Latest / Baba ji Vijay Vats / 30 Nov 24 - कर्म सिद्धांत का रहस्य हर क्रिया कैसे जुड़ी है ब्रह्मांड से? गीता का ज्ञान।
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- 0:05प्रिय श्रोतागण, पहले प्रवचनों में हम इस प्रसंग में पहुंचे थे
- 0:21विश्व पिता। काशी नरेश की तीन पुत्रों को
- 0:28अपहृत करके ले आए थे। बलपूर्वक स्वयंवर चल रहा था और
- 0:39अंबानी जो सबसे बड़ी थे। उसने अपना पति चुन लिया था, शाल
- 0:47वह शार्द के गले में उसने वरमाला डाल दी थी चलते स्वयंवर में।
- 1:02जाति उपस्थित। वह भीष्म पिता मह देवव्रत अब आगे
- 1:08का प्रश्न अम्बा, अम्बिका, अम्बिका।
- 1:18जब अम्बा हस्तिनापुर पहुंची तो उसने हस्तिनापुर नरेश विचित्र वीर
- 1:23से स्पष्ट कहा कि आपका सेनापति मुझे बलपूर्वक ले के आया है, मैं
- 1:31अपना पति मान चुकी हूँ, वरमाला डाल चुकी हूँ।
- 1:36शालभ को मैंने अपना पति माना है और हृदय से स्वीकृत भी किया है।
- 1:43विचित्र वीर ने तत क्षण कहा देवी मैं तुमसे शादी नहीं करूँगा, तुम
- 1:49जा सकती हो बृष्मपिथा माने। अम्बा को काशी पहुंचा दिया लेकिन
- 2:00शार्प ने उसे अपनाने से मना कर दिया।
- 2:06ये कहानी आगे चलेगी। अम्बा ने प्रतिशोध लेने की कोशिश
- 2:12की, अम्बा ने भीष्म से कहा। कि तुम मेरा वर्णन करो, मैं
- 2:17तुम्हें पति मान सकती हूँ। भीष्म के इंकार करने पर अम्बा ने
- 2:23प्रतिकारी कि मैं तुम्हारी मृत्यु का कारण बनूँगी अब हम आगे चलें।
- 2:37अम्बिका अम्बालिका इनके कोई संतान नहीं हुए और दुर्घटना एक बार फिर
- 2:53घट गई। हस्तिनापुर पे एक बार फिर कालिख
- 2:59ने। अपना साम्राज्य जमा लिया।
- 3:04विचित्र वीर की मृत्यु हो गए। सारा हस्तिनापुर शोक संतप्त था।
- 3:20बेश्याम को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ?
- 3:29सत्यवती ने अपने पहले पुत्र वेद व्यास को भेजा।
- 3:37सन्देश ऐसा कुछ हो गया है। वेद व्यास आए और सत्यवती ने
- 3:45निवेदन किया। के पुत्र हस्तिनापुर को इसका
- 3:50वारिस दे दो। वेधव्यास ने अम्बिका और हम बालिका
- 4:01को एक एक पुत्र दे दिया। वहाँ पर एक दासी थे।
- 4:06उसने प्रार्थना की कि मुझे भी पुत्र चाहिए।
- 4:12पितृ व्यास अनुभव के धनी थे यहाँ पे एक शब्द थोड़ा सा अंडरलाइन कर
- 4:20लेना। आचार्य।
- 4:25खोपड़ी के धनी होते हैं। आचार्य खोपड़ी के धनी होते हैं और
- 4:34संत अनुभव के धनी होते हैं। अनुभव से भरे होते हैं संत?
- 4:43संतों के पास जो अनुभव है उसका लेशमात्र भी तिल मात्र भी
- 4:49आचार्यों के पास निर्मित है। उस दासी के प्रार्थना करने पर एक
- 5:03पुत्र से विधि दिया गया। उसका नाम विद्वव दासी पुत्र
- 5:08विद्वर विद्वर ने सारी उम्र से। लेकिन पांडवों से बहुत प्यार करता
- 5:14था सहानुभूति वह शीतल वृत्ति का इंसान था, सत्य के साथ जाता था और
- 5:25सत्य उसको पांडवों में नज़र आता था क्योंकि पांडव पुत्र।
- 5:32धर्मराज के पुत्र जो बड़े दयालु विद्यालय और अगर जीतने का कारण
- 5:43बनी पांडवों की सेना तो उसमें से एक फैक्टर जो भी है।
- 5:52सिद्धस्त सत्यवादिता का प्रण तो ले चूके थे लेकिन इतने मीठे थे,
- 5:58इतने ज्ञानी थे और इतने ईमानदार थे, इतने सत्यनिष्ठ थे और इतने
- 6:05बाहुबल था उसमें। वो भी एक फैक्टर बना उसका इमेज
- 6:16युधिष्ठिर का इमेज शांति प्रिय, दयालु राजा का था।
- 6:27अगर प्रजा से सहमति ली जाती तो प्रजा युधिष्ठिर को ही चुनती
- 6:39विद्र प्रेम करते थे, युधिष्ठिर से पांडवों से और कुछ पांडवों के
- 6:47पांडवों के चले जाने का मिलान भी था।
- 6:52वो अनाथ बच्चे थे। उनकी रक्षा के लिए कौन आ गया है
- 6:58और ध्यान रखना जो निर्बल के लिए आगे आता है वही संत होता है।
- 7:18सूरा सुई जानिए जो लड़ दीन के हेत पुरजा पुरजा कट मर कब हो न चाटे
- 7:28के बहादुर संत होता है। सूरा सोई जानिए और उसे ही बहादुर
- 7:40कहना चाहिए, जो निर्बल के लिए लड़ता है।
- 7:45बाली के साथ तो सारे हो लेते हैं क्योंकि बाली के पास शोहरत है।
- 7:52धन है, खजाना है, नाम है भारी भीड़ है उसके पीछे उसके साथ तो
- 8:02कोई भी हो लेगा लेकिन धर्म शास्त्र?
- 8:12का प्रमाण कुछ और है। धर्मशास्त्र कहता है कि जो निर्बल
- 8:15के साथ है वही जीतता है। इस बात को हृदय में संभाल लेना जो
- 8:27निर्बल का साथ देता है। वो ही जीतता है।
- 8:31धर्म के साम्राज्य में जो बलि का साथ देता है वह हार जाता है।
- 8:39इसलिए कहावत है कि निर्बल के बलराम परमात्मा बलि है और निर्बल
- 8:46का साथ देता है। असहाय अवस्था में उसे पुकारो, वह
- 8:54तुरंत चला आएगा। द्रौपदी की पुकार सुनके वह तुरंत
- 8:59आ जाता है लेकिन एक बात ध्यान में अब बिना पुकारना हुआ था।
- 9:08घोर संकट की अवस्था में तुम्हारे प्राण तड़प उठे और बस एक ही आवाज
- 9:14निकले तुम्हारे प्राणों से श्रीकृष्ण गोविन्द।
- 9:22हरे मुरारी हिनाथ नारायण वासुदेव। तो वासुदेव प्रावटा हो जाता है।
- 9:45तीन बच्चे हुए, एक अंधा हुआ धृतराष्ट्र और दूसरे पांडव रूप से
- 9:52ग्रस्त हुए खून नहीं बनता था। उसमें यह एक तरह का शराब ही था,
- 10:01खून नहीं बनता था। तो वह गहरे तलों पर जाने में
- 10:12असमर्थ था। अंतरंग क्षणों में वह जा नहीं
- 10:15सकता था। उसकी मृत्यु हो जाती थी।
- 10:20उससे ये कहलों के शापित था। वो।
- 10:24शापित होने के कारण ही वो पांडवों से ग्रसित था।
- 10:29यह एक बात और भी समझा दूँ। मैंने कहा गीता भरी पड़ी है।
- 10:41ये है जो भी जैसे व्यक्ति पैदा होता है, लोग मुझे पूछ लेते हैं।
- 10:45बाबा ये सलाम कहता कि एक ही जन्म है, फिर ये जो जन्मजात लंगड़े
- 10:54दुबड़े अँधे काणे, ये क्यों होते हैं?
- 10:58क्या परमात्मा को वैर है? नहीं नहीं, इस्लाम कुछ भी कहता
- 11:04है। इस सईद कुछ भी क्रिश्चियन की कुछ
- 11:08भी कहती रहे लेकिन ये उनकी मान्यता है।
- 11:13ध्यान रखना सत्य नहीं। सत्य यही है कि अगर तुम अधूले हो,
- 11:20आँखें नहीं हैं तुम्हारी तो कहीं तुमने कुछ ऐसा किया होगा।
- 11:28प्रकृति ऐसे ही तो दंड नहीं देती और ऐसे ही तो पुरस्कार नहीं देती।
- 11:37ये बुद्धि हीन हो जाना ये मोटी बुद्धि के हो जाना तब कुछ तो किया
- 11:44ही बुद्धि का इस्तेमाल गलत बातों पे किया होगा तो परमात्मा ने
- 11:52तुम्हारा औजार छीन ली। क्षमा करना मैंने पहले भी कहा था,
- 12:02जो लोग किन्नर होते हैं, उन्होंने अपराध किए होते हैं पिछले जन्म
- 12:09में। तुम दंड नहीं दे सकते, परमात्मा
- 12:16दंड दे देता है, परमात्मा उनका इन्स्ट्रुमेंट छीन लेता है, यौन
- 12:25यंत्र और किन्नर बन जाता है। मैंने क्षमा पहले ही मांग लिया।
- 12:35लेकिन समझाना तो पड़ता ही है इसलिए किसी की इच्छा के बिना उसे
- 12:49विलाद का करना है। घृणित अपराधों में आ जाता है,
- 12:55बड़े अपराधों में आ जाता है और इनकी सजा उन्हें बहुत नहीं पड़ती।
- 13:04जो भी रोगों से पीड़ित होते हैं, जन्मजात बड़े रोगों से पीड़ित हो
- 13:08जाते हैं। मेरे एक मित्र उनकी घरवाली के
- 13:19किडनी है क्या? कौन क्या करे?
- 13:26जल्दी खराब हो जाता है। एक बार कौन क्या करे?
- 13:30मैंने पहले भी कहा था बाबा मुझे कहते थे जो व्यक्ति पिछले जन्म
- 13:34में हिटलर ट्राइप होते हैं उनको मैं अंधा बना देता हूँ क्योंकि
- 13:41आँखें हैं। सभी दुष्कर्मों का मूल है, लेकिन
- 13:50हैरानी तो तब होती है कि ये अंधे पिछले जन्म से कोई सब नहीं लेते।
- 13:55इस जन्म में भी धोखाधड़ी करने से बाज नहीं आते।
- 14:06तो फिर तेरा क्या होगा? कालिया तीन पुत्र हुए और तीसरा
- 14:21हुआ दासी पुत्र बेधर मैं बड़ा समझदार था, आई ऍम संतुष्टि, मैं
- 14:30लिन। बस जीवन जीने के लिए होता है जीवन
- 14:38जीने के लिए होता है, दूसरों पर अधिकार करने के लिए नहीं होता
- 14:42दूसरों का अधिकार दूसरों का अधिकार दूसरों पर है मेरा अधिकार
- 14:48मुझ पर तुम्हारा अधिकार तुम पर। मैं बलपूर्वक तुम्हें अपनी बात
- 14:53मनाने के लिए वादे करूँ, यही तो पाप होता है और पाप किसे कहते हैं
- 15:03किसी के जीवन के अधिकार को छीन लेना।
- 15:08कैसा मनोवृत्तियों के हिसाब से वो जीना चाहता है अपनी स्वतंत्रता
- 15:13में तुम उसे दुष्कर बना देते हो तो तुम अपराधी हुए क्योंकि तुम
- 15:20तानाशाह हो गए तानाशाहों का यह जन्म तुम देख लेते हो?
- 15:27लेकिन संत उनका भविष्य भी देखते हैं।
- 15:31उनकी मृत्यु के बाद उनका असर क्या होता है?
- 15:37उन्हें मकान नहीं मिलता जैसे कुवारों को मकान नहीं मिलता।
- 15:47तो कहेंगे भाई पत्नी साथ लेके आओ फिर मकान मिलेगा अब आगे चले।
- 16:09राजकाज दे दिया गया। पांडु को क्योंकि देख सकते थे
- 16:17तीसरे को वो राजकाज दे नहीं सकते थे क्योंकि दासी पुत्र थे प्रथा
- 16:22सी के यह गुरु वंश में नहीं। चलता रहा, चलता रहा और यह भी एक
- 16:38नियम है कि पिता के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र राज़ का अधिकार
- 16:45होता है। अब यहाँ पर पेज फंस गया, आकर बड़े
- 16:51हो गए, सभी बड़े हो गए, राज़ करने के योग्य हो गए अपनी विद्यापूर्ण
- 16:57करके आ गए। कुछ पांडु ने सोचा कि जीवन जीने
- 17:07के योग्य तो है नहीं। क्यों न तब कर लिया जाए।
- 17:12बात श्रेष्ठ थी। संतजनों ने उसे मति दी कि तुम
- 17:21एकांत में। कहीं जाकर तुम्हारे लिए कुटिया
- 17:24बनवा देते हैं, वहाँ जाकर तप करो और बात समझ में आ गई।
- 17:32वह मन में चला गया। तप करने के लिए सात में कुंती
- 17:37चली। और कुंती के साथ मादरी भी चली गई।
- 17:48दो पत्नियां थीं तप करते करते 1 दिन।
- 18:03अब ये मत समझना कि जिनके काम यंत्र नहीं हैं उनके भीतर काम
- 18:09वासना नहीं होती ये भूल जाना। लूले लंगड़े अपंग।
- 18:19ये अंधे इनके भीतर वासना नहीं होती, यह भूल जाना वासना होती है,
- 18:25लेकिन यंत्रों से काम नहीं ले सकते क्योंकि परमात्मा ने यंत्र
- 18:32दिए ही नहीं प्रतीत में तुमने इन यंत्रों का दुरुपयोग भी किया।
- 18:38इसलिए उसने छीन लिया है। इसके पास प्रकृति के बस बड़ा
- 18:42शानदार उपाय है। जीस अंग से तुम दूसरों की
- 18:52स्वतंत्र इस शब्द को आप गौर से लिख लेना।
- 18:56ये शब्द बड़े काम पड़ेगा। तुम्हारे जीवन में कर्म व्यवस्था
- 19:01को करने के लिए ये काम बड़े काम इनको आप लिख लेना, दूसरे की
- 19:10स्वतंत्रता का हनन होता हो। वह काम तुम्हारे लिए पाप है।
- 19:21पाप की परिभाषाएं बहुत दी जाती हैं, संतो के द्वारा भी ऋषियों के
- 19:28द्वारा भी अन्य अन्य लोगों के साथ है।
- 19:34लेकिन पाप की परिभाषा मैं तुम्हें नहीं देता हूँ आज जो परिभाषा मुझे
- 19:42बाबा नहीं है दूसरों की स्वतंत्रता को, जिससे हनन पहुंचे
- 19:50दूसरे की स्वतंत्रता बाधित हो। वो पाप है।
- 19:56प्रत्येक व्यक्ति जीने में स्वतंत्र है और पूर्ण ढंग से जीने
- 20:00में स्वतंत्र है, बशर्ते के उससे दूसरों का नुकसान न हो।
- 20:08कम जो चाहे खाना खा सकते हो। तुम जैसे ही चाहे चल सकते हो,
- 20:15तुम्हें जैसे ही अच्छे लगते हैं, वस्त्र पहन सकते हो, लेकिन उसके
- 20:23ऊपर आपत्ति करोगे कि नहीं? तुम्हें तो भिण्डे ही खाने
- 20:26पड़ेंगे, तुम्हें तो कुद्दू ही खाना पड़ेगा।
- 20:32मेरा एक मित्र था, जैन धर्म में जाया करता था।
- 20:35आचार्य जी ने कह दिया कि महा व्रत लो, एक सब्जी को सारी उम्र नहीं
- 20:41खाना है तो मेरे पास हँसी हँसी आए।
- 20:48मुझे कहने लगे। आचार्य कहते हैं कि एक।
- 20:51महा व्रत लो एक सब्जी सुन लो, सारी उम्र नहीं खानी कौन सी सब्जी
- 20:57को त्याग दू? मैंने कहा जो तुम ऑलरेडी ये नहीं
- 21:00गाते हो कहता मुझे तो कद्दू अच्छा नहीं लगता, मैंने कहा हर कद्दू को
- 21:06छोड़ दो। त्याग भी हो जाएगा।
- 21:11थोड़ा सा अहंकार भी बढ़ जाएगा और आचार्य की नजरों में भी तुम
- 21:16त्यागी हो जाओगे। दूसरे दूसरे दिन जाकर कहा कि
- 21:25आचार्य जी गुरूजी मैं कद्दू का त्याग करता हूँ।
- 21:30आजीवन। कद्दू नहीं खाऊंगा अब बताओ बेचारे
- 21:33कद्दू ने क्या बिगाड़ा है और ये लोग ऐसी मूता क्यों करते हैं जो
- 21:41चाहो खाओ, एक सब्जी छोड़ दो, जो तुम्हें अच्छी नहीं लगती?
- 21:48कोई कोई सब्जियां होती हैं। तुम जिंदगी भर खाते हैं, मैंने
- 21:58कभी सीताफल नहीं खाया। पेठा अच्छा लगता ही नहीं बढ़ता,
- 22:02अच्छा लगता ही नहीं, किसी को बढ़ता ही अच्छा लगता है तो मैं
- 22:07उसे छोड़ भी दूँ तो क्या तकलीफ है मंगाता।
- 22:12अगर ड्राई फ्रूट्स को छोड़ दे, त्याग कर दे तो कैसा रहेगा?
- 22:22है ही नहीं। जब उसके पास तो पहले ही छोड़ा हुआ
- 22:28था भाई। तो ड्राई फ्रूट को छोड़ देना
- 22:37जिसके पास के पास है ही नहीं। हाँ छोड़े बुद्ध छोड़े, कपिल
- 22:46वस्तु छोड़े जिनके लिए तुम लड़ लड़ के मर जाते हो जिसकी गाथा मैं
- 22:51सुन रहा हूँ तुम्हें। वह इस जर जरूर जमीन की गाथा है।
- 22:57इसके लिए भगवान कृष्ण ने 40,00,000 लोगों को धूल चटा दिया
- 23:05और उनके परिवार आते हैं। कितना संताप झेला होगा?
- 23:13एक घर का हेड चला जाएगा, बाकी उसके आश्रित जो लोग हैं वो कितना
- 23:20संताप झेलते हैं? तुम सोच सकते हो बात कहती जड़,
- 23:35जड़ जो रोज़ जमीन ये तीनों चीजें। लेकिन यहाँ था जड़ जमीन इसके लिए
- 23:45लड़ मरे, लेकिन उसी जमीन को छोड़कर सम्राट की पदवी छोड़कर
- 23:56अकेले वारिस कपिल वस्तु को लात मार के।
- 23:59अपनी खुशी से चला जाता है, वह होता है त्याग।
- 24:06मजबूरी में जो त्याग है जो पहले से तुम्हारे पास है ही नहीं, वो
- 24:12तो त्याग है ही। कुदरत ने ही करवा दिया।
- 24:18अंधा कहे कि मैंने देखना छोड़ दिया है, त्याग कर दिया है, कैसा
- 24:22रहेगा ये देखने की क्षमता ही नहीं है।
- 24:32वह त्याग नहीं माना जाता त्याग वह माना जाता है तुम्हारी तरफ
- 24:38तुम्हारे आस पास 3600 प्रकार के। खाद्य से मकरियां पड़ी हूँ और
- 24:44तुम्हारे मन में भी वो खाने का विचार न उठे, सिर्फ कर्म से नहीं,
- 24:51लोगों को दिखाने के लिए नहीं, लोगों से सम्मान प्राप्त करने के
- 24:59लिए नहीं। किसी प्रकार की पद्मश्री, पद्म
- 25:03विभूषण वगैरह ग्रहण करने के लिए तो हमारे चित्त में भी ये तरंग न
- 25:12उठे कि मैं ये चीज़ खा लूँ ये भोग लूँ, वो घूम लूँ, ऐसा कुछ न उठे।
- 25:23बहुत है त्याग अगर सच्चा त्याग कह सकते हैं तो बुद्ध जैसे लोग करते
- 25:28हैं, महावीर जैसे लोग करते हैं, किसके पास है ही नहीं, वो त्याग
- 25:36क्या करेगा? और कहानी को हम आगे ले चले।
- 25:51अब यहाँ पर तड़क आया कि जो राजा है उसका बड़ा पुत्र ही राज्य को
- 26:03संभालेगा। यहाँ दुर्योधन का तर्क बिल्कुल
- 26:08ठीक था, वर्तमान में राजा को पांडु मर चूके थे।
- 26:22काम वासना के कारण पांडु की मृत्यु हुई।
- 26:25मादरी स्नान कर रही थी। स्नान करती मादरी को देख लिया काम
- 26:29वासना उठी यंत्र काम नहीं करते थे और वह मर गया, वो ही काम वासना
- 26:37उसकी मृत्यु का कारण बनी। जो राजा होता है, वर्तमान में
- 26:51पदासीन होता है। उसका ज्येष्ठ पुत्र ही राज़ करता
- 26:57है। दुर्योधन का तर्क बिल्कुल सटीक
- 27:00मालूम पड़ता है। दुर्घटना ने अपना तर्क पेश कर
- 27:10दिया, अपना दावा पेश कर दिया और उसके दावे के आगे ना भीष्म कुछ
- 27:15बोल सके ना द्रोण कुछ बोल सके ना बिदु कुछ बोल सके।
- 27:21वो कहने लगे, पांडु का पुत्र वैसे भी पांडु छोटा है।
- 27:26अगर सोचा जाए धृतराष्ट्र अंधा न होता तो कौन राजकर्ता धृतराष्ट्र
- 27:33अंधा था, इसलिए राज़ नहीं किया। पांडु तो दो नंबर था इन दी
- 27:39एब्सेंस ऑफ धृतराष्ट्र। तो पांडु जब मर गया तो धृतराष्ट्र
- 27:49को बैठाना पड़ा या मजबूरी थी तब मजबूरी थी के धृतराष्ट्र देख नहीं
- 27:59सकता था अब मजबूरी है के पांडु मर गया है।
- 28:06और देखिये जो वर्तमान प्रगति निस्हीन होगा, उसका ही बड़ा पुत्र
- 28:11राज़ कर रहा हूँ। यह धारणा थी यही नियम था अब यहाँ
- 28:16पर दोनों पक्ष अड़ गए। भूतपूर्व राजा पांडु उसका बड़ा
- 28:23पुत्र है। जो धृष्ट वह राज़ करेगा, लेकिन
- 28:30दुर्योधन ने दावा पेश किया और दावे में बिल्कुल जान थी।
- 28:35वो कहते हैं, देखिए मेरा मेरा पिता अंधा था, इसलिए उसे राज्य
- 28:40नहीं दिया गया। लेकिन अब तो मेरा पिता गद्दी
- 28:45निशीन है ना क्योंकि पांडु मर चुका है तो राज्य उसे मिलेगा जो
- 28:52राजा है। राजा इस वक्त है धृतराष्ट्र और
- 28:58उसका बड़ा पुत्र हूँ मैं। तो मैं हूँ उत्तराधिकारी सही और
- 29:05था भी वो है मेरी दृष्टि में अगर तुम्हारी मान्यताओं को अलग से
- 29:14छोड़ दिया जाए तो वर्तमान के राज्य का जो बड़ा पुत्र होगा वही
- 29:19उत्तराधिकारी होगा। वर्तमान में राजा है दर्द राष्ट्र
- 29:24और उसका अधिकारी कौन बड़ा पुत्र ज्येष्ठ पुत्र द्रौधन फिर ये
- 29:32षड्यंत्र किसने चला? बात तो बिल्कुल साफ थी।
- 29:37बिल्कुल दुर्योधन राज्य करने का उत्तराधिकारी बनता था क्योंकि वह
- 29:42वर्तमान राजा का ज्येष्ठ पुत्र था।
- 29:46यह चिंगारी छेड़ी विदरु की तरफ से तुम शायद सोच भी न सकोगे।
- 29:52विदरु ने चिंगारी छेड़ी और कृष्ण ने आग लगा दी।
- 29:57कृष्ण ने तो आग लगा दी कि कृष्ण का कृष्ण की बहन सुभद्रा वह
- 30:07अर्जुन से प्यार करते थे और अर्जुन से शादी हो गई उसकी।
- 30:16इसलिए अर्जुन और कृष्ण का नाता जीजा साला का था।
- 30:22कृष्ण चाहते थे कि मेरी बहन महारानी बने।
- 30:31वह कृष्ण की इच्छा थी। यहाँ कृष्ण गलत भी जहाँ गलत
- 30:40होंगे, वहाँ मैं गलत कहूँगा। मेरी मान्यता के हिसाब से तो मैं
- 30:45नहीं कहूँगा कि तुम गलत मानो मेरी मान्यता के हिसाब से बिद्र
- 30:51क्योंकि प्रेम करते थे। इसलिए वह दृष्ट के पक्ष में थे और
- 30:58वैसे काबिलियत के हिसाब से देखे तो राज़ करने में जो व्यक्ति शीतल
- 31:05मन का नहीं, जो फैसला लेने में देर करता है, जो सन्श्यत्मा
- 31:14ग्रस्त है। यह दयालु नहीं है जो कपटी है।
- 31:22ध्यान रखना इस बात का जो झूठ बोलता है, जो क्या चल सकता है, जो
- 31:28पाप वृत्तियों से भरा हुआ है, जो झूठ बोलकर शासन करता है।
- 31:36जो खरीद करके शासन करता है, वह राजकाज का अधिकारी नहीं है।
- 31:42अब मेरे इन शब्दों को आप लिख लेना राजा कौन जो शांत चित्त हो पहला
- 31:52उसका मन नचाता ना हो उसे। उसकी इन्द्रियां उसके वश में हो
- 31:58यानी वो इन्द्र हो, जीसको कोई अंकाक्षा न हो विशाल साम्राज्य
- 32:08की। जो शीतल मना हो जो दूसरों पर
- 32:16अधिकार करना ना चाहता हो। याने तानाशाह वृत्ति करणों महावीर
- 32:23का वृक्ष प्यारा वचन है जियो और जीनत।
- 32:30और तानाशाह भक्ति न खुद जीता है, न जीने देता है।
- 32:39जो दूसरों का अधिकार न छीनता हो, जो विषयों से पीछे लगकर दुष्कर्म
- 32:45न करता हो, जो सत्यवादी हो। जो अहिंसक हो, जो हिंसा न करता हो
- 32:56चार वहाँ मरवा दिए आठ वहाँ मरवा दिए 12 वहाँ मरवा दिए जो हिंसा न
- 33:06करता हो अहिंसक हो। जो जिए भी और जीने भी दे और जो
- 33:14किसी की संपत्ति पर नजर न रखता हो तो जिसके पास है ठीक है, पापी
- 33:25व्रती का न हो गुस्से ला हो। अहंकारी न हो जो ये व्रती न रखता
- 33:33हो कि सारे सृष्टि का साम्राज्य मेरे हाथ में आ जाए।
- 33:39ऐसी व्रती को रखने वाला व्यक्ति राज़ करने का अधिकार ही नहीं
- 33:43होता। क्यों?
- 33:51क्योंकि उसकी वासनाएँ उसके अधीन नहीं है।
- 33:56इन्द्रियां उससे बाग बाग जाती हैं।
- 34:00इन्द्रियां कहती हैं, हम तो साम्राज्य करना चाहते हैं सारी
- 34:04सृष्टि के ऊपर। और वह अपनी इंद्रियों के पीछे भाग
- 34:08लेता है, जब शांत मन का न हो, जो तृप्त मन का न हो, वह राजा बनने
- 34:17के योग्य नहीं है। झूठ, कपट, चोरी, कफर, तूफान यह
- 34:22उसके बीच में न हो और यह सारे गुण।
- 34:25एक ही व्यक्ति में थे उस वक्त किसमें?
- 34:31युधिष्ठिर में गुणों के हिसाब से अगर काबिलियत के हिसाब से गुणों
- 34:37के ढंग से परखा जाए तो युधिष्ठिर से बढ़िया हस्तिनापुर का।
- 34:44राजा कोई भी बनने के लायक नहीं था, जो दृष्ट से किसी की दुश्मनी
- 34:52नहीं थी। कृष्ण के साथ दुश्मनी थी।
- 34:57जरासंध दुश्मन था, शिशुपाल दुश्मन था।
- 35:04लेकिन युधिष्ठिर का दुश्मन कोई नहीं था।
- 35:08ये बड़ी प्यारी बात है। इस ढंग से देखा जाए तो युधिष्ठिर
- 35:17राजा बनने के योग्य था। काबुलियत के हिसाब से और अगर
- 35:25उत्तराधिकार के रूप से देखा जाए तो दुर्योधन उत्तराधिकारी बनने के
- 35:31योग्यता मान्यता के अनुसार दोनों पक्ष तुम्हें समझाते।
- 35:43आखिर में बड़े बूढ़े विषयों में पड़े विषम पिता महा द्रोणाचार्य
- 35:48कृपाचार्य विदुर के सभी बड़े बूढ़े उन्होंने बैठ के फैसला करवा
- 35:59दिया। ऐसा करो।
- 36:02एक छोटा सा खांडी से बजत हुआ पांच भाई हैं राज़ करने की ये 100 भाई
- 36:07हैं वरने 101 थे एक दासी पुत्र पिता यू यू सु।
- 36:17जब गांधारी गर्भावस्था में थी तो धृतराष्ट्र को काम उठा।
- 36:22अब मैं जान बूझ कर नहीं छेड़ रहा हूँ।
- 36:27इतिहास है तो दासी पेश की गई। उसके घर में ठहर गया, उससे हुआ
- 36:35यूसुफ वह था तो वो था तो धृतराष्ट्र का।
- 36:43लेकिन कंधारी के गर्व से नहीं हुआ था, वैलिड नहीं था।
- 36:47दासी पुत्र कहलाया। 101 पुत्र थे।
- 36:57ये पांच हैं। चलो इनको हिसाब से दे दो तो
- 37:01बंटवारा कैसे हुआ तुम्हें भी शायद पता नहीं होगा।
- 37:05बंटवारा इसी ढंग से हुआ। पांच और 101 के बीच में बांटा गया
- 37:12निश्चित हस्तनपुर ज्यादा था, इन्द्रप्रस्थ थोड़ा था और
- 37:17इन्द्रप्रस्थ थोड़ा भी था और बेड हुई जमीन थी।
- 37:23उबड़ खाबड़ पथरीली चिकणी रितली ये सब कूड़ा करकट जो धृतराष्ट्र के
- 37:31राज्य में आता था, जिसका कोई काम दाम नहीं था, जहाँ कोई फसल नहीं
- 37:34होती थी, को सौंप दिया गया कि ये लो ये तुम्हारा।
- 37:42इसको आप ठीक कर लो। यहाँ जो चाहे बना लो, इसके बनाने
- 37:49का निर्माण जो खर्च होगा वो हस्तिनापुर वहन करेगा, यहाँ कृष्ण
- 37:59आएगा। कृष्ण ने वहाँ सुंदर इन्द्रप्रस्थ
- 38:04का निर्माण कर दिया। विश्वकर्मा को बुला के बढ़िया
- 38:11नक्शा बना दिया और उसका आगाज हुआ। आगाज हुआ तो वह महली से ढंग से
- 38:21बनाया गया था। ऐसी कारीगरी थी कि फर्श वहाँ पर
- 38:26पानी नहीं था, लेकिन फर्श ऐसा लगता था जैसे पानी से भरा हुआ हो।
- 38:33दुर्योधन को भी निमंत्रित किया गया।
- 38:37क्योंकि आज गृह प्रवेश करना था तो दुर्योधन जब वहाँ पर उतरने लगा,
- 38:44उस कक्ष में तो उसने अपने पहुंचे ऊपर कर लिया।
- 38:51उसे लगा जैसे पानी है, पानी से मेरी अचकन खराब हो जाएगी।
- 39:00तो जब उसने ऊपर अचकन को ऊपर किया तो द्रौपदी ऊपर गैलरी में खड़ी
- 39:09थी, वो हंसने लगी। अब वैसे तो देवर भाभी थे।
- 39:16मजाक कर सकते थे और दुर्योधन छोटा था, लेकिन उसने मजाक किया और मजाक
- 39:29बड़ा खतरनाक पड़ा। मजाक के भीतर से ईर्ष्या की आग।
- 39:35साफ झलक रही थी। संतुष्ट नहीं थी द्रौपदी द्रौपदी
- 39:49ने कहा कि अंधों के अंधे ही पैदा होते हैं।
- 39:52यहाँ से राड चढ़ गई। उसने शकुनी का बताया और शकुनी ने
- 39:59फिर। शुरू कर दिया अपना काम अब तुम ऐसा
- 40:04मत करो, मैं उस शकुनी की बात करता हूँ, इस शकुनी की बात नहीं करता
- 40:09हूँ तो मंत्र बने उसमें इंद्रप्रस्थ को जीतने का।
- 40:18सिलसिला शुरू हो गया। अब भाई जितना ही है तो दिया
- 40:22क्यों? तो जुए का आयोजन हुआ।
- 40:26उन दिनों में जुआ भी समाज का मान्य हिस्सा था, आज नहीं है।
- 40:34मैंने कहा कुछ समाजों के रंग ढंग बदलते रहते हैं।
- 40:39एक प्रश्न आज ही आया। उसको बीच में निपटाता चलो, लेकिन
- 40:42ऐसे प्रश्न किया मत करो, ये गीता है, इसमें ऐसे प्रश्न करना अपराध
- 40:50से कम नहीं है तो तुम चुपचाप सुनते रहा करो, अगर प्रश्न करने
- 40:56है तो मत सुना करो। और मैं क्या यही कह सकता हूँ जब
- 41:06तुमने अटपटे प्रश्न पूछने हैं, कोई ढंग का प्रश्न ये नहीं पूछना
- 41:12ये प्रश्न आया है। कि अगर समाज इस डंक का था तो कर्ण
- 41:20को क्यों बहा दिया गया? तुम्हें प्रश्न ठीक लगेगा, लेकिन
- 41:25ठीक है नहीं। क्यों बहा दिया गया?
- 41:32कुंती ने डर के मारे क्यों बहा दिया उस नाजायज उरद को?
- 41:38तभी मैं कहता हूँ कि तुम वीडियो को पूरी सुना करो और एक बार नहीं
- 41:45वैसे भी तुम खाली रहते हो। आजकल नौकरी वोकरी तो है ही नहीं
- 41:52तो फिर दूसरी बार सुन लिया करो क्या हर्जा है?
- 41:55वक्त पास हो जाता है, नॉलेज बढ़ जाती है तो पूछा है कि क्यों
- 42:01कुंती ने बहा दिया जब ऐसी समाज में प्रथा ही नहीं थी, भाई थी,
- 42:06सुनिए मैंने क्या कहा, मैंने कहा, उसका घरवाला साथ जाता था।
- 42:11इसे नेयोग की प्रथा कहते हैं जो स्वामी।
- 42:14दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश में वर्णित की है सत्यार्थ प्रकाश
- 42:19पड़ी है सत्यार्थ प्रकाश में स्वामी दयानंद ने यही बात कही है,
- 42:28जीस दंपति के औलाद न हो वह निर्योग के द्वारा।
- 42:32और राज़ पैदा करवा सकता है। समाज की मान्यता थी चलो एक पक्ष,
- 42:40एक समूह तो बनेगा। स्त्री की तरफ से तो एक अंडाणु
- 42:43आएगा ना। पुरुष की तरफ से शुक्राणु नहीं
- 42:48आया, लेकिन स्त्री की तरफ से अंडाणु तो आया।
- 42:53ऐसा ही हुआ। रतीश सर के मामले में एक शुवांकु
- 42:57वंश के रतीश सर तो उसने अंगरा ऋषि से नियोग करवाया।
- 43:01इसको नियोग प्रथा कहते थे। यह मान्यता प्राप्त थी, लेकिन
- 43:06मान्यता प्राप्त पति साथ जाता था। वहाँ कवारी थी, पति था ही नहीं,
- 43:17अभी तो साथ क्या खाक जाएगा? इसलिए वो अवैध था।
- 43:24नियोग पति की सहमति से होता और यह प्रयोग था।
- 43:29यह नियोक ने यह तो कुंती ने प्रयोग किया था।
- 43:35वह अभैद्य था, उसको बढ़ा दिया गया।
- 43:40ठीक आगे से ऐसा प्रश्न मैं पूछना यह गीता है, इसमें बहुत कुछ आएगा?
- 43:48बड़ी उलझनदार है ये अगर आनंद लेना है इसकी मिठास का तो सिर्फ सुनना
- 43:57बाबा नानक ने कहा है सुनिए दुख पाप का नाश बड़ी प्यारी है, बड़ी
- 44:03मीठी है ये गंगा की धार। इसमें स्नान क्यों नहीं कर लेते?
- 44:08फिर भी तुम्हें भी अभी प्रश्न उठते हैं इसकी गंगा में स्नान
- 44:20करने का मन नहीं करता तुम्हें? खैर मैंने तुम्हें जवाब दे दिया
- 44:29कि उसका पति। सहमति से नियो करवाता था।
- 44:35जब खुद टकरें मार मुर के छक जाते थे तो फिर इन सरकारी संडों के पास
- 44:43जाते थे। इनकी दुकानें खुली हुई थीं।
- 44:50दुकानों के ऊपर बोर्ड लगा रखे थे। श्री श्री अंकरा ऋषि जी महाराज
- 44:58मान्यता प्राप्त सांड तो उनके पास जो ठीक लगता है उसके पास चले जाते
- 45:05हैं। और उन दिनों में व्यवसाय था कि
- 45:13लिखने वालों ने लिखा नहीं है, लेकिन मैं बता देता हूँ तुम्हें
- 45:18व्यवसाय था या तो नाम मेरा चलेगा, जिसकी ये औलाद है स्वम मेरे हैं
- 45:26या फिर इसकी एवज में? उसे कुछ पदार्थ देने पड़ते थे।
- 45:33देखिए अब गजब हो गया है। धन भी लेते थे, स्वाद भी लेते थे
- 45:40तो मशा मत करो, सारे दिन इंतजार करते थे, कोई ग्राहक आ जाए और आते
- 45:50भी थे। हसनपुर बहुत विशाल साम्रज्य था
- 46:03इन्द्रप्रस्थ दिया गया इन्द्रप्रस्थ बनाया गया एक
- 46:07उल्हाने ने एक छोटी सी व्यंग्य ने महाभारत करवाया, अन्धो के अंधे ही
- 46:15पैदा होते। बात तो सत्य है लेकिन देखिए कड़वी
- 46:20है, बोली नहीं चाहिए थी। पतंजलि ने बड़ी प्यारी बात रखी है
- 46:30पतंजलि जब। यम नियम आसन प्रणयाम पर
- 46:34प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधि अष्टांग योग का वर्णन करते हैं तो
- 46:38यम के भीतर एक शब्द कहते हैं पहला अंग है यम।
- 46:44उसके पांच भाग हैं सत्य, अहिंसा, अस्तब्रह्मचर्य, अपरिग्रह।
- 46:52पहला पोरशन है सत्य बड़ी शॉर्ट में चल रहा हूँ, मैं हाँ, जो
- 46:57फास्ट गाड़ी है एक्सप्रेस जैसे तुम शताब्दी करते हो।
- 47:16अरे छोड़ो झंडी किसी ने भी दिखाइयो मेरी बात सुनो तो कहते
- 47:25हैं कि सत्य बोलो सत्य से शुरू होता है।
- 47:29सत्य अहिंसा अस्त ब्रह्मचार्य आप भी करो, लेकिन सत्य बोलो लेकिन
- 47:37ऐसा सत्य बोलो कि किसी के हार्ट को ठेस न करें।
- 47:43अभी ऐसा कभी हो सकता है। सत्य हमेशा ही हार्ट को ठेस करता
- 47:47है। अब पतंजलि होते तो उनसे मैं आमने
- 47:51सामने बात कर लेता, लेकिन बिचारे रहे नहीं।
- 47:53मैं क्या करूँ? पतंजलि कोई ज्ञात नहीं होगा इस
- 47:58बात का कि सत्य हमेशा ही कष्टकारी होता है हृदय के लिए क्योंकि हृदय
- 48:08में तुम। गलत मान्यताएँ छुपाए बैठे हो वो
- 48:12टूटेंगे। सत्य कहने से उन्होंने कहा सत्य
- 48:17बोलो ऐसा बोलो जो मीठा हो। बस ये ऐसा ही बोल सकते हैं हम।
- 48:23ये मामा जी को मामा जी कह सकते हैं, बाप का साला नहीं कह सकते,
- 48:27बस इतना ही है तो बाप का साला बस उनके कहने का ये मतलब था लेकिन
- 48:35सत्य से तुम्हारी गलत मान्यताएँ टूटती हैं।
- 48:44और संत इसकी फिक्र नहीं करता। संत कहता है तुम्हारी गलत मान्यता
- 48:49जी कूड़ा तुमने बट्टल सिर के ऊपर रखा हुआ है, यह मैंने गिराना है
- 48:54और तुम्हें भार मुक्त करना है। यही वंदन है तुम्हारी, यही भार है
- 49:00तुम्हारी। और यही भारत को मैंने घेरना है,
- 49:03मैंने हल्का करना है। उसके लिए मुझे प्रताड़ित होना
- 49:06पड़े, मुझे दंडित होना पड़े, वो प्रवाह नहीं करता।
- 49:10ऐसा ही साहस होना चाहिए बोलने वाले तो कहीं वो सत्य बोल पाएगा
- 49:17अन्यथा सत्य नहीं बोल पाएगा। फिर तो वो वैसे ही कहेगा।
- 49:21बैठे बैठे आचार्यों की तरह अगर मैंने सत्य बोला तो वो मुझे बाहर
- 49:26डालेंगे। अरे भाई मार डालेंगे तो वैसे भी
- 49:30तुम मर ही जाओगे, खा पी लो जो खाना पीना है।
- 49:36मर तो जाना ही है और कोई पता है अगले पल वैसे ही आ जाए, स्वाभाविक
- 49:42ही आ जाए फिर तुम क्या करोगे? नारायण जब अंत में।
- 49:57आ पकड़ेंगे कान नारायण, जब अंत में आ पकड़ेंगे कान।
- 50:14उनसे भी यूं कह दियो क्या हमको फुर्सत ना हमको फुर्सत नहीं है
- 50:25भाई फिर चलेंगे, लेकिन वो सुनता नहीं।
- 50:30तुम्हारे पास फुर्सत हो ना हो, वह तो कहता बेटा अब बोरिया बिस्तर सब
- 50:36यहाँ बांधना बुंदना कुछ नहीं चलो तो बोलना भी चाहते हो सत्य बतलाना
- 50:46भी चाहते हो और आधा अधूरा बतलाना चाहते हो।
- 50:49अरे छाती को चूड़ी करो और पूरे सहस से बोलो और साहस के बिना कखाक
- 50:57संत होता है। जिसने अपना शीर्ष तलीप भी रख ना
- 51:01सके वह कखाक संत होगा। वह प्रेम की गली में क्या खाक
- 51:08जाएगा? सबसे पहला गुण है बोलने से पहला
- 51:17मुझे बाबा कह सकते हैं कहते थे कि हथेली पे रख लेना।
- 51:24मैंने कहा बाबा वो तो 85 में 28 अक्तूबर को डेली भी आ गया था।
- 51:31अब तो देखना है ज़ोर कितना बाजू है का दिल में सर फ़रोशी की
- 51:37तमन्ना अब हमारे दिल में है, अरे ऐसे डर रहे हो, कांप रहे हो?
- 51:45जैसे जंड को देखकर जंड के भक्त कपते हैं मैं जंड के बारे में
- 51:53उलटपुलट कह देता हूँ। मैं खेत्रपाल के बारे में उलटपुलट
- 51:57कह देता हूँ ये लाला वाला फाला वाला पीर के बारे में गलत मल्त कह
- 52:02देता हूँ। तो कहता तो मैं हूँ भाई मेरे वो
- 52:08मूंछ मूंछ पाड ले डर नहीं ये लगता है श्रद्धा बोलता हूँ मेरे को तो
- 52:18बोलते को भी 40 साल हो गए। आधिकारिक रूप से तुम्हारे सामने आ
- 52:25पाया हूँ लेकिन बोल तो बहुत पुराना रहा हूँ।
- 52:39सत्य सदा वृद्धा को ठेस पहुंचाता है और पतंजलि कहते हैं ऐसा सत्य
- 52:45बोलो के बोलो बस आचार्यों की तरह बोलो।
- 52:51और अगर मैं सत्य बोलेंगे तो ये मुझे मार देंगे।
- 52:54भाई मरना तो 1 दिन है और मौत तो अगर तुम शक्ति भी बोलोगे तो भी आ
- 53:01जायेगा फिर कोई भी दुश्मन ना हो, एक दुश्मन तो सदा ही खड़ा है।
- 53:08मारकर गोली गिरा ली जाएगी। बे मुहूर्त के उठा ली जाएगी।
- 53:28जब तेरी डोली निकाली जाएगी बे मुहूर्त के उठा ली जाएगी।
- 53:46जब तेरी पतंजलि यहाँ थोड़ा सा गलत है, मैं उसे पतंजलि से मैं एकता
- 53:55का हाथ रखता हूँ, मैं कहता हूँ सत्य बोल ही हो सकता है जो साहस।
- 54:03तुम कहते हो ऐसा सत्य बोलना, मीठा मीठा सत्य बोलना, मीठा सत्य नाम
- 54:07की कोई चीज़ ही नहीं सत्य सदक कड़वा होता है क्रूसिज़ ऑल्वेज़
- 54:13बिटर मीठा सत्य नाम की कोई चीज़ नहीं होती।
- 54:20और ये आचार्य लोग डर, डर के मीठा सत्य बोलते हैं और इनके डर के
- 54:24पीछे मृत्यु खड़ी होती है। इसलिए पड़े आराम से तुम देखना
- 54:31जैसे बोलते हैं इनका डंग देखना। एक एक अल्फाज़ को अपनी खोपड़ी के
- 54:38पैमाने पर कस के बोलेंगे। कहीं ऐसा कुछ ना बोला जाए, क्या
- 54:48खाक सत्य बोलोगे तुम और क्या सत्य के बारे में खाक बोलोगे?
- 54:56दोनों ही चीजें तुम्हारे बस से बाहर हैं।
- 54:59बेटा चुभ गई, बात हृदय में उतर गई, कलेजे में उतर गई, खा गई उसको
- 55:08शकनी के पास गया मामा द्रौपदी ने ये बोला।
- 55:16अच्छा कोई बात नहीं, पुत्र निपट लेंगे।
- 55:23वक्त आने पर जुए का आयोजन हुआ। आओ जुआ खेलने कुछ पार्टीस भी होती
- 55:32थीं जश्न मनाने के लिए। राजा लोग इकट्ठे होते है, जश्न
- 55:35मनाओ जुआ के यहाँ भी है ये क्लब्स और क्या चीज़ है?
- 55:41शाम को शराब पीओ जुआ के लिए ऐसे ही होता था तब भी तो जुआ खेलने की
- 55:50व्यवस्था हो गई। और जुबे के अंदर बहुत शॉर्ट में
- 55:56बोल रहा हूँ, जो काम की बात उसको थोड़ी लंबी कर देता हूँ और जो
- 56:01कहानी की बातें बड़ी शॉर्ट में जाता हूँ।
- 56:06वक्त बड़ा कीमती है। जुए का आयोजन हुआ।
- 56:12उधर से धर्मराज युधिष्ठिर खेल रहे थे।
- 56:15झूठ नहीं बोलते थे, बिल्कुल ठीक जुआ खेल सकते हैं, झूठ नहीं बोलते
- 56:20हैं। जुआ खेलने की परंपरा थी, वैलिड
- 56:24थी, जैसे आज क्लब्स के भीतर नहीं है, है ना?
- 56:28हाँ वैसे ही थी। आज एक चारदवारी के बीच में है
- 56:32वॉपर था तब वो सारे ओपन में थी, कोई भी गिर सकता था।
- 56:37उसको पुलिस पकड़ के नहीं ले जा सकते।
- 56:40राजा लोग जुआ भी खेलते थे, शराब भी पीते थे।
- 56:46जुए का आयोजन हुआ। इधर से चकनी पासा फेंकेगा ये तो
- 56:52ऐसा था भाई उधर से युधिष्ठिर पासा फेंके, इधर से दिरोधन पासा फेंके
- 56:57चकनी को बीच में क्यों देके आये, ये तो वैसा ही टंगा पंगा है पिछले
- 57:10जन्म का शरारती है जो ऐसा पैदा किया भगवान ने।
- 57:16व्यवस्था के अनुसार प्रकृति ने पहले ही दंडित कर दिया।
- 57:20इसको देखो कैसा चलता है अंग ढंग ही ठीक नहीं है और बेईमान तो
- 57:29बेईमानी करेगा। पाशा फेंकने में दक्ष।
- 57:36मैंने बड़े लोग देखे हैं, पास्ता फेंकते हैं।
- 57:39ऐसा लगेगा कि ये पास्ता ऊपर आएगा लेकिन आता दूसरा पास्ता वो दक्ष
- 57:46होते हैं। ये दृष्ट बिल्कुल जैसा ठीक।
- 57:53सही है। सब कुछ हार गया।
- 57:58खुद को बिहार गया, भाइयों को बिहार गया और आखिर में द्रौपदी को
- 58:02बिहार गया। द्रौपदी ने ऐतराज उठाया, मैं
- 58:05तुम्हारी संपत्ति नहीं हूँ, पहली बात तो मुझे जीत के लाया अर्जुन।
- 58:13दूसरी बात अर्जुन की भी मैं संपत्ति नहीं कोई स्त्री पुरुष की
- 58:19संपत्ति थोड़ी होती है, सहभागणी होती है तो तुम मुझे जुए पे कैसे
- 58:25लगा सकते हो? जिसने जुए पे लगाया वो गलत और
- 58:29जिसने जुए पे लगवाया वो गलत। यहाँ ठीक थी द्रौपदी बिल्कुल ठीक
- 58:38थी द्रौपदी का गुस्सा बिल्कुल ठीक है मैं मैं दांव पे कैसे लग सकती
- 58:45हूँ? मुझको हारा जीता नहीं जा सकता।
- 58:51आए तो गुलाम प्रथा वैसे भी समाप्त हो गए, लेकिन उस वक्त थी गुलाम
- 58:58प्रथा थी। भगवान राम के राज़ तक गुलाम प्रथा
- 59:04थी। धीरे धीरे जैसे जैसे इनके
- 59:13दुष्परिणाम सामने आते चले गए, हम ज्यादा मानवतावादी होते चले गए और
- 59:21वैसे वैसे हमने उन कानूनों को हटा दिया और फिर जब हार गए तो निकलो
- 59:31भाई इंद्रप्रस्थ को खाली करो। फिर झगड़ा हो गया।
- 59:39अब बड़े बूढ़े फिर आगे बिचारे क्या करे?
- 59:41ये तो चौथे दिन क्लेश ही क्लेश रहते हैं।
- 59:51पूरे गणमान्य लोगों के बीच में जुआ खेला गया और सभी व्यक्ति।
- 59:55सभी गणमान्य व्यक्ति इसके प्रत्यक्ष प्रमाण थे कि ठीक ये
- 1:00:00हार गया। सब कुछ हार गया।
- 1:00:06आखिर में फैसला हुआ कि इनको इनका इंद्रप्रस्थ।
- 1:00:16आधा राज्य वापस कर दिया जाएगा अगर ये 12 वर्ष का वनवास हमारी सीमाओं
- 1:00:23से बाहर चले जाएं और तेरहवाँ वर्ष ये बड़ी खतरनाक है।
- 1:00:32ये दुर्योधन और छकनी की चाल बड़ी खतरनाक दुर्योधन भी जानता था,
- 1:00:39छकनी भी जानता था, दुर्योधन तो मूर्ख था, जो क्रोध से ग्रस्त
- 1:00:44रहता हूँ, वह समझदार नहीं होता। समझदारी को खा जाता है।
- 1:00:52क्रोध तो दुर्योधन इतना क्रोध ही था कि मैं तो भगवान कृष्ण को भी
- 1:01:01कह दिया, इस ग्वाले को कैद कर दूँ।
- 1:01:05जबकि देख चुका था शिशु पाल का असर।
- 1:01:12लेकिन उसके बावजूद क्रोध हर लेता है।
- 1:01:17विवेक को भूल गया। खैर, कृष्ण तो कैद नहीं किए जा
- 1:01:25सकते। फैसला हुआ।
- 1:01:3113 वर्ष 12 वर्ष वनवास और तेरहवां वर्ष अज्ञातवास और भला राजा अपनी
- 1:01:39सी आइडी को छोड़ेगा तो जहाँ जहाँ जाएगा उनका राशन पानी वहाँ पहुंचा
- 1:01:47दिया जाएगा जहाँ जहाँ जाएगा सी आइडी।
- 1:01:53लेकिन होनी होनी बड़ी प्रबल होती है।
- 1:01:57होनी आँखों में धूल फेंक देती है। 12 वर्ष भी गुजार लिया और तेरहवां
- 1:02:04वर्ष ऐसे स्थान पर चले गए वो विराट के यहाँ।
- 1:02:10जहाँ पर ढूंढे ही नहीं जा सकते थे जहाँ पर कोई कल्पना भी नहीं कर
- 1:02:14सकते। तेरहवें वर्ष हो।
- 1:02:20विराट के पास गए नौकरी के देखिए ऐसे कहते हैं वक्त महारानी कुंती।
- 1:02:32महारानी द्रोपदी महाराजा युधिष्ठिर क्या कुछ बनने को मजबूर
- 1:02:41हो गए? क्या कुछ सुनने को मजबूर हो गए?
- 1:02:44क्या क्या कष्ट सही होंगे उन्होंने?
- 1:02:48तेरहवां वर्ष किस तरह गुज़ारा सबसे भयंकर था क्योंकि राजसी
- 1:02:54कामों से तो दूर थे ही अब अपने ढूंढे जाने का फिकर भी था और अगर
- 1:03:02ढूंढ लिए गए तेरहवें वर्ष में तो फिर फिर 13 वर्ष वैसे ही 12 वर्ष
- 1:03:06बनवास? एक वर्ष अज्ञात वर्ष इतने में
- 1:03:11जिंदगी बीत जाएगी। बड़ा शानदार फॉर्मूला था शकनी का,
- 1:03:18लेकिन उस विशाल के आगे उस विराट के आगे शकनी के परपंच कहाँ चलते
- 1:03:23हैं? उस विराट के लिए लबड़ी आज देखिये
- 1:03:36राजा होते हुए भी इतनी सेना होते हुए भी अब तो सारी सेना उसकी थी,
- 1:03:41इन्द्रप्रस्थ की सेना भी उसकी थी, पीछे लगा दिए सारे।
- 1:03:47लेकिन फिर भी गायब हो गए। आँखों से ओझल हो गए तेरहवाँ वर्ष
- 1:03:52पूरा एक वर्ष उन्होंने अज्ञातवास में बिता लिया वापस आ गए अपना
- 1:04:01अधिकार माँ का अधिकार मांगने पे। दुर्योधन ने कहा कि तुम बात करते
- 1:04:09हो आधे राजे के, मैं पांडवों को सुई के तीखी सुई के नोक जितनी जगह
- 1:04:22भी नहीं तुम का हस्तानापुर साम्राज्य में।
- 1:04:29मुखर्जी यही से युद्ध की शुरुआत है।
- 1:04:36कुंती ने आज्ञा दे दी क्योंकि सबसे व्रत थे वो पांडवों में
- 1:04:43युद्ध की घोषणा हो गई। और युद्ध हुआ और युद्ध का सारा
- 1:04:48वर्णन है युद्ध का सारा वर्णन यह गीता है यह गीता उत्पन्न क्यों
- 1:05:02हुई? बस थोड़ी सी बात।
- 1:05:04और फिर प्रसंग खत्म युद्ध की घोषणा हुई उससे पहले श्री कृष्ण
- 1:05:13भगवान एक राजदूत बनकर गए। पांच गांव मांगे, पांच भाइयों के
- 1:05:22लिए एक एक गांव मांग लेंगे। एक एक गांव पे राज़ करने के राजा
- 1:05:27तो कहलाएंगे, लेकिन दुर्योधन ने स्वीकार नहीं किया।
- 1:05:32पांच राज्य भी मैं नहीं दे सकता तो पांच ये जन्य भगवान कृष्ण ने।
- 1:05:43शंख बजा दिया। युद्ध होगा, अब रण होगा और उसके
- 1:05:54बाद 1 दिन। राजा धृतराष्ट्र के पास वेधाव्यास
- 1:06:04आते हैं वेधाव्यास कहते हैं धृतराष्ट्र को के राजन यहाँ
- 1:06:16लाशें। गिने नहीं जाएंगे, तुम तो देख
- 1:06:20नहीं सकते। युद्ध होना अवश्य भाभी है या रुक
- 1:06:25नहीं सकता। अब तुम भी चाहो तो भी नहीं रुक
- 1:06:28सकता क्योंकि ये होने को स्वीकार हो गया है और जो चीज़ होने को
- 1:06:33स्वीकार हो जाती है वह टली नहीं जा सकती।
- 1:06:38अब मैं देख रहा हूँ उसके बही खाते को उसमें यह युद्ध लिखा जा चुका
- 1:06:43है। महाविनाश होगा, लाशें ही लाशें
- 1:06:49होंगी, कितने अनाथ हो जाएंगे, कितने विधवाएँ हो जाएंगी, कितने
- 1:06:56घर उजड़ जाएंगे? इसकी जिम्मेदारी तो बाद में नीती
- 1:07:02तय करेगी, लेकिन तुमसे मैंने कुछ नहीं कहना तुमसे, मैंने सिर्फ एक
- 1:07:09बात कहनी है कि तुम सारी उम्र अंधे रहे कुछ देख नहीं सके।
- 1:07:15अब अगर इस युद्ध को देखना चाहते हो तो मैं तुम्हें तीसरा नेत्र दे
- 1:07:21सकता हूँ जिससे तुम युद्ध का सारा दृश्य अपनी आँखों से देख सको और
- 1:07:29युद्ध का दृश्य ही नहीं किसके मन में क्या बातें आती हैं, देखिये
- 1:07:33यहाँ छठी इन्द्र की मैंने बात की थी।
- 1:07:36यहाँ छठी इन्द्रिय का जागृत होना क्या क्या दे देता है, वो बताते
- 1:07:40हैं वेद व्यास किसके मन में क्या चल रहा है।
- 1:07:48तर्क वितर्क, कुतर्क सब तुम्हें पता चल जाएगा।
- 1:07:54कौन क्या योजना बना रहा है? कौन क्या कर रहा है, ये सब
- 1:07:59तुम्हें भी यहाँ बैठे पता चल जाएगा क्या युद्ध में हुआ क्या न
- 1:08:04हुआ, सब पता चल जाएगा तुम सारी उम्र अंधे रहे, आज भी अंधे हो,
- 1:08:10जन्मजात अंधे हो? मैं तुम पर इतनी करुणा कर सकता
- 1:08:17हूँ कि तुम्हें तीसरा नेत्र दे दूँ, तुम्हारी छठी इंद्रिय जागृत
- 1:08:22कर दूँ। वेदव्य सब जानते थे कि कृष्ण
- 1:08:28उपदेश भी देंगे। शायद ये कृष्ण के उपदेश को समझ
- 1:08:34जाए। युद्ध को रोकने की घोषणा करते हैं
- 1:08:40लेकिन धृतराष्ट्र ने कहा देखिये प्रभु मैं सारी उम्र अंधा रहा
- 1:08:47हूँ। मुझे ये नहीं पता आदमी की तस्वीर
- 1:08:50क्या होती है, मैं देखा ही नहीं है, इसलिए मैं अब भी नहीं देखना
- 1:09:02चाहता मैं अपने पुत्रों को और अन्यो को।
- 1:09:11उनकी लाशों को निहारना नहीं चाहता।
- 1:09:14जब तुम कहते हो सत्य है प्रभु तुम झूठ कभी नहीं गए थे लेकिन ये
- 1:09:22दृश्य मैं देख कैसे सकूंगा? इसलिए मुझे दिव्य दृष्टि मत दो तो
- 1:09:29फिर ठीक मैं चलूं। तुम ऐसा करो, मेरे सारथी को सुत
- 1:09:38पुत्र संजय देव दृष्टि दे दो, यह मुझे पल पल की खबर देता रहेगा।
- 1:09:46दिव्य दृष्टि में अगर किसी के मन में कोई बात आई तो भी पता चल
- 1:09:50जाएगा। कौन क्या योजना बना रहा है ये भी
- 1:09:53पता चल जायेगा। अर्जुन क्या सोच रहे हैं ये भी
- 1:09:58पता चल जायेगा। वो कृष्ण क्या बोल रहे हैं, ये भी
- 1:10:01पता चल जायेगा। कृष्ण ने अर्जुन को क्या दिखाया?
- 1:10:06विराट के वक्त क्या दिखाया ये भी पता चल जायेगा।
- 1:10:13मन के भीतर से उभरती हुई वो तरंगों की तरन सब समझाएगी तुम्हें
- 1:10:26कौन आ रहा है कहाँ आ रहा है क्यों आ रहा है?
- 1:10:31सब तुम्हें समझ में आ जायेगा ये छठी इंद्रिया और दूसरी बात यहीं
- 1:10:37तक नहीं छठी इंद्री के जागृत होने के पश्चात तुम चाहो तो उन घटनाओं
- 1:10:43को बदल सकते हो। छठी इंदरे के ऊपर किसी दिन अगर
- 1:10:53वक्त लगा प्रश्न बहुत बार आए हैं, लेकिन इस तरह के नहीं आए कि
- 1:10:58विस्तार से पर थोड़ा सा स्वाभाविक इंट्रोडक्शन लेकिन हो सका तो
- 1:11:04विस्तार से बोलने का प्रयास करूँगा।
- 1:11:10सब पता चलता है। ओह यू कैन चेंज दी इवेंट्स जीस।
- 1:11:16व्यक्ति ने कहा, ऑल दी इवेंट्स आर प्रीडिटरमाइन्ड वो फैल हो जाता है
- 1:11:24जहाँ कबीर कहते हैं आकर। अनहोनी होकर रहे, होनहार मत जाए
- 1:11:34लोग मुझसे पूछ लेते हैं कि ये दो विरोधी शब्द क्यों कहे?
- 1:11:39एक ही व्यक्ति कबीर कहते हैं। अनहोनी होवे नहीं जो होनी से होए
- 1:11:52और फिर दूसरे वचन में कहते हैं कहीं दूर जाके अनहोनी होकर रहे,
- 1:11:58होनहार मिट जाए। बाबा ये दो विरोधी शब्दों का अर्थ
- 1:12:03क्या है? ये विरोधी शब्द तो हैं लेकिन ये
- 1:12:07विरोधी वक़्तों के ऊपर है। जब तुम ईश्वर के ऊपर छोड़ देते हो
- 1:12:13तो ईश्वर ने जो करवाना है, निर्धारित है वह होगा।
- 1:12:19ऑल दी इवेंट्स आर बीड डिटरमाइन्ड यू कैन से एज़ ए टेरर स्टाइ लियो
- 1:12:26टोलास्टाइ के शब्द है और दूसरे शब्द लियो टोलास्टाइ दूसरे शब्द
- 1:12:36संत कबीर। अनहोनी हो कर रहे होनहार मिट जाए
- 1:12:45ऐसे दीनानाथ को किस वेद को बखाये अनहोनी हो कर रहे, जो नहीं होनी
- 1:12:59वो हो जाए और होनहार मिट जाए। यह कौन कर सकता है जिसके इंद्रिय
- 1:13:05जागृत है? छठी इंद्रिय लक्षण भी है।
- 1:13:09जो व्यक्ति यह क्षमता रखता है होनहार को मिटा दे, उसके पास छठी
- 1:13:18इंद्रिय है। और अनहोनी होकर जो नहीं होना वो
- 1:13:26हो जाता है। यह क्षमता होती है छठी इंद्री के
- 1:13:31विकसित होने के बाद उसे ही हम महासंत कहते हैं, उसे ही हम
- 1:13:38परमात्मा कहते हैं। प्रकृति से ऊपर प्रकृति के विधान
- 1:13:45से ऊपर जो उठ गया वह व्यक्ति छठी इन्द्रियों से युक्त हो जाता है।
- 1:13:52प्रकृति के इन इंद्रियों से पार जाना होता है।
- 1:13:57पांच कर्म इंद्रीया, पांच ज्ञानेन्द्र, चार अंतःकरण।
- 1:14:02इनसे जो पार हो गया वह छठी इंद्रीया का स्वामी चाहे तो जो
- 1:14:11कुछ होना है उसको होने दे और चाहे तो जो कुछ होना है उसको न होने
- 1:14:16दे, बदल दे। बेधव्यास ऐसे ही लोगों में थे।
- 1:14:24वो कहने लगे आकर राजन तुम चाहो तो मैं तुम्हारा अंधापन दूर करके
- 1:14:31तुम्हें दिखा सकता हूँ क्या हो रहा है?
- 1:14:36ये तो होगा निश्चित है हो चुका बस तुम्हें देखना बाकी है तो उसने
- 1:14:43कहा संजय को दे दो, ये बताता रहेगा तो तीसरे नेत्र की जो
- 1:14:49विलक्षणता थी, वह सौंप दी गई सुतपुत्र संध्या को और संध्या बता
- 1:14:55रहे हैं। अब देखिए, बहुत से लोगों को शंका
- 1:14:59भी है। शंका यह है कि संजय हर वक्त जब
- 1:15:07युद्ध शुरू होता था तब से लेकर युद्ध के आखिर तक धृतराष्ट्र के
- 1:15:13पास रहते थे। नहीं, ऐसा नहीं।
- 1:15:17सत्य ये है कि पहले 10 दिन तक जो कमांडर इन चीफ थे होते भीष्म पिता
- 1:15:24माँ भीष्म पिता माँ लड़ रहे थे और जब भीष्म पिता माँ को धराशायी कर
- 1:15:30दिया, अर्जुन ने शर। शैय्या पीस उड़ा दिया तो मन खराब
- 1:15:39हो गया। संजय का तब तक वो युद्ध क्षेत्र
- 1:15:43में थे। कुरुक्षेत्र में वो पहले दिन से
- 1:15:46ही कुरुक्षेत्र में थे। धृतराष्ट्र के पास नहीं थे,
- 1:15:51धृतराष्ट्र को सिर्फ संवाद से सुना रहे थे वो?
- 1:15:54तीसरे नृत्य में ये भी संभावना होती है और देखिए बड़े मज़े की
- 1:16:01बात बताऊँ जहाँ बैठे हैं धृतराष्ट्र और जहाँ युद्ध हुआ
- 1:16:08कुरुक्षेत्र वह कोई पास पास नहीं है।
- 1:16:14कुरुक्षेत्र और हस्तिनापुर के बीच में करीब 175 किलोमीटर दो रास्ते
- 1:16:25जाते हैं। वहाँ तक एक रास्ता है 171.2
- 1:16:29किलोमीटर। एक रास्ता है 175.6 किलोमीटर।
- 1:16:36तो आप 175 किलोमीटर एवरेज समझ लीजिए के हस्तिनापुर जहाँ बैठे
- 1:16:42हैं धृतराष्ट्र और जहाँ युद्ध हो रहा है कुरुक्षेत्र।
- 1:16:47यह करीब करीब 175 किलोमीटर है। 175 किलोमीटर के ऊपर संजय और सुना
- 1:16:55रहे हैं वो अपनी दिव्य दृष्टि से दर्द, राष्ट्र की कहानी के यहाँ
- 1:17:00लाइव कमेंट्री, यहाँ ये कुछ हो रहा है ये सोच रहे हैं।
- 1:17:05ये बतलाया जा रहा है फलां व्यक्ति ये सोच रहा है फलां व्यक्ति ये
- 1:17:09सोच रहा है ये छठी इंद्रिय की कमाल है।
- 1:17:15विधाता की इस सृष्टि में इतनी विराटता है कि बोली भी नहीं जा
- 1:17:21सकती? और उसका एनालिसिस करना तो असम्भव,
- 1:17:28असम्भव, इम्पॉसिबल, बड़ा महान था। विषम पिता मन धृतराष्ट्र को लेकिन
- 1:17:36जैसे ही धराशायी हो गए, मन खराब हो गया।
- 1:17:40संजय वहाँ से चल पड़े। और हस्तिनापुर पहुँच गए
- 1:17:44धृतराष्ट्र को जाके खबर सुनाई धृतराष्ट्र रोने लगा है, आज फैसला
- 1:17:54हो गया है। आज वो दिन आ गया जो वेधव्यास कह
- 1:18:00के गए थे। बड़ा रोय बड़ा रोय?
- 1:18:05उसी के कंधों पर जिम्मेदारी थी और वह ही शरशैय्या के ऊपर लेटा हुआ
- 1:18:11है। असहाय तब तक थे कुरुक्षेत्र के
- 1:18:20बीच में और उसके बाद हो गए हस्तनपुर में।
- 1:18:23धृतराष्ट्र के बिल्कुल समय बैठ के देखे यहाँ जो दिखा देते हैं वो हर
- 1:18:29वक्त धृतराष्ट्र के पास बैठा हुआ दिखा देते हैं।
- 1:18:32यह गलत है। सत्य में ऐसा नहीं हुआ।
- 1:18:35सत्य में पहले 10 दिन तक वह कुरुक्षेत्र में थे, धृतराष्ट्र
- 1:18:41के पास नहीं थे 175 किलोमीटर। अवे फ्रॉम धृतराष्ट्र और उसके बाद
- 1:18:49भीष्म पितामह के धराशायी होते ही वह धृतराष्ट्र के पास चले गए।
- 1:18:53आगे का वर्णन जो 18 दिन साढ़े 17 दिन युद्ध चला वो धृतराष्ट्र के
- 1:19:02पास बैठे थे। 10 दिन के बाद सब सुना रहे थे,
- 1:19:09लेकिन पता चल गया था फैसला आज हो गया था।
- 1:19:20संकट में है आज वो धरती जीस पर तुने जन्म लिया संकट में है आज वो
- 1:19:36धरती। जीस पर तुने जन्म लिया पूरा कर दे
- 1:19:55पूरा कर दे। आज वचन जो गीता में है तुने दिया
- 1:20:10कोई नहीं है तुध बिन मोहन। भारत का रखवाला रे कोई नहीं है
- 1:20:29तुझ बिन मोहन। भारत का रखवाला रे बड़ी दे भाई
- 1:20:42नन्द लाला तेरी राहत के बृज बाला। गाल बाल एक एक से पूछे कहा है
- 1:20:59मुरली बाला रे, बड़ी देर भाई नंदलाला तेरी राह के।
- 1:21:12ब्रजवाला सखा हमारे पितमात स्वामी सखा हमारे हिनाथ।
- 1:21:29नारायण वासुदेव, श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी श्री कृष्ण
- 1:21:46गोविंद। हरे मुरारी हे नाथ नारा यन
- 1:21:55वासुदेव हे नाथ नारायण वासुदेव। विदमात स्वामी सखा हमार विदमात
- 1:22:16स्वामी सखा।