Latest / Baba ji Vijay Vats / 29 May 25 - अस्तित्व का होना जादू है या कला? संत रविदास और संत कबीर की कहानी। जब तुम जागोगे तो पाओगे कि..
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- 0:00संत रैगास और संत कबीर ये शिल्प कला अपना काम अपने हास्य करता है।
- 0:25संत कबीर जो दरिया बनते हैं और संत रैगास जूतियां बनाते हैं।
- 1:29तुम्हें जानकर बड़ी हैरानी हो गई कि ना तो रैदास ने ना कभी कभी
- 1:37सोचा नहीं कि हमारे पास ग्राहक ही ज्यादा होंगे।
- 1:50सुबह से शाम तक हमारे पास एक ग्राहक ही आते है।
- 1:59उन्होंने कभी नहीं सोचा था क्यों इसका एक मूलभूत कारण समझ लो।
- 2:12उनके अन्तश का भेदिक कोर पूर्ण या संतुष्ट था, कोई ऊहापोह नहीं थी,
- 2:24कुछ छीना छपटी कोई मांग नहीं थी। कुथल पुथल नहीं थी।
- 2:32बड़ी शांति से चैन से झूमते नाचते गाते, भीतर से प्रभु का श्रमण
- 2:42करते थे। एक जूतियां बनाता है, एक चदरिया
- 2:52बनता है बहुत से लोग बोलते तो नहीं थे लेकिन जैसे ही संत रैदास
- 3:05की बनी हुई जूतियां पहन। एक अजीब सा आनंद में घिर लेता,
- 3:20जैसे ही शांत कबीर के द्वारा बनाई गई चदरिया फोड़ते एक अजीब सा।
- 3:32आनंद उन्हें घेर लेता हूँ। कुछ लोगों को पता चलता है जो
- 3:42थोड़ा फेस्टिवल होते हैं। कुछ लोगों को पता नहीं चलता पूछा
- 3:53के इसका कारण क्या है? जहाँ संत का स्पर्श हो जाए वो
- 4:09मिट्टी भी सोना होती है। हालांकि मिट्टी और सोना दोनों ही
- 4:14उसके रूप हैं तुम्हें समझाने के लिए।
- 4:24परमात्मा के लिए जितनी सहज माटी है बनाना उतना ही सहज सोना है,
- 4:31उतना ही तुम्हारे लिए कीमतों का फर्क पड़ जाता है।
- 4:37जैसे ही वेद बुद्धि आई। वैसी ही कीमतों का फर्क हो गया।
- 4:46मनुष्य में तेजभती आती है, लेकिन जैसे जैसे वह अपने भीतर अपने
- 4:57मौलिकानु में जाता है। वेद समाप्त होता जाता है और 1 दिन
- 5:03ऐसा हो जाता है जब वह अपनी तृप्तता में खो जाता है।
- 5:11वह खुद के पास पहुँच जाता है जो उसका अपना आपका।
- 5:19दुनिया पूछ रही थी संत जी आपकी युद्धियों में ये सब क्या है?
- 5:25क्या है? हम पहनते हैं।
- 5:32और सारे बोझ का पर्व हो जाते हैं, सारी चिंताएं घटती घटती घट जाती
- 5:38हैं। कुछ लोगों ने चमत्कार देखा, कुछ
- 5:45लोगों ने देखा तो माना नहीं। और कुछ लोग इतने जड़ थे कि उनको
- 5:54एहसास ही नहीं हुआ। वही काम तुम भी करोगे चदरिया तुम
- 6:05भी बनोगे ज्योतिया तुम भी बनोगे। लेकिन उन जूतियों में रैदास का
- 6:15आनंद और शांति और तपती यह न बिखरेगी मैं कबीर की चदरिया का?
- 6:28संतोषजनक भाव बस कुछ नहीं चाहिए जैसे जैसे जिन हाथों से वह बनाएगा
- 6:46उन हाथों की तासीर संत का रोम, रोम पवित्र।
- 6:56इसलिए हमने हजरत मोहम्मद का एक बार रख लिया, सहेज के उससे बड़ी
- 7:06संपदा धरती पर कोई। क्योंकि वह उसके शरीर का अंग था।
- 7:26संत जीसको छू देगा, वह माटी भी सोना हो जाएगा।
- 7:34वह दुर्गंध भी परम सुगंध में कबीर हो जाएगी।
- 7:44पूछा ये क्यों हुआ? ये सब भीतरी तर्क पर जाने की एक
- 7:51लक्षण अगर तुम कहते हो कि हम अपने भीतर को छू लिए और तृप्तता के
- 8:05लक्षण। और सहजता का लावण्य तुम्हारे चहु
- 8:15और बिखराने तो फिर यह एक सर्कस है, तुम दिखावा कर?
- 8:27जब व्यक्ति दिखावा करता है तो समझ लेना वो भीतर से रीता है।
- 8:35थोथ चना बाजी करना रीता व्यक्ति आडंपर करता है।
- 8:45भरा हुआ व्यक्ति मस्ती से कर्म करता है, उसका कोई दायित्व नहीं
- 8:53होता, उसकी एक लीला होती है इसलिए हमने भगवान राम और कृष्ण और ऐसे
- 9:01के अवतार पर। लीला के यह उनका कर्तव्य नहीं, यह
- 9:12उनकी खेल है। बहुत से लोग सवाल कर देते हैं।
- 9:17अक्सर सभी दुनिया के सवाल और बड़े मज़े की बात है।
- 9:23जिन्होंने कुछ जाना नहीं देखा नहीं वो ही कमेंट कर देते है।
- 9:31चुप नहीं कर देते भला ये कहने वाले की परमात्मा नहीं है।
- 9:42जाकी परमात्मा है और बिना खुद के अनुभव के कितने सच्चे होंगे?
- 9:50तुम समझ सकते हो दोनों ही झूठे, जिसके भीतर परमात्मा आया।
- 10:03उससे बड़ी खुशी नहीं होती। संसार में परमात्मा परम आनंद है।
- 10:10परम हाँ, उससे बड़ी खुशी और परमात्मा परम तृप्ति।
- 10:19उससे बड़ी तृप्ति कोई इसलिए संत सदा सी कहती आयी है वह पल धन्य
- 10:33जीस पल में वो विराट हमारे भीतर उतरा।
- 10:39उस परमात्मा ने आपके भीतर अपना डेरा जमाया आसीन हुए तुम्हारे
- 10:50भीतर, इसे ही कृष्ण ने स्त्री प्रज्ञाता कहा।
- 11:00यह आनंद की वो दास्तां है तो तुम कभी समझ ना पाओगे यह आनंद की वो
- 11:11कहानी है। जब तुम्हारी समझ में कभी नहीं आए
- 11:21एक ऐसा रहस्य है जीसको तुम पी तो सकते हो, उसका भगवान नहीं कर
- 11:31सकते। जैसे ही उसकी याद आती है, कैसे ही
- 11:41रुमा रुम कुछ बिखेरने लगता है। सुगंध वह खुशबू जिसमें तृपती है
- 11:53वह खुशबू जिसमें नाच है। जिसमें संगीत है, वीणा का जो
- 12:02धड़कता भी है, लेकिन पता भी नहीं चलता उसकी खुशबू चहुँ और बिघरती
- 12:10है। हजारों साल नरगिस अपनी बेनरी पे
- 12:24रोती है बड़ी मुश्किल से होता है जब मन में दीदा बर पैदा वे जो
- 12:36देखने के योग्य है। हजारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे
- 12:43रोती मेरे पास लावण्य नहीं है नूर नहीं है मेरे पास बड़ी मुश्किल से
- 12:52होता है चमन में दीदावर पैदा। वह जो देखने योग्य है, ये बड़ी
- 13:03मुश्किल से पैदा होता है। जो तुमने पूछा पुत्र संत जीसको
- 13:19हाथ लगा दे। संत रहता वो जूती में सुगंध बच
- 13:28जाती, उसमें ऐसा आनंद भर जाता और लोगों को पता नहीं ये चीज़ क्या
- 13:36है, क्या है ऐसा जिसकी बनाई हुई जूती को हम पहन लेते हैं?
- 13:42ग्राहकों की डर न टूटते पर आस पास के जूतियां बनाने वाले ईर्ष्या का
- 13:51इसके पास ग्राहकों की कतार क्यों? और इतने बड़े बड़े धनी लोग आते
- 13:57हैं? इस सहस्य व्यक्ति में ऐसा क्या?
- 14:08इसके हाथों में ऐसा क्या जादू जो जीस चमड़े को छू देता है वो पहनते
- 14:18ही? मूव कहुई बाचार पंखु चढ़े गिर भर
- 14:26गहन गूंगा बोलने लगता है अपाहिज चलने लगता है जा सु कृपा सु दयाल।
- 14:40द्रवउ सकल का लीमा लगता है जहाँ इनके हाथ पड़ जाते हैं वहाँ सारा
- 14:52मन नर्मल। इनके हाथों में जादू है, कला
- 15:04नहीं, कला नहीं, जादू है वह जादू जीसको ये छू देते हैं सोने में
- 15:15महक आ जाती। तो कतार में टूटती है।
- 15:25कबीर के पास लोग आ जाते हैं बगज्जे राजा के यहाँ शादी 100 कम
- 15:36बज जाए। तो कुबीर कहते देखो भाई तुम्हारे
- 15:43से पहले तीन व्यक्तियों का मेरे पास वो कम है, मैं पहले वो
- 15:49बनाऊंगा, फिर आपके 100 कंबल बना दूंगा, ज़रा भी वेदनी।
- 16:01कोई पार्शियल्टी नहीं, कोई ऊँच नीच नहीं ऐसा नहीं वो राजा है।
- 16:09ऐसा नहीं कि ये प्रजा है, ऐसा ही रेत उसके साथ होता।
- 16:19बस एक बात जो रह गई जो किसी से समझाई ना गई, ग्राहक के जीस कंबल
- 16:28को ओढ़ लेता जीस चेदरिया को ओढ़ लेता उसका सारा वातावरण अस्तित्व
- 16:34महकाई तो हो जाता। और जीस युवती को पहन लेते हैं
- 16:43ग्राहक रेदास की बनाई गई उनकी चाल निराली हो जाती है।
- 16:54फिर कौवा चला हंस की चाल कौवा हंस की चाल से चलता।
- 17:01मस्तानी चाल से बाहर से देखने में तुम्हें पता न चलेगा।
- 17:12आस पड़ोस के जूते बनाने वाले कहते हैं इसमें ऐसा क्या?
- 17:18नफरत करते, घृणा करते, इसके कतार नहीं टूटती।
- 17:26अपने यहाँ कोई आता नहीं। कबीर के पास कतार नहीं टूटती।
- 17:36आस पास के जुला है खाली बैठ। और कबीर कह भी देते है भाई ज्यादा
- 17:45जल्दी है तो पास वाले से बना लो, सामने से बना लो, संत रैदास कह
- 17:55देते है, नहीं, मेरे तो दो हाथ है।
- 18:02इन दो हाथों से जैसा बनेगा, वैसा बना दूंगा।
- 18:10तुम्हें ज्यादा जल्दी है तो आसपास दुकानें और भी हैं।
- 18:14तुमसे बनवा लो, लेकिन वो बात कौन है?
- 18:27संत रैदास के हाथ में उसका पूरा अस्तित्व समझ जाता है।
- 18:34संत रैदास जब जूती बनाते हैं तो जूती नहीं बनाते हैं।
- 18:42संत रैदास का सारा अस्तित्व उस जूती में समा जाता है।
- 18:47मैंने आपसे बताया था कर्म करने की कला कर्म करने वाला न बचे वस्तु न
- 19:00बचे, कर्म ही बचे। बस कर्म ही बच जाता।
- 19:10उनके हाथों में कोई कला न थी, लेकिन जादू था और यह है जादू न तो
- 19:19मैं समझा पाऊंगा न तुम कभी समझ पाओगे।
- 19:24यही वडम्बना है। इस रचना की यही वडम्बना है।
- 19:29इस रचना के सृजन हाथ को नहीं समझाया जा सकता।
- 19:41अक्षर हूँ या ईशा? वेद हो या क्षृतियाँ हो, पुराण हो
- 19:52या बाइबल, गीता ग्रंथ कुरान, ये शब्द उसको बताने में कभी।
- 20:03समर्थ न हो पाएंगे, क्योंकि शब्दों में वह जान है शब्दों में
- 20:11कला है जादू और मैं बात करता हूँ जादू की जादू है चमत्कार।
- 20:21ये तुम आस पास का सारा दिख रहे हो, ये कोई कलाकारी नहीं है।
- 20:26यह जादू संत जीसको हाथ लगा देता। वह मट्टी होती तो सोना हो जाता,
- 20:45वह दुर्गंध होती। चमड़ेगी तो सुगंध में बदल जाती
- 20:50है, इतना रहस्य रहता है राजधानी दिखा यहाँ क्या है दूर दूर तक
- 21:01चर्चा होने लगी। रहदास की जान राजघराने से भी आते
- 21:08हैं मेरा भी अब। अपना इक तारा लेके बजन गाती है
- 21:16बड़ी मस्ती से सोच कैसा दृश्य होता है इतने साल पुरानी इतिहास?
- 21:30जब राजस्थान की सभ्यता में स्त्री का घूँघट तब वो नंगे सर चढ़ते
- 21:45नंगे पांव तोड़ती राजघराने की वो रानी विधवा थी।
- 21:54लेकिन सोती बूटी खो चुकी थी। काश काश तुम्हारी भी सुधी बूटी
- 22:07खोजा। तुम भी इस मकान पे पहुँच जाओ जहाँ
- 22:14तुम्हारी बुद्धि शून्य हो जाती है, मन ठहर जाता है जहाँ उस गुलशन
- 22:32की महक तुम्हें किसी और लोक की यात्रा कराती है।
- 22:44तुम भूल जाती हो हम कह तुम्हारा दुख और कोई दुख नहीं तुम्हारा दुख
- 22:52है कि तुम जीस संसार में हो, उस संसार से परे भी एक चीज़ है।
- 23:01तुम संसार को तो अच्छी तरह जानें लेकिन काश तुम वो मुकाम भी जान
- 23:10पाते जो संसार से पार है और तुम्हारे बीते है जो व्यक्ति इन
- 23:17दोनों फलक दिल के फलकों को देख लेता है।
- 23:23उस व्यक्ति के भीतर कला नहीं जादू आ जाता है।
- 23:29वो बोलेंगे तो जादू, वो चलेगा तो जादू वो कोई भी काम करे जादू।
- 23:40जहाँ से गुजर जाएगा वातावरण महकई हो जाएगा।
- 23:49यह वो जादू है जो तुम्हारे ही अंत में आता है अंत से आया हुआ जादू।
- 24:00तुम इसको खोज नहीं पाए? मृक की नाभि में होती है कस्तूरी
- 24:08पर कस्तूरी की सुगंध बड़ी प्यारी होती है मिठ मृक को पता नहीं
- 24:15होता। मृग उस आनंद को चखता है।
- 24:21तुम भी चखते हो, तुम्हारे ही गांठ में है वो और तुम्हें बड़ा मज़ा
- 24:30आता है उसे चखते। लेकिन अफसोस तो इस बात का कि
- 24:36तुम्हें पता नहीं चलता ये आता कहाँ है?
- 24:41तुम उसके मूल उदगम स्रोत को ढूंढ़ते हो, कभी धन में, कभी पदवी
- 24:49में। कवि प्रतिष्ठा में, कभी स्त्री
- 25:00में, कभी पुरुष में, कवि पदार्थों में लेकिन तुम्हें?
- 25:10वह नहीं मिलता। बस तुमने एक वाहन नहीं ढूंढा जहाँ
- 25:20वह है। यही मृग की तकलीफ कबीर कहते हैं।
- 25:28यही तकलीफ है हिरन की मृग की। कि उसकी नाभि में कस्तूरी कस्तूरी
- 25:36कुंडल वस्ता है। मेरे गुड्डूंडा है मान अम्मा मैं
- 25:45ढूंढनी तो पड़ेगी इतनी प्यारी और लम्हे सबके जीवन में आके।
- 25:53कोई से वंचित नहीं रहता। सबके भीतर है।
- 25:58तुम चाहो तो उस सुगंधित को सारे दिन भर रात चकते रहो, सूंघते रहो,
- 26:09तुम चाहो तो सदा के लिए उसे छोड़ दो।
- 26:18ये तुम्हारी चाहत है इसको तुम उसका खेल भी कह सकते हो लेकिन ये
- 26:26तुम्हारी समझो में ये बात आई थी। समझ ऐसी तर्क की तलवार है।
- 26:42कि वह यथार्थ को देखने नहीं देते, यथार्थ से बहुत दूर रहते तुम हर
- 26:50चीज़ को समझना चाहते हो, जबकि समझ तुम्हारी कुछ भी नहीं है।
- 26:56अब ज़रा देखो। तुम कहोगे बड़ी महक आ रही है मेरे
- 27:01यहाँ पर लोग आ जाते हैं बाबा ये खुशमुखा से आ रही है मैंने कहा
- 27:05इतर छिड़का है बेटा वो तो है लेकिन दूर करके जाएगी, हम घर तक
- 27:13जाएंगे तो घर तक भी साथ जाएगी, वो क्या है?
- 27:18फिर हम ध्यान में बैठ जाते हैं, वहाँ भी कभी कभी बिलकुल यही कुछ
- 27:22हुआ तो मैं कहता हूँ पुत्र ये तुम्हारे भीतर से आती है, यहाँ
- 27:30आकर तो सिर्फ प्रगति करना होता है।
- 27:37जिसे कोई गुरु बता दे के हे मृग जीस कस्तूरी के लालसा में पीपासा
- 27:47में तू मण मण भटकता फिरता है, और ठहर जा और देख वो तो तुम्हारी ही
- 27:55कुंडल में वसी है। तू कहीं दूर नहीं है थोड़ा सा जाग
- 28:04थोड़ा सा ठहर थोड़ा विश्राम कर और तू पाएगा विश्राम करने में जो
- 28:14मज़ा। वो दौड़ भाग में नहीं है कहीं भी
- 28:23भाग ले जो सो के चरजू दे चुहारे ना बल्क ना।
- 28:33हाँ कौन है तेरा मसाफिर जाएगा कहाँ वहाँ कौन है तेरा मसाफिर?
- 28:52जाए कहाँ दम ले ले तू घड़ी चिछियां पायेगा कहाँ वहाँ कौन है
- 29:07तेरा? कहीं तेरा कुश्ने संसार के इस छोर
- 29:18से उस छोर में चले जाना कहीं तेरा कहीं कुश्ने तेरा तुझे में ही
- 29:32तुझे मिलेगा। वहीं से होगा आगाज और वहाँ से
- 29:39आगाज करके तो पायेगा कि सब मेरा है, बिना स्वयं के अस्तित्व को
- 29:47जाने सारी दुनिया को खंगालो कुछ नहीं हाथ लगेगा।
- 29:57और स्वयं को अस्तित्व को जानकर तुम कहीं भी चले जाओ तुम्हें सब
- 30:03अपना सा लगेगा, कुछ विज्ञान नहीं, यही यादों है ये कलान।
- 30:12यही जादू है। कबीर में यही जादू है परे दास यही
- 30:19जादू है सभी श्रुति प्रकाश तुम्हारे सभी के वितरीय जादू है
- 30:31तो? उभर जाए।
- 30:34यह सबके भीतर न कम, न बत्ती सब में यकसा है।
- 30:45यह बात तो सफुरित होने की है बात तो।
- 30:52बाहर दिख जाने की है। प्रगटी करने की बात प्रगटीकरण से
- 31:00पहले तो तुम दुर्गन्ध हो। प्रकटीकरण के बाद तुम्हारा रोवा
- 31:09रोवा सुगंध में भर जाता है। यह अजीब सा जादू है जो तुमने
- 31:17पूछा। पुत्र उनके हाथों में जादू है
- 31:24जीसको छू देते हैं। यह माटी भी सोना बजाती है और
- 31:33तुम्हारी बुद्धि ऐसी कनुष्टता है ऐसा श्राप है।
- 31:41बुद्धि श्राप है। तुम्हारा अंत से वरदान है बुद्धि
- 31:52जीस चीज़ को छू देती वो सोना भी माटी हो जाता बुद्धि जानती है
- 32:00काटने, छांटने की कला और उसे कुछ भी नहीं आता।
- 32:06और तुम्हारा अंतःस जानता है सुई दागे की वो कला जो टूटे फूटों को
- 32:13जोड़ देती है, बस इसी कला के कारण वह भीतर का अस्तित्व जादू कहलाता
- 32:23है और तुम्हारी बुद्धि। कलाकार कहलाती है कलह सब चीजों को
- 32:34काट देती है। तर्क की तरह मैं कल एक शब्द को
- 32:43सुन रहा था। मुझे बड़ी हैरानी हुई।
- 32:51कष्ट भी हुआ है। कोई व्यक्ति बहुत दूर से आया और
- 33:00वह फटे पुराने कपड़ों में बैठा वृक्ष के नीचे बैठा छोटी सी
- 33:08चारपाई पे। नाम तो मैं उसका नहीं जा रही और
- 33:16कोई पूछ रहा है कि भीतर से नाद बज रहा है, बड़ा प्यारा है तो उस
- 33:26व्यक्ति का संवाद सुनकर मुझे झटका लगा।
- 33:34मैंने सोचा। ऐसे ही लोग अगर धरती पे आते
- 33:39रहेंगे तो धरती पहले से ही नर्क है।
- 33:45इससे ज्यादा और नर्क क्या बनेंगे? और इसको नर्क बनाने में ऐसे ही
- 33:51लोगों का योगदान रहा। गत्ते ये तो दिखाओ कहाँ है आनंद
- 34:00नाद दिखाओ कहाँ है अब उसको तो हो रहा है इसको नाद की आनंद की खुशबू
- 34:11हर पल हर घड़ी 2400 घंटे। आठों पहर यह तृप्ति भरी हुई आवाज,
- 34:27यह खलक की आवाज भीतर से खालक की आवाज इसे सुनाई पड़ती है।
- 34:34जिसका रोवा रोवा इसको सुनकर मंत्र मुग्ध हो जाता है।
- 34:38वो कहते है, दिखाओ इसको कह मैं उससे क्या कहूं, मैं तो दूर बैठा
- 34:45हूँ पर वो पता नहीं कहाँ बैठा चार भाई के ऊपर?
- 34:53बिखेर रहा है अपने तथाकथित ज्ञान की बात मुझे समझाया क्या ये धरती
- 35:06स्वर्ग की उस महत्त्व खुशबू से क्यों चूक गई?
- 35:11क्यों इतनी दुर्गांधा? आज फैल गई वातावरण में चहुं कोनों
- 35:17में दुर्गंध ही दुर्गंध है। तुम उसे समझाया के ऐसे गुरुओं के
- 35:22कारण भले इसको कोई चोट की भर लें। ज़ोर की चूट की भर ले दांतों से
- 35:34खा जाए वो चिल्लाएगा तो फिर इससे पूछें ये कहाँ है दर्द की, ज़रा
- 35:46दिखाओ हमें निकाल के। दर्द हुआ तुम्हें हाँ हुआ चुटिया
- 35:55काटी, दांतों से काटा, दर्द हुआ तुम्हें महसूस हुआ ना हुआ दिखाओ
- 36:03हमें कहाँ? लेकिन क्या करें बिचारा इतने दूर
- 36:10से आए उसके भीतर खुद हुआ नहीं मैं रोज़ कहा करता हूँ इन आचार्यों की
- 36:21बात मारकस की बात। चरवा की बात जो देखा नहीं, वह
- 36:28होता नहीं कहता मुझे तो कभी भगवान यह तो दिमागी बिमारी भी हो सकती
- 36:36है, हो सकती है तीन इंडस की बिमारी होती है, दिमागी नहीं।
- 36:43ये कानों की बिमारी होती है। अब इसको कौन समझाए और ये लोगों को
- 36:52समझाने लगा। एक बात तो पक्का इसने अपनी जिंदगी
- 36:56को खराब कर ली। ये बात अलग है।
- 37:06तो परमात्मा की पाठशाला बंद नहीं होती।
- 37:13इस बार मौका चूक गए तो मौके बहुत दाता दे लैंदा थकपा जुगा जुगांतर।
- 37:29उसका मृत प्रसाद तुमपे बरसता ही रहेगा तुम चूके चूके जाओ कितनी भी
- 37:37बार वह प्रसाद को लुटाना बंद नहीं करेगा।
- 37:44तुम तर्क की बुद्धि की तलवार से चुक जाओगे, लेकिन वह उसकी दया
- 37:52बिखरनी नहीं चुकेगी वह तो अपनी दया को सदा बिखेरता है तो मुझे
- 37:59हैरानी हुई होगी। आनंदनाथ की वो आवाज, उसका आनंद
- 38:07बेचारे ने किया नहीं तो वही फॉर्मूला जो मैं रोज़ आपको समझाता
- 38:15हूँ, जो हमने नहीं देखा वो होता नहीं।
- 38:22भला ये कैसा तर्क तुम्हारी झूठ की भर लूँ?
- 38:27तुम्हें दांतों से खा जाऊं तुम कहो दर्द मैंने कहा मुझे तो कभी
- 38:32पता नहीं, मुझे तो दर्द हुआ नहीं, वो होता ही नहीं दिखाओ कहाँ?
- 38:42लेकिन कुछ लोग मेकअप को बहाना बना लेते है।
- 38:50कुछ लोग दर दर तब फटी हुई कमीज़ डाल रखी।
- 38:55उसने लोग क्या क्या सर्कस करते है?
- 39:04बोला मुश्किल क्या है अगर तुम नया कुरता पैजामा डाल लोगे तो मुश्किल
- 39:14क्या है? क्यूँ फटा हुआ डालते हो किसी के
- 39:18पास में चले जाओ। कुर्ता पजामा तो दिलवा ही देगा
- 39:22ऐसा ठगी वगैरह मारने की जरूरत क्या है?
- 39:27और कुछ ही दिनों में इसका मुकाम पागलखाना होना चाहिए।
- 39:33तुम देखोगे इसके पांव पूजे जाएंगे।
- 39:39यह कलयुग की महानता ठीक ही कहा तुलसी ने कलयुग केवल नाम अधारा,
- 39:50सुमर सुमर नर उत्तर ही परा। यह व्यंग्य है।
- 39:57कलयुग में नाम के सहारे से ही लोग पार हो जाएंगे।
- 40:01यह एक मजाक है तुम्हारे साथ न जाने तुलसी ने किन सतर्क शब्दों
- 40:14में जाके। सत्य के मुकाम पे जाके ये शब्द
- 40:21बोल दिया कि ऐसा कलयुग आएगा कि तुम शब्दों से ही तर जाओगी शब्दों
- 40:28के होंगे। अलफ़ाज़ों की होंगी किश्तियां
- 40:32अलफ़ाज़ों की होंगी जहाज? और तुम उन में उड़ोगे और तुम उन
- 40:39में सवारी करोगे, लेकिन तरोगे नहीं डूब जाओगे मैं तुलसी कहती
- 40:48हैं, सुमर सुमर नर उतर ही पा रहा। तुम सुमरोगे तुम जाप करोगे और तुम
- 41:00पार उतर जाओगे, लेकिन काल्पनिक रूप से स्वाद तो कल्पना का भी
- 41:09होता है, तुम्हें सुंदर स्वप्न आ जाए।
- 41:16तुम बड़े खुश होते है, हालांकि सोपन और सोपन में सत्य नाम का कुछ
- 41:25भी नहीं होता चित्रों के अलावा, लेकिन जब जागोगे तो पाओगे।
- 41:37कुछ तस्वीरें थी थिंग कहाँ गई, खो गई एक तो ऐसी भी व्यवस्था है।
- 41:58कि तुम स्वप्न में जो रंग देखे, जागोगे तो पाओगे वो खो गए।
- 42:05इससे उलट भी बात बड़ी मजेदार है। तुम हो तो राजा।
- 42:14ध्यान से सुनना मेरी आखिरी बात कौन हो तो राजा गालों में हीरे
- 42:23जहरातों के हार पड़े हैं सिर पे मोरू मुकुट है हाथों में।
- 42:35हीरे मोती, युक्ता आभूषण, लेकिन अगर तुम सो गए और सोकर तुमने सपना
- 42:51देखा कि तुम दरिद्र हो गए। कहाँ गया वो मौर मुकट कहाँ गया वो
- 43:01हाथ का हीरे मोती युक्त कंगन कहाँ गया गल का वो हार कहाँ गई वो
- 43:12तुम्हारी राजशाही लोभास खो गई। और तुम चिल्लाओगे मैं राजा था ये
- 43:24द्रिद्र हो गया आज कहाँ खो गया मेरा सब कुछ ये दो अवस्थाएँ होती
- 43:33हैं। तुम दूसरी तरह के आदमी हो, तुम हो
- 43:44तो परमात्मा स्वप्न आ रहा है दृढ़ता, स्वप्न में तुम दृढ़ता हो
- 43:54गया। स्वप्न में तुम्हारी खुदाई छीन ली
- 44:06तुम भिखारी हो गए हो तो सम्राट सम्राट होते हुए कुछ सो जाए।
- 44:17भिखारी हो जाए, सपना आ जाए दर दर मांग रहा है।
- 44:21हाथ में कटोरा एक दूसरा भी है, है तो विकारी सपना आया रंग बरंगे
- 44:36जहाजों में उड़ रहा है। सुमर सुमर नर उतर ही पा रहा राधे
- 44:46राधे करते रहो सब ठीक हो जाएगा। यह स्वपन में अमीरी जैसा बात है,
- 45:03यह तुमने काल्पनिक अमीरी बना ली वस्तु त अमीर हो तुम सो गए हो।
- 45:18और तुम राजा हो ये भूल गए हो सोते वक्त कभी किसी को याद नहीं रहता
- 45:22वो क्या है, कौन है, भूल जाता है वह गरीब है तो भी भूल जाता है,
- 45:35दर्द्रता भी खो जाती है। काजपनी का राजा हो जाते हो तुम
- 45:44ऐसा ही जाप है शब्दों का, बस तुम शाब्दिक अनुभूतियों में खोए खोए
- 45:52रहते हो। तुम्हें मिलता कुछ थोड़ी देर के
- 45:55लिए। जब जागते हो तो पाते हो।
- 46:01यह तो स्वपन था, लेकिन अगर वस्तु तफर दोनों में फर्क है, तो दोनों
- 46:09में फर्क किया है कि वस्तु स्थिति जो तुम वास्तव में हो।
- 46:18बस सोए रहो या जागे रहो वो नहीं खोती और जो तुम नहीं हो वो खो
- 46:30जाती है। दादू कहते हैं, दादू?
- 46:35दूजा कोनी दूजी मन की दौड़ दौड़ में टी संध्या गया वस्तु ठोर की
- 46:44ठोर तुम तो जो हो वो हो बस सो गए हो हो तो राजा।
- 46:53अभी भी तुम्हारे हीरे जवाहरात से जड़ी हुई वो माला पहनी हुई है।
- 47:01अभी भी मोरू मुकुट है, तुम्हारे सर पर अभी भी तुम्हारे हाथों में
- 47:07सोने, हीरे जवाहरात, मोती रत्न जड़ित।
- 47:13ये गहने पहने हुए हैं लेकिन तुम सो गए हो और सोए में तुम सपना देख
- 47:21रहे हो कि हम कंगाल हो गए तो दोनों में फर्क क्या?
- 47:31एक में राजा सो गया। तो बिकारी हो गया, एक में बिकारी
- 47:38सो गया तो राजा हो गया तो वस्तु स्थिति क्या है?
- 47:44वस्तु स्थिति यह है के जागने पे पता चलेगा।
- 47:51तुम्हारी असलियत नहीं मिटेगी। तुम्हारा अस्तित्व नहीं मिटेगा।
- 47:58यह मीठा सोने के कारण तुम सो गए थे, तुम कंगाल हो सो गए राजा हो
- 48:06गए तुम्हें लगाव मैं राजा हो गया। यह नाम का जप सोय होय की सम्राटता
- 48:16है तुम एक बार कल्पनिक रूप से सम्राट हो जाते हो हो जाते हो,
- 48:24लेकिन जब घर जाओगे तो पाओगे। वही कंगाल के कंगाल पेट रोटी
- 48:34मांगेगा रोटी? कल्पनाओं से नहीं मिलते है रोटी
- 48:42का निर्माण परमात्मा ने अलग से किया है।
- 48:46शब्दों में रोटी होती नहीं। शब्दों में पानी नहीं होता, ना
- 48:50प्यास बुझती है, ना भूख मिटती है, तुम चाहो तो कल्पनाओं के द्वारा
- 49:00रोटी का चित्र बना के रोटी का जाप करके तृप्त होने की चिष्ट कर सकते
- 49:06हो। लेकिन पक्का है कि पेट नहीं भरेगा
- 49:12तुम चाहो तुम्हारी मौज है चिल्लाओगे भूखा हूँ अभी भी भूखा
- 49:19हूँ जाप करके तुम कौन सा तृप्त हो जाते हो?
- 49:27कभी किसी को तृप्ति मिली तुम सारा जहान खंगाल लेना।
- 49:36पूछ ना किसी को जिसने जाप किया, किसी को तृप्ति मिली, तुम्हें एक
- 49:42भी नहीं मिलेगा। और तुम पूछना किसी स्थान से जाके
- 49:50जो किसी बौधी वृक्ष के नीचे बैठे, जिसने महीनों से कुछ खाया नहीं
- 50:00जाप की बात तो बहुत दूर? जाप जिसे करता था वो माला भी गिर
- 50:08गई भलो भयो, हरी भी सरो सर से टली बला बाद में पता चलता है ये तेरे
- 50:17को बला थी जो छिपटी हुई थी, मैंने खुद ही सहेज ली थी।
- 50:25तुम सोए हुए तुम राजा हो और कंगाल हो गए और सोए हुए तुम हो तो कंगाल
- 50:33और राजा हो गए लेकिन दोनों में फर्क कैसे पता चले फर्क ये बने
- 50:38पता चलेगा कि जब तुम जाग जाओगे। तो वस्तु स्थिति साफ हो जाए कि
- 50:44तुम वास्तव में क्या हो? अगर कंगाल हो गया और सपने में
- 50:51राजा हो गया तो जाग के पायेगा कि मैं कंगाल हूँ।
- 50:56सपना था सपने में राजा हो गया था। बस तुम्हारे जाप में राजा होने का
- 51:03एक कल्पना का प्रभाव है और तुम राजा हो सो गए हो नींद तो
- 51:15प्रत्येक व्यक्ति को आती है। और सोकर तुम कंगाल हो जाते हो बस
- 51:22तुम्हारे सारे संसार में आज यही है तुम अखंड परमात्मा का स्वरूप
- 51:35आनंद तुमसे ज़रा भी दूर नहीं गया कभी?
- 51:40लेकिन तुम सो गए हो बड़े शोक से सुन रहा था ज़माना, हम ही सो गए
- 51:48रास्ता कहते कहते है तुम सो जाते हो वो तो तुम राजा।
- 51:59तो पूछा दोनों में फर्क क्या है? दोनों में फर्क ये कि वस्तु
- 52:03स्थिति नहीं बदलती वस्तु ठोर की ठोर तुम अमीर हो, तुम गरीब हो अगर
- 52:12सो गए। तो जागने पे पाओगे, जो तुम हो वही
- 52:16हो दौड़ मिट्टी जाग खोली, संशय गया वह जो स्वपन था, वह चला गया
- 52:29वस्तु ठोर के ठोर जो वस्तु स्थिति है।
- 52:34वे वो ही रही जो सोने से पहले थी। कंगाल हो तो कंगाल रहोगे, राजा हो
- 52:41तो राजा रहोगे वह न बदलेगी, वे जान दे आप कुछ शोख जे हे।
- 52:53ए जान दे कुछ शोखज है रंग दही न तस्वीर।
- 53:13है, जान दे कुछ तो कुछ है रंगा दाहिना तस्वीर ना है जब हट गए।
- 53:33गए ज्यादा हट गए जद हट गए जद हट गए जद हट गए हँसी इश्क के दिन।
- 53:54जद हट गए हँसी पेश केजी मल कर बैठे तस्वीरां दा के कुछ दे हाल।
- 54:13फकीराधा साड़, नदियों, बिछड़ें, निराधा के कुछ ध्यान रखें।
- 54:31फकीरांदा साढे नदियाँ बिछुड़े नीरांदा ए जान दे कुछ शोख जो है
- 54:47रंगंदा ही न तस्वीरें। और तस्वीरों में उतर गए उस सुंदर
- 54:54से मन को लुभाने वाले रंगों के कुछ शोक जो है रंगदा ही न
- 55:03तस्वीरें जब हट गए 80 इश्क। जब इश्क के बाजार में चले गए ये
- 55:15जानते हुए ये तस्वीरों में रंगों की सवार कुछ नहीं होती, मल कर
- 55:21बैठे ये तस्वीर वीरांदा तो तस्वीरों में हमल कर बैठे।
- 55:29लाओ भैया तस्वीर कर दो मोर ले आए बस ऐसे ही तुम जान बूझ कर मोर ले
- 55:35लेते हो ये नाम मिलता कुछ नहीं सम्राट तो तुम हो।
- 55:48तुमसे हमारा सम्राट्य कोई नहीं छीन सकता न तुम कभी कंगाल हुए
- 55:59यथार्थ में स्वप्न कैसे हो? एक सपना है।
- 56:13जब तक सपना है, तब तक तुम रोते रहोगे, जब ये सपना टूट जाएगा,
- 56:23टूटेगा 1 दिन तो टूटेगा कब तक सोये रहोगे?
- 56:29तब तुम पाओगे? मैं कंगाल कभी हुआ ही नहीं, मैं
- 56:35तो अमृत पुत्र हूँ, कंगाल में कभी भी नहीं हुआ शिवो हम शिवो हम।
- 56:50शिवो हम शिवो, हम हमर आ तून सच्चिदानंद।
- 57:18जिसे शस्त्र काटे, नागनी जलाये। गलाए ना पानी, ना बाजु सुखाए,
- 57:39जिसे शस्त्र काटे, नागनी जलाये। गलाए न पानी, न वायु सुखाय।
- 57:57वहीं आत्मा सच द अनंद मैं हूँ। शिव हम शिव, हम
- 58:21शिव, हम शिव, हम। शिव, हम शिव, हम धन्यवाद।