ये घुटनों तक आ गए, घुटने नहीं हिल रहे, मेरे
- 1:01:46जवाब दे गए हैं और फिर थोड़ा थोड़ा ऊपर बेहोशी का आलम।
- 1:01:55छाता गया मौत अपने पांव पसारती गई।
- 1:02:01ये काली माँ ने ढक लिया, जांघों तक और ऊपर चली जा रही है, मृत्यु
- 1:02:09की छाया और गहरी हुई जा रही है। और सुक्रात कहते हैं कि अब अब कमर
- 1:02:20भी हिल नहीं पा रही है और सुक्रात और ऐरस्टोटल मुँह में मालदीय रो
- 1:02:36रहे। कभी मरते हुए गुरुदेव के मुँह में
- 1:02:44कान में खिसकी न पड़ जाए मेरी रोने की कहीं इन्हें पता न चले तो
- 1:02:54मेरे शिष्य तड़प रहे थे। जब मैं विदा हो रहा था तो मुँह
- 1:03:00मेरा माल ठूंस लिया। सब का बुरा हाल है और देखिए मर
- 1:03:11रहे हैं सोपरटिस्ट ज़िन्दगी के। मरने की लाइव कमेंट्री प्रथम बार
- 1:03:22किसी व्यक्ति ने बोली बोथ सोक्रेट अब अनकॉन्शस जड़ता अचेतनता ऊपर
- 1:03:33ऊपर चली जा रही है अब नाभी तक। कुछ नहीं मिल रहा है स्पष्ट देख
- 1:03:42रहा हूँ जड़ता और ऊपर ऊपर जा रही है और मैं देखने वाला हूँ, लेकिन
- 1:03:48मैं तो अभी हूँ। चेतनता खो रही है, लगातार निरंतर
- 1:04:04अचेतनता अपने पांव पसार रखी है। धीरे धीरे वृक्ष स्थल पर आ गए,
- 1:04:12हाथ शून्य होने लगे, उंगलियां शून्य होने लगीं।
- 1:04:19बाजू और यहाँ तक कंधे यहाँ सारा सुन होगा बस सुखरात कह कर देखो,
- 1:04:30अभी तक भी मैं तुम्हें बता सकता हूँ।
- 1:04:35कि क्या हो रहा है? सारा शरीर जड़ हो गया, मृत हो
- 1:04:39गया, मृत वत नहीं मृत हो गया और मैं देख रहा हूँ इस समृत शरीर को
- 1:04:49मैं देख रहा हूँ प्रथम बार ये लाइव कमेंट्री आपको अवश्य सुननी
- 1:04:53चाहिए। शुक्रांत के मृत्यु के प्रत्यक्ष
- 1:05:01घटना और वो जो लोगजनों ने सुने वो ज्यादा देर तक संसार में उलझे
- 1:05:09नहीं रह सके। वो थोड़े से वक्त में है वो।
- 1:05:13खुद भी एनलाइटन हो गया। ऐसे दृश्य देखने योग्य होते हैं,
- 1:05:22लेकिन ये धरती पर एकमात्र दृश्य अब तक का है।
- 1:05:34कन्धों तक सब गया गर्दन तक आ गई जड़त और सुखरात कहते हैं, देखिये
- 1:05:47नख से पांव के अंगूठे से और कन्धों तक।
- 1:05:55सब गुम हो गया है। यूज़्ड अनकॉन्शियसनेस विराट जड़ता
- 1:06:05का सभी जगह निवास है, लेकिन मैं। मैं चेतन में जागता हूँ, मैं जड़
- 1:06:20नहीं हुआ हूँ, वह देखने वाला जड़ नहीं हुआ है।
- 1:06:24अब मुझे समझ आया है एंड ही गॉट एनलाइटन इन दिस मोमेंट।
- 1:06:29इस क्षण में वह ज्ञानी हुआ। जब गर्दन के ऊपर तक वि शुद्ध के
- 1:06:39चक्र में तक पहुँच गया जड़ता का साम्राज्य तो सुकरात के आखिरी
- 1:06:47शब्द के अब शायद इससे आगे मैं बोल भी ना पाऊँ फिर आँखों से इशारा
- 1:06:54करूँगा। और तुम मेरे इशारों को भी पकड़
- 1:06:57लेना बस वहीं तक बोला जा सकता है। मृत्यु के बारे में इससे आगे बोला
- 1:07:04नहीं जा सकता एंड ही गॉट एनलाइटन इन थिस मोमेंट?
- 1:07:12उन्हें ज्ञान हो गया सब मर गया लेकिन मैं हूँ।
- 1:07:19मैं इन्हें मरा मरा देख रहा हूँ। आज ज्ञान हुआ के मृत्यु में जीवन
- 1:07:27का दर्शन कैसे होता है? सुक्रात बोधे से ले जा रहा है।
- 1:07:34प्लेटों और एयरस्ट्रूटर और बाकी के सभी शीर्षक मौन खड़े हुए हैं।
- 1:07:46जैसे श्वास ठहर गई हो, रुक रुक के श्वास आती हैं, इनके।
- 1:07:53कहीं श्वास के शोर में गुरुदेव की आवाज़ के पीछे का कोई भाव छुपा न
- 1:08:04रह जाए। सब समेट लें क्योंकि ये घटना फिर
- 1:08:10दोहराई नहीं जाएगी कभी। और सुखरात पूरे अब थोड़ी सी देर
- 1:08:23में जब वोकल सेक्स के ऊपर जड़ चली जाएगी तो मैं बहुत भिन्न होऊंगा।
- 1:08:37लेकिन मैं देख रहा हूँ आज मुझे ज्ञान हुआ व्हाट इस एनलाइटनमेंट
- 1:08:48सुक्रात कहते हैं मैं जान के बस आज जान के एक बिजली सी कौन थी।
- 1:08:55और सब साफ हो गया अपारदर्शी हो गया एवरीथिंग वास् ट्रांसपेरेंट
- 1:08:59टु फॉर, मैं आईज सभी कुछ अपारदर्शी था मेरी आँखों के सामने
- 1:09:06में से लगातार निहारता था। बुद्धि की न समझ में आने वाली ये
- 1:09:20घटना सिर्फ तभी समझ पाओगे जब तुम्हारे साथ ये बीतेंगे।
- 1:09:28और काश वो घड़ी आये जब ये घटना तुम्हारे साथ हुई।
- 1:09:35भीतर मृत्यु हुई। इस जड़ता को तुम उस चेतनता से
- 1:09:43साक्षी बने बने निहारते रहो, उस वक़्त का इंतज़ार तुम उस वक़्त
- 1:09:50में सो मत जाना तुम उस वक़्त में रोने मत लग जाना।
- 1:09:56तुम उस वक्त में छटपटाने मत लगना, तुम उस वक्त में आखिरी वक्त में
- 1:10:01लोग कहते हैं, मेरी बेटी से मिला दो मेरे बेटे से मिला दो मेरे भाई
- 1:10:06से मिला दो ऐसा कुछ मत करना, तुम जागना और जाग के देखना।
- 1:10:15कोई इच्छा शेष ना रहे, किस्से मिलने की, किसी की सूरत देखने की,
- 1:10:23किसी से बात करने की, ये देखना ये दिख रहा है ये तुम्हारी आँखों के
- 1:10:30समुख प्रकट होती हुई घटना। इसको गौर से निहारना, पूरी चेतनता
- 1:10:39को प्रगाढ़ कर लेना, यहाँ सेंटर करना अपनी कॉन्शसनेस को।
- 1:10:48तुम जीवन में कभी कहीं सेंटर करते रहे, कभी तीसरे नेत्र में, कभी
- 1:10:52कहीं कभी कहीं कभी कहीं अब यहाँ सेंटर करना, कॉन्सेंट्रेट कर लेना
- 1:11:01अपनी सारी चेतना को और तुम देखोगे सब मर के।
- 1:11:08तुम न मरे, मैं न मरूँ, मरे संसार और जीस घड़ी में पता चल जाता है
- 1:11:17मैं नहीं मरता संसार मरता है सरे मरा मैं कहाँ मरा मैं देखने वाला
- 1:11:22रह गया मोहे मिला जिला ब नाहरा। मुझे वह मिल गया जिसके कारण सब
- 1:11:29जीवित हैं जो कभी मरता नहीं नैनम सिदंती शास्त्रण नैनम दीपाओ का नय
- 1:11:37चैनम के लिए दिन त्यापो न सुस्यतिमारूता मिल गया सब कुछ।
- 1:11:47बस ये वो घटना तुम स्वभाग्यशाली होगे, तुम भाग्यशाली होगे, तुम
- 1:11:53भाग्यवान होगे और तुम्हें भगवान कहा जाये तो कोई गलत नहीं।
- 1:11:59सही शब्दावली है ऐसे लोगों के लिए भगवान जो भाग्यवान हो गए, जान
- 1:12:09लिया सुखरात ने इस सेक्शन में जाना मैं हूँ कौन सब मर गया
- 1:12:15देखिये देने वाले ने उसे दंड दिया था मौका।
- 1:12:26जानने वाले ने मौत में से भी अमृत चूक लिया।
- 1:12:34हंस समुद्र में से मोती चुग लेता है, पानी छोड़ देता है।
- 1:12:44तुम शांत बने रहना, कंपाने वाला वक्त होगा, रोमा, रोमा हिल जाएगा,
- 1:12:54तुम सूखे के पत्ते की तरह कांपने लगोगे, यहाँ तो थोड़ी सी चेतना
- 1:12:59चढ़ जाती है। सहरन में तो कहते हैं।
- 1:13:02बाबा इस प्रश्न का जवाब जल्दी दे देना अरे इतनी घबराहट करोगे तो
- 1:13:06छोड़ दो इसका ये इतना आसान मसला नहीं है जीस पर तुम चले हो अगर उस
- 1:13:17प्रेम की चाहत है। राजा पर जा जहीर, उचा शीशु दे ले
- 1:13:25जाए, तुम तो थोड़ी सी कॉन्सेंट्रेशन चढ़ गई क्या सरार
- 1:13:33में तुम जल्दी से बाबा को पुकारने लगे?
- 1:13:36और बाबा किस किस का जवाब देगा? उधर से उधर से उधर से सैकड़ों तरफ
- 1:13:45से फ़ोन आ रहे हैं और इसी एज का फ़ोन है मृत्यु से घबराए हुए लोग।
- 1:13:52किसी को कुछ दिख गया, किसी को कुछ दिख गया बाबा इसका मतलब क्या है?
- 1:13:57क्या मतलब है? इसका एक ही मतलब है आखिर में तुम
- 1:14:00खाक हो जाओगे और खाक होना स्वीकार कर लो और क्या मतलब है?
- 1:14:06क्यों भटकते हो इस मृत्यु से डरते फिरते हो?
- 1:14:10आखिर में मृत्यु हो जाएगी तो अभी स्वीकार कर लो ना।
- 1:14:18जीस मरने से जग डरे मेरे म आनंद तुम आनंद मनाओ जश्न मनाओ उसके
- 1:14:25मरने का क्या मरे क्या मरे तो इल्ल्यूज़न मरे यह तो बहुत बार
- 1:14:32मरा लेकिन तुम्हारा इल्ल्यूज़न न मरा।
- 1:14:37यह इलूशन मरे और सोक्रेट इज़ का इलूशन मरा।
- 1:14:41आज सोक्रेट इज़ को पता चला मेरे सामने वह मर गया, जिसे मैं मैं
- 1:14:49समझता था। मैं जिसे मैं समझ रहा था अब तक वह
- 1:15:02मैं बिखर गया सही मैं आ गया हूँ एमआइ इस आई की खोज करनी है एमआइ।
- 1:15:21क्यों परेशान होते हो नहीं? शीष तली पे रख सकते तो मत आओ इस
- 1:15:27गली में जो शीष तली पे दर्द न सके वह प्रेम गली में आए क्यों अगर
- 1:15:38इतनी छोटी छोटी बातों पे कपना है? तो यह रास्ता तुम्हारे लिए नहीं
- 1:15:43है। फिर संसार के तुच्छ पदार्थों में
- 1:15:49तुच्छ आनंद को लेते रहो और बने रहो, बने रहो ये शब्द याद रखना
- 1:15:57ऐसे ही बने रहोगे दुखी? तड़पते हुए धधकते हुए ये अंगारे
- 1:16:06कभी बूझ न सकेंगे और अगर इससे पीछा छुड़ाना चाहते हो तो एक बार
- 1:16:17मेरी शरण में आ जाओ। अहम तम सर्व पाप्य भव मोक्ष से
- 1:16:25अनुमा सुचारू मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूंगा।
- 1:16:32सर्वधर्माण पत्र ज माँ ने कण शरण पर मत जाओ वो किसी धर्म की शरण
- 1:16:37में। छोड़ दो हिंदू, मुसलमान, सिख,
- 1:16:41जैन, इसाई, बुद्ध, ये सब तुम्हारे मुखौटे हैं?
- 1:16:49कागजी मुखौटे, रंगों से पुते हुए थोड़ी सी बारिश इनके रंग उतर जाते
- 1:16:55हैं। क्यों झगड़ते हो आखिर में खाक
- 1:17:09होने वाला व्यक्ति अभी तो मौत है। संसार में मौत बनाई है फिर तुम
- 1:17:16झगड़ते हो। मोत का?
- 1:17:201 दिन मोयन है, गरीब कहते हैं, नींद फिर रात भर नहीं आती, मोत का
- 1:17:281 दिन मोयन है, पक्का है कि मोत आएगी रात नींद क्यों?
- 1:17:34रात भर नहीं आती, फिर भी रात को नींद नहीं आती।
- 1:17:401 दिन चिर निद्रा में सो जाओगे, पक्का है कोई बचा तुम्हारे बाप
- 1:17:48दादा सो पीढ़िया गिना देते हैं हरिद्वार वाले को कोई बचा है नींद
- 1:17:57क्यों रात भर नहीं आती। मौत का 1 दिन मय्यन है मृत्यु तो
- 1:18:03आएगी लेकिन फिर तुम सोते क्यों नहीं?
- 1:18:08क्या छिन गया है तुमसे? और फिर ज़रा सोचो 1 दिन पूरा ही
- 1:18:13छिन जाएगा, तब क्या होगा? कैसे बर्दाश्त करोगे जनाब?
- 1:18:23थोड़े थोड़े गांठे नफों को बर्दाश्त नहीं कर पाते।
- 1:18:29यह सारा ही छिन जाएगा तो कैसे बर्दाश्त करोगे?
- 1:18:41इस प्रेम गली में तभी पैर रखना जब मिटने की ख्वाहिश पक्की पक्की हो
- 1:18:47जाए, अगर ऐसा थोड़ी सी तपिश लगी कि तुम भागे तो मत आना अभी और
- 1:18:55थोड़ा सा जश्न मना लो, अभी बाकी है।
- 1:19:02अभी मन भराना अभी संसार को झकड़ में रखो, अभी ना जाओ छोड़कर के
- 1:19:25दिल। अभी भरा नहीं अभी न जाओ छोड़कर के
- 1:19:37दिल अभी भरा नहीं धन्यवाद।