Latest / Baba ji Vijay Vats / 27 Dec 24 - Deep Explanation of कर्मण्येवाधिकारस्ते। uncertainty पे छोड़ दो। गीता का ज्ञान!
Transcript
- 0:05कर्मण वाधिकारस्ते माफलेशु कदाचन। श्रीमद्भागवत गीता का यह श्लोक।
- 0:37गीता की जान है इस श्लोक में जैसे किसी की जान तोते में बंद होती है
- 0:51मोहवर्ष प्राणी की जान। संबंधित वस्तुओं में या बच्चों
- 1:00में पोतों में होती है, वैसे ही गीता की जान इस श्लोक में है।
- 1:13यह श्लोक बड़ा। अद्भुत है लेकिन समझा नहीं क्या
- 1:25इसलिए मेरी आज विनती है आपसे कैसे शुल्क का अर्थ?
- 1:33अवश्य सुन लीजिएगा, क्योंकि संसार हो या अध्यात्म हो, दोनों के लिए
- 1:42इस श्लोक का अर्थ जानना बहुत जरूरी है।
- 1:55माँ कर्मफल हेतुर। भुरमा ते शंगो वस्तु।
- 2:04क। मरने कर्मण्ने वाध का रस्ते हम
- 2:11इसको कुछ भागों में बांट लेते हैं।
- 2:20पहला वाग कर्मने वाद का रस्तह दो तलों से कर्म हो सकते हैं एक एक
- 2:34शब्द को बड़े प्यार से। कोलाहलहीन वातावरण में शांतिप्रिय
- 2:46मनोस्थिति में सुनिएगा आपके भीतर उतर जाए इस शलोक का सही अर्थ।
- 2:59तो आपकी जिंदगी तब्दील हो जाएगी। कर्म ने वाद का रास्ते दो तलों से
- 3:13कर्म हो सकते हैं एक तल। तुम करो, दूसरा तल उसे करने दो
- 3:36बड़े। सरल शब्दों में तुम्हें समझाने की
- 3:39चेष्टा करता हूँ। पहला तल तुम करो करता बनो तुम वो
- 3:46तुम कर रहे हो और दूसरा तल उसे करने दो।
- 3:54बस बात यहीं खत्म हो जाती है। अगर तुमने इन दो शब्दों के अर्थ
- 4:03यथार्थ में और गहरे स्वरूप में जान लिए तो तुम्हारी जिंदगी की
- 4:08नैया पार हो जाएगी। या तो तुम करो या तो उसको करने दो
- 4:20सारी गीता का यही श्लोक है जान सारी दुनिया खुद कर रही है।
- 4:40लेकिन सारी सृष्टि खुद नहीं कर रहे।
- 4:47ये चाँद तारे, नक्षत्र, वायु, आकाश।
- 4:56सूर्य ये सभी उसके हुक्म में चलते हैं, उसे करने देते हैं।
- 5:05खुद नहीं करते उसका जो विधान रच दिया उसने।
- 5:12उसमें पाबंद रहते हैं। एक मनुष्य ही ऐसा प्राणी है इसलिए
- 5:24भगवान कृष्ण को एक शब्द प्रयोग करना पड़ा।
- 5:28अधिकार ये तुम्हारा अधिकार है। कर बनने बाध्य का रस्ते, ये
- 5:37तुम्हारा अधिकार है यानी कि तुम चाहे पार हो जाओ भाबुसा बरसा।
- 5:48चाहे भेड़ियों को हाथों में, पांवों में सारे शरीर में जकड़
- 5:53रहे हो, तुम्हें ये अधिकार है। अधिकार शब्द का प्रयोग भगवान
- 6:04कृष्ण बड़े गहरे थलों से करते हैं।
- 6:13कर्म करना तुम्हारा अधिकार है मानव तू चाहे तो खुद कर चाहे तो
- 6:25उसे करने दे, मैं बार बार बोल रहा हूँ।
- 6:29ये इतना महत्वपूर्ण श्लोक है कि बस दूसरा श्लोक सुनने की आवश्यकता
- 6:37नहीं, एकमात्र श्लोक यह तुम्हारे जीवन को आनंद के।
- 6:49सागर में दबो देगा और इसकी उपेक्षा तुम्हें दुखों के कांटों
- 6:59में सदा सदा के लिए ढकेल देंगे। एक अर्थ क्या समझे कि तुम्हारी
- 7:09नैया पार रख जाएगी और एक अर्थ न समझे तो तुम्हारी नैया डूब जाएगी?
- 7:20ये तुम्हारा अधिकार है, तुम डूबो या तुम तरो।
- 7:26तुम किनारे लग जाओ या समुद्र की अतर गहराइयों में खो जाओ, ये
- 7:34तुम्हारा अधिकार है, इसलिए शब्द अधिकार बड़ा प्यारा है और भगवान
- 7:40कृष्ण बहुत बड़े है सायकलॉजिस्ट। वो तुम्हारी मनोभावनाओं को बहुत
- 7:49अच्छी तरह से समते हैं जीस प्रकार तुम नहीं समझ पाते कृष्ण समझ पाते
- 7:56हैं। दो तलों से कर्म हो सकते हैं।
- 8:08दो तलों से कर्म किए जा सकते हैं। अब स्वतंत्रता तुम्हारी कि तुम
- 8:15कौन सी तरह के कर्म करते हो और तुम्हारी यह स्वतंत्रता तुम्हें
- 8:21पार भी लगा देगी। तुम्हारी यह स्वतंत्रता तुम्हें
- 8:26डुबो भी देखे, तुम डूबते हो तो अपने ही कारण है तुम तर जाते हो
- 8:37तो अपने ही कारण कोई दूसरा। जिम्मेदार नहीं है।
- 8:42इसके लिए तुम स्वतंत्र हो, डूबे तो अपने कारण डूबे तरे तो अपने
- 8:51कारण तरे कोई तुम्हें डबोता नहीं कोई तुम्हें तारता नहीं हूँ सिर्फ
- 9:01गुरु तुम्हें मार्ग बता सकता है कि तुम हो तो स्वतंत्र हो लेकिन
- 9:09ये मार्ग अपना लो, भगवान नहीं कहेंगे तुम्हें ये मार्ग अपना लो,
- 9:16भगवान कहे कि तुम स्वतंत्र हो। लेकिन गुरु कहेगा ये मार्ग अपना
- 9:21लो, इससे तुम थर जाओगे, भूल कर भी दूसरा मार्ग मत अपना लेना।
- 9:28इसी कारण से ही तुम आज इस धरा पर दुखी, दुखी से टूटे फूटे।
- 9:37जख्मों से लदे हुए, मवाद से भरे हुए तुम्हारे शरीर के फोड़े
- 9:44रिस्ती हुई दुर्गंत की ये बुद्धू, ये सिर्फ तुम्हारे कारण है।
- 9:57तुमने अपने जीवन का निर्णय अपने हाथों में लिया है और हमारे
- 10:08कथाकथित सयाने लोग कहते हैं कि अपने जीवन का नेतृत्व अपने हाथों
- 10:15में ले लो। लेकिन कृष्ण ये बात नहीं कहते
- 10:21हैं। कृष्ण कहते हैं, अपने जीवन का
- 10:24नेतृत्व इसलिए बुद्ध को और कृष्ण को विपरीत मन्त्र बुद्ध कहते हैं
- 10:33अप दीपो भव। अपने जीवन का नियंत्रण अपने हाथों
- 10:38में ले लो। कृष्ण कहते हैं, सर्वधर्माण
- 10:43प्रत्यक्षमा में कम शरण वृक्ष मेरे शरण में आजा अपने हाथ में मत
- 10:49ले। ये दोनों विपरीत हैं।
- 10:51यद्यपि तुम दोनों पढ़ लेते हो और समझते किसी को भी नहीं इसलिए
- 11:00बुद्ध का इतना तिरस्कार हुआ। इस धरती पर बुद्ध अपनी जगह ठीक
- 11:05है। क्योंकि इतना समर्पण भाव तुम में
- 11:11आता नहीं है कि तुम कर्म उसकी मर्ज़ी से कर सको पर बुद्ध अच्छी
- 11:21तरह से जानते हैं इसलिए बुद्ध कहते हैं रोग तो खत्म कर लो।
- 11:32कर्मों को तुम उनके ऊपर तो नहीं छोड़ सकते सुप्रीम सत्ता पे लेकिन
- 11:38ये घाव तो ठीक कर लो, मर्म तो लगा लो या रिस्कते हुए गांवों को यह
- 11:45स्नान कर लो। मरहम फट्टी तो कालो ये तुम्हें
- 11:50दर्द तो न करें, ये तुम्हें दुख तो न दें, बुद्ध यही रुक जाते
- 11:57हैं। मैंने पहले भी कहा था बुद्ध आगे
- 12:01नहीं जाते, बुद्ध कहते हैं तुम्हारी नैया तुम्हारे हाथों
- 12:06में। कृष्णन कहते हैं तुम्हारी नैया
- 12:16तुम्हारे हाथ में, लेकिन फिर दुख भी तुम्हारे हाथ में तुम्हारी
- 12:22नैया तुम्हारे हाथ में अगर तुम मुझे समर्पित कर दोगे तो फिर सुख
- 12:27भी तुम्हारे हाथ में है, अब तुम देखो।
- 12:30तुमने तुम्हारी स्वतंत्रता का उपयोग किस भांति से करना है?
- 12:37बुद्ध के वचनों के अनुसार करना है या कृष्ण के वचनों के अनुसार करना
- 12:42है? बड़ी वृहद उलटफेर है दोनों के
- 12:46शब्दों में यद्यपि तुम गहराइयों में जा नहीं सके।
- 12:55सीधे साधे शब्द बुध गए तुम्हारी खोपड़ी में उतर जाते हैं और तिरछे
- 13:05आड़े शब्द कृष्ण के हृदय की गहराइयों से नीचे।
- 13:12तुम्हारे अस्तित्व के तल को छू नहीं पाते, यही कमियां तुम्हारा
- 13:19मन डरता है जियरा भटकता है। इसी से तो डरते थे और यही भगवान
- 13:28कृष्ण ने कह दिया। मृत्यु ही से तो हम डरते हैं और
- 13:33मृत्यु ही को भगवान कृष्ण ने कह दिया कि तू मर जा, तुम्हारे
- 13:40समर्पण करने का अर्थ क्या है? अगर गहरे में देखा जाए तो कि तुम
- 13:45मर जाओ, तुम अहंकारित रूप से मर जाओ।
- 13:50तुम्हारे जीवन की नैया मेरे हाथों में सौंप दो ये पतवार मुझे दे दे
- 13:56मुझे चलाने दे तू मत चला तुझे इन अनजान रहा हूँ का कुछ भी तो पता
- 14:03नहीं और बात भी ठीक है। बुद्ध अपनी जगह ठीक है।
- 14:09बुद्ध कहते हैं वहाँ न पहुँच सके तो कम से कम अपने इस जीवन को तो
- 14:15सुखी बना लो अप दीपा बाबा अपने जीवन की रौशनी स्वयं बनाओ।
- 14:25अपना मार्ग खुद प्रदर्शित करो, लेकिन कृष्ण कहते हैं तुम मूर्ख
- 14:31हो अपना जीवन तुम तब प्रदर्शित करोगे अगर तुम्हें ज़रा भी मैप का
- 14:38पता होगा मैप का तो तुम्हें पता नहीं।
- 14:45तुम जहाँ जा रहे हो तुम्हें पता ही नहीं कि तुम कहाँ जा रहे हो।
- 14:57कहाँ जा रहा है तू जाने वाले? कहाँ जा रहा है?
- 15:14तू है जाने वाले अँधेरा है, मन का दिया तो जला ले।
- 15:31कहाँ जा रहा है? तू जाने वाले अँधेरा है मन का?
- 15:47दिया तो जला ले कहाँ जा रहा? कहाँ जाएगा अंधेरे में मन का दिया
- 16:04तो जला ले। लेकिन ध्यान से समझना बुद्ध के ये
- 16:08वाक्य कृष्ण को जजते हैं। कृष्ण कहते हैं दिया जला लोगे
- 16:17लेकिन जाना कहाँ है ये बताओ। तुम्हें यही नहीं पता मैप का नहीं
- 16:29पता व्हेर अरे यू गोइंग व्हेर यू अरे टु गो जाना कहाँ है तुम्हें?
- 16:47यही मुश्किल है बुद्ध में और कृष्ण में कृष्ण के जमाने से
- 16:54सराबोर यह पृथ्वी बुद्ध को झेल नहीं पाती।
- 16:59क्यों बिल्कुल विपरीत है और है भी विपरीत?
- 17:06क्योंकि बुद्ध कहते हैं अपने दीपक स्वयं बनो तो मैं जचती है बात
- 17:10खोपड़ी को बाती जचेगी इसलिए बुद्ध के साथ।
- 17:1950,000 सन्यासी निकल पड़े। जो बात खोपड़ी को जचती है उसके
- 17:29पीछे सारी दुनिया हो जाती है और जो बात खोपड़ी को जचती ही नहीं
- 17:36क्वेश्चन के पीछे कहाँ 50,000 लोग लगाए?
- 17:40तुम्हें जानकर हैरानी होगी कृष्ण के शिष्य कितने थे?
- 17:45बताओ बुद्ध के शिष्य तो 50,000 उसके साथ चलते थे, बाकी प्रत्येक
- 17:53गांव गांव में बुद्धकालीन समय में।
- 17:57प्रत्येक गांव गांव में बुद्ध का सन्यासी था, अभी भूत थे वो बुद्ध
- 18:05से, लेकिन कृष्ण का। एक एक अर्जुन बस अर्जुन के सिवा
- 18:27उनका शिष्य कोई नहीं था और मैं तुम्हें कहता हूँ कि कृष्ण कृष्ण
- 18:33है। अध्यात्म के मार्ग पर कृष्ण के
- 18:42मुकाबले बुद्ध जीरो हैं। जीरो कृष्ण हीरो हैं, बुद्ध जीरो
- 18:51हैं संसार में। कि अगर ढंग से देखा जाए तो कृष्ण
- 19:01हीरो है, मैंने शब्द प्रयोग किया ढंग तो मैं नहीं मालूम, अगर तुम
- 19:09अपना दीपक स्वयं बन जाओगे तो रास्ता तो दिखेगा पगडंडियाँ साफ
- 19:15होंगी पगडंडियों पे? प्रकाश बिखरेगा और तुम जलोगे
- 19:20कांटा न चुभेगा कोई सर्प, बिच्छू रास्ते में कोई कांच बिखरा पड़ा
- 19:26है, ये सब दिखेगा तुम्हें लेकिन। साथी।
- 19:35ना कोई मंजिल दिया है ना कोई महफिल चला मुझे लेके।
- 19:53है दिल अकेले कहाँ साथी ना कोई मन।
- 20:10कहाँ जाओगे कहाँ? जब रास्ता पता न हो तो हाथ में
- 20:18दीपक बेकार हो जाते हैं। अब दीपों भवः रौशनी तो फैलाएगी
- 20:26रास्तों में कंकड़ पत्थर कांच। सब बिच्छू सब नजर आएँगे।
- 20:34लेकिन जाना है कहाँ? मुसाफिर जाएगा कहाँ तेरा कौन है
- 20:46वहाँ मुसाफिर? जाएगा कहाँ दम ले ले दो घड़ी।
- 20:57ये। छिया।
- 21:00पायेगा कहाँ वहाँ कौन? है तेरा?
- 21:10जाएगा कहाँ सब ठीक है? रस्सा रौशनी से जगमगा रहा है।
- 21:22जहाँ चल रहे हों साफ साफ दिख रहा है लेकिन राहें अज्ञात हैं।
- 21:32ये अज्ञात राहों पे चल रहा हूँ तो हमारे पास कोई मैप नहीं है और
- 21:39कृष्ण कहते हैं तो हमारे पास मैप नहीं है इसलिए तुम जिसके पास मैप
- 21:46है। उसके हाथों में छोड़ दो पतवार
- 21:51किसके हाथों में मैप है, कौन है इन राहों को जानकर कृष्ण कहते हैं
- 21:58मेरे शरण में आजा अद्भुत बात कहते हैं कृष्ण और ठीक भी है।
- 22:08जाएगा का रास्ता मालूम है तुझे सब ठीक है हथेली पे तू ने दीपक रख
- 22:20लिया, रास्ता दिखता है कहाँ जा रहा है और उसके।
- 22:26आने वाली अड़चनें भी दिख रही हैं। लेकिन जायेगा कहाँ?
- 22:32कृष्ण कहते हैं मूर्ख मत बन, समझदार बन रास्ता तुझे मालूम
- 22:42नहीं। साथ ही न कोई मंजिल कुछ भी तो
- 22:52मालूम नहीं तुझे तेरे साथ भी कोई नहीं है जो तुझे रास्ता बता दे ये
- 22:58अनजान रहे हैं, जिसके ऊपर तू चल रहा है तो तुझे कौन पार कराएगा?
- 23:05माझी पार कराए का जीस नौक में सवार हो गया जाना किधर है तुझे
- 23:16नहीं मालूम माझी के हाथ में दे दे पतवार और रोज़ का खिलाड़ी है।
- 23:23वो तुझे बिलकुल सुरक्षित वहाँ ले जाएगा, माझी के हाथ में पतवार दे
- 23:27दे बस जो ये शब्द हैं उसका अर्थ यही है सर्वधर्माण प्रतजमा में
- 23:36कमशरण ब्रज मैं तुझे पार कर दूंगा, तू खुद से पार न हो पाएगा।
- 23:42आह हम तो आम सर्ब पाप के भव मोक्ष स्वामी महाश्विचक कृष्ण कृष्ण के
- 23:58शरण में जाने का भी मन करता है और कृष्ण तर्क के कारण भी श्रद्धेय
- 24:04हैं। पूजनीय।
- 24:07उनके तर्क बराबर बुद्धि भी समझती है और हृदय में भी प्रवेश करते
- 24:12हैं और हृदय से आगे अस्तित्व के तल को भी छूते हैं।
- 24:16भगवान कृष्ण के सरताज कोई उम्मीद भर?
- 24:25नहीं आती, कोई उम्मीद भर नहीं आती, कोई सूरत नजर नहीं आती।
- 24:33मौत का 1 दिन मुवइयन है, मौत का 1 दिन मोयन है, नींद को रात भर नहीं
- 24:42आती। आगे आती थी हाले दिल पे हँसी आगे
- 24:52आती थी हाले दिल पे हँसी अब किसी बात पे नहीं आती तुम्हें पता है।
- 25:04हर इंसान को पता है कि 1 दिन मरना है लेकिन फिर भी वह मृत्यु को
- 25:13स्वीकार नहीं करता है और कितना बड़ा पर्दा है आदमी के दिमाग पे?
- 25:26जो मृत्यु ने अवश्य आना है, अल्टीमेट है, वो अवश्य आएगी।
- 25:36मौत का 1 दिन मयन है, पक्का है कि मौत आएगी।
- 25:40नींद क्यों रात भर नहीं आती? फिर काहे का फिक्र है, जब मर ही
- 25:46जाना है? बस यही पेच फंसता रह के बुध कहते
- 25:57हैं हाथ में दिया उठा ले। कृष्ण कहते हैं मौत का 1 दिन मैयन
- 26:04है, तू छोड़ दे मुझपे दीपक को हाथ में ले के कितने दिन चलेगा उससे
- 26:13दिन नहीं बढ़ जाएंगे इतने जन्मों से भटके हैं और बुद्धविक।
- 26:20जानते हैं, वो तो स्वयं वर्णित करते हैं कि मैं पिछले जन्मो में
- 26:26यह था, पिछले जन्मो में यह था, पर जब पता है, मौत का 1 दिन मोयन है,
- 26:36नींद क्यों रात भर नहीं आती? फिर इतने जन्मों में तुम अपना
- 26:40लक्ष्य पूरा नहीं कर सकते सके तो इसी जन्म में पूरा करो एक जन्म तो
- 26:48स्पेर करो वर्टिकली ये बहुत और सच में देखो।
- 26:57तो बुद्ध ने अपने जीवन में जो किया वो तुम्हें समझा नहीं पाए।
- 27:04बुद्ध ने यही किया जो कृष्ण कहते हैं तुम बड़े हैरान हो गए, लेकिन
- 27:11चौंकना मत। बुद्ध ने सब छोड़ छोड़ के
- 27:16सर्वधर्माण प्रतिज्ञा, मामी कम, शरण में गए बारापुरा, शाही महल,
- 27:26दास दासियां, सारी सुख की संपत्तियां।
- 27:33सब छोड़ छोड़ के गए के नहीं। उसकी शरण में आपत्तियों को स्वयं
- 27:41से स्वीकार कर लेना तो उसकी शरण में आना होता है।
- 27:47वे पत्तियों को खुद न्यौता देना। ही तो उसकी शरण में कृष्ण की शरण
- 27:55में जाना होता है और कृष्ण क्या कह रहे हैं?
- 28:00यही तो कृष्ण कह रहे हैं सभी छोड़ दे सर्वधर्माण प्रतिज्ञाम एकम शरण
- 28:06ब्रज, तो बुध ने एक हिसाब से कृष्ण का अनुसरण किया।
- 28:13छोड़ दिए, राजमहल छोड़ दिए, सुख के साधन, धर्मपत्नी छोड़ दी, छोटा
- 28:19बच्चा छोड़ दिया, पिता को छोड़ दिया, रायदरबार छोड़ दिया, फेरे
- 28:25जुहातों के खजाने छोड़ दिए। जनता छोड़ दी, वाहवाही छोड़ दी,
- 28:32उसके पांव पूजने वाली छोड़ दी राजकुमारी छोड़ दी सब छोड़ दिया
- 28:42ये क्या किया उसने? बुद्ध अप्रत्यक्ष रूप से कृष्ण का
- 28:49अनुसरण करते हैं। सर्वधर्माण प्रति जमामे का मिश्रा
- 28:53नंबर उसने अपने आपको उसके हवाले कर दिया है।
- 28:58जीसको अज्ञात कहते हैं पता था बुद्ध को मुझे शाम का अन्न मिल
- 29:07पाएगा कि नहीं? शाम का भोजन जहाँ मैं जाऊंगा बड़ी
- 29:13दूर निकल जाऊंगा वहाँ मुझे कोई पहचान भी पाएगा किसी के द्वार पे
- 29:21खड़ा हुआ तो मैं भिखारी होऊंगा राजा नहीं।
- 29:28बुद्ध ने अपने जीवन में कृष्ण को उतारा और तुम्हें शिक्षा देते
- 29:35हैं। दीपोभाबा वो तुम्हें खुद की नाव
- 29:41को खुद चलाना सीखा रहे हैं। यह होगा ना?
- 29:48मैंने पहले ही कहा था कर बनने बाद का रस्ते हैं, दो तरह से कर्म हो
- 29:56सकते हैं या तो तुम कर्म करो या उसको करने दो।
- 30:05और बुद्ध ने क्या किया? बुद्ध ने उसको करने दिया, खुद
- 30:11कहाँ किया? खुद तो अगर महल न छोड़ते तो खुद
- 30:14करते बुद्ध ने महलों को छोड़कर कृष्ण का अनुसरण किया।
- 30:20कृष्ण के शिष्यंत को निर्वहन किया उन्होंने।
- 30:31घोर आपत्तियों में अन्सर्टन्टी में खुद को धकेल दिया।
- 30:38पता नहीं सुबह का खाना मिलेगा नहीं मिलेगा।
- 30:45और फिर मनपसंद खाना मिलेगा कि नहीं मिलेगा?
- 30:51एकदम से जीस व्यक्ति ने इतनी अनुकूलता देखी हो।
- 30:59एक इशारे से आवाज भी नहीं लगानी पड़ती।
- 31:02एक इशारे से सब आदर था। और इतनी अनसर्टन्टी में छोड़ दिया
- 31:10वो अनसर्टन्टी क्या होती है अनसर्टन्टी अज्ञात को कहते हैं
- 31:18पता नहीं होगा कि नहीं होगा पता नहीं मिलेगा कि नहीं मिलेगा पक्का
- 31:24था। बुद्ध को पक्का था के महलों को
- 31:29छोड़ दूंगा, मिल ही जाएगा, जिसकी तलाश में गया नहीं, इतना बोल्ड
- 31:37स्केप उठाया। उन्होंने कहीं ना कहीं।
- 31:44कृष्ण का शीर्षक ग्रहण कर गया और इसलिए उनकी बातों को ज्यादा
- 31:56महत्त्व नहीं दिया गया। उन्हें उखाड़ दिया गया क्योंकि
- 32:00उससे ज्यादा। उससे अगला पड़ाव बताने वाले लोग
- 32:04जहाँ से गुजर गए थे यहाँ से निकले थे वो लोग, अभी तो उनके पांव की
- 32:11धूल सुखी में न थी, वहीं पड़ी थी। अभी कृष्ण के पद चिन्ह इस धरती पर
- 32:18जमे हुए थे थे बुध आ गए। अनसर्टेन्टी में छोड़ देना ही
- 32:29भगवान कृष्ण का लक्ष्य है। वो कहते हैं कि मुझ पे छोड़ दे
- 32:33मुझ पे छोड़ने का अर्थ क्या होता है?
- 32:35गहराई से समझना अनसर्टेन्टी पर छोड़ दे।
- 32:42अब आगे जो भी हो अंजाम देखा जाएगा।
- 32:47अब आगे जो भी हो अंजाम देखा जाएगा।
- 32:51खुदा तराश लिया और बंदगी कर ले। हमने तो अपना राह चुन लिया जैसा
- 33:01होगा। कहाँ चले बुध अपने हाथ में दीपक
- 33:07लेके कहाँ चले बाई इसे गुरु बदले खुद का दीपक गुरुओं को बना रहा
- 33:20फिर पीपल की छांव में बैठे। और नदियां के किनारे खाना पीना
- 33:30बंद कर दिया। इतने दुर्बल और कृष्ण तनु हो गए
- 33:34थे। रंग उनका काला पड़ गया था।
- 33:38एक राजकुमार हर सुख सुविधा से संपन्न।
- 33:46रंजना नदी के किनारे प्यास लगी है।
- 33:50अपना कमंडर ले के चले हैं, लेकिन ठीक से नदियां में उतर नहीं पाते,
- 33:55पांव लड़खड़ा जाते हैं। बिचार आता है वहाँ से कुछ
- 34:06स्त्रियां पन घट पर जा रही थीं, सिर पर मटकियां थीं पानी लेने के
- 34:14लिए उस वक्त पन घट होते थे तो गीत गाते गाते जाती थीं झुंडों में।
- 34:24तो जाते जाते गीत गा रही थीं और बुद्ध निरंजना नदी के बीच में
- 34:30खड़े थे। वो स्त्रियां गीत गा रही थीं,
- 34:35उनका अर्थ था। वीणा के तारों को इतना मत कसो कि
- 34:42वो टूट जाए और इतने ढेले भी मत छोड़ो कि स्वर्ग ही न निकले सुर
- 34:50ताल बढ़ा दो ऐसी कसो तारों की। पर नाली को कि जो स्वर सजे और
- 35:02बड़े रसीले हों, बस फिर निकलेंगे वो स्वर जिससे व्यक्ति मुक्त हो
- 35:10जाता है पीणा के तारों को इतना मत कसो कि वह टूट जाए।
- 35:18तो बुद्ध को समझाई कि तुमने तो बहुत कस लिया बिना के तारों को और
- 35:23इतने ढीले भी मत छोड़ो। पहले ढीले छोड़े हुए थे, सुख था,
- 35:29शबाब था, सारी लज्जत थी, दास दासियां थीं, सब कुछ था।
- 35:36एक इशारे पर बोलने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी और आज आज इतना
- 35:42लाचार हूँ मैं कृषतन्नी हूँ कि मैं अपनी प्यास तक नहीं बुझा
- 35:48सकता, वह समझाई उन्हें। वहाँ से अगर सही पूछो वहाँ से ये
- 35:59समझाई आप दीपो भव के शरीर को तो ठीक रख लो, अल्प खा लो भगवान
- 36:10कृष्ण कहते हैं। युक्ताहार विहारस्य ये करते हैं
- 36:19आपको बिल्कुल सही नेतृत्व प्रदान। बुद्ध एकपक्षीय नेतृत्व प्रदान
- 36:27करते हैं, लेकन कृष्ण बहुपक्षीय। इन ऑल डाइमेंशन नेतृत्व करते हैं
- 36:38इसलिए मैं कृष्ण को सर्वांग प्रभुत्व से युक्त मांगता हूँ।
- 36:49उसके बराबर अगर कोई बढ़ते हैं तो तुम बुद्ध और महावीर को एक ही
- 36:54श्राणी में खड़े कर लेते हो, क्योंकि तुम्हें पता नहीं है
- 37:00महावीर कृष्ण की श्रेणी के व्यक्ति जिसने अपने आप को उस पर
- 37:08छोड़ दिया। और ऐसा छोड़ा भोजन भी खाऊंगा तो
- 37:18तू अगर भेज देगा तो भी नहीं खाऊंगा मेरी शर्तों पे तुझे भोजन
- 37:24देना होगा। एक कदम आगे निकल गया।
- 37:27उससे भी एक कदम आ गए। इसलिए मैं सदा ही कहता हूँ कि
- 37:36महावीर बुद्ध के समकालीन तो थे, महावीर 36 साल बड़े थे, बस इतना
- 37:43ही पड़ता। और बुद्ध 36 वर्ष छोटे थे।
- 37:51ये समकालीन थे कबीर और नानक कबीर 29 साल बड़े थे और नानक 29 साल
- 37:59छोटे थे। ये करीब प्रिय समकालीन तो हुए
- 38:04हैं। लेकिन सम स्तरीय नहीं हुए।
- 38:10उस सत्र में महावीर नहीं थे, जीस स्तर पर बुद्ध थे।
- 38:14महावीर कहीं ऊंचे स्तर पर बैठे हैं, बिल्कुल कृष्ण के अपोज़िट
- 38:19प्रतिद्वंद्वी छोर पर बैठे हैं, लेकिन कृष्ण का किसी भी हिसाब से
- 38:23मुकाबला न करने में। असमर्थ नहीं हैं।
- 38:27बिल्कुल बराबर बढ़ते हैं कृष्ण के।
- 38:30इसलिए मैं कृष्ण को जैनियों का क्षमा करना, महावीर को जैनियों का
- 38:40कृष्ण नहीं कहता हूँ, जैनियों का कृष्ण महावीर।
- 38:46और अगर गौर से देखोगे तो हिंदुओं का महावीर कृष्ण ये दोनों बराबर
- 38:55में आते हैं। इनके तिल समान हैं, विरोधी हैं ये
- 39:02ठीक। वह संकल्प से जाता है।
- 39:07वह समर्पण से जाता है, वह संकल्प की बात करते हैं, महावीर और कृष्ण
- 39:14समर्पण की बात करते हैं। पहुंचते दोनों तो ये शब्द।
- 39:23जीतने आसानी से हम इसके अर्थ कर देते हैं।
- 39:27आजकल तो छः 6 साल के बच्चे बड़े दुख की बात है, जो बच्चे की अभी
- 39:35मानसिक डेवलपमेंट पूरी नहीं हुई। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि 7 साल
- 39:41से लेकर 12 साल तक अगर नहीं कहते हैं तो मैं कह देता हूँ।
- 39:477 साल से लेकर 12 साल तक व्यक्ति बच्चा उसकी मानसिकता डेप होने का
- 39:54सही वक्त है। उसकी मानसिकता को खुला छोड़ दो,
- 40:01उसको डर पाने दो और तुम इसी काल में व्यक्ति को मार देते हो।
- 40:14पांच 7 साल के बच्चे को 6 साल के बच्चे को कुइता से खलाई जाती है
- 40:19तो वो शब्द ही सीखेगा तो तो रटनी होगी और क्या होगा?
- 40:24किसी को सीखा दो इसमें क्या अहमियत है?
- 40:30उल्लू पंथी माहौल है। ये आज हमारे हिंदुस्तान में नहीं,
- 40:36सारे विश्व में ये उल्लू पंथी माहौल ये नया पंथ है इसको नोट कर
- 40:42लेना। ये सिर्फ शब्दों के जाल को अपने
- 40:47न्यूरोज में भरने वाले इनका मैंने नाम रखा।
- 40:51उल्लू पंथी उल्लू पंथी संस्कृत में कह देता हूँ, वह सिर्फ याद
- 41:01करते हैं। इनका अर्थ नहीं पता जैसे तोते को
- 41:04अर्थ नहीं पता जय श्री राम तोता बोल देगा लेकिन उसका अर्थ?
- 41:10नहीं पता उसे। और जय श्री राम बोलने वालों को भी
- 41:16अर्थ कहाँ पता है उल्लू बनते वो है।
- 41:21उनको भी नहीं अर्थ बताओ, बस बोल देते हैं और कुछ तो बोलते ही रहते
- 41:28हैं उनको तो मैं पागलों की श्रेणी में रख दूँ, कर्म ने वाब्ध का
- 41:36रस्ते माँ फलेशु कदाशन हम पहले शब्द को ले रहे हैं।
- 41:41कर्मने वाद का रास्ता है, कृष्ण बड़े सुगम हैं, कृष्ण तो बड़े समय
- 41:51हैं, बड़े सरल हैं। कृष्ण कहते हैं, इतना मुश्किल
- 41:55नहीं है जितना तुम समझ रहे हो। के रास्ते बड़े प्यारे हैं,
- 42:00सुरीले हैं नाचो, गौ और नाचते गाते बंसरे बजाते बजाते पहुँच ही
- 42:10जाओ, इतना प्यारा रास्ता और इतना सुरीला।
- 42:20और आनंद के रस से भरा हुआ यह रास्ता भगवान कृष्ण इतना सरल कर
- 42:26देते हैं। वो कहते हैं, कुछ मत करो, ओनली
- 42:31सरेंडर मील सिर्फ मुझे समर्पित हो जा और समर्पित।
- 42:41सर्कस की तरह नहीं होना जैसे तुम समर्पित होते हो।
- 42:46मैंने देखे हैं मंदिरों में जाकर मूर्तियों के सामने दंडवत समर्पित
- 42:52हो जाते हैं। वह समर्पण न हुआ।
- 42:58तुम्हारा भीतर तो ना झुका, बाहर से झुक गए नमाज़ पढ़ने वाले बाहर
- 43:05से सारे झुक जाते हैं रीढ़ की हड्डी को तीर कमान की तरह, लेकिन
- 43:12बाबा नानक कहते हैं कि तुम झुके कहाँ?
- 43:16नमन तुमने किया नहीं, नमन से नमाज़ बना है ध्यान रखना नमन नीचा
- 43:22हो जाना मिट्ठत नीमि नान का गुण चंगिया तत्र नम, नम से नमाज़ बना
- 43:31है नमन करना, जोके जाना, नीमा हो जाना।
- 43:35तुम तो नहीं झुके? नानक की शर्त लगी थी शहंशाह से
- 43:43तुम नमाज़ पढ़ोगे तो मैं नहीं पढ़ूँगा अरे वो तो झुके, उन्होंने
- 43:50तो पीठ मोड़ ली, धरती से लगा लिया सर।
- 43:54इबादत की दोनों हाथ फैलाई, लेकिन उठ खड़े हुए बाबा नान तो खड़े
- 44:01रहे, अब शर्त लगी थी शहंशाह कहने लगे बाबा।
- 44:12तुमने अपने शब्दों को आज तोड़ दिया वचन भंग कर दिया, नानक बोले
- 44:23नहीं, मैंने नहीं किया, तुमने किया क्यों?
- 44:27मैंने तो नमाज़ पढ़ी। लेकिन तुम्हारी शर्त थी कि तुम भी
- 44:32नमाज़ पढ़ोगे बिल्कुल थी, लेकिन एक शर्त और भी थी।
- 44:35नानक बोले वह शर्त है कि तुम नमाज़ पढ़ो हाँ हाँ तो मैंने
- 44:42पढ़ी, देखो झुका हाथ फैलाई इबादत की।
- 44:50मैं तो झुका ये सारे देखने वालों से पूछो लेकिन वो देखने वाले वैसे
- 44:56ही जो कहते जैसे राजा झुका था। नानक बोले तुम झुके तो लेकिन तुम
- 45:07कहाँ झुके? तुम्हारा शरीर झुका और फिर मैं
- 45:15नहीं झुका तो मैं खड़ा रहा लेकिन मैं भीतर से झुका वो तुम्हें पता
- 45:20नहीं वो तुम्हें दिखता नहीं। नवाज़ सही तो बैन अदा की तुमने
- 45:26नहीं की? और बाबा फिर मैंने क्या किया?
- 45:33तुम तो पेशावर में घोड़े खरीद रहे थे, तुरंत शहंशाह ने पांव पकड़
- 45:45लिया। समझ गए वो और वो वाकई नमाज़ के
- 45:52दौरान पेशावर में उसका घोड़ा बीमार हो गया था।
- 45:56बूढ़ा सा बदलने की सोच रहे थे। चलो पेशावर में नया घोड़ा ले के
- 46:02आएगा। और उसी की खेद विरोध कर रहे थे।
- 46:08एक घोड़ा जच गया था, उसका मूल भाव कर रहे थे।
- 46:12यही कुछ कर रहे थे वह जो सारे संसार में बिखरा हुआ है, दृष्टा
- 46:20की भांति वो अगर अपने भीतर की चीज़ देखता है।
- 46:24तो शहंशाह के भीतर की चीज़ नहीं देखेगा, इसलिए तो बाबा ने यह शब्द
- 46:30कहा है गट गट के अंतर की जानत भले बुरे की पीर पहचानत मैं जो तुमसे
- 46:39कहता हूँ के अरदास मत करो। क्योंकि अरदास करके तुम उसको नीचा
- 46:44दिखाते हो, अरदास करके तुम उसकी विलक्षणता महत्ता को गिरा देते
- 46:51हो। कैसे कैसे कि तुम पहले ये समझते
- 46:55हो के ऊंचे से बोलना पड़ेगा, फिर सुनाई पड़ेगा, वो बेहरा है।
- 47:02उसको अरदास सुनानी पड़ेगी कि मैं कितना दुखी हूँ।
- 47:06फिर उसे पता चलेगा। इसका मतलब साधारणतया उसे पता नहीं
- 47:10चलता। तुम उसको नीचा दिखा रहे हो, लेकिन
- 47:16बाबा कहते हैं। घट घट के अंतर की जान वो तुम्हारी
- 47:20पीड़ा पहले से ही जानता है तुम अरदास करके नया बताओगे, इसलिए मैं
- 47:26तुम्हें कहता हूँ अरदास करने की कोई आवश्यकता नहीं, बिल्कुल
- 47:30तुम्हारी उस नमाज़ की तरह है। इसी तरह तुम्हारे रेडेड टाई शब्द
- 47:36नमाज़ के और तुम बोलते हो जोके कहा, नमाज़ का अर्थ था उसके समक्ष
- 47:45अपने आप को समर्पित कर देना झुकाना।
- 47:52उसके सामने नतमस्तक हो जाना, अपने अहम को घरा देना, लेकिन ये सब
- 47:58तुमने कहाँ किया? ये तो किया नहीं, फिर नमाज़ कहाँ
- 48:01हुई? नमाज़ नहीं हुई, कर बनने वाले का
- 48:10रास्ते। हम आज इन्हीं शब्दों तक सीमित
- 48:13रहेंगे। उसके बाद हम अगले शब्दों पर
- 48:17जाएंगे। कर्म करना तुम्हारे अधिकार में
- 48:21है। ओह कर्म चाहे तुम करो चाहे मैं
- 48:27करूँ चूस करना तुम्हारा अधिकार है।
- 48:33अब देखो तुम क्या चूस करोगे उसके हाथों में सौंपोगे अपनी पतवार के
- 48:41भजन ही गाते। रहोगे पतवार के बिना ही।
- 48:51मेरी नांव। चल रही है पतवार के।
- 49:01बिना ही मेरी नांव। चल रही है करता।
- 49:17नहीं हैरान है। ज़माना मंजिल भी मिल रही है।
- 49:32करता नहीं मैं कुछ भी। करता नहीं मैं कुछ।
- 49:42भी मेरा काम हो। रहा है।
- 49:51करते हो तुम कन्हैया करते हो तुम कन्हैया मेरा नाम हो रहा है।
- 50:11मेरा आप की कृपा से सब। काम हो रहा है।
- 50:23ये गाते ही रहोगे और लोग समझेंगे कि तुमने समर्पण कर दिया।
- 50:31लेकिन पकड़े जाओगे जब 10,00,000 का बैग हाथ में मिलेगा कि कौन
- 50:38करता है ऐसा मत करो, ये भीतर से आनी चाहिए।
- 50:45पुकार बाबा तो भीतर से नमन हो गए। उस अल्लाह के प्रति नामों में
- 50:54क्या रखा है? शक्ति उस एक शक्ति के प्रति नमन
- 51:04हो गए। वो तो नवाज़ करके खड़े खड़े करके
- 51:06कोई बात नहीं। शरीर के ढांचे से कोई फर्क नहीं
- 51:09पड़ता। तुम क्या समझते हो?
- 51:11जिसके स्पाइनल में दर्द होता है वो नमाज़ नहीं कर सकता?
- 51:16कर सकता है भाई मेरा दंड जिसका काम नहीं करता वह नमाज़ अच्छी तरह
- 51:25कर सकता है। भीतर से झुकना होता है, उसे ही
- 51:29नमाज़ कहते हैं। बहस से सर्कस नहीं करनी होती,
- 51:33झुकने की और तुम सभी धर्मों के लोग आज सर्कस करते हैं, कोई सिर
- 51:38पर उठा के चलता है। अरे भाई ये हृदय में उतारने जैसी
- 51:43चीज़ थी, तुम सिर पे लाद लिया। तुम्हें कुछ विचार है कोई
- 51:51मूर्तियों के आगे प्रणाम कर रहा है भीतर से कोई नहीं झुकता सर पे
- 51:59उठाने को तैयार है, भाड़ होने को तैयार है, दंडवत होने को तैयार
- 52:05है। भीतर के उस अहंकार को झुकाने के
- 52:08लिए आहूत करने के लिए कोई भी तैयार नहीं और भगवान कृष्ण यहीं
- 52:13पे आ गए तो मैं कहते हैं के भीतर से झुक अपनी नैया की पतवार मेरे
- 52:20हाथों में सौंप या फिर तू कर? दो ही तरीके हैं, लेकिन अफसोस इस
- 52:31शब्द का अर्थ किसी ने बताया ही कर्म ने वाद का रास्ते हैं,
- 52:39अधिकार है तुझे या इधर जा या उधर जा।
- 52:45या तो मेरे हाथ में सौंप दे या तो फिर अपने हाथ में ही रख फैसला
- 52:51तेरे हाथ में तू स्वतंत्र है, मैंने तुम्हें स्वतंत्र बनाया खुद
- 52:57करेगा, वो खुद भरेगा। जैसे करम करेगा वैसे।
- 53:06फल देगा भगवान ये है गीता का ज्ञान, ये है गीता का ज्ञान जैसे।
- 53:21कर्म करेगा वैसे फल देगा भगवान। ये पतवार तुमने अपने हाथ में ले
- 53:26लिया और अगर तुमने पतवार उसके हाथ में सौंप दी तो फिर जो करेगा वही
- 53:36भरेगा फिर वो करेगा। फिर तुम उनके अनुसार ही कठपुतली
- 53:44की तरह नाचता हो? कठपुतली के हाथ में कुछ होता है,
- 53:50कठपुतलियों का खेल दिखाने वाला किसी को राजा बना देता है, किसी
- 53:54को रंग बना देता है, किसी को दास और गुलाम बना देता है, किसी को
- 53:59महाराजा और महारानी बना देता है। कोई आदेश करता है कोई आदेश मानता
- 54:08है, लेकिन कठपुतलियों का खेल है कठपुतली अपनी तरफ से कुछ करती है।
- 54:20नाचती भी खुद नहीं है। वो जब चाहता है कठपुतलियों को
- 54:25नचाने वाला तो नाचती है, रोकता है तो रुक जाती है।
- 54:31वो जो कठपुतलियों को रोकने वाला है वो जब रोकता है अपने हाथों को
- 54:36तो कठपुतली नाचने से रुक जाती है। उसके अपने हाथ में कुछ भी नहीं,
- 54:46तुम अपनी पतवार को न चलो और तुम्हारी नैया चलेगी, वो है
- 54:53समर्पण पतवार के। बिना ही मेरी नाव चल रही है,
- 55:09हैरान है, ज़माना। मंजिल भी मिल रही है।
- 55:21तुम्हारे काम भी शुद्ध हो रहे हैं, तुम्हें आनंद आ रहा है, तुम
- 55:28मस्ती में डूबे हुए हो, सरो बोर हो, खुशी में झूमते हो, नाचते हो,
- 55:36गाते हो। और अपना रास्ता भी तय कर रहे हो
- 55:40मंजिल भी मिल रही है करता नहीं मैं।
- 55:46कुछ भी सब काम हो रहा है। मेरा आपकी कृपा।
- 56:00से सब काम हो रहा है। कर मन्ने वाले का रस्ते है आज
- 56:15हमने। इन दो शब्दों का आंतरिक तल पर
- 56:21जाकर रहस्य खोदा। बाकी का श्लोक अभी निरंतर जारी
- 56:28रहेगा। इसका थीम तुम स्वतंत्र रहो।
- 56:35ईश्वर ने तुम्हें स्वतंत्र पैदा किया, लेकिन स्वतंत्र किसलिए?
- 56:42या तो कर्मों को तुम करो इस मामले में स्वतंत्र या कर्मों को मुझपे
- 56:49स्वप दो या तो फिर तुम करो वो तो फिर जो तुम करोगे तुम्हें ही
- 56:54भोगना। या तो फिर मेरे हाथ में पतवार दे
- 56:59दो तो मैं करूँगा या तुम्हें नहीं भुगतना पड़ेगा।
- 57:05ये बड़े बंजक की बात है गज़ब की बात कही है कृष्ण और सत्य है मैं
- 57:12आगे तुमसे बताऊँगा। जब तुम सौंप दोगे, उसके हाथ में
- 57:18पूर्ण पतवार हो तो होगा क्या, जब उसके हाथ में पतवार आएँगे तो कैसे
- 57:28तुम्हारे मसले हल होंगे? यह विषय।
- 57:33बहुत लंबा विषय हो गया। इतनी वीडियो देखने के आदी नहीं हो
- 57:401 घंटे की वीडियो तो देख ही लिया करो, कोई ज्यादा नहीं, लेकिन कुछ
- 57:45कुछ भक्त कह देते हैं बाबा 3 घंटे की बन लिया करो पर क्या करू?
- 57:52वो लोग भी हैं बेचारे जिनको रोज़ी रोटी कमानी होती है, उनके पास समय
- 57:59कम है, बेरोज़गारी है, काम धंधा भी नहीं है और महंगाई का ज़माना
- 58:06है तो मुझे सबको नगर में रखकर ही बोलना होता है।
- 58:14तुम स्वतंत्र हो, मैंने तुम्हें स्वतंत्र पैदा किया है, ये
- 58:20स्वतंत्रता है किस बात की? बस यही बात नहीं बता सका कोई
- 58:25स्वतंत्रता है कर्म करने की चाहे तो तुम करो।
- 58:30और चाहे तो मुझे करने दो, अब तुम देखो क्या फैसला करते हो?
- 58:37श्रीकृष्ण, गोविंद, हरे मुरारी। हे नाथ नारायण वासुदेव?
- 58:56श्री? कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ
- 59:03नारायण वासुदेव। श्री कृष्ण।
- 59:09गोविन्द हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव पाथ स्वामी सखा हमारे।
- 59:28पितुमाथु स्वामी सखा हमारे हिनाथ नारायण वासुदेव।
- 59:47श्री कृष्ण। गोविंद हरे मुरारी हिना।
- 1:00:04नारायण, वासुदेव, वासुदेव। धन्यवाद।