Latest / Baba ji Vijay Vats / 21 May 25 - आपने खुद का राजनीतिक चैनल बना लिया, ये क्या है बाबा? आप 2 कार्य कैसे करेंगे?
Transcript
- 0:25बाबा जी, प्रणाम आपने कल की वीडियो में कहा था।
- 0:38भगवान शिव जीस पर कोपे तोड़ते हैं।
- 0:44उसे राजनीति में धकेल देते हैं और आज आपने खुद का राजनीतिक चैनल बना
- 0:56लिया, ये क्या है बाबा जी? अरुण चौधरी, इलाहाबाद बाबा जी ने
- 1:21कहा। और मैंने मान लिया कि तुम्हें ये
- 1:29बात अद्भुत नहीं लग रही। तुम्हें वो बात अद्भुत लगती है।
- 1:41जीस पर कुपित होते हैं, उसे राजनीति में डाल देते हैं।
- 1:49और आपने खुद ही अपना राजनीतिक चैनल दी गोल्डन स्पैरो बना लिया?
- 1:58क्या कहेंगे इसपे आप? बाबा ने कहा, और मैंने मान लिया
- 2:18इससे तुम्हे कोई सबक नहीं मिल गया।
- 2:27राम को राजलिक होने भारत कोई दूध आया?
- 2:35क्या आपको महाराज ने जब बुलाया है भगवान राम कहने लगे माँ मैं आकर
- 2:48तिलक कर रहूँगा अभी पिता श्री के पास जाना है और जब गए।
- 3:01तो वनवास का होगा ना के पल भर में उलट उलट हो गए इससे क्या सबक?
- 3:14मिलता है तुम्हें। यही तो राज़ है जिसे आप समझ नहीं
- 3:23सकें जीस राज़ को आप शेरो शारी में धकेल देते हो, छोड़ो बेकार की
- 3:37बात में। कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम
- 3:41है कहना छोड़ो, बेकार की बातें कहीं भी न जाए रहना ये कोई जवाब
- 3:50नहीं होगा। बाबा ने कहा और मैंने मान लिया।
- 3:59पिताश्री ने कहा पर श्री राम ने मान लिया ठीक है और पूर्ण हृदय से
- 4:07मान नहीं समझाए, मैं समझाते। जिसका में न रहा हो या उसके हाथ
- 4:24की गट पुतली हो गया जैसे निचाई। वैसे नाचूँगा यही तो सिखाते है।
- 4:41सभी महापुरुषों का जीवन तुम्हे यही तो सिखाता है और गहरी से गहरी
- 4:49बातें है और कठिन से कठिन बात है। जीस कठपुतली ने ये कहा कि मैं तो
- 5:00न न चुका संजलेना के वह कठपुतली बना ही नहीं।
- 5:16फिर जैसा मिचाई वैसे सब जंगा सी। अगर तुमने ज़रा भी अकड़ दिखाई,
- 5:46नाचना तो वैसे ही पड़ेगा। गंगा के भीतर एक तिनका पूरे बहाव
- 5:54में बहा जा रहा था। अचानक उसमें मैं आ गया।
- 6:00और जब मैं आ जाता है व्यक्ति में तो उसकी बुद्धि कुपित हो जाती है
- 6:06और बुद्धि कुपित हुई कि तुम्हारा भाग्य कुपित हो गया, तुमसे, तुम
- 6:14उल्टी चलोगे? उसने भी यही सोचा।
- 6:18मैं क्यों बहूँ जबकि बह रहा था उसी के बहाव के कारण गंगा का वेग
- 6:25भी उसे बहा रहा था। मैं आ गया मैं क्यों बहूँ मैं कोई
- 6:34इसका कर थोड़ी? मैं इसके विपरीत दीक्षा में
- 6:38बहूंगा स्वह के बल से बहूंगा वह लगा अकड़ने।
- 6:51उसने कोशिश की धारा के विरुद्ध बहनी की।
- 6:56इतनी क्या गंगा का भाव बड़े बड़े जिंदाओं को दबो देता है?
- 7:09उसके भाव के विरुद्ध बह तो नहीं हो सका?
- 7:12गंगा के भाव के कारण टूट गया बिच बस?
- 7:20बीच में से टूट गया। रीड की हड्डी टूट गई और बहना तो
- 7:23फिर भी पड़ा लेकिन दो टुकड़े होके बहना पड़ा।
- 7:31अम्मा मुस्कराई बहना तो उधर ही पड़ेगा जद्र गंगा चाहे।
- 7:40अब अच्छा रहे, बहे तो उसी तरफ, लेकिन दो टूक बंद है मेरी इच्छा
- 7:53के भाभी तुम कैसे पाओगे क्योंकि तुम मेरी इच्छा?
- 8:01अगर बहने की है तुम ही बहोगे अगर मैं ठहर जाउंगी तो तुम कैसे बहोगे
- 8:11ये तुम्हारे मस्तिष्क की बातें हैं।
- 8:15इन्हें मैं बखूबी जानता पहचानना हूँ तुम जब जाओगे वाकिंग करने के
- 8:32लिए अपने घर के बेड के ऊपर बैठोगे, मोबाइल लिया वहाँ तुम्हें
- 8:40और कुछ नहीं दिखेगा। महा तुम्हें सिर्फ दिखेगा तो
- 8:47गोल्डन स्पेप तुम्हारे चाहने से क्या होता है होता है वही जो
- 8:58मंजूरी होता होता है। और तुम बटन के ऊपर हाथ दबा दोगे
- 9:09और ध्यान रखना। ये इलेक्शन कमिशन ऑफ इंडिया
- 9:13गोल्डन स्पैरो का चुनाव चिन्ह किसी और को ना दे दे।
- 9:20यद्यपि अब तो लोग कोशिश करें। बड़ा सुन्दर है चिन्ह है लेकिन
- 9:35तुम जीत भी जाओ तो भी सोने की चिड़िया को तुम माटी की चिड़िया
- 9:40बना देते हो खिलौना। लेकिन जिनके हाथों में कला होती
- 9:51है वह माटी की चिड़िया को भी सोने की चिड़िया में बदल दिया करता है।
- 9:57बात कला की है। बात कहाँ तुम्हारे चुनाव चिन्हों
- 10:05की हैं बात, कलाओं की? पूछिए गुरु जवे जी नरक में तो
- 10:26स्वर्ग की राखी आस गुर गों के गुर बा भरे गुर करे योतास फिर वो भक्त
- 10:37क्या हुआ? अगर उसने भगवान की बात न मानी,
- 10:41उसके ढंग से न चला, वह परमात्मा से ज्यादा बुद्धिमान हो गया।
- 10:48ये देखो सारी दुनिया भगवान से ज्यादा बुद्धिमान है।
- 10:52हम मार्ग जैसे लोग तो बिना खंगाले बिना खोजे कह देते नहीं हैं।
- 10:59वो है ही नहीं से कहते हैं वह मर गया है मैं दफन करके आया ऐसी ऐसी
- 11:07मूड मान्यता ही जलती हैं सुनसार में।
- 11:20आता नहीं कह ग और पढ़ने लगे ऋग्वेद
- 11:34पुत्र तुम्हें सवाल तो बहुत अच्छा है, ऐसे तेज धार वाले सवाल आने ही
- 11:41चाहिए, पता चलेगा। कि मुझे कैसे कैसे लोग सुनते हैं,
- 11:58जो उसकी इच्छा में राजी न होगा। वह भक्त न हुआ और जब भक्त न हुआ
- 12:05वह आनंदित न हुआ। भक्ति ही सूत्र है आनंद का उसके
- 12:13चरणों में विच्छ जाना, यही तो आनंद का सच्चा मार्क है।
- 12:27तुम नमाज़ क्यों करते हो? लेकिन शरीर झुकता है और शरीर तो
- 12:31सर्कस में भी झुकता है। ये सर्कस ही है।
- 12:35सारे दिन सर्कस ही तो किया करते हैं।
- 12:47माथे को पीले रंग से थोप लिया। दाढ़ी को थोप लिया पीले रंग?
- 12:56राधे राधे करते रहो, मैंने कहा अपना कल्याण पहले करो, दूसरों का
- 13:04बाद में करो। डॉक्टर खुद ही बीमार हो तो बीमार
- 13:11को कैसे ठीक करेगा? लेकिन मैं जानता हूँ उन्हें
- 13:18समझाएगी। तुमने पूछा तो ठीक पुत्र ये पूछना
- 13:31चाहिए था अगर न पूछता तो मैं समझता कि जिसने सुनो और भक्तों ने
- 13:36ही सुनो। किसी ऐसे व्यक्ति ने नहीं सुना जो
- 13:45तार्किक था, जो मेरी बातों को आँखें मूँद के मान लेता यद्यपि
- 13:52फिर भी माननी पड़ेगी, बहना पड़ेगा लेकिन तिनके को टूट कर बैठना
- 13:59पड़ेगा। जब तुम्हारी मौज है कि तुम सबूत
- 14:03बहना चाहते हो के टूट के बहना चाहते हो बहना तो उसके ढंग से ही
- 14:12पड़ेगा। तुम सर्कमस्टेंसेस के गुलाम कुकी,
- 14:27किने अभागे क्षणों में तुमने सर्कमस्टेंसेस को अपना नाम लिया
- 14:34है। आसमान में छाये हुए इन बादलों को
- 14:40तुमने अपने अड्जिस्टेंट स्पोर्ट लिया है।
- 14:45मैं बस यही और उन्हीं अभागी क्षणों में तुम्हारी दुखद कहानी
- 14:52शुरू हुई। और दुःख का कहीं अंत होने नहीं जा
- 14:57रहा। बहुत कोशिशों के।
- 15:21मगर दिल न पहला बहुत कोशिशों की मगर दिल न।
- 15:39हम बहला कई साझ छेड़े, कई गीत लाए।
- 15:58और जब याद आए बहुत ही याद आ हो जब याद आए।
- 16:18बहुत ही याद आ ग में ज़िन्दगी के अंधेरों में हम चिराग।
- 16:37मोहब्बत जलाये हो जाए। मुझे याद आए बहुत याद।
- 16:57हाँ हाँ वो जुदा क्या हुआ है? जिंदगी खो गए वो जुदा।
- 17:14क्या हुआ है ज़िन्दगी खो गए, समझती रही, रौशनी खो गए।
- 17:33शम्मा जल ति रही, रौशनी खोबल बहुत कोशिशों की मगर दिल ना।
- 17:53बहला कई साजिछ कई। बड़े गीतकार बड़े साज जड़े बड़े
- 18:15नगमे बटेरे यही तो तुम्हारी जिंदगी की कहानी है, काश तुम गैर
- 18:29बदलना सीख जाओगी। कार में सफर करने वाला पिछली सीट
- 18:37पर बैठने वाला जरूर सोचता होगा। फीस चलाने वाला व्यक्ति कैसा है?
- 18:48ये कभी आगे दौड़ाता है। गाड़ी कभी पीछे दौड़ाता है।
- 18:52ऐसा क्या जादू है इसमें? और गाड़ी उसके इशारे से चलती है।
- 18:59काश तुम्हें गियर को बदलने की तकनीक आ जाए।
- 19:05वहीं तकनीक तुम्हें पैदा करने की चेष्ठा में लगा हुआ हूँ कब से
- 19:10पांच वर्ष विच गाय बहुत साद छगा है, कई गीत गाये, बड़े गीत गाये।
- 19:26बहुत साज छिड़े, मैंने मृदंग वीणा, ढोलक, तबला, क्या क्या नहीं
- 19:34गाया, लेकिन तुम समझे? तुम कुछ भी करो, ओह धातु में कहो
- 19:55या संसार कहो, उसमें कोई फर्क नहीं पड़ता बस तुम सिर्फ कठपुतली
- 20:00हो के करो यही आज का सब की तुम्हें मैं दे रहा हूँ कुछ भी
- 20:09करो। उसके हाथ की कठपुतली होके करो वह
- 20:18तुम्हारे होंठों से गीत गुनगुनाए, तुम्हारे होंठों से क्रोध बरसाए,
- 20:26तुम इसका फिक्र मत करना, तुम बीच में मत अड़ंगा डालना।
- 20:34वह जो कहता है जो करता है करने देना, क्योंकि सारा माल मालिक का
- 20:39तुम्हारा तो कुछ भी नहीं है ना एक एक दर्रा बनाया हो, किसी ने तो
- 20:43बता दो। और बना सकने की क्षमता हो तो भी
- 20:49बता दो और आज नहीं कभी भी बता देना मैं हमेशा तैयार रहूँगा
- 20:56तुम्हारी बात सुनने के लिए मैं उदित हूँ हमेशा और मुझे पता है
- 21:01कोई नहीं आ पाएगा खल। यू कैन इनवेंट ओनली नॉट टू कैरिएट
- 21:09तुम खो तो सकते हो, तुम उत्पन नहीं कर सकते यही है तुम्हारी
- 21:16क्षमता। और जब उत्पन्न नहीं कर सकते तो
- 21:23उसकी उत्पन्न की हुई स्थिति में तुम खेलना ही सीख लो।
- 21:28शुभ ना होगा। क्यों गँवा रहे हो ये तुम्हारी
- 21:31सांसों को बड़ी कीमती है यार। इनमें मीरा की तरह नाचा भी जा
- 21:40सकता था और इनमे हिटलर की तरह रोया भी जा सकता था और तानाशाह
- 21:49अक्सर रोया ही करते। क्योंकि उन्होंने उस सच्चे मालिक
- 22:00को उसके ही इस यंत्र को काम करने की अनुमति नहीं दी, अपने ढंग से
- 22:09ओके नहीं, मैं तो अपने ढंग से और तुम्हें नहीं पता।
- 22:17मैंने फिर कहा जब तुम बटन दबाने जाओगी जैसे निधिवन में प्रत्येक
- 22:25गोपिका के आगे राधा के आगे अलग से कृष्ण खड़े थे।
- 22:35यह महाराष्ट्र था। वैसे ही तुम्हें सब तरफ सोने की
- 22:41चिड़िया नजर आई और कुछ नजर ही नहीं आएगा।
- 22:50अर्जुन की तरह क्या दिखता है पुत्र?
- 22:53मुझे सिर्फ चिढ़े की आँख दिखती है तो लगाते निशाना
- 23:12तुम्हें कोई अज्ञात शक्ति घर लेगी एंड यू विल बी कंपेर्ड टु पुश दट
- 23:20बटन तुम्हें पता ही नहीं चलेगा। तुम जितनी अपनी कीमत समिति हो
- 23:33उतनी कीमत है। तुम जितनी अपनी हैसियत समिति हो
- 23:38उतनी हैसियत तुम्हारी है नहीं। और वैसे उतनी शब्द कह के मैं
- 23:43सिर्फ तुम्हारा मान ही अकरम हूँ। तुम्हारी हैसियत है ही नहीं, तुम
- 23:49सुन लो। नेगलिजबल कह के भी तुम्हें कुछ तो
- 23:55मान देना ही होता है। अगर मैं कहूं कि तुम नगण्य हो
- 24:00नगलिजबल हो तो इसमें भी मानना पड़ेगा।
- 24:03तुम हो तो ठीक है, जंख्या में नहीं आती।
- 24:09दुश्मला के आगे बहुत सी जीरो लगती हैं लेकिन तुम हो लेकिन मैं कहता
- 24:15हूँ तुम नगण्य भी नहीं हो। तुम हो ही नहीं यही गलतफहमी किसी
- 24:24भाग्यहीन क्षण में तुम्हारे भीतर उतरी।
- 24:27पर ये आज तक तुम्हें तड़पाई जा रही हो आज तक इसने सब चेह ने लूट
- 24:32लिया तुम्हारा दर्द दे दिया तुम्हें चेह ने ले गई ये बात
- 24:39तुम्हारा छलियों के रातों की नींद तुम्हारी हराम तुम समझते हो हम
- 24:46देश की सेवा कर। खुद की नीतों को हराम कर रहे थे
- 24:51वो और देश की सेवा कहाँ हुई? यहाँ तो अपनी भी सेवा नहीं है।
- 24:56देश की सेवा का ख्वाब का रूप है। पहले तो फूल को अपनी पंखड़ियाँ
- 25:04खोलने से पहले कली की तरह बंद होना पड़ता है, अपना मुख पूर्णतया
- 25:10बंद कर लेना पड़ता है ताकि उसके भीतर संग्रहीत कर सके।
- 25:14उस सुगंधी को जो उस निकल को बिखेर में तो मैं भी कला हूँ।
- 25:25जीने वाले तुझे जीने का सिलिका है जहाँ प्रार्थ से पहले स्वार्थ
- 25:36साधना होता है। जब तुम्हारी कुपड़ियों में कभी
- 25:44आएगा तुम कहोगे हम तो लोगों का कल्याण करेंगे और तुम्हारे खुद का
- 25:51कल्याण कौन करेगा? जी, मैं तुम्हें सीखाता हूँ पहले
- 25:58खुद का कल्याण करो। और जब तुम खुद का कल्याण करोगे तो
- 26:04तुम पाओगे, अब मैं योग्य हुआ दूसरों को सच्ची राह दिखाने के
- 26:10लिए मैं योग्य हुआ तो फिर तुम जो भी बोलोगे वह वेद का वचन होगा।
- 26:16वह ऊपर सिंह के श्लोक हो गए। वह गीता हो गई।
- 26:23वह श्री गुरु ग्रंथ साहब के शब्द होंगे, वह कुरान होगी, वह फाइबर
- 26:31होंगे, वह तुम्हारी धार्मिक पुस्तक होगी, पुनिश्चित होंगे।
- 26:40लेकिन पहले बांचना सीख लो अभी बांचने का सिलिका नहीं आया
- 26:46तुम्हें यही मैं तुम्हें सीखाता हूँ तुम्हें वह पीछे खड़ा माली
- 26:56दिखाई नहीं पड़ता। अभी मैं खबर पढ़ रहा था।
- 27:03एक परिवार छुट्टियां मनाने के लिए गया था।
- 27:0717 है लोग खूब जश्न मनाया, खूब जश्न मनाया, सारी रात जश्न मनाया।
- 27:19सो वहाँ होने के गरीब थे आग लग गई निकलने को कोई स्थान नहीं पता
- 27:27नहीं कहाँ सो गए सभी और ऐसी आग लगी।
- 27:37के सभी झुलस गए हैं। एक प्रत्यक्षदर्शी बता रहा था
- 27:43मुझे कि मैंने देखा एक माँ अपने चार बच्चों को अपने साथ चपेटे हुए
- 27:51बैठे थे। ओह पांच लोग, चार बच्चे, एक माँ।
- 27:57हमने सोचा जिंदा होंगे, लेकिन पास जाके देखे तो सभी मृत्यु से बस
- 28:09यही तुम्हें समझी नहीं आता। जीस कारण तुम्हें ये समझ आ गया।
- 28:22मैं फल दो पल का शायर हूँ पल दो पल मेरी कहानी है पल दो पल मेरी
- 28:38मस्ती। है।
- 28:41पल दो कल मेरी ही जवानी है मैं पल दो कल का।
- 28:50शायर सैकड़ा माली भौबि से होस। और ही बुलबुल का फूलों पे नशा है
- 29:05खड़ा माली व पीछे होशियार मार कर गोली करा ली।
- 29:09चाय के जब त्रि टोली निकाली चाय के बे मुहूर्त के उठारी चाय।
- 29:16ये तुम्हारे सपने हिल स्टेशन जाएंगे, वहाँ मस्ती मनाएंगे, जश्न
- 29:22मनाएंगे, नाचेंगे कूद में गीत गाएंगे और तुम्हें ये भी नहीं पता
- 29:30होता कि वापिस घर में आएँगे कि नहीं?
- 29:40और तुम इसको जश्न कहते हो? मैं रोज़ बोलता हूँ, ऐश करती हैं
- 29:48तुम्हारी इंद्रियाँ और तुम सिर्फ देखने वाले होते हो, यह चीज़ जो
- 29:54हमने खाई है तो कड़वी। यह तो मीठी थी, नमकीन थी, वह
- 29:59स्वाद थी, यही गलती तुम्हें लेट हो गई है।
- 30:09इसी गलती को तोड़ने के लिए सभी बुद्ध पुरुष अपनी अपनी।
- 30:14कोशिश करके चले गए। वो बीत गए, तुम आज भी उसी मूर्खता
- 30:20के भितर जिए जा रहे हो तुमने अपनी अपनी मूर्तियां गढ़ ली और तुम भूल
- 30:31गए हो कि तुम कौन हो? बस ये तुम कौन हो यही है वह गांठ
- 30:39जीसको तुमने खोला है और तुम खोल नहीं पाते तो गुरु की अवश्य कर
- 30:43पड़ती है तुम कौन हो? ये गांठ जीस दिन खुल जाएगी।
- 30:55उस दिन मौजे महारम हो जाएंगे। यही तो गलतिन है ये सब थे जीवन
- 31:08मर्द का। पर दो बल के लिए तुम्हें सत्य
- 31:15दिखता है लेकिन फिर इसी गर्दिश के भीतर वो समा जाता है, दिखाई देना
- 31:24बंद हो जाता है। ये धुंध ऐसी।
- 31:27कि तुम्हें दूर तरफ़ देखने नहीं देती, फिर किसी गुरू की जरूरत
- 31:36पड़ती है। फिर मिट्टी तौंद जग चारण होया
- 31:49तौंद बढ़ जाती है और जगत में रौशनी हो जाती है।
- 31:54तुम समझते हो कि शायद ये ज़िन्दगी भर का अंधेरा है नहीं, उसकी
- 32:00सृष्टि में ऐसा कभी नहीं होता। यहाँ बराबर चलती हैं चीजें
- 32:06अंधियारा भी आता है, उजाला भी आता है और तुम दोनों को ही देखते
- 32:13रहना। उन आसमान में छाये हुए बादलों को
- 32:18बिना यह देखे कि वे सफेद हैं या काले हैं।
- 32:24ये वर्षेंगे या सिर्फ गरजेंगे तुम सिर्फ देखते रहना, यही सूत्र
- 32:36सिर्फ देखते रहना ये आयेंगे, चले जाएंगे।
- 32:40बहुत बार आये बहुत बार चले गए तुमने कभी सोचा जिन अनहोनी बातों
- 32:51के लिए तुमने कितनी रातें गंवा दी, इतने फिकरमंद हुए कहीं ऐसा न
- 32:57हो जाए? कहीं ऐसा न हो जाए, इरादे बांधता
- 33:02हूँ और सोचता हूँ शहर जाता हूँ कहीं ऐसा न हो जाए, कहीं ऐसा न हो
- 33:19जाए, ये शंशत में गिर लेता है। और तुम किसी मंजल पे नहीं पहुँच
- 33:25पाते हैं, एक ही मुड़ता है एक ही अज्ञानता है, किसी अज्ञानता की
- 33:43गांठ को खोल लेना है और तुम पाओगे धागा बिल्कुल स्वत है।
- 33:51धागे के भीतर कोई गांठ अटकती नहीं।
- 33:55तुम्हें कुछ परेशानी देती नहीं। ये धागा बिल्कुल स्वार्थ सीधा यही
- 34:03तुम्हारी समझ में नहीं आता। यह है गांठ।
- 34:06भीतर जब तुम हाथ फिरते हो तो लड़क लेती है और तुम्हें पता ही नहीं
- 34:13चलता यह है क्या जो मुझे बंधन में डाले फिरती बस एक ही है यह अज्ञान
- 34:23तुम कौन हो तुम्हें इसका पता नहीं।
- 34:30और जीस दिन तुम्हें पता चल जाएगा उस दिन तुम खुद की बेवकूफी पे हश
- 34:34हो लोगों की बेवकूफियों पे तो बहुत असली है और जिंदगी में किया
- 34:42है क्या यही तो कुछ किया है? कितने ही बड़े पदवी पे आ गए तुमने
- 34:50ज़िन्दगी में दूसरों का मजाक उड़ाने के सिवा और किया ही है जीस
- 34:56दिन खुद पे हँसी आनी शुरू हो गई वो तुम तुम ज्ञानी हुए उससे पहले
- 35:02तो तुम लोगों पे तो सदा ही हंसते रहे हो।
- 35:05लोगों पे तो सदा ही तुम तंज कसते रहे हो यह तुम्हारी अज्ञानता की
- 35:11परिचायक है देव तक है तुम शायद सोचते होगे इन दोनों फंक्शन्स को,
- 35:22मैं निभाऊंगा कैसे? नहीं यही गलती खा जाते हो तुम?
- 35:30जब मैं नहीं रहता तो जो रहता है वो ही किया करता है सब पर वो
- 35:39विरोधी अस्तित्व में भी मौजूद रहता है।
- 35:43उसका वजूद ही कुछ ऐसा है के विरोध से लिप्त है वो।
- 35:50विरोधों से लिबड़ते बढ़ते रहता है हर वक्त और विरोधों में मौजूद
- 35:55रहता है बातें थोड़ी गहरी हैं सरलता से समझने के लिए।
- 36:06वह विरोधों में भी समाहित है और तुमने सिर्फ आत्मसात करना है।
- 36:19सत्य को व्हाट सट्टो तुमने किताबों के कीड़े बनकर प्रचार
- 36:29नहीं करना है। नाम बटोर रोके कई स्वामी हुए थे
- 36:36कब हुए थे बहुत से हुए बहुतों ने माथे पीले किए बहुतों ने दाड़ियाँ
- 36:44रंगी लेकिन क्या हुआ? बहुत साज छिड़े, कई गीत गाए।
- 36:56तुम्हें उसकी याद नहीं आती बस मैं हूँ कौन पल भर के लिए अगर कभी याद
- 37:04आती है तो वह फ़ौरन खो जाती है। यह याद निरंतर बनी रहे।
- 37:15अखंड धारा की तरह वह याद आते आते वे रहा का रूप ले ले तुम्हारा
- 37:29हृदय। अतिब तो हो उठे उसे पाने के लिए
- 37:33व्याकुल हो जाए कब आओगे इतने बेचैन हो जाओ तुम।
- 37:49उसकी गैरमौजूदगी में कि उसका सांनिध्य तुम्हारा रोया, रोया
- 37:55मांगने लगे और राधा की चेतना पुकारना, हे कृष्ण, तुम कहो।
- 38:17जब राधा की चेतना कहे कृष्ण मुझे अंग से लगाव तो होता है महारास
- 38:27लेकिन तुम्हारे पे व्रहक भी आई नहीं मीरा पे आती है।
- 38:33राधा पे आती है तुम पे नहीं आती, चैतन्य पे आती है तुम पे नहीं
- 38:40आती, बस यही पहचान है तुम उस बेचैनी को पैदा होने दो और वह
- 38:50उठेगी। उन लम्हों में उठेगी जब तुम
- 38:54निर्विचार अवस्था बिना किसी काम के खाली लम्हों में बैठे होगे।
- 39:03तुम खाली कभी हुए नहीं जब वो लम्हे तुम्हारे सामने से।
- 39:10गुजरेंगे। खाली नम ही तो वह जो सदा से मौजूद
- 39:14है, वह उतर जाएगा तुम्हारे भीतर तुम स्पेस भी तो बनाओ, तुम सदा
- 39:21बीज़ी हो तुम सदा व्यस्त हो और तुमने सब छिद्र ढक लिए हैं कि
- 39:27कहीं से वो प्रवेश न कर जाए। तुमने द्वार, दरवाजे, खिड़की सब
- 39:32बंद कर दी है, अच्छे से टिप लगा ली।
- 39:41यह कोई नुक्लेअर रेडिएशन नहीं है जो किसी सुराख में से तुम्हारे घर
- 39:48में घुस जाएगी। यह तो द्वार दरवाजे खोलने पड़ेंगे
- 39:53अपने हृदय। कि आओ तुम्हारा स्वागत है, लेकिन
- 39:58तुम सिद्धा ही बंद रहते हो। ये व्यस्तताएं तुम्हें बंद रख
- 40:02देती हैं और तुम कभी खुलते हो, तुम कभी उसे भीतर आने की अनुमति
- 40:09नहीं देते। यद्यपि।
- 40:13वह हर कड़ में समय हुआ है, लेकिन तुम फिर भी उसे नहीं आने देता तुम
- 40:24बंद कड़ी की तरफ कितनी भी सुगंध, लेकिन बाहर फैलती नहीं।
- 40:32मैं तो मैं यही से करता हूँ एक कला ये सीख लो कैसे तुम अपने अंत
- 40:43में आ जाओ और कैसे तुम अंत से सभी गैर बदलते बदलते बाहर खोपड़िया
- 40:49में हो जाओ। कैसे खोपड़िया से चल के भीतर अपने
- 40:53अंत स्थल में बचाओ, यहाँ तुम स्वयं बैठे हो बस इतनी सी तो
- 40:58कहानी है और इतने प्रवचन कर दिया तो मैं समझी नहीं हुई, तुम फिर
- 41:05पूछ रहे थे बाबा अपने अंदर कैसे अच्छा गार्ड तुम्हारा है भाई?
- 41:11मुझसे क्या पूछते हो, अपने अंदर नहीं जा सकते ये कोई बेगाना मुल्क
- 41:17है हाँ आज बेगाना लगता है क्योंकि बिछड़े बहुत देर हो गई कब के
- 41:27बिछड़े थे? कब किसी मेले में तुम्हारा अलगाव
- 41:34हो गया था? तुम बिछड़ गए थे अपने माँ बाप से
- 41:38और सर कुछ याद नहीं क्या हुआ तुम तो परम पिता परम ऐश्वर्य।
- 41:48उस ऐश्वर्य को ही ईश्वर कहते हैं। धन धनी से परिपूर्ण सब उसका
- 41:57तुम्हारा कुछ भी नहीं और तुम उसकी औलाद हो, तुम उसका अंश हो तुम
- 42:02उससे एक बार ऐसे बिछड़े कि श्रद्धा के लिए बिछड़ गए।
- 42:09फिर तुम्हें उसकी तड़प कभी महसूस नहीं हुई।
- 42:16काश तुम्हारे भीतर भी मेरा जैसी तड़प आ जाए और जब जिसके भीतर भी
- 42:23मेरा जैसी तड़प आ गयी। वह राजस्थान की सड़कों के ऊपर यह
- 42:28परवाह नहीं करती कि घूँघट का आंचल कितना झुका है, कितना खुला है?
- 42:36वो सड़कों पर नंगे पांव तोड़ती है, चाहे महारानी ही क्यों ना हो।
- 42:48तुम कहते हो इसने लाज खो दी इसने हया खो दी यह बेशर्म हो गई हाँ
- 42:56बिलकुल ठीक कहते हो, तुम शर्म तुम्हारी दृष्टि में है।
- 43:06तुम्हें देखने की कला है तुम परम ज्ञानियों को परम बुद्धिमानों को
- 43:16तुम मूर्ख करार दे के जेलों में बंद कर देते हो, पागलखानों में
- 43:20बंद कर देते हो, इसका ही शुड बी मेंटली ट्रीटेड इसका उपचार होना
- 43:25चाहिए। क्योंकि उनकी बात नहीं, तुम्हें
- 43:31समझ नहीं आती किसी दूर लोक का ऐसा लगता है किसी दूर लोक का संदेश दे
- 43:39रहे हैं। ये होता तो दूर लोक का है।
- 43:44बैलोप तो तुम्हारा ही है जिसके समुद्र में मोती हैं, चल हंसा उस
- 43:53देश समुद्ध जहाँ होती है लेकिन वो कभी तुम्हारा था और कभी तुम्हारा
- 43:59होगा और आज भी तुम्हारा है। तुम्हारा पैदाइशी हक है उस पर और
- 44:07तुम कहती हो कि हम अपने भीतर कैसे उतरे?
- 44:11क्या तुम्हारी ही तो संपत्ति है? न तुम्हे बिरहा आया, न तुम्हे
- 44:18बिरहा की अग्नि जली। ना तुम्हारा रोवर रवा तड़पा ना
- 44:22तुम मछली की तरह तड़पा इसलिए हिंदुओं ने मछली को अवतार बनाया
- 44:30लेकिन तुम इसके अर्थ नहीं समझ सके सिम्बोलिक रेप्रेसेंटेशन्स थिस
- 44:36वास् ओनली तड़पो। तड़पों इतना तड़पों जैसे मछली की
- 44:42तरह तड़पों यह शुरुआत है मीरा के बिरहा जैसे जल बिन मीन प्यासी जल
- 44:56नहीं मिला। तो कैसे तड़पती है ज़रा?
- 45:00तड़पती हुई मछली को एक बार निहार लेना बस वैसे ही तड़पंज स्थल
- 45:05तुम्हारे भीतर आ जाएगी तो मंजिल दौड़ रहे है।
- 45:10पहला कदम उठना चाहिए। पहला कदम उठ जाए।
- 45:19वह सौभाग्यशालीक्षण है, पलटू शुभ दिन शुभ घड़ी याद पड़े जब नाम जब
- 45:32उसकी याद आ जाए। वही शुभ दिन है, वही शुभ घड़ी
- 45:41क्योंकि तुम उस रस की तरफ खींचे जो रस तुम्हारे रोओ, रोओ में बिखर
- 45:46जाएगा खून के साथ मिलकर और तुम्हें बड़ा मज़ा आएगा।
- 45:57तुम आज तक संसार के उन मज़ों में उलझे रहे जिन मज़ाओं को तुमने
- 46:05सिर्फ देखा। इन्द्रियों को भोगते हुए
- 46:08इन्द्रियों ने भोग और इन्द्रियां भोग के बिखर गईं, और तुम सिर्फ
- 46:13उसके साक्षी थे। और तुमने उसको अपना ही मज़ा समझ
- 46:17लिया, बड़े मज़े से जिए कहाँ जिए भाई, एक क्षण भी बना दो वो जिनको
- 46:25तुम मज़े का क्षण कहते हो, वो सिर्फ स्टिमुलेशन के क्षण होते
- 46:31हैं उत्तेजना के क्षण। तुम उन्हें ही मज़े के क्षण कहते
- 46:36हो, मैं जानता हूँ मैं इन गलियों में से बहुत पहले गुजर चुका हूँ
- 46:42इन धूल भरी आँधियों से कब का गुजर चुका हूँ मैं अच्छी तरह से जानता
- 46:47हूँ कि तुम मज़ा कहते किस के हो थिस इस ओनली स्टिमुलेशन।
- 46:54उत्तेजना को तुम मज़ा कहती हो तुम जब उत्तेजना के पीक पॉइंट में
- 46:59होते हो, तुम कहते हो बड़ा मज़ा आया, लेकिन तुम्हें पता नहीं यह
- 47:04मज़ा तुम्हारे लिए ही गातक है यह तुम्हें मुर्दे की तरह।
- 47:14निर वीर ही कर गया। निर जीव कर गया।
- 47:17इसने तुम्हारी क्षति को बाहर फेंक दिया और तुम कहते हो बड़ा मज़ा
- 47:22आएगा आज तक तुमने असली मज़ा चखाने में रोज़ बोलता हूँ।
- 47:31तुम सिर्फ उत्तेजनों को जीना सीखे तुमने आनंद की वो एक बूंद भी कभी
- 47:38नहीं पी जिसके पीने से व्यक्ति ठहर जाता है।
- 47:44तुम उत्तेजना को पीते हो, जिसके पीने से व्यक्ति ठहरता नहीं और
- 47:50भागता है। तेज दौड़ता है कैसे कमालू धन कैसे
- 47:55कमालू पथवी इससे भी ऊंची पदवी और आखिर में तुम अमेरिका के
- 48:00राष्ट्रपति बन जाते हो। फिर तुम्हारी कोशिश होती है कि अब
- 48:05भगवान कैसे बन जाते ये प्रत्येक व्यक्ति?
- 48:10की सोच है, भीतर की कामना है। फिर व्यक्ति जब अपनी चरम सीमा पे
- 48:17होता है तो वह कहता है मैं हिरण्य के शव कैसे बन जाऊं।
- 48:22कैसे दुनिया मुझे भगवान मानने लगे।
- 48:27तुम भगवान होना नहीं चाहते। यही तो होता है और कोई नौकरी
- 48:34प्रहलाद आकर तुम्हारी सत्ता को चुनौती दे देता है।
- 48:42तुम चाहती हो भगवान को काश तुमने मुड़कर देख लिया होता।
- 48:48कि मैं भगवान होना चाहता हूँ और भगवान होने का जो मार्ग मैंने
- 48:53चुना वो गलत है। ज़रा पीठ कर लो जीस तरफ मुखड़ा उस
- 48:59तरफ पीठ कर लो, जीस तरफ पीठ उस तरफ मुखड़ा कर लो, तुम भगवान हो
- 49:03जाओ। रबदा की पान वो तो रो फूटना से
- 49:09इधर ना बस यही तो कहते हैं बोले शू ज़रा उलटे हो जाओ, जीस तरफ मुख
- 49:16है, उस तरफ पीठ कर लो, जीस तरफ पीठ है उस तरफ मुख कर लो, तुम
- 49:21भगवान हो जाओ और वही भगवान होता है।
- 49:26वही भाग्यवान होता है जो संसार की तरफ से पीठ कर लेता है, सत्य की
- 49:33तरफ से तरफ मुख कर लेता है, वही भाग्यशैली हो जाता है।
- 49:39लेकिन कितने जन्म बीते तुमने ऐसा नहीं किया।
- 49:42गुरु समझा समझा कर चले गए बीत गए बेचारे लेकिन तुम्हारी समझ में
- 49:47ज़रा भी नहीं आई तुम्हारी भीते के प्रश्न ना तुम्हे रात को सोने
- 49:58देते है ना तुम्हे दिन में? चैन से रहने देते हैं।
- 50:05तुम छठ बटाते रहते तो फिर संसार की चीजों के अभाव में छठ बटाने से
- 50:14अच्छा ये नहीं के परमात्मा के अभाव में मीन की तरह छठ बटाओ।
- 50:23फिर 1 दिन तुम गंतव्य तक पहुँच जाओगे, यही मैं कहता हूँ तुमसे
- 50:34पहले तुम पेट की भूख मत जाओ। फिर दूसरी भूख आएगी अध्यात्म की
- 50:44पेट की भूख। पहली नहीं तो कबीर की तरह अपनी
- 50:51माला फेंक दोगे, ये ले अपनी कंठी माला, भूखे भजन होई को पाले।
- 51:00और तुम इन दोनों चीजों को अलग अलग समझते हो अलग अलग नहीं विरोधी
- 51:04समझते हो, जबकि विरोध यहाँ कुछ भी नहीं है।
- 51:07परमात्मा की सृष्टि में विरोध नाम की कोई चीज़ ही नहीं है।
- 51:10एक ही है तुम्हें विरोधी लगते हैं।
- 51:16उत्तर और दक्षिण तुम्हें दो विरोधी दिशाएं लगती हैं, लेकिन
- 51:20तुम्हें पता नहीं यह मिलती हैं, एक धागा है जो उत्तर को दक्षिण से
- 51:26जोड़ देता जो पूर्व को पश्चिम से जोड़ देती सभी अखंड है यहाँ।
- 51:36लेकिन शब्दों से तुम्हें बता नहीं सकूंगा।
- 51:41सभी एक है जैसे मैं कहती हूँ तुम्हारा शरीर एक है, तुम कहो कि
- 51:46कैसे एक है ये अंगूठा रख सब अंगों की अपनी अपनी अहमियत।
- 51:55मैं कैसे लिवर को फड़क बना लूँ? सब अलग अलग हैं, बस तुम्हें नजर
- 52:01आते हैं। बस तो एक है सारा भीतर का यंत्र
- 52:08एक होकर एक टीम की तरह काम करता है तो तुम जिंदा हो।
- 52:14अगर एक भी अंग खराब हो जाए तो तुम ठहर जाओगे, फिर सब अंग बेकार हो
- 52:20जाएंगे, हृदय थोड़ा सा धड़कता, धड़कता धड़कता, बस हो गया काम
- 52:29घटिया का हर्ट कूलप्स करके। क्या करेंगे वाक्य की यात्रा
- 52:38तुम्हें लगता है कि अंगूठा अलग हात का अलग, पंकार सिर अलग पांव,
- 52:47अलग पेट अलग। हाथ अलग यह एक शरीर है।
- 52:58ऐसे ही यह विराट संसार एक शरीर की भाँति है।
- 53:03तुम इन्हें अलग अलग रूपों में देखो, तब तक तुम अज्ञानी और जब
- 53:08तुम्हें यह एक नजर आए। तब तुम ज्ञानी हो, फिर न यह कहने
- 53:17वाला होगा कि परमात्मा है या परमात्मा नहीं है, फिर सब खो
- 53:24जाएगा, सब खो जाएगा जंग। जब कयामत होगी, जब प्रलय आएगी, सब
- 53:35खो जाएगा और तुम चैन की नींद सो जाओगी वहाँ पर शांति शांति शांति
- 53:45मत कहा करो, शांत तो 1 दिन हो ही जाओगे।
- 53:51ये दर्द चलता चलता रुक गया। ओम शांति हो जाएगी ओम शांति करनी
- 53:58नहीं पड़ती, ओम शांति हो जाया करती है ये धक धक करता हुआ जहाँ
- 54:05ठहर गया दर्द वहाँ ओम शांति हो गई।
- 54:10लाने की चेस्टा में क्यों पड़े पागल हुए हो?
- 54:13क्या पागल कुत्ते ने काट लिया हाथ में?
- 54:32सर्द जोकों से भड़कते हैं बदन में, शोले हैं सर्द जोकों से।
- 54:50भड़कते हैं। बदन में शो ले जान ले लेगी विजय
- 55:06बरसात करी बाजा दूर रहकर न करो बात करी बाजा।
- 55:28दूर रहकर ना करो बात करि बाजा एक मद्दत से तमन्ना थी।
- 55:48तुम्हें छूने की एक मदद। से।
- 55:58तमन्ना थी तुम्हें छूने की? आज बस में नहीं जज़बात करीबा जा
- 56:19आज। बस में नहीं जज़बात।
- 56:26करिवा जा दूर रहकर। न।
- 56:35करो आती करिवा जा। तुम्हारी बेतरी ख्वाहिश है उसमें
- 56:49समझ आना एक मुद्दत से तमन्ना थी तुम्हें छूने की तुम्हें छू।
- 57:05आज बस में नहीं जर्ज़ बात करी, आज आप आज जर्ज़ बात मेरे बस में तो आ
- 57:14जाओ मुझसे लेपक। इस कदर हमसे झिझकने।
- 57:27की। जरूरत क्या है इस कदर हमसे झिझकने
- 57:39की। जरूरत क्या है?
- 57:45न की भर का है अवसाद करि बाजा। दूर रहे करना करो, बात करिवा जाओ
- 58:11याद हो जाएगी। ये रात करी बाजा याद रह जाएगी ये
- 58:30रात करी बा। जा मुझे भी याद।
- 58:36है वो रात जब सर्द झोको में मुझे जीने की तमन्ना बड़ी थी पर मैं जी
- 58:48भर केजी। काश तुम्हारे भीतर में ये पल
- 58:57उत्तर। श्रीकृष्ण भवन हर मुरा।
- 59:15हे नाथ नारायण वासुदेव श्री कृष्णव।
- 59:28हर मुरारी, श्रीनाथ नारायण, वासुदेव भितुमात स्वामी सखा अमर।
- 59:50पितुमात स्वामी सखा हमारा और। नारायण वासुदेव, श्री कृष्ण
- 1:00:12गोविंद हरे मुरारी केनाथ, नारायण वासुदेव।
- 1:00:25पितुमात सुनी सका मर हे नात? नारा यन वासुदेव श्री कृष्ण
- 1:00:42गोविंद हरे मरहारी एनाथ नारायण वासुध।