Latest / Baba ji Vijay Vats / 2 Nov 25 - परम ध्यान के लिए मन को मौन कैसे करें? परम एकांत का रहस्य जानिए! ध्यान की सही राह जानिए! Baba Ji Vijay Vats Satsang
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- 0:01प्रणाम बाबा जी, संदीप कुमार अवस्थी, परम एकांत और परम मौन।
- 0:19किसे कहते हैं? कृपया गहराई से इस बात को
- 0:27व्यवसायित करने का कष्ट करें परमात्मा।
- 0:39जब अकेला होता है तो वह पर मोल में होता है, सुखी भी होता है और
- 0:51परमात्मा जब खंड खंड हो जाता है। तो वह दुखी भी हो जाता है और
- 1:05परमों से कलाहल में आ जाता है। हमारे शास्त्रों में लिखा है कि
- 1:17परमात्मा। एक सप्ताह था, उसमें संकल्प उठा
- 1:26एकोआम बहुत श्याम वैज्ञानिक भी यही कहते हैं एक देसी गोला था।
- 1:38छः अरब साल पहले वह टूट गया, उसमें विस्फोट हो गया और बहुत से
- 1:46उसके भाग हो गए। कण कण में बिखर गया, परमात्मा
- 1:55दुखी हो गया। जब एक था तो सुखी था।
- 2:05जब विभात हो गया तो दुखी हो गया। इसी यात्रा को 84 का चक्कर रहता
- 2:11है। शब्दों को मत पकड़ लेना, मेरे
- 2:18कहने का भाव समझने की चेष्टा करो। वह सुखी था, चुप था और अकेला था।
- 2:36तो वह आनंद में था, खुमारी में था, अपने आप में डूबा हुआ था।
- 2:44सहसा ही उसके भीतर संकल्प उठा कि मैं एक से अनेक हो जाऊं और वो हो
- 2:51गया। हो तो गया लेकिन दुखी भी हो गया।
- 2:59अब यही यात्रा वापसी की यात्रा है।
- 3:05उसे अध्यात्म कहते हैं। पहले एक से अनेक हुआ अब अनेक से
- 3:11एक होने की तरफ। यह जाता है कैसे तुम एक हो जाओ,
- 3:24उसे ही एकांत कहते और तुम जब एकांत में होते हो।
- 3:33तब बड़े खुशी होते हो, मस्त होते हो, आनंद में होते हो और जब बिखर
- 3:44जाते हो, खंड खंड हो जाते हो तो दुखी हो जाते।
- 3:52यह एक यात्रा है। एकांत क्या है?
- 3:59बाबा पर मौज क्या है? अभी तुम एकांत नहीं हो अभी तुम एक
- 4:11भीड़ हो। अभी तुम परम मौन नहीं हो अभी तो
- 4:15तुम मौन भी नहीं अभी तुम बिल्ड बहुत से लोगों का इकट्ठ हो, अनंत
- 4:30अनंत जीव आत्माओं का इकट्ठ हो। लेकिन भीतर में छुपी है वो ही
- 4:43जिज्ञासा वो ही बिपाशा कि कैसा उसी स्वरूप में कैसे आ जाऊं जैसा
- 4:51मैं पहले था? इसी अभिवषा को मोमूक्षा कहते हैं।
- 5:00इसी अभिवषा को मुक्ति कहते हैं। अलग अलग संतों ने इसे अलग अलग नाम
- 5:10दिए। महावीर कहते हैं, केवली में उतर
- 5:16जाओ, कैवल्य की अवस्था में चले जाओ, जहाँ तुम अकेले रह जाओ, अब
- 5:27एक तल है जहाँ तुम अकेले हो अब भी और एक तल है जहाँ तुम एक समुदाय
- 5:34हो, एक भीड़ हो। अब भी ऑप्शन तुम्हारी है।
- 5:42तुम इस भीड़ में भी बना रह सकते हो और तुम उस एकांत में भी जा
- 5:48सकते हो। ये ऑप्शन तुम्हारी है।
- 5:55सुखी होना है तो भीड़ से खिसको उस एक में चले जाओ और अगर दुखी होना
- 6:05है तो उस एक से तुम अनेक में आ जाओ, यही परमात्मा ने किया।
- 6:14मैं एक से अनेक हो जाऊं, वह दुखी हो गया।
- 6:21अब तुम चाहते हो की मैं सुखी हो जाऊं तो तुम अनेक से एक में आ
- 6:24जाओ। ये एक एक छोटी सी यात्रा है और
- 6:31इसी यात्रा के लिए सारे शस्त्र भरे।
- 6:38पर पर गड्ढे लग दिए ते पर पर हुई अखबार नानक लेखे, एक गड पे बाकी
- 6:44चकना चार बात तो एक ही है बाकी तो सब बकवास है।
- 6:58तो बात एक ये है कि तुम कैसे भी भक्त हो और कैसे तुम एक हो जाओ बस
- 7:10वही प्रणाली है जिससे तुम एक से अनेक हुए थे वही प्रणाली से।
- 7:17बिल्कुल उल्टे चलोगे तो अनेक से एक हो जाओगे और एक हो जाओगे तो
- 7:24तुम सुखी भी हो जाओगे। इसको ध्यान से समझने की चेष्टा कर
- 7:40अभी तुम भीड़ के बिना जिंदा नहीं रह सकते।
- 7:44अकेले में तुम्हारा दंग उड़ता है अकेले में तुम मरे मरे से प्रतीत
- 7:52होते हो अपने आप में तुम दुखी हो जाते हो, तुम भीड़ को ढूंढ़ते हो
- 8:00और जहाँ भी भीड़ होती है। वहाँ तुम चल निकलते हो चाहे
- 8:06सिनेमागृह हो चाहे हिल स्टेशन हो, चाहे कोई भी ऐसी स्थान हो जहाँ पर
- 8:15हो तुमने देखा। लोग भीड़ में जाने को उत्सुक रहते
- 8:23हैं। उस भीड़ से कुछ मिले ना मिले
- 8:28लेकिन उनके मन को मन को थोड़ी सी शांति मिलती है।
- 8:35इन पागलों के समूह में हम भी आ गए।
- 8:40फिर चाहे तुम मनोरंजन के लिए भीड़ में जाओ, चाहे तुम वातावरण को
- 8:46निहारने के लिए, प्रकृति का आनंद मानने के लिए भीड़ में जाओ, लेकिन
- 8:55मकसद तुम्हारा यही है कि तुम अकेले रह नहीं सकते।
- 9:07और जैसे ही तुम्हारे भीतर से यह प्रज्ञा उपजनी शुरू हुई के भीड़
- 9:16से मैं थक गया, 1 दिन थक ही जाओगे और अब मुझे चैन चाहिए।
- 9:32अब मैं थक गया हूँ, ऊब गया हूँ इस भीड़ से और मुझे अब चैन चाहिए।
- 9:41अब मैं अकेला होना चाहता हूँ तो दोनों ऑप्शन तुम्हारे हाथ में
- 9:50हैं। तुम बड़े स्वतंत्र हो।
- 9:54लेकिन इतनी इतनी स्त्र होते हुए भी तुम चिल्लाते रहते हो कि मैं
- 9:58बंधा हुआ हूँ, मुझे कोई आजाद करो गुरु को तलाशते हो, शास्त्रों में
- 10:07ढूँढ़ते हो, तीर्थों पे जाते हो, हज की यात्रा करते हो।
- 10:14क्या क्या नहीं कहते यह मूर्खता है, इच्छा भीतर की है, अकेला हो
- 10:29जाना और तुम चलते हो भीड़ के रास्ते।
- 10:38हज पर चले जाना एकांत में हो जाना होता है।
- 10:43महावीर ने कहा, केवल एक हो जाओ, केवल हो जाओ, बस तुम हो जाओ
- 10:49दूसरा। अथवैत में उतर आओ जहाँ दूसरा
- 11:05अक्सर तुम्हारा दम घुटता है जब तुम अकेले में होते हो, तुम चाहते
- 11:14हो कि कैसे मैं भीड़ में खो जाऊं। कैसे कोलाहल में मैं रम जाऊं,
- 11:21क्या करूँ, कोई उत्पाद कृत्य हो, कोई शोर शराबक बिखेरते हो, कैसे
- 11:34मैं एक से अनेक हो जाऊं? बस सारे दिन तुम यही प्रयोजन करते
- 11:42रहते हो और फिर उस प्रयोजन से जो दो को बचता है, फिर तुम चिल्लाते
- 11:47हो तुम्हें दुखी। अब मैं एक होने के लिए क्या करूँ?
- 12:00एक तल पर तुम आज भी अकेले हो और एक तल पर तुम आज भी भीड़ हो, यह
- 12:09तुम आज भी हो रात को तुम सो जाते हो।
- 12:16क्या तुम्हारे मन की भीड़ समाप्त हो जाती?
- 12:19नहीं, क्योंकि अगर भीड़ समाप्त हो जाती तो सुबह से फिर वो ही भीड़
- 12:25तुम्हें तंग करती उसी भीड़ के साथ तुम निकल लेते हो।
- 12:30संसार में वह समाप्त नहीं होती। बस तुम एक बार बेहोश हो जाती हो,
- 12:40तुमने उस भीड़ के मौलिक वस्तु को समाप्त नहीं किया, तुमने भीड़ को
- 12:49नहीं समाप्त किया। तुमने क्या किया तुमने उस भीड़ से
- 12:57पिनारा कर लिया, नींद में चले गए? यही फॉर्मूला है अनेक से एक।
- 13:07उन्होंने कहा। इस भीड़ को तुम बता न सकोगे।
- 13:16इस कोलाहल को तुम समाप्त न कर सकोगे और हमारे साधकों ने और
- 13:25हमारे मार्गदर्शकों ने हमें यही समझाया।
- 13:29एकांत की तलाश करो, तुम मतलब नहीं समझ तुमने शोर शराबी का घर छोड़
- 13:37दिया तुमने कंधाओं की शरण ले ली, हाँ, यहाँ शोर नहीं है।
- 13:48क्यों न मैं यहाँ बैठ जाऊं, बड़ा आनंद है, बड़ी शांति है कोई सताने
- 13:56वाला नहीं कोई ध्यान को बढ़ाने वाला नहीं हमारे ठहरे हुए पानी
- 14:06को। कोई करने वाला नहीं।
- 14:11यह ठीक है, लेकिन कहने वालों ने जो कहा था उसका मतलब तुम समझे ही
- 14:17नहीं। कहने वाले ने कहा था एकांत में
- 14:21चले जाओ और तुम चले गए हिमालय की कंधाओं में।
- 14:29पहाड़ों में, गुफाओं में, वणव में तुमने एकांत का अर्थ गलत ले लिया।
- 14:44बा। मुश्किल ही कोई समझ पाता है।
- 14:47एकांत का सही सही मतलब क्या है? तुम तो यही समझते हो कोरहाल हीन
- 14:55वातावरण बिलकुल ठीक है, मतलब तो यही है।
- 15:02लेकिन ये कोलाहल हीन वातावरण तुम तलाशते हो बाहर वनों में गंधरा
- 15:09में लेकिन ऋषियों ने ये तो नहीं कहा था ऋषियों ने कहा था ये
- 15:16कोलाहल हीन वातावरण तुम्हारे अंतःस में है इसीलिए।
- 15:22एकांत होने के लिए तुम्हें अपने भीतर के कोलाहल हीन अवस्था में
- 15:30उतरना होगा। यह था सारी बात का अभिप्राय।
- 15:38लेकिन तुमने इसके अर्थ गलत ले लिए।
- 15:40हमने अक्सर अध्यात्म के अर्थ गलत लिए।
- 15:45इसलिए हम बेसिक फार्मूला से चूक जाते हैं।
- 15:51कहने वाले ने ठीक कहा था, एकांत में उतर जाओ।
- 15:58अपनी प्रज्ञा में शित्र हो जाओ, अकेले हो जाओ, कैवरली को प्राप्त
- 16:04हो जाओ, निर्वाण में चले जाओ, शब्द अलग अलग हैं।
- 16:11घटना एक ही है। अगर अर्थों का गलत मतलब निकालोगे
- 16:22शब्दों का तो तुम चूक जाओगे, इसलिए सभी संत कहते हैं कि वह न
- 16:33तो समझा जा सकता है। और नहीं समझाया जा सकता है।
- 16:40दोनों ही काम नहीं हो सकता है। वह समझा भी नहीं जाता और वह
- 16:46समझाया भी नहीं जाता और इसे समझने की कष्ट मत करना।
- 16:55इसे जानने की चेष्टा मत करना, वह कभी जाना ना जा सकेगा।
- 17:01तुम असल में समझते नहीं कि तुम किसे जानना चाहते हो, तुम उस
- 17:09विराट को जानना चाहते हो? जिसके एक कण के बारे में भी
- 17:14तुम्हारे बड़े बड़े स्कॉलर्स इनवेंटर आज तक नहीं समझ पाए कि ये
- 17:22बना कैसे? बनाने वाले ने इसे कैसे बनाया?
- 17:26वह चाहे प्रकृति थी, वह चाहे परमात्मा था।
- 17:32इसे बनाया कैसे होगा? और फिर इसे ज़रा ज़रा नहीं है।
- 17:39यह तो बड़ा विराट है। हम जिसे मिट्टी का ढेरा कह देते
- 17:45हैं और उसकी कोई कीमत नहीं वो तुम्हारे लिए कोई कीमत नहीं।
- 17:52जिसने बनाया होगा उसके लिए तो बहुत बड़ी कीमत है।
- 18:00तुम सिर्फ मूल्य निर्धारण करते हो।
- 18:07वस्तुओं की मात्रा से सोना कम है तो वह महंगा है और धरती ज्यादा
- 18:15है। मिट्टी ज्यादा है तो वह बड़ी
- 18:16सस्ती है। हम इसलिए कह देते हैं सब खाक हो
- 18:21जाएगा, सब मिट्टी हो जाएगा, लेकिन तुम्हें पता नहीं।
- 18:28मिट्टी का एक जर्रा भी तो तुम नहीं बना सकते अगर सोने का एक
- 18:34जर्रा तुम नहीं बना सकते तो मिट्टी का भी एक जर्रा तुम नहीं
- 18:39बना सकते। तुम बड़े अशक्त हो एकांत क्या है
- 18:54पर मौन क्या है एक ही तत्व के लिए कही गई दो बातें।
- 19:03जब तुम एकांत में चले जाते हो तो तुम पाओगे वहाँ कुलाहन वहाँ शोर
- 19:09शराबा, वहाँ कोई उत्पाद नहीं वहाँ कोई झगड़े बखेड़े नहीं, वहाँ बड़ी
- 19:17शांति बड़ा आनंद है मौन है। वहाँ कोई हलचल नहीं, वो कहीं बाहर
- 19:28नहीं बाहर तुम कितना ही खोज लो कंदराव में भी दूर से आती हुई
- 19:35आवाज तुम्हारे कानों में पड़ेगी कोई जंगली जानवर।
- 19:42पुकार रहा है चीख रहा है दहाड़ रहा है तुम्हारे, कानों में
- 19:47पड़ेगी आवाज़ लेकिन एक तल है जहाँ शेर भी नहीं दहाड़ता।
- 20:00जहाँ बिल्कुल परम मौन है टोटली साइलेंस, जहाँ एक सूखे हुए पत्ते
- 20:10जितनी भी गिरने की आवाज नहीं होती, इतना मौन है।
- 20:21सब ठहरा हुआ कोई तरंग नहीं, कोई शोर शराबा नहीं अगर तुम ऐसे तल पर
- 20:36जाने की हिम्मत कर सकते हो। तो ध्यान में रखना फिर आनंद तुमसे
- 20:45दूर नहीं फिर जीस शांति की तलाश में तुम वणों में निकलते हो तुम
- 20:53पहाड़ों में निकलते हो, कंदराओं को ढूँढ़ते हो।
- 21:00वो तुम्हें घर बैठे ही मिल जाएगा। प्रतीक के घट में वो परम शांति और
- 21:06मौन विराजमान है। ये बात अलग है कि उसे सही रास्ता
- 21:12बताना। और सही रास्ता उसे दिखाने वाला भी
- 21:17नहीं मिलता। जो दिखाते हैं वो भी शोर शराबा ही
- 21:26सखाते हैं वो भी कोलाहल ही सखाते हैं।
- 21:34उन्हें साइलेंस में जाना सिखाते हैं।
- 21:42एक अटल तो हमारे ही भीतर विद्यमान है, जहाँ ज़रा भी छोड़ उसी को
- 21:51परमौन। उसी को एकांत कहते हैं, तुम परम
- 21:59मौन हो गए तो तुम एकांत में पहुँच जाओगे और तुम एकांत में चले गए और
- 22:05वहाँ तुम परम मौन हो जाओगे। दोनों बातों में कोई फर्क नहीं।
- 22:10ये प्राय व ची शब्द है। तो कैसे जाएं उसे?
- 22:18एकांत में मैंने आपसे पहले भी कहा था एक फॉर्मूला है किसी चीज़ जैसी
- 22:32होने के लिए। वैसी संरचना खुद की भी होनी
- 22:36चाहिए। जैसे जैसे पानी की बूंद समुद्र
- 22:43में समा जाती है, क्यों समा जाती है?
- 22:47क्योंकि पानी का केमिकल फॉर्मूलेशन दैट इज़ दी सेम दैट ऑफ
- 22:51ऑक्शन। समुद्र के समान ही उनकी रासायनिक
- 22:56संरचना समुद्र भी एच टू वो है और पानी की बूंद भी एच टू वो है तो
- 23:06वह उसमें मर्ज हो सकती है। क्यों?
- 23:13क्योंकि दोनों की रासायनिक संरचना एक है।
- 23:21ये बात अलग है के मुद्दतों तक बूंद समुद्र में मिले ना वो बात
- 23:31अलग है। लेकिन मिल सकती है और जैसे नमक है
- 23:43नमक पानी में घुल तो सकता है और आपने देखा होगा समुद्र का पानी
- 23:48नमकीन होता क्यों है? क्योंकि उसमें एनएसीएल होता है,
- 23:53नमक होता है, नमक घुल जाता है, मिलता नहीं, घुलना और मिलना, ये
- 23:58दो शब्द घुलने में उसका वजूद कितना भी आप एक मान लो।
- 24:09लेकिन घुलने में वह अलग बना ही रहेगा और कभी भी अलग किया जा सकता
- 24:15है, लेकिन मिलने में वह एक नहीं हो पाएगा।
- 24:22क्षमाकरण मिलने में वह अलग नहीं हो पाएगा।
- 24:27वह एक ही रहेगा। इसलिए बूंद जब मिल जाती है समुद्र
- 24:33में तो उसको ढूंढ के दिखाओ। फिर वह अनंतसागर का कहाँ चली गई?
- 24:42उसमें तुम खोज न पाओगे। यही फर्क है घुलने में और मिलने
- 24:49में तुम घुल तो सकते हो, मिल नहीं सकते।
- 24:57यही मुश्किलात है प्रेम में और आनंद में यही फर्क है।
- 25:09प्रेम है, घुलना। और आनंद है मिलना बोली हुई चीज़
- 25:18वापस विच्छेद की जा सकती है, लेकिन मिली हुई चीज़ ढूंढी ही
- 25:24नहीं जा सकती तुम ढूंढ के दिखा दो।
- 25:31पानी की बूँद जो समुद्र में एक दफे समा गई लाख कोशिश करने पर भी
- 25:37वो ही वो ही पानी की बूँद तुम अलग अलग कर पाओगे तुम्हारे पास है ऐसी
- 25:42कोई फॉर्मूलेशन नहीं है। कृष्ण उस समुद्र से एक आकार हो
- 25:50जाती है कबीर, नानक, राम, मीरा उस समुद्र से एक आकार हो जाती है
- 25:59ज़रा ढूंढ के दिखाओ। कबीर सहजो, दया, रबिया तो समुद्र
- 26:10में मिल गई, ज़रा ढूंढ के तक हूँ नहीं ढूंढ सकोगे।
- 26:19वह इतना अनंत है। इतना विशाल है।
- 26:22एक बार जो चीज़ उसमें मिल जाती है, एकाकार हो जाती है, वो फिर से
- 26:31नहीं ढूंढी जा सकती, लेकिन जो घोल जाती है वह फिर से मिल जाती है।
- 26:39क्योंकि घुली हुई चीज़ वह थी ही नहीं जिसमें वो घोल गई।
- 26:46नमक पानी था ही नहीं। नमक का रासायनिक संरचना कुछ और
- 26:52था। उसका रासायनिक संरचना था एनए सी।
- 26:59और पानी का है चिट्टू तो घोल तो सकता है, मिल नहीं सकता।
- 27:11परमात्मा में मिलने के लिए तुम्हें परमात्मा जैसा होना
- 27:15पड़ेगा। अब हम आगे चलें।
- 27:22पर मोन में जाने के लिए हमें मोन से शुरू करना पड़ेगा।
- 27:30शुरू शुरू में हम मोन करें। ये जुबां को बंद कर।
- 27:40बड़ी शक्ति व्यय होती है। बोलने से अगर सच सच विश्लेषण करो
- 27:47तो बोलने से और देखने से तुम्हारी आधे से ज्यादा शक्ति नष्ट हो जाती
- 27:54है। इन दो कारणों से तुम अपनी आदी
- 28:04शक्ति खो देते हो अगर तुम देखना बंद कर दो और बोलना बंद कर दो तो
- 28:16तुम पाओगे। ये तुम्हारे भीतर ऊर्जा का
- 28:21विस्फोट हो जाएगा। तंत्र ने लिखा है कि अगर कोई
- 28:31व्यक्ति सात वर्ष तक एक एकांत के कमरे में बैठा रहे।
- 28:37गुप्त गुण ना कर भूख लगी, भोजन कर लिया, नींद लगी, सो गया, स्वच्छ
- 28:47वायु का सेवन कर लिया, पानी पी लिया, प्यास लगे।
- 28:56तो सात वर्ष के बाद कुछ करना धरना नहीं है।
- 29:02इन सात वर्षों में ध्यान रखना बस रोज़मर्रा के जो काम शरीर को
- 29:09चाहिए वह ही करना है और वो तो करना पड़ेगा।
- 29:19उसके इलावे कुछ न करो, एक कमरे में बैठ जाओ और फिर तुम देखो
- 29:27नजारा। मेरे पांव में घुंघरू बंधा दे,
- 29:40मेरे पांव में घुंघरू बंधा दे तो फिर मेरी चाल देख ले फिर देखना
- 29:48चाल क्या क्या लुतिफा आता है तुम्हे?
- 29:56ज़िन्दगी जीने के योगा अभी तो नहीं है लेकिन तब ज़िन्दगी इतनी
- 30:02प्यारी लगने लगती है कि तुम कहोगे जीने का मज़ा ही अब आया, देखने
- 30:12वाले कह गए कि कहाँ? एक जगह बैठा है, कोई मनोरंजन
- 30:20नहीं, कहीं जाता नहीं टहलता नहीं, कोई कैफे हाउस नहीं, कोई पिक्चर
- 30:27नहीं, कोई आज की ताजा खबर नहीं। कौन जीता, कौन हारा?
- 30:37यह भी नहीं कोई गेम भी नहीं खेलता।
- 30:42कहीं भी तो नहीं जाता। यह बिल्कुल नीरस रहता है।
- 30:47ये भी क्या जिंदगी है? लेकिन तुम अभी तक बैठे और क्योंकि
- 31:00अभी तक बैठे नहीं और एकांत का स्वाद नहीं चखा तो तुम बिल्कुल
- 31:05सहजता से ऐसे ही बोलोगे। ये स्वाभाविक है।
- 31:11अगर किसी ने परमात्मा का रस पिया नहीं तो वह बिलकुल मार्कस की तरह
- 31:16बोलेंगे कि वो है नहीं, नीचे की तरह बोलेंगे गॉड स्टैट चारवाक की
- 31:23तरह मिलेगा जिसने परमात्मा का रस भी लिया।
- 31:30वह इन शब्दों का उच्चारण नहीं कर सकता क्योंकि उसने पी लिया और
- 31:39एकांत का रसपीना और मौन का रसपीना पर महात्मा का ही रसपीना होता है।
- 31:51रस आता ही परमात्मा से है। ये बड़ी मजेदार बात है।
- 31:58रस संसार से आता ही नहीं, रस आता ही परमात्मा से है।
- 32:04गगन मंडल से आता है, रस टपकता है। इसलिए उपनिषदों में कहा गया रसूप
- 32:15ऐसा उसकी परिभाषा है, वह रस रूप है।
- 32:22देखिए, इतने शब्दों में से उपनिषदों को कोई शब्द नहीं अच्छा
- 32:26लगा। एक ही शब्द अच्छा लगा, जो बिलकुल
- 32:31उपयुक्त ढला एप्रोप्रिएट था, वह रस रूप है।
- 32:40जब तुम पर मौन में होते हो, पहले मौन से चलना अभी तुम कहते हो हमने
- 32:51बच्चे भी पालने हैं, नौकरी भी करनी है, माता पिता की सेवा भी
- 32:58करनी है। अभी फर्जी बहुत बाकी है।
- 33:03बिल्कुल करो, ये भी आवश्यक है, लेकिन तभी तो आपको फुर्सत के
- 33:17लम्हे नसीब होते ही हैं, कोई कितना भी काम कर ले।
- 33:23मैंने ऐसे ऐसे लोग देखे है जो चौबीसों घंटे में कुछ नहीं करते,
- 33:29लेकिन जब भी उनसे पूछ लो, वो कहते है, आई ऍम बीज़ी, मैं व्यस्त हूँ,
- 33:34करते कुछ नहीं हो, तुम बहाने करने को कर सकते हो।
- 33:40मुझे वक्त नहीं मिलता, लेकिन वक्त तो सभी को मिलता है तो अपने
- 33:49फर्जों को पूरा करो और फर्जों को पूरा करके अपने अंतश में उतर जाओ।
- 33:58अपने एकांत की तरफ चलो दिशा मोरने।
- 34:20वह जद भी मिली है। फर्जा तू?
- 34:34तेरे मुख? किताब ले बैठा मेनू तेरा शबाब ले
- 34:54बैठा। उमंग होनी चाहिए, उसका शबाब
- 34:59तुम्हें गायल कर दे। अगर उसके शबाब ने तुझे गायल कर
- 35:07दिया है तो तुम किसी तरह भी फुर्सत के नियम पैदा कर दोगे।
- 35:14तुम्हारा ध्यान। सदा ये सोचता रहेगा कि कैसे वक्त
- 35:20के अपने कर्ज फर्ज पूरे करके उन फुर्सत के लम्हों में उसे एकांत
- 35:29की तरफ की यात्रा शुरू करता हूँ। हर वक्त इंतजार रहेगा पर मौन और
- 35:42एकांत जिसके पास आके उसको ना परमात्मा की जरूरत है।
- 35:53ना आनंद की जरूरत है, ना मुक्ति की जरूरत है उसे और कुछ नहीं
- 35:57चाहिए। बस यह एकांत तुम्हारे सब मसले हल
- 36:03कर देगा। इसलिए महावीर ने कहा कैवल्य
- 36:05अवस्था इसको साध लो। केवरी अवस्था में पहुँच जाओ, जहाँ
- 36:16केवल तुम बचो सिर्फ तुम्हारे सभा और कोई ना तुम एक ही बचो वहाँ चले
- 36:29जाओ। और वहाँ जाकर तुम पाओगे वहाँ तो
- 36:33बहुत गहन शांति है पैन ड्रॉप साइडनेस वहाँ ज़रा भी आहट नहीं,
- 36:46कोई खटक नहीं, कोई शोर गोल स्वास्थ तक लेने का।
- 36:52वहाँ शोर नहीं पहुंचता, लेकिन अभी तो तुम भीड़ में हो अभी तो तुम इस
- 37:03खोपड़ी में बैठे हो, जहाँ भीड़ ही भीड़ है मखियों की तरह भिन बना
- 37:10रहे हैं विचार। और ये विचार तुम्हें हर घड़ी
- 37:16परेशान करते रहते हैं और तुम चीखते हो चिल्लाते हो ये मन मेरा
- 37:26है लेकिन मुझे परेशान बहुत करता है नहीं ये मन तुम्हारा नहीं।
- 37:34तुम मन के हो ये मन तुम्हारा नहीं है, तुम मन के हो इस फर्क को
- 37:43संतुलित, आज तुम्हारा मन तुम्हारा मालिक है।
- 37:50और तुम उसके गुलाम जैसा मन कहता है, तुम उसके पीछे पीछे हो लेते
- 37:58हो। उसे ही बाबा ने कहा ये मनमुखी है,
- 38:04जैसा मन कहता है वैसा ही ये चलता है।
- 38:07यह मनमुखी है। चिकन एक वक्त ऐसा आए जब तुम जो मन
- 38:17को कहे वो मन करे फिर तुम मालिक हुए इस मन के एक शब्द है।
- 38:28के स्वर्ग में इंद्रा रहता है। इसका बड़ा गहरा अर्थ शास्त्रों
- 38:34में लिखा है हम समझ नहीं पाए इन्द्र तुम बनते हो बन सकते हो
- 38:43इन्द्र तुम बनोगे तब जब तुम सारी इन्द्रियों के मालिक हो जाओगे।
- 38:48और इन्द्रियों का राजा है मन मन संचालित होता है।
- 38:53इन्द्रियों के द्वारा या कहलों के इन्द्रियां संचालित होती हैं।
- 38:58मन के द्वारा ये दोनों एक ही बात है मन में वेग आया, तूफान आया
- 39:04कामका क्रोध का, लोक का, मोह का, अहंकार का।
- 39:08वह वेग ने पकड़ लिया, तुम्हारे सारे प्राणों को जकड़ लिया और उस
- 39:19वेग ने तुमसे मन चाहा खिलवाड़ किया तुम अभी तो मन के गुलाम।
- 39:27इसलिए अभी तुम इंद्रण नहीं अभी तुम स्वर्ग के मालिक नहीं हो
- 39:34स्वर्ग के राजा नहीं अभी तो तुम नरक नरक के राजा हो अभी तो तुम
- 39:42यमदूत। इंद्र बना जा सकता है, इंद्र बना
- 39:52जा सकता है। इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करके
- 39:58काबू पा के इन्द्रियों का राजा मन मन के कहने से इन्द्रियां संचालित
- 40:05होती। और जो मन को जीत लेता है, जिसका
- 40:11मन जिसके काबू में है वह इंद्र हो गया, लेकिन तुम अभी तो मन के काबू
- 40:24में हो। अभी तो तुम्हारी इन्द्रियां ही
- 40:28इन्द्र हैं और तुम तो उसके गुलाम हो और तुम स्वर्ग के मालिक नहीं।
- 40:34तुम नरक के मालिक हो क्योंकि जैसी इन्द्रियां कहती हैं जैसे मन कहता
- 40:41है वैसी नाच न जाता है। तो तुम मनमुखी हो, तुम गुरमुखी
- 40:48नहीं हुए, दूसरे शब्द दिये बाबा ने गुरमुखी मैं गुरू कहते हैं
- 40:53तुम्हारा ही अन्तश में बैठा हुआ तुम्हारा ही स्वरूप जीस घड़ी वो
- 40:59मालिक हो गया और वो मालिक कब होगा?
- 41:03जब मालिक होगा जब तुम्हें पता चल गया कि वास्तव में मालिक तो मैं
- 41:10हूँ, लेकिन मेरी मलकियत संभाली है मान ने नाजायज कब्जा कर लिया है
- 41:20मान ने मालिक तो मैं हूँ। और सच में मालिक तुम हो उसे बाबा
- 41:28कहते हैं गुरमुख जब तुम अपने मालिक हो जाते हो इंद्रियों के और
- 41:36मन के तो तुम गुरु के पास पहुँचते हो, फिर तुम गुरुमुख।
- 41:44नहीं तो तुम मनमुखी इनकी परिभाषाओं को हमने गलत ले लिया और
- 41:53अगर कोई व्यक्ति मनमुखी होता है तो वह भीड़ में होता है।
- 42:00क्योंकि मन में तो अनेक तरह की लहरें हैं, विचार उठते हैं, वेग
- 42:05हैं, संकल्प विकल्प हैं, तमाम ट्रैफिक चलता है, भीड़भाड़ है।
- 42:18वहाँ तो शोरगुल है, वहाँ तो शांति नहीं है, तो अगर तुम मन के तल पे
- 42:29रहोगे तो तुम दुखी रहोगे और अगर तुम मन से मून में आ गए।
- 42:40तो तुम सुखी हो गए मन से मौन तक की यात्रा सही अध्यात्म की यात्रा
- 42:52मन में भीड़ है मौन में अकेले तुम हो।
- 42:59मन में ना जाने क्या कूड़ा कबाड़ा तुमने भर लिया है वह सारा हर वक्त
- 43:06बोलता ही रहता है भरा तुमने ही है जिम्मेदार तुम ही हो कभी गुरु के
- 43:14संग हो रही है किसी के। कभी गुरु के संग होली के किसी के
- 43:18और उन्होंने सबने कूड़े भर दिए। तुम्हारे और कभी कोई कूड़ा बोटता
- 43:25है, कभी कोई कूड़ा बोटता है तुम कूड़े की बातें सुनने में ही उलझे
- 43:29रहते हो और फिर तुम कहते हो कि हम दुखी बहुत हैं।
- 43:38वह जो गुरुओं ने तुम्हें सिखाया था, वह काम का न था, वो लालची लोग
- 43:50थे, वो ठग थे। और पांडाल जमाए बैठे थे।
- 43:55बाहर चाहे करोड़ों करोड़ों शिष्यों मूर्ख तो सारी दुनिया है,
- 44:08समझदार तो कोई एक बुद्ध होता है समझदार तो कोई एक नानक कबीर होता
- 44:15है। जश्न तो कोई एक अमीरा और चैतन्य
- 44:20मनाती है, बाकी तुम तो मुँह लटकाए फिरते रहते हो और तुम आनंद की
- 44:31तलाश में मारे मारे फिरते हो। लेकिन हाथपल्ले क्या करता है?
- 44:40जब तक तुम मनमुखी हो तब तक हाथपल्ले पड़ेगा तो घर से तो हम।
- 44:53चले थे। खुशी की तलाश में खुशी की तलाश
- 45:08में। घमराह में खड़े थे, वो ही साथ हो
- 45:22लिए। खुद दिल से दिल की बात कही और रोए
- 45:41यूँ हसरतों के दाह। मोहब्बत में धो लिए, खुद दिल से
- 45:56दिल की बात कहीं और रो लिए। बस रोना धोना तुम्हारे पल्ले रह
- 46:09जाता है ना तुम उन्मुक्त हो के नाच सकते हो पग घुंघरू बांधक ना
- 46:18तुम गुनगुना सकते हो गीत। ना तुम मुस्करा सकते हो, ना तुम
- 46:24ढहाके लगा सकते हो और जिसका भी मालिक मन हुआ उसकी यही दशा हुई।
- 46:37कुम्भ, पाक, नर्क जैसे आपके शास्त्रों प्राणों में लिखा गया।
- 46:41जीतने योजन दूर है। ऐसा कुछ नहीं है और तुम्हारी बीत
- 46:46रही है। इसको चाहे आम नर्क बना लो, चाहे
- 46:52कुम्भ भी पाक नर्क बना लो, तुम्हारी मर्जी नरक का भी कोई
- 47:00प्रारूप होता है। अपने आपको कितना भी दुखी कर लो,
- 47:06तुम कर सकते हो जितनी मन की गुलामी, जितनी इंद्रियों की
- 47:12गुलामी, उतना ही नर्क कहीं बाहर नहीं।
- 47:17तुम्हारी इंद्रियों की गुलामी तुम्हारे मन की गुलामी के भीतर ही
- 47:21नर्क है, वही तो असली नर्क जहाँ तुम मालिक नहीं रहते, अपने आप के
- 47:30मालिक नहीं रहते, इससे ज्यादा बेजार, निर्बल, इससे ज्यादा
- 47:36असहाय। और कौन हो सकता है तुम्हारे सिवा
- 47:45तुम बड़े बेजार हो तुम मुसीबत में मारे मारे फिरते हो उस खुशी की एक
- 47:55बूंद की तलाश में। लेकिन वो दूरदराज तक कहीं दिखाई
- 48:01नहीं पड़ते। अगर पर मौन चाहिए तो परम एकांत तो
- 48:14मिल ही जाएगा अगर परम एकांत चाहिए।
- 48:22तो परमौन तो मिल ही जाएगा। ये दोनों घटनाएं पूरक हैं,
- 48:29परिपूरक हैं, तुम शांति की तलाश अलग से मत करना, तुम बस आनंद की
- 48:39तलाश करना। और अगर आनंद आ गया तो तुम पाओगे
- 48:45शांति उसके पीछे पीछे छाया की तरह है।
- 48:52शांति को ढूंढने वाले लोग बिल्कुल उसी तरह है जैसे एक अंधेरे कमरे
- 48:59में थे। तुम बाल्टी भर भर के तब भर भर के
- 49:02अंधेरे को बाहर फेंकना शुरू कर दो, यह तुम्हारी ऐसी ही मनोदशा है
- 49:11तुम अंधेरे कमरे में प्रयास कर रहे हो इस अंधेरे को बाल्टी भर भर
- 49:16के बाहर फेंकना। लेकिन ऐसा कभी हो न सकेगा।
- 49:21यह अँधेरा चूक नहीं हो सकता, मुक सकता है।
- 49:28कैसे प्रकाश दिया जला था अँधेरा बाल्टी या टब भर के बाहर फेंका
- 49:37नहीं जा सकता। वह समाप्त किया जा सकता है और
- 49:46समाप्त करने का एक ही डंक है जो बुद्ध ने कहा अब दीपो भवः अपना
- 49:52दीपक जला। और जैसे ही तुमने अपना दीपक
- 49:57जलाया, वैसे ही अँधेरा भाग जाएगा। ऐसे तुम बाल्टियों से कब से लगे
- 50:06हो, कितने जन्मबीत का है? लेकिन अँधेरा नेगेटिविटी है।
- 50:12प्रकाश कर न होना अंधकार। तुम शांति के तलाश में शांति
- 50:19मिलती नहीं, बहुत से धर्म में से हैं तथा कथित धर्म नहीं है, ये
- 50:23अधर्म है। इनको धर्म का कुछ पता है जो शांति
- 50:29की खोज में शांति की तलाश में तुम्हें सिखाते हैं।
- 50:33ऐसा करें। अंकार का नादकर उच्चारण करो, बड़ी
- 50:40बड़ी सरकस सिखाते लेकिन जिसने शांति को खोजा वह चुक गया।
- 50:51शांति तो मर गट में भी बहुत होती। पर तुमने ऐसा किया क्या किया जो
- 50:56मरघट में तुम्हें इतनी शांति मिल गई?
- 51:00नहीं शांति कोई विधायक चीज़ नहीं, शांत होना एक नेगटिविटी है तो फिर
- 51:12क्या कहें? आनंद को पैदा करो, प्रकाश जलाओ
- 51:19प्रकाश का अर्थ है आनंद जैसे ही आनंद आता है प्रकाश आ गया।
- 51:33जैसे ही दिया जलाया अंधकार लुप्त हो गया अंधकार कहीं जातन शांति को
- 51:45तलाश करने वाले लोगों ऐसी बकवास को छूट दो।
- 51:51शांति कोई विधायक चीज़ नहीं जो खोजी जा सकती है शांति है ही
- 51:58नहीं, तुम जीस शांति को खोजने का प्रयास कर रहे हो, वह नाइसलेसनेस
- 52:04है, वह कुलाहर हीनता है सिर्फ शोर नहीं है वहाँ।
- 52:09इसलिए तो भागते हो तुम कंदराव की तरफ निर्जन वनों की तरफ जहाँ कोई
- 52:22न हो, जहाँ कोई बोलने वाला न हो। जहाँ सब जगह सन्नाटा हो, जहाँ
- 52:33सुनसान हो, लेकिन तुम नेगेटिविटी को खोजते हो और फिर तुम रोते हो
- 52:46तो मैं एक सूत्र समझाता हूँ। अंधेरे को बाहर फेंकने का प्रयास
- 52:52मत करना प्रकाश जला लेना तुम्हारे पास दिया है शांति की खोज मत
- 52:59करना, आनंद के पास पहुँच जाना तुम्हारे अंत में विराजमान है।
- 53:08शांति अपने आप आ जाएगी शांति को खोज नहीं पड़ता आनंद की छाया की
- 53:16तरह शांति पीछे पीछे चली जाती है, वह कोई अलग से चीज़ नहीं है जैसे
- 53:22तुम्हारी छाया होती है। बस तुम होते हो तो छाया आ जाती
- 53:27है। अगर तुम नहीं होगे तो छाया कहाँ
- 53:29से आई? ऐसे ही आनंद की छाया है शांत उसको
- 53:35अलग से मत खोजना और जो सिर्फ शांति को अलग से खोजते हैं, उनसे
- 53:41बड़ा मूर्ख कोई नहीं। बस वो वैसे ही हैं जो अंधेरे को।
- 53:56बाहर फेंक रहे हैं, ये कभी नहीं हो सके।
- 54:37चढ़ा क्यों? मैं वोबे किसी की मजाक न किसी की
- 54:58आंख का। ना?
- 55:07किसी के दिल का करार। जो किसी के काम न आ सके न वो एक
- 55:29मोस्ट गोवा। हर तुम बिल्कुल बहादुर शाह ज़फर
- 55:37की तरह ऐसे ही रोक न किसी की आँख का नोट, न किसी के दिल का करार जो
- 55:45किसी के काम न आ सके। मो।
- 55:48मैं वो एक मुझसे गुब्बार। जो शांति की तलाश में करेगा वह
- 55:58बिल्कुल ऐसा ही होगा और जो आनंद की तलाश करेगा उसके जीवन में
- 56:09रोशनाई ही रोशनाई आचारित। दीपक जल जाएगा आनंद को भजाने की
- 56:19चेष्टा की तरफ मुख कर लेना, शांति की तलाश करना छोड़ दो शांति सीधे
- 56:28सीधे आती ही खोजो आनंद को। और आनंद तुम्हें मिलेगा कहाँ अपने
- 56:39ही अंतश में कहीं बाहर न सभी संत कहते हैं कहे रे बन खोजत जाय।
- 56:52कस्तूरी कुंडल से मृग ढूंढा गनमा ऐसे घट में पीव हैं मूर्ख जाने ना
- 57:00तुम्हारे भीतर ही घट में है जीसको तुम ढूंढ रहे हो सदा से जन्मो
- 57:07जन्मो से, जैसे खोया भूल गया। और जहाँ वो है सिर्फ उसी जगह तुम
- 57:15तलाशते हो जहाँ वो नहीं है वहाँ तुम सब कोना कोना खंगाल देते हो,
- 57:25फिर तुम कहते हो, मिलान है, मिलेगा भी।
- 57:32जहाँ वो है नहीं वहाँ खोजते हो, जहाँ वो है उस तरफ तो मुख भी नहीं
- 57:43करते। परमात्मा तुमसे आंख में चोली
- 57:53खेलता है और तुम उसे ढूंढने का प्रयास करते हो लेकिन प्रयास करते
- 58:02हो बाहर संसार में, संसार में भी दिख जाएगा 1 दिन।
- 58:09लेकिन पहले ओरिजिनेटेड पाइंट तो देखो पहले अपने अन्तश में जहाँ से
- 58:16द्वार खुलता है उस विराट का उसको खोज लो फिर तुम्हें संसार में भी
- 58:23देखेगा। फिर ईशा बास में एकदम सर्वम जगत
- 58:27है हम जगत। लेकिन सबसे पहले आपने अंतर का
- 58:31द्वार खोजना जहाँ से ब्रह्मांड का सारा क्षेत्र खुलता है वह है
- 58:39तुम्हारे अंदर उस दरवाजे पर दस्तक दे।
- 58:48और वहाँ जो द्वार है उसको खोल जद पाल या पेड़ कलंदर दा बुआ खुल गया
- 58:58अपने अंदर दा सुखवासी हाँ, वो समंदर दा।
- 59:06जित्त चढ़ दी है ना लेन दी है फिर क्रोध नहीं आएगा, फिर शांति मिल
- 59:12जाएगी, फिर तनाव नहीं आएगा, कुछ नहीं आएगा वहाँ सब ठहरा हुआ है।
- 59:25और वो बाहर नहीं बाहर तो कुलाहल हीनता है नोइसेलेसनेस है, लेकिन
- 59:31भीतर कुलाहल हीनता नहीं है भीतर ऐसी शांति है जो विधायक है, भीतर
- 59:38की शांति नोइसेलेसनेस नहीं, सिर्फ शोर शराबे का नहीं होना।
- 59:44ये नहीं है। भीतर मित्र ऐसी शांति है जिसकी
- 59:48तुलना नहीं हो सकती। बाहर ऐसी शांति है ही नहीं किस्से
- 59:53तुलना करें बस समझा सकते हैं कि नॉइज़लेसनेस जो बाहर तुम 15 में
- 1:00:02वनों में। पहाड़ों में ढूंढ़ते हो भीतर वैसी
- 1:00:11शांति नहीं है, बिलकुल अलग तरह की शांति है और वो आती है आनंद से
- 1:00:19आनंद की छाया की तरह। आनंद को उपजालो शांति की फिक्र मत
- 1:00:32करो, पूछा है प्रश्न और जवाब बिलकुल सिंपल है।
- 1:00:44पूछा है एकांत, एकांत बोही भीड़ के इस महकमे को छोड़ दो।
- 1:00:54बुद्धि को इसमें भीड़ भरी हुई है। तुम्हारे सारे तंतु न्यूरोस भरे
- 1:01:00पड़े हैं, यही भीड़ है, उससे भीतर चलोगे?
- 1:01:06हृदय भी भरा हुआ है, घृणा है, प्रेम है, अलग अलग तरह के भाव है,
- 1:01:14ये भी भरा हुआ है। इसको भी छोड़ दो कोपड़ी को भी
- 1:01:19छोड़ दो हृदय को भी छोड़ दो वहाँ चलो जहाँ न भावना है, न विचार है
- 1:01:32विचार तो कोल्हल है। भावनाएँ भी गुलहल हैं और इन दोनों
- 1:01:39तलों को छोड़कर उस तल पे पहुँच जाओ, जीस तल पर मौन है पर मौन है
- 1:01:48उसी तल को एकांत कहते हैं वहाँ पहुँच जाओ।
- 1:01:54इसी को माँ गिरने कहा, केवली हो जाओ, केवल्या की उपस्थिति केवल्या
- 1:02:02की अवस्था केवल्या का सांनिध्य उसके करीब बैठ जाओ।
- 1:02:14अगर तुमने कैवल्य की अवस्था को पा लिया वही एकांत है और वही परम मौन
- 1:02:21है और अगर तुम परम मौन हो गए तो तुम कैवल्य को उपलब्ध हो गए।
- 1:02:28निर्वाण को उपलब्ध हो गए स्थिति प्रज्ञा हो गए।
- 1:02:34ये सब अलग अलग शब्द हैं। बात एक ही है जिधर इशारा है संतो
- 1:02:44का वो वात एक ही है। एकांत क्या है?
- 1:02:53और परम मौन क्या है? वहाँ उतर जाओ तुम्हारे भीतर है,
- 1:02:58तुम इंद्र बन जाओ अपनी इंद्रियों के मालिक बन जाओ, अभी तो
- 1:03:04इंद्रियां तुम्हें नचा रही हैं, अभी तो मन तुम्हें दौड़ा रहा है
- 1:03:10इसकी गृहस्थ से बाहर हो जाओ। इसके क्षेत्र से बाहर हो जाओ और
- 1:03:17जैसे ही तुमने इसका क्षेत्र क्रॉस किया लांघ गए, इसके क्षेत्र को
- 1:03:24तुम उस परमात्मा के क्षेत्र में प्रवेश कर जाओ।
- 1:03:32जहाँ न ईर्ष्या पहुंचती है, न नफरत पहुंचती है, न द्वेष पहुंचती
- 1:03:38है, न अशांति पहुंचती है, न कोई आग पहुंचती है और उसी क्षेत्र को
- 1:03:45कहा है भगवान कृष्ण ने। नैना छिद्दीन तीर्थस्त्रण।
- 1:03:50जहाँ परम मौन है, जहाँ ज़रा भी आवाज़ नहीं जहाँ परम शांति का
- 1:03:58सन्नाटा है, कोई आवास परम मौन की अवस्था वही है जहाँ परम एकांत है,
- 1:04:08तुम अकेले हो जाते हो। और अकेला होना परम सौभाग्य है,
- 1:04:14काश तुम किस दिन अकेले हो जाओ तो इसका बाहर से अभ्यास करो जैसे ही
- 1:04:22फुर्सत में आ जाओ। एक एकांत में कमरे में बैठ जाओ,
- 1:04:28ज्यादा से ज्यादा अभ्यास को बढ़ाते रहो, जिनके पास वक्त है
- 1:04:32ज़रा बैठ के देखो साथ सर जो जो तुमने सोचा था संसार में पाने के
- 1:04:39लिए और बहुत प्रयास करने के बाद भी तुम्हें नहीं मिला वह तुम
- 1:04:44पाओगे। सिर्फ मौन में कुछ न करने में
- 1:04:49सिर्फ आराम से बैठने में वो मिल जाएगा क्योंकि तुम उस तल पर पहुँच
- 1:04:56जाओगे जहाँ जो मांगोगे वो मिल जाएगा वहाँ तुम जो कह दोगे मुख
- 1:05:03से। अब पूरा हो जाएगा पर मौन से
- 1:05:07तुम्हें वाकसिद्धि मिल जाएगी, पर मौन से तुम जो चाहोगे अपने लिए या
- 1:05:15दूसरे के लिए पूरा हो जाएगा। क्या नहीं मिलता पर मौन में जाने
- 1:05:22से एकांत में जाने से? क्या नहीं मिलता सब मिल जाता है
- 1:05:30इसलिए कबीर ने कहा, एक साध है, सब सध है, एक को साध लो, एकांत में
- 1:05:37चले जाओ, सब सध जाएगा, जो तुम चाहोगे वो ही मिल जाएगा।
- 1:05:44सब साथ है सब जाए, लेकिन तुम सभी साधने में चले ये खोपड़ी सभी को
- 1:05:50साधने चाहती है। बौघी पालू, थोड़ी सी इज्जत भी कमर
- 1:05:55थोड़ा धन भी कमर थोड़ी पदवी भी ले लूँ।
- 1:06:02ये बंगला भी मिल जाए, ये कार्य भी मिल जाए, सुंदर स्त्री पुरुष भी
- 1:06:06मिल जाए, सब मिल जाए। तुम सबको साधने में चलते हो, कुछ
- 1:06:11नहीं मिलता। सब गंवा बैठते हो और कबीर का ये
- 1:06:15अमूल्य वचन एक साध है। सब सब है उस एक एकांत में उसको
- 1:06:21साध लो। उसके करीब आ जाओ, सब शब्द जाएगा
- 1:06:24जो तुम चाहोगे वो शब्द जाएगा, यही कल्पवृक्ष है जैसे एकांत तुम कहते
- 1:06:31हो। संत कहते हैं यहाँ जो सोचोगे वहीं
- 1:06:36मिल जाता है। संसार की कोई चीज़ नहीं है।
- 1:06:42तो वहाँ जाके तुम ना पढ़ सकोगे एव्रीथिंग इस पॉसिबल दे अरे जो
- 1:06:50मांगोगे वही मिलेगा। धन्यवाद।