Latest / Baba ji Vijay Vats / 26 Jan 25 - नागार्जुन के शून्यवाद की शुरुआत! शून्यता में कैसे आएं? चिपकाहट को कैसे खत्म करें?
Transcript
- 0:22सोम प्रकाश बाबा आप रोज़ वक्तव्य बदल लेते हैं, किस वक्तव्य पर
- 0:38ठहरें? किसे सच माने?
- 0:45समझ नहीं आता? इतनी लंबी लंबी वीडियो और आपका
- 0:55वक्तव्य बदल लेना। बड़ी मुश्किल पैदा करता है।
- 1:06ऐसा क्यों होता है? बाबा
- 1:18कल तक आप कह रहे थे कि वे कार उठे?
- 1:22काम, क्रोध, लोग, अहंकार। तुम्हारी शक्ति से ये विकार
- 1:29गतिमान होते हैं। अपनी शक्ति को खेंच लो, ना होगी
- 1:38शक्ति, ना उठेंगे विकार इसको ठीक माना।
- 1:47आज आपसे नई नई ही बात कह दी विकार साक्षी को तोड़ लो कृत्रिम साक्षी
- 2:00को तो विकार नहीं उठेंगे, आप आनंद के सागर में चले जाओगे।
- 2:10बिकारो में उसी की तलाश थी। आनंद मिल गया।
- 2:16विकार खत्म हो जाएंगे। किसको ठीक माने आप?
- 2:23रोज़ वक्तव्य बदलते हो? क्या आप झूठ बोलते हो?
- 2:29सोम प्रकाश हाँ, मैं झूठ बोलता हूँ, झूठ बोलता हूँ क्योंकि तो
- 2:46मैं। स्टेप बाई स्टेप पर समझाना पड़ता
- 2:49है और तुम उन बातों के साथ चिपक जाते हो जैसे हमने ऊपर जाना है या
- 3:03धरती के नीचे जाना है। धरती में से पीने का पानी निकालना
- 3:08है ताकि आते जाते राहगीरों की प्यास हो जाए।
- 3:14ऊपर छत पर जाना है और पोड़ियाँ चढ़ना है तो मैं आज कहूंगा मैं
- 3:24पहली पोड़ी पर हूँ। कर कहूंगा, दूसरे पर हूँ फिर
- 3:30तीसरी चौथी फिर मैं कहूंगा छत पे हूँ पोड़ियाँ हैं ही नहीं
- 3:35पोड़ियाँ छूट गई जहाँ भी आप अटक गए।
- 3:43वहाँ आप उलझ गए। ओह मैंने झूठ बोला था कि मैं पहली
- 3:53पोड़ी पे हूँ मैं दूसरे पे हूँ मैं तीसरे पे हूँ या उसे स्टेप
- 3:59ब्य स्टेप समझो कि मैं। लाइव कमेंट्री कर रहा था।
- 4:06ऐसा ही धरती में से पानी निकालना है।
- 4:11आज धरती एक फुट खोदली, आज दो फुट खोदली, 345 बढ़ती जाएगी।
- 4:20आज रेत आ गया। आज कंकड़, पत्थर और आज काली
- 4:26मिट्टी आ गई आज गंधला पानी आ गया और आज साफ पानी आ गया फिर और गहरा
- 4:35जाऊंगा। बिलकुल साफ पानी आ गया आप इनको।
- 4:44बदलना कहोगे आप वक्तव्यों को रोज़ बदल लेते हो क्या करूँ?
- 4:51बदलना पड़ता है एक दम से तो मैं कहूँ कि धरती को खोद लो, पानी
- 4:59निकल आएगा। तुम समझ नहीं पाते एक दम से तो
- 5:03मैं कहूं के पुड़ियों पे चढ़ जाओ, छत आ जाएगी तुम समझ नहीं पाते तुम
- 5:10निशानियाँ ढूँढ़ते हो अभी रोज़ मेरे पास प्रश्न आते हैं पुलाधार
- 5:16पे क्या निशानी है स्वादिष्ट स्थान पे?
- 5:19मणिपुर पे अना हत पे विशुद्धि पे आज्ञा पे क्या क्या निशानियाँ
- 5:25होती हैं कौन कौन रंग देखते हैं कौन कौन आवाज आती है तुम तो इतनी
- 5:30क्लैरिफिकेशन मांगते हो, तुम इतनी सीधी और सरल बात अगर जान सकती।
- 5:40तो जाने वालों को इतनी मग्ज खपाई न करनी पड़ती।
- 5:45तुम जानते नहीं हो और दूसरी बात तुम चिपके जाते हो।
- 5:52आज जो बात मैं कह रहा हूँ कल वह झूठी होने वाली है।
- 5:59और तुम्हें अड़चन आएगी, लेकिन ध्यान से समझो अड़चन तब आएगी जब
- 6:06तुम मेरे एक वक्तव्य से चिपक जाओगे।
- 6:10जैसे जैसे मैं तल बदलू। वैसे वैसे तुम चिपकाहट को छोड़
- 6:16देना, मेरे संग संग चलना मैंने कितनी बार तुम्हें कहा है मेरे
- 6:22संग संग चलते आओ फल बदलेंगे हमने आसमान को छूना।
- 6:33यह हमने धरती में से प्यास उजाने वाला पानी निकालना है।
- 6:41तलत तो रोज़ बदलेंगे और तलों के साथ वक्तव्य भी बदलेंगे।
- 6:48इन्हें आप कह सकते हो कि मैं झूठ बोलता हूँ।
- 6:53लेकिन बात तो यह है कि तल बदले जाते हैं रोज़ क्योंकि हमने छूना
- 6:59है पानी को लगी है प्यास माटी नहीं बुझा सकेगी प्यास बुझेगी
- 7:09पानी से। पानी निकलेगा गहरा, कहीं 1020 फुट
- 7:16पे निकल सकता है, कहीं 1000 फुट पे निकल सकता है।
- 7:22बहुत से लोग मुझे कह देते हैं बाबा अभी तक नहीं मिला।
- 7:32नाद शुरू नहीं हुआ फना पे तो हो गया मैं कहता हूँ भूमि भूमि का
- 7:39फर्क होता है किसी की भूमि बिल्कुल उपजाऊ है हमारे यहाँ सात
- 7:48फुट पे पानी है पंजाब में। सात फुट पे और मरुभूमि में
- 7:59रेगिस्तान में 700 फुट पे भी नहीं आता।
- 8:05फिर क्या करेंगे? अगर तुम्हारी अन्तनाद शुरू नहीं
- 8:11हुआ तो तुम्हारी भूमि मरुभूमि है, मरुस्थल में हो?
- 8:18तुम अगर मेरे बोलने से पहले ही शुरू हो गया तो बड़ी उपजाऊ जमीन
- 8:27है। लोग कह देते हैं हमें तो 10 साल
- 8:34हो गए, ये नाद चल रहा है। हम तो इलाज कराते फिर रहे हैं तो
- 8:41ये अज्ञानता है अज्ञानता का तो हमें डॉक्टर भी कह देते हैं।
- 8:47यह तो टीनेटर से अब तुम उलझ जाते हो चाहिए था इसका आनंद लेना और
- 8:57अज्ञा ने आपको उलझा दिया, वो भी नहीं जानते।
- 9:04डॉक्टर्स भी मेरे पास आ जाते हैं। हमने दवाई खाई, ठीक नहीं हुई।
- 9:10मैं उनसे बोलता हूँ ये एक धागा है।
- 9:15इनके जरिए तुम उस सहसरार में चढ़ सकते हो।
- 9:22ये कोई कानों की बिमारी ट्रेनडस नहीं है इसलिए तुम्हारी दवा से
- 9:29ठीक नहीं होता। हर रोग की दवा डॉक्टर के पास नहीं
- 9:36होती और अनहतनात रोग नहीं है। अनहतनात तो एक वरदान है।
- 9:43परमात्मा का वरदान जीसको वो बुला लेता है, पुकारना है उसे नाद शुरू
- 9:51होता है, मैं वक्तव्य नहीं बदलता तर बदलता हूँ तुम्हारे लिए बदलता
- 10:04हूँ। मुझे कोई आवश्यकता है तुम्हें
- 10:09समझाना होता है, तो मेरी कल की बातें आज झूठ होने वाली हैं।
- 10:15आज की बातें कल झूठ हो जाएंगी। फिर तुम क्या करो?
- 10:23मेरे शब्दों को मत पकड़ो, आज जो इतने झगड़े हो रहे हैं, ये जो
- 10:32कॉमेंट्स आते हैं, गाली रोज़ होते हो, मेरे से इसका कारण क्या है?
- 10:41मैंने उस के बारे में बोला। कितने कॉमेंट्स हैं कारण क्या है?
- 10:49तुम ओशो से चिपटे हुए लोग हो अगर थोड़ी प्रशंसा कर दूंगा तो मैं
- 10:58तुम्हारा साथी। अगर थोड़ी सी गलती निकाल दूंगा,
- 11:02मैं तुम्हारा दुश्मन हूँ जैसे कि तुम ओशो ही हो गए हो, यही गलती
- 11:09है। ऐसे ही कबीर पंती हैं, ऐसे ही
- 11:12नानक पंती हैं। ऐसे ही ईसा पंती हैं, ऐसे ही
- 11:16इस्लाम पंती हैं। सभी के अपने अपने पंथ हैं और सभी
- 11:23उन पंथों से चिपके हुए हैं। सत्य की जानकारी किसी को भी नहीं
- 11:29है। यही दुविधा है तुम्हारी जो सत्य
- 11:35को जानता है वह मौन हो जाता है। उसकी सभी चिपकाहटें समाप्त हो
- 11:42जाती हैं। मैं फिर कुछ बोलता नहीं, उसमें
- 11:47इतनी भी तमन्ना नहीं रहती कि मैं बोलूं और प्रसिद्धि कमालू बुड्ढा
- 11:55जाता तेल ना तम आए। वह दाता सबका दाता सबना जियाँ का
- 12:05एक दाता वड्डा दाता। तीर न कमाए उसमें लाल चिका एक तल
- 12:15भर भी नहीं है। इसलिए वह बोलता नहीं, मूंग रहता
- 12:19है। तुम छोटा सा काम कर लेते हो,
- 12:23बोलते हो ये मैंने किया ये मैंने किया टिंडोरा पीते हो?
- 12:34और उसने सब बना दिया, वो ज़रा भी नहीं बोलता, सांस भी नहीं भरता
- 12:39है, पर मौन बैठा है शांति में अवस्थित ज़रा भी नहीं कहता मैंने
- 12:49बनाया तुम गालियां भी निकालते हो, तुम कहते हो वो है नहीं।
- 12:54तुम कहते वो हो नाक रगड़ते हो, लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ता,
- 13:01तुम नास्तिक हो तुम आस्तिक हो, तुम कुछ भी नहीं हो दोनों में से,
- 13:08लेकिन उसे ज़रा भी फर्क नहीं पड़ता, वह मस्त है।
- 13:13क्योंकि वह मस्ती है, वह अपनी सहजता में परमोन में सदा बैठा
- 13:22रहता है तो मैं कुछ भी नहीं कहता, जर्रे जर्रे मैं उसका निवास है
- 13:29कोई स्थान ऐसा है जहाँ वो नहीं हो।
- 13:35ऐसा कुछ था नहीं जाने जानने वालों ने यही बात कही बिन ना में नाहीं
- 13:43को था। जेता कित्ता तेता ना?
- 13:50ईशा वश्य में दम सर्वम यत किंच जगत याम जगत ईश्वर इस जगत के कण
- 13:58कण में विद्यमान है। नाम के बिना कोई स्थान नहीं बिन
- 14:04नावें ना ही कोठा हूँ, लेकिन तुम शब्दों में।
- 14:10क्योंकि चिपक जाते हो इसलिए शब्दों में वो ले जाते हो।
- 14:16तुमने पूछा हम क्या करे? बाबा शब्दों से चिपकना बंद कर दो
- 14:24शब्द चाहे किसी के भी। वो कृष्ण के हों, वो राम के हों,
- 14:29वो नानक के हों, कबीर के हों, ओशो के हों, किसी के हों, शब्दों को
- 14:37पकड़ना बंद कर दो, जो शब्दों से चिपका, वह उलझा और जो चिपका।
- 14:47वो ठहरा तुम्हें पता है जो चीज़ चिपक जाती है वो ठहर जाती है तुम
- 14:56दिवार पर कोई पोस्टर लगा देते हो बस वो चिपक गया वो चल नहीं सकता
- 15:04वो ठहर गया। ऐसा ही तुम्हारा मजूदा है, तुम
- 15:12जीस गुरु के साथ चिपके वह ठहर और वहाँ तुम असहिष्णु हो जाते हो,
- 15:23तुम्हारी सहनशक्ति समाप्त हो जाती है।
- 15:27तुम अगर हिंदू हो तो मुसलमान की बात में गले नहीं उतरेगी।
- 15:32अगर मुसलमान हो तो हिंदू, ईसाई, यहूदी उनकी बात गले नहीं उतरेगा,
- 15:40क्योंकि चिपक गए। ठोस हो जाते हो, पत्थर हो जाते हो
- 15:53तुम तरल नहीं होते, तुम वास्प नहीं बनते हो तरल होना सीखो वास्प
- 16:03बनना सीखो। मैं तो ऐसा ही करता रहूँगा, रोज़
- 16:09नए प्रश्न आएँगे, रोज़ पुरानी बातों को छोड़ दूंगा, रोज़ नई
- 16:16बातों को बताऊँगा और तुम रोज़ पूछोगे, कल तो बाबा आपने यह कहा
- 16:23था। आज आपने ये कहा कल तो कहा था मैं
- 16:30दूसरी पोड़ी पर हूँ आज तुमने कह दिया मैं छत पर हूँ, पोड़ियाँ हैं
- 16:35ही नहीं तो छत पर जाके सभी पोड़ियाँ समाप्त ही तो हो जाती
- 16:41हैं तो ठीक बोला मैंने। छत पे जाके अगर मैं कहूँ कि
- 16:47पोड़ियाँ नहीं हैं तो इसमें कोई गलती नहीं है और अगर पोडियों पे
- 16:57खड़ा हो के नीचे धरती पे, मैं कहूँ कि छत नहीं है तो यह भी ठीक
- 17:03है। जो मैं जानता नहीं उसको नकारूंगा
- 17:10इसलिए मार्क्स ने नकारा परमात्मा नहीं और आज यह फैशन बन गया।
- 17:23जो व्यक्ति जानता नहीं, बड़ा सरल तरीका है कह दो वो होता ही नहीं।
- 17:31आचार्य कहते हैं अनलाहिटमेंट नहीं होता बुद्ध कहते हैं संसार दुख
- 17:40है। तुम जब गए तो क्या सुख होता नहीं
- 17:49होता है? लेकिन आप ठीक से समझते नहीं।
- 17:57बुद्ध कहते हैं संसार दुख है। यानी चिपकाहट दुख है तुम चिपकोगे
- 18:07तो दुखी रहोगे, तुम चिपकाहट को तोड़ दोगे तो सुखी हो जाओगे,
- 18:16लेकिन शब्दों को सत्य की भाँति मत ले लेना।
- 18:20तुम शब्दों को सत्य लिख सत्य की भाँति देखते हो।
- 18:24यहीं चूक हो जाती है रोज़ एक एक करके मैं स्टेप वाइ स्टेप तुएं
- 18:35तुम्हारी मान्यताओं को तोड़ता हूँ।
- 18:40अब इस शब्द को ठीक से समझा एक एक करके मान्यताओं को तोडूंगा
- 18:51मान्यताएँ रोज़ टूटेंगे, रोज़ बदलेंगे मेरे वक्तव्य।
- 18:58रोज़ मान्यताएँ तुम्हारी टूटेंगी, रोज़ मैं अगले पड़ाव पे हो
- 19:02जाऊंगा। लेकिन जीस दिन छत के उपर आ गया।
- 19:09उस दिन मैं वक्त भी नहीं बदलूंगा इसलिए कबीर ने कहा।
- 19:17सभ्य से आने एक मत वहाँ जाकर वक्तव्य बदला नहीं जा सकता।
- 19:25वहाँ जाकर मत एक ही होता है। कबीर भी वो ही कहेंगे।
- 19:29नानक और कृष्ण भी वो ही कहेंगे। जब छत पे पहुँच जाता है व्यक्ति
- 19:38तो वक्तव्य बदले नहीं जा सकते जब तक नीचे रहोगे एक एक पौड़ी पड़ाव
- 19:49सीढ़ी चढ़ते जाओगे, रोज़ वक्तव्य बदलेंगे?
- 19:54ऐसे ही जब धरती में से पानी निकालोगे, प्यास लगी है, रोज़
- 20:00वक्तव्य बदलेंगे। आज एक फुट दो फुट 50 फुट आज रेत आ
- 20:06गया, चिकनी मिट्टी आ गई, काली मिट्टी आ गई, गंधा पानी आ गया,
- 20:12साफ़ पानी आ गया। और फिर जब साफ पानी बहुत गहरा आ
- 20:18जाएगा तो तुम रुक जाओगे। तुम कहोगे बस प्यास बुझने वाला
- 20:24पानी आ गया। यह मान्यताओं का टूट जाना।
- 20:34एक एक करके टूट जाना और तुम इसे टूटने देना तुम अड़ जाते हो
- 20:44क्योंकि तुम कहीं न कहीं चिपके हुए हो और वो जो भूल गए।
- 20:51वो बस अंतिम है तुम्हारा ये समझना तुम्हें अटका देता है।
- 20:59तुम आगे नहीं जा पाते, इसलिए मैं कहता हूँ अक्सर अनुकरण करने वाले
- 21:05मूर्ख होते हैं अगर आगे चलने वाला ठहर गया।
- 21:11तो अनुकरण करने वाले भी ठहर जाएंगे।
- 21:17तुम भी रुक जाओगे, जहाँ मैं ठहरूंगा वहाँ समझना पड़ाव आ
- 21:31जाएगा। वड्डा दाता तिरना था।
- 21:37उसमें इतनी भी तम्मा नहीं, इतना भी लालच नहीं कि वह बोल के कह दे
- 21:45कि मैं तुम सब को तुम्हारे सब के लिए इतना कुछ बनाया तुम सब को मैं
- 21:54खाने पीने को। ऑक्सीजन महिया कराता हूँ सांस
- 21:59लेने को ये सब मेरा दिया है वो नहीं कहता कहाँ बोलता है वो यह पर
- 22:09मस्त है उसका बाट नाम। उसके आनंद का द्योतक है।
- 22:19कितना आनंदित है वो बांट के कितनी मस्ती में झूमता है वो बांट के और
- 22:30तुम थोड़ा सा काम कर लेते हो। एक चित्रकार चित्र बना लेता है और
- 22:37फूले नहीं सुमाता ये चित्र मैंने बनाया।
- 22:46मूर्ति बना लेता है मूर्तिकार ये मूर्ति मैंने बनाई।
- 22:51कोई कारीगर घर बना लेता है या घर में नहीं बनाया तुम लैब लगा देते
- 22:56हो। आधा की उसमें तुम्हारा कुछ भी
- 22:58नहीं होता। सभी सामग्री बाहर से ली तुमने
- 23:04सिर्फ डिज़ैन किया, लेकिन परमात्मा तो सभी सामग्री भी अपने
- 23:10पास से बनाता है। परमात्मा तो सब कुछ बनाता है,
- 23:17स्पेस भी बनाता है, स्पेस के भीतर सामग्री भी फिट करता है।
- 23:25बस यहीं तुम चूक जाते हो जो समझ में नहीं आता तुम्हारी छोटी सी
- 23:30खोपड़ी के और देखिए समझ कभी आएगा भी नहीं।
- 23:35यह बिल्कुल इस तरह है जैसे मैंने कहानी सुनाई।
- 23:39छोटी प्याली में समुद्र नहीं आता, वह घर में सागर नहीं समाता, वैसे
- 23:46ये तुम्हारी कुबड़ों में कभी नहीं आएगा।
- 23:49मार्कस एक नहीं, मार्कस रोज़ पैदा होते हैं।
- 23:54चार वा रोज़ पैदा होते रहेंगे रोज़ आचार्य पैदा होते रहेंगे और
- 24:00बोलते रहेंगे एनलाइटनमेंट नहीं होता क्यों जाना नहीं जिसने जान
- 24:09लिया वो बताने की चेष्टा करेगा। वो तुम्हें समझाना चाहेगा, कोशिश
- 24:20करेगा। वो तो जानते हैं कृष्ण जानते हैं
- 24:26तुम समझ नहीं पाओगे कृष्ण जानते हैं अगर जो नहीं समझ पाएगा लेकिन
- 24:33फिर भी बोलते हैं। और जानते हैं कि मुझे अपनी
- 24:38शक्तिपात गिराना पड़ेगा, इसके अंत में फिर समझेगा।
- 24:46यह बावजूद इसके बोलते हैं और आखिर में वही करना पड़ता है।
- 24:53शक्तिपात ही तो करना पड़ता है। आखिर में गुरु अच्छी तरह से जानता
- 25:00है। वह बोला नहीं जाता फिर भी बोलता
- 25:04है, बस बोलता है तुम्हें दुख संकट।
- 25:15दरिद्रता क्लेश, चिंताग्रस्त आग में जलती हुई मैं जब देखता है तो
- 25:25बोलता है तुम दरिद्र नहीं हो, तुम शहंशाह हो।
- 25:35ये जो जल रहा है ये तुम नहीं हो, तुम कुछ हो हो, तुम वो हो जो जलता
- 25:43नहीं हो, ये जो कट रहा है, तुम नहीं हो तुम वो हो जो कटता नहीं।
- 25:52रोज़ बोलता है उसे करुणा दिया तरसता है तुम्हारी दशा में के
- 26:02अज्ञानता के कारण ये दुखी हैं। वास्तव में ये दुखी नहीं है तो
- 26:09तुमने कहा क्या तुम झूठ बोलते हो? बिल्कुल झूठ बोलता हूँ, आगे भी
- 26:14शब्द सुन लो, जो बोला जा सकता है वह सत्य होता ही नहीं, सत्य कभी
- 26:23बोला नहीं जा सकता। सत्य अगर कभी शब्दों में आ जाए तो
- 26:30समझ लेना वो झूठ है। जो बोला जाएगा वह झूठ होगा और मैं
- 26:40भी इस चीज़ को जानता हूँ। मैं झूठ है, इसलिए तुरंत स्वीकार
- 26:45कर लिया मैंने हाँ, मैं झूठ बोलता हूँ।
- 26:49बखूबी जानता हूँ मैं, मैं उसको कभी नहीं बोल पाऊंगा, वहाँ तक
- 26:57पहुँच सकता हूँ, उस प्रज्ञा में ठहर सकता हूँ वहाँ तक जाने के
- 27:03रास्ते बता सकता हूँ। उसका स्वाद बता सकता हूँ?
- 27:09वह आनंद है, वह मस्ती है, वह खिलता हुआ सागर है, वह सुगन्ती की
- 27:18बर्मा है, तुम क्यों दुखी हो? तुम्हारा अंत बड़ा सुखी है।
- 27:27तुम वहाँ चले क्यों नहीं जाते? सब बोलेंगे, बोलता ही चला जाऊंगा,
- 27:36लेकिन जब तुम सवाल करोगे वह पैदा कैसे हुआ?
- 27:42उसको किसी ने बनाया तो मैं मौन हो जाऊंगा।
- 27:46ये खोपड़ी के सवाल मुझसे हल नहीं होंगे।
- 27:51मैं यहाँ लाचार हूँ मैं यहाँ बेबस हूँ, मैं बेबस हूँ, इनका जवाब
- 27:58नहीं दूंगा, दे नहीं सकता, सिर्फ इतना ही कहूंगा कि ये तो मैं नहीं
- 28:04जानता। बस इतना सा बोलता हूँ कि तुम दुखी
- 28:10हो तुम्हारे चेहरे लटके हुए दुखों से भरे हुए लंबे, लंबे चेहरे तुम
- 28:23इससे। निजात पा सकते हो।
- 28:28इन दुखों से इस जलन से निजात पा सकते हो?
- 28:35ढंग है कहो तो बता देता हूँ मैं बस मैं ये जानता हूँ।
- 28:43कि उस मैं को पीकर तुम भूल जाओगे सब कुछ जो आज याद आता है उस मैं
- 28:55को पीकर तुम भूल जाओगे जिन्हें हम भूल।
- 29:02ना चाहें वह अक्षरियाल आते हैं जिन्हें हम भूलना चाहें।
- 29:19वह अक्सर याद आते हैं, बुरा हो इस मोहब्बत का बुरा हो इस मोहब्बत
- 29:35का। वो क्यों कर याद आते हैं जिन्हें
- 29:45हम भूल ना चाहें अक्षर याद। हाँ थी हैं भूलना चाहते हो ये
- 30:03दर्द, ये बिरहा, ये तना, ये कमजोर है व्यवस्थाएँ।
- 30:15दृढ़ताएँ ये कर्ज ये फर्ज ये मर्ज बोलना चाहते हो तुम, लेकिन अक्सर
- 30:25याद आते हैं बुरा हो इस मोहब्बत का वो क्यों कर याद आते हैं?
- 30:37तो संत कहता है कि हमारे पास दवा है, तुम इतने उदास मत हो, तुम
- 30:47इतने लाचार मत दिखो, तुम बेबस और विवश मत हो।
- 30:54तुम चलो मेरे संग मैं तुम्हे पलाऊंगा थोड़ी सी और तुम भूल
- 31:03जाओगे सब कुछ अभी तुम भूलना चाहते हो और भूल नहीं पाते और अक्सर याद
- 31:12आते हैं वो। लेकिन जब तुम वो थोड़ी सीपी लोगे
- 31:24तो धीरे धीरे भूलने लगोगे, फिर तुम सब कुछ भूलना चाहोगे।
- 31:34फिर तुम पैग आगे करोगे, फिर तुम पकारोगे और ज़रा सी देदेसा की और
- 31:48ज़रा सी और। और ज़रा सी दे दशा की और ज़रा सी
- 31:57और कैसे रहूं चुपके मैंने पी ही क्या है होश अभी तक है बाकी?
- 32:09और ज़रा सी दे दे साखी और ज़रा सी और संत तुम्हें एक बूंद दिला देता
- 32:17है संत के पास बैठना आचार्य उपासना तुम्हें लगता है जैसे तुम
- 32:29सब भूल गए। तुम कुछ पूछने आते हो संत के पास
- 32:40और पाते हो के भूल गए क्या पूछने आते क्या है संत के पास एक अन्य?
- 32:52संत के पास एक खुमार है चौबीसों घंटे दिन भर रात आठों पहर उसके
- 33:01भीतर से वह मदरा झलकते रहते हैं लहर बनकर।
- 33:09और संत तुम्हे छोटी सी बूँद पीला देता है, उसके और बूँद तुम क्या
- 33:16पीते हो? तुम भूल ही जाते हो जो तुम्हे
- 33:21भूले से भुलता नहीं था। वो तुम्हें याद करने से याद नहीं
- 33:27आता। पहले भलाई भूलता नहीं था।
- 33:34अब याद करना चाहते हो तो याद नहीं आता।
- 33:39ऐसा हुआ राम कृष्ण परमहंस। के शिष्य नरेंद्रनाथ पिता मर गए
- 33:48थे, घर में बड़े थे। जिम्मेदारी उनके ऊपर आ पड़ी।
- 33:57पिता के रहते कोई फिकर ना था, बड़े वकील थे अब तो घर का खर्चा।
- 34:04दाना पानी चलाना मुश्किल हो गया। कर्जतली डूब गए, आमदनी का कोई
- 34:12साधन नहीं था। ऐसी दशा आ गई कि किसी किसी दिन
- 34:23फाका भी रहना पड़ता। भोजन न मिलता है।
- 34:31बहुत बार मन में आया कि गुरुदेव से कह दूँ, लेकिन संकोच कर जाता
- 34:40हूँ। इतनी सी बात भी क्या कहना है?
- 34:48एक दम बड़ी अति आ गई है। घर पर किसी को खाना नहीं मिला तो
- 34:57सोच आज बता ही दूंगा। गुरु के पास आए चारण स्पर्श किया
- 35:06गुरुदेव घर में अन्न धन का अभाव है।
- 35:13पिता जीके स्वर्गवास के बाद कई कई दिन भूखे रहना पड़ता है।
- 35:23उनकी एक बहन ने भूख के कारण सुसाइड कर लिया।
- 35:27आत्महत्या गरीबी भी बुरी बला है। ऐसा भी गया कि खाने को आना भी ना
- 35:50मिले तो रामकृष्णा का पगले, तुने पहले ना बताया?
- 36:00तू ऐसा कर माँ आएगी मेरे पास, पर मैं माता को बोल के आऊंगा, उससे
- 36:07मांग लेना, खूब सारा धन मांग लेना।
- 36:15खूब सारा दिव्य मांग लेना, पदार्थ मांग लेना, अन्न धन का अभाव न हो
- 36:23आ जाएगी। जब आएगी माँ तो मैं उसको नमन करके
- 36:31पूजा अर्चना करके मैं बाहर आ जाऊंगा।
- 36:35कह के आऊंगा माँ तुमसे मिलना चाहते हैं नरेंद्रनाथ, तुम चले
- 36:44जाना और तुम मांग लेना उसके पास कोई कमी नहीं है।
- 36:56शबनजिया का एक दाता सो मैं भिसर न जाई वह किसी को भूलता नहीं, तुम
- 37:08जाओ उसके पास तुम मांग लो ठीक। विवेकानंद चले गए।
- 37:16धरेन्द्रनाथ थे उनका नाम राम कृष्ण बाहर आ गए, बैठ गए आँखों
- 37:25में झरझर आंसू सामने माँ है भूल गया।
- 37:37वो जो निशीली तरंगें आती हैं भीतर से और तुम्हें बहा के ले जाती
- 37:45हैं, तूफान की तरह तुम आप ही में नहीं रहते।
- 37:53सच पूछो तो तुम ही नहीं रहते, तुम ही गिर जाते हो तुम ही उड़ जाते
- 37:57हो तो माँ सामने बैठी माँ ने कहा पुत्र तुम कुछ।
- 38:11मांगने आए थे। हाँ माँ शक्ति दो, मुझे भक्ति दो
- 38:20चरणों की अगाध भर दी शक्ति दो। ठीक है, बेटे तो हो गया, शक्ति हो
- 38:37गई, भक्ति हो गई, मुक्ति हो गई और बस माँ और क्या चाहिए होता है?
- 38:49मुक्ति तो अंत है, शक्ति हो गई, भक्ति हो गई, मुक्ति हो गई ठीक है
- 38:59पुत्र जाओ बाहर आ गए। रामकृष्णा ने पूछा मांग लिया।
- 39:08ओह गुरुदेव, मैं तो भूल गया भूल ही जाते हैं वहाँ जा के भूल जाते
- 39:15हो जो भूले से भूलता नहीं था उसकी एक बूंद या उसकी करीबी आते ही तुम
- 39:23भूल जाते हो मस्त हो जाते हो। खो जाता है तुम्हारा आपा?
- 39:33इसलिए कृष्ण कहते हैं कि गहे बगाहे आचार्य के समीप बैठ जाना
- 39:39आचार्य उपासना। तुम्हारी सभी दुविधाएं समाप्त हो
- 39:50जाएंगी। आचार्य के पास से निकलती हुई
- 39:53तरंके तुम सहज कर जाएंगी और उस सहजता में आनंद है और आनंद ही
- 40:00तुम्हारी जरूरत है भीतर के अंतः के प्राणों की।
- 40:09कोई बात नहीं कल फिर आएगी मत, कल मांग लेना आज नहीं मांगा था ठीक
- 40:19दूसरे दिन भेज दिया जाओ आज चुप मत जाना।
- 40:23कल तो चूक गए थे आज मत चूक के जाना।
- 40:28रामकृष्णा ने पूजा अर्चना की और बाहर चले गए।
- 40:35जाओ विवेकानंद माँ आ गई है आज मंगलाओ चले गए विवेकानंद।
- 40:45माँ को प्रणाम किया, कल्याण मस्त पुत्र कहो कैसे ले आये माँ मुझे
- 40:57शक्ति दो ठीक? विवेकानंद बड़े ईमानदार है, यहाँ
- 41:06समझने वाली बात है, भक्ति के लिए शक्ति मांगी, पहले मुफ्त में
- 41:13नहीं, कोई चीज़ मांगते हैं। भक्ति करने के लिए शक्ति दो और
- 41:20भक्ति से मुक्ति मिल जाएगी। मा शक्ति दो, भक्ति दो और मुक्ति
- 41:33दो विवेकानंद बड़े ईमानदार विवेकानंद मुफ्त में नहीं चाहते
- 41:40मुक्ति। तुम मुफ्त में चाहते हो तुम चाहते
- 41:45हो बिना कुछ दिए मुक्ति मिल जाए तुम इन जब कहटों को छोड़ना नहीं
- 41:52चाहते, गुरु तुमसे कूड़ा मांगता है।
- 42:00गुरु कहता है कि ये कूड़ा मुझे दे दो ये चिपकाहटे मुझे दे दो, तुम
- 42:09नॉन क्लिंगकनेस में आ जाओ लेकिन तुम तुम्हारी तो जान है ये
- 42:17चिपकाते। तुम अगर अपने गुरु को नीचा नहीं
- 42:23कहला दे ना सकते तो इसका अर्थ ये नहीं कि तुम गुरु की बिढ़ाई जाते
- 42:32हो। भूल जाना इस बात को।
- 42:36तुम खुद को ऊंचा दिखाना चाहते हो। मेरा गुरु ऊँचा इसका अर्थ ये नहीं
- 42:43कि तुम्हारा गुरु ऊँचा इसका अर्थ ये कि तुम ऊँचा तुम्हारा अहंकार
- 42:48ऊचा गुरु के कांधे पर रखकर बंदूक चलाते हो।
- 42:56तुम अपने गुरु की तुहीन सुन नहीं सकते क्योंकि तुम अपनी तुहीन नहीं
- 43:02सुन सकते। तुम्हारा लगाव है गुरु के साथ
- 43:06इसलिए जो जेक के साथ भी चिपका हुआ है।
- 43:11कोई कबीर, कोई नानक, कोई इस्लाम से।
- 43:15कोई सनातन से कोई बुद्ध से उसका बुरा नहीं सुन सकता क्यों?
- 43:28क्योंकि उसका अहंकार दबता है। अगर सनातन बुरा है।
- 43:33तो मैं सनातन को मानने वाला हूँ, मैं भी बुरा हो गया।
- 43:38सनातन छोटा है तो मैं भी छोटा हो गया।
- 43:42इस्लाम छोटा तो मैं भी छोटा हो गया।
- 43:48कुल कारण इतना है। तुम अपने आप को बड़ा समते रहो और
- 43:57बाबा कहते हैं वड्डा दाता तेलना तामा है, उसमें लोभ नहीं होता,
- 44:03इतना भी नहीं होता कि कोई मुझे कहे कि तुमने सारी सृजना बनाई?
- 44:10एक ज़रा तुम बना नहीं सकते और तुम उम्मीद करते हो कि सारा जहाँ
- 44:16तुम्हारी आरती करें, पूजा करें सामर्थ्य तुम्हारे में एक ज़रा और
- 44:22एक बूंद पानी को बनाने को नहीं है चाहतें तुम्हारी है कि सारा संसार
- 44:28तुम्हारी अर्चना। पूजा की थाली सजाई लेकिन वो बड्डा
- 44:35दाता तिल ना ताना है वह परम दयालु वह बड़ा दाता वह सर्जन हरा इतना
- 44:47कुछ बनाने वाला सटीक। मैं तुमसे कुछ नहीं चाहता, उसकी
- 44:56कोई तमन्ना नहीं तुम अरदास कर देते हो, तुम प्रणाम कर देते हो,
- 45:04तुम बढ़िया ही कर देते हो। लेकिन वह बढ़िया ही मांगता नहीं।
- 45:10तुम्हारी बढ़िया ही करना शिफ्ट सलाहगा करना बेकार हो जाता है।
- 45:16वह सुनता नहीं, तुम्हारी सलाहगा क्यों?
- 45:19क्योंकि उसकी इच्छा नहीं है कि तुम मेरी सलाहगा करो।
- 45:23अगर सलाहगा करने की इच्छा हुई तो यह भी तमाम हो गई।
- 45:29और वह तो तिल ना तम आए उसमें तो ज़रा भी तमा नहीं है तो विवेकानंद
- 45:41बड़े ही मानता है। विवेकानंद कहते हैं माँ शक्ति दो
- 45:45जिससे भक्ति कर सकूँ और भक्ति का प्रणाम जब मैं खो जाऊंगा।
- 45:52तो मुक्त हो जाऊंगा कुछ दांव पे लगा के मुक्त होना चाहते हैं
- 46:02मुफ्त में मुक्त नहीं होना चाहते, लेकिन मूर्ख चाहते हैं।
- 46:10कुछ दांव पे भी न लगाना पड़े और वह भी मिल जाए नहीं होगा यह
- 46:19तुम्हारे अहंकार की सदा यही तमन्ना रहती है कि मेरा भी कुछ न
- 46:25बिगड़े टूट फूट न हो ज़रा भी। और मैं विराट भी हो जाऊं।
- 46:32मैंने बहुत बार कहा ज़रा जीर्ण है ये हवेली तुम चाहते हो ये भी बची
- 46:38रहे और नहीं भी उछल जाए ये दोनों बातें कैसे संभव हो सकती हैं ज़रा
- 46:45जीर्ण है हवेली तो गिरेगी गिरानी पड़ेगी।
- 46:50नीम से खोदनी पड़ेगी, उठानी पड़ेगी फिर नई का उसार होगा लेकिन
- 46:58तुम प्राणी को गधने नहीं देते हैं।
- 47:02तुम्हारी ये टिप्पणियां बताती हैं कि तुम कितने चिपटे हुए हो।
- 47:08और इन चबकाहटों को तुम छोड़ना नहीं चाहते और नए को तुम पाना
- 47:14चाहते हो, विराट को सूत्र को तुम छोड़ना नहीं चाहते बस यही मुसीबत
- 47:21है, इसलिए तुम तो खेलो एक एक करके घराते जाओ।
- 47:31अपनी मान्यताओं को, क्योंकि मान्यताएँ सिर्फ मान्यताएँ हैं।
- 47:35तुम्हारी अनुभव नहीं है। अनुभव से जो मान्यताएँ आएंगी वो
- 47:41घराने नहीं पड़ेंगे, वो सच हैं। लेकिन सुनी सुनाई शास्त्रों में
- 47:49पड़ी गुरु मुख से सुनी वो मान्यताएँ हैं, वो अनुभव नहीं
- 47:55हैं, वो घराने पड़ेंगे आज नहीं कल और तुमने तो जगत ही सारा
- 48:04मान्यताओं के ऊपर खड़ा किया है। तुम्हारे सारे महल मान्यताओं के
- 48:08ऊपर खड़े हैं और गिराने पड़ेंगे यही नागार्जुन कहते हैं, एक एक
- 48:20मान्यता को कराते जाओ एक एक मान्यता को कराते जाओ।
- 48:27गुरु के समीप बैठ जाओ गुरु तुम्हारी मान्यताओं को तोड़ेगा पर
- 48:34वो टूटती जाएंगी, टूटती जाएंगी ये खंड हर हवेली सारी टूट जाएगी, 1
- 48:42दिन राख भी न बचेगा। 1 दिन समतल भूमि हो जाएगी के जर
- 48:52जर हवेली कहीं नहीं दिखेगी शून्य बाद का पहला अर्थ हो यह है।
- 49:05सारी मान्यताएँ टूट जाए क्योंकि वो नकली हैं।
- 49:09तुम्हारे अनुभव से नहीं आई, वो असली नहीं है जैसे तुमने आग में
- 49:16हाथ न डाला हो। और तुम यह कहते हो कि आग में हाथ
- 49:23डालने से जल जाता है वो तुम्हारी मान्यता है, चाहे सत्य ही क्यों न
- 49:30हो, लेकिन तुमने जलने का स्वाद लिया।
- 49:39नागार्जुन कहते हैं। सभी मान्यताओं को एक एक करके
- 49:46कराओ, कुछ न बचेगा क्या बचेगा, शून्य बचेगा सब गिरा दो।
- 49:59शून्यता में आ जाओ क्या होगा शून्यता में आने के बाद फिर
- 50:08उसरेगी नई जमीन और जितनी आसानी से मैंने कह दिया कि मान्यताओं को एक
- 50:18एक करके घरा दो। उतनी ही मुश्किल है एक एक करके
- 50:23घराना क्या तुम जब के साथ रहो अपनी मान्यताओं के साथ ये
- 50:30मान्यताएँ तुम्हारा जीवन हो गईं। इन मान्यताओं को तुम कहते हो।
- 50:38कि मेरी भावनाओं को भंग कर दिया दो, मेरे को ₹500,00,00,000 का
- 50:46हार जाना मेरी भावनाओं को आहत कर दिया थी हमने।
- 50:57भावनाएँ गलत हैं। एक बात कहूँ भावना कोई भी सत्य
- 51:04नहीं होती, क्योंकि भावना तुमसे दूर है जहाँ तुम हो वहाँ से बहुत
- 51:14दूर भावना सपेर के ऊपर है। विचार भी स्पीयर पर है, कर्म भी
- 51:22स्पीयर पर होते हैं, परिणाम भी स्पीयर पर आते हैं और तुम बैठे हो
- 51:29केंद्र पर भावनाओं तुमसे बहुत दूर हैं।
- 51:36अगर वो आहत भी हो जाएं तो तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ता।
- 51:43भावनाओं के टूट जाने से केंद्र का कुछ नहीं बिगड़ता।
- 51:47केंद्र बिल्कुल सेफ बैठा है। अपनी मस्ती में मस्त तो एक बात
- 51:54समझ लेना। जो व्यक्ति केंद्र में पहुँच गया
- 51:58वह कभी नहीं कहेगा। मेरी भावनाओं को आहत कर दिया
- 52:04क्योंकि वह भलीभाँति जानेगा। ये भावनाएँ उससे बहुत दूर हैं।
- 52:11परिद्वीप ये हैं भावनाएँ और फिर भावनाएँ तुम बनाते ही क्यूँ।
- 52:18तुम भावनाओं के बिना विचारों के बिना मान्यताओं के बिना बहुत
- 52:23अच्छी तरह से जीवित रह सकते हो जीस तरह से तुम जीवित हो अब भारे
- 52:30भरे से दुखी दुखी से। विचारों से ग्रस्त यह मान्यताओं
- 52:42का परिणाम है। तुम्हारी सभी मान्यताएँ धीरे धीरे
- 52:50गिराएंगे। नागार्जुन।
- 52:54और फिर आखिर में वो मान्यता है वह मान्यता जो जड़ में है तुम्हारे
- 53:03आखिरी मान्यता वह क्या है एक शब्द आता है इनेरतीय।
- 53:13तुमने कभी सुना इनेरसिया इसका अर्थ क्या होता है?
- 53:21इनेरसिया का अर्थ होता है जीवंत निष्क्रियता, फिर सुन लो।
- 53:33बड़ा महत्वपूर्ण शब्द है और उतना ही महत्वपूर्ण कार है इनर्शिया
- 53:45जीवंत निष्क्रियता, बड़ी कमाल की बात है।
- 53:52निष्क्रियता का मतलब तो मृत होता है और तुम कहते हो जीवंत ये
- 53:59विरोधी शब्द दोनों इकट्ठे हाँ यही है नागार्जुन वाद शून्य वाद।
- 54:14निःशक्रिय तो मृदा भी हो जाता है लेकिन जीवंत निष्क्रिय ता इसे
- 54:24हमारी पंजाबी में मर जीवडा भी कहते हैं, है तो जीवंत लेकिन जीते
- 54:30जी मर गया। यह दूसरी भाषा में मर जी वडा
- 54:39नागार्जुन की भाषा में इनर्शिया जीवंत निष्क्रियता तो कुमारी की
- 54:48बात है ये क्या है? जीवंत निष्क्रियता के पास जाना
- 54:54है। पहले सभी मान्यताओं को तोड़ दो।
- 55:02यह मान्यताएँ तुम्हारी बनाई हुई हैं।
- 55:06कोई कहीं से इकट्ठी कर ली, कहीं का ईंट, कहीं का रोड़ा।
- 55:12भानुमती ने कुनबा जोड़ा ये सारा कुनबा तुम्हारा इधर उधर से आया
- 55:17हुआ है कोई शास्त्रों से कोई मार्गदर्शकों से, कोई तुम्हारी
- 55:26अपनी ही सोच से। कोई संतो से कोई तुम्हारे जिनको
- 55:37तुम मानते हो सब उनके हैं तुम्हारे और तुमने सबको इकट्ठा कर
- 55:47लिया। और उसको जीने का एक ढंग बना दिया,
- 55:53लेकिन मूल चीज़ को तुम भूल गए। नागार्जुन तुम्हारी मूल चीज़ पे
- 55:59प्रहार करते हैं। नागार्जुन कहते हैं, एक एक
- 56:04मान्यता को तोड़ते जाओ। जो तुमने माना तोड़ो उनको कुछ भी
- 56:13माना तुमने तोड़ दो और इनेरतीय में पहुँच ही जाओ ओह इनेरतीय क्या
- 56:24है? जीवंत निष्क्रिय था।
- 56:30अब तक हम ऊपर से आ रहे थे। अब हम केंद्र से चलेंगे तो
- 56:35तुम्हें समझाएगा ये जीवत निष्क्रियता क्या है?
- 56:42केंद्र है जीवंत? केंद्र है चेतना चेतना से ऊपर
- 56:51उठोगे परिधि की तरफ जाओगे तो से कृत आनी शुरू हो जाएगी।
- 57:03केंद्र पर पूर्ण निष्क्रियता है निष्क्रियता को दूसरे शब्दों में
- 57:09निर्लिप्तता भी कह देते हैं। नॉन अटैचमेंट इसे गुरुतेग बहादुर
- 57:16कहते हैं। सर्वव्यापी सदा अले प तोहे संग
- 57:28समाय काहे रे बनढुंडन जाए? सत्य को शब्दों में प्रकट करने जा
- 57:40रहा हूँ ये मत बोलना असंभव को संभव करने की चेष्टा में संलग्न
- 57:48हूँ ये मत बोलना कैंटर से। केंद्र के ऊपर परम जीवंतता है तुम
- 57:59परम जीवंत हो तुम परम एनर्जिटिक हो सारा संसार तुमसे एनर्जी लेके
- 58:09चलता है सारा पदार्थ। तुमसे शक्ति लेके चलता है शक्ति
- 58:17के तुम मूलभूत स्वामी हो, केंद्र वहाँ से जाती हैं, सारी शक्ति की
- 58:25तरंगें और सक्रिय करती हैं संसार को।
- 58:34इसका एक शब्द समझना हैं इशारे तुम समझ जाओ तो भाग्यशाली और मैं भी
- 58:44अपने आप को भाग्यशाली मानूंगा क्योंकि ये अंतिम पड़ाव है।
- 58:49नागार्जुन मैंने कहा था अंत में आएँगे।
- 58:54नागार्जुन से पहले सब आ जाएगा। नागार्जुन से पहले सब सब आ जाएंगे
- 59:02और अंत में रह जाएंगे नागार्जुन शून्य बात।
- 59:09सर्ववयापी सदा अलेपा सर्ववयापी सदा अलेपा तोहे संघसम।
- 59:29तोहे संघ समाज काहेरे बनढूं न जाए, वह निर्लिप है।
- 59:51वह कौन जीवंत निष्क्रियता बहुत सहज सहज मैं समझा रहा हूँ क्योंकि
- 1:00:04समझाने का आखिरी दौर आ गया। नागार्जुन आखिरी इसके बाद कुछ
- 1:00:12नहीं बजता। नागार्जुन शून्य बात जहाँ शून्य आ
- 1:00:22गया शून्य केंद्र। नागार्जुन कहते हैं, केंद्र शून्य
- 1:00:33है और केंद्र नृलिप्त है और बड़े मज़े की बात है।
- 1:00:40केंद्र नृलिप्त होते हुए भी सजीव है।
- 1:00:45एनर्जेटिक है, शक्तिमान है और निष्क्रिय है।
- 1:00:56अब इसको समझो, आप निष्क्रियता उसको पाने का ढंग है।
- 1:01:04अब देखिये अगर आप ये बात चूक गए तो स्वयं के तत्वों को भी चूक
- 1:01:12जाओगे और नागार्जुन को समझ नहीं सकोगे।
- 1:01:18नागार्जुन सभी कुछ फेंक देते हैं। नागार्जुन अपने पास कुछ नहीं
- 1:01:26रखते। केंद्र के पास कुछ नहीं रहता।
- 1:01:31केंद्र के पास सिर्फ अस्तित्व होता है, केंद्र सिर्फ होता है,
- 1:01:37केंद्र के पास कुछ नहीं होता। केंद्र सिर्फ एग्ज़िस्टन्स है,
- 1:01:43केंद्र सिर्फ प्रजेंस है। केंद्र सिर्फ होना है जब मैं कहता
- 1:01:56हूँ जीवंत निष्क्रियता ये दो शब्द और इसको खोल दूँ?
- 1:02:04तो तुम्हें समझाएगा सारा मुझे लोग पूछ लेते हैं बाबा जब आपके मुकाम
- 1:02:09पे आते हैं हम तो घर में प्रवेश करते ही एक अजीब तरह की मस्ती भी
- 1:02:17आ जाती है और अजीब तरह की शीतलता भी आती है पैसिविटी?
- 1:02:27यह क्या है? ये दोहरी चीजें क्यों हैं?
- 1:02:32पैसिविटी भी आती हैं, निष्क्रियता घेर लेती हैं और आनंद भी आ जाता
- 1:02:42है। सुरूर भी आता है, मस्ती भी आती
- 1:02:45है, पता नहीं चलता द्वार से लेके आपके कमरे तक कब पहुंचे, कैसे
- 1:02:56पहुंचे, यह क्या है, बस इसे ही मैं कहता हूँ।
- 1:03:03इनर्शिया इनर्षिया का प्रभाव दूर दूर तक होता है जहाँ कोई स्वयं को
- 1:03:17जानने वाला। स्वयं में केंद्रित हुआ।
- 1:03:25व्यक्ति बैठा है, वहाँ से तरंगे निकलने शुरू होते हैं।
- 1:03:32अब देखिए अगर इसको बहुत तरीके से समझोगे तो थोड़ा थोड़ा समझ में
- 1:03:38आएगा। अनीता के ऊपर से गुजर जाएगा।
- 1:03:47मैं निष्क्रिय हूँ, इसलिए बैठा हूँ कहीं जाता है, निःशक्रियता का
- 1:03:55परम चरम स्थान में और। जीवंतता का परम स्थान मैं हूँ परम
- 1:04:10शक्ति रूप में हूँ और परम निष्क्रियता भी मैं हूँ।
- 1:04:22और समझदार लोग तो कहेंगे ये तो नहीं समझ में आ रहा है नहीं आएगा
- 1:04:26समझ में आएगा तो अनुभव में जब तुम उस केंद्र के पास पहुंचोगे तो फिर
- 1:04:37अनुभव में आएगा। उससे पहले तुम बुद्धि से समझने की
- 1:04:43चेष्टा करोगे तो हल्का इशारा मिल सकता है।
- 1:04:50हल्का इशारा मैंने क्यों कहा कि आपको मस्ती आनी शुरू हो, आप खुद
- 1:04:57कहते हैं? और हम हाथ पांव सोनो नहीं शुरू हो
- 1:05:01जाते हैं, निष्क्रिय होना शुरू हो जाते हैं जैसे जान न हो इनमें
- 1:05:07इसलिए अक्सर शिकायत करते हैं लोग बाबा गायत्री मंत्र तो रह गया और
- 1:05:14जो प्रश्न पूछना था। वो तो भूल गए, ऐसा क्यों हुआ?
- 1:05:23ऐसा ही होना स्वाभाविक था। ऐसा ही होना चाहिए जहाँ इनेरसिया
- 1:05:31है जहाँ जीवंत निश्चय क्रियता है। जहाँ एनर्जी भी है और इनएक्टिवनेस
- 1:05:41भी है, पैसिविटी भी है और शक्ति भी है।
- 1:05:47वहाँ ऐसा ही होता है। यह दुविधा तुम्हारी बुद्धि में
- 1:05:51नहीं समझायेगी ये मैं जानता हूँ लेकिन इशारों में अगर आज आए।
- 1:05:59तो भी तुम धन्य बाकी हो और मेरा भी प्रयास सफल मानूंगा मैं अगर
- 1:06:06तुम इशारा भी पकड़ लो तुम इनर्शिया में आ जाओ तो तुम
- 1:06:14नागार्जुन के शून्यवाद को समझ कर। उस सत्येंद्र से लहरें उठती हैं,
- 1:06:23बड़ी मीठी होती हैं जैसे केंद्र की बात करते हैं, बाबा तेग बहादुर
- 1:06:32निर्लिप्त है, वो लिप्त नहीं होता।
- 1:06:37चिपकता नहीं सर्वव्यापी सब जगह व्याप्त है तो अनर्शिया से उठती
- 1:06:48हैं लहरें मीठी एनर्जी के। और वो जब आपको टॅच करते हैं तो आप
- 1:07:01निष्क्रिय हो जाते हो, आपके औजार, बुद्धि सारे हाथ पांव सुन्न होने
- 1:07:09लगते हैं। बुद्धि छोटी इसलिए भूल जाते हो
- 1:07:17हमने क्या पूछना था यहाँ आ जाते हो, दीक्षा ले लेते हो, बैठ जाते
- 1:07:25हो, लेकिन प्रश्न नहीं कर पाते हैं।
- 1:07:34अधूरे अधूरे चले जाते हो। बाद में याद आ जाता है।
- 1:07:41जब इसे गर्व से बाहर चले जाते हो तो याद आता है।
- 1:07:45गायत्री रह गया, यह प्रश्न पूछना था, पास जाकर नहीं पूछ पाए।
- 1:07:55क्या हुआ? तुम भी उस केंद्र के करीब आता है
- 1:08:02क्योंकि तुम्हारे भीतर भी वो केंद्र है सर्वव्यापी, सबके भीतर
- 1:08:09है वो केंद्र। सिर्फ संत के भीतर नहीं होता, संत
- 1:08:14को तो पता चल जाता है संत तो वहाँ पहुँच जाता है, है तो तुम्हारे
- 1:08:20भीतर भी उतना है और यही संत प्रयास करता है कि तुम भी किसी न
- 1:08:26किसी तरह उस इंडर्शिया में पहुँच ही जाओ।
- 1:08:31बड़ा प्यारा है, बड़ा मीठा है, यह जो अनहद की आवाज़ आती है यह उसी
- 1:08:37से उठती है जहाँ तुम विराजमान हो। इनर्शिया से आती हैं ये लहरें और
- 1:08:47तुम्हें और बात बता दूँ एक छोटी सी।
- 1:08:54क्योंकि मैं स्वयं के अनुभव से कहता हूँ, जो कुछ कहता हूँ, जब
- 1:09:02मैंने प्रथम बार अनाहतनाद के बारे में बोला उसके बाद अनाहतनाद की
- 1:09:08बौछार लग गया। मैं नहीं जानता।
- 1:09:13इनके भीतर अनाहत शुरू हुआ कि नहीं हुआ, लेकिन मैं बिल्कुल कह सकता
- 1:09:20हूँ, ईमानदारी से कह सकता हूँ 100% सत्यता से कह सकता हूँ कि
- 1:09:29मुझको ट्रैन दुर्घटना के बाद घटना कहूंगा, दुर्घटना नहीं।
- 1:09:34न अच्छी घटना थी, न बुरी घटना थी। सत्य में तो बहुत आश्चर्यजनक घटना
- 1:09:39थी, उसके बाद कुछ ही दिनों में मुझे नाद शुरू हो गया था।
- 1:09:51तो इस नाद का मैं जितना आनंद चखा हूँ, वह आपसे कह नहीं सकता है
- 1:10:00इसका रोमा रोमा मैं जानता हूँ ये क्या है कहाँ से उठता है क्या कुछ
- 1:10:05होता है इससे जिसके नाद शुरू हो गया।
- 1:10:12वह थोड़ा सा भीतर जाके जो सोचेगा वो हो जाएगा अगर कोई दरिद्र है,
- 1:10:23अगर कोई कंगाल हो गया। और उसके नाद शुरू है, तो वह थोड़ा
- 1:10:32अपने भीतर जाए, बाहर न भटके अपने भीतर जाके यह सोच भर ले कि मैं
- 1:10:45कंगाली से मुक्त हो जाऊं। त्रिद्र हीन हो जाऊं त्रिद्र हीन
- 1:10:51हो जाऊं त्रिद्रता न रहे मैं खुशहाल हो जाऊं मैं अमीर हो जाऊं
- 1:11:00तो तुम हो जाओगे ये बात नई है तुम्हारे लिए आज।
- 1:11:07लेकिन बहुत से व्यक्ति आ जाते हैं।
- 1:11:10परेशानी है बाबा ध्यान में नहीं जा सकते।
- 1:11:16क्या करें? वक्त नहीं बचता।
- 1:11:19क्रिया योग के दिया है। वक्त नहीं बचता, ध्यान में जाने
- 1:11:23का है। यह छोटी मोटी बिमारी है।
- 1:11:27किसी को कोई तकलीफ है, किसी को कोई तकलीफ, रोज़ मेरे मैसेज आते
- 1:11:31हैं, तुम जो मुझे कहते हो बाबा मैं बीमार हूँ मेरी धर्मपत्नी
- 1:11:39बीमार है, बेटा, बेटी, बीमार है या मेरा रिलेटिव बीमार है।
- 1:11:46या इस समस्या से जूझ रहा है तो जो मैं करता हूँ वो तुम ही कर रहे हो
- 1:11:54आसान बता देता हूँ क्योंकि आज मैं हूँ सदा तो मैं नहीं रहूंगा ये
- 1:12:02ध्यान रखना। लेकिन मेरा बताया हुआ फॉर्मूला
- 1:12:08सदा रहेगा। ये तुम आगे की आगे फॉर्वर्ड करते
- 1:12:13रहना कंजूस मत बनो, तुम्हारा कुछ नहीं जाता, यह ऐसा फ़ॉर्मूला है
- 1:12:23जिससे तुम्हारा कुछ गठता नहीं। प्रोबकार की बातें बताने से कबीर
- 1:12:32कहते हैं, चिड़ी चोंच भर ले गई, नदी न घटी और नीर दान दिए।
- 1:12:39दान न बटे कह के भक्त कबीर। ये दान इस तरह के दान तुम्हारा
- 1:12:49कुछ नहीं घटता। अगर यह फॉर्मूलेशन तुम आगे बढ़ा
- 1:12:55दोगे, फॉर्वर्ड कर दोगे, तुम्हारा कुछ नहीं घटेगा और मैं बोलता हूँ
- 1:13:02यूट्यूब के ऊपर पड़ा रहेगा। लेकिन कोई पता नहीं कल कोई यू
- 1:13:07ट्यूब भी भ्रष्ट हो जाए। कोई पता लगता है कुछ पता नहीं
- 1:13:11क्या होगा? अतीत काली माँ से ग्रस्त है और
- 1:13:20भविष्य भी काली माँ से ग्रस्त है। भविष्य में क्या होगा?
- 1:13:28कोई नहीं जानता आने पर पता चलता है कि ये होना था तो तुम मुझे
- 1:13:38कहते हो मैं क्या करता हूँ मैं उस स्थल पर जाकर जिसे तुम फरियाद
- 1:13:42कहते हो? महावीर उसे संकल्प कहते हैं, वहाँ
- 1:13:48जाकर मैं संकल्प करता हूँ, इस व्यक्ति का ये कष्ट यह खत्म हो
- 1:13:58जाए। नष्ट हो जाए।
- 1:14:05अब यह बात समझ लेना अगर तो तुम्हारे कर्मों का परिणाम है,
- 1:14:15फिर तो वह नहीं खत्म होगा। मेरी फरियाद बेकार हो जाएगी।
- 1:14:21मेरा संकल्प कोई काम नहीं करेगा, थोड़ा सा काम करेगा कितना 10%
- 1:14:30सिर्फ और 10% आराम का तुम्हें पता भी नहीं चलता इसलिए मैं कहता हूँ
- 1:14:38कोई काम नहीं करेगा। 10% काम तो करेगा संकल्प कहीं ना
- 1:14:43कहीं तो काम करता है, इतना का आराम तो तुम्हें मिलेगा, लेकिन
- 1:14:49पता नहीं चलेगा तुम्हें अगर यह तुम्हारे कर्मों का प्रतिफल आया
- 1:14:56है तो। और अगर कर्मों के बिना और भी बहुत
- 1:15:03सी चीजें हैं कुछ किया कराया कोई गलत रहो तुम्हारे में से निकल गई।
- 1:15:15ये पापी रोगियों फिरती हैं। हिटलर कहाँ जाएगा यहीं भरता है वह
- 1:15:22सड़ती हुई बदबू से भरी हुई सूक्ष्म शरीर है जिसे तुम दे ही
- 1:15:34कह लो बदबू आती है। वो तुम्हारे बीच में से गुजर गया,
- 1:15:41तुम्हें पता भी नहीं चलता वह इतनी सूक्षम है लेकिन तुम्हें वो
- 1:15:47रूपांतरित कर जाएगी। तुमने कभी देखा अचानक सतम बहुत
- 1:15:53खुश मूड में होते हो। अचानक सतम?
- 1:15:57मरने की सोचने लगते हो कि इससे तुम मर जाए तो अच्छा है क्या हुआ?
- 1:16:04तुम्हें नहीं पता कि कोई हिटलर जैसी रूह तुम्हारे भीतर से निकल
- 1:16:11गई है और वो अपनी बदबू छोड़ गई है।
- 1:16:19वह बदबू तुम्हारे विचारों को बदल देगी।
- 1:16:22बड़ी गहरी बातें हैं लेकिन ये होती हैं इसलिए मैं कहता हूँ और
- 1:16:31तुम्हारे डॉक्टर्स तुम्हारे ओझा इनके पास कोई।
- 1:16:35हल नहीं है। इन चीजों का बहुत गहराई की बातें
- 1:16:41हैं। मैं बता सकता हूँ इसलिए तुम्हें
- 1:16:44बताता हूँ अचानक से तुम दुखी बैठे हो, तुम सुखी हो जाते हो, प्रसन्न
- 1:16:53हो जाते हो क्या हुआ? कोई तब्दीली तो हुई नहीं।
- 1:16:58कोई अच्छी रो, कोई सुगंधित रो जिसने पुण्य ही पुण्य किया है,
- 1:17:11कोई ऐसी रो। कोई ऐसा दे ही जिसने अपने को जान
- 1:17:15लिया वो बीच में से निकल गई है। इसलिए हम आवाहन करते हैं देवताओं
- 1:17:21का। इसलिए हम राक्षसों को प्रणाम करते
- 1:17:25हैं कि तुम तो भाई दूर ही रहना। तुलसीदास ने कहा है।
- 1:17:31कि ये जो दुर्जन है इनसे तो मैं क्षमा चाहता हूँ, तुम तो दूर ही
- 1:17:35रहो और जो सज्जन हैं उनको मैं बुलाता हूँ।
- 1:17:39एक बार आह्वान करता हूँ, तुम आ जाओ।
- 1:17:45वो इस बात को समझ गए थे। कहीं न कहीं यह देवता जब भीतर से
- 1:17:49निकल जाएंगे। ये बड़े सूक्ष्म में पारदर्शी
- 1:17:53होते हैं। शीशे के भीतर से भी गुजर सकते
- 1:17:58हैं, लेकिन इनकी सुगंधी तुम्हारे भीतर हो जाएगी।
- 1:18:04तो देवताओं का आह्वान करने का यही मतलब था और कोई मतलब नहीं था।
- 1:18:11देवता जब तुम्हारे भीतर से गुजर जाएगा, तो वह अपनी सुगंधी की छाप
- 1:18:16छोड़ जाएगा और दुष्ट राक्षस जब तुम्हारे भीतर से गुजर जाएगा और
- 1:18:24तुम्हारे भीतर को विषाद छोड़ जाएगा।
- 1:18:28तुम दुखी हो जाओगे बिना कारण के दुखी हो जाओगे, ऐसा होता है मैं
- 1:18:35क्या करता हूँ जब तुम मैं पढ़ता हूँ तुम्हारी मैसेजस को, इसलिए
- 1:18:43मैं तुमसे यह कहता हूँ कि जो तुम लिखते हो ना बाबा जी सुबह कि राम
- 1:18:46राम? शाम की ये पकौड़ा खा लो ये समोसा
- 1:18:52खा लो ये चाय पी लो या व्रत की बकवास ये मत लिखा करो जरूरतमंदों
- 1:19:02के प्रश्न रह जाते हैं। जरूरतमंदों की आस्तें रह जाती हैं
- 1:19:10तुम्हारी राम राम से मैं खुश नहीं होता, लेकिन जरूरतमंदों के कमेंट
- 1:19:20पढ़ने से वंचित हो जाता हूँ। सीमित वक्त है मेरे पास।
- 1:19:27इसलिए तुम कृपा किया करो लेकिन तुम हटते नहीं।
- 1:19:29क्या करूँ मैं? फिर वही राम राम शुरू हो जाती है।
- 1:19:34फिर वही परिणाम शुरू हो जाते हैं और देखो तकलीफें इनके ऊपर भी आती
- 1:19:38है। राम राम करने वाले ऐसा नहीं है कि
- 1:19:42इनके ऊपर तकलीफें नहीं आती आती? फिर यह चाहते हैं कि हमारी
- 1:19:47तकलीफों को भी वापस सुने। अब मुझे उलझा तो लिया तुमने कहीं
- 1:19:53हाथ जोड़ रखे हैं, कहीं दंडवत परिणाम हो रहे हो, कहीं चाय समोसा
- 1:19:58खिला रहे हो तो तुम कैसे सोच सकते हो?
- 1:20:02मैं इतने व्यक्तियों का कमेंट सभी पढ़ लूँगा।
- 1:20:06इसलिए मैं कहता हूँ कि तुम जाने अनजाने पाप करते हो।
- 1:20:12लोग तुम्हें कहेंगे कमेंट करो, मैं तुम्हें कहता हूँ ना करो ये
- 1:20:20व्हाट्सएप को भरना तुम पाप करते हो।
- 1:20:23क्योंकि ये है दीन दुखियों के लिए दुखी व्यक्ति यहाँ अपने दुख
- 1:20:31लिखेगा, तकलीफ लिखेगा और तुम राम राम लिख रहे हो, तुम कही हास से
- 1:20:36उठ रहे हो, तुम कही लेटे हुए दिख रहे हो, क्या फर्क पड़ता है, उससे
- 1:20:42कोई फर्क नहीं पड़ता। बहुत बार का है लेकिन तुम रुकते
- 1:20:47नहीं। मैं क्या करूँ इससे किसी जरूरतमंद
- 1:20:52की बेचारे का जो मैं फरियाद कर सकता था, शायद उसकी तकलीफ कम हो
- 1:20:58जाती और हो सकता है नष्ट ही हो जाती।
- 1:21:02मुझे ऐसे भी मैसेजस आ जाते हैं बाबा आप तक तकलीफ पहुंचे, हम ठीक
- 1:21:10हो गए तो मन को एक सुख मिलता है और आपके परिणाम को देखकर।
- 1:21:20मन में तकरीफ होती है। मैं सच बताता हूँ तुम्हें दूसरे
- 1:21:27बढ़िया की समस्या का है। दूसरे कहते होंगे हमें लिखा करो,
- 1:21:31मैं नहीं कहता क्योंकि मेरे भीतर की करुणा ये इजाज़त नहीं देती।
- 1:21:39कि तुम मुझे राम राम करो, मैं तो रोटी भी नहीं खाता, तुम समोसा
- 1:21:45खिलाओ मुझे ये वक्त को खराब करने जैसी बातें हैं तो जब तुम अपना
- 1:21:54दर्द दुख मुझे बताते हो। तो मैं उस स्तर पर जाकर संकल्प
- 1:22:03करता हूँ जिसे तुम फरियाद भी कर सकते हो फरियाद जैसे तुम करते हो,
- 1:22:10वैसे नहीं होती, तुम तो कोई लफाजी करते हो।
- 1:22:16उसमें जीवन नहीं होता, उसमें जान नहीं होती, कोरी लफाजी होती है,
- 1:22:22सही पूछो तो फरियाद सिर्फ संत ही कर सकता है, क्योंकि उसके भीतर
- 1:22:29संकल्प है। वह उस स्तर पर जाकर संकल्प करेगा
- 1:22:33जहाँ मैं रोज़ कहता हूँ, उस जंक्चर फ्लाइट में जाकर जो मर्जी
- 1:22:36वहाँ लो तो वहाँ जाकर तुम्हारे दुखों का नाश भी मांगा जा सकता
- 1:22:44है, तो क्यों वक्त खराब करते हो? मुझे आशा है इतने सख्त अलफाज़
- 1:22:54बरतने के बाद तुम आज के बाद ऐसा कुकृत्य नहीं करोगे।
- 1:23:01बाबा जी रामदेव चरन स्पर्श। कोई आदमी खड़ा दिखा दिया, उसके
- 1:23:08पैर पकड़ते दिखा दिए, लिठते हुए दिखा दिया।
- 1:23:12ये गलत है ऐसा मैं अपेक्षा भी नहीं करता और इन चीजों को मैं
- 1:23:17बुरा मानता हूँ। कोई बेचारा असहाय जिसकी मैं
- 1:23:23सहायता करना चाहता हूँ। लेकिन वक्त तो वही 24 घंटे है ना?
- 1:23:28उसी के अंदर ही मुझे चलना होगा तो तुम कृपा कर दो तो ज्यादा बढ़िया
- 1:23:35रहेगा लेकिन तुम मानने वाले हो नहीं मैं करूँ क्या?
- 1:23:43आशा है तुम्हें समझाएगी? मैं उस तल पर जाकर संकल्प करता
- 1:23:48हूँ उसे नाम तुम फरियाद दे दो उसे नाम तुम कुछ भी दे सकते हो,
- 1:23:56प्रार्थना भी कर सकते हो और अगर वो उस तल पर जाकर फरियाद हो जाती
- 1:24:03है। तो निश्चित ही तुम मुक्त हो
- 1:24:06जाओगे। इन दुःखों से एक शर्त मैंने पहले
- 1:24:11ही बता दिया। तुम्हारे प्रारम्भ के कर्मों का
- 1:24:15फल नहीं होना चाहिए, राहत उनसे भी मिलेंगे, लेकिन मिलेंगे 10%।
- 1:24:24और 10% काउंट नहीं होती तो उस तल पर तुम खुद ही जाकर जाना सीख लो।
- 1:24:36एक तो तुम्हारी ये जो मान्यताएँ हैं, ये टूट जाएंगी और न जाने तुम
- 1:24:43किसी भाग्यशाली क्षण में भीतर छलांग ले लो और तुम्हें पता ही चल
- 1:24:48जाए मैं हूँ कौन यह आखिरी मान्यता है तुम्हारी यही कहते हैं
- 1:24:59नागार्जुन तुम शून्य हो जाओ। आखरी मान्यता तुमने तोड़नी है
- 1:25:06क्या? मैं हूँ कौन?
- 1:25:11तुम्हारे सभी दुख, दर्द, तकलीफें, क्लेश, कष्ट, चिंताएं, चिंतनय, आग
- 1:25:18सब समाप्त हो जाएंगे। जब तुम जान लोगे तुम हो कौन?
- 1:25:22वास्तु में तुमको मान क्या रहे हो तुम्हारी मान्यता तो गलत है
- 1:25:30तुम्हारे दुख बताते हैं कि तुम्हारी मान्यता गत है प्रकाश
- 1:25:35तुम भीतर छलांग लगा लो, ये जान लो कि तुम हो कौन ये होगा?
- 1:25:41मान्यताओं के समाप्त होने पे और नागार्जुन कहते हैं, शून्य हो जाओ
- 1:25:50शून्य बात तो उस इनर्शिया से लहरें उठती हैं।
- 1:25:58अगर सभी व्यक्तियों से नरक्ष्या में जाना शुरू हो जाए तो ये धरती
- 1:26:05एक पल में स्वर्ग हो जाएगी। लेकिन तुम तो बाहर झंडे उठा के
- 1:26:11फिर रहे हो, फलानी पार्टी जिंदाबाद, फलानी पार्टी
- 1:26:16मुर्दाबाद। तुम्हें इन बातों से निजात नहीं
- 1:26:20मिलती भक्त नहीं मिलता। तुम संत की बातों पर या तो यकीन
- 1:26:30नहीं करते या तुम अभी चाहते नहीं वहाँ जाना दोनों में से कोई एक
- 1:26:36बात है या तो तुम जानते नहीं कि परमात्मा है।
- 1:26:42या तुम मानना चाहते नहीं कि वो है दोनों में से कोई बात नहीं।
- 1:26:47अब मार्कस ऐसा नहीं कि वो जानते हैं कि परमात्मा नहीं है नहीं, वो
- 1:26:52जानते नहीं, लेकिन वो परमात्मा तक जाना चाहते नहीं।
- 1:26:58ये अलग बात है, तुम स्वतंत्र रहो। तुम नहीं जाना चाहते तुम मत जाओ
- 1:27:04ये तुम्हारी अपनी स्वतंत्र इच्छा है इनेरशिया अब बात पूरी समाप्त
- 1:27:16नहीं होगी क्योंकि फिर डेढ़ घंटे की वीडियो हो गई है।
- 1:27:21फिर अगला पड़ाव हमें छूना होगा। इनरशिया में बहुत कुछ बताना बाकी
- 1:27:29है। अभी ये भी बताना बाकी है कि मुझे
- 1:27:34कहा गया कि कम्युन मत बनाना है। लेकिन महावीर बुद्ध 50,000 लोगों
- 1:27:43का कमीन साथ लेके क्यों चलते हैं? बहुत से प्रश्न बाकी रह गए।
- 1:27:48अभी नागार्जुन का शून्य वध ऐसे समाप्त नहीं हो जायेगा।
- 1:27:54हल्के में बहुत कुछ तुम्हें दे के जायेगा।
- 1:28:00ये अंतरिम है और इसके जानने से सब जान लिया जाएगा।
- 1:28:09वक्त इजाजत नहीं देता, इससे ज्यादा तुम देख भी नहीं पाओगे, कल
- 1:28:15तक के लिए फिर छोड़ें इसको। फिर शून्य बाद कल यहीं से शुरू कर
- 1:28:20देंगे। श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी।
- 1:28:33नाथ नारायण, वसुदेव।