Latest / Baba ji Vijay Vats / 8 Mar 26 - आत्मनिर्भर भारत या गुलामी का नया युग? बाबा जी का कड़ा और निर्भीक संदेश!!
Transcript
- 0:11पवन कुमार हमें। बचपन से सिखाया।
- 0:19गया है। कि जो निंदा करता है वह शांत नहीं
- 0:29है। जो स्वीकार करता है वह सुनता है।
- 0:43हम डोसा में हैं, कृपया आप हमारी दुविधा का निराकरण कीजिए।
- 1:01शब्दों का जंजाल आपको इतना उलझा लेता है कि आप सत्य क्या है?
- 1:12झूठ क्या है? इसमें वेद नहीं कर पाते।
- 1:20जो निंदा करता है, वह संत है। अग्रिस को फार्मूला के रूप में या
- 1:30सत्य के रूप में स्वीकृत कर लिया जाए।
- 1:37तो थोड़ा सोच के बताना पुत्र, मैं तुम्हें ऊंट की मेंगणियां दे दू
- 1:47बकरी की मेंगणियां दे दू एक प्रेप में डाल कर।
- 1:55और ऊपर से वो खाने वाली जो लकड़ी की चुपकरे सी होती है, वो फंसा
- 2:02दो, अच्छा खोपा वगैरह खुर चूके उसके ऊपर बचा दो।
- 2:12आप उससे कहे बाबा ये क्या है? मैं कहूं ये तो रसगुल्ला है,
- 2:18गुलाब जामुन क्या आप उसे खा जाओ? और क्या मैं अगर आपको वास्तविकता
- 2:38से प्रसिद्ध करवा दूं कि यह गुलाब जामुन, रसगुल्ला कहने वाले लोग
- 2:45झूठे हैं, पाखंडी हैं, निहित प्रयोजन के कारण बोल रहे हैं?
- 2:53इनका कोई नेतृत्व स्वार्थ है तो क्या यह निंदा है?
- 3:01यह गुलाब जामुन नहीं है। यह बिक्री बकरी की मीमणें हैं।
- 3:07यह ऊंट की मीमणें हैं, वो गोल होते हैं।
- 3:14इन पर मात्र लीपापोती की गई है। बर्ग लगाया गया है, खोपा घिस कर
- 3:26उसका बुरादा छिड़का गया है। लेकिन पुत्र ये रसगुल्ला, गुलाब
- 3:35जामुन नहीं है, ये है तुम मेगणे बकरे की और ऊँटों की और तुम्हें
- 3:42कहा जा रहा ये छोटी वाली बकरी की मेगणें नहीं है।
- 3:46छोटी वाली छोटी गुलाब जामुन है। बड़ी वाली ऊंट की नहीं है।
- 3:53बड़ी वाली ऊंट की की जगह गुलाब जामुन बड़ी वाला है।
- 4:00क्या ये निंदा है सत्य से परिचित करवा देना?
- 4:08और सत्य से परिचित करवाने वाला अगर संत नहीं होता तो मैं संत
- 4:14नहीं क्योंकि मैं तुम्हारी भ्रांतियों को तोड़ने के लिए आया
- 4:24हूँ और मैं जानता हूँ कि तुम दुखी क्यों हो।
- 4:31तुम दुखी हो ये पक्का है क्योंकि तुम रोज़ चिल्लाते हो, मेरे पास
- 4:37आके बाबा दुखी क्या कहें, कोई अभाव से पीड़ित है, वो तो समझ में
- 4:44आता है जिनके पास सब कुछ है। वो भी कहते हैं कि बाबा हम दुखी
- 4:50तो समझ में नहीं आती। आम इंसान की संत की समझ में आता
- 5:04है यह दुष्टों के द्वारा दिए गए आपको?
- 5:12मिथ्य आवरण हैं, जो आपको मान्यताओं के रूप में दे दिया गया
- 5:21मान लो खा लो यह गुलाब जामुन छोटे वाला है मान लो खालो।
- 5:31यह गुलाब जामुन बड़े वाला ऊंट की मेगनी नहीं या बकरी की मेगनी
- 5:37नहीं, बस मैं उसी क्रम में आपकी भ्रांतियों को आवरणों को नष्ट
- 5:48करने की फिराक। हर वक्त करता हूँ और अगर
- 5:55बाराठियों को तोड़ना संत का काम नहीं होता तो फिर मैं संत नहीं,
- 6:05क्योंकि मैं तो तुम्हारे सारे अवर्ण उगाड़ दू?
- 6:12और तुम्हारे संतों को नंगा कर दूंगा अमूल चूल फिर भी अगर तुम
- 6:21देख कर भी कहोगे नहीं यह संत सही है, आप गलत हैं।
- 6:31तो ठीक है, हमें उसमें कोई ऐतराज नहीं है अगर तुम दुखी भी रहना।
- 6:38चाहते हो? इसमें परमात्मा भी आपकी कोई
- 6:41सहायता नहीं कर सकता। और मैं भी आपकी कोई सहायता नहीं
- 6:48करूँगा। मैं एक बार कहूंगा परमात्मा तो
- 6:52बिलकुल ही नहीं कहता, वह तो खामोश है।
- 6:57परमौन की स्थिति में आनंद की लहरों में बैठा है, वह बोलेंगे
- 7:03क्यों? जब कबीर कहते हैं।
- 7:16हंसापयो मानसरोवर। हम सपायों मानसरो ताल तलैया क्यों
- 7:38डोल? ताल।
- 7:41तलैया क्यों डोल? मन मस्त हुआ।
- 7:51फिर क्यों बोल रहे? जब संत इतना मस्त हो जाता है,
- 7:57बोलने का दिल नहीं करता, तुम्हें पता नहीं क्या मजबूरियां रही
- 8:01होंगी, यही कोई बेवफा नहीं होता। किसी को बुरा कहते वक्त पीड़ा तो
- 8:12हमें भी बहुत होती है, क्योंकि हमें अपने उस तीर्थ से बाहर आकर
- 8:21जहाँ हम रस का पान कर रहे हैं। बड़ा मदहोशी का आलम है वहाँ
- 8:34रिमझिम रिमझिम बारिश हो रही है, आनंद उसको छोड़कर आने का किसका
- 8:43जेहरा करेगा? लेकिन फिर भी हम आते हैं, कितना
- 8:51तकलीफ दे होगा ये तुम्हें पता है क्योंकि तुमने अभी वो पर मौन का
- 8:58स्वार्थ चखाना। अभी तुमने आवाजों की दमक सुनी,
- 9:06अभी तुमने आवाजों की शोर शराबी की खनक सुनी तुमने वो परमोन का आलम
- 9:13कभी चखा ही नहीं इसे तुम मान्यताओं पे जीते हो?
- 9:24हमें तो बाबा यही सिखाया गया है, जो किसी की जनता करता वह संत नहीं
- 9:32होता तो क्या मैं तुमसे कह दूँ, अगर कोई जहर फलाये तो मैं कह दूँ
- 9:39नहीं नहीं पीलो ये अमृत है। और मल मूत्र को?
- 9:49क्या मैं कह दूँ कि ये कलाकंद है, मल मूत्र को कह दूँ ये बड़ा सुंदर
- 10:03पकवान है, हलवा है। अगर संत नहीं बोलेंगे और कौन
- 10:10बोलेंगे और एक बात और भी समझा दूं, संत ही बोल सकता है।
- 10:23जिसके पास आँखें हैं वो ही रंगों की व्याख्या कर सकता है जिसके पास
- 10:31आँखें। वह रंगों की भला व्याख्या कर कैसे
- 10:36पाएगा? और फिर तुम कहते हो कि हमें तो ये
- 10:42सिखाया गया है कि जो रंगों की व्याख्या करे, वह तो संत होता ही
- 10:46नहीं नहीं, तुम्हें कल सिखाया गया है।
- 10:54रंगों की जो व्याख्या करें, वही सजा का होता है।
- 11:00रंगों का जो स्वाद चक्र है, रंगों की पहचान जो बताएं।
- 11:13बाघों में रंग वरंगे फूलों को देखकर और उनकी महक को नासा पुटों
- 11:22में रखकर जो व्याख्यान करता है फूलों का।
- 11:27वही तो रंगों को निहारा करता है, उसी के तो नर्सिका फूटे हैं, तुम
- 11:37क्या सुनते हो जो कहता है नहीं, नहीं यह गोबर नहीं है।
- 11:48यह तो अमृत है स्कोपिने से तुम्हारे सब रोग दूर हो जाये और
- 11:57तुम तो अमर हो जाओगे। हमारे पिताजी कहानी सुनाया करते
- 12:03है। कार ही गांव में।
- 12:05हरियाणा के अंदर एक किसान गाय लेके आया था।
- 12:13राठी गाय बहुत बढ़िया गाय उस वक्त में महंगी भी बहुत थी लेकिन गाय
- 12:21बहुत बढ़िया थी। अच्छा दूध देती थी लेवा बहुत था,
- 12:30सुंदर थी दिखने में तो ₹2 ज्यादा दिख गए।
- 12:39वो किसान खरीद लाया। बच्चे अच्छे से दूध पी लेंगे,
- 12:45अच्छे से घी निकल जाएगा, अच्छे से इच्छा से बन जाएगी।
- 12:54उसी गांव का एक व्यक्ति है गाय लेने जा रहा था।
- 13:02रास्ते में दोनों का मिलन हुआ। कहता भाई राम राम कहता राम राम
- 13:10भाई ये गाय बेचनी है। किसान बोला बच्चों के लिए ले के
- 13:16आया बाबुसकिल मैं भी सुबह से ढूंढ रहा था।
- 13:22बा मुश्किल मुझे ये गाय अच्छी लगी, मैं ले आ दो, पीस से ज्यादा
- 13:27ले आ किसान कहता गाय तो बहुत अच्छी है, ये गाय तू मुझे दे दे
- 13:36तू और चार पीस से मुनाफा ले ले। अब मैं इतनी दूर कहाँ जाऊंगा?
- 13:46मेरे दिल को लग गई। गाय बहुत अच्छी है और बेचने वाली
- 13:54ने भी कहा भैया तुम याद रखोगे कि गाय लिखे आया?
- 14:02बहुत अच्छी शील स्वभाव के खूब दूध देती है, तीन बार दूध देती है
- 14:13अच्छा तो मेरे लिए आया तुम्हारे चार पीसों को क्या करूँ?
- 14:22एकाश्रम होता नहीं, मैंने और भी घर बार के खेत के काम करने हैं,
- 14:33तू जा के और बाजार से ले आ अभी मेला लगा हुआ है।
- 14:42लेकिन अब तू अड़ गया तो कहता नहीं, मैं तो यही गाय लूँगा, कीमत
- 14:48तेरे मुख बोली तू बोल कितने चाहता है?
- 14:56वो कहता, भाई मैं जब बेचना ही नहीं, मैं तो खुद अभी अभी खरीद के
- 15:00लेके आया। मेरे बच्चों ने एक बार भी इसका
- 15:03दूध नहीं पिया जब वह व्यक्ति ज्यादा अड़ गया यह बिल्कुल सच्ची
- 15:13कहानी। तो पिताजी बताया करते हैं, उसे
- 15:23लाने वाले किसान ने कहा तू ऐसा कर जो गाय जो गोबर करेगी वो सारा खा
- 15:29लेना या कोई पैसा नहीं लेता। इसे मुफ्त इसकी रस्सी पकड़ा देना।
- 15:35तुझे लोग क्या कुछ करवा देता है? आज तो धर्म के नाम पर गोबर की
- 15:51बांटी होती है। गोबर गणेश है।
- 15:58गोबर का सेवन करने में कोई हिचक फैट नहीं होती।
- 16:03जो कागज के गणेश की पूजा कर सकता है वह गऊ का गोबर क्यों नहीं खा
- 16:10सकता? यही भ्रांतियों ने तुमको।
- 16:16इसलिए हम कभी अच्छे साइंटिस्ट पैदा नहीं कर सके।
- 16:21कोई वक्त था जब हिंदुस्तान वैज्ञानिकता की चरमपराकास्ठा पर
- 16:29था और तब हम सोने की चिड़िया भी हुआ करते थे।
- 16:36जैसे मन्तुभुंदियों का राज़ आया, विज्ञान घटता गया, मूड मतियाँ
- 16:46हावी होती गईं, ऐसे लोग पैदा हो गए जो कुछ भी कह देते हैं।
- 16:56जान जाना उन्होंने कुछ भी नहीं होता उसने वो कहता ठीक गाय ने
- 17:11गोबर किया दो तीन किलो के करीब गाय का गोबर था वह सारा खाद।
- 17:24कोई अंधभक्त तो होगा आरएसएस का बीजेपी का यही तो सिखाया जाता है।
- 17:31वहाँ गौ माता है, दूध के लिए, गोबर के लिए नहीं।
- 17:43खा गया। उस किसान ने दुखी मन से अरे सब
- 17:47करा दिया, ये ले जा घर खाली हाथ चला गया।
- 17:55पैसा भी कमाए, गाय भी नहीं लाया। सारी कहानी सुनाई।
- 18:02सारा घर शोक मग्न हो गया और वह व्यक्ति गाय को लेके घर पे चला के
- 18:11अब इतना गोबर खा लिया दो तीन किलो मंद बुद्धियो।
- 18:20क्या तुम खा लोगे गोबर पार्टी में पेट?
- 18:24भर के खा लेंगे। मुझे दोष मत देना जो उसका असर
- 18:32हुआ, तुम्हारा भी होगा पेट दुखने लगा, वॉमिटिंग होने लगी।
- 18:39बहुत सी व्याधियाँ होंगी डॉक्टर उसे बचाना आ सके वह मर के
- 18:50मृदोतिया ऐसे ऐसे परिणाम लेकर आती हूँ तो मैं संडे मर मर की
- 18:59मूर्तियां बनाकर उसे भगवान कहता हूँ।
- 19:03कागज की किश्तियां बनाकर समुद्र को पार करने की अभिलाषा है
- 19:08तुम्हारी जो कभी बुरी नहीं हो सके।
- 19:16जैसे ही हम वैज्ञानिकता से उलट हुए।
- 19:20वैसे ही हम दिन पर दिन गरीब होते गए और आज हालात ऐसे के हमारी
- 19:29सुप्रीम गलती के ऊपर बैठे हुआ व्यक्ति सिर्फ झूठ बोलता है, झूठ
- 19:35के सिवा कुछ नहीं बोलता ये कसम खा के।
- 19:39कि मैं जो कहूंगा, सत्य कहूंगा, सत्य के सिवा कुछ नहीं कहूंगा,
- 19:44झूठ बोलता है, झूठ के सिवा कुछ भी नहीं बोलता।
- 19:53तुमने कहा पुत्र, हमें ये सिखाया गया, जो निंदा करता है वह संत
- 20:00नहीं होता। फिर जो आपको गलत मार्ग पर
- 20:09पहुंचाता है, गलत मार्ग दिखाता है।
- 20:13क्या वह सुनते हैं? इसलिए आज तुम दुखी हो इसलिए
- 20:19हिंदुस्तान का हर व्यक्ति। पीड़ित है हृदय त्राहिमाम
- 20:28त्राहिमाम कर रहा है, तुम प्यासे हो, तुम भूख हो उस आनंद के उसकी
- 20:35पोलक तुमने कभी चटनी नहीं। उसकी सुगंध तुमने नस का पुटों में
- 20:42कभी तुम उसका आगाज़ नहीं कर पाए और फिर तुम आनंद की इच्छा करते
- 20:55हो। मान्यताओं को थोपे थोपे इस शब्द
- 21:03ने तुम्हारे आनंद की बलि ले ली है।
- 21:08इसको ठीक से समझ लेना इस शब्द ने की।
- 21:13संत निंदा नहीं करता और क्या किया करता है?
- 21:22संत तुम्हारी मान्यताओं को तोड़ा करता है और सही चीजों को बतलाया
- 21:29करता है। सही मार्गों पर तुम्हें डरा करता
- 21:32है, गल तुमसे छीन लिया करता है। संत का यही तो काम होता है और जो
- 21:41अपने आपको संत भी कहलाता है और मार्ग भी गलत दिखाता है, उसी के
- 21:48कारण ही तुम आज हिंदुस्तान को। दुःख की मूर्ति बना दिया है तुमने
- 22:00और ऐसे व्यक्तियों के पास पाखंडी व्यक्तियों के पास कतार लंबी होती
- 22:05है, आनंद नहीं होता, सुंदर शब्दावली होती।
- 22:22लेकिन तुम भीतर झांकने की योग्यता नहीं रखता, इसलिए तुम ऐसे लोगों
- 22:29के जंजाल में फंस जाते हो। स्वाभाविक है नहीं संत जहाँ निंदा
- 22:42की जरूरत है निंदा करता है। निंदा का मतलब यह सत्य नहीं है और
- 22:53कबीर कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति को दो आँखों वाला है।
- 23:01और निंदा करता है। निश्चित रूप से वह सत्य बोलेंगे।
- 23:07ऐसे व्यक्ति को अपने पास ही बिठा लेना।
- 23:10कुटिया में निंदा कन्नी रेह राखी है, आंखन कुटिक स्वाद।
- 23:20बिन साबुन बिनवार के सगल मैल धुल जार कबीर कहते हैं निंदा करने
- 23:29वाले को देख लेना, आँखें हैं इसके तो कुटिया के भीतर ही बैठा लेना।
- 23:39आप तो बैठ जाओ प्रोफाइल उसके चरण दोनों वह बड़ा कीमती आदमी है जो
- 23:48बातों को जो गलतियों को जो कमियों को तुम नहीं खोज सके अपने वित्त
- 23:55निंदक खोज लेता है, क्योंकि निंदक की दूरी होती है तुमसे।
- 24:00और वस्तुएं दिखती है जब तुम दूरी पर होते हो इसलिए निंदक भांप लेता
- 24:10है कि तुम गर्व तो कबीर बड़ा शानदार भजन कहते हैं।
- 24:17निंदा कनिया राखी है आँगन कुटीर शॉवर बिन श्रावण बिन वारके सगल
- 24:25मैल तुलजा तुम्हें जो सिखाएगा पुत्र गलत सिखाओ।
- 24:36अगर कोई कहे के एच टू ओह पानी नहीं होता, एच टू ओह टू पानी होता
- 24:43है या एच थ्री? ओह थ्री पानी होता है तो तुम्हें
- 24:49तो कोई ज्ञान नहीं है? संख्या तुम्हें तो एटोमिक फर्ब
- 24:53परिक्शन का कुछ पता ही नहीं? तुम तो जो कहेगा तुम्हारा अध्यापक
- 24:58तुम कहोगे ठीक है अगर आगे अध्यापक नालायक हो तो तो तुम भी गए काम से
- 25:08हम तो डूबेंगे संग संग आपको भी ले डूबेंगे।
- 25:19पुत्र, मैं निंदा करता हूँ, बुराइ नहीं करता ये सब चल बुरा मेरे लिए
- 25:31कुछ भी नहीं। इस बात को ध्यान से सब से सब में
- 25:41परमात्मा है और मैं बाहर से चाहे कुछ।
- 25:50सब में बसरया प्रभु एक को नानक वेख वेख शरण नानक कहते हैं, मैं
- 26:00जब सबके भीतर उस परमपिता परमात्मा को विद्यमान देखता हूँ तो मैं
- 26:07सबकी शरण सबको नमन करता हूँ। सब में रामयया प्रभु एको नानक वेख
- 26:17वेख शरणई सबकी शरण परता हूँ। मैं जब प्रवचन शुरू करता हूँ तो
- 26:26आपको प्रणाम करता हूँ, कहता कुछ नहीं।
- 26:33बस प्रणाम करना काफी है। बोलने की आवश्यकता नहीं होती, बस
- 26:41आप मेरे परिणाम से ही समझ लिया करो कि मैं आपके बेहतर बैठे उस
- 26:47परम पिता परमात्मा को। जो आनंद से भरा हुआ समुद्र है
- 26:54उसको प्रणाम कर रहा हूँ। मैंने वो देखा है मैंने वो पिया
- 27:02है मैं उसको पीकर मदहोशी के आलम में नाचा मैंने उसे जिया है।
- 27:12मैं यूं ही किसी की निंदा नहीं करता और फिर तुम भी तो बंदे नहीं,
- 27:23तुम भी तो बंदे नहीं हो तुम अगर ये समझते हो कि मेरा निंदा करना।
- 27:29ठीक नहीं है और मैं संत नहीं हूँ तो आप जब चाहें मुझे सूख सकते हो।
- 27:35किसने बांधा मैं तो कभी बांधता नहीं, मैं तो जो व्यक्ति मेरा
- 27:44वक्त जो आनंद को पीने में मैं गुजर रहा था।
- 27:49वो शास्त्रार्थ करने के लिए बाधित करता है।
- 27:52मुझे मैं उसे ब्लॉक मार देता हूँ क्योंकि मैं जानता हूँ कि
- 27:59शास्त्रार्थ करोगे कैसे उस विराट के बारे में उस विराट के बारे में
- 28:05कोई शब्द है ही नहीं। उस विराट का कोई पैमा ना ही नहीं।
- 28:10नो मेजरमेंट इस गया वह असीम है, उसकी कोई सीमा नहीं, कोई और छोर
- 28:26में कैसे व्याख्यायित करूँगा। कैसे शास्त्रार्थ करूँगा उसके
- 28:34बारे में भला शब्दों में वो समा जाएगा?
- 28:41नहीं आएगा समझ में ना शब्दों में आएगा, ना बुद्धि में आएगा ना हृदय
- 28:48में आएगा। वह किसी गागर में आता ही नहीं, वह
- 28:54किसी सागर में भी नहीं आता तो मैं ये भी बता दूँ कि वह किसी सागर
- 29:01में भी नहीं आता। वह तो परम सागरों का परम सागर है
- 29:06और पता नहीं वह उसका कोई आदी अंत और मध्या ही नहीं।
- 29:15और तुम खुले मैं तुम्हारी भेड़िया काटने के लिए बोल रहा हूँ और फिर
- 29:23अगर तुम्हें ऐसा लगता है, पुत्र। कि मैं तुम्हें बेड़िया दे रहा
- 29:31हूँ, तो ठीक है, तुम जैसा चाहो वैसा कर सकते हो क्योंकि मैं किसी
- 29:41को मानता नहीं वर्ण मैं बंधे हुए को मुक्त करता हूँ।
- 29:47यही मेरा लक्ष्य है। अगर तुम मेरे पास आकर भी बंध जाओ
- 29:54तो यह तुम्हारी बदनसीब ही होगी क्योंकि तुम मेरे पास बंधन के लिए
- 30:00नहीं आये, तुम मेरे पास बंधनों से मुक्त होने के लिए आये हो।
- 30:08फिर तो तुम खाई से निकले कुएं में गरे।
- 30:22तिहार बदनसीबी। जो नहीं तो और।
- 30:31क्या है के उसी के हो गए हम जो ना हो सका।
- 30:46हमारा रहा कर दिशाओं में हरदम। तुम जब चाहे मुझे सुनना बंद कर
- 30:57सकते हो, मैं कभी किसी से आग्रह नहीं करता क्या?
- 31:06क्योंकि जब तक प्यास न लगें तब तक पानी पिलाना भी एक पाप होता है।
- 31:16तुम्हें प्यास ही नहीं है, पानी तुम्हारे काम का है।
- 31:25जिन्हें पानी चाहिए, उनके लिए पानी मेरे पास है, शीतल जल है,
- 31:32उनके कंठ को ही गीला नहीं करेगा, शीतल नहीं करेगा।
- 31:35उनका रोम रोम ठंडक से भर जाएगा। लेकिन प्यास लगनी आवश्यक है।
- 31:48तुम्हे अगर किसी ने सिखाया है तो मैं तुम्हे बाधित नहीं करता।
- 31:58तुम चाहो मुझे जब त्याग सकते हो, मैंने तुम्हें जंजीरें नहीं दीं,
- 32:05मैंने तुम्हें हर कोशिश हर लम्हा तुम्हारी जंजीरों को काटने में
- 32:11व्यतीत किया है अगर फिर भी वह नहीं टूटी।
- 32:16तू खुदा हाफिज। जाने वाले तुझे खुदा हाँ जाने
- 32:38वाले। तुझे खुदा हाफ गम के मार्ग सलाम
- 32:52कह ते हैं जाने वाले। तेरा खुदा ऑफिस।
- 33:05तुम चाहो तो जा सकता हो, बिलकुल मैं नहीं कहता कि तुम्हारी
- 33:11बेड़िया हो, मैं तोड़ रहा हूँ नहीं अगर तुम्हें लगता है कि मैं
- 33:17तुम्हारे ऊपर बेड़िया हूँ क्या? तो तुम्हे बांधता कौन है पुत्र?
- 33:25तुम बड़े आराम से मुझे छोड़ सकते हो और दूसरी बात जो तुमने कही?
- 33:39ध्यान से सुनना है वस्तुओं को नहीं छोड़ना मान्यताओं को छोड़ना
- 33:48है पदार्थों को नहीं छोड़ना है ममत को छोड़ना है।
- 34:00पदार्थ अगर वहीं जहाँ पड़े हैं पड़े रहे हैं और तुम अपने को छोड़
- 34:07दो और तुम्हारी जिंदगी कृष्ण जैसी खुशहार नाचते काचते।
- 34:19तुम आनंद में झूम हो गए मुरली को ऑटो पे रख कर बजाओ पदार्थों को
- 34:27नहीं छोड़ना मुझे कल ही कोई कह रहा था कोई शेर व्यक्ति।
- 34:3640,000 करोड़ रुपये छोड़कर संयस्त हो गया।
- 34:45मैंने कहा, वैसे संयस्त की निशानी तो नहीं है क्योंकि जो संयस्त हो
- 34:52गया उसे पदार्थ बाधा क्या देगा? क्या परमात्मा पागल है अपनी ही
- 35:03बनाई हुई सृष्टि पदार्थों की और उसके कण कण में खुद विद्यमान है
- 35:11क्या वह मूर्ख है? परमात्मा की तरफ देखो, वह कैसा
- 35:22बिहेव करता है अपनी ही बनाई हुई सृष्टि के कणकण में विद्यमान
- 35:28उपनिश्चित का यह वाक्य इच्छा वास्तुमेदम सर्वम।
- 35:32यत् कींची जगत एवं जगत, फिर भी खुशी फिर भी आनंदमग्न फिर भी शांत
- 35:43है, सृष्टि के भीतर बैठा है, लेकिन पदार्थ उसे बांधता है।
- 35:52अपनी ही बनाई हुई जड़ सृष्टि के अंदर बैठा हुआ चेतन बड़ा मगन है,
- 36:01अपनी चेतनता में मगन है, उस रस धार को पी रहा।
- 36:10और तुमने कहा पुत्र 40,000 करोड़ रुपये छोड़ के क्या?
- 36:14वादा से कृष्ण राज़ को नहीं छोड़ते, राज्य के भीतर ही बैठे
- 36:27रहते हैं। जब युद्ध होता है, युद्ध में भी
- 36:32सारची बनते हैं और निधीवन में गोपिकाओं के साथ रास रह जाते हैं,
- 36:43कोई रास उन्हें बांध नहीं सकता। कोई सिंहासन, कोई मोती मणियाँ
- 36:57हीरे जौहरत, कोई खजाना उसे बांध नहीं सकता।
- 37:05वह बिल्कुल पदार्थों के भीतर आसीन है।
- 37:09और कृष्ण मुस्कुराता, मुस्कुराता, मुस्कुराता, मुरली बजाता है।
- 37:17मुरली तो तुम भी बजाते हो, लेकिन उसमें आनंद की सुगंध नहीं होती।
- 37:25उसमें शब्द होते है। शब्द जो किसी को भी उलझा दे नहीं।
- 37:34धनु। अधुवन में राधिका नाचे रे मधुवन
- 37:47में। राधिका नाचेरे गिरधर की मुरली
- 37:58आवाज गिरधर की? मुरली या बाजे रे मधुवनु में राधी
- 38:12का नाचे रे कहा। है वो मुरली की धुन की खुशबू।
- 38:25शब्दों के आगोश में बोधुन की सुगंध को खत्म कर दिया।
- 38:32मुरली तो तुम भी सुनते हो, ये धर्म खतरनाक है।
- 38:41ये धर्म नहीं है, ये विष हैं आज नहीं कल ये अपने ही विषयों को
- 38:48पीकर मर जाएं, ना खुदा ही मिला ना वसारी सनम, ना इधर के रह ना उधर
- 38:57के रह। मुरली की धुन के ऊपर नाचती हैं
- 39:07गाय भों गायें जिन्हें धुन अच्छी लगती है, शब्द अच्छे नहीं लगते।
- 39:16धुन को तो जानवर भी पकड़ लेता है, लेकिन शब्दों को जानवर नहीं पकड़
- 39:25तुम क्या शास्त्र अर्थ करे जानवर को वही पता है, लेकिन तुम जैसे
- 39:33ही। वंशरी को अपने ऑटो पे रखो मुरलिया
- 39:39की धुन गायक तो गौ में बहुत दूर से चली आती गोपरियां भूल जाती
- 39:48हैं, तवे के ऊपर उठी रखकर भूल जाती हैं सुध बुध खो देती।
- 39:58और कृष्ण की बनसलियां कुछ सुनने चली आती हैं।
- 40:02जल जाती है रोटी जल जाती है सब्जी आग लग जाती है सब्जी, लेकिन यह
- 40:10मरण लिया के रंग प्यारी बड़े। तुम रोज़ मुरली सुनते हो क्या?
- 40:19ऐसी परिस्थिति तुम्हारे हृदय पे कभी आई क्या तुम्हारे चितने कभी
- 40:27ऐसा आनंद पकड़ा नहीं तुम मुरली के ऊपर?
- 40:33शास्त्रार्थ इसका अर्थ का है बहुत से मूर्ख मैंने मुरली के शब्द
- 40:39लिखते हुए देखा है तुम सिर्फ कागजों को काला कर के विदा हो
- 40:45जाओगे, संसार से न संसार को बदल पाओगे।
- 40:53न तुम खुद को बदल पाओगे तुम जैसे आये हो उससे भी ज्यादा काले चेहरे
- 41:00लेके वापस चले जाओगे नानकते मुख, उजले केती छुट्टी नल, लेकिन तुम।
- 41:08अपने मुखो को ज्यादा काले करके चले जाओगे और मान्यताएँ थोक लोगे
- 41:13अपने ऊपर पहले ही बहुत सी मान्यताएँ तो मैं कहता हूँ
- 41:21पदार्थों को नहीं छोड़ना है। पदार्थों से ममत को छोड़ना है फिर
- 41:31कोई हरचा नहीं अगर कोई कृष्ण हीरे, मोती, जौहरात से युक्त,
- 41:41सिंहासन पर बैठ जाए। फिर कोई हरामी की बात बही,
- 41:50राष्ट्र रचाने वाला गाना चोरी करें, चोरी करके माखन खा जाए।
- 42:01लेकिन उसकी ये शरारतें भी बड़ी अच्छी लगती हैं।
- 42:07उसकी मासूमियत बड़ी अच्छी लगती है और गोपियां चाहती हैं और गोपियां
- 42:17ईशोदा से पूछती है मयंक 2 दिन से गाना नहीं आया।
- 42:28क्यों को पियो? तुम उसका इंतजार क्यों करती हो?
- 42:33बस उसकी एक झलक देखने के लिए वह आए।
- 42:40थोड़ी देर बिताए अपने दोस्तों के कंधों पर चढ़े।
- 42:46छोटे छोटे हाथों से हमारी मटकियों को खोलें और माथन चुरा के खजाए
- 42:53अपने दोस्तों को भी खिला दे, यह अदा हमें बड़ी प्यारी लगती है।
- 42:59सुद बिसरागयो? मोरी रे कर गयो मन की छोरी ओह
- 43:23काला। ओह काला इक बा सूरी वाला कर गयो
- 43:36मनी की चोरी रे। सुध विसरा गयो मो रेह हो काला इक
- 43:52भाँ। सूरीवाला तो ईशोदा मिया कहती है,
- 43:58तुम ही तो हो जो रोज़ उलाने देके जाती है।
- 44:02तुम्हारा कहीं कन्हैया ने मटकी फोड़ी ये।
- 44:07छान चली जाए जी आ नहीं जा जी आ जाए तो फिर।
- 44:21जी आ नहीं जाए ये जान चली जाए जी आ नहीं जाए।
- 44:36फिर अगर ये आता नहीं तो अभी पता नहीं।
- 44:40कुछ खोया हुआ ऐसा लगता है आँखों से नहीं चली जाती है।
- 44:53पता नहीं क्या जादू है इसकी मत वाली आँखों में यह चोरी करता भी
- 45:01अच्छा लगता है। पर शोदा कहती है फिर तुम शिकायत
- 45:08क्यों करते हो? कहते ये तो कान्हा को देखने के
- 45:16बहाने से माता है कि 2 दिन हो गए आया नहीं?
- 45:23मइया तुमने झिड़क दिया होगा तो हमें 2 दिन से दिखा नहीं तो
- 45:34शिकायत करने के बहाने से हम चली आए जी।
- 45:39आ जाए तो फिर? जी आ नहीं जाए ये जान चली जाए।
- 45:54अगर वो नहीं आए तो मुसीबत अगर वो आ जाए तो मुसीबत।
- 46:03बस ऐसा ही है वो छित चोर जब तुम्हारे भीतर बैठा है, तुम मुरली
- 46:17तो रोज़ सुनाते हो, लेकिन तुमने हर चीज़ की नकल गढ़ गयी।
- 46:24तुमने खुशबूदार फूलों को भी प्लास्टिक के फैक्टरी के भीतर बना
- 46:29लिया है पता है, नकली हैं पता है सुगंधी नकली है इतर छिड़का है,
- 46:40लेकिन फिर तुम। किसी तरह मन को जलावता दे देते
- 46:44हैं कि चलो कोई बात नहीं, ऐसे ही काम चला लेंगे।
- 46:51असली तो मिलता नहीं, आनंद तो नकली नकली से चला ले, लेकिन संत
- 46:58तुम्हें जगाता रहता है। संत तुम्हारे भीतर बिरहा की आग
- 47:04छेड़ने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ता।
- 47:16पदार्थों को मत छोड़ना, पदार्थों से महो को छोड़ देना।
- 47:28पदार्थों के ममतव को छोड़ देना और अगर तुम यह दो साध्य जो बड़ी
- 47:39मुश्किल से साधना पड़ता है में कामयाब हो गए।
- 47:46तो समझो तुमने मंजिल पाले है यही है एक फॉर्मूला पदार्थों के बीच
- 47:57में रहकर पदार्थों से ममत बना रहे।
- 48:04और ऐसे वैरागी का जन्म हो तुम्हारे वेतर कि कोई भी चीज़
- 48:12तुम्हें आनंद न दे सकें। यह ममत्व हीनता इतनी प्यारी है।
- 48:23तुमने नकल बना ली है 40,000 करोड़ को छोड़ दो कोई बात नहीं, वैसे भी
- 48:29अगले क्षण मौत आ सकती है। कौन जाने किस घड़ी वक्त का बदले
- 48:37मिजाज़ छोड़ दिया। कोई बहुत बड़ा काम नहीं किया और
- 48:48क्यों छोड़ते हो क्योंकि म मत में छोड़ना बड़ा मुश्किल है म मत में
- 48:53तुम्हारा मैं जाता है और छोड़ने में तुम्हारा मैं ज्यादा।
- 49:01बढ़ जाता है। तुम कहते हो मैं कोई ऐरा गहरा
- 49:04नत्थू खैरट मैं वो सेठ हूँ जिसने 40,000 करोड़ छोड़कर सिर मुंडवा
- 49:14लिया मैं कोई मामूली नहीं हूँ, इससे तुम्हारा मैं बढ़ गया।
- 49:21तुम्हारा अहंकार बढ़ गया। पहले से ही तुम दुखी थे, तुम्हारे
- 49:25अहंकार के बढ़ने से तुम और ज्यादा दुखी हो गए।
- 49:28तुम्हारी अपेक्षाएं बढ़ गई। ये लोग आए, मेरे चरण पकड़े, तुम
- 49:35तो बहुत बड़े त्यागी हो। नहीं, ऐसे वह शक्ति नहीं मिलता जो
- 49:48कबीर को मिला, जो नानक को मिला, जो मीरा को मिला, जो कृष्ण को
- 49:54मिला। जो बुद्ध को मिला, जो महावीर को
- 50:01मिला, ऐसे नहीं मिलता तुम कुछ भी ना छोड़ो और अकेला ममत भी छूट
- 50:15जाए। यही है तुम्हारी मदद आखिरी पड़ाव
- 50:21पर तुम पाओगे सब है, लेकिन मम्मा तो छूट गया भरा पूरा संसार भरा
- 50:35पूरा सिंहासन है। सब है, लेकिन पहले तुम्हें ऐसा
- 50:41लगता था सब है, लेकिन ऐसा लगता है जैसे मेरा कुछ भी नहीं फिर ऐसा
- 50:52होगा कि सब होगा। और तुम्हें लगेगा कि हैं तो सब
- 51:02लेकिन सब आनंददायी है सब का होना मुझे आनंद देता है।
- 51:11पहले सब का होना तुम्हें दुखी करता था।
- 51:15तुम छोड़ के चले जाते हो, ये थोड़ी गहरी बात है।
- 51:18ध्यान से समझ कोई व्यक्ति तभी छोड़ता है जब वह चीज़ उसे दुखी
- 51:27करने लग जाती है। आश्रमों में।
- 51:32संस्थाओं में डरों में तुम ऐसे ही लोग पाओगे जो घर परिवार से दुखी
- 51:41हैं। एक एक करके सबके रोग पूछ लीजिए।
- 51:47यहाँ तक के जो गुरु आपको पाठ पढ़ाते हैं उनको भी कुछ ऐसा ही
- 51:51रोग होगा अन्यथा कौन इतना फायदा बंद करता है?
- 51:59ये पागलों की कारतूस है जब खुद ने वो आनंद की।
- 52:06खुमार नहीं देखी दूसरों को क्या खाक बतलाओगे खुद नाचे नहीं उसकी
- 52:16झंकार दूसरों को क्या खाक निचाओगे ये तो बिल्कुल वही।
- 52:27जो तुम ब्याह सर्दी में नागिन का डांस करते हो, अक्टिंग होती है
- 52:34पकेली भीतर आनंदन नहीं होता। तुम कला पर ज्यादा ध्यान देते हो।
- 52:47आनुदे ज़रा भी नहीं होता, लेकिन मेरा नाचती है, एक पांव दक्षिण
- 52:56जाता है, दूसरा पांव उतर जाता है और उसे ज़रा भी पता नहीं होता है।
- 53:03मैं राजस्थान की सड़कों पर नंगे पांव दौड़ रही हूँ।
- 53:10रेतीली जमीन में नंगे पांव दौड़ रही हूँ वह घूँघट जो एक गज का हुआ
- 53:17करता था, आज उतर गया है, सिर से कोई पता नहीं चलता।
- 53:25यह मतवारी क्या है? यह उस सुगंध से आती है जो आपके ही
- 53:34भीतर बैठा है पदार्थों को छोड़ने की।
- 53:43दखावेबाजी मत करना, ममत्व को छोड़ देना और संसार में बने रहना तो
- 53:55तुम वी रहो पदार्थों को छोड़ देना।
- 54:02तो भगोड़ा बना है वो तो तुम डर गए पदार्थों के बीच में खड़े रहना और
- 54:13पदार्थों का लुत्फ उठाना यह वीरों का काम होता है।
- 54:28वीर भोग्या वसुंधरा इस वसुंधरा को वसुंधरा को, इस सृष्टि को इस धरती
- 54:37को वीरपुर से ही भोग सकता है कायर तो भाग जाते हैं कायर तो।
- 54:46हिमालय की गुफाओं में कंधाओं में छुप जाती है बकाया वीरभज्ञ भीषंदा
- 54:56इस वसुंधरा इस धरती को इस सृष्टि को सिर्फ वीरपुर से ही बोंक सकते
- 55:03हैं। मैं पाखंड का खंडन करता हूँ, इसको
- 55:10तुम निंदा शब्द दे सकते हो और मैं भगोरों को सावधान करता हूँ के
- 55:19भागना मत। भरे संसार में भरे दुःख के
- 55:25पहाड़ों की सर्कमस्टैंसेस में वीरों की भांति सितर होकर खड़े
- 55:34रहना यही वीरता है माफी की कोई भी मांग है।
- 55:43एक नहीं कर्म करते वक्त सावधानी होनी चाहिए।
- 55:49कर्म करके उसका फल ना भोगना तो कायरता।
- 55:59वीर वही जो कर्म करने से पहले अपने आपको सचेत कर लें, अवेयर कर
- 56:06लें, जगा लें और जाग कर कर्म करें।
- 56:12वह वीर है जो बेहोशी में काम करे। पह काल मैंने बहुत से कायर देखे
- 56:23है जो कतल करने से पहले ही शराब पी लेते है।
- 56:29मैं पूछता हूँ ये शराब क्यों? क्योंकि अवेयरनेस में कतल होता
- 56:35नहीं? अवेयरनेस में यह लगता है पागलपन
- 56:42चोरी भी नहीं होती, हिंसा भी नहीं होती।
- 56:46जो जाग गया वह सभी विचारों से मुक्त हो गया तो भागना मत सीखो।
- 56:59प्रयासित करना मत सीखो, कर्म करने से पहले परम जागरूक होना सीखो।
- 57:09कोई भी कर्म करो, परम जागरूकता से करो।
- 57:15अन्यथा न करो ठहर जाओ, सोचो अवेयर हो जाओ, सचेत हो जाओ फिर कर्म करो
- 57:32मैं। पाखंडों का खंडन करता हूँ, बिलाशक
- 57:38तुम इसे निंदा शब्दों से अलंकृत कर सकते हो।
- 57:44मुझे कोई परेशान है और मैं भगोड़ों को सदा भगोड़ा कहता हूँ।
- 57:52मैं वीर पुरुषों से कहता हूँ जो संसार की खुशी और गमों में बराबर
- 58:01पत्थर की शीला की तरह अडिग, अचल मान खड़ा रहे और सब कुछ स्वीकार
- 58:11कर ले। इसे कहते हैं ज़िन्दगी का साथ
- 58:19निभाना ज़िन्दगी बड़ी छोटी एक छोटी सी ज़िन्दगी में तुम बार बार
- 58:29मार खा जाते हो एक बात को ध्यान। मैं जिंदगी।
- 58:38का साथ निभाता। चला गया।
- 58:45मैं जिंदगी का साथ निभाता। चला गया।
- 58:52जो भी कुछ घटता है। तुम उसके संग हुल जो भी कुछ करता
- 59:04है अच्छा बुरा मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता।
- 59:10चला गया। हर फिक्र।
- 59:14को धुएं में उड़ाता चला गया जो मिल गया।
- 59:24उसे। को मुकद्दर समझ लिया।
- 59:30बस यही मुकद्दर में है। वह लाभ हो या हनी सर्व स्वीकार है
- 59:38अपने पूर्ण अंत। से जो मिल गया।
- 59:45उसी। को मुख्तार समझ लिया।
- 59:50मुकद्दर समझ लिया जो। खो गया मैं।
- 59:56उसको बुलाता चला गया। जो खो गया उसको भूल गया क्योंकि
- 1:00:05जो व्यक्ति अंत में तुम जाओगे। तुम जाओगे तुम देखोगे तुमने
- 1:00:15जिंदगी में न कुछ कमाया, न कुछ कमाया मैं अभी तो कहता हूँ तुमने
- 1:00:23बनाया कुछ नहीं। लेकिन तुम अंत में जाके पाओगे कि
- 1:00:27तुमने कमाया भी कुछ नहीं जो कमाया था वहीं छोड़कर आ गए।
- 1:00:34संसार में ना कोई कुछ कमा सकता है।
- 1:00:42एक दौड़ है अंधी। इसको चाहो तो लगा सकते हो चाहो तो
- 1:00:49रुक सकते हो, रुक जाओगे, ठहर जाओगे तो आनंद की धरोहर मिलेंगे,
- 1:00:57दौड़ते रहोगे तो दुख की धरोहर मिलेंगे।
- 1:01:06तुम्हारे हाथ में कर्म है, तुम दुखी होना चाहते हो तो थोड़ा तुम
- 1:01:13सुखी होना चाहते हो तो रुको। और तुम कहाँ पहुँच जाओगे?
- 1:01:26ये आपकी आखिरी मंजूर है जो अब मैं बोल रहा हूँ मेरे आखिरी शब्द में।
- 1:01:32गम और खुशी में फर्क। न महसूस हो जहाँ।
- 1:01:42आगम और खुशी में फर्क न महसूस हो। जहाँ मैं दिल को उसम काम।
- 1:01:52पेला सा चला गया। मैं दिल को उस मुकाम पे।
- 1:01:59आता चला। गया।
- 1:02:02धीरे धीरे ठहर जाओ, तुम पाओगे तुम अपने ही भीतर उतरने लगे और 1 दिन
- 1:02:09उस मुकाम पे पहुँच जाओगे जहाँ हर्ष और शोक बराबर हो जाता है।
- 1:02:16गम और खुशी में फर्क न महसूस हो जाऊं कुछ नहीं महसूस हो जाऊं मैं
- 1:02:29दिल को उस मुकाम। पे लाथा चला गया।
- 1:02:36हर फिक्र को। धुएं में उड़ाता।
- 1:02:40चला गया मैं जिंदगी का। साथ निभाता चला गया।
- 1:02:48जिंदगी का साथ निभाता चला गया। जो कुछ ज़िन्दगी में हैपन हो रहा
- 1:02:55है बट वॉटेवर इज़ गोइंग ऑन हैपनिंग तुम उसके संग संग हो लो
- 1:03:07ज़िन्दगी तुम्हें दुख दिखाती है। तुम उसको स्वीकार करो, ठीक है,
- 1:03:15यही मेरा नसीब था चंद की तुम्हें खुशहाली के दिन दिखाती है को ठीक
- 1:03:24है, ज्यादा जश्न मत बनाओ। क्योंकि तुम अभी अनजान हो,
- 1:03:35तुम्हें पता नहीं तुम्हें कोई खुशी नहीं होती, तुम्हें कोई
- 1:03:42गर्मी नहीं होती। आखिर में तुमने इस मुकाम पर
- 1:03:48पहुंचना है जहाँ गम और खुशी बराबर हो जाती है।
- 1:03:54भेद खत्म हो जाते हैं, अद्वैत आ जाता है, भेद बुद्धि समाप्त हो
- 1:03:59जाती है तुम चर्म उत्कर्ष आनंद के चर्म उत्कर्ष में।
- 1:04:05छलांगें लगाते हो अठखेलियां, करते हो नहीं तुम्हारा लक्ष्य धन्यवाद
- 1:04:14सर।