Latest / Baba ji Vijay Vats / 12 May 26 - शक्तिपात का महा-रहस्य: वास्तव में क्या घटित होता है और क्यों टूट जाती है इंसान की पहचान?
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- 0:11बाबा जी प्राणों शक्तिपात के दौरान वास्तव में ऐसा क्या घटित
- 0:22होता है कि कभी कभी व्यक्ति का शरीर या मन?
- 0:29उसे सहन नहीं कर पाता। क्या उस क्षण व्यक्ति केवल किसी
- 0:39ऊर्जा का अनुभव करता है या यह अहंकार?
- 0:46भै। और स्वयं की पहचान के टूटने जैसा
- 0:50गहरा आंतरिक अनुभव होता है और यदि कोई साधक उस शक्तिपात को पूर्ण
- 1:01रूप से सह जाए तो क्या वह हमेशा के लिए?
- 1:07स्थिति प्रज्ञा अवश्य में साबित हो जाता है या उसके बाद भी साधना
- 1:15और शिथिलता की यात्रा जारी रहती है।
- 1:20आपकी पुत्री श्रेया। प्रश्न लाजवाब है।
- 1:42गुरु जो भी करता है तुम्हारी पहचान को तोड़ने के लिए करता है,
- 1:53फिर वह बोलता है। फिर वह गाता है, फिर उसका चाल,
- 2:03चलन, उसका खाना पीना सब कुछ तुम्हारे लिए अर्पण हो जाता है।
- 2:15किसी तरह तुम्हारी पहचान टूट जाए इसलिए शक्ति बात भी करता है।
- 2:31ऐसा ही शक्ति बात रामकृष्णा पर मन से क्या?
- 2:40तो यहाँ ध्यान रखना, उस शक्तिपात के दौरान तुम जीस कॉन्शसनेस लेवल
- 2:48को छू गए, वह तुम्हारा अपना नहीं है।
- 3:02वह तो सिर्फ तुम्हें राह दिखाया है ताकि तुम अच्छी तरह से समझ लो
- 3:16के हाँ, रस्ता होता है इसे सतोरी भी कह सकते हो आप?
- 3:26सतोरी में प्रमाणिकता होती है, सिर्फ अनुमान खत्म हो जाते हैं।
- 3:34अभी तो तुम अंदर जाते हो, मस्जिद जाते हो, गुरुद्वारा जाते हो तो
- 3:41मात्र अनुमानों के कारण। पक्का नहीं पता कि वह परमात्मा है
- 3:49भी कि नहीं, सुमरन भी करते हो, सब कुछ करते हो, लेकिन अनुमान के
- 3:59अधीन प्रमाण में मेरे पास। शक्तिपात तुम्हें प्रमाण तक लेके
- 4:09जाता है। पहला फर्जी हुई है पुत्री इसे ठीक
- 4:13से साफ लेना। तुम अनुमान से प्रमाण तक पहुंचे।
- 4:24और फिर जहाँ तक पहुंचे वहाँ तक का अनुभव अनुमान तुम्हें पूर्णतया हो
- 4:36गया यानी कोई तुम्हें राहत दिखाए। ऊँगली पकड़ते।
- 4:42और उस जीटी रोड के ऊपर जहाँ तक तुम्हें ले जाए, बस वहाँ तक का
- 4:47रास्ता तुम्हें याद है, फिर वहाँ से तुम वापस आ जाओ आगे का रास्ता
- 4:53तुम्हें पता ही नहीं है क्योंकि तुमने देखा ही नहीं।
- 5:01यही होता है अभिमन्यु के साथ गर्भ में अर्जुन चक्रव्यूह को भेदने की
- 5:14कला बताते हैं द्रुप्ती को। और अर्जुन बता ही रहे होते हैं और
- 5:24बच्चा तो माँ के कानों से सुनता है।
- 5:30चक्रव्यूह में प्रवेश करने की सारी तकनीक बता देते हैं अर्जुन।
- 5:40और अभिमन्यु सुन लेता है, लेकिन उसके बाद चक्रव्यूह से बाहर कैसे
- 5:50आना जब यह प्रसंग शुरू होता है। तो द्रौपदी सो जाती है और द्रौपदी
- 6:06सो गई तो द्रौपदी के कान भी सो गए और द्रौपदी के कानों से ही माँ के
- 6:18कानों से ही बच्चा सुनता है। इसलिए अनुभव अधूरा रह गया तो फिर
- 6:29चक्रव्यूह को भेदने की कला तो विमानों ने सीखी, भेद भी दिया।
- 6:34भेद चला भी गया, लेकिन बाहर आने की कला नहीं पता था।
- 6:40क्योंकि द्रौपदी सो गए थे। शक्तिपात जब गुरु करता है तो
- 6:54शिष्य जहाँ तक उस शक्तिपात को सह पाता है, अब देखो यहाँ मेरे कमेंट
- 7:02मिलेंगे। लोक वर्दी वर्दी गालियों में
- 7:07निकाल देते हैं क्योंकि मैं उनके खंडहरों को गहराने में व्यस्त
- 7:13हूँ। वह बजरंग दल के खास।
- 7:21हनुमान जी उन किृष्ठ पर मैं कहता हूँ कि हनुमान जी ज़रा पांव दबा
- 7:26दो। उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचते हैं
- 7:33और उन्होंने अपनी पहचान हनुमान के शिष्यों की तरह बना ली है।
- 7:44और मैंने इन पहचानों को तोड़ना है तुम्हारी चिपकाहटें तुम्हारी
- 7:51पहचानें बन जाती हैं यही रोग है और मैं इन रोगों को तोड़कर।
- 8:00तो मैं सुस्त करना चाहता हूँ, स्वय के भीतर स्थित हो जाना
- 8:09स्वयस्थिति सभी मान्यताएँ सभी चपका हटे।
- 8:18क्लिंगन नेसिस गुरु तोड़ता है, शब्दों से तोड़ता है, गायन से
- 8:31तोड़ता है जो विधि उसे कारगर लगती है।
- 8:38उस विधि से तोड़ता है और वह जानता है कि इसकी भावनाओं को ठेस
- 8:54पहुंचेगी और वह यह भी जानता है कि भावनाएँ इसकी गलत हैं।
- 9:01इसकी जेब कहाटे हैं। इसकी बनाई हुई है।
- 9:05सत्य ने तुमने स्वयं को शरीर माना, शरीर माना ये मेरा नाम है
- 9:19इसकी मैं पुत्री हूँ। यह मेरा निवास है, घर नंबर यह है
- 9:29स्टेट यह है देश यह यह सब तुम्हारी पहचान है, लेकिन क्या
- 9:36वास्तव में तुम्हारी यह पहचान है, यह तुम नहीं जानते।
- 9:42ये गुरु चलता है। गुरु जानता है कि इसने गलत पहचान
- 9:50बना ली और गुरु ये भी जानता है कि गलत पहचानों से जब वो टूटेगी तो
- 9:58उन्हें बड़ा दुख होगा। दर्द होगा।
- 10:01और कभी कभी तो भक्तजन ईसा को सूर्य लगा देते हैं, कभी कभी तो
- 10:08इतने क्रोधित होते हैं कि मंसूर के हाथ को उखाड़ देते हैं और
- 10:15सुखरात को जहर पीने का आदेश। बुध के ऊपर सूख जाते हैं।
- 10:26महावीर के कानों में कीले ठोंक देते हैं।
- 10:31भला उन विचारों ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था?
- 10:36यही तो कहा था। मैं ईश्वर पुत्र हूँ, लव इज़ गोट
- 10:42इसने और क्या कहा था तो मारा क्या बिगाड़ दिया उसने?
- 10:47लेकिन नहीं नफरत फैलाने वालों के लिए लव इज़ गोट नहीं है, नफरत ही
- 10:55प्रभात है। तो तुम्हारी पहचान टूटी तुम्हें
- 11:01बहुत अच्छे क्यों लगेंगे तुम्हें ईसा अच्छे क्यों लगेंगे तुम्हें
- 11:10वह जो सब बांट के चले जाते हैं सांझ।
- 11:14वह हज़रत मोहम्मद अच्छे क्यों लगेंगे?
- 11:18क्योंकि जब तुम्हारी विविशा ग्रंथियाँ में यह चीजें ठूंस दी
- 11:23गईं जो तुम्हारी पहचान बन गईं और अब ध्यान से सुनना बात को?
- 11:34तुम्हारे सारे दर्दों का, दुखों का कष्टों का, कलेक्षों का
- 11:39चिंताओं का चिंतन नाओं का मूल कारण है?
- 11:43तुम्हारी पहचान गलत है। और ये पहचान किसने दी तुम्हारे
- 11:53माँ बाप? तुम्हारी समाज ने तुम्हारी पैरा
- 12:00पैरोकारो ने मार्गदर्शकों ने और तुमने मान लिया हाँ, ठीक है, मैं
- 12:10सिख धर्म में पैदा हुआ, हिंदू धर्म में पैदा हुआ।
- 12:14मैं इसाई हूँ, मैं मुसलसल इमान मुसलमान ये सब तुमने पहचानी मान
- 12:24ली जानते तुम खुश। और तुम दुखी हो और सारा संसार
- 12:40दुखी है, सारा संसार नहीं जानता के कारण क्या है?
- 12:50एक संत तो जानता है। बस वही संत तुम्हें बता सकता है
- 13:02कि रोग क्या है, निदान क्या है? सही डॉक्टर के पास जाओगे, वह
- 13:11बताएगा रोग क्या है और वही बताएगा कि निदान क्या है?
- 13:17व्हाटस? दी डायग्नोसिस एंड व्हाटस दी
- 13:20ट्रीटमेंट? सारी दुनिया दुखी है और मैं जानता
- 13:32हूँ मुझे झटका लगा जब बाबा ने कहा और कोई नहीं है।
- 13:39बोले मेरा कलेजा रोने लगा, मैंने कहा क्या वो है, दिन आ गया है।
- 13:47बाबा ने कहा हाँ। उठो तुम उठना पड़ेगा कोई सुने ना
- 13:58सुने तुम सत्य को यहाँ छोड़ जाओ जीसको जरूरत होगी वह पी लेगा।
- 14:11कुआं खोद जाओ जीसको जरूरत होगी, पानी निकालेगा पीलेगा और राहगीरों
- 14:20को प्यास लगती है। क्या होता है?
- 14:31शक्ति पार्ट में सोए हुए थे चैन से ओढ़े हुए कफन बहुत से लोग हैं,
- 14:42जिनके पास सब कुछ चैन है, आराम है, धन है, पदवी है।
- 14:51उनकी पूजा भी होती है। दूसरे लोग उनसे अपनी समस्याओं का
- 14:59दुखों का निवारण निदान करने के लिए आते हैं।
- 15:09लेकिन वह खुद दुखी होते हैं। जो खुद दुखी होता है वह जो भी
- 15:17निदान करेगा, वह ठीक नहीं करेगा, वह गलत करेगा क्योंकि ठीक तक वह
- 15:26स्वयं ही नहीं पहुंचा। जिसने अमृत रस का वह पान नहीं
- 15:34किया जाकर वह तुम्हें क्या खाक बताएगा उसकी पहचान क्या होती है,
- 15:42वह पीने में कैसा होता है, पीने के बाद क्या लक्षण आते हैं?
- 15:48नहीं बता पाएगा। ये उसकी मजबूरी है।
- 15:54संसार में बहुत से लोग हैं, जिनके पास सुविधाओं के सारे साधन हैं।
- 16:05बीमार हो जाए तो बढ़िया डॉक्टर हैं।
- 16:09अच्छी खुराक है स्नान ध्यान सब है अच्छे वर्ष महीने को है सर्दी
- 16:19गर्मी के बिछोने बढ़िया हैं। लेकिन वो ही मेरे दर पे आजाद है
- 16:30बाबा सब है फिर अब क्या रह गया? इनका वो रह गया जो जन के पास सब
- 16:37था जो बुद्ध के पास सब था। जन का राजा है जन के पास सारी सुख
- 16:49सुविधाओं के साथ, फिर भी दुखी बुद्ध के पास सब कुछ।
- 17:02और जन को राजकाज तो संभालना पड़ता है।
- 17:05बुध को तो वो भी नहीं संभालना पड़ता।
- 17:08बुध के तो पिता श्री जीवत है फिर भी बुध भाग जाते है।
- 17:21आखिर कारण क्या होगा? भीतर से चुभता हुआ वो काँटा जो
- 17:33सुख से न मिला आराम से न मिला सुविधाओं से न मिला 10 दसियों से।
- 17:4536 प्रकार के खानों से प्रत्येक इच्छा के पूरे हो जाने से भी ना
- 17:51मिला जो वह बुद्ध भी नहीं पा सके वह जनक भी नहीं पा सके।
- 18:03और 24 के 24 तीर्थन का राजा था जैनक।
- 18:11उन्होंने सभी ने राजपाट छोड़ दिया और ध्यान रखना, जो राजा है।
- 18:21राजा वो ही है जो 1 दिन राजपाट छोड़कर उस अज्ञात में उतरने की
- 18:34चेष्टा में संलग्न हो जाए। राजपाट व्यर्थ है, थोक।
- 18:45इसमें जो भी मिला, जो भी मिला, वह आज ऐसा लगने लगा जैसे व्यस्त है,
- 18:59इसे ही बैरा के व्यस्त है। कुछ कमी है।
- 19:10कुछ काँटा अभी भी खटक रहा जैसे तुम्हारा काँटा चूक जाए और कोई
- 19:18डॉक्टर पकड़ के उस काँटे को निकाल दे।
- 19:20लेकिन चेस चेस अभी भी और है। सारी रात तुम जगती रहे।
- 19:26तुम सुबह उठ के डॉक्टर के पास जाते हो, डॉक्टर साहब, यह लगता है
- 19:31काँटा अभी निकला नहीं तुम ठीक से इसकी सर्जरी करके देखो और डॉक्टर
- 19:38देखता है काँटा अभी अधूरा निकला अधूरा रह गया।
- 19:43डॉक्टर उसको सर्जरी से निकाल देता है।
- 19:45फिर तुम्हें तृप्ति आती है, सुविधाएं तुम्हारा आधा घँटा निकाल
- 19:53देता हूँ इसलिए मैं राजनीति पे बोलता हूँ।
- 19:58पहले सुविधा सम्पन्न तो हो जाओ, आधा घँटा निकलेगा।
- 20:05फिर आधा गुरु को सर्जरी करनी पड़ेगी और गुरु सर्जरी करेगा।
- 20:15नीम हकीम खतराए जान तुम्हारी सर्जरी नहीं करेगा?
- 20:21मेरी एक धर्म की बहन बनी हुई थी। वो हर रक्षाबंधन पर मेरी रकड़ी बन
- 20:36यही की थी। अब वो और ब्याह ही गई थी
- 20:44रक्षाबंधन के दिन। अपने मायके आ गया मुझे रक्षाबंधन
- 20:53का दादा बंद पहले महंगी महंगी रकड़ियां लेके आतीं, मैंने कहा ये
- 21:03मत लाया करो। मैं दिखावे का शौक नहीं रहता, बस
- 21:09एक मूली का धागा सुफ्फिसिएंट मुझे बांधने के लिए प्रेम का धागा काफी
- 21:19है पर्याप्त से भी ज्यादा है। यह मात्र धागा नहीं होता।
- 21:30यह एक वचन होता है जो समर्थ असमर्थ को देता है, भाई बहन को
- 21:38नहीं, कलावती ने धागा भेजा। अमायूँ को अमायूँ भाई नहीं था
- 21:52बल्कि अगर तुम तुम्हारी वेद दृष्टि से देखो तो कलावती हिंदू।
- 22:01हमारी मुस्लिम मंत्र लेकिन यह महीन धागा तुम्हारे तोड़ने से टूट
- 22:09तो जायेगा लेकिन उसके भीतर का प्रेम बचा रहेगा, वह तुम नहीं
- 22:16तोड़ पाओगे। ये कच्चे में ही धागे और वो हर
- 22:24बार आते उस साल भी आई बस एक छोटी सी प्लेट लेके आती मेरे तिलक कर
- 22:41देते, चावल लगा देते। थोड़े से फूड, एक गुढ़ की डरी
- 22:55सूक्ष और मौली का वो धागा बांध देते और हाथ जोड़ के बैठ शक मन
- 23:11में सोचती कि मेरी रक्षक बस। ना राज्य, ना पाठ, ना घोड़ा, ना
- 23:31हाथी, ना तख्त, तस कुछ नहीं सिर्फ रक्षा और रक्षाबंधन के दिन।
- 23:45यह धागा सिर्फ धागा नहीं होता। ये प्रेम के बंधनों से बंधा हुआ
- 23:57वह विश्वास और वह एक वचन होता है। जो साल भर में रक्षा करने के लिए
- 24:08वचनबद्ध होता है। उस साल भी वो आज बैठ गयी।
- 24:19मैंने कहा मधु उसका नाम मधु वाला था।
- 24:25अब की मैं दाग नहीं कर रहा हूँ क्या क्यों, क्यों?
- 24:41क्योंकि मैं तेरी रक्षा नहीं कर पाऊंगा, वह तो फूट फूट के होंगे
- 24:51भाई। आप मेरी रक्षा नहीं कर पाओगे,
- 24:56मैंने कहा विधि का विधान ज्ञान हानि लाभ सही है जाहि विधि
- 25:07राखोराम तहि विधि रही है। बस वही ना यही तक का साथ यह शरीर
- 25:21भी 1 दिन चला जाएगा। मैं तुम्हारी रक्षा नहीं कर
- 25:25सकूंगा। यानी तुम तो नहीं जाओगे?
- 25:32मैंने कहा नहीं, मैं तो नहीं जाऊंगा, मैं तो अभी हूँ लेकिन
- 25:38तुम्हें मैं ना बचा पाऊँगा। खैर, भारी मन से वो।
- 25:50मैंने दादा नहीं बनवाया और कुछ महीनों के बाद वह बीमार हो गए।
- 26:06ज्यादा बीमार हो गई या कान में प्रश्नभार सुना रहा हूँ तुम्हें?
- 26:13मैं कहानियों अपने जीवन से संबंधित थी सुनाया करता हूँ।
- 26:18शास्त्रों में लिखित कहानियों सिर्फ उदाहरणों के लिए दिया कृत
- 26:23ये मेरे जीवन से घटित घटना है। यहाँ पर इलाज कराया।
- 26:34ऐसा नहीं गरीब नहीं होते। खूब पैसा लगाया, पीजीआई में ले
- 26:45गए। 10 डॉक्टर उसके आसपास खड़े हैं।
- 26:51इन्फेक्शन इतना बढ़ गया, दे कोल्डन्ट कवर पैसे कवर नहीं कर
- 27:01सके। इतना इन्फेक्शन फैल गया।
- 27:07जो उसकी मृत्यु हो गई। उसके भाई ने मुझे बताया तो मैं
- 27:18चुप हो गया। मैंने ये कहानी उसे नहीं बताया और
- 27:27मेरा मन खराब था। यहाँ तक कि मैं उसकी संस्कार में
- 27:34भी नहीं गया। यह बंधन प्यार के बंधन रक्षा के
- 27:51बंधन ये प्यार से बांधे जाते हैं, रक्षा का वचन देते हैं क्या उस
- 28:00क्षण? व्यक्ति अपने भीतर ऊर्जा का संचार
- 28:07अनुभव करता है, न जय, अहंकार, भय और स्वयं की पहचान के टूटने जैसा
- 28:17गहरा आंतरिक अनुभव होता है नहीं अगाहत होता है अनुभव नहीं होता।
- 28:24यह हथौड़े की तरह चोट कर पाए। तुम्हारी सभी पहचानें ध्वस्त होने
- 28:36लगती है धीरे धीरे धीरे धीरे तुम भूल जाते हो सब।
- 28:48और अगर तुम भूल गए गुरु तुम्हें बोलने में मदद करेगा कि तुम हो
- 28:57कौन। यह तुम्हारे नकली बाहरी अवर्ण
- 29:03मिटाने की चेष्टा करेगा जो तुम्हारे समाज ने तुम्हारे माता
- 29:08पिता ने तुम्हारे गुरुओं ने तुम्हें दिया सच्चा गुरु इसको
- 29:15मिटाने की चेष्टा करेगा। और तुमने यह बांध लिया है जहाँ तक
- 29:25तुम बर्दाश्त कर पाओगे तुम्हारी मान्यताओं को टूटने से तुम सो गए
- 29:35वहाँ तक का रास्ता तुमने जान लिया।
- 29:42लेकिन जहाँ जाकर नरेंद्र नाथ पिक्चर लाए स्वामी जी मेरे माँ
- 29:52बाप भी हैं मेरा प्रभात। तो रामकृष्णा का अण्डगी अच्छा तो
- 30:05फिर ठीक है? उन्होंने हाथ उठा लिया, कृष्ण भी
- 30:13देर नहीं लगाता वो। क्योंकि गुरु डिक्टेटर तानाशाह
- 30:23तुम्हारी इच्छा से तुम टूटने दो तो ही शुभ तुम जहाँ भी अड़े गुरु
- 30:33हाथ खींचने का। क्योंकि वह तुम्हारी स्वतंत्रता
- 30:39पर आघात नहीं करेगा। जहाँ तक रास्ता देखा विवेकानंद ने
- 30:51वहाँ तक भलीभाँति वो रोज़ उतरता। अब व्यस्त हो गया, क्योंकि एक बार
- 30:58रास्ता दिख गया तो तुम आँखें बंद करके भी जा सकते हो भीतर बाहर की
- 31:03आँखों की आवश्यकताएं पड़ती हैं। बाहर की आँखें तो बंद ही हुआ करता
- 31:13है। उस आनंद को चखते वक्त बाहर की
- 31:17आँखें स्वतः ही बंद हो जाती, लेकिन उस शक्ति बात के क्षण में
- 31:26चिल्लाने से पहले तक जितना रास्ता कवर होगा।
- 31:31उतना विवेकानंद की संपत्ति बन गया।
- 31:37वह मुझ से उस क्षण तक जाता और वापस आ जाता जब चाहे आगे का रस्ता
- 31:43अज्ञात और विवेकानंद इसी त्रासदी में मरे।
- 31:51आगे खुद से जाने की चिष्टा की। लेकिन खुद से कहीं जा जाता है जो
- 32:01गुरु तुम्हें जितनी शीघ्रता से पहचान देता है।
- 32:08उस्पष्टता से तुम्हें वह रास्ता दिखा देता है।
- 32:12वह तुम अपने प्रशार्थ से नहीं जान सकते क्योंकि वह प्रयास हीनता से
- 32:19जाना जाता है और तुम्हारी आदत हो गई है।
- 32:23प्रयास से कुछ कमाने यही संस्कार बाधा बनता है।
- 32:29तुम परमात्मा तक जाने के लिए भी प्रयास करते हो और तुम्हारे सारे
- 32:35जप, तप, पूजा, पाठ, यज्ञ, हवन, भजन के सब।
- 32:51उस सप्ताह तक पहुंचने के लिए अप्रयाश अवस्था की आवश्यकता होती
- 32:57है। इसलिए मैं रोज़ कहता हूँ नथिंग टू
- 33:03तो गुरु तुम्हें जहाँ तक। दिखा गया रास्ता वहाँ तक तो तुम
- 33:11जब ज़रा गर्दन झुकाई देख ली दिल के आईने में थी बसी तस्वीरें यार
- 33:22बड़े मज़े से उतर जाओगे तुम सारी उम्र।
- 33:26विवेकानंद वहाँ तक तो गए। आनंद बहुत होता है, वहाँ तक भी
- 33:32कोई कम नहीं होता, लेकिन जो बाकी का रास्ता रह गया लेकिन उसको।
- 33:46नहीं खोज पाए वह अज्ञात ही बना है।
- 33:57यहाँ जीवंत गुरु की आवश्यकता पड़ती है और सिर्फ जीवति नहीं
- 34:03सच्चे गुरु की आवश्यकता पड़ती है। तुम्हारी शास्त्र है तो सच्च जीवत
- 34:12नहीं और तुम्हारी गुरु है तो जीवत सच्चे नहीं है।
- 34:18अब दोनों का कॉम्बिनेशन कहाँ से लेके आऊं जो गुरु सच्चा भी हो और
- 34:23जीवत भी हो, जो बड़ा मुश्किल है? यही तो असंभव है, जो आज प्रत्येक
- 34:30प्राणी दुखी पुत्री तुम्हारी मान्यताएँ।
- 34:47तुमने जो अपनी पहचान बनाई वह तुम्हारे अंत समय उतर गई।
- 34:57वह आंतरिक पहचान एक झटके में टूट जाती है।
- 35:07और तुम्हारा सारा ढांचा कांपने लगता है, तुमने देखा होगा क्रिया
- 35:15योग करने के बाद बहुत से व्यक्ति जब ध्यान में बैठते हैं या दिन
- 35:20में किसी वक्त। पता नहीं कब वह कंपनी लग जाती है,
- 35:25भय का अनुभव होता है। मुझे फ़ोन फ़ोन आता है बाबा क्या
- 35:32हो गया है? मैंने कहा कुछ नहीं हुआ है, तुम
- 35:35सती प्रग बने रहो यह के सोर्सेस है जो तुमने भीतर ही कटरा किया।
- 35:42वक्त वक्त पे तुम डर गए थे और तुमने दबा लिया था इसे डर को और
- 35:47जो भी तुमने दबाया वो तुम्हारे भीतर स्टोर हो गया, वह खत्म नहीं
- 35:51होता तुम समझ लेते हो जैसे कबूतर बिल्ली को देखकर आंखें बंद कर
- 35:57लेता है कि बिल्ली गई, लेकिन बिल्ली गई नहीं।
- 36:04ये तुम्हारा भ्रम है तुमने आँखें बंद कर तुमने वक्त वक्त पे काम,
- 36:16क्रोध लो मोह अंग मत, मत्सर बह इनको दबाया सुप्रेश किया।
- 36:25वो कहीं नहीं गए। तुमने कैथोडसिस का मौका नहीं दिया
- 36:30और अगर कैथोडसिस का मौका दिया तो गलत ढंगों से दिया तुम्हारा
- 36:39गुस्सा कभी घृणा बन के उभरा है, कभी दूसरों का?
- 36:45सिरपड कर उतरा कभी गोली चरा के उतरा लेकिन तुमने सही मार्ग से
- 36:54उसको निकासी नहीं। सही मार्ग था कि जब वह निकलता,
- 37:00तुम एकांत में बैठ जाता। और तुम पाते कि धीरे धीरे वह
- 37:11वातावरण में निष्कासित हो रहा है, इवैपरेट हो रहा है वाष्प बनकर उठ
- 37:17गया और तुम निर्भर हो गए तुम अकरुज विहीन हो गए।
- 37:22ऐसे ही तुम काम विहीन हो जाओगे रोज़ मुझे कहते हैं लोग बाबा यह
- 37:27नहीं जीता जाता। मैंने कहा जीतना नहीं होता, जीतने
- 37:30में लड़ना पड़ता है जीतने में तुम लड़ोगे, क्योंकि किसी को हराओगे।
- 37:42तभी जीतोगे न, काम को जीतना नहीं होता।
- 37:49जब काम आए या क्रोध आए लोग मो। अंकार मत मत या वह आए, इन्हें
- 37:58जीतना नहीं। सिर्फ तुमने अपनी स्थिति में
- 38:06ठहराव बनाए रखना है। कंपना नहीं है, कंपन आएगा तो
- 38:13तुमने देखना है कि शरीर कांप रहा है।
- 38:16मन डल रहा है, भयंकर डर लग रहा है।
- 38:20ऐसा लगता है जैसे प्राण बिखिर हो जाएं, इतना भयंकर सूखे पत्ते की
- 38:27तरह कम होंगे। सेलेक्शन उस क्षण में जाग जाना ये
- 38:36कौन कम रहा है? अगर तुमने उस वक्त साक्षित व साध
- 38:43दिया सूखे पत्ते की तरह, कांपते हुए इस शरीर को तुमने नकल आँखों
- 38:52से परिपूर्ण अवस्था में निहार दिया।
- 38:57तो तुरंत तुम्हें भेद पता चल जाएगा।
- 38:59यह कंपनी वाला मैं नहीं, मैं इस कंपनी वाले को देखने वाला हूँ तो
- 39:08एक से दो हुए मैंने फॉर्मूला दिया था।
- 39:11121। पहले तुम एक थे बस सारा पुंज एक
- 39:18है उसे नाम कोई भी दे दो राम कहलो कृष्ण कहलो रहीम कहलो कृष्ण पहले
- 39:30तुम एक थे, लेकिन लेकिन जैसे ही। यह दबाया हुआ इस पद्धति से
- 39:38निकलेगा और ध्यान रखना इसी पद्धति से निकलेगा।
- 39:42यह मस्त यह मस्त प्रक्रिया है तुम्हारी विज्ञान भैरव तंत्र की
- 39:52112 विद्या एक तरफ़। यह अकेली विधि एक तरफ़ उनमें तो
- 40:01प्रयास करना पड़ेगा। इस विधि में कोई प्रयास है सर तो
- 40:09तुम वैसे भी लेते हो, थोड़े लंबे ले लिया करो।
- 40:15और फिर कुछ न करने में बैठ जाओ, दिन के किसी पल में तुम्हारे भीतर
- 40:22दबी हुई वो धूल जो जम गई है, मैं धीरे धीरे अवपरेट होगी।
- 40:30और चेतन मन में आकर निकलेगी तो तुम कबोगे तुम कामग्रस्त होगे,
- 40:40तुम क्रोध से भर जाओगे, तुम ईर्ष्या से भर जाओगे, जैसा भी
- 40:45विकार आया धूल का वैसा ही तुम्हें।
- 40:52तुम उसके साथ हो लोगे। घर से तो हम चले थे खुशी की तलाह।
- 41:09में खुशी की तलाश में वो मुरा में खड़े थे, वो ही?
- 41:28साथ हो लिए खुद दिल से दिल की बात कही और रो लिए तो तुम इनके साथ ही
- 41:47का करो। बस यहीं तुम चूक जाते हो साक्षी
- 41:54तो से तुम्हारा चिपकना वही तो गुरु उखाड़ना चाहता है की तुम
- 42:05चिपकना बंद कर। जस्ट ट्राई यूर क्लिंगिंग मैसेज
- 42:20तुम्हारी चपकहटों को समाप्त कर दो नितनाब।
- 42:30वही वेला है, इसलिए वर्धमान को महावीर का खिताब दिया गया।
- 42:41वह कोई योद्धा वीर नहीं था। इतने महावीर नहीं थे कि किसी जंग
- 42:47को लड़ते, लेकिन बाहर की जंगों को लड़ने वाले।
- 42:53भीतरी जंगों से हार जाते हैं, बड़े बड़े महारथी काम ऊर्जा के
- 43:06प्रभाव से हार जाते हैं, क्रोध से हार जाते हैं।
- 43:12लोह मोह अहंकार से हार जाते हैं, वह से हार जाते हैं, असल है मन
- 43:22जीते जगत इन वेकारों पर विजय है और विजय मिलेंगे देख कर।
- 43:32विकार मेरे से जुदा है। भय आया तुम सूखे पत्ते की तरह
- 43:40काँपे तुमने साक्षी होकर उस सूखे पत्ते को कांपते हुए शरीर को देखा
- 43:47तो तुम्हारा भ्रम टूट गया। यह कंपने वाला कोई और है, मैं
- 43:54देखने वाला हूँ यहाँ थोड़ा सा भ्रम टूटेगा और रोज़ थोड़ा थोड़ा
- 43:59टूटेगा और एक वक़्त आएगा यह कम्पेगा बुरी तरह से कम्पेगा और
- 44:05तुम हँसते हँसते इसको देखोगे, देखो कैसे कम्पेगा।
- 44:11जैसे कि दूसरे को देखते हो, आज समाज दूषित हो गया है, कोई हार
- 44:23जाता है तुम ढोल नगाड़े बजाते हो, तुम लड्डू बांटते हो?
- 44:30यह विकृत समाज की निशान है। हमारे राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने
- 44:41कहा था, अगर तुम्हारे सामने खड़े व्यक्ति का दुख देखकर तुम्हारा
- 44:49हृदय विदीण होता है। अगर तुम्हारे सामने खड़े व्यक्ति
- 44:56के तुक को देखकर तुम्हारा हृदय विदीर्ण होता है तो समझ लेना
- 45:03परमात्मा ने तुम्हें बनाकर कोई गलती नहीं की।
- 45:11परमात्मा ने तुम्हें बनाकर कोई गलती नहीं की अगर सामने खड़े
- 45:16दुखयारे को देखकर तुम्हारा हृदय दुखी हो अगर सामने खड़े व्यक्ति
- 45:24को देखकर सुखी व्यक्ति को देखकर तुम्हारे हृदय को।
- 45:30सुकुम मिलता है तो परमात्मा ने तुम्हें बना के कोई गलती नहीं की,
- 45:36लेकिन अगर सामने खड़े व्यक्ति को आग में जलते हुए देख कर तुम्हें
- 45:42सुकु मिलता है तो परमात्मा ने बहुत बड़ी गलती की।
- 45:45तुम्हें बना के उसने तुम्हें नहीं बनाना चाहिए।
- 45:53सामने खड़ा इंसान अट्टहास करके हँस रहा।
- 45:57बच्चों की तरह खिलखिला के हँस रहा और तुम उसकी हँसी से इरशाक आ
- 46:06जाते। यह हँसी मेरे भीतर कौन है?
- 46:11तुम उस हँसते हुए प्राणी को शरीफ दे देते हो बस और कोई कारण नहीं
- 46:17था खोजने वालों ने खोजने में गलती कर दी।
- 46:24असल में राजा। ईसा की शांति और प्रेम से
- 46:31मुस्कुराता हुआ चेहरा रोम रोम खेलता हुआ शांति और प्रेम को
- 46:36बांटता हुआ देख नहीं सका। उसे बड़ी इच्छा हैं अगर ऐसे भी
- 46:43इंसान होते हैं। तो राजा ने कहा तेरे होने पे लाने
- 46:49थे, फिर या तो तू इससे जैसा हो जा, यह तो मुश्किल है गद्दी को
- 46:57छोड़ के इससे जैसा हो जाए, यही तो मुसीबत है तुम्हारे राजाओं के जो
- 47:04संत जैसा हो नहीं सकता। वह अपनी तमन्नाओं को बलि नहीं
- 47:13चढ़ा सकता तमन्ना साथ लिए वह इस खुशी को पाना चाहता है और यह
- 47:22असंभव है। तमन्नाएँ कम हैं, तमन्नाएँ बहुत
- 47:34हैं या तमन्नाएँ बिल्कुल नहीं तमन्नाएँ बहुत हैं तो रुलाई हैं।
- 47:45तमन्ना कम है तो शहन साही बस थोड़ी सी तमन्ना खा लिया, पी लिया
- 47:51सो लिया पहन लिया नहा लिया इन जरूरतें कहते हैं इन्हें तमन्ना
- 47:55नहीं होती और तमन्नाएँ बिलकुल नहीं तो खुदाई एक कपल ऐसा आता है।
- 48:05जहाँ जीने की भी तमन्ना नहीं रहती, महावीर इसी तल पे पहुँच
- 48:10जाते हैं और सारे संत इसी तल पर पहुँच जाते हैं, जो उनकी।
- 48:18तमन्ना है बरबाद हो जा। जो उनकी तमन्ना है बरबाद हो जा तू
- 48:32ए दिल मोहब्बत की किस्मत बना दे वह बनती है किस्मत जब उसकी रजा
- 48:42में तुम चल रहा राजे हो जाओ। तड़कपुर तड़प कर अभी जान दे दे।
- 48:52फिर। चाहे तड़पना भी को ना पड़ता है यू
- 48:56मरते हैं मर जाने वाले दिखा दे। जो उनकी तमन्ना है बरबाद हो गया
- 49:18तो जो रास्ता शक्तिपात में तुमने देख लिया वो तुम्हारी प्रॉपर्टी
- 49:24हो गया। संपत्ति हो गया पहली बात।
- 49:32जब गुरु शक्ति पाठ करता है या तुम अपने अप्रयास के कारण उस स्थल पर
- 49:40पहुँच जाते हो, दोनों ही स्थितियों में।
- 49:48तुम्हें उस रस्ते का पता चल जाता है और तुम बड़े मज़े से आराम से
- 49:54जा सकते हो। फिर कई बार परमात्मा ही कृपा करता
- 50:04है, अनेकों बार परमात्मा कृपा करता है।
- 50:09गर्मी आवय कपड़ा नदरी मोख द्वार उसकी नजर अगर हो जाए सच्चा साहब
- 50:18विजय नगर करे तहिकागो हंसकर फिर तुम्हें वह अज्ञात वह चेतन।
- 50:30तुम्हारे ऊपर बरस जाता है और तुम्हें रास्ता पता चल जाता है एक
- 50:38बात को ध्यान में रखना तुम्हारी अभी की जो पहचानी है वो सही नहीं।
- 50:47सारा संसार इसलिए दुखी है यह इसका लक्षण जीस दिन तुम्हारी पहचान सही
- 50:56हो जाएगी उस दिन जो लक्षण आएगा तुम्हें बता दूंगा वह लक्षण आएगा
- 51:03आनंद के रस से भरा हुआ तुम झूमोगे।
- 51:07मद होश हो जाओगे तुम्हें होश भी होगा और सरूर भी होगा।
- 51:18शराब को पीने से तुम अर्छित हो जाते हो।
- 51:24ऐसी मद है तुम्हारे यहाँ की मैं खान लेकिन उस मैं को तुम मद हो सब
- 51:35हो जाओगे, तुम अवेयर भी हो जाओगी और सरूर का तो कुछ पता ही।
- 51:44जरूर तो इतना होगा तुम अराधे राधे राम राम कुछ भी कहने के योग्य
- 51:53नहीं हो, वहाँ लगेंगी खेचरी मुद्रा।
- 52:01तुम तो मात्र सर्कस कर रहे हो खिचड़ियां लगा के अभी भ्रम रंत्र
- 52:07में सेवरा से ढपकन तुमने जीवा को मोड़ दिया ताजवे से लगा लिया रस
- 52:17तो अभी उतरा नहीं तुम्हारी रचना। पिएगी क्या खाक नहीं खिचड़ी उस
- 52:25वक्त लग जाया करती अगर न खिचड़ी लगे तो कोई हर्ज नहीं, वह रस तो
- 52:32जड़ता ही रहेगा, तुम्हारे प्राण भी जाए देखना।
- 52:42जब किसी को अटैक आता है वह सर विजेट की घोड़ी को जीभ के नीचे रख
- 52:49लेता है। क्यों?
- 52:51क्योंकि वह जल्दी घुल जाती है, खून में बड़ी आती है तुम ऐस्प्रिन
- 52:56को जगह देते हो। क्यों?
- 53:01क्योंकि वह जल्दी खून में मर जाते, तुम उसको निगलते नहीं,
- 53:10क्योंकि निकलोगे तो सारी प्रोसेसिंग।
- 53:15ड़ा एडजस्ट होगा, मेटा बला ही होगा, सभी क्रियाएं होंगी फिर
- 53:20कहीं जाके खून में मिले इतने में तुम्हारे प्राणों के हो जाये तो
- 53:31तो ज़रा नहीं खिचड़ी तुमने पहले लगा दी यह नाटक है सर्कस।
- 53:44खिचड़ी तुम्हें लगानी नहीं पड़ती। ध्यान रखना मुझे लोग कह देते हैं,
- 53:50रीढ़ को सिद्धि रखते हैं क्योंकि कुंडरनी का क्या पता कब जग जाए
- 53:58उसको जाने में कोई बाधा नहीं रहेंगी।
- 54:01हम इसलिए रीढ़ की हड्डी को सीधा करते हैं।
- 54:03मैंने कहा खबरदार आराम से बैठो चाहे पूरी गर्दन को और पूरी रीढ़
- 54:11की हड्डी को जगाकर बैठ जाओ। तीरकमन बना लो क्यों?
- 54:16क्योंकि वह वृहद शक्ति वह इतनी विराट है, अपना रास्ता खुद बना
- 54:22लो। और रस्ता साफ सुथरा है।
- 54:26रस्ता वही है जहाँ से ईड़ा पिंगला सुसभना दो छोरों से ईड़ा पिंगला
- 54:35बीच में, सुसुमना के बीच में से जाता है वो आनंद का प्रवाह।
- 54:43और वह इतनी ऊर्जा से ओतप्रोत है। वह इतनी चेतना से ओतप्रोत है कि
- 54:49तुम कितने भी टेढ़े हो जाओ, इसका मतलब जिसकी कमर झुक गई है, उसकी
- 54:55कुंडली जागरूक नहीं हो सकती। बिल्कुल हो सकती है।
- 54:59कुंडली में इतनी शक्ति है। कितनी चेतना है तुम्हारी?
- 55:03सभी बैरियर्स को वे स्वते ही तोड़ देगी।
- 55:10तुम्हें बैरियर तोड़ने की आवश्यकता नहीं, जो रीढ़ को सीधा
- 55:17रखना मूर्खों का पागल मत। जब जगेगी वह जगेगी अपना रास्ता
- 55:25खुद बना ले जब रस झरेगा झर जाएगा, तुम किस अवस्था में हो वो रस नहीं
- 55:37देखेगा। मैं चल रहा था चल रहा था उस कच्ची
- 55:43पटड़ी में जो एक अकरम की पटड़ी थी।
- 55:475.5 कोट के रोज़ जाता और गोदाम के साथ साथ मेन सड़क से मैं दाईं
- 55:59मुड़ा, फिर दाईं मुड़ा फिर बाय मुड़ा आगे बोना बिक्सा गये।
- 56:05और वहाँ वो उतर गया। अब कोई भविष्यवाणी कर सकता है, यह
- 56:12कोई स्थान है? उतरने का कच्चा रस्ता है सुनसान
- 56:19रात की 8:30 बजे शरद पूर्णिमा की रात।
- 56:29कोई देश नहीं, कोई काल नहीं, कोई स्थान नहीं, कोई स्थिति के तुम
- 56:39रीढ़ की हड्डी सीधी ही करो। किसी भी अवस्था में तुम लेटे भी
- 56:44पड़े हो तो वो जाग सकती है। उसके जागने में कोई दिक्कत?
- 56:50मैं अपना रास्ता खुद बना रही की बिल्कुल सीधा रास्ता है।
- 56:53सुशोमना के भीतर से जा के उसने पहले से रस्ते पर महात्मा ने बना
- 57:03लिए तुम्हारे बनाई से कुछ होता नहीं।
- 57:07शक्तिपात चाहे गुरु करे, चाहे उस अखंड विराट के घर से आए या
- 57:17तुम्हारे प्रयास होने के कारण से उपजे किसी भी कारण से उपजे।
- 57:28हमारी सारी प्रत्य विज्ञाओं को वह समाप्त कर दे तुमने जो अपनी
- 57:36पहचानी बनाई रिकग्निशन सब टूट जाएगी नष्ट वष्ट हो जाए।
- 57:45और आखिरी जो तुम्हारी पहचान नष्ट होगी वो होगी, मैं शरीर नहीं पहले
- 57:56नाम रूप समाप्त होगा आकार समाप्त होगा, फिर तुम्हारा ढांचा ही बिखर
- 58:04जाएगा। ना मैं मन हूँ, ना मैं भाव ना
- 58:09हूँ, ना मैं शरीर हूँ मैं इनसे पाप यह तुम्हें अपनी आत्मा
- 58:20प्रत्यभिज्ञा होगी। टूटेगा उनका आएगा भय यह ऊर्जा के
- 58:32कारण ही आएगा। बिलासा शक्तिपात का मंत्र भी
- 58:36शक्ति का फेंक देना। सें की पहचान टूटना ही मुख्य कारण
- 58:46है। बहुत देर के लिए तुम्हें पता ही
- 58:53नहीं चलेगा। मैं हूँ कौन?
- 58:55मैंने इस अवस्था में सूअर को गले से लगा लिया था।
- 59:00अब देखिए। मुझे लोग कहते हैं आप परमात्मा
- 59:07जरिये जरिये में वह नजर आएगा। दिखने का मानना नहीं पड़ेगा, इस
- 59:16शब्द को अच्छी तरह समझेंगे, मेरी बातों को मानना मत।
- 59:21नकली गुरु कहेंगे मान मैं तुम्हें कहूंगा नहीं मानो नहीं उस स्थान
- 59:32पे चले जाओ जहाँ रसधार बहती है, जहाँ गुलशनों की सुगंध।
- 59:41बिखरती है फूल खिलते हैं, वहाँ चले जाओ अभी तुम गटरों के किनारे
- 59:55पहचान नष्ट हो जाएगी मुख्य बात और फिर।
- 1:00:02अगर कोई साधक पूर्ण रूप से शक्तिपात को सहे जाए तो क्या वह
- 1:00:08हमेशा के लिए सिद्ध प्रगा अवस्था में साबित हो जाएगा?
- 1:00:13या उसके बाद भी साधना और स्थिरता की यात्रा जारी रहती है?
- 1:00:20यह प्रश्न तो बड़ा मूल्यवान। एक बात समझ लो इतना फर्क पड़ेगा
- 1:00:27जो कि बहुत विराट फर्क है। पहले तुम उस अज्ञात के रास्ते को
- 1:00:33जानते नहीं थे, शक्तिपात अगर तुमने पूरा पी लिया।
- 1:00:43तो? तुम उस रास्ते से अन भीगी नहीं
- 1:00:49तुम उस रास्ते को जाना पहचान बना लो फिर तुम दिल के आईने में थी
- 1:00:56बसी तस्वीरें यार जब ज़रा कर धन झुकाई।
- 1:01:01तुम्हें रास्ते का पता रस्ता ही तो है नहीं, आज सारी दुनिया रस्ता
- 1:01:12ही तो खंगाल रही है, रस्ता ही मिल जाए।
- 1:01:19तो कौन माला उठाकर राधे राधे करने की जेहमत करे यह तो ही करोगे कबीर
- 1:01:29के हाथ से माला गिर जाती है। कबीर कहते हैं भलो भयो, हरी भी
- 1:01:35सरो सर से टली भला। विचार विसर गए।
- 1:01:43विचार मैं नहीं हूँ। भावनाएँ विसर गई भावनाएँ मैं नहीं
- 1:01:47हूँ, शरीर विसर गया शरीर मैं नहीं हूँ जाप विसर गया जाप में भलो भयो
- 1:01:54हरी विसरों सर से टली भला। तुम अपने आप को तो बिसरी जाओगी,
- 1:01:59तुम परमात्मा कर दो ये भी एक भोज था सब भोज है जहाँ तो फिर निर्भोज
- 1:02:12क्या है आनंद का रस? जैसे थे तैसे भय तुम आनंद ही हो
- 1:02:20सत्य चित आनंद रोज़ बोलते हो और सत्य द आनंद भगवान बोलते तुम आनंद
- 1:02:29हो, सत्य हो, चित हो, आनंद हो। जैसे थे जैसे भए तुम आनंद थे और
- 1:02:38आनंदी हो गए बीच में से क्या था भी तुम्हें भूल गए थे तुम अब पुनः
- 1:02:47पुनः याद आया रिमेम्बर, तुम उसी अवस्था में फिर पुनः आसीन हुए।
- 1:03:06अब कछु कहाँ न जाए और ध्यान रखना उस अवस्था में बोला नहीं जाएगा।
- 1:03:12बहुत दिनों तक तुम मुझे पिताजी पूछते तुम ऐसे क्यों रहते हो?
- 1:03:22कुछ दुखता है। बैत जी को दिखला दे किसी डॉक्टर
- 1:03:29को दिखला दे, मैं कुछ बोलता हूँ ना, उन्हें पता है एक रस्धार एक
- 1:03:37दूसरे अज्ञात लोक का दर्शन मैंने किया है ना मैं बता सकता हूँ।
- 1:03:46यह मुसीबत है। मेरे लिए बोलना अच्छा नहीं लगता।
- 1:03:53अभी आज ही एक प्रश्न आया है कि बोलने का दिल नहीं करता बाबू,
- 1:03:58क्या करें? इसी अवस्था को योगी लोग तरस जाते
- 1:04:05हैं। तुम्हारा बोलने का मन नहीं करता
- 1:04:09तो अति शुभ है पल्टू। शुभ दिन शुभ घड़ी याद पड़े जब नाम
- 1:04:18जब तुम्हारे ऐसी अवस्था आ गई वह घड़ी।
- 1:04:24जब तुम्हारा बोलने को दिल नहीं करता, इसी से तो त्रस्त है सारी
- 1:04:31दुनिया सारी दुनिया यही प्रश्न लेके आती मेरे पास बाबा यह मन
- 1:04:37बोले ही चला जाता। चुप चुप ना हो भाई जे लाए रहा ली
- 1:04:44बतार हम बैठते हैं, चुप होते हैं, होंठों को सी लेते हैं, लेकिन यह
- 1:04:51मन चलता ही रहता है, यह हमें दुखी करता ही रहता है तो अच्छा दिन
- 1:05:00आया। शुभ दिन शुभ करे।
- 1:05:05याद पढ़ा जब नाम जब तुम इस पचड़े से बाहर निकले, जो मन के गतिमान
- 1:05:13होने से तुम व्यथित थे और आज सारी दुनिया इसी से व्यतीत।
- 1:05:20कहाँ रुकता है मन तुम्हारा इस मन के चलने से तुम परेशान हो सारी
- 1:05:27दुनिया परेशान तुम खोना तो चाहते हो उस रस के भीतर, लेकिन यह भय।
- 1:05:40डर तुम्हें वहाँ जाने नहीं देता, सारा संसार व्यथित है इस मन के
- 1:05:51चलने से गति मानो तुम चाहते भी हो इस मन से छुटकारा लेकिन तुम्हारी
- 1:05:58चाहने से क्या होता है? क्योंकि जब अमन ठहरता है तो भी
- 1:06:03तुम डरते हो और ठहर कर ही वो रास्ता नपा जाता है।
- 1:06:11मैं कितनी बार बोला अगर वह रास्ता नापना चाहते हो?
- 1:06:19तो ठहर जाओ, परिपूर्ण रूप से ठहर जाओ, फिर तुम अपने भीतर खींचते
- 1:06:25चले जाओगे। वह भीतर का चुम्बक बड़ा
- 1:06:28प्रभावशाली है। वह तुम्हें धीरे धीरे अपनी और
- 1:06:31खींच लेगा। तो शक्तिपात के बाद अगर कोई
- 1:06:38शिष्य। शक्तिपात सहेजाए तो वह रस्सा जान
- 1:06:43लेगा, लेकिन वह गुराम नहीं होगा। वह जब चाहे उस रस्ते से जा सकता
- 1:06:53है। अज्ञात की धाराएं टूटी।
- 1:06:57अज्ञात ज्ञात बन गया। तुम जब चाहो उस राजपथ पर यह उबड़
- 1:07:03खाबड़ बीहड़ जंगल तुम्हारे लिए राजपथ हो गया।
- 1:07:06आज इस राजपथ पर दिमागें बूंदकर जा सकते हो क्योंकि रस्ते में कोई
- 1:07:13ट्रैफिक नहीं। वन वे ट्रैफिक नहीं है एक ही आदमी
- 1:07:18चल रहा है बड़ी मुश्किल से कोट न में कोई एक चलत है कोट न चलत एक
- 1:07:25पहुंचत है कोट न पहुंचत एक रोकत है।
- 1:07:34रोकता कोई कोई है दूसरों को बताने के लिए कोटी लोग चलते हैं एक
- 1:07:40पहुंचता है करोड़ लोग चलते हैं कोटी नचलत एक पहुँचत है करोड़
- 1:07:48चलते हैं एक पहुंचते बाकी सब रास्ते में।
- 1:07:53किसी को सिद्धियां चाहिए, किसी को वृद्धियां चाहिए, किसी को राज़
- 1:07:59चाहिए, किसी को धन सौंदर्य चाहिए, सब उलझ जाते हैं।
- 1:08:04एक को जाते हैं। कबीर कहते हैं देखो उलझ मत जाना
- 1:08:09वहाँ कुछ मांग नमक। मांगन से मरना भला यह है शब्दगुरु
- 1:08:18की सीख मांगन मरण समान है मत, कोई मांगो भीख बाहर भीख मांगोगे तो
- 1:08:32मरने के समान है। माँ गनते मरना भरा यह है सतगुरु
- 1:08:38की सिख बाहर मत मरो, भीतर मरो अगर मरना है तो वैसे मरो जैसे गोरख
- 1:08:46मरते हैं मरो भे जौ की मरो मरो, मरण है मीठ ऐसी मरणी मरो जीस मरणी
- 1:08:53मर गोरखड़ी टक। थोड़े से कठिन है शब्द इसको बार
- 1:08:58बार रिपीट ही कर लेना, रिपीट करके सुनना तो यंत्र संयंत्र है, उस
- 1:09:06अवस्था में जाकर बहुत कुश्त में लाने से आएगा क्योंकि तुम मालिक
- 1:09:12हुए। तुम शहन चाहे आलम होने जा रहे हो
- 1:09:27तुम कल्प वृक्ष के नीचे बैठने जा रहे हो और कल्प वृक्ष में तुम जो
- 1:09:33मांगोगे, वही में जाएगा। यहाँ संसार में तुम्हें इतना दूभर
- 1:09:39लगता है वह दूभर नहीं, वह उतना ही आसान होता है इसलिए बाबा नानक
- 1:09:46कहते हैं जो मांगू ठाकुर अपने उस कल्प के नीचे मैं आ गया हूँ, ये
- 1:09:53स्थितियां बता रहे हैं तुम इनके अर्थ नहीं हो सके।
- 1:09:57अर्थ वही बताएगा जिसने वो रस्ता नाप लिया कहाँ माइलस्टोन है कहाँ
- 1:10:03आम का पेड़ लगा कहाँ कीकर का पेड़ लगा कहाँ वट वृक्ष कहाँ पीपल कहाँ
- 1:10:09नीम लगा कहाँ शीक्षम लगा। जो पहुंचा है वह रास्ता जानता है
- 1:10:20और वही बता सकता है। यह मूर्ख अज्ञानी जो गुरुओं से,
- 1:10:27गुरुओं से हजूरों तक पहुँच जाते हैं, ये तुम्हें कुछ न बता
- 1:10:32सकेंगे। न गुरु ने देखा न गुरु के गुरु ने
- 1:10:36देखा सब ठगों की धमाल चोंकड़ी थी और दूसरों को ठगने के लिए पहले
- 1:10:46व्यक्ति खुद को ठगता है, इस बात को अपहर्ता में उतार।
- 1:10:54जैसे दूसरों को जलाने से पहले क्रोध खुद को जलाता है, क्रोध
- 1:11:00तुम्हारे भीतर काटी सॉल एडरनालिन हार्मोन्स पैदा करता है और वो जहर
- 1:11:05है। तुम्हारा ब्लड जहरीला हो जाता है,
- 1:11:10फिर तुम दूसरे को। गादी निकालते हो?
- 1:11:13बड़ी भारी गाली निकालते हो लेकिन आगे अगर बूंद बैठा हो तो फिर फिर
- 1:11:23तुम्हें और गुस्सा आएगा। तुम कहोगे अरे हमने सारा ज़ोर लगा
- 1:11:29दिया। इसने तो रुमाल से पूछ लिया, कहता
- 1:11:34और कुछ पूछना है दत्त रे सारा गड़बड़ हो गया कब?
- 1:11:46तो उस स्थिति में पहुँचकर बाबा कहते हैं जो मांगू।
- 1:11:50ठाकुर अपने तेह सोई सोई सब कुछ देता है वह कल्पवरुष के नीचे
- 1:11:57आज्ञा है, लेकिन थोड़ा सा आगे जाकर कबीर कहते हैं, देखो यहाँ
- 1:12:05आकर कुछ मांग मत लेना। मांगन मरण समान है, मत कोई मांगो
- 1:12:13फिर अगर जहाँ आकर तुमने कुछ मांग लिया तो तुम अपना आपा देखने से
- 1:12:19चूक जाओगे, फिर तो मरते रहोगे जीते रहोगे उसी चक्कर भी हमें
- 1:12:24उलझते रहो। मांगन से मरना भला इस स्थिति में
- 1:12:39आकर तुम अपने अहंकार को पूरा गलाने में संलग्न हो जाओ।
- 1:12:45यह मरना ही भला है तुम्हारे लिए यह सतगुरु की सीख।
- 1:12:53सच्चा गुरु यही सीख देता रहता झूठा गुरु तुम्हें बहुत प्रकार से
- 1:13:00छलता है और वह नहीं जानता बेचारा छलने से पहले उसने खुद को छल लिया
- 1:13:07है जो खुद उस तल पर पहुँच सकता था।
- 1:13:14वह वक्त उसने पहले अपना गंवाया फिर वक्त तुम्हारा खराब किया।
- 1:13:21आठ कोटी राधे कर लो क्या हो जाएगा, क्या हो जाएगा जप करने से
- 1:13:31कभी कुछ हुआ? जब छोड़ने से तो होता है क्योंकि
- 1:13:37जब करना एक प्रयास जब छोड़ना प्रयास से हीनता है प्रयास हीनता
- 1:13:44से तो वो मिलता है प्रयास से वो नहीं मिलता बल्कि दूर होता है।
- 1:13:52अगर कोई व्यक्ति अगर कोई साधक उन रंगों को समूचा पी जाता है।
- 1:14:02फिर वह उन सारे अज्ञात रस्तों को जान गया।
- 1:14:08फिर वह जब चाहेगा जा सकेगा। जब चाहेगा बाहर आ सकेगा।
- 1:14:14हमने प्रवचन करने होते हम बाहर आ जाते हैं।
- 1:14:17मुश्किल तो बहुत होती है, तकलीफ होती है लेकिन यह अब जिम्मेदारी
- 1:14:25है। हमारी घर में सभी मौत से सोए होते
- 1:14:30हैं। सबसे पहले माँ जागती है क्योंकि
- 1:14:36माँ ने बहुत सा काम करना होता है, बच्चों के लिए चाय बनाना होता है,
- 1:14:43नाश्ता तैयार करना होता है, बच्चे को नहलाना होता है, उसकी ड्रेस
- 1:14:49प्रेस करना, उसका वस्ता। ठीक करना होता है।
- 1:14:53बहुत से काम करने होते हैं। मन इसलिए सबसे पहले उठती है।
- 1:15:00गुरु भी सबसे पहले उठता है। गुरु तो सोता ही गुरु का तत्व
- 1:15:10वेतर का। सदा जगता है, सदा आनंदित है, सदा
- 1:15:16उस रस को पी रहा है, सदा अविर है, वो सोता नहीं सदा जाग रहा है।
- 1:15:24उसको जागरण करने की आवश्यकता नहीं।
- 1:15:27जागरण करने की व्यवस्था ठगों को होती है।
- 1:15:31और माता की मूर्ति बना लें और फिर सारी रात जागे दिल के बहलाने को
- 1:15:41गालिब ये ख्या हमने देखी है जन्नत की हकीकत हमने तो देखी है जन्नत
- 1:15:49की। हम तो उस सही जन्नत में पहुँच गए
- 1:15:54और वह वाकई बड़ा प्यारा है। उसका रस निराला मदहोश करने वाला
- 1:16:04है अगर कोई साधा। उस रस को भी गया वो शक्ति बात को
- 1:16:14झेल गया तो उसका रास्ता साफ हो गया।
- 1:16:18जैसे अंधेरी रात में काले मेघ मंडलों से घिरा हुआ आसमान तुम्हें
- 1:16:27कुछ नहीं दिख रहा। और तुम किसी रस्ते पे जा रहे
- 1:16:31अचानक से बिजली चमक गई और तुम्हें दूर तलक रास्ता दिख गया।
- 1:16:38फिर तुम्हें दिख गया कि रास्ता साफ है, यह रास्ता तुम आराम से चल
- 1:16:44पड़ोगे पहली बार ऐसा होगा। फिर तो तुम अभ्यस्त हो जाओगे और
- 1:16:51फिर तो उजाला ही हो जायेगा। फिर उस उजाले में तुम जब चाहो जब
- 1:16:59चाहो आ जाओ जब चाहो चले जाओ यही तो मुक्ति।
- 1:17:06इस मुक्ति का स्वाद निराश है। जिन्होंने नहीं किया वो कहेंगे
- 1:17:12मुक्ति होती है। कैसी मुक्ति न?
- 1:17:15भुर का संतरा जिस्म को मौत आती है लेकिन।
- 1:17:26रूह को मौत आती नहीं है, जिस्म को मौत आती है लेकिन रूह को मौत आती
- 1:17:41नहीं है। इश्क रोशन है, रोशन रहेगा रौशनी
- 1:17:50इसकी जाति नहीं है, रौशनी इसकी जाति नहीं है।
- 1:18:01कौन? है जो सपनों में आया कौन है जो
- 1:18:08दिल में समाया लो छुप गया आस मूवी।
- 1:18:19इश्क मेरा रंग लाया ओपी कौन है जो सपनों में आया?
- 1:18:41कौन है जो दिल में समाया? लो।
- 1:18:48छु गया आसमान ही इश्क मेरा रंग ला।
- 1:18:58बस ये रास्ता तुम्हारा हो गया। तुम आजाद हुए, तुम मुक्त हुए
- 1:19:05झंझटें खत्म हुई आवागमन खत्म हुआ तुम जब चाहे इस आनंद के भीतर जा
- 1:19:12सकते हो जब चाहे लौट आ सकते हो, धन्यवाद।