Latest / Baba ji Vijay Vats / 23 Feb 25 - आस्तित्व के करीब कैसे जाएं? जपजी साहिब का गूढ़ अर्थ! Japji Sahib Paudi 18 Secret.
Transcript
- 0:19कंवर पाल बाबा जपजी साहब की अट्ठारहवीं कौड़ी मुझे बड़ी गफलत
- 0:36में डाल जाती है कृपा करके आप अपने ढंग से।
- 0:43समझाने का कष्ट करें असंख मूर्ख अंध कोर।
- 1:15व्यक्ति के तल एक तल नहीं होता है।
- 1:24यहीं से शुरू करते हैं बाबा व्यक्ति के तल अनंत होते हैं।
- 1:33अपनी भाषा में अशंख कहते हैं उसे बाबा अशंख
- 1:50आप भी सुबह से शाम तक एक तल पे नहीं रहते अगर कोई महान विद्वान
- 1:59व्यक्ति को। छोटे बच्चे से बात करता हुआ देख
- 2:04लेगा तो वह इस गलती में ना पड़े कि जो वह छोटे बच्चे से बोल रहा
- 2:13था वह उसकी समझ है नहीं। छोटे बच्चे से आप और ढंग से बात
- 2:25करेंगे। तोतला के बात करेंगे।
- 2:30तोतली भाषा जो बालक कह तोतली बता सुनत हसत।
- 2:39पितु और माता माँ बाप बड़े हँसते हैं क्योंकि समझाने की चेष्टा
- 2:45करता है वो बच्चों से बात करोगे तो उसी तरह से करोगे, कितने ही
- 2:53समझदार हों। अगर वो व्यक्ति आपको बच्चों से
- 2:57बात करता हुआ देखकर आपका सही अस्तित्व मान ले तो वह गलत है।
- 3:07यही बात बाबा शुरू कहते हैं, जपजी साहब की अट्ठारहवीं।
- 3:15अशंका कोई गिनती नहीं है, तुम अपने अफसर के साथ और व्यवहार करते
- 3:26हो, सैल्यूट मारते हो? अपने नौकर के साथ तुम तानाशाह हो
- 3:35जाते हो, अपनी घरवाली के साथ कुछ नहीं बोलेंगे, अलग अलग तरह के लोग
- 3:44हैं असा मत करो। बच्चों के साथ और तरह का छोटे
- 3:53बच्चों के साथ, और तरह का माता पिता के साथ और शिक्षक के साथ और
- 3:59सुबह से शाम तक आपके असंख्य व्यवहार बदल जाते हैं।
- 4:03आपको पता भी नहीं चलता आप खुद यह मानते हो कि मैं एक हूँ।
- 4:12बाबा कहते तुम एक नहीं हो, तुम्हें पता ही नहीं चलता,
- 4:17तुम्हारा तल कब बदल गया? यहाँ से शुरू करते हैं असंख्य
- 4:29अनंत जो गिने न जा सकें। संख्या में नहीं आती।
- 4:33उनको कहते हैं बाबा असंख अगर इसको आध्यात्मिक भाषण में लें तो इसका
- 4:44अर्थ है के बुद्धि के तल से वास्तविक तल तक जाते जाते।
- 4:53आपके असंख्य तल बदल जाते हैं। छोटी सी शेक्सपियर की कहानी से
- 5:03मैं शुरू करूँगा विलियम शेक्सपियर लिखते हैं कि मैं।
- 5:12चर्च में हर संडे जाया करता था, नया बाद्री आया था, बहुत सुंदर
- 5:22बोलता था मीठा जो बोलता समझ भी आता, हृदय द्रवित भी हो जाता और
- 5:29कभी कभी रोना भी आ जाता। तो मुझे उसको सुनना बड़ा अच्छा
- 5:37लगता था जब मैं चर से जाता चर से वापस जब मैं आता तो बाजार से
- 5:50सामान लेके आता हूँ घर बार का सामान।
- 6:00एक बार पांच का सिक्का $5 शेक्सपियर कहते मैं चला बाजार से
- 6:13समान भी ले आएँगे। और सुन भी आएँगे।
- 6:20उसका बोलना अच्छा लगता था। मैं बैठ गया, बोलना शुरू हुआ।
- 6:33धीरे धीरे बोलता क्या? शेक्सपियर लगते हैं वह बोलता गया,
- 6:42मैं अपने भीतर डूबता गया, बोलता गया मैं भीतर डूबता गया, एक बार
- 6:50ऐसा निश्चय हुआ। कि ये जो $5 में लेके आया घर से
- 7:00जब थाली आएगी बाद में थाली आती थी तो खुशी से ये $5 उसको दे दूंगा
- 7:12$5 बहुत होते थे उस वक्त शेक्सपियर के जमाने में।
- 7:23बोलता गया, सुनता गया पांच ही डॉलर मैं आज जब इसकी थाली आएगी,
- 7:28उसमें डाल दूंगा। मैं सुनता गया, वह बोलता गया।
- 7:35लेकिन बीच में खोपड़ी काम करने लग जाती है, आपकी भी खोपड़ी काम करती
- 7:39है। आपको पता नहीं चलता यही कबीर ने
- 7:45कहा हर तरफ आपका मन दौड़ता है। माला तो कर में फिरे जीव फेरे
- 8:01मुकम्मा मनीराम या तो मन कहता, $5 थोड़े ज़्यादा हो जाएंगे ऐसा करते
- 8:20हैं। $5 रख दूंगा और $3 उठा लूँगा $2
- 8:31रह जाएंगे उसके पास समय और बीता इसलिए संत पुरुष कहते हैं, अगर
- 8:42कोई दान की भावना किसी वक्त आ जाए तो ततक क्षण निपटा देना।
- 8:50उसे शुभ भावना, कोई आए और अगर अशुभ भावना जाए।
- 9:03किसी को हानि पहुंचानी, किसी का नुकसान करना, किसी को मारना काटना
- 9:13तो फिर कहते है दो घड़ी ठहर जाना, दो घड़ी ठहर जाना।
- 9:24क्योंकि मन बदलता है ऋषि जानता है मन हर पर बदलता है, बदलने का नाम
- 9:34ही मन तो शेक्सपियर कहते है वो बोलता क्या है, मैं सुनता क्या?
- 9:46लेकिन मन तो अपनी ही उधेड़बुन में लगा है सामान भी खरीदना है, सारा
- 9:54सामान खरीदना है रविवार है तो ऐसा करूँ क्या?
- 10:02$1 रख दूंगा, चार उठा दूंगा बस लोग तो $1 भी नहीं देते हैं, कुछ
- 10:08पेन्स ही देते हैं तो सिक्स पर लिखते हैं कि धीरे धीरे जब थाली
- 10:17आयो मेरे पास। तब मैंने उस थाली में से कुछ
- 10:30सिक्का उठा लिया रखने थे $5 जब थाली आई।
- 10:40तो मन में लो भाग गया। उस दिन पैसा काफी चढ़ा था।
- 10:46कहता है कि मैंने $5 उठा लिया। संत ऐसे ही होते हैं, अपनी चोरी
- 10:59को भी बता देते हैं। जिन्हें तुम बुरा कहते हो,
- 11:07जिन्हें समाज बुरा कहता है, संत उसे प्रकट कर देता है, क्यों वह
- 11:14जानता है, संत जानता है कि तुमसे तो छुपा लिया।
- 11:21लेकिन दो आँखें मुझे लगातार निहार रही हैं।
- 11:24भीतर उनसे न बच पाऊंगा। लोग मुझे कह देते हैं कि हत्या
- 11:36करके ही झुक जाती हैं लोग इन्हें दंड नहीं मिलता।
- 11:42इनके साथ न्याय कैसे होता होगा? वो ही बाबा कहते हैं कि तुम मूर्ख
- 11:52हो अंधेर। तुम्हें पता नहीं तुम सिर्फ यह
- 11:59जानते हो कि यही जन्म है और बहुत से धर्मों ने तो माना है इससईयत
- 12:06मानती इस्लाम मानता का बस एक ही धर्म है, उसका कारण है एक ही जन्म
- 12:13है उसका एक बहुत बड़ा। उसका कारण ये है कि निपटा दो इसी
- 12:22जन्म में क्योंकि मन बड़ा चालाक है।
- 12:27मन को अगर समय दे दिया जाए तो मन कहता कोई बात नहीं करने गए।
- 12:35अब ये बहुत जन्मों की यात्रा है। मेरे पास लोग आ जाते हैं, उनके
- 12:44साथ ही छोड़ने वाले आ जाते हैं। मैं कई बार पूछ लेता हूँ उनका औरत
- 12:51देखकर आपको भी दीक्षा दे दूं। नहीं बाबा मैंने दीक्षा नहीं
- 12:57रहनी, अब मन कहता है इतनी जल्दी क्या है?
- 13:09इतने जन्म हैं फिर देख लेंगे आप, नहीं तो कोई और गुरु मिल जाएगा।
- 13:18तू नहीं और सही और नहीं और सही तू अगर है हरजाई तो अपना भी यही दौर
- 13:24सही इस्लाम ने रिसाइयत ने कहा एक ही
- 13:38जन्म होता है इसका अर्थ ये नहीं कि एक ही जन्म होता है।
- 13:47इसका गहरा अर्थ ये था कि बस जल्दी निपटा दो तोड़ दो।
- 13:56इन बेड़ियों को अगर आज नहीं तोड़ोगे तो कब तोड़ोगे?
- 14:07अगर आज नहीं तो फिर कभी ना और मन तो बड़ा आलसी है।
- 14:16मन कहता है कल कर लूँगा। जहीरावन ने कहा था आज का काम कल
- 14:23पर मत छोड़ लक्ष्मण को उपदेश देते हुए ये शब्द कहा कि भईया आज का
- 14:30काम कल पर मत छोड़ निपटा लेनो क्योंकि कल का कोई भरोसा नहीं।
- 14:38आय के न आय। मैं भी यही समझता था देखो बिना
- 14:43काम निपटाए जा रहा हूँ, तो इस्लाम किसी कारण से कहा एक जनम है।
- 15:04पहले से ही बहुत देर हो गई। उठो कब जागोगे मन बाई मन सुबह की
- 15:15हवाएं ठंडी लगती हैं। मन कहते हैं रात को नींद ठीक से
- 15:23आई नहीं तो अब इन ठंडी हवाओं का आनंद ले लूँ।
- 15:27गहरी नींद आएगी सो जाऊं आनंद ले लूँ, मौज ले लूँ।
- 15:32जागना तो सारे दिन है तो जिन्होंने यह बात कही।
- 15:41संत पुरुषों के शब्दों का हूबहू अर्थ नहीं लेना चाहिए।
- 15:47आप सूख जाते हैं। वह नानक कहते हैं, एक ग्राम में
- 15:54जाके उजड़ जाओ, उजड़ जाओ। इसका मतलब क्या था?
- 16:00उजड़ जाओ नहीं, इसका मतलब कुछ और था और अगले ग्राम में जाते हैं।
- 16:08कहते कहते बसे रहो बसे रहो तो इसका के अर्थ था बसे रहो का के
- 16:15अर्थ था जो तुम समझते अबोव नहीं था।
- 16:19कुछ और था जिन्हें कहते उजड़ जाओ। वह भले लोग थे जहाँ जाएंगे, भलाई
- 16:27फैलाएंगे जिन्हें कहते हैं बसे रहो वह बुरे लोग थे जहाँ जाएंगे
- 16:34बुराइ फैलाएंगे। इसलिए संत आपने देखा फेरी वाले
- 16:48संत एक जगह नहीं टिकते इनको हम फकीर कहते हैं, आज यह कल वहाँ।
- 17:01जोगी बाला हीरा गोमक्कड़ संत जहाँ जाएंगे, तरंगे छोड़ के जाएंगे,
- 17:17घूमते ही रहता है। तो संतों के कहे हुए शब्दों को भी
- 17:24भू बहू मत ले लेना। अक्सर अर्थ गलत होते हैं तो अगर
- 17:36इस आयत में। इस्लाम ने कहा कि एक ही जन्म होता
- 17:40है, इसका अर्थ कुछ और है, इसका अर्थ गिफ्ट अभी नहीं करोगे तो फिर
- 17:49कब? उठ जाग मुसाफिर, अब रहने कहा जो
- 18:10सोवत है। उठ जागे मुसाफिर और भाई अब रहन
- 18:26कहाँ जो सो तू? जो सोवत है सो खोवत है जो जागत
- 18:42है, सो पावत है जो सोवत है। सो खोवत है जो जागत है सो पावत
- 19:02है, उठ जाग मसा, फिर बोर है। अब नहीं तो फिर कब तो शेक्सपियर
- 19:21लिखते हैं जो काम भलाई का मन में अगर कोई आ जाए तुरंत निपटा देना।
- 19:33मेरा फर्ज़ बनता था, मैं तुरंत उठता और $5 उसकी थाली में चढ़ा
- 19:41देता और वापस चला जाता। बस यही काम आता वो पांच जो उठाई
- 19:49वो काम नहीं आया। बुरा आये तो ठहर जाना, क्योंकि
- 19:58तुम्हें पता है तुम किसी का बुरा करके अपना ही बुरा कर रहे हो।
- 20:07ये तुम्हें बाद में किसी क्षण में समझ आएगा।
- 20:10लेकिन आज समझ में नहीं आता तो फिर संतो ने आपको सरल वचन कह दिया,
- 20:19बुरा आए तो ठहर जाना दो गाड़ी और भला आए तो तुरंत निपटा देना।
- 20:29जब तुम ठहर जाओगे, देखोगे बुरा करने की भावना धीरे धीरे क्षण हो
- 20:35जाती है और एक वक्त आता है कि बुरा करने की भावना रहती है।
- 20:45संत बड़े समझदार हैं। आइए हम अट्ठारहवीं बूढ़े पे चल
- 21:03बड़े गहरे अर्थ हैं अच्छा हुआ आपने पूछ लिया अध्यात्मिक अर्थ
- 21:09इसका लेकिन सुन लेना। आध्यात्मिक अर्थ थोड़े गहरे
- 21:19रहस्यत्मा को होता है। असंख मूर्ख अंध को अनगणित जिनकी
- 21:38कोई संख्या। मूर्ख हैं अंधे इसका अर्थ क्या
- 21:48है? इसका अर्थ जो तुम सोचते हो एक
- 21:58शब्द में कबीर का उठा लूँ सभ्य स्याने एक मत।
- 22:05मूर्ख अपने अपने अज्ञानी को मूर्ख कहते हैं नानक अज्ञानी जिसने सत्य
- 22:16जाना नहीं, वह अज्ञानी और जिसने सत्य जाना नहीं, वह मूर्ख।
- 22:26असंख मूर्ख अंध वहीं अंधे क्योंकि ज्ञानी हुए बिना आँखें नहीं
- 22:34मिलते। जब तुम ज्ञान को उपलब्ध होते हो
- 22:39तभी तुम सजा के होते हो। तभी तुम्हें आँखें मिलती हैं सही
- 22:51सही सटीक अख तभी तुम अंधे से सजा के होते हो, नैनो वाले होते हो
- 23:04उससे पहले तुम अंधे हो। असंखमूर्ख अंध कोर देखा जाए।
- 23:15सभी शास्त्रों का दो शब्दों में अनुवाद किया जा सकता है।
- 23:23वही वही शब्दों के अर्थ शब्द अलग है।
- 23:29अंधा भी हुई है, मूर्ख भी हुई है जिसने खुद को जाना है पहचाना
- 23:34नहीं, वही अंधा, वही मूर्ख असंख्य चोर हरामखोर।
- 23:49क्रांतिकारी अर्थ है इनके गहरे, यह अर्थ बुद्धि के नहीं, बाबा
- 24:02कहते हैं कि तुम असंख्य। तल बदलते हो, रोज़ जो चलते हो
- 24:09बुद्धि की ऊपरी कगार से सतह से जो जो गहरे पानी में उतरते हो,
- 24:17तुम्हारे तल बदलते जाते हो और तल बदलते जाते हैं।
- 24:23तो वहाँ से बोले गए शब्दों के अर्थ अलग हो जाते हैं, वही समझदार
- 24:35आदमी जब बच्चों से बात करता है और जब ज्ञानियों से शास्त्र अर्थ
- 24:41करता है तो बिलकुल अलग व्यक्ति होते हैं।
- 24:47क्योंकि तल बदल लेता है। बाबा कहते हैं तुम दिन में हजारों
- 24:54बार तल बदलते हो, तुम चोर हो, तुम हरामखोर।
- 25:09इसका मतलब क्या है? ध्यान रखना, नानक बात कर रहे हैं
- 25:19आपके असंख्य और असंख्य कौन आप? संत तो असंख्य संत गिनती कह आप
- 25:34असंख्य हों, जिनकी आँखें नहीं मिलीं, जिनको जो अभी मूर्ख हैं,
- 25:43अंधे हैं। उनकी बात करते हैं बाबा अशांक
- 25:51असंख चोर हरामखोर अपनी बात नहीं करते बाबा?
- 26:07बड़ा प्यारा अर्थ निकलेगा इसका ध्यान से समझना जब तुम उन अंतरंग
- 26:16ऊंचाइयों को छू लोगे तो आप पाओगे सभी मैं हूँ।
- 26:31दूसरा कोई नहीं दादू दूजा कौन है मैं ही मैं हूँ दूसरा कोई नहीं
- 26:44है। अशंख?
- 26:51लेकिन बाबा कहते हैं सभी उसे तल पर नहीं पहुंचते हैं।
- 26:57सभी उन ऊंचाइयों को ग्रहण नहीं करते और जब तक ग्रहण नहीं करते तब
- 27:03तक क्या है? चोर चोर का अर्थ पॉकेट मार नहीं
- 27:14होता, चोर का अर्थ दूसरे का पदार्थ चुरा लेना।
- 27:28और बाबा कहते हैं, दूसरा ही नहीं है डांस से सुनना बहुत गहरी बात
- 27:39है। उस सच्च खंड से बोल रहा हूँ जहाँ
- 27:49भेद मठ जाता है और उस सच्च खंड की वाणी है जपजी वहाँ जाकर आप चोर
- 28:02नहीं रहते, क्योंकि किसका चुराव के।
- 28:12किस्से ठगी करोगे किसको गुमराह करोगे एक तल पर तुम्हारा अनंत
- 28:22ब्रमंडः तुम हो समझ तो पड़ेगी नहीं।
- 28:28सूक्ष्म बालिका के समझ नहीं आता नहीं आता, समझ नहीं आएगा जी यहाँ
- 28:33तो होना पड़ता है तो संत की बात को सुन लो, जब वहाँ होगे तब क्या
- 28:42होगा? तब चोरी तुम्हारे लिए निर्ार्थ हो
- 28:47जाएगी। तुम हक का खाना खाओगे, तभी तक तुम
- 28:58असंक चोर हरामखोर बाबा कहते हैं, हक का खाना कौन खाता है सिर्फ
- 29:06संत? क्योंकि संत जानती है कि मेरा है
- 29:19जो स्थल पर पहुँच गया वो यह जानेगा कि सब मैं हूँ और सब किसका
- 29:26है मेरा है। अब एक एक अल्फाज़ को हृदय की
- 29:37डायरी पे लिखते जाना रहस्यत्मक गहरे आध्यात्मिक अर्थ।
- 29:48कभी कभार हजारों वर्षों के बाद जब कोई व्यक्ति उस स्थल पे पहुँचता
- 29:55है तो ऐसे शब्द उदभोष करने का साहस आता है।
- 30:03उसके नयन घुलते हैं। और नए न खुलते ही आयाम बदल जाते
- 30:08हैं। जिसने कभी रंगों को देखा नहीं था,
- 30:18वह रंगों को देखकर आश्चर्य से भर जाता है बच्चों की तरह।
- 30:25कलकारियां मारता है, खुश होता है, बच्चे को हर चीज़ आश्चर्यजनक दखाई
- 30:31पड़ती है। बाबा कहते हैं असंख चोर हरामखोर,
- 30:44ये आपकी बात करते हैं। जो अभी उस उच्चतम या कहलों
- 30:54अंतस्तम तल पे नहीं पहुंचा वह हराम का खतरा है, वह चोर है।
- 31:08तो असंक शब्द को आप पहले नोट कर लेना, जब मैं मोड़ता हूँ अर्थ तो
- 31:14असंक शब्द पहले जोड़ लेना संतों को छोड़कर बाकी बस इसका ये अर्थ
- 31:22है। जिसने उस स्थल पर जाकर सत्य देख
- 31:29लिया जो अब झूठ में न रहा, जो सत्य में प्रतिष्ठित हो गया, जो
- 31:37दृष्टर की तरह हरिश्चंद्र की तरह सत्यवादी नहीं बनना है।
- 31:42वो जीभ का मसला है, सत्य हो जाना है, वो होने का मसला है।
- 31:56अशंक चोर हरामखोर चोर के मन में आती है तभी दबे पांव आता है।
- 32:11क्योंकि चोर मानता है कि ये मेरा नहीं है जो मैं चुराने में हूँ।
- 32:18कबीर के ये घटना लोग मुझे पूछ लेते हैं बाबा इस घटना का अर्थ
- 32:22नहीं समझाया। जो भी आता है कबीर कहता है खाना
- 32:33खा के जाना भाई प्रवचन तो सुन लिया लेकिन बहुत देर हो गई।
- 32:39भूखे जाओगे संत के दर से भूखे जाओगे।
- 32:46नहीं नहीं, खाना खा के जाना प्रत्येक का अपना तल होता है।
- 32:53कमाल का अपना तल लोई का तल बिल्कुल कवेर जैसा पड़ी फटी।
- 33:02ऐसी सुंदर पटी ऐसी जोड़ियां होती हैं कबाल कहने लगे पिताश्री, मैं
- 33:20कहाँ से लेकर आऊं दहाड़ी तप्पा करके कोई दो पीसे कमाता हूँ।
- 33:29आप इनको प्रवचन सुना के कह देते हो?
- 33:31बड़े प्यार से इंकार भी नहीं कर सकते या कोई फॉर्मैलटी नहीं करता।
- 33:37जैसे ही आप करते हो हाँ हाँ, हाँ खाना तो खा के ही जाना।
- 33:46आपकी बातों में साफ झलकता है। क्या आप मन से नहीं कह रहे हो आप
- 34:00सिर्फ कह रहे हो बस? वास्तव में तुम कह रहे हो तुम कब
- 34:05दफा होगे, तुम आए ही क्यों थे? लेकिन कबीर बड़े सहज हैं।
- 34:17कबीर कहते हैं अब देखो खाली पेट तो मत जाना, दोपहरी हो गई है?
- 34:23भोजन तो करके ही जाना पर लोई को तो पता है लोई तो सदा से सेवा कर
- 34:33दे मगन है, सेवा उसकी पूजा है। और लोई बड़े प्यार से पकाती है।
- 34:44भोजन पहले ही तैयार रखती है। उसे पता है कबीर कहेंगे, लेकिन
- 34:51कमाल कहते हैं कि मैं कहाँ से लेकर हूँ चोरी करूँ?
- 34:56कबीर कहते हैं, अरे बड़ा याद कराएं।
- 35:01हाँ हाँ, बिल्कुल चोरी करें और वो घटना में अक्सर बताया करता हूँ
- 35:09लेकिन जैसे अभी सूक्ष्म से बात आई कि समझ नहीं रही बाबा वो भी समझ
- 35:15नहीं आएगा। जीसको ये पता चल गया सब मेरा है।
- 35:25बहस आना, डाका मत मारने, लग जाना, मेरी बात का सहारा लेके उस स्तल
- 35:36पर जाकर अगर समझ आ जाए दिख जाए। तो ढाका मारना भी ढाका मारना नहीं
- 35:42है। ये बाबा के शब्द गलत इस्तेमाल किए
- 35:56जा सकते हैं। पार्टियों के लिए जो गंगा नहा के
- 36:00परले पार हो गए 150 ₹200,00,00,000 ले के।
- 36:07वो कहेंगे सब मेरा है, बाबा कहते तो हैं ये बाबा के वचनों का
- 36:14दुरूपयोग हो जाएगा। अगर किसी ने आपको देश से संभाल
- 36:24दिया है तो बेचने मत लग जाना। बाबा के शब्दों के पीछे लग गए,
- 36:31हाँ अगर तुम उस तल पे पहुँच गए हो, यहाँ सब तुम्हारा है अस्तित्व
- 36:43का अंग अंग तुम्हारा है। अंश अंश तुम्हारा है सबजर ज़ोरू
- 36:55जमीन तुम्हारे भीतर समाई हुई है, तुम्हारा ही अंश है वो तल कुछ और
- 37:05होता है। ये तल कुछ और है इसलिए बाबा पहले
- 37:10ही कह देते हैं गिने नहीं जा सकते।
- 37:15इतने मूर्ख हैं और अक्सर मूर्ख लोग समझदार लोगों के शब्दों का
- 37:22सहारा लेके। झूठ भी बोलते हैं, ठगी भी करते
- 37:26हैं, चोर भी करते हैं, हेरा फेरी भी करते हैं, कतल भी कर देते हैं।
- 37:32बाबा का नाम ले के कातिल कह देता है।
- 37:39जब सद में पहुँच जाता है तो मैं क्यों ना पहुंचूंगा।
- 37:48वैश्य कह देती है जब गणिका अनिका पहुँच जाती है तो मैं क्यों न
- 37:52पहुंचूंगी ये बाबा के शब्दों का गलत सहारा हो गया है।
- 38:01अब ठीक से समझने की चेष्टा कीजिए। पूरी पूरी समझ न आए तो कुछ तो
- 38:07आएगी, ये मुझे पक्का भरोसा है क्योंकि वहाँ से आए हुए शब्द
- 38:16बुद्धि के समय तो नहीं आते, लेकिन तुम्हारे भीतर उतरेंगे तो जरूर 31
- 38:23तो पैदा हो गया। ये तो पक्का है पहले इन बेसिक
- 38:32वेड्स को ले लो असंखमूर्ख अंधकोबर बहुत से लोग हैं जिनकी अभी आँखें
- 38:41नहीं खुनी। और वो रंगों को बतला रहे हैं हरा
- 38:45रंग कैसा नारंगी कैसा पीला कैसा गुलाबी कैसा सूरज का रंग कैसा
- 38:53पापा कहते हैं उनकी आंखें नहीं खुले लेकिन प्रचार कर रहे हैं
- 39:00रंगों का। ऐसे लोग अशंक हैं।
- 39:06सारे शब्दों को बहुत गहराई से और स्पष्टता से सुन अट्ठारहवीं पूड़ी
- 39:16अगर इस पहले शब्द को आप ठीक से समझ जाओगे तो आगे तो सरल है।
- 39:24आगे तो वही राग है, उसी राग के छंद हैं, इसको ठीक से समझ लो असंख
- 39:35मूर्ख अंध को जिनकी अभी आँखें नहीं खुलीं।
- 39:43जो अभी सयाने नहीं हुए, जो अभी मुर्ख हैं, इनको अभी आँखें नहीं
- 39:51मिलीं। उनकी बात कर रहे हैं पापा।
- 40:00और वो जो भी कुछ कर रहे हैं उनका कारण बता रहे हैं।
- 40:06बाबा और यह भी बता रहे हैं वो तादाद में बहु गिणित है आँखों
- 40:13वाले तो कुछ गणित कहीं कहीं सेकड़ों।
- 40:19मेलों पर एक दीया जलता है जिसे हम सयाना कहते हैं।
- 40:26अगर आपने इस पहली लाइन का अर्थ समझ लिया, यही वेश है फाउंडेशन।
- 40:38तो फिर आगे तो तुम तरलता से ही चलते जाओगे।
- 40:41सहजता से बस इसको आप ठीक से समझ लो।
- 40:47बाबा कहते जिन्होंने देखा नहीं आँखें नहीं मिलीं वो अंध अंध को
- 40:55और। असंख मूर्ख वो मूर्ख हैं स्याने
- 41:02नहीं हुए तो स्याना कौन होता है जिन्हें सत्य का पता चल गया।
- 41:09वो स्याना है, जिनकी आँखें खुल गईं।
- 41:15वो सुजकें जिनकी आँखें नहीं खुलीं, वो अंधे और बाबा कहते हैं
- 41:21उनकी गिणती बहुत है, असंख है, गिणी नहीं जाती, आँखों बालों की
- 41:31गिणती की जा सकती है। कहीं सो मील पर एक दिया जलता है,
- 41:43कहीं सो मील पर एक सयाना है, बाकी बाबा कहते हैं बाकी अंधे।
- 41:54अब अगर ये समझ आ गया आपको तो बस फिर आप सहज तरलता से ही चलते
- 42:00जाओगे। इस अर्थ को ठीक से समझ लेना जो
- 42:04मैंने बोला सबय सयाने एक मत जो सयाना हो गया, जीसको आँखें मिल
- 42:16गईं। वो बिल्कुल कहेगा ये रंग हरा है
- 42:23क्योंकि उसके पास आँखें वो कहेगा ये रंग गोलाबी है और सभी कहेंगे
- 42:32बिल्कुल गोलाबी है। आप भी देखो आपके पास आँखें।
- 42:37गुलाबी रंग गुलाबी है न हरा रंग हरा है न ऐसा ही बाबा कहते हैं
- 42:46सयाने व्यक्तियों के समझ अल्फ़ाज़ एक होंगे सब हैं सयाने एक मत।
- 42:58और मुँह रख अपनी जिनकी आँखें नहीं बाबा कहते हैं कि वो प्रचार कुछ
- 43:04भी करें कि रंग पीला है, गैरवे रंग की चड़ी मत पहनो, ऐसा कुछ कौन
- 43:17करेंगे अंधे? अंधे कोण जिन्होंने सत्य को पाया?
- 43:28जो उस तत्व तक नहीं पहुंचे जो शाम वेद का माह वाक्य है तत्व वह
- 43:34मसीह? और जो वहाँ पहुँच गया वो सयाना हो
- 43:42गया। उसको आँखें भी मिल गई।
- 43:44ये दो एक ही बातें हैं शब्द दो जिसने सत्य को पा लिया।
- 43:53वह सुजाखा भी हो गया, नैनोवाला भी हो गया, अंधा नहीं रहा और जिसने
- 44:01सत्य को पा लिया वह सयाना भी हो गया।
- 44:05मूर्ख नहीं रहा। उस स्तर पर पहुंचने वाला व्यक्ति
- 44:11सत्य को पा लेता है। अपनी नग्न आँखों से सत्य को निहार
- 44:17लेता है, सत्य का दर्शन हो जाता है वही सयाना और वही सुजाखा अब
- 44:28मेरे ख्याल में इतनी बारीकी से मैंने अर्थ कर दिया।
- 44:33आप समझ गए होंगे आगे के शब्द बड़े सरल हैं, ये समझ आ ही जाएंगे।
- 44:42चलो हम आगे चलें असंख मूर्ख अंधकोर ये बेश है, आगे चलें।
- 44:51असंख्य चोर हरामखोर जो अंधे होंगे, जो उस स्तर पर नहीं
- 45:00पहुंचाएंगे, वो चोरी भी करेंगे, वो हराम का खाना भी खाएंगे।
- 45:10हलाल का खाना सिर्फ एक व्यक्ति खाता है कौन संत को कि संत जानता
- 45:22है सब मेरा, वह इकट्ठा नहीं करता। तुम्हें चोरी लगेंगी, लेकिन उसे
- 45:36भाव चोरी का ज़रा भी नहीं आएगा, क्योंकि उसने जान लिया कि चोरी
- 45:46किसकी करूँ? जब सब मेरा है, तुम्हारे कुत्ते
- 45:58की सभी जेबें जब तुम्हारी हैं। तो एक कुत्ते की जेब से पैसा
- 46:05निकाल के तुम दूसरी जेब में ढाल लेते हो, तो क्या तुम चोरी करते
- 46:10हो? एक खीसे से पैसे निकाल के तुम
- 46:16दूसरे खीसे में ढाल देते हो क्या तुम चोरी करते हो?
- 46:21बस ऐसा ही संत हो जाता है। संत अपनी मस्ती में बोलता है।
- 46:29संत ने जान लिया जो जानने योग्य है, जिसे जानने के बाद भेद समाप्त
- 46:36हो जाता है और जीसको जानने के बाद।
- 46:40दुख समाप्त हो जाते हैं क्योंकि भेद दुखों का मूल है।
- 46:48ये जो लोग आपको भेदवादी बनाते हैं अमीर गरीब हिंदू मुसलमान।
- 47:02मालिक गुलाम जो भेद क्रिएट करते हैं, इनको मूर्ख कहते हैं।
- 47:11बाबा बाबा कहते हैं ये रोग मूर्ख है, ये भेद क्रिएट करते हैं।
- 47:20जबकि वह तो अभेद है। उसका असली अस्तित्व अभेद है।
- 47:31और तुम सब अब ये बात ठीक से समझ लेना।
- 47:40तुम सब में यू हैव यू ऑल हैव दी पोटेंशिअलिटी तुम सब में
- 47:49संभावनाओं हैं वो होने की अस्तित्व होने की संभावनाओं तुम
- 47:57सब में हैं। नानक उत्तम नीचे न कोई न कोई ऊँचा
- 48:06है, न कोई नीचा है। ये भेद शादियों की बात है।
- 48:14ये उच्च कुंभ है, ये नीच कुंभ है। ये उच्च जाति है या नीचे जाती है?
- 48:22हमारा धर्म महान है, दूसरे का धर्म छोटा है, ये सब भेद फैलाने
- 48:28वाले लोगों की बातें हैं। बाबा कहते हैं और ये बहुत संखक
- 48:35है। वोट डलवाओगे तो बहु शंखक हमेशा
- 48:43जीतता है, इसलिए मैं कहता हूँ लोकतंत्र नाम की कोई चीज़ नहीं
- 48:49होती तुम्हें हैरानी होती है। लोकतंत्र कैसे होगा सभी लोगों की
- 48:59बातों को सुना जाए, लेकिन सुनी तो गई।
- 49:0451% की 49% वाला जीत नहीं सकता, जीतेगा 51% वाला।
- 49:13फिर लोकतंत्र कहाँ हुआ? अगर किसी के समझ काम करें तो मुझे
- 49:19बता देना असंख मूर्ख अंधखोर असंख चोर हरामखोर।
- 49:37तुम चोरी करोगे, तुम में चोरी की भावना पैदा होगी, हरामी होने की
- 49:47भावना पैदा होगी असंख अमर कर जा ही ज़ोर बहुत से लोग असंख शब्द को
- 49:56नोट कर लेना आप असंख शब्द का मतलब क्या होता है?
- 50:00आपके लिए बोल रहे हैं बाबा बाबा तो संत हो गए, बाबा अपने लिए नहीं
- 50:06बोल रहे हैं, तुम्हें कह रहे हैं और एक दूसरे ढंग से आपको जगाने का
- 50:12काम कर रहे हैं। तुम भी वही हो जाओ जो हो तत्व मशी
- 50:17श्वेत के तू। यही बोलता है संवेद ये ठीक है,
- 50:34इससे संसार समाज चलेगा नहीं। इससे कानून चलेगा नहीं, बस इससे
- 50:43एक काम होगा क्या जीस लिए तुम आए थे खिलने के लिए जो बीज?
- 50:56फूल बनने के लिए खिलने के लिए आया था वो खिल गया जो बीज फूल बनकर
- 51:06खुशबू बिखेरने के लिए आया था, वो फूल बन गया और खुशबू बिखरने लगी।
- 51:15ये हो जाएगा। मैं कल भी बोल रहा था ये सर लोग
- 51:25आपको हर रुतबा दिला देंगे, आईएस बना देंगे, पीसीएस बना देंगे।
- 51:37जो तुम कहो वो बना देंगे, अमीर भी बना देंगे, सारी विद्यायें भी
- 51:45सीखा देंगे, राजनीतिक की विद्या भी सका देंगे संधान दंडभय।
- 51:54सब चीजों में तुम्हें निक्षणात कर देंगे।
- 51:59लेकिन सब चीजों को निक्षणात करने के बाद बस एक चीज़ इन्हें खुद भी
- 52:06नहीं पता। ये भी वो बीज हैं।
- 52:12जो अंकित हो के फूल बन सकते हैं, खेल सकते हैं और खुशबों को खुद भी
- 52:22मान सकते हैं, फैला भी सकते हैं। बस ये इनको पता नहीं।
- 52:29इसलिए मैं तुमसे आज कहता हूँ जो व्यक्ति अजामिल की कहानियों
- 52:35सुनाने लगे, सुन ले ना लेकिन है वो मूर्ख।
- 52:48मेरी इस बात को ध्यान में रख कर सुन लेना प्रत्येक व्यक्ति अपने
- 52:58ढंग से समझाएगा तो बाबा ये अशंख लोगों की बात करते हैं।
- 53:05असंख्यपूर्ण हैं मूर्ख। बाबा कहते हैं जिनकी आँखें खुल
- 53:13गईं, जो सयाने हो गए वो तो थोड़ी सी मात्रा में हैं, मैं सदा ही
- 53:20बोलता हूँ कोटिन में कोई एक चलत है कोटिन चलत एक पहुँचता है।
- 53:29अब क्या रेशो बन गई, देख लो करोड़ों में कोई एक चला और जो
- 53:34करोड़ों चले उनमें एक पहुंचा तो कितने पहुंचे?
- 53:39बाबा के हिसाब से ठीक पहुंचा। बाबा कहते हैं, कोई 100 मील पर एक
- 53:47व्यक्ति खिला हुआ फूल है, जिसके भीतर से आंतरिक महकात्तनी है और
- 53:57ऐसे व्यक्ति के दर्शन कर लेना है, वो तुम्हारा सौभाग्य है।
- 54:04क्यों? क्योंकि उसको देखते ही वो
- 54:13इन्फेक्ट कर देगा। तुम्हें भी तुम्हारे भीतर सबसे
- 54:19पहला विचार यह जाएगा हैं। क्या मैं ऐसा नहीं हो सकता?
- 54:28एक बीज बोया जाएगा तुम्हारे भीतर अचेतन के किसे गहरे तल में माना
- 54:36बहुत गहरे तल में आएगा वो आज नहीं किसी जन्म में।
- 54:43फलते फलते फलते तुम्हें पता भी नहीं चलेगा।
- 54:48जैसे तुम्हारे पेट में टेप वार्म फलते हैं, कीड़े फलते हैं।
- 54:55वो जन्मते ही इतने नंबर नहीं होते।
- 54:58धीरे धीरे बढ़ते हैं तुम्हारा ही खून चूस के।
- 55:02और सर बहुत बड़े हो जाते है और पेट में मर जाते है सारी घर
- 55:06गृहस्थी उनका जीवंत तुम्हारे पेट में फेकता है फिर वो 1 दिन निकल
- 55:12जाते है संत का दर्शन जब तुम करोगे।
- 55:25सुखमणि साहब संत का दर्शन सब दुख जावे आज नहीं जाएगा अब इस बात को
- 55:41भी ध्यान से समझ लेना। संत का दार्शन एक बीज बो देगा है,
- 55:47हम भी ऐसे हो सकते हैं और तुम्हें पता भी नहीं चलेगा।
- 55:51तुम्हारी भीतर कब ये भावना बन गई कि अपन भी ऐसा होना है।
- 55:57बस ये काम कर करके ये कर्ज फर्ज निपटा के अपन भी ऐसा ही होना है।
- 56:05संत के दर्शन से ये भाव पैदा हो गया।
- 56:08बस एक झलक बहुत होती है सत्य की और संत की एक झलक बहुत होती है एक
- 56:19झलक। ज्यादा देर उसके पास बैठने की
- 56:23कामना भी मत करना, क्योंकि संत के पास बहुत से लोग आए हैं।
- 56:31इतने लोभ ही मत बनना दूसरे भी हैं और दुनिया में आठ अरब लोग हैं।
- 56:42हवा फैलती फैलती फैलती फैल जाएगी और सभी दर्शन करना चाहेंगे तो तुम
- 56:49मात्रे की झलक पा लेना और घर चले जाना मैंने बहुत बार कहा।
- 56:59मिलेगा तो तुम्हें अपने भीतर से। हंसा पायो मानसरोवरों।
- 57:20ताल तले या क्यों डोले? मन।
- 57:28मस्त हुआ फिर क्या बोले? मन मस्त हुआ फिर क्यों बोले?
- 57:44मिलेंगे तुम्हे तुम्हारे भीतर से तेरा साहब।
- 57:55है तुज? माँ ही बाहर नैना क्यों खोलें?
- 58:09मन मस्त हुआ। फिर क्यों बोले मन मस्त हुआ फिर
- 58:20क्यों? बोले मिलेगा तुम्हें अपने अंदर
- 58:27से। संत के दर्शन महाउपकारी बस एक बार
- 58:40संत को निहार लेना देख लेना कि मैं भी ऐसा हो सकता हूँ, यह जो
- 58:49मस्ती में बैठा आनंद को मान रहा है।
- 58:53मैं क्यों नहीं वही बीज हूँ, उसी का अंश हूँ एक का, मैं भी तो वही
- 59:01हो सकता हूँ, बस ये धारणा ले के चले जाना और संत को देखते ही तुम
- 59:09चाहो चाहे न चाहो। तुम्हारे भीतर यह धारणा बैठ
- 59:12जाएगी। 1 दिन यह धारणा फलीभूत होगी।
- 59:16यह बीज तुम्हारे भीतर अंकित हो गया।
- 59:19संत दर्शन से अंकित हो गया। बस संत दर्शन का इतना ही महत्त्व
- 59:26है। जो कि सबसे बड़ा महत्त्व है।
- 59:30संत दर्शन जैसे परमात्मा के एक बार दर्शन करने से ज्ञान जक्षो
- 59:37खुल जाता है। ऐसे ही संत का एक बार दर्शन करने
- 59:43से आपके भीतर तुम्हें पता नहीं चलता जाए।
- 59:46बेज बोया जायगा। धीरे धीरे उसको खाद, पानी सब
- 59:53लगेगा। वह फूटेगा अंकुरित होगा और
- 59:58तुम्हें पता भी नहीं चलेगा। कब नन्ना पौधा छोटा वृक्ष, बड़ा
- 1:00:07वृक्ष। कब फल लगे, कब फूल लगे और कब फल
- 1:00:11पक गए मीठे तुम्हें नहीं पता चलेगा।
- 1:00:16भीतर भीतर ये सारा प्रोसेसर फलता जाएगा।
- 1:00:21तुम्हें तभी पता चलेगा। जब समाधि की वो आहटें तुम्हें
- 1:00:27घेरने लगेंगे तो बाबा ने ठीक कहा संत का दर्शन महाउपकारी।
- 1:00:46संत की महिमा सब तय्यारी कोई उसका मुकाबला नहीं।
- 1:01:09असंख अमर कर जा ही जो असंख जो मूर्ख हैं वो अमर होने की ख्वाहिश
- 1:01:19करता है। दूसरों के ऊपर डिक्टेटरशिप करने
- 1:01:27की कामना करते हैं। ये वो लोग हैं जो संत नहीं हैं।
- 1:01:37असंख शब्द को पहले नोट कर लेना असंख अमर कर जाहि ज़ोर।
- 1:01:46असंख गलवड़ हत्या कमाल बहतेरे लोग जिनके ज्ञानचक नहीं खुले, नाइन
- 1:01:55नहीं मिले, अंधे रह गए, मूर्खता नहीं मिटी।
- 1:02:04सयानी नहीं हुए वो क्या करेंगे? वो सभी काम करेंगे जो बाबा गिनारे
- 1:02:10हैं असंख गल्वड हत्या कमा असंख पापी पाप कर जा।
- 1:02:23ये वो लोग हैं जो संत नहीं हैं तो इसका उलट भी साथ साथ समझते जाना।
- 1:02:31संत ये सब कुछ नहीं करेगा, जो मूर्ख करेगा सयाना वो कभी नहीं
- 1:02:38करेगा। असंख मूर्ख अंधकोर असंख चोर
- 1:02:47हरामखोर असंख अमर कर जाहि ज़ोर असंख गलबड़ हत्या कावां लोगों के
- 1:02:56गले भी काटेगा, हत्या भी करेगा। और इसी को वो अपनी कमाई समझेगा।
- 1:03:06जबकि जहाँ व्यक्ति कुछ नहीं कमाता उसका कमाया यहीं रह जाता है।
- 1:03:12फिर कमाया क्या? उसने बताओ, पहलवान कहेगा मैंने
- 1:03:17शरीर कमाया कहाँ कमाया? न गामा रहा, न धरा रहा, कौन रहा
- 1:03:23है? न भीम रहा, न धर्योधन रहा, बड़े
- 1:03:29बड़े महामारी चले गए। जिन्होंने शरीर कमाया, जिन्होंने
- 1:03:34धन कमाया, कितने चले गए, सिकंदर चढ़ गए।
- 1:03:39क्या क्या उदाहरण दे तुम्हें? जिन्होंने जो कमाया बाबा कहते हैं
- 1:03:45वो साथ नहीं चाएगा असंख गाल वड हत्या कमा, वो गाल भी काट लेंगे,
- 1:03:53हत्या भी करेंगे, कमाई भी करेंगे, लेकिन कमाई नहीं है वो।
- 1:03:58जो साथ नहीं जाता वो कमाई कहाँ हो गई?
- 1:04:02कमाई तो तुम्हारे साथ जाएगी असंख पापी पाप कर जा जिन्हें पुण्य का
- 1:04:13कोई पता नहीं है फिर वो पाप ही करेगा।
- 1:04:20असंख पापी पाप कर जा असंख कूड़ यार कूड़े फिरा कूड़ा इकट्ठा
- 1:04:30करें। कूड़ा कहते हैं इन पदार्थों को जो
- 1:04:39तुम सुख सुविधा के साधन कहते हो। बाबा कहते हैं ये शरीर को तो सुख
- 1:04:46दे देंगे, एयर कंडीशनर ले आओगे, बाहर के मौसम को बदल देगा।
- 1:04:59लेकिन बाबा कहते हैं, ये कूड़ा है, एक ऐसा स्थान भी है जहाँ शीतल
- 1:05:07पवन बहती है, ठंडी समीर। ऐसा साम्राज्य है वहाँ आनंद की
- 1:05:19ठंडी ठंडी लहरें, वहाँ छांव भी बहुत है वहाँ आनंदों और मस्ती का
- 1:05:27खुमार भी बड़ा गहरा है और वो तुम्हारे भीतर है।
- 1:05:33तुम उसके दावेदार कभी भी हो सकते हो क्यों नहीं होते?
- 1:05:39चलो उस देश चलो चल हंसा उस देश समृद्ध जहाँ मूते है।
- 1:05:52ये ठंडी ठंडी हवाएं बहती हैं मन को शीतल कर जाती हैं तन बदल नहा
- 1:06:02लेता है उस तीर्थ में जाकर संत कहता है आओ मेरे संग।
- 1:06:15कहाँ आग में झुलस रहे हो, कहाँ बैठे हो डंडे डंडे उठाए फिरते हो,
- 1:06:24भीतर तो आग लगी है, भीतर से शांत और शीतल हो जाओ।
- 1:06:34ये तुम्हारा जन्मसिद्ध अधिकार है, तुम कहाँ गुम हो गए?
- 1:06:42मेलों में छोड़ो इनको? आओ
- 1:07:05बहरो में ले चलूँ दिल जो मज़ा एस। सितारों में ले चलूँ और सितारों
- 1:07:33पे ले चलूँ। दरजौं जा ऐसी बाहरों में ले चलूँ
- 1:07:51और हजूर। असंख कुड़यार कूड़े फिरा।
- 1:08:01शरीर को सुख और सुविधा के साधन कूड़ा कहते हैं।
- 1:08:05बाबा बस इसी को इकट्ठा करने में ही लगे रहते हैं।
- 1:08:16रॉयस ले आओ, बढ़िया से बढ़िया कार ले आओ और नहीं तो थार ले आओ।
- 1:08:33हस्ते क्या? असंख कुड़यार कूड़े फेरा असंख
- 1:08:46पापी पाप कर जा, पाप का मतलब जो दुखी है, पाप से दुःख मिलता है,
- 1:08:57तुम कब सुखी सुखी गए? जब मौत आती है यद्यपि तुम मौत
- 1:09:05मांगते हो, लेकिन जब मौत आती है तो तुम डरने लग जाते हो, कांपने
- 1:09:13लग जाते हो, तुम दुखी हो। खिरपित में मृत्यु दुख से भी बुरी
- 1:09:22लगती है। सूक्ष्म से एक प्रश्न आ रहा है,
- 1:09:30आइए इसको साथ लेते चले वक्त तो नहीं है।
- 1:09:36कहते हैं जो लोग अमीर हो जाते हैं ये लोग गद्दी नसीन हो जाते हैं,
- 1:09:42वो दिखाब क्यों करते हैं, ये मुकुट पहनना, सोने के वस्त्र
- 1:09:52पहनना वगैरह वगैरह। प्रश्न सुन रहे दो चीजें हैं
- 1:10:03साइकोलॉजिकल और फिलॉसोफिकल इन दोनों चीजों से परे की बात करूँगा
- 1:10:10क्योंकि साइकोलॉजिकल भी बकवास है मन।
- 1:10:14मन शोर है और फैलाशिप अगर ये भी बकवास है, क्योंकि शब्द शब्द भी
- 1:10:22शोर है और तुमने जाना है शांति की तरफ जहाँ कोई शोर शराबा नहीं
- 1:10:33कोलाहल नहीं। हालचाल में पूर्ण शांति है,
- 1:10:37परिपूर्ण विश्राम है, फिर पूछा है फिर ये दिखावा क्यों करते हैं?
- 1:10:47बस दिखावा इसलिए कहते हैं कि इनको मिला नहीं, नाक कट जाए।
- 1:10:57तो आदमी को बहाना बनाना पड़ता है कि नाक कटवाने से भगवान मिल जाता
- 1:11:02है, बस वही कहानी इनके साथ हुई अंगूर खट्टे हैं, यह बात मत कहो।
- 1:11:16अंगूर खट्टे हैं। तुम उनको कह सकते हो जो पुरुषार्थ
- 1:11:20कर रहे हैं, भागदौड़ कर रहे हैं, जो भागदौड़ ही नहीं कर रहा।
- 1:11:27जो ठहर गया वो मैराथन में अभी दौड़ा ही नहीं है।
- 1:11:31उसने दौड़ बंद कर दी। और तुम शब्द यह नहीं कह सकते,
- 1:11:42क्योंकि बहुत बार इन गद्दों को भोंगा है।
- 1:11:47बहुत बार धन के अंबारों को लगाया है।
- 1:11:52छोड़ के आए हैं, इनको मिलता नहीं खिसियानी बिल्ली खंबा नोचा ये
- 1:12:07दिखावा तो करते हैं अगर तृप्ति मिल गई होती ज़रा सोच होती अंश।
- 1:12:16तो अमीर व्यक्ति कहीं तो ठहरता है, कहीं भी नहीं ठहरने का अर्थ
- 1:12:22क्या है? इसको लक्ष्य मिला नहीं, दौड़ें ही
- 1:12:28चला जाता है तो इसे हम पागल कह दे तो ज्यादा अच्छा नहीं है।
- 1:12:37गद्दी नसीन होने के बाद दूसरी बार गद्दी को मांगता है।
- 1:12:41तीसरी बार क्यों मांगता है? श्रद्धा के लिए गद्दी क्यों
- 1:12:45मांगता है? क्यों उपाय करता है?
- 1:12:48इसको मिला नहीं क्योंकि इनको जो मिला।
- 1:12:55गद्दियाँ जो दे सकती हैं, धन जो दे सकता है वो इनको मिल गया।
- 1:13:04वो ही इस शब्द में कहा बाबा ने गौर से सुनो पर तुम्हारे काम का
- 1:13:09जवाब है ये। असंख कोड़यार कोड़े फिरा असंख लोग
- 1:13:20कूड़ा इकट्ठा कर रहे हैं। ये गद्दियाँ कूड़ा कहते हैं।
- 1:13:26बाबा ये धन कूड़ा कहते हैं बाबा। जीस वजन को गाने के लिए महंगे कवि
- 1:13:41तो वैसा मत कर 20,00,000 लेते हैं वो दिन भर रात।
- 1:13:54उसकी सुरत सलाघा में बाबा नानक हर वक्त गाते हैं, रातों रातों में
- 1:14:03गुजर जाती है, माँ कहती है बेटा सो जा, सुबह हो गई कबीर गाते ही
- 1:14:11रहते हैं। और कबीर का एक शब्द बड़ा प्यारा
- 1:14:14है। यहाँ जीसको मिल गया, वो गांठ में
- 1:14:19बात लेगा, दिखायेगा जो दिखावा करता है समझ लो उसको वो नहीं मिला
- 1:14:28जो अंतिम है। ये सोने की पुशाकें पहनने वाले
- 1:14:36अमीर हैं। ये छः पुशाकें बदलने वाले
- 1:14:45गद्दीधारी हैं। यह उच्चस्त पति के आसीन हो गए
- 1:14:54हुक्म चला सकते हैं आनंद नहीं ले सकते और जरूरत तो भीतर की आनंद है
- 1:15:07जरूरत हुक्म चलाना नहीं। जरूरत हुक्म मानना है उस वली का
- 1:15:15जिसने सृष्टि की रचना की, तभी तो लोग हम वली को मानना नहीं चाहते,
- 1:15:23कह देते है ही नहीं वो तो। बड़ा आसान है कह देना को पीने
- 1:15:32वाला कहता है। हीरो पायो गांठ गठियायो।
- 1:15:49बार बार बा को क्यों खो लें? मन मस्त हुआ फिर क्या बोलें?
- 1:16:06मन मस्त हुआ फिर क्यों? हम्म?
- 1:16:11बोले अगर मिल गया होता अमीरी में या बड़े ओहदों में।
- 1:16:26तो दिखावा करना बंद कर देते हैं। नाचते मेरा भी है, लेकिन तुम्हारी
- 1:16:33नृत्यगणों की तरह नहीं नाचते गाते।
- 1:16:38नानक और कबीर भी हैं, लेकिन तुम्हारे महंगे कबीयों की तरह
- 1:16:42नहीं गाते। रामकथा के पैसे थोड़ी लेते हैं हम
- 1:16:49और मैंने कहा था किसी काल में जब रामकथा के लोग पैसे लेने लग जाएं
- 1:16:55तो समझ लो घोर अंधकाल आ गया और इससे पहले बहुत पहले कई लोगों ने
- 1:17:02शुरू कर किये रामकथा। भागोत कथा ये व्यापारी हैं भगत
- 1:17:09में और इन्हीं को बाबा असंख्य में रखते हैं।
- 1:17:17जो सबसे पहला शब्द बोला असंख असंख मूर्ख अंत को।
- 1:17:24इनको आँखें नहीं मिलीं। ये मूर्ख है जीसको हीरा मिल गया।
- 1:17:36कबीर कहते हैं उसने गांठ में गठरा लिया, बार बार बा को क्यों खोले
- 1:17:44वह खोलेगा नहीं, दिखावा नहीं करेगा।
- 1:17:46वह पी जाएगा अमृत पीने के लिए होता है दिखाने के लिए चलें आगे
- 1:17:58असंक कुड़यार कूड़े फिरा। असंख मलिच मल पख खा जो मिल जाए।
- 1:18:11यह मलिच स्वाद के लिए मुर्गे की गर्दन काट देते है।
- 1:18:22बलिदान के नाम पर अहंकार नहीं चढ़ाते, वो कोबल कोबल बेचारा बकरी
- 1:18:34का बच्चा उसको चढ़ा देते हैं। ये थोड़ा ही कहा था, हजरत ने नहीं
- 1:18:44ये नहीं कहा, उसने बड़ी मांगी थी तुम्हारे अहंकार के।
- 1:18:55तेरी जुल्फों से। जुदाई तो नहीं मांगी थी, कैद,
- 1:19:11मांगी थी रिहाई? तो नहीं मांगी थी तेरी जुलफों से
- 1:19:26जुदाई तो नहीं मांगी थी, कै तू मांगी थी?
- 1:19:36अरे हाय तो नहीं मांगी थी? अपनी जुल्फों में समाले मज़ा
- 1:19:47मैंने कैद मांगी थी तेरे जुल्फों की अरे हाय थोड़ी मांगी थी?
- 1:19:55तू अपने आगोश में ले ले, मुझे मद होश करते हैं, इतनी पिलासा की
- 1:20:06मुझे मेरी मैं का होश हो जाए, मैं तेरे में फना हो जाऊं?
- 1:20:15मैं तुझसे एकाकार हो के कह सकूँ अहम ब्रह्मस्व अनलहक असंख मलेच्य
- 1:20:31मल पखख 3600 प्रकार के पदार्थ हैं खाने के लिए।
- 1:20:37लेकिन तुम कुक्कड़ बलि के नाम पर बकरा खाते रहो, ये असंख्य की बात
- 1:20:44करते हैं। असंख्य कोण जिन्हें नेत्र नहीं
- 1:20:48मिले, जो मूर्ख रह गया, जो अंधा है, असंख्य निंदक कर।
- 1:20:55सिर कर ही पार बहुत से निंदक अपने सर पे बाहर ले लेते हैं।
- 1:21:02निंदक और आलोचक में फर्क है, निंदक है जो बिना देखे बोलता है,
- 1:21:09किसी के विरोध में और आलोचक है जो लोचन से देख के बोलता है।
- 1:21:19ये दोनों शब्द तुमने मिला लिए हैं, निंदक है जो अंधा अंधा बोलता
- 1:21:26है बिना तिख जैसे किसी को गाली निकाल देना, वो निंदा है आलोचक।
- 1:21:36जो देखेगा देख के बोलेंगे कि तू मूर्ख है, तू ज्ञानी नहीं है।
- 1:21:41बाबा भी कहते हैं, ये निंदक नहीं है।
- 1:21:44बाबा बाबा देख के बोलते हैं असंख निंदक सिर करहिं पार और निंदक
- 1:21:52अपने सिर पे वार करेगा। जीस काम को करने से तुम्हारे मन
- 1:21:58के भीतर आ जाये कि मैंने किया वह पाप है जीस काम को करके तुम्हारे
- 1:22:07भीतर मैं भाव न बने वह पुण्य है सीधी सीधी प्रभाषा तुम्हे दो
- 1:22:13अक्षरों में दे दी। नानक नीच का है विचार, जिन्होंने
- 1:22:19अभी सर्वोत्तम तल नहीं छूआ, निम्न सत्रों में फिर रहे हैं नानक कहते
- 1:22:27हैं, मैंने उनके विचार कहे हैं, वो कैसे होते हैं?
- 1:22:32नानक नीच का है विचार जिन्होंने उन पंखड़ियों को नहीं खिलाया,
- 1:22:401000 पंखड़ियों को सहसरार दल का मिल तुम्हारा नहीं केला तुम निम्न
- 1:22:46स्तर पे भटक रहे हो अभी कांभासन में क्रोध में लोप में।
- 1:22:55जिन्होंने आनंद का अमृत का प्यारा नहीं पिया, उनकी बात नहीं।
- 1:23:00ये उनकी बात है जो नीच है जो निम्न स्तरों पे जी रहे हैं जो
- 1:23:06काम वासना में जी रहे हैं, क्रोध में जी रहे हैं, लोभ मोह अहंकार
- 1:23:11में जी रहे हैं। नाने कहते मैंने उनकी बात की है,
- 1:23:18वारिया न जामा, एक बार तुम ऐसे हो कि तुमको तुम पर जितनी बार भी
- 1:23:30कुर्बान हुआ जाए कम। तुम इतने विराट हो और मेरी हसीत
- 1:23:36क्या है? मैं एक बार भी कुर्बान नहीं हो
- 1:23:38सकता। बाबा अपने आप को खुद को कहते हैं
- 1:23:45वारह न जावा एक बार। जो तू दी पावै साईं पलीकार जो
- 1:23:53तुझे अच्छा लगता है, जो यह बात जान लेता है और मान लेता है जो तू
- 1:24:04दी पावै, सोई पलीकार। तू सदा सलामत निरंकार हे नरंकार
- 1:24:12तू सदा उसके संग रहता है, जो तुद पावय सोइ पलीकार।
- 1:24:22जो इस भावना में रहता है। तू सदा सलामत निरंकार हे निरंकार
- 1:24:31तू सदा उसके संग संग रहता है, तू सदा सलामत रहता है हाजर नाजर रहता
- 1:24:37है निरंकार तू सदा सलामत निरंकार। निरंकार तू सदा उसके साथ रहता है
- 1:24:46जिसने तुझ पर छोड़ दी अपनी नैया के बतवार जिसने खुद की खुदी फना
- 1:24:53कर दी तेरे में जो विलीन हो गया जो एक आकार हो गया जिसकी बूंद
- 1:24:58सुंद्र में समा गई। वह तो जैसा ही हो क्या धन्यवाद।