Latest / Baba ji Vijay Vats / 4 May 25 - मेरे पूर्व जन्म की एक अध्बुद्ध घटना! तुम्हें समर्पण का अनुभव नहीं हुआ.. इसी लिए भटक रहे हो!
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- 0:09एक छोटा सा ग्राउंड उसमें एक रे स्पेशल रहती थी उसका 8 साल का
- 0:18बच्चा स्कूल जाता, घर आके खेलता। सभी बच्चों के संग खेलता, भूख
- 0:39लगती, खाना खा लेता, नींद आती, चारपाई पे लेट जाता और सो जाता।
- 0:53बचपन मज़े से बीत रहा था। वह अक्सर देखता अपनी माँ को एक
- 1:08चित्र लगा रखा है उसने उसके ऊपर। फूलमाला चढ़ाती रोज़ नई फूलों की
- 1:19गुन्ती हुई एक छोटी सी माला भेंट करती क्षणों में रखती, धूप जलाती,
- 1:27दीपक करती, प्रणाम करती। और आसन पे बैठ जाते।
- 1:34उसको ऊंचे से मूर्ति रखी हुई और कुछ बहुत बताते हैं।
- 1:43बच्चा छोटा था, अभी कुछ समझ नहीं पाया।
- 1:52आखिर ये कौन? इतना प्रश्न भी तो नहीं आया?
- 1:57उसके घर कोई नहीं जाता आता। वह बाहर जाता गली के अंदर खेलता
- 2:05बहुत पुराने जमाने की बात है। बच्चा पढ़ाई में होशियार था।
- 2:14रंग, रूप, डील, डौल, सुंदर नैन नक्श खूब खेलता, जौर आजमाइश भी
- 2:22करता बड़ा प्रसन्न रहता। वो दस्ता जब उसकी माता करीब करीब
- 2:39घर के कामों से निवृत्त हो के बस वहीं जाके बैठ जाती और कुछ बहुत
- 2:46बदती। बच्चे ने कुछ पूछा नहीं, बच्चा
- 2:53बड़ा होते चला क्या? पढ़ाई में होशियार था, उसी
- 3:05क्लासेज में पहुँच गया उसके घर कोई नहीं आता था एक वृद्धा को।
- 3:16जिसके हाथ में खूंटी पकड़ी हुई सहज शालीन सा लगता हुआ सर पे
- 3:27हल्की सी पगड़ी स्वेत रंग। बात सारे स्वेत लंबे कानों में
- 3:42मुद्रियाँ कैसी? उसके देखते ही देखते उस व्यक्ति
- 3:54के हाथ कांपने लगे थे और अब तो वह भी जवान मचा रहा था।
- 4:02कॉलेज में पढ़ने लगा और वह आता 10 5 मिनट के लिए बाहर।
- 4:13उसकी माता उसके लिए पानी लेके आती, वह पानी पी लेता।
- 4:21बच्चा अपनी पढ़ाई में खेल कूद में मस्त रहता।
- 4:25ये जमाने नहीं थे मोबाइल टेलीविज़न कुछ भी नहीं था।
- 4:30और कोई शौक न था, बच्चे को खेलने का शौक था, बच्चा था तो गलियों
- 4:36में खेला करता। थोड़ा बड़ा हुआ तो बाहर मैदानों
- 4:43में खेलने लगा। सदा से ही लेकिन वह व्यक्ति हार
- 4:58में है ना आता और उसी नीयत तारीख पे आता।
- 5:05नहीं, उसने पूछना की जा इतनी समझा कौन है हमारे घर कोई आता तो है
- 5:09नहीं, थोड़ा बड़ा हुआ, उसने कहा माँ मेरे पिता कहाँ है?
- 5:31स्त्री ने कहा पुत्र ये तुम्हारे पिता हैं जिसकी मैं आराधना करती
- 5:38हूँ, बैठ के कहाँ गए हैं? ये पुत्र विदेशों में हीरे
- 5:44जवाहरात का व्यापार करता है। तुम इतनी देर से लौटे क्यों नहीं?
- 5:55मैंने तो कभी अपने होश संभाले इनका मुख भी नहीं देखा।
- 6:03हाँ पुत्र मुझसे भी यही कह के गए थे।
- 6:08आ जाऊंगा। अक्सर ऐसा ही कभी कभी ज्यादा देर
- 6:14भी लग जाया करते हैं। मार नहीं बिका होगा या ऑर्डर
- 6:22ज्यादा मिल गया होगा। कुछ तो कारण है तो माँ का भी
- 6:32चिट्ठी पत्र नहीं, उसके मैं पुत्र चिट्ठी पत्र तो कभी नहीं आये।
- 6:39इतना वक्त भी कहाँ होता है व्यापारियों के पास?
- 6:43अपने ही काम धंधों की व्यस्तता बहुत होती है।
- 6:48मैंने कभी कहा भी नहीं, ठीक बच्चा तरफ तो हो जाता।
- 7:03बच्चा बड़ा होता चला गया, जवान हो गया।
- 7:08इधर पढ़ाई में भी बहुत सुंदर मार्क्स आये और उधर खेलकूद में भी
- 7:15वह कुश्ती खेलने लगा। पुराने जमाने में यही होता था
- 7:20कुश्ती अखाड़े। मरल योद्धा तब ये क्रिकेट वगैरह
- 7:25के खेल नहीं होते थे। पढ़ाई लिखाई में इतना होशियार कि
- 7:34अपनी सारी यूनिवर्सिटी में से पसंद आए सबसे ज्यादा नंबर।
- 7:42और इतने ज्यादा कि उसका कहीं और छोर मुकाबला नहीं दूसरे नंबर पे
- 7:50जो आया आस पास, कहीं मुकाबला नहीं उसका।
- 7:54उसने सारी यूनिवर्सिटी का रिकॉर्ड तोड़ दिया और इधर मैदान में मल
- 8:00युद्ध में ऐसा माहिर। कुश्ती में इतना माहिर कि कुछ ही
- 8:06मिनटों पर प्रतिद्वंदी को चित कर देता दोनों तरफ जय जयकार घराता अब
- 8:16तो वो भी व्यस्त रहना शुरू हो गया।
- 8:22दोस्तों में, मित्रों में, कोचस में प्रोफेसर्स में, चारों तरफ
- 8:31भीड़ आज माँ वहाँ जाना है आज माँ वहाँ जाना है आज उसकी पार्टी।
- 8:39आज वहाँ रुकूंगा, आज घर नहीं आऊंगा।
- 8:44वर्षों बीत गया है। दोनों तरफ से प्रथम किस्त में
- 9:01कुश्ती में भी प्रथम। ने उसने कहा माता सीमा मुझे विदेश
- 9:12से आना होगा, कोई प्रतियोगिता है यहाँ तो मैंने सब जीत लिया।
- 9:21विदेशों में एक मुकाबला है उसके लिए मेरा चयन हुआ है, तुम कहो।
- 9:29तो मैं चला जाऊं माँ ने कहा, हाँ पुत्र इसी दिन के
- 9:42लिए ही तो मैं इंतजार कर रही थी कि तुम भी कभी इतने मशहूर हो जाओ
- 9:52अपने पिता की तरह। और तुम भी विदेशों में भ्रमण करो,
- 10:02ठीक है अम्मा, लेकिन कहीं तुम्हें मेरी कमी तो खली खलेगी नहीं।
- 10:11ऐसे पिताजी नहीं आये। कहीं ऐसा मन में तो नहीं आएगा कि
- 10:16शायद मैं भी ना लूटूं उस स्त्री ने जट से उसका मुँह बंद कर लिया
- 10:26है, ऐसा मत कहो। नहीं, मैं अपने पिताजी की बात कर
- 10:33रहा था। पिताजी की तरह इतनी देर न लौटूं
- 10:36तो नहीं, कोई बात नहीं तुम अपना जीवन बनाओ मैं जहाँ गुजर बसर कर
- 10:47लूँ, क्या ठीक है अम्मा? ये थोड़े पैसे रख लो, मुझे के रूप
- 11:00में मिले है। स्कॉलरशिप कॉलेज की तरफ से भी
- 11:04मिला और इधर खेल भारती की तरफ से भी मिला।
- 11:12तब तक स्त्री थोड़ी मृत हो गई थी, अधेड़ो भर में आ गए थे और वह
- 11:21वृद्ध जो बेचारा लाठी के सहारे आता।
- 11:281 दिन शायद आप से पूछा माँ ये कौन है पुत्र?
- 11:31ये यहाँ के सरपंच है, अच्छा बहुत गंभीर व्यक्ति है, ज़रा भी नहीं
- 11:44होता है। हाँ पुत्र ये तेरे पिता जी जब
- 11:48बाहर होते हैं। तो कह के जाते हैं इसके मित्र कि
- 11:54घर में कोई पैसे टक्की की जरूरत हो, सामान की जरूरत हो तो तुम
- 11:58पहुंचा देना मैं पैसे आके लुटा दूंगा, मुझे बता देना अक्सर यही
- 12:02करते हैं तुम्हारे पिता ठीक बच्चा फिर को संतुष्ट था।
- 12:09बच्चा बाहर चला गया लेकिन ऐसा चला गया कि वह तो सफलता की ऊचाईयों और
- 12:26बलिंदियों को छूता ही चला गया, छूता ही चला गया।
- 12:36इतना ऊंचा मुकाम का लोग उसे आने ना देते।
- 12:43नहीं नहीं यही रहो उसके लिए मकान बना दिया क्या बच्चा जवान हो
- 12:52क्या? वहाँ किसी स्त्री के प्रेम में
- 12:54पड़ गया स्त्री किसी अमीर घराने से ऐसा समझो किसी राजवंशी से थी
- 13:08लड़का भी कद काठ दौर। मैं असाधारण था सम्मोहित हो गयी
- 13:16और उन्होंने फैसला किया कि एकत्र बेखट्ठा रह जाए।
- 13:23घर वालों ने हामी भर दी। सुंदर था, बलवान था, निशानाध था,
- 13:29समीदार था। इतनी डिग्री थी सब जगह फर्स्ट सब
- 13:35जगह फर्स्ट प्रथम प्रथम प्रथम इतनी काब्रियत कौन है कहाँ से आया
- 13:42इसकी जरूरत नहीं। लड़की ने कहा कौन है कहाँ से आया?
- 13:50मैंने इसका क्या करना? मैंने रहना इसके साथ है।
- 13:57वैसे तुम जांच लो, अच्छी तरह परख लो।
- 14:00एकलो की लड़की शादी हो गई, इकट्ठे रहने लगे।
- 14:11बच्चा और बलवान होता क्या विदेशों में चला जाता वहाँ से तग में लेके
- 14:17आता बच्चा भूल ही गया मैं कहाँ से आया?
- 14:28अपनी माँ को बुल के आओ अपने घर वसा लिया यहाँ आके सब अच्छा चल
- 14:36रहा और इतना सुंदर चल रहा, लेकिन माँ की कभी कभी आदत थी या माँ का
- 14:45धन्यवाद करता। और पिता का भी धन्यवाद करता जिसने
- 14:50उसे जन्म दिया। यद्यपि उसने देखा नहीं लेकिन उसका
- 14:55धन्यवाद करता। जब भी आता तो शिष्टाचार की तरह।
- 15:07मन से ये माँ के पांव छू गया था। इस बार भी ऐसा ही तो किया था
- 15:13उसने, लेकिन अब तक वापस ना लौटा था।
- 15:1810 वर्ष पूजा गए थे अब तो उसका बच्चा।
- 15:25ये धीरे धीरे बड़ा होने लगा। चिट्ठी पथरी का कोई मकान न था,
- 15:32छोटा सा गांव था मैं तो ठीक से सब कुछ जानता भी न था।
- 15:45कौन सी तहसील पड़ेगी, कौन सा जिला पड़ेगा, कुछ नहीं पता और इधर वो
- 15:54बच्चा भी बढ़ता गया, उसका वह भी उतीर्ण होता गया और जवानी की
- 16:01भरपूर भर में। इधर उसकी माता भी कुछ बीमार रहने
- 16:08लगी तो पैसा भेजे कहाँ से भेजा पैसे का पता नहीं कहाँ से भेजा
- 16:25कोई एड्रेस नहीं। वह सरपंच आता बाहर चार बाई पे बैठ
- 16:32जाता, अब आती था पुत्री कहाँ हो, वो झट सी आती है, चुन्नी का पल्लू
- 16:43कर रही थी बस। ये चुनने का बल्लू आज हो गया, यही
- 16:55थी शर्मो हया आपकी तस्वीर यही था बड़ों का आदर इसमें बहुत कुछ छिपा
- 17:01हुआ था स स्नेह छिपा हुआ था। बड़ों का आदर छुपा हुआ था, बड़ों
- 17:13के प्रति उदार भाव छिपा हुआ था, बड़ों का शुक्राण छुपा हुआ था।
- 17:22ये छोटा सा चुन्नी का पर्ल बहुत कुछ कह जाता है।
- 17:26आज ये ही उखाड़ दिया हमने मैं थोड़े से प्रिसेतिया था आराम से
- 17:39उसका घर वशर चलता हूँ उसके घर पशु से सुबह शाम दूध पहुंचा देता,
- 17:49बच्चे को तो पता भी नहीं चला। मुझे दूध कहाँ से मिला?
- 17:53सरपंच के घर से आता सब कुछ उसके पास पशु बहु थे छा छा जाती, घी आ
- 18:00जाता, मक्खन आ जाता। सभी ग्रामीण वासियों से पिताजी
- 18:08कहते हैं। सभी गरीबों को बहुत सहायता करता।
- 18:17अमीर बहुत खेती बहुत थी लहलहाती फसलें गांव में गरीब में गढ़मारी
- 18:27हो जाती, उसकी फसल हरी के हरी रहती।
- 18:32यह श्रद्धाओं का परिणाम ही था। वो सदा करता हेश्वर तेरा अपार
- 18:46धन्यवाद अप्रमपार धन्यवाद तेरा। तुने मुझे इतना दिया कि मैं बाँट
- 18:52सका एक शब्द में और भी गया था तेरे इस लिए भी धन्यवाद कि तुने
- 19:08कुछ लोगों को कुछ नहीं दिया। अगर तुने सभी को मेरे जितना दिया
- 19:15होता तो मैं बांटता किसको ये बात बच्चे के कभी समझ नहीं आती।
- 19:24सरपंच के बेटे कहते पिताजी तुम ये क्यों कहते हो?
- 19:28कि तुमने गरीब बना दिया, उसका भी बहुत धन्यवाद, क्योंकि अगर गरीब न
- 19:33बनाता तो मैं बांटता किस से कौन मुझे हृदय से धन्यवाद देता कौन
- 19:41मुझे हृदय की गहराइयों से धन्यवाद कहता, मुझे आशीष देता मुझे भीतर
- 19:46के तरों से आशीर्वाद मिलता। नहीं तुने अच्छा किया, तेरी
- 19:51सृष्टि सारी बखूब है। तुने जो बनाया वह कमाल बनाया क्या
- 20:04हुआ वह स्त्री का बेटा बड़ा हो गया और अचानक राजा का देहांत हो
- 20:16गया। कहानी है, किसी शास्त्र की कहानी
- 20:28है, देहान्त हो गया उसका। सारी जनता त्राहि त्राहि करने
- 20:37लगे। अब क्या होगा?
- 20:44अंतिम संस्कार कर दिया क्या? पुत्री ने अंतिम संस्कार कर दिया।
- 20:50एक अकेली बैठी थी और जमाई था। गद्दी निशी पुत्रे ने होने से मना
- 21:04कर दिया। उसने कहा मैंने मेरा पति मुझसे
- 21:09कहीं ज्यादा योग्य है, यह संभाल पायेगा।
- 21:12इसको सौंप दो, उसको सौंप दिया गया।
- 21:16देश चलाने लगा वो कुमरान बन गया। 1 दिन अचानक याद आया हो माँ,
- 21:25लेकिन अब तो उसके पास सब कुछ था, ज़माना बदल गया था अब तो सब कुछ
- 21:32था। करीब अधेड़ उम्र में आ गया था।
- 21:37लेकिन अब तक सब कुछ था उसके पास उसको मांगी याद आई राजा था
- 21:58दरबानों को सौंपकर अपने घरवाले को कहने लगा।
- 22:03चलो, मैं तुम्हे अपनी माँ से बुला लूँ तुम सीधा ही कहती थी तुम्हारी
- 22:07माता से वजना उसका आशीर्वाद और उस दिन तो बड़ी खुश हुई हाँ है, चलो
- 22:17मैं भी देखना चाहती हूँ। एक छोटा सा वैश्य का कोठा वहाँ पर
- 22:41एक लड़की न जाने कहाँ से आई। उसको धंधे में दकील दिया गया।
- 22:53धंधा करते करते उसके गर्भधर के उस कोठे की मालकिन ने उसे कहा तू जा
- 23:04अब तेरी कोई जरूरत नहीं। उसको धक्के देके बाहर निकाल दिया
- 23:14और लड़की मजबूर सड़कों के ऊपर भीख मांगती रही कई दिन तक भीख हम आप
- 23:24रही थी। वहाँ चौराहे से एक सज्जन पूछने के
- 23:30लिए उसने देखा ये लड़की को ठीक कराने की लगती है, उसने पूछा बेटे
- 23:47कौन होता? लड़की बोली हमारी कोई जात नहीं
- 23:53होती कहाँ से आई उसने सारी कहानी बता दी गर्भवती हो गई खेल वहाँ से
- 24:08निकाल दिया क्या? इतनी बात से वह सब समझ गया, उसने
- 24:24कह पुत्र मेरी कोई बेटी नहीं तो चल मेरे साथ।
- 24:35मैं तुम्हारी परवरिश करूँगा, इस बच्चे को जन्म दे, तुम्हें अलग से
- 24:40कम्बरा दे दूंगा। वह उस बिटिया को ले आया।
- 24:55उसके भरण पोषण की जिम्मेदारी उसके और तो कोई था ही नहीं।
- 25:04कभी कभार आता उसको खर्चे पन इंतजार था।
- 25:10घर से सभी जरूरी सामान आ जाता। रसोई का सारा सामान, दूध वगैरह सब
- 25:21जो उसके पास था। बड़े बड़े बाघ थे वह से फल खाने
- 25:28को कनक सब घर पहुँच जाता दोस्त सब घर पहुँच जाता वो लड़की कौन थी
- 25:42उसे खुद भी पता नहीं कोई धक्का दे गया था।
- 25:52बाद में उसने तलाश की तो पता चला रेलगाड़ी की लाइन के ऊपर वह छोटी
- 25:59बच्ची पड़ी मिली। किसी ने पाला जैसे तैसे पाला।
- 26:07उसकी मृत्यु हो गई। कुछ लोगों के पाद्य में सहारा
- 26:17लिखा ही नहीं होता। वहाँ से उसको वैश्य उठा के ले गए।
- 26:30वैश्य ने अपने कोठे पे गर्भवती होगी उसे निकाल दिया अब उसका कौन
- 26:38सा हरा भीख मांगने लगे, भीख मांगते मांगते।
- 26:49यह संत हृदय उससे मिला चल बैठी तू मेरे संग चल मेरे पुत्र ही पुत्र
- 26:57हैं मेरे पुत्री नहीं, इस बहाने से आज मुझे मेरे परमात्मा ने
- 27:05पुत्री को दे दी मांगी बहुत। लेकिन उसने मुझे शायद तुझे ही
- 27:12पुत्री के रूप में देना तू चल मैं सब परवश करूँगा और 1 दिन दो
- 27:26कहानियों इकट्ठी चलती हैं। वो जहाज पर बैठ गए।
- 27:36मियाँ बीबी और उसका छोटा पुत्र तीनों आ रही हैं ऐसा तो वो जानता
- 27:45था कहाँ है काम? कौन सा गांव है पहुँच गए घर
- 27:55पहुंचे तो उस स्त्री के घर में जब हो गए स्त्री थोड़ी थोड़ी सांस भर
- 28:11रही थी। थोड़े दिन पहले सरपंच की मृत्यु
- 28:17हो गई थी, अब उसका कोई सहारा ना रहा।
- 28:25अब वो इंतजार में थी कि कब मेरा पुत्र लौटे लेकिन पता नहीं उतर
- 28:30गया कहाँ? सरपंच देह छोड़ दिया।
- 28:43उसने सब कर दिया और वह कुछ कर दिया और उसका काम इतना।
- 28:54तो उस लड़की ने उस स्त्री ने अधेड़ उम्र के उस स्त्री ने शी
- 28:59कुमाचट सूइसाइड और क्या करे अब कोई है तो है ही नहीं।
- 29:06किसे कहे किसकी बेटी, किसकी माँ? ना तो माँ कहने वाला कोई?
- 29:14ना बेटी कहने वाला कोई दोनों पता नहीं है कहाँ?
- 29:22तुम ना जाने किस जहाँ खो गए। हम भरी।
- 29:37दुनिया में तनह हो गए तुम न जाने किस यहाँ में खो।
- 29:56उसने कोई जहर निगल लिया था और जहर अपना काम कर गया था।
- 30:00जैसे ही बेटा और उसकी धर्मपत्नी घर पहुंची उसकी माँ को तड़पते हुए
- 30:10पाया। उसने पूछा लेकिन भोस नहीं थी कुछ
- 30:17न भोस की सिर्फ आँखों में इन्हें देख कर एक चमक जुबान से कोई शब्द?
- 30:38पुत्र ने पांव में से रख दिया, उसकी धर्मपत्नी ने पांव में से रख
- 30:45दिया। अब कोई प्रतिकार नहीं लेकिन उसकी
- 30:50आँखों में थोड़ी सी चमक, आशीर्वाद का भाव।
- 30:55मरते मरते गहन संतुष्ट पुत्र ने हाथ उठाया, अपने सिर पे रख लिया।
- 31:10उसके धर्मपत्नी ने हाथ उठाया, अपने सिर पे रख लिया और दोनों ने
- 31:17उसके पांव में अपने सिर रख दिए। और वह स्त्री प्राण त्याग
- 31:33एक करुण गाथा की समाप्ति हुई। पुत्र को पता नहीं उसकी माँ कौन,
- 31:41उसका पिता कौन? और माँ को पता नहीं उसका पुत्र
- 31:49कौन राजा बन या किसी देश का उस देश की रानी संग आई एक राज़ को
- 32:02दिल में दफन की है? वह चल बसें उस बेड़े में बहुत से
- 32:18लोग साथ आए बड़े बड़े फौजी बड़े बड़े जर्नल।
- 32:27बड़े बड़े योद्धा उस राजा के साथ थे संग थे गर्म तो देख के हैरान
- 32:35था। ये वो ही पुत्र है जो गदियों में
- 32:40हमारे बच्चों के संग खेला करता था सुना अब ये राजा हो क्या है?
- 32:47ये रानी है उस मुल्क की लेकिन उसे नहीं पता ये मेरी माँ कौन है उसे
- 32:54नहीं पता मेरा पिता कौन? और सच पूछो तो इस स्त्री को भी
- 33:00नहीं पता उसका पिता कौन एक वैशव का पता होता है।
- 33:07कि उसका पिता कौन है? लेकिन जो भी है, गुणवान है,
- 33:14धैर्यशील है, फिर बुद्धि है, जो भी है जल्दी से संस्कार किया।
- 33:26आसपास होश खड़ी नहीं सलामी दी, शस्त्र झुकाए भारी मन से घर में
- 33:37अब अचानक ही याद आई उस सरपंच के। उसके घर जम उसके घर चल पड़ा।
- 33:48इतना लाल लश्कर लेकिन पता चला उसके पुत्र से सरपंच नहीं था।
- 34:03पूछा सभी पहचान गए अरे ये तो बच्चा था यहाँ से गया जी इतना
- 34:12बड़ा हो गया, इसके साथ इतनी पलटूर ये कहाँ से आयी?
- 34:18ये कौन है? पता लगा कि यह किसी मुल्क का राजा
- 34:22बन गया है और ये इसकी धर्मपत्नी रानी तो उनके पुत्रों ने कहा
- 34:31सरपंच बहुत है तुम्हारे नाम? 500 एकड़ जमीन दब गए जब पुत्री के
- 34:37हिस्से में आती थी ये इसके पुत्र। पुत्री से तो क्या ये मेरे पिता
- 34:47से नहीं, ये तुम्हारे पालक पिता से गर्ज मेरे पिता को?
- 34:58पता नहीं। वह वापस नहीं लौटा।
- 35:04इस कहानी का अंत कैसे करो? कहानी सच्ची है, बिल्कुल सच्ची है
- 35:14बताऊँगा। किसी पिछले जन्म की कहानी पिछले
- 35:29जन्म की स्मृतियों में जा रहा था, तब ये कहानी सामने आयी।
- 35:36आज मन हुआ 3 मई है। 3 मई को पहला प्रवचन मेरा आया था।
- 35:42आज 5 साल हो गए। मुझे बोलते हैं निरंतर वहीं पांच
- 35:47पांच का वक्त कभी खुदाई नहीं की। निरंतर बोलता रहा।
- 35:57और हृदय के यंत्रण को गहराइयों से बोलता रहा रोज़ अपने भीतर जाता,
- 36:02इसी बहाने से तुमने बड़ा पुण्य किया तुमने सुना मैं आभारी इस
- 36:13बहाने अपने भीतर छलांग लगा लेता हूँ।
- 36:17अपनी मस्ती में खोए रहता है और पांच वर्ष कब बीत गए पता न चला।
- 36:28आज पांच वर्ष पूरे हुए हैं। ना पुत्र को पता मेरा पिता कौन और
- 36:44ना माँ को पता के उसका पति कौन और ना माँ को पता के उसका पुत्र भी
- 36:52राजा हो गया है किसी देश का। यह व्याख्या से भरी कहानी मेरे
- 37:02हृदय को चीर जाते हैं, यह सत्य है।
- 37:10घटना बिल्कुल सत्य है। समृतियों के उस छोर से आई है
- 37:15घटना, जो मैंने अपने पूर्व जन्मों में देखी कौन क्या कहा कुछ पता
- 37:30नहीं, लेकिन मैं सब जानता हूँ। सरपंच भी गया।
- 37:53उस पुत्र ने सारा घर खंगाल दिया। सब था घर में सब था।
- 38:01कहीं नमो निशान में कोई पत्र नहीं छोड़ा, वह कैसी मरी यह भी ना पता
- 38:08चला। वह क्या खा गई?
- 38:10जब भी कुछ पता नहीं चला इतना पता सी कमिटेड सो सर्च, अब छत्र छाया
- 38:18ना रही सर पे तो जीना किसके लिए जीना क्यों?
- 38:30लेकिन तुम हिम्मत ना खासा। अगर ऐसा कुछ आ जाए तो जो अपने आप
- 38:40को भगवान भरोसे छोड़ देता है, भगवान उसका अवश्य कल्याण करता है।
- 38:50ईश्वर जो कुछ करता है अच्छा ही करता है।
- 39:00ईश्वर जो कुछ करता है, अच्छा ही करता है।
- 39:08मानव तू परिवर्तन से काहे को डरता है मानव तू परिवर्तन से काहे को
- 39:20डरता है? ईश्वर जो कुछ करता है।
- 39:27अच्छा ही करता है मानव तो परिवर्तन से काहे को डरता है
- 39:37तुम्हें बता? दूँ।
- 39:38ये बात ये उसके लिए अच्छा करता है जो उसके हाथों में सौंप देता है।
- 39:46अपने नाव की पतवार नाव की पतवार तुम अपने हाथों में रखोगे और
- 39:53जवानी कलामी कागजी, तुम कहोगे कि पतवार तेरे हाथों में तो फिर वह
- 39:59नहीं सौंपेगा अपने हाथों में सारी कमान को, फिर जो करेगा वह वो नहीं
- 40:05करेगा वह तुम करोगे। और उसका फल भी तुम ही भोगोगे यही
- 40:10है जवाब तुम्हारे प्रश्न का तुमने कहा पुत्र करता कौन?
- 40:19जो उसके भरोसे उसके लिए वही करता पूर्ण समर्पित भाव से जो उसका हो
- 40:24जाता? उसका वो ही कर्ता और जो
- 40:27पूर्णसमर्थ बाप से नहीं होता। कागजी लफ्जी उसका होता है तो वह
- 40:35कागजी होता है और वह हृदय की जानत है।
- 40:43घट घट के अंतर के जानत। भले बोरे के पेड़ पछाने तुमने
- 40:48समर्पण किया, हृदय से किया या खोपड़े से किया, वह अच्छी तरह से
- 40:53जानता है। तुम्हारा अस्तित्व झुका कि
- 40:56तुम्हारा शरीर झुका सर्कस की भाँति वह अच्छी तरह से जानता है
- 41:00तुमने नमाज़ की हृदय से की या तुमने शरीर से की?
- 41:05ये दोनों में बड़ा अंतर है। तुम नमन पे हुए लेकिन तुम्हारे
- 41:11शरीर ने सर्कस की तरह झुका या तुम हृदय से नमन हुए फिर तो शरीर भी
- 41:17नाज़ुके तो कोई बात नहीं चलेगा। जब से दुनिया बनी है तब से रोज़
- 41:27बदलती है, जोश है, आगे यहाँ है वो कल आगे चलती है।
- 41:40जब से। दुनिया बनी है तब से रोज़ बदलती
- 41:47है। जोश।
- 41:50है आज यहाँ है कल वो आगे चलती है। देख।
- 42:00के अदला बदली को। देख के।
- 42:05अदला बदली को क्यों आहें परता है, आहें परता है।
- 42:16देख के। अदला बदली को क्यों आहे?
- 42:21बरता है ईश्वर जो कुछ करता है, अच्छा ही करता है।
- 42:33मानव तो पल बर्तन से काहे को डरता है?
- 42:41जब नैया की पतवार उसके हाथ में सोंक दी, फिर मत देखना क्या
- 42:45सर्कमस्टैंसेस बनाए उसने जो बनाए स्वीकार कर लेना?
- 42:51अच्छे बनाए, बुरे बनाए हमारे हिसाब से बनाए, लेकिन तुम अपने
- 42:56हिसाब से मत देखना इन सर्कमस्टैंसेस को पता नहीं उसके
- 43:04इतिहास में क्या लिखा है तुम्हारे लिए उसके हाथों की कलम?
- 43:10तुम्हारे लिए क्या चलती है वो जाने तुम सौंप दो अपने जीवन की
- 43:15भागदौ अपने नाव की पतवार उसके हाथों में फिर वो जो करें वह शोभा
- 43:22फिर तुम मत देखना काली घटा है के बादल बरस रहे हैं के गरज रहे हैं।
- 43:30कि श्वेत है बदरिया या सूर्य निकला या धूप नहीं खिली तो मत
- 43:38देखना इन सर्कमस्टैंसेस को मत देखना बस तुमने सौंप दी तो तुम
- 43:44निश्चिंत हो जाना, फिर उनके परिणाम भी मत देखना।
- 43:49जो होता है ठीक होता है। इसे कहते हैं समग्रता से पूर्ण
- 43:53समर्पण जो होता है फिर ठीक होता है, लेकिन उनके लिए जिन्होंने
- 44:01अपनी बातों को तुम्हारी नाव की पतवार वो तब संभालेगा।
- 44:12जब तुम खुद छोड़ दोगे यही मनुष्य के जीवन की दुविधा है, वह अपने
- 44:23नाव की नैया की पतवार खुद पकड़े रखता है।
- 44:28और कागजी लफाजी शाब्दिक रूप से उसके हाथों में दे देता है।
- 44:35मैं तेरी शरण में आया मैं तेरी शरण में आई जाते कहाँ हो तुम
- 44:42लफाजी और कोरी लफाजियों से तुम भी शुभ हो ना?
- 44:47सोने के महल बना लो, सोने के लंका बना लो, रावण की तरह होगी न वो
- 44:57कोरी लफाजियों से कुछ हाल नहीं होता और तुम नहीं तो संसार में
- 45:01चलेगा, चल जाता है। यहाँ मूड हो की ये ज्यादा कीमत है
- 45:08परमात्मा बहुत सयाना, उसने तो कणकण अपने हास्य सृजन किया।
- 45:15उसको तुम इतना मूर्ख न समझना, उसने कणकण अपने हास्य पैदा किया।
- 45:22वह तुम्हें अच्छी तरह जानता है। कि तुमने लफ्जी की या तुमने अपनी
- 45:32आत्मा को समर्पित किया उसके चरणों में?
- 45:36इसलिए वो कहते हैं लफ्जी को छोड़ो, ये धर्म तुम्हारी लफ्जिया
- 45:42है। शब्दों की तबदीली शब्दों की
- 45:48तबदीली से कोई तुम्हारे जीवन की तबदीली नहीं होती नाम बदलो नाम
- 45:54बदल लो ईश्वर रख लो और दा रख लो गॉड रख लो राम रख लो रहीम रख लो
- 46:00कुछ रख लो। वह गुरु रख लो, सतनाम रख लो, नाम
- 46:06बदल दो लेकिन इससे जीवन बदल जायेगा, इसकी कामना ना कर लो।
- 46:14तुम यही करते हो और फिर कहते हो बाबा मैं दुखी हूँ।
- 46:23दुख सुख आते रहते हैं। दुख सुख।
- 46:28आते रहते हैं सबके जीवन में। पतझड़ और बहारें दोनों जैसे गुलशन
- 46:44में दुःख, सुख आते रहते हैं यहाँ सबके जीवन में।
- 46:55पतझड़ और बहारे दोनों जैसे गुलशन में दोनों जैसे गुलशन में।
- 47:13चढ़ता है तूफान कभी तो कभी उतरता है चढ़ता है तूफान कभी तो कभी
- 47:26उतरता है, कभी उतरता है। देख के।
- 47:35अदिला बदली को क्यों आहें भरता है, क्यों आहें भरता है?
- 47:45अगर तुमने उसके चरणों में से रख दिया तो हालात बदलेंगे।
- 47:52तुम उसमें मीन में एक मत करना। यह मीन में एक शिकायत है, फिर
- 47:58तुमने कुछ नहीं बदला फिर तुमने अपनी नैया की बतवार उसके हाथों
- 48:03में सौंपी अपने ही हाथों में रखी और तुम अगर दुखी हो इसको एक
- 48:08मापदंड ले लेना। इसको एक मापदंड ले लेना, अपने नाव
- 48:14का पतवार उसके हाथों में अदृश्य के हाथों में सौंप देना जो तुमने
- 48:19देखा ही नहीं बहुत बड़ा साहसी काम है जीसको तुमने देखा उसके ऊपर
- 48:25विश्वास होगा। जीसको तुमने जाना ही नहीं, कभी
- 48:30पहचाना ही नहीं उसके हाथों में कैसे सौंपोगे यही मुसीबत है तुम
- 48:39अनजान के हाथों में कैसे कमांड दे दोगे?
- 48:44कोई जहाज का फायदा अनजान को अपनी कुर्सी पर बैठाता है।
- 48:48तुम चलाओ जहाज का रिस्क है, सैकड़ों यात्रियों का रिस्क है,
- 48:54वह सिवा ही रिस्क तुम्हें है और तुम कहते हो क्या है समर्पण तो हम
- 48:58कर देंगे नहीं, समर्पण है तो नहीं हो पाता पुत्र समर्पण अगर हो जाए।
- 49:05क्योंकि वह अज्ञात है इसलिए समर्पण नहीं हो पाता।
- 49:10तुम ज्ञात के प्रति समर्पण कर पाते हो।
- 49:13अच्छी तरह से देख पूछ के लड़की की शादी करनी होती है।
- 49:161000 घरो से पूछोगे, इधर से पूछोगे, उधर से पूछोगे और बड़ोस
- 49:21से पूछोगे, उनके क्षेत्रों से पूछोगे।
- 49:26अपने रिश्तेदारों से पूछोगे, जाओ पूछो पड़ताल करो कैसा?
- 49:31क्योंकि लड़की ने सारी उम्र वहाँ गुजारनी, तुम्हारी बुद्धि कहती है
- 49:44पहचानो अज्ञान अज्ञात के हाथों में।
- 49:48अपने जीवन को मत सोंको यही दुविधा है शादी तो देख पूछ के कर लेना
- 49:55कोई बात नहीं, लेकिन जीवन कि पतवार पुष्कर मत करना, वह तुम्हें
- 50:02पता नहीं अज्ञात है, अनजान रही हैं उबड़ खाबड़ रास्ते हैं।
- 50:08कहीं पर्वत हैं, कहीं कटीले हैं, कहीं कांटे बिछे, कहीं कांच बिखरा
- 50:16सब जगह से तुम्हें चलना होगा वहाँ भी लहू वाहन हो जाएंगे सब होगा
- 50:22लेकिन तुमने सीबी नहीं मरने भगवान राम की तरह है।
- 50:29छोड़ दिया, सिंहासन को पल में होना ठहराय तिलक हो गया वनवास
- 50:38पूर्ण हृदय से स्वीकार किया। ठीक है हम बनवास जाएंगे।
- 50:44ऐसा है तो ऐसा कोई बात नहीं चलेगा।
- 50:49जीवन यहाँ भी गुजर जाएगा और जीवन वहाँ तो बड़ी मस्ती में गुजर
- 50:53जाएगा। संतों के दर्शन करेंगे जो एकांत
- 51:01कुठियों में बैठे अपने अंत में। अपने होने का आनंद ले रहे हैं,
- 51:05उनके चरणों में जागरा जाएंगे। अद्भुत संत बैठे हैं राजा बनकर तो
- 51:11शायद मैं कहीं ना जा पाऊंगा बंध जाऊंगा, देखने की कला है यही जीने
- 51:19की कला है। देखने की कला नहीं तुम्हारे मन
- 51:24में बुद्धि में तो फिर जीने की कला भी नहीं है।
- 51:29राम के देखने की कला पड़ी है पल भर में ठोकर कहाँ मारते हैं?
- 51:37वह पल भर में एक्सेप्ट करते हैं, वनवास को और राज़ को ठोकर नहीं
- 51:41मारते। वो कहते ठीक चलेगा, अज्ञात पे
- 51:47छोड़ देते हैं और अज्ञात पे छोड़ देना ही क्या है धर्म अज्ञात पे
- 51:57छोड़ देना ही धर्म है तुम जिनको धर्म कहते हो, वो तो ज्ञात है।
- 52:02उनके तो सबके अपने अपने ज्ञात नक्शे हैं।
- 52:05इन शास्त्रों को नक्शे ही तो कहते हैं ज्ञात को सोक दे ना कुछ भी और
- 52:12इसलिए तुम पहुँच ही नहीं पाते। तुम कहते हो हम दुखी हैं, तुम
- 52:17पहले संप्रदाय पूछ लेते हो कौन से संप्रदाय से क्या लेना संप्रदाय
- 52:21से? इनके अपने अपने नक्शे हैं, लेकिन
- 52:26तुम्हारा नक्शा किसी से मैं नहीं खाता।
- 52:28तुम अद्विती हो परमात्मा की इस सृष्टि में कोई दो चीजें जकसा
- 52:32नहीं होती। उसने बनाया सभी को मैंने बनाया वो
- 52:39अद्वैत है। और उसने अद्वैत की रचना की सभी को
- 52:44अलग अलग बनाया। उसने दो चीजें बराबर बराबर नहीं
- 52:52होती। जुड़वाँ जन्म लेने वाले भाई बराबर
- 52:56नहीं होते हैं। बहुत फासला होता है।
- 53:08देख के अदला बदली को क्यों आहें भरता है तुम कहते हो समर्पण हो
- 53:15गया और कृष्ण कहते हैं नहीं हुआ क्योंकि तुम अभी दुखी हो।
- 53:25मतलब सोचो ज़रा अगर अपने सर के ऊपर जो पड़ा हुआ भार तुमने जो
- 53:32गट्ठल रखा है उसके अंदर ईंटें पड़ी हैं, तुमने जो गट्ठल रखा है
- 53:35उसके भरा हुआ था तुम वो फेंकते तो हो नहीं?
- 53:42और बोझ तले दबे जा रहे हो, टांके तुम्हारी कम भर रही हैं और तुम
- 53:46कहते हो कि मैं मैं बाहर से मर रहा हूँ।
- 53:50ये बाहर कहाँ से आया? समर्पण नहीं हुआ तो बाहर तुम्हारे
- 53:55सिर पर ही रहेगा ये ईंटों का या गड्ढ़ों का।
- 53:59ये सब तुम्हारे सर के गठ्ड़ियाँ भरी पड़ी हैं तुम्हारे पाप के और
- 54:04पाप तो तुमने जन्मो में और किया ही था, ये गट्ठड़ भरा पड़ा है
- 54:08पापों का और कृष्ण कहते हैं तू इनको मुझे सौंप दे, तू कितना भी
- 54:15पापी है तू सतना है। गणिका है तू अणिका अहम् तुम सर्व
- 54:21पाप्य भव मोक्ष श्याम सूझा, बस तुझे एक काम करना तू अज्ञात के
- 54:27हाथों में सौंप दे अपने नाव की पतवार मैं तुम्हें मुक्त करने की
- 54:33जिम्मेवारी देता हूँ। हम तो हम सर्वो पाप के भयो, मोक्ष
- 54:40स्वामी पापों से मुक्त कर दूंगा, मैं तुम्हे उस आनंद में ले जाऊंगा
- 54:45जो तुमने कभी सोचा नहीं था, इतना आनंद होगा तुम सदा जीवन की
- 54:51त्रासदीयों से गुजरे हो, इन कटेले राहों पे चले हो जिन संसार कहते
- 54:56हो। अब कृष्ण कहते हैं कि नहीं तुम
- 55:04मुझे सौंप दो, दुख ही तो मानते हैं कृष्ण कृष्ण कहते हैं तो मुझे
- 55:11दुख दे दो। छोड़ दो, आंसुओं को हमारे लिए
- 55:23छोड़ दो, आंसुओं को हमारे लिए। खुशी रहो, हर ख़ुशी है तुम्हारे
- 55:44मिलिए, खुशी हुए रहो हर खुशी है। तुम्हारे लिए छोड़ दो, छोड़ दो,
- 56:02छोड़ दो, आंसुओं को हमारे लिए छोड़ दो।
- 56:14आंसुओं को हमारे लिए खुशी रहो, हर खुशी है तुम्हारे लिए।
- 56:32सर्वधर्माण प्रतिमा में कम शर्म बस पापों को मेरे पास ले आओ,
- 56:42पापों को मेरे पास ले आओ और मुक्त हो जाओ हर खुशी है तुम्हारे लिए
- 56:48तुम खुशियाँ अपने पास रखो। तुम दुख मुझे दे दो तुम खुश हो ये
- 56:59जो कांटे चुभते हैं, ये मुझे दे दे और फिर देखना जब तुम मेरे हाथ
- 57:07की कठपुतली बन जाएगा, फिर मैं तुम्हें ऐसे मुकाम पे ले जाऊंगा।
- 57:11जो तुमने कभी सोचा ना था तुमने कामना की होगी जन्नतों की लेकिन
- 57:16वहाँ जहाँ मैं ले जाऊंगा, वहाँ तो जन्नत नहीं, वहाँ तो कुछ और है।
- 57:35सितारों पे ले चलो। दिल जो जाए ऐसे बहारों में ले चलो
- 58:00आओ। हजूर तुमको सितारों को ले चलो,
- 58:11दिल झूम जा। ऐसी।
- 58:17बाहरों में। ले चलो और जो तुमको।
- 58:33बस यही है, मुझसे पूछता हूँ मैं दुखी तो हूँ सब करता हूँ।
- 58:40उसको सौंप के करता हूँ नहीं करते पुत्र क्योंकि परिणाम बताते हैं
- 58:47मैं 1000 बार कह चुका लक्षण देखना।
- 58:51कृष्ण कहते हैं, लक्षण देखना अगर लक्षण नहीं।
- 58:57तो फिर तुमने करम भी नहीं किया। जीस दिन तुम अज्ञात के हाथों में
- 59:07अपने जीवन की नैया को स्वप दोगे उस दिन तुम अहो भाव से उछलने
- 59:13लगोगे। तुम सितारों की उन बहारों में खो
- 59:18जाओगे तुम जीवन की रंगीनियां वहाँ जाकर मानोगे तो हमारे पास तो यहाँ
- 59:25कुछ भी नहीं है। महज पत्थरों की शिलाओं के
- 59:29अतिरिक्त और कुछ भी नहीं तुम इनसे टकरा कर लहूलुहान हो जाते हो?
- 59:36दर्द से भर जाता है सारा शरीर और तुम कहते हो यहाँ सुख तो है नहीं
- 59:43नहीं है सुखिया यद्यपि मेरे ही क्रिएशन यद्यपि सुख नहीं है,
- 59:51क्रिएशन में सुख नहीं। ये जान लो और क्रिएशन में सुख
- 59:58नहीं है ये जान के मेरी तरफ़ मुँह मोड़ लो और आ जाओ ये हाथ खुले हैं
- 1:00:07तुम्हें आगोश में सुनाने के लिए। तुम्हारी मुसीबत क्या है?
- 1:00:19पूछा मुसीबत क्या है? मुसीबत है कि तुम अज्ञात के हाथों
- 1:00:23में नहीं सूंघ पाते। तुम तो ज्ञात के हाथों में नहीं
- 1:00:26सूंघ पाते जीस गुरु को तुम ज्ञात कर लेते हो अच्छे से उसके हाथों
- 1:00:33में नहीं सूंघ पाती। फिर अज्ञात के हाथों में जो
- 1:00:37गुरुओं का गुरु उसके हाथों में कैसे सौंपाओगे?
- 1:00:41बस यही मुसीबत है और क्या मुसीबत है?
- 1:00:48अरे ये मत कहें न कि मैं दुख दुखी तरह हो के क्योंकि जिसने समर्पण
- 1:00:54किया। उसको सुख मिला, जिसने समर्पण नहीं
- 1:01:00किया वह तो दुखी रहेगा और तुम लफ़्फ़ा से समर्पण करते हो, ये
- 1:01:08देखो सोने की लंका बना दी नहीं नहीं, वह तो सोना छोड़ो, वह तो
- 1:01:14पीतल की लंका भी नहीं। लफाज़ियों से कुछ नहीं होता अपने
- 1:01:24कर्तव्यों से कुछ होगा वो कर्तव्य तुम्हारा क्या है?
- 1:01:34शब्दों के जाल से बाहर निकलो ये शास्त्र शब्दों के जाल में और
- 1:01:39शास्त्र किस धर्म से संबंधित है ये तो पूछो मत बस कागज का एक
- 1:01:45पुलाव कौन सा धर्म ये तुम्हारे बना है?
- 1:01:51ये कागजों का एक पुलिंदा है। इसमें ढूंढने चले सत्य जीवन मृत
- 1:01:59वस्तुओं में नहीं मिला करता भाई।