Latest / Baba ji Vijay Vats / 19 Jun 25 - ENLIGHTENED होने के लिए स्त्रियों के लिए खास प्रवचन! दीक्षा और आनंद का गूढ़ विज्ञान!
Transcript
- 0:01बहुत से प्रश्न हैं। स्त्रियों की तरफ से भी पुरुषों
- 0:11की तरफ से भी स्त्रियों ने चिंता ज़ाहिर की।
- 0:18पुरुषों ने ग्रेट डिस्कोर्स कहा। एक प्रवचन से सब कुछ समझ में नहीं
- 0:26आता। पूरन कैन्शियसनेस का मतलब है
- 0:34तुम्हारे वायु पर मौसम का पूर्ण हो जाना, यह लैंगिक हिसाब से
- 0:42व्याख्या है। डेफिनिशन अगर लैंग के हिसाब से की
- 0:53जाए तो वह क्रोमोसोम की परिपूर्णताः एनलाइटनमेंट।
- 1:02कॉन्सेस्नेस का पूरा होना लेकिन प्रश्न भी है रचना कुमारी करीब
- 1:14सैकड़ों प्रश्न है, आज के प्रश्न ने बाबा हमें ये ला दिया।
- 1:22हमें क्या करना चाहिए? अपनी चेतना के उत्थान के लिए याद
- 1:32रहे मैं जैन धर्म के श्वेतंबर और दिगंबर सम्प्रदाय के बारे में बोल
- 1:39रहा था। आत्मा का परमात्मा का कोई लिंग
- 1:59नहीं है, न वो पुरुष है न वो इश्तेहार।
- 2:08यह व्यवस्था पुरुषों के लिए है क्योंकि उनके भीतर वाय प्रमासोम
- 2:15हैं। वाय प्रमासोम को बढ़ाएं, कैसे
- 2:20बढ़ाएं ये भी बताऊँगा। कैन्सेस्नेस को कैसे पढ़ाएं और
- 2:29अगर मैंने कहा किसी दिन साइंस इतनी विकसित हो गई कि क्रोमोसोम
- 2:35के भीतर न्यूक्लियस के भीतर पढ़ी हुई कैन्सेस्नेस की मात्रा को वो
- 2:43जान सकें। तो साइंस परम विकास की अवस्था को
- 2:48छू लेगी, जिनके भीतर बाहे क्रोमोसोम में नहीं है।
- 2:54क्या स्त्रियाँ नहीं पहुँच सकतीं? देखिए मैं बता रहा था आपको दी
- 2:59गंबर व्यवस्था। श्वेतांबर व्यवस्था कहती है, के
- 3:06पहुँच सकती है स्त्री लेकिन श्वेतांबर व्यवस्था भी मैं समझता
- 3:11हूँ कि इतनी पारदर्शी नहीं क्योंकि वो भी कहती है कि 24 में
- 3:17से एक स्त्री पहुंची मलीवा है। यही झगड़ा है श्वेताम्बर और
- 3:27दिगंबर मिश्र मरलीबाई और मरलीनाथ। लेकिन ये झगड़ा वैसे ही है जैसे
- 3:36शिया सुन्नी मुसलमानों में। ईसाईयत में भी है कैथोलिक ये सभी
- 3:51तंप्रदाओं में अलग अलग व्यवस्था अपने मतानुसार कर देते हैं।
- 4:00लेकिन मूलभूत जो व्यक्ति है वह कोई किसी तरह का वेद नहीं करता।
- 4:09अब समझ रहे बात को स्त्री पूछती है कि हम क्या करें?
- 4:19पहली बात तो जो कृष्ण ने किया कृष्ण अपनी चेतना को बांटने के
- 4:28लिए, क्योंकि कॉन्शसनेस का समुद्र हो गए हैं, विराट हो गए।
- 4:37ज्यादा से ज्यादा स्त्रियों को अपने सांनिध्य में रखते हैं।
- 4:43तुम सांनिध्य में रख नहीं सकते क्योंकि तुम्हारे सांनिध्य में
- 4:48अगर स्त्रियों आएंगी तो फिर गुफाओं का निर्माण होगा।
- 4:57इसलिए मैंने इस व्यवस्था को बिलकुल नकार दिया।
- 5:02यहाँ बैठने की कोई व्यवस्था नहीं। मैं पूरे आपकी आध्यात्मिकता का
- 5:10विकास करने के साधन जुटाता हूँ। पर मैं जानता हूँ इसका विकास कैसे
- 5:17होगा। मेरी प्रक्रिया है आप जीस भी तल
- 5:23पर हो जीस भी तल पर हो मूलाधार से ऊपर मैं उसी तल से आपको उठाऊंगा।
- 5:34और तुम्हें तुम्हारे उस सफी और पे ले जाऊंगा जहाँ से भी शुद्धि चक्र
- 5:43शुरू होता है वहाँ से तुम प्रायः नहीं करोगे।
- 5:52अगर तुमने बहुत बुरे कर्म करने शुरू कर दिए तो तुम घर जाओगे,
- 5:59प्रायः तुम नहीं करोगे। 1000 में से 999 केस नहीं करेंगे,
- 6:08एक केस गिरेगा जो बिल्कुल ही हिटलर हो गया है।
- 6:12बहगरे तो पहली व्यवस्था तो ये थी क्योंकि कृष्ण अब नहीं आएँगे।
- 6:26कृष्ण की जो फिलोसोफी थी, कृष्ण का जो मार्ग था।
- 6:32बहुत था कैसे इनको वायक रोमोसोम के सांनिध्य में ही दिया जाए,
- 6:37क्योंकि कृष्ण पूर्ण चेतना है और वायक रोमोसोम के जरिए इन्हें
- 6:43ब्रॉडकास्ट किया जा सकता है कि यह बिलकुल साइंटिफिक भाषा बोल रहा
- 6:46हूँ। मैं यद्यपि सरल करके।
- 6:51ताकि आपको समझा जाए वाय क्रोमोसोम उनका पूर्ण हो गया कान्शस्नस लेवल
- 6:58उनका 100% हो गया। अब वह बांटना चाहती हैं क्योंकि
- 7:02निरंतर कान्शस्नस झर रही है, झर क्या रही है?
- 7:07सारी कान्शस्नस वही हो गया है। अखंड हो गया है, परिपूर्ण हो गया
- 7:15है। अब वो कितना भी बांटे
- 7:21पूर्णत्यपूर्ण मादा ये पूर्ण विवाह शिष्य थे।
- 7:26पूर्ण में से पूर्ण को भी निकाल लिया जाए तो पूर्ण ही बचता है।
- 7:30उपनिषद का यह वाक्य तुम्हारे ऋषि समझा नहीं पाए, जैसे कृष्ण में से
- 7:38कृष्ण को निकाल लो, सारी चेतना को निकाल लो, निकाल नहीं सकोगे।
- 7:44मुझे पता है। जितनी चेतना निकालोगे उतनी ही
- 7:49चेतना फिर भर जाएगी वो की समुद्र है, पीछे से समुद्र आ रहा है, भर
- 7:54रहा है वह खाई होने नहीं देता खाई में से तुमने ज़रा सा निकाला एक
- 8:02बाल्टी भर के। और नहीं पीछे से आ गया।
- 8:07उसने फिर खाई भर दी। कृष्ण का फॉर्मूला थोड़ा अलग है।
- 8:15आज के कृष्णों का फॉर्मूला तो एक पाखंड और चला हुआ है।
- 8:23जैसे ये गुफाओं का खेल चलता है। रचना कुमारी कहती हैं कि आपके
- 8:38प्रवचन ने हमें हिला दिया क्योंकि तुमने मुझे बुद्धि से सुना होगा।
- 8:45बबीता कहती हैं कि बाबा जी सवाल है, पुरुष कोई भी हो या बुद्ध ही
- 8:50हो, इसका जवाब दे दीजिए और भी बहुत से प्रश्न हैं लेकिन इनका
- 8:58मतलब एक ही है। सूक्ष्म मन से समझना होगा।
- 9:05मैंने कल कहा कि माँ को पुत्र से प्रेम होता है, खिंचाओ पिता को
- 9:13पुत्री से होता है, कारण क्या है तुम्हें पता ही नहीं लोहे को पता
- 9:18नहीं मैं चुम्ब की तरफ क्यों खींचा जा रहा हूँ?
- 9:24चुम्ब को भी पता नहीं कि लोहा मेरी तरफ क्यों खींच रहा है?
- 9:29इस तरह बाग को पता नहीं कि मैं पुत्री की तरफ ज्यादा अट्रैक्ट
- 9:34क्यों हूँ? ये सब क्रोमास्वामी नर व्यवस्था
- 9:38है, तुम्हें पता भी है? पिता अपने बाह्य क्रोमोसोम के
- 9:47किरणों को चेतना को पुत्री को बांटना चाहता है।
- 9:52उसे गले लगा लेता है। बात शल्यवास।
- 10:01हमारे गुरु तो तुम्हें गले लगाएंगे, गोफाओं में ले जाएंगे
- 10:08ऐसी कहानियों चल पड़ी है घोर कलयुग आ गया है।
- 10:14एक वो और स्वामी थे। अब मुझे नाम नहीं याद आ रहा है।
- 10:19वो भी ऐसा ही कुछ करते थे। ये आज जो जेलों में बंद हैं, इनको
- 10:25जेलों में बंद करने वाले कोई मूर्ख या पागल नहीं हैं।
- 10:29बड़ी की न्यायिक व्यवस्था में उन्होंने इन्हें दंडित किया है।
- 10:34अगर ज़रा भी निरपराध होते तो फिर। उन जजेस का कोई निजी दुश्मनी नहीं
- 10:42था। इनके साथ ये किसी कारण से बंद है।
- 10:47इन्होंने अपने काम को नहीं जीता। कैसे जीत पाएंगे?
- 10:52ये विकास कैसे अपनी चिंता को परिपूर्ण करेंगे?
- 10:58चेतना के परिपूर्ण होने का मज़ा काम के मज़े से करोड़ों गुना कम
- 11:05काम का मज़ा करोड़ों गुना कम है। मुझे किसी ने पूछा बाबा?
- 11:15संभोग का आनंद और संभोधि का आनंद इसमें गुणात्मक फर्क कर सकोगे।
- 11:21क्वांटिटेटिव फर्क कर सकोगे। गुण का फर्क तो है, लेकिन
- 11:29क्वांटिटेटिव फर्क कर सकोगे। मात्रात्मक फर्क कर सकोगे।
- 11:32मैंने कहा। लेकिन पूर्ण रूप से जैसे अरबों
- 11:39खरबों जैसे अरबों खरबों स्त्रियाँ पुरुषों एक पुरुष के साथ संभोग
- 11:48कर। तो जो आनंद होगा वो उसको इकट्ठा
- 11:58कर दो फिर भी वो कम पड़ेगा। कहि तुलसी ने बात कही है।
- 12:17तात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरीय तुला एक अंग तुल न ताही।
- 12:28शक्ल मिली जो सुख लव सत संग। सत्य के संग में अब गुणात्मक मैं
- 12:37आपसे क्या कहूं संख्यात्मक मैं आपसे क्या कहूं?
- 12:44क्योंकि फर्क ही क्वालिटेटिव है। क्वांटिटेटिव नहीं है, लेकिन
- 12:56समझाने में अगर मैं समझाऊं तो करोड़ों अरबों बार का संयोग एक
- 13:06बार में ही आप कर लो। तो उसको आप ये गढ़ सकते हो कि
- 13:11समाधि के आनंद के बराबर तो फिर भी नहीं होगा।
- 13:14तुलनता ही शक्ल मिली जो सुख लव इस बात से आप समझ ले लो तो फर्क तो
- 13:24नहीं समझा सकूंगा मैं। क्वांटिटेटिव ढंग से संख्यात्मक
- 13:28ढंग से नहीं समझा सकूंगा क्योंकि फर्क है गुणात्मक संख्यात्मक फर्क
- 13:35ही नहीं है। गुणार का कोई फर्क नहीं है, गुणों
- 13:39का फर्क है इसमें आनंद कुछ ऐसा है जो आपने आज तक पिया नहीं।
- 13:46और सुख कुछ ऐसा है जो आप सदा से पीते रहे हम क्रोमोसोमिनल
- 13:57व्यवस्था पे आ जाये। पूछा है कि पुरुष ही चाहे कोई भी
- 14:04हो। चाहे पति हो, चाहे गुरु हो।
- 14:14जहाँ तक गुरु का समन्वय गुरु शिष्य से शारीरिक संबंध नहीं
- 14:23बनाएगा। क्यों?
- 14:27उसको आवश्यकता नहीं है? उसने इतना बड़ा आनंद पा लिया है
- 14:34तुम्हारे शुद्र आनन्दों में वह उलझेगा के ये भी एक लक्षण है।
- 14:42सर कृष्ण कहाँ उलझें, कहाँ उलझें, कृष्ण कहाँ उलझें, अगर तुम जैविक
- 14:55के हिसाब से भी समझोगे। तो 16,000 राणियों के साथ 16,108
- 15:03राणियों के साथ एक व्यक्ति किसी के मत पर भी इकट्ठा नहीं रह सकता।
- 15:11यह एक सिम्बोलिकरी प्रेजेंटेशन है।
- 15:18सिम्बोलिक रेफ्रिजेंटेशन अगर बिल्कुल ही सत्य सुनना चाहते हो
- 15:26तो भक्तजन अपने कान को बंद कर लो। भक्तजन अपने कान को बंद कर।
- 15:36कृष्ण ने सिर्फ आठ रानियों से बच्चे पैदा किया कृष्ण ने सिर्फ
- 15:46आठ रानियों से बच्चे पैदा किया 16,100 रानियों राजकुमारियों जब
- 15:56वो बंदीगृह से छुड़ा के लेके आया था।
- 16:00वह ऑलरेडी प्रगणन थी और कृष्ण उनके पास धमके भी नहीं।
- 16:11दूर बैठे उनके रहने, खाने पीने, नहाने धोने की व्यवस्था करते रहे।
- 16:18अपनी शारीरिक पूर्ति का इंतजाम बखुद करती रही।
- 16:21ये हैं सत्य इसलिए मैंने कहा था भक्तजन कान मुंज लो, हौ इट इस
- 16:30वर्शिपर तुम ज़रा सोच। एक पुरुष अपने जीवन में ज्यादा से
- 16:37ज्यादा संभोग अगर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सोचो तो 4000 पर पड़
- 16:43सकता है और रानियों कितनी हैं? 16,108?
- 16:55और बच्चे कितने हैं? 1010 1,61,000 बच्चे हो गए एक
- 17:07बच्चे के लिए एक संभोग तो चलेगा नहीं?
- 17:09कम से कम इतना संभोग व्यक्ति कर नहीं सकते।
- 17:151,61,080 बार संभव नहीं कर सकता, पुरुष नहीं कर सकता ढंग से सोचो
- 17:27के तो सम जिस्सा भाई यह क्या है? यह गड़बड़ मसाला है।
- 17:35मैं नहीं उभरना चाहता था, लेकिन अगर आप बहुत गहराई में लेके जाओगे
- 17:42तो सत्य बोलने से कोई बुरे भी नहीं होगी, क्योंकि यह आचरण का
- 17:46व्यवस्थाएँ हैं, चरित्र का व्यवस्थाएँ हैं।
- 17:49तुम सफेद साड़ी डाल लो। क्या फर्क पड़ता है तुम गेरुआ
- 17:55वस्त्र पहन लो क्या फर्क पड़ता है अगर तुम्हारा आइसन को समझती है
- 18:02बात ऐसे धोखेबाज, सबका ही मिलेगा तुम्हें।
- 18:09संसार में भी मिलेंगे। केंद्रों पर आध्यात्मिक केंद्रों
- 18:12पर भी मिलेंगे। और इन शैतानों ने अपनी समूह भी
- 18:22बना लिए, जिन्हें नाम दिया गया आध्यात्मिक केन्द्रों को।
- 18:28खैर, मैं ज्यादा नहीं बोलेंगे, इसको मैं तुम्हारे प्रश्न का जवाब
- 18:32देने में ज्यादा खुशी रखता हूँ। कृष्ण सभी बच्चों के पिता नहीं
- 18:42थे। सही पूछो तो उनके सिर्फ 80 बच्चे
- 18:47थे 81 चारुमती। एक बेटी और 80 बट ये उनकी खुद की
- 18:53संतान थी। बाकी सभी बच्चे उन राजकुमारियों
- 19:02के थे। उन्होंने कहाँ से पैदा किया ये वो
- 19:05जानती हैं। ये सब चीजें भीतर जाके खा ली जा
- 19:10सकती हैं। जब तुम अब चेतन अचेतन कॉन्शस में
- 19:14कलेक्टिव अनकॉन्शस में जाओगे तो तुम्हें पता चल जाएगा।
- 19:20ये कहाँ से आएगा? जैसे डीएनए बता देता है कि ये
- 19:24इसके बच्चे हैं या नहीं। तो ये जो बच्चे थे ये यदुवंशी
- 19:30नहीं थे, कृष्ण के नहीं थे, कृष्ण के एक्यासी बच्चे थे जैसे राम के
- 19:38दूत लव और कुश संख्या गिनी जा सकती है।
- 19:48अब मैं कल के प्रवचन तुमने आज कमेंट किया, मैंने कल ही जब बोला
- 19:55तो मुझे कुछ संदेह था क्योंकि सुनने वाली बुद्धि से सुनते हैं,
- 20:01हृदय से सुनते हैं, अस्तित्व से सुना जाता है।
- 20:07तुम हृदय से सुन सकते हो, लेकिन हृदय से सुनते नहीं।
- 20:12बहुत से मेरे लिसनर हैं, जो हृदय से सुनते हैं, उन्होंने कोई कमेंट
- 20:19नहीं किया होगा मेरे हिसाब से लेकिन जब मैं।
- 20:24कलेक्टिव अनकॉन्शस में जाता हूँ तो मैं पाता हूँ कि दुखित मन हैं
- 20:33इस शिशु पंज में, लेकिन ये शिशु पंज में क्योंकि तुमने जहाँ
- 20:38पहुंचना है, आत्मा का कोई लैंगिक अस्तित्व नहीं होता, ना आत्मा
- 20:43स्त्री होती है। न आत्मा पुरुष होता है तुम
- 20:48परमात्मा को माँ भी कह सकते हो। परमात्मा को पिता भी कह सकते हो
- 20:52परमात्मा को मित्र भी कह सकते हो बंधु सखा भी कह सकते हो तुम नहीं
- 21:06जाना है वाणी। जहाँ तुम्हारा ठोर ठिकाना है और
- 21:14वो खुशी का सागर है, आनंद का समुद्र है वो वो न स्त्री है
- 21:26नपुष। न मीर, ना फ़िल्म मैं बात कर रहा
- 21:32था एक रास्ते की और तुम भटक गए रास्ते की बात कर रहा था
- 21:41श्वेताम्बर क्या कहते हैं पिता दिगम्बर क्या कहते हैं?
- 21:48मैं तुमसे कहता हूँ कि महावीर क्या करे?
- 21:52दिगम्बर श्वेताम्बर तो आगे उनके प्रारूप आ गए।
- 21:55शिष्य तो सदा ही विकृत करते हैं धर्म को, क्योंकि शिष्य पहुंचा
- 22:01नहीं होता उस तरफ। गुरु करता है असली बात शुद्ध
- 22:08प्योर शिष्यवाद को बिगाड़ लेंगे पक्का है इसलिए मैं तुम्हें कहता
- 22:13हूँ ग्रंथ मत पढ़ना क्यों? क्योंकि बिगाड़ लिया क्या?
- 22:24गीता शिष्यों ने लिखी बिगाड़ ली वेद पुराण, उपनिषद सब शिष्यों ने
- 22:29लिखे बिगाड़ ली। गुरु तक बात सही थी।
- 22:34ऑथेंटिक। उसके बाद इमिटेशन आ गई।
- 22:37मिलावट हो गई। अब सुनिए तुमने पूछा पुरुष बुद्ध
- 22:50पुरुष हो या पति हो? शेख फरीद रहे बहुत तब किया।
- 23:08उस पॉइंट पे पहुँच गए जहाँ वो दो कहेंगे वह हो जाएगा यहाँ रुक जाए
- 23:17थोड़ा सा यह सिद्धि मिलती कैसी है सत्य बोलने से?
- 23:25मैं क्यों कहता हूँ राजनीति का नाम मतलब?
- 23:28क्योंकि तुम उस से जंक्चर पॉइंट पे पहुँच नहीं सकोगे राजनीति के
- 23:32झूठ बोलते हैं राजनीति के झूठे लोग हैं वो कहेंगे अच्छे दिन
- 23:37आएँगे, ले आएँगे बुरे जाने जो भी वायदा करेंगे वो करेंगे अपने
- 23:44राजनीतिक अस्तित्व के हिसाब से तुम्हारी पर ले नहीं पड़ेगा इसलिए
- 23:50मैं तुमसे कहता हूँ। सभी संतो ने पहला शब्द रखा सत्य
- 23:55और पतंजलि थे, कृष्ण थे, राम थे। बुद्धति मनवीर झूठ बोलोगे तो तुम
- 24:10प्रथम पड़ाव पे ही गलत होगे। जब तुम जो बोलोगे, सत्य बोलोगे या
- 24:20मोहन हो जाओगे। मौन होना सर्वश्रेष्ठ प्रणाली है
- 24:26अपने अंतःस में उतरने की पर मौन हो जाना मौन होने से शुरू करो,
- 24:33बोलो ही मत और अगर बोलना पड़े तो सत्य बोलो यहाँ से शुरू।
- 24:43सत्य बोलते बोलते झूठ तुम्हें भटकाता है, झूठ बोल दिया तो फिर
- 24:51उस झूठ को बचाने के लिए 1000 झूठ और बोलोगे और फिर तुम्हारा
- 24:57अस्तित्व ही 1 दिन झूठा हो जाएगा। फिर तुम और तरफ भटक गए।
- 25:04तुम अपने अंतर से नहीं उतर सकोगे। इसलिए सत्य पहला स्तिर है सत्य से
- 25:12शुरू करो तुम जो बोलोगे एक बड़ाव ऐसा आएगा जो बोलोगे वही हो जाएगा
- 25:19शेख फरीद ने। बहुत तप किया।
- 25:24उस पड़ाव पे पहुँच गए, सीढ़ियाँ शोर मचा रही थी, उसके ध्यान में
- 25:30बाधा पढ़ रही थी। जब तुम्हारे ध्यान में बाधा पड़ती
- 25:33है, तो समझो तुम अभी पहुंचे नहीं। उस स्तर पर जब तुम उस स्तर पर
- 25:39पहुँच गए। तो बाहर ढोल भी खड़कते रहे तुम
- 25:41क्या? क्योंकि उस सर पर इतनी मस्ती है?
- 25:49बाहर का शोर शराबा उस मस्ती को तोड़ नहीं सकता, वह मस्ती प्रबल
- 25:54है तुम्हारी शोर शराबे कितनी हो? चाहे एटोमिक विस्फोट हो जाए,
- 26:00तुम्हें नहीं फर्क पड़ेगा, उससे तुम जल सकते हो, तुम्हारा शरीर जल
- 26:08सकता है, लेकिन तुम्हें पता नहीं चलेगा, तुम्हारी मस्ती नहीं जल
- 26:13सकती नैनम छिद्दंती शस्त्राणी। यह मस्ती के बारे में बात की है
- 26:19भगवान कृष्ण ने नैनम दाहती पाबका न चैनम के लिए धन त्यापना शोसिया
- 26:25ये बात मस्ती के बारे में किया आनंद के बारे में किया।
- 26:29वह ना जलता है, ना कटता है, ना सूखता है, ना भीगता है।
- 26:39तुमने जाना है उस तत्वों के पास और ओढ़ ना तुमने स्त्री का ओढ़ा
- 26:45के ओढ़ ना तुमने आदमी का ओढ़ा इससे कोई फर्क ही नहीं पड़ता।
- 26:54तो मैंने कौन सा रास्ता पूछा? मैंने यही रास्ता पूछा स्त्री और
- 27:00पुरुष के दोनों से पार में जाओ स्त्री अगर अपने ढंग से चलेगी
- 27:09जैसे मैंने कल कहा बीके नहीं पहुँच सकेगी क्यों?
- 27:13क्योंकि यह स्त्री मान के द्वारा चलेगी।
- 27:17अब समझना बात को और फर्क समझा जाएगा।
- 27:22यह संस्था चलेगी मान के द्वारा मन को शुद्ध आचरण से कहो, मन को
- 27:28कॉन्सेंट्रेट करो। इसको विस्तार दो शुभ त्रंगों को
- 27:34फैलाओ मानो तुम्हारा संसार शुभ हो जायेगा।
- 27:37बिलकुल ठीक है लेकिन शुभ होने से क्या सत्य भी हो जायेगा?
- 27:43हम्म शुभ सदा ही सत्य होता है ये तुमको किसने का?
- 27:52शुभ हो जाएगा, चरित्रवान हो जाएगा।
- 27:54तुम सत्यवादी हो जाओगे, तुम दानी हो जाओगे, तुम कुछ जोड़ोगे नहीं,
- 28:00परिग्रह नहीं करोगे, सत्य करोगे, हिंसा नहीं करोगे, सब ठीक है,
- 28:05लेकिन क्या तुम उससे एनराइटन हो जाओगे?
- 28:07क्या तुम उसे अपना आपा पालोगे? खोया तो तुमने अपना उपाय नकाओ
- 28:15बदलने से या कपड़े बदलने से? क्या तुम अपना आपा वासकोगे तो फिर
- 28:21तो आत्मा मरती है और कृष्ण भगवान कहते हैं वासन से यह ऋणनीयता
- 28:27विहाय। नवानी गणनाती नरो प्राणी तथा श्री
- 28:32रानी विहाय जीर्णान्यानी सयाती नवानी देही देही प्राणी वस्त्रों
- 28:40को छोड़कर नए वस्त्र ऋण कर लेता है।
- 28:43ऐसे ही शरीर बदलता है घर की तरह। वहाँ जाकर पुरुष और स्त्री मिट
- 28:56जाती है। बेदनिकेता में स्त्री भी मिटती है
- 29:01वहाँ जाकर वजूद मिटता है, वहाँ नकल का वजूद, इल्यूजन का वजूद और
- 29:08एलीजन न तो स्त्री होती है, न पुरुष होता है।
- 29:13ब्रह्मा न पुरुष होता है, न ही स्त्री होती है।
- 29:17इल्यूजन इस नाट्यमेर न फीमेल इल्यूजन इल्यूजन है।
- 29:27भ्रम तोड़ना है, स्त्री पुरुष होने का भ्रम नहीं तोड़ना है।
- 29:32इसको ठीक से समझ लेना बात को तो ये बीके वाली क्या करेंगी?
- 29:39ये सिर्फ चरित्र निर्माण करेंगी, इसलिए चरित्र को इन्होंने मूलतत्व
- 29:46मानो। ये गीता का श्लोक भी बोलेंगे तो
- 29:50इस चरित्र के हिसाब से ही डालेंगे और चरित्र भी ढल जाए तो कुछ नहीं
- 29:55होता। तुम कितने ही साधु बन जाओ, लेकिन
- 30:02संत न हो सकोगे साधु और संत तो बहुत लॉट ऑफ डिफरेंस विक्रांत।
- 30:09साधु चरित्रवान है, संत आत्मवान है, इस शब्द को फिर समझ लो साधु
- 30:20चरित्रवान है, संत आत्मवान। साधु कहता, मैंने झूठ नहीं बोला,
- 30:29मैंने जोड़ी नहीं की, मैंने जोड़ा नहीं।
- 30:32मैंने किसी को दुख नहीं दिया, उसका मैच लगता है।
- 30:36इसमें संत कहता है मुझे नहीं पता दुख दिया होगा, हुआ होगा उसने
- 30:45कराया जो कुछ कराया। संत एक चीज़ जानता हूँ कि मैं हूँ
- 30:50ही नहीं मैं करूँगा क्या ख्वाब एक ही है, वो ही धरे धरे में समाया
- 30:57हुआ है, वो ही करता है वो ही सबको निचाता है, वो ही करवाता है फिर
- 31:03मेरी भ्रम औकात क्या? संत और साधु में इतना फट तो साधु
- 31:14हो जाएगी ये बीके लेकिन साधु होने से सिर्फ वस्त्र बदला जाता है।
- 31:20श्वेत वस्त्रधारी हो जाएगा। वस्त्र बदलने से वस्त्र तो आत्मा
- 31:25बदलती है तो वस्त्र बदलने से क्या संत संत हो जाती है?
- 31:37जब आत्मा वस्त्र बदलती है एक वर्ष से दूसरी सीढ़ी में तुम चले जाते
- 31:41हो तो क्या तुम साधू संत हो जाते हो नहीं होते?
- 31:46शंक तो होने के लिए तो आपका खोना पड़ता।
- 31:51है। मोयाबाज ना मिलदा सजन।
- 32:00वे। या बाज?
- 32:07न मिल दा सजन वे होश मालिक द। किसके मरने से मिलता है वो
- 32:30तुम्हारे के मरण से, तुम्हारे भ्रम के मरण से तुम अगर दुखी हो।
- 32:37बुध कोण हो? पुरुष कौन हो?
- 32:41पति हो या बुध हो? खैर, हम कहानी को आगे बढ़ाये।
- 32:50फरीद ने देखा, चिड़िया मर जाओ, तुम शोर मचा रहे हो, ख लल पड़ता
- 32:55है। मेरी इबादत में खलल पड़ता है।
- 33:01मर जाओ जी मर गए एक ऐसा आता है मुकाम जहाँ यू कैन डू एनीथिंग यू
- 33:11वांट जो भी तुम चाहते हो वो जाता है।
- 33:19ऐसा ही हुआ। विवेकानंद उस स्थल पर पहुंचे और
- 33:23उन्होंने पाया कि मैं आज अब कुछ भी कर सकता हूँ तो उन्होंने उस
- 33:31मूर्ख से। सब मूर्तियों को फेकवाना चाहकू
- 33:35है, लेकिन रामकृष्णा अड़े आ गए। राम किशन कहते हैं ना यह प्रकृति
- 33:41के विधान में एक बाधा है। ये काम तुमने गलत किया है।
- 33:48हैलो मैं तुमसे तुम्हारी वहस्थिति छीनता हूँ।
- 33:54और उन्होंने स्थिति छीन ली। अंतिम दम तक 39 वर्ष तक जब तक वो
- 34:01मरे नहीं तरसते रहे, वो विवेकानंद के मुझे उसकी झलक फिर मिल जाए
- 34:09मिली। लेकिन 3 दिन पहले मिली।
- 34:14और 3 दिन पहले बेलूर मठ में उनको पता चल गया कि अब क्योंकि मेरी
- 34:19क्षमता वापस आ गई, मैं शांत हो गया तो अब मैं 3 दिन बाद मर
- 34:25जाऊंगा और 3 दिन बाद उसका ब्रेन है मरीज हो गया।
- 34:31सुबह योग किया। उन्होंने प्राणायाम किया, सब किया
- 34:34पूरा किया, प्राण छोड़ दिया, मैं आ गया फरीद में शेख फरीद में चलो
- 34:51घर चलते हैं। माँ से कहेंगे मैंने ये पाया
- 34:58अहंकार, श्रेय लेना चाहता है निर, अहंकारी व्यक्ति श्रेय नहीं लेना
- 35:04चाहता अहंकार व्यक्ति इकट्ठा कर लेना चाहते हैं वो श्रेय भी हो,
- 35:10धन भी हो। गति भी हो, कुछ भी हो इकट्ठा
- 35:14करेगा वो और पतंजलि कहते हैं इकट्ठा मत करो, अब प्रिग्रह लेकिन
- 35:21मूर्ख व्यक्ति इकट्ठा करेगा उसे पता है मेरे संग जाएगा नहीं, फिर
- 35:26भी इकट्ठा करेगा। तो अभी मूर्खता अभी पूर्ण हुआ
- 35:31नहीं था। फ्री बाद में कहीं जाकर पूर्ण
- 35:34होगी तो चलो घर चलते हैं। माता को बताएंगे, खुशी होगी।
- 35:42रास्ते में प्यास लगी, घर अभी दूर था।
- 35:51साधन नहीं हुआ करते थे। यातायात के पैदल ही चलना पड़ रहा
- 35:56था। धूप घनी थी, प्यास लगी कुंए पे
- 36:00खड़ी हुई एक स्त्री को पाया मेरी इस कहानी को ढंग से सुन लेना।
- 36:09पूरे आनंद से कॉन्सेंट्रेट होकर वो स्त्री कुएं से पानी भर रही थी
- 36:22और बाल्टी से पानी भरती और अपनी मटकी में डाल लेती।
- 36:28दो मटकिया लेके आई थी रिवाज था जब जाना ही है तो दो मटकिया लेके जाओ
- 36:35दोनों मटकिया इकट्ठी भर लो ऊपर नीचे रख लो उनको रोज़ का ही
- 36:39अभ्यास था ये उद्र से प्यासे प्यास लगी।
- 36:46शरीर है प्यासा तो हो गई तो शीख फरीद ने कहा, देवी हम प्यासे हैं
- 36:53पानी पिलाते उस स्त्री को बात सुन तो गई लेकिन वह अपने काम करने में
- 37:05मस्त रहे। उसने सोचा पहले मटकी भर लूँ, फिर
- 37:12आजदंतु को पानी पीला दूंगी तो वह मटकी भरने में तरली थी।
- 37:21शेख फरीद गुस्सा खा गए। वो कहता है, देवी पानी पीला दो,
- 37:27गर्मी बहुत है, प्यास ज्यादा लगी, ज्यादा ज्यादा प्यासा पहले मुझे
- 37:34पानी पीला दो मटकी फिर भर लेना, लेकिन स्त्री है कि सुनती ही
- 37:41नहीं। क्या नाम था आबिदा आबिदा नाम की
- 37:55स्त्री है ये पानी भर रही है और फरीद कुलज रहे हैं।
- 38:05अरे मैंने इतनी बड़ी सदी पाली मैं चिड़ियों से कहा, मर जा और अतहेत
- 38:12उसने कहा, चिड़ियों को जी जाओ तो वो जी गए जैसा कहोगे वैसा ही हो
- 38:19जाएगा। उस इस तरह का पानी पिलाते प्यासा
- 38:27क्या भला इतना सा काम नहीं कर सकती है?
- 38:30ये मटकी भी तो भर रही है या बहरी है, तो उसने उससे पूछा, बहरी हो
- 38:38क्या? तो उसने हाथ ला दिया नहीं, नहीं,
- 38:42बहरी नहीं हूँ, सुनता मैं? तो फिर सुनता है तो पानी पिलाते
- 38:46ना मुझे लेकिन वो मटकी भरने में तली।
- 39:04फ्रिज करते जाओ। इसी वक्त बस में जाओ और कहानी
- 39:09बड़ी मजेदार है। लेकिन आबिदा का कुछ नहीं बिगड़ा
- 39:15वैसे ही पानी भरते और चौंक के। क्या वो भ्रम था?
- 39:25नहीं, मैंने बहुत बार आजमाया, उसने फिर कहा शायद चुप हो गई हो।
- 39:36उसने कहा तुम्हारा नाम क्या है? उसने कहा तुमने नाम से क्या लेना
- 39:40तुम प्यासे हो? ठहर जाओ, पहले मैं अपनी मटकियां
- 39:45भर दूँ, फिर तुम्हें पानी पीला दूंगी।
- 39:52फरीद ने फिर दूसरी बार उसे शराब दिया कि जा भस्म हो जा, मुझे देरी
- 39:57करा रही है। मुझे प्यास लगी लेकिन फिर कुछ
- 40:01नहीं होगा। परेशान हो गए।
- 40:05फिर कहानी मजेदार भी है और शिक्षा प्रद भी है।
- 40:13जी क्या हो रहा है इस हिस्से पर कोई इफेक्ट ही नहीं हो रहा।
- 40:22उसने मटकियां भरी मजबूरी थी, ठहरना पड़ा, दो बार शराब दे दिया
- 40:28था, कुछ नहीं बिगड़ा, अभी तक मटकी भरी आराम से फिर और पानी निकाला।
- 40:40और आगुंतिक से गाह शेख फ्री से लव अंजलि धोलो फिर पानी पी लो, हाथ
- 40:47धो लिए पानी पी लियो प्यास बूझ गई पूरा पानी पी लिया पेट भर।
- 40:55आज ये सफर काफी है। पानी पी लिया, तृप्त हो गया।
- 41:01पूछा देवी तुम कौन सच सच बताओ आप? गीता बोली मैं वो चिड़िया नहीं
- 41:10हूँ जिनको तुम कहोगे, मर जाओ, मर जाउंगी जिनको तुम कहोगे जी जाओ और
- 41:17जी जाऊंगी। अच्छा किया तुमने तुम खड़े रहे
- 41:25लेकिन तुम्हारा घमंड तो शुरू हो गया।
- 41:30सिद्धियों का घमंड हमेशा चोर हो ही जाया करता है।
- 41:37सिद्धियों का घमंड सदा बरकरार नहीं रहता, ये टेंपररी होता है।
- 41:43यह उस आत्मा को नहीं मार सकता जो तुम्हारे भीतर विद्यमान है।
- 41:48वह तो कृष्ण कहते हैं कि कोई शस्त्र चलता नहीं।
- 41:56तो उसे नमन किया, सुकराना किया लेकिन पूछा की देवी ये रहस्य तो
- 42:03बता मैं आके कैसे जा पाऊंगा? मैं अपनी माँ को अपनी शेखी भगाने
- 42:10के लिए चला था, लेकिन तुमने फेल कर दिया।
- 42:14और तुमने ये भी पहचान लिया कि मैं चिड़िया थोड़ी जो तुम्हारे कहने
- 42:17से मर जाऊंगी, तुम्हारे कहने से जी जाउंगी तो देवी मुझे इसका
- 42:26रहस्य बताओ क्या है उस देवी ने जो कहा आप भी सुन के चौंक जाओगे।
- 42:32शक्ति में ऐसी कहानियों मैं सुनाना नहीं चाहा करता, लेकिन अगर
- 42:38प्रसंघ ही ऐसा आ जाए तो सुनानी पड़ जाती है।
- 42:41क्या करूँ तो वह देवी बोली मैं पति वृद्ध हूँ।
- 42:52फरीद नाम भी जान गए मैं पति व्रत हूँ, मैं कुछ नहीं करती पूजा
- 43:02फ्रीद ने कोई तप, कोई जप, कोई पाठ, कोई पूजा, कोई नमाज़, कोई
- 43:10रोजा। कोई हज कुछ किया तुमने क्या किया?
- 43:15तुमने कितना किया? कहती मैंने कुछ नहीं किया, मैंने
- 43:20कुछ नहीं किया, ऐसे कैसे तुम्हें पता चला देवी मैं तो बड़ा?
- 43:31मैं तो इतने साल बैठा रहा हूँ। 12 वर्ष की आज माँ को खुशखबरी
- 43:38सुनाने चला रहा था अविदा बोलीं फरीद तुम्हें ये सिद्धि मिल गई है
- 43:44निश्चित लेकिन मैं सिद्दियों से ऊपर।
- 43:50तुम अभी प्रबुद्ध नहीं हुए हो। यू हॅव नॉट गॉट एनलाइटन येट मैं
- 44:02पति की सेवा करती हूँ मेरा पति बीमार है उसकी सेवा कर।
- 44:10शरीर दुखता है, शरीर दबा देते है, अपना खुद का ख्याल रखती हूँ, पति
- 44:17की सेवा करती हूँ, इसमें बड़ा रहस्य छिपा हुआ है, बायक रोमांसों
- 44:25के निकटस्थ रहना। अगर स्त्री इतना सा भी कर ले कुछ
- 44:32भी ना करे, कुछ भी ना करे लेकिन स्त्री करे क्या आदमी तो उसे?
- 44:48कामवासना में घसीटना चाहेगा, फिर स्त्री क्या करे?
- 44:55स्त्री गुरुशरण में जाए और गुरुशरण में फिर गुफाएं हैं।
- 44:58अभी फंस गई ना स्त्री इधर जाए तो कामवासना में पति घसीटता है।
- 45:07गुरु शरण में जाए तो गुरु गुफाई बनाता है इसलिए तो ये सीखो के
- 45:15पीछे लोहे के सीखो के पीछे जिन्हें सोने के सिंघासनों पर
- 45:20राज़ करना था, आज वो आजीवन कारावास भुगत रहे हैं।
- 45:25मरेंगे तो जेल में मरेंगे। तो स्त्री क्या करे?
- 45:32तुम्हारे प्रश्न का खूब है। क्या ये सभी प्रश्नों का जवाब दे
- 45:38रहा हूँ? उधर जाए तो पति घसीट है।
- 45:45और बहुत सी स्त्रियां तो इसलिए शार्द ही नहीं करते, बी के बन
- 45:50जाते हैं, जैन शादी का ही बन जाती है, मुंड मुंडार लेती है लेकिन
- 46:03मिलता विलता कुछ नहीं। क्योंकि ये मन के ऊपर काम करती है
- 46:10और मन के ऊपर जो काम करेगा वह ऐसा करो।
- 46:16यह तो हो सकता है। मनोवैज्ञानिक तो हो सकता है साधु
- 46:21तो हो सकता है। पवित्र आचरण तो हो सकता है लेकिन
- 46:25संत नहीं हो सकता, क्योंकि मन के ऊपर काम किया, मन के पार काम नहीं
- 46:31किया, उन मुनि अवस्था में नहीं आए, मन से पार नहीं हुआ और उन
- 46:37मुनि अवस्था में आना कुछ अलग बात है।
- 46:43मन के दरवाजे पर ही दस्तक देते रहना, ये कुछ अलग बात है।
- 46:47तुम्हारे साइकेट्रिस्ट मन के ऊपर ही काम करते है, मन से पार नहीं
- 46:53होते और वह रहस्य मन से पार है। मैंने जितना बोला दिसंबर के बाद
- 46:59सब रहस्यमय बोला। उससे पहले मैंने जो समझाया वो सब
- 47:05मैंने बुद्धि के तल से समझाया, कभी कभी छलांग लगा देता भीतर कुछ
- 47:10हीरे ज्वाला तो चुन लाता, लेकिन दिसंबर के महीने के बाद मध्य
- 47:14दिसंबर के बाद मैं जो बोला रहस्य में उतर के बोला।
- 47:21क्यों? क्योंकि इससे पहले रहस्य के ऊपर
- 47:24बोला नहीं गया। बुद्ध ठहर गए, मन के ऊपर ठहर गए,
- 47:29रहस्य में उतरे और सब मन के ऊपर ठहर गए।
- 47:32रहस्य के ऊपर उतरे। पीएचडी थे, दार्शनिक थे लेकिन
- 47:44दार्शनिक थे अलफाज के स्थितियों के नहीं।
- 47:49आत्म स्थिति में नहीं पहुंचे थे वो उसी जगह जहाँ परमात्मा का
- 47:53निवास है। इसलिए बहुत मज़े से होश कह सकते
- 47:59हैं कि मैं अपने आप को बुद्ध के क्रीप पाता हूँ, वो नहीं कह
- 48:04पाएंगे कि मैं अपने आप को कृष्ण के क्रीप पाता हूँ मजबूरी है
- 48:09क्योंकि वो रहस्य में नहीं उतरे। कृष्ण तो रहस्य के मालिक हो गए।
- 48:16ये थोड़ी सी बात गहरी होगी, लेकिन समझने की चेष्टा तुम करना भी मत,
- 48:21इसे तुम अनुभव में लाने की चेष्टा जरूर करना।
- 48:28ओशो कृष्ण के क्रीब नहीं गए ओशो बुद्ध के क्रीब गए बुद्ध को अच्छी
- 48:32तरह से खंगाल देंगे वो। तो सुन लीजिए, बी के धर्म वाले
- 48:38साइकोलॉजिस्ट हो जाएंगे बस ये पढ़ाई ही है एक जैसे तुम कॉलेजस
- 48:44में पढ़ते हो, मनोचिकित्सा है ये इससे आगे नहीं जा पाएंगे।
- 48:50शुभतरंगे बिखेरों शुभ सोचो सत्य बोलो प्रगढ़ा ना करो और समूह में
- 49:03इकट्ठा होकर दान माँगेंगे मेरे पास लोग आ जाते हैं शिकायत करते
- 49:08ये पान साथ इकट्ठे हो जाती है। दान तो बैठ जाती है।
- 49:13तो मुश्किल खड़ी होती है। ये धर्मों का काम थोड़ी तुम सहज
- 49:19मांग लो। बुद्ध ने भी मांगा, लेकिन जिद कभी
- 49:22नहीं की। शंकर ने भी मांगा, लेकिन जिद नहीं
- 49:27की। लेकिन उसके द्वार पर बैठ जा ना
- 49:30उसको कहना इतने पैसे दो गले में से निकाल के ये तो वो वाला काम हो
- 49:36गया नहीं तो नंगा हो के नाचें से तगला कहता ले भाई 51 यार ले और चल
- 49:46काहे नाच निशाना है यहाँ। डरते हैं बेचारे गस्ती लोग तो अभी
- 49:58रहने कहा मैं पति पर मैं अपने पति की सेवा करती हूँ।
- 50:07अब इससे क्या मतलब लगाओगे तुम? तुम सिर्फ चरित्र साधोगे लेकिन
- 50:14चरित्र साधने से कुछ भी तो नहीं होता।
- 50:18गहरी बात तो तुम्हें कोई बता ही नहीं पाया।
- 50:23आज पहली दफ़े में तुम्हें गहरी बात बताया।
- 50:28मैं तुम्हारे सत्य को अध्यात्म को विज्ञान से जोड़ के बताया कि
- 50:36वास्तविकता क्या है जब स्त्री वाय के संपर्क में आती है माँ का
- 50:43क्यों प्रेम होता है बेटे के साथ? बेटी के साथ नहीं लगाव होता है,
- 50:49प्रेम नहीं होता, बाते शल्य नहीं होता बाते शल्य होता है बेटी के
- 50:53साथ इसलिए हर स्त्री चाहती है मेरे बेटे को पुरुष को फर्क नहीं
- 51:00पड़ता, पुरुष की चाहे बेटी भी हो जाए।
- 51:05क्योंकि स्त्री ममता में उसको गले लगाये थे और पुरुष बच्चा बाएं
- 51:11क्रोमोसोम से जुगता है। ये गहरे रहस्य समिति लेना रहस्य
- 51:15की बातें तुम्हें किसी शास्त्र नहीं में बस किसी का अलग से
- 51:20शास्त्र बना लेना। मैं हमारे।
- 51:24जो चैनल के प्रभारी हैं साहित्य के रमेश से मैं आग्रह करूँगा कि
- 51:36इसका प्रसंग ही अलग बना लो रहे हैं।
- 51:39से का? ये तुम्हें चरित्र से नहीं
- 51:50मिलेंगे। चरित्र से तुम सेवा कर सकती हो
- 51:55बिलकुल अच्छी बात है, बहुत अच्छी बात है, किसी दुखी की।
- 52:00किसी पीड़ित के हाथ पांव दुख रहे हैं, तुम उनको दबा दो, आराम मिलता
- 52:09है, उसके भीतर से आसीस निकलती है, प्यासे को पानी पिलाओ दो, भूखे को
- 52:19खाना खिला दो। जो तुम्हारे पास है वो बांट दो जो
- 52:22बाबा नान करने की मैं भूखों से ये कहता हूँ, तुम भूखे न मरो अगर
- 52:31तुम्हें बिल्कुल ही रोटी कोई नसीब नहीं होती तो गुरुद्वारा सदा ही
- 52:36उपलब्ध है। बाबा नानक का गुरुद्वारा सभी
- 52:40देशों में तुम्हें मिल जाएगा। तुम भूखे मत रहो, तुम गुरुद्वारा
- 52:48में जाकर पेट भर जाओ। वहाँ नानक का भंडारा चलता है,
- 52:54वहाँ 1313 कभी बार नहीं बनता। माँ खत्म नहीं होता।
- 53:00कितना ही खाये जाओ तुम वो पूरा करता ही जाएगा।
- 53:06इसलिए भूखों से मैं कहूंगा किसी भी देश में है, गुरुद्वारा
- 53:09तुम्हें मिल ही जाएगा। सोने की व्यवस्था भी तुम्हें भीतर
- 53:15नहीं बाहर मिल जाएगी। लेकिन वो तुम्हारी केयर पूरी
- 53:19करेंगे? उनमें सेवाभाव है।
- 53:21आज भी खालसा पंथ में सेवाभाव उसकी आत्मा में कूट कूट के भरा है।
- 53:29सवाय इन उदेदारों के जो गोलक में से धन चुरा के घर ले जाते हैं।
- 53:36और इनके परले कुछ नहीं पड़ेगा। बाबा नानक ने बांट न सिखाया हम
- 53:50प्रसंग पे वापस चले हाँ बेटा शायद।
- 53:58फरीद को अभी समझ नहीं आया कि कैसे हो सकता है कोई स्त्री सिर्फ पति
- 54:07व्रत हो गया, जहाँ पति व्रत का स्वाद तो था, लेकिन उसका पति इतना
- 54:15बीमार था, चौबीसों घंटे उसे उसका सांनिध्य।
- 54:18साथ में रहते थे और उसकी आत्मा इतनी जगह गई कि शी गॉट एनलाइटन
- 54:31मेरी एक सब्सक्राइबर आया। उसका पति बीमार था बहुत ज्यादा
- 54:37उसका मेरे पास। फ़ोन आया।
- 54:39ऐसे पति बीमार है और ऐक्टर्स के कारण मैं उसकी सेवा में संलग्न
- 54:49रहती हूँ। गरीबी भी है, लेकिन कुछ साधन है।
- 54:58मुझे क्या करना चाहिए? मैंने कहा कुछ ना करू मैं सिर्फ
- 55:02इसके करीब बैठू इसकी सेवा करो, देखभाल करो, यही तुम्हारी तपस्या
- 55:09है और उसने यही किया। पति श्री छोड़ गई।
- 55:17लेकिन बहुत कुछ जाते जाते प्रति वह स्त्री आज अपने सहस्रार के
- 55:32बहुत करीब है। थोड़ा सा उसको पुश, मैं उसे देखा
- 55:44जब यहाँ दीक्षा लेने आई वो पति की मृत्यु के बाद शायद मुझे याद नहीं
- 55:51पहले के बाद, लेकिन मुझे लगा। कि वह जल्दी ही पहुँच जाएगी।
- 55:59उसकी आभा, उसके शरीर का सहारा हमारे शरीर से सदा ही तरंगें
- 56:06निकलती हैं। राजनीतिज्ञों के मैं कैसे पहचान
- 56:10जाता हूँ? मेरे पास बहुत राजनीतिज्ञों के
- 56:13यहाँ पर आते हैं। मैसेजस हमें दीक्षित कर लो, घने
- 56:16का बिल्कुल आप कृपा करो। हमें संख्या बल की आवश्यकता नहीं
- 56:26ज्यादा धनार्दिक व्यक्ति जिन्होंने पाप करके पैसा कमाया।
- 56:34पापा बाज जी न वो भी कठ्ठी मोया संग न जावस उनके और भी आप देखोगे
- 56:40और मैं तो बस और देख कर ही दीक्षा देता हूँ।
- 56:43कई व्यक्तियों को मैं इंकार भी कर देता हूँ।
- 56:45नहीं मिले अब फिर सुधारो पहले अपने आप।
- 56:52जो खासतौर से मास्टरबिट वगैरह करते हैं, उनको तो मैं स्पष्ट रूप
- 56:57से कह देता हूँ नहीं ये छोड़ो, पहले तुम बड़े आनंद की तलाश में
- 57:05अगर आए हो तो छोटे आनंद को छोड़ के क्यों नहीं आती?
- 57:11अभी तुम्हारी ये बरती भी नहीं तुम खत्म कर पाए तुम अभी इसी के गुलाम
- 57:18तो बड़े आनंद की कामना लिए लिए यहाँ पर आ गए, तो मैं झिड़क देता
- 57:23हूँ नहीं नहीं यहाँ कोई तुम्हारा मुकाम नहीं है जाओ यहाँ से।
- 57:29ब्रह्मचर्य का पाठ से लिए पढ़ाया गया तुम चार बूंद पानी से तृप्त न
- 57:37हो जाओ। एक बूंद अमृत की भी मुहैया है
- 57:43तुम्हारे लिए और जैसे ही तुमने एक बूंद अमृत का भी लिया और पानी का
- 57:48स्वाद। तुम्हें स्वाद नहीं लगेगा, वो गल
- 57:51की प्यास बजाएगा, लेकिन ये तुम्हारी आत्मा की प्यास को बजा
- 57:55देगा। वह आनंद के एक एक बूंद तो तुम अगर
- 58:02उसकी तलाश में आए हो। अगर नहीं आए हो फिर जो चाहिए कमाल
- 58:07हो। गन मुकाम, श्रे गद्दी, मान सम्मान
- 58:15जो भी कुछ चाहिए कमालो मैंने तुम्हें कब बुरा है मेरे पास
- 58:24सिर्फ नेरोल प्योर। मुँह मूक्षु आना चाहिए, जिसके
- 58:30भीतर आग लगी है, मेरा की तरह गो आना चाहिए, मेरे पास उसका कल्याण
- 58:37भी होगा। निश्चित रूप से और अगर तुम ठग्गी
- 58:41मार के आ गए के बाबा ने लगा दिया हाथ तुम मुक्त तो हो जाओगे।
- 58:47लेकिन फिर तुम जल्दी मुक्त हो जाओगे, औरों से जल्दी मुक्त हो
- 58:55जाओगे, ये ठीक फिर जन्म लग सकता है।
- 58:59तुम्हें एक एक जन्म और लग सकता है शायद दो भी लग जाए।
- 59:06लेकिन जो व्यक्ति तीव्र वह मुखसा को लेकर आया प्यासा है, वास्तव
- 59:12में प्यासा है, बेराह की आग जल गई, तड़प रहा है, रात को नींद
- 59:17नहीं आती, उसे उस अमृत को बीने की जिज्ञासा जग गई है।
- 59:24कहीं से वो झलक देख ली है उसने। वह जो मेरे पास आएगा, फिर मैं
- 59:35उसकी रुचि को पूरा करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ू तो तुमने
- 59:43मेरे को मन के तल पे सुना तो माता पुत्र को क्यों चाहती है?
- 59:50क्योंकि पुत्र को जब वो गले लगाती है तो वाय क्रोमोसोम के आनंद से
- 59:54भर जाती है। मैंने आपसे पहले कहा वाय
- 59:58क्रोमोसोम। आनंद का खजाना है और अगर किसी दिन
- 1:00:09साइंस ने इतना विकास किया तो वह वाय क्रो मुसुम के भीतर जा के
- 1:00:14तुम्हें बता सकेगा कि कौन व्यक्ति एनलाइटन हो गया और कौन नहीं हो
- 1:00:20गया। तो पुत्र में क्यों?
- 1:00:23क्यों वायक रोम मौसम होता है। जब वो गले से लगाएगी तो उसे पता
- 1:00:29ही नहीं कि मेरे भीतर से वार्ताशलय कैसे बह जाता है।
- 1:00:32महमत्व का ये गुप्त बातें हैं जैसे।
- 1:00:40चुम्बक को अपनी चुम्बक का नहीं पता होता और लोहे को पता नहीं
- 1:00:45होता कि मैं क्यों खींचा जा रहा हूँ चुम्बक की तरफ और दूसरी बार
- 1:00:50चुम्बक के साथ जब लोहा लग जाता है तो तुमने एक बात देखी कि चुम्बक
- 1:00:56के साथ अगर लोहा लगा रहे। तो जब तुम उसको हटाओगे तो उस लोहे
- 1:01:04में भी चुम्बक तो का थोड़ा सा असर आ जाएगा।
- 1:01:09तुम ज़रा आजमा के देख लो, किसी चुम्बक को लोहे के टुकड़े के साथ
- 1:01:13रख देना, उसे घंटों पड़े रहने देना इसलिए माँ।
- 1:01:20के पास ही बच्चा रहता है। करीब 2 साल तक आजकल तो मेड्स के
- 1:01:24पास रहते हैं तो पाश्चात्य सब बता तुमने विकृति की ओर तुम जा रहे
- 1:01:29हो, तुम्हें फिर से लौटना होगा। हमारी सनातन प्रणाली की तरफ ठीक
- 1:01:37है ये भगाड़ने वाले बहुत आगे हैं टोपीधारी लेकिन तुम घबराओ मत,
- 1:01:41इनसे इनका सफाया हो जाएगा, जल्दी ही कोई नहीं बचेगा।
- 1:01:46इनमे से ये पाखंड को खिलाने वाले आज नहीं कल धराशायी होने को ही
- 1:01:53है। इन्हें कोई ज्ञान नहीं है।
- 1:01:58भीतर अपने गए नहीं इधर से चार अक्षर पढ़ लिए, उधर से चार अक्षर
- 1:02:01पढ़ लिए। इनकी बताई हुई सभी बातें झूठी
- 1:02:08हैं। हमारे हरयाणवी कहते हैं, बकवाद
- 1:02:11है, बकवाद है। तो माँ जब गले से लगाएगी उसको पता
- 1:02:20भी नहीं होगा। ये मेरे स्थलों से दूध काहे झल
- 1:02:24रहा है, क्यू मोमत तो बिखरा जा रहा है, लेकिन यही कारण है।
- 1:02:33वाय क्रोमोसोम की उपस्थिति उसको एनलाइटन कर रही है।
- 1:02:37धीरे धीरे धीरे धीरे उसके भीतर की चेतना कॉन्शसनेस प्रवाहित हो रही
- 1:02:45है माँ के बीज में और उसे आनंद आता है सारी रात बच्चा माँ के पास
- 1:02:50होता है, कभी दूध मांगता है। कभी कोटि कर देता है, कभी पेशाब
- 1:02:54कर देता है और बाप बेटी का हो जाता है।
- 1:03:04अब इसका वो कृष्ण जैसा उदाहरण है। कृष्ण बांटने जाता है।
- 1:03:09बाप के पास वाय क्रोमोसोम है, वो बांटना चाहता है और किसे बांटे
- 1:03:14बेटी को ही बांट सकता है क्योंकि वह एक्स क्रोमोसोम है, वाय
- 1:03:21क्रोमोसोम बांटना चाहता है इसीलिए पुत्र का बेटी के साथ लगाव होगा।
- 1:03:29ये तुम साधारण जीवन में भी देख सकते हो।
- 1:03:33बाप बांटता है बेटी कान्शस्नस और माँ ग्रहण करती है कान्शस्नस
- 1:03:41पुत्र से यह है क्रोमोसोमिनल फार्मूला।
- 1:03:48यह साइंस के हिसाब से मैंने तुम्हें अध्यात्म का वर्णन कर
- 1:03:53दिया। बहुत विषय बड़ा लम्बा चौड़ा है और
- 1:04:03वक्त तो मिनटों में ही गुजर जाता है।
- 1:04:07है मैं समझ रहा हूँ। कि मैं तुम्हारे दुविधा का और
- 1:04:10प्रश्नों का जवाब भली भांति देख पाया हूँ।
- 1:04:13फिर क्या किया जाए, यह समाधान रह गया।
- 1:04:17हमारा थोड़ा समय इसके ऊपर भी 10 मिनट 5 मिनट लगा रहा हूँ।
- 1:04:25शादी करते हैं तो पति। काम में घसीटता है।
- 1:04:31अगर तुम्हारी इच्छा है तो तुम शादी करो और पति के साथ हम बिस्तर
- 1:04:39रहो, क्योंकि पति मैं लाइटेड पर्सन हूँ।
- 1:04:46उसकी एनलाइटन पर्सन की तो रेंज बहुत दूर दिख जाती है।
- 1:04:52मैं तुम्हें बता देता हूँ। हमारे शहर 84 एकड़ में बना है
- 1:04:57गिद्दड़ वाह और इसका सारा फैलावक दूरदराज की बस्तियों को देख लिया
- 1:05:03जाए तो 200 एकड़ के करीब बनता है। और मेरी आध्यात्मिक तरंगें इससे
- 1:05:13कहीं दूर तरस कर जाती हैं। बस उन्हें पुकारो में तुम वहीं
- 1:05:20बैठे हुए उन्हें रिसीव कर लो। मैं सोचता था यहाँ कोई रिहायशी
- 1:05:28प्रबंध कर दूँ तुम्हारे लिए। लेकिन मेरे पास ऐसे मेरे पास
- 1:05:37समस्या है। समस्या काहे की है?
- 1:05:42मेरे पास मैनपॉवर है, एक बच्चा है, वह कहाँ कहाँ जाए?
- 1:05:48आप देखते होंगे जब यहाँ पर दीक्षा लेने आते हो, सारी व्यवस्था को
- 1:05:52करता है तो मैनपॉवर मेरे पास नहीं है।
- 1:05:57धन तो लोग देने को तैयार है, वो तो बस उनसे कहा जाए।
- 1:06:04वो शुरू करते हैं लेकिन वक्त नहीं दे सकते।
- 1:06:06आज आज सभी व्यक्ति। व्यस्त कर लिए गए हैं।
- 1:06:11महंगाई के कारण या कुछ ना कुछ सब्जवाद दिखाते तो आप सदा व्यस्त
- 1:06:21हो, चाहे आपके पास ज्यादा भी है तो भी व्यस्त हो।
- 1:06:27कम है। फिर तो व्यस्त हो गई, पेट तो भरना
- 1:06:31ही है अपने बच्चों का तो मैंने सोचा था यहाँ पास आसपास व्यवस्था
- 1:06:41बना ली जाएगी, लेकिन मेरे पास मैनपॉवर है।
- 1:06:47अगर कोई यहाँ आता है। तो वह मैच नहीं कर सकता।
- 1:06:53मैं देखता हूँ उनके और इतने ठीक नहीं हैं।
- 1:06:58मुझे शुभ विचारों वाले लोग चाहिए जो यहाँ गंदगी न फैलाएं।
- 1:07:06सेवा भाव से निष्काम भाव से सेवा करने के लिए जो यहाँ आए तो शायद
- 1:07:11कुछ हो सकता है। खैर, ये भविष्य की समस्याएं कोई
- 1:07:17बड़ी बात नहीं, फिर मेरे जाने के बाद तो इनकी कोई अर्थ भी नहीं रह
- 1:07:22जाती। बस जितना लाभ उठा सकते हो।
- 1:07:26फिर अभी जो व्यवस्था बनाई गई है, उसी का तुम लाभ उठाओ, दीक्षा ले
- 1:07:31जाओ, आज घड़ी के लिए मेरे संग बैठ जाओ, मेरे आसपास के दायरे पे बैठ
- 1:07:39जाओ या तो घनी भूत मात्रा में सारी कॉन्शस निस्क।
- 1:07:44कॉन्सेस्नेस ही कॉन्सेस्नेस भरा पड़ा है सारा समुद्र की तरह तो
- 1:07:51यहाँ आके थोड़ी देर के लिए तुम लुत्फ उठा सकते हो और अगर तुम 12
- 1:07:56मिनट तक बैठ सकते हो तो सुफ्फिसिएंट है।
- 1:08:02संतो ने भी कहा है कुछ सोच समझ के कहा है एक घड़ी, आंधी घड़ी, एक
- 1:08:11घड़ी, 24 मिनट की आंधी घड़ी, 12 मिनट की आंधी से पुनी आध, 6 मिनट
- 1:08:19की एक घड़ी आंधी घड़ी। आंधी से पुनी आत 6 मिनट भी अगर आप
- 1:08:29संत की संगत में बैठ जाओ, कबीरा संगत सादगी हटे, हरे कोटे अपराध
- 1:08:37आपके करोड़ों पापों को दूर करते रहो।
- 1:08:42इनके अध्यात्म का अर्थ कुछ और थे। शाब्दी का अर्थ भी बड़े प्यारे
- 1:08:47हैं। बस संत की क्षण में सिर्फ 6 मिनट
- 1:08:52गौफाओं के भीतर मत जानो ये लोग तुम्हारा हननचारित्रिक और
- 1:08:58तुम्हारा आध्यात्मिक दोनों तरह की।
- 1:09:02तुम्हें हनन करके तुम्हें चूस के बाहर फेंक देंगे।
- 1:09:06ये भेड़िए हैं भूखे भेड़िए। इन्होंने आनंद का वो खजाना पिया
- 1:09:13नहीं जहाँ जाके तृप्ति आ जाती है। भूख मिट जाती है।
- 1:09:17अभी इनकी भूख बाकी है। तो इनके पास तो मत जाना।
- 1:09:23इससे अच्छा घर बैठ जाना, दीक्षा ले जाओ, यहाँ से अपने चक्करों को
- 1:09:33ऊपर के चक्कर तक पहुंचाना और दीक्षा देते वक्त जब मैं आपके
- 1:09:38माथे को छूता हूँ। तो मैं आपकी शक्ति को भीतर से
- 1:09:42खींच के जहाँ पर भी असन्न है वो मुद्रागार से ऊपर जहाँ तक भी है
- 1:09:50मैं उठाता हूँ उसको विशुद्धि तक ले आता हूँ।
- 1:09:53विशुद्धि वो क्षेत्र आ जाता है जहाँ से परमात्मा का क्षेत्र शुरू
- 1:09:56होता है। उसे आके आपको कुछ नहीं करना होता।
- 1:10:00आप गिर तो सकते हो अगर बहुत ज्यादा बेविचार करोगे तो लेकिन
- 1:10:06गिर सकते नहीं वैसे संभव जैसा ही है करीब नेक्स्ट इम्पॉसिबल।
- 1:10:17तो मैं तुम्हें उस जगह पे ले आऊंगा जहाँ से तुम गिरोगे नहीं और
- 1:10:22बैठो क्रिया जो करो ऊंचे ऊंचे सांस लो वैसे भी तो सांस लिए बगैर
- 1:10:28तुम जीवत नहीं रह सकते। देखिए कोरोना में कितने रोग मर गए
- 1:10:33खूब मज़े से आनंद से जहाँ भी हो, ठंडी हवाओं में चले जाओ।
- 1:10:37बाग बगीचों में टहलो और ऊंचे ऊंचे स्वास्थ्य लो।
- 1:10:41ये तुम्हारी जीवन प्राण ऊर्जा है उसके बाद न कुछ करने में बैठ जाओ,
- 1:10:47कुछ न करो मन भटके का भटकने को जैसे दूर दराज आप किसी।
- 1:10:55घटना को घटते हुए देख रहे हो? ऐसे विचारों को देखो तुम्हारा कुछ
- 1:10:59नहीं बिगाड़ सकते, ये जड़ हैं ध्यान रखना तुम चेतन हो ये आएँगे
- 1:11:06ठहरेंगे बादलों की तरह लेकिन बादल कभी श्रद्धा के लिए ठहरे हैं
- 1:11:11आसमान पे नहीं गडगडाते हैं चले जाते हैं।
- 1:11:16ऐसे ही विचार भी चले जाएंगे और जब विचार चले जाएंगे तो खाली आसमान
- 1:11:22रह जाएगा और वो चमकता हुआ सूरज तुम्हारे सावधान ठंडी में इस धूप
- 1:11:30को तेपना बड़ा मज़ा आएगा। श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरा ए नाथ
- 1:11:52नारा। न वा सु दे श्रीकृष्ण गोविंद हरे
- 1:12:07मुरारी। हे नाथ नारायण वासुदेव, श्री
- 1:12:15कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव।
- 1:12:27पितुमात स्वामी सखा हमारे पितुमात स्वामी सखा हमारे हिनाथ नारायण
- 1:12:41वासुदेव। श्री कृष्ण।
- 1:12:44गोबिंद हारे मुरारी हिनाथ नारायण। वासुदेव।
- 1:12:55श्री? कृष्ण गोविंद हरे मुरारी ए नाथ
- 1:13:01नारायण वासुदेव पांव। धन्यवाद।